सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

बीबीसी के बंदी के पीछे के तर्क / इर्शादुल हक

सिर्फ बजट कटौती ही कारण नहीं है बीबीसी हिंदी का बंद किया जाना

मेरा मानना है कि बीबीसी हिंदी रेडियो के समाचार कार्यक्रमों का बंद होना ब्रिटेन सरकार के विदेश मंत्रालय से दिये जाने वाले अनुदान में महज कटौती का मामला नहीं है, जैसा कि बीबीसी के वर्ल्ड सर्विस के प्रमुख पीटर हॉरॉक्स का दावा है. इससे पहले उन्होंने दावा किया था कि विदेश मंत्रालय ने उनके अनुदान में 16 प्रतिशत की कटौती की घोषणा की है जिसके तहत उनकी मजबूरी है कि वह 650 नौकरियों की कटौती कर रहे हैं और कुछ सेवाओं को समाप्त कर रहे हैं.
अगर यह मामला सिर्फ बजट यानी पैसे का होता तो  एक आम आदमी यह सवाल कर सकता है कि इसी बीबीसी ने 2008 में पांच करोड़ डॉलर के सालाना बजट से बीबीसी अरबी न्यूज चैनल की शुरूआत क्यों की? जिस तरह से धमाकेदार अंदाज में अलजजीरा न्यूज चैनल से प्रतिसपर्धा करने के लिए बीबीसी ने अपना अरबी चैनल शूरू किया उसका स्पष्ट निशाना उन अरबी भाषियों पर कब्जा जमाना था जो पहले से ही अलजजीरा के दर्शक बने हुए थे. बीबीसी ने उस समय यह भी स्पष्ट किया था कि जरूरत पड़ने पर इसके सालाना बजट में इजाफा किया जा सकता है.
पहले भी विगत चार सालों से बीबीसी के कई विदेशी सेवाओं को बंद किया जा चुका है. इन चार सालों में बीबीसी ने कार्यक्रमों को बंद करने का अभियान छेड. रखा है. एक तरफ कुछ नये क्षेत्रों में विस्तार और दूसरी तरफ कुछ भाषाओं को बंद करने के अभियान से भला कौन सहमत हो सकता है कि उसे बजट की समस्या आ रही है. जो लोग बीबीसी की अन्य भाषाओं के कार्यक्रमों से परिचित हैं उन्हें मालूम होगा कि बीबीसी ने ऊर्दू सेवा का विस्तार अब भी जारी रखा है. पिछले तीन सालों में बीबीसी ने उर्दू रेडियो सेवा के विस्तार के लिए पाकिस्तान के एक या दो नहीं, कुल 34 निजी एफएम रेडियो स्टेशनों से करार किया है. कुछ दिन पहले तक इसके कार्यक्रम पाकिस्तान के इसके पार्टनर मस्त एफएम के सहारे दिन भर में कुल ग्यारह बार प्रसारित किया जाने लगे थे. बीबीसी के पाकिस्तान में इस विस्तार पर जब पाकिस्तान इलक्ट्रोनिक मीडिया रेगुलेटरी ऑथारिटी की नजर पड़ी तो इसने 24 स्टेशनों को बंद कर दिया. इस पर बीबीसी की नाराजगी इतनी बढ़ी की वह इस मामले को अदालत तक ले गया. और काफी सुनवाइयों-लड़ाइयों के बाद कानूनी जीत भी बीबीसी की हुई. फिर इसके कार्यक्रम अन्य कई एफ स्टेशनों से शुरू ह सके.क्या बीबीसी के इस विस्तार में बजट कभी सामने आया?   सच्चाई तो यह है कि 9/11 की घटना के बाद से ही हिंदी के साथ बीबीसी के व्यवाहर में फर्क आना शुरू हो गया था. जो लोग बीबीसी को करीब से जानते हैं वह इस बात को बखूबी महसूस करते हैं. उर्दू की तुलना में हिंदी के साथ बुश हाउस लंदन में उसी समय से वैसा ही व्यवहार किया जाने लगा था जैसा आज भारत के अंग्रीजी अखबारों के दफ्तरों में हिंदी के साथ किया जाता है. यानी नम्बर दो का. उस समय जब किसी ने इसका कारण जानने की कोशिश की तो उन्हें यह तर्क समझाया जाता था कि बीबीसी उर्दू वेबसाइट के पाठकों की संख्या बीबीसी हिंदी की तुलना में चार गुणा अधिक है इस लिए इसके विस्तार में अधिक संसाधन की जरूरत है. पर ध्यान देने की बात है कि वेबसाइट के पाठकों और रेडियो स्रोताओं की सख्या की दृष्टि में नेपाली की हिंदी से क्या तुलना है. फिर भी बीबीसे नेपाली की विस्तार यात्रा जारी है. नेपाल के कम से कम पांच एफएम रेडियो पर बीबीसी नेपाली के कार्यक्रम अब सुने जा रहे हैं.
जाहिर है इस विस्तार में भी भी बजट का प्रबंध तो किया ही गया होगा.बीबसी  बजट में कटौती की भरपाई के लिए कई तरीकों पर गौर करता रहा. फिर आखिर में इसने यह तय भी किया कि उसे बजट की भरपाई के लिए विज्ञापनों का सहारा लेना चाहिए. हालांकि विज्ञापनों की परिपाटी बीबीसी में नहीं रही है. काफी हिलाहुज्जत के बाद बीबीसी ने अपनी कई सेवाओं को यह अनुमति दे भी दी. आप बीबीसी की अंग्रेजी वेबसाइटों पर विज्ञापन देख सकते हैं. तो सवाल यह है कि क्या बीबीसी अपनी हिंदी सेवा के साथ ऐसा नहीं कर सकता था? आखिर दुनिया में न्यूज चैनल, रेडियो या अखबार अपना बजट विज्ञापनों के जरिये ही तो जुटाते हैं. भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था में हजारों करोड़ का विज्ञापन बाजार है. आखिर इस बाजार के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि उसे सिर्फ बीबीसी हिंदी रेडियो के माध्यम से एक करोड़ बीस लाख स्रोताओं तक पहुंचने का मौका मिलता. वैसे भी भारत के ग्रामीण स्रोताओं तक इतनी व्यापक पहुंच(आकाशवाणी को छोड़ कर) किसी भी संचार माध्यम का नहीं है जितना की अकेले बीबीसी का है.

इससे पहले वॉयस ऑफ अमेरिका भी हुई थी बंद

जब हम बीबीसी की बात कर ही रहे हैं तो जरा वॉयस ऑफ अमेरिका की हिंदी सेवा पर कुछ बात कर लें. 2008 में व्यवास ऑफ अमेरिका की हिंदी सेवा बंद कर दी गई थी. 14 सित्मबर 2008 को गल्फ न्यूज में लिखे अपनी रिपोर्ट में पत्रकार रामलक्ष्मी ने वॉयस ऑफ अमेरिका से जुड़े अनाम अधिकारियों के हवाले से खुलासा करते हुए लिखा था कि अमेरिकी सरकार हिंदी सेवा पर सालाना दो करोड़ डॉलर खर्च करती थी. अब इस बजट का उपयोग अरब देशों में प्रसारित होने वाली सेवाओं( अरबी) के लिए किया जायेगा क्योंकि शीत युद्ध की समाप्ति और भारत की तेज रफ्तार आर्थिक विकास के बाद अमेरिका की प्राथमिकताएं बदल गईं हैं. सवाल यह है कि क्या बीबीसी उन नीतियों का अनुसरण कर रहा है जिसे अमेरिका ने दो साल पहले शूरू किया था?
तो फिर आखिर क्या वजह है कि बीबीसी के रेडियो कार्यक्रम जो शॉट वेव पर पिछले 66 सालों से चलाये जा रहे थे, उसे बंद किया जा रहा है?

क्या इसके कारण बीबीसी की कोई खास पालिसी या रणनीतिक अभियान का हिस्सा तो नहीं है ? आप बीबीसी की निष्पक्षता के कायल हो सकते हैं. लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया की कोई भी समाचार संस्था अपने एक खास अभियान और हित के तहत ही काम करती है. बीबीसी भी उससे बरी नहीं है. मोटे तौर पर बीबीसी का हित पश्चिमी देशों के हितों पर केंद्रित रहा है. फिलहाल पश्चिमी देशों के हित भारतीय उपमहाद्वीप में अफगानिस्तान, कश्मीर, और पाकिस्तान हैं. इसी तरह मध्यपूर्व यानी अरब देश उनकी प्राथमिकता में हैं. कहीं अरबी भाषा का न्यूज चैनल शुरू किया जाना और उर्दू सेवा को मजबूत करना इसी अभियान का हिस्सा तो नहीं है? बीबीसी के अंदर के कुछ सूत्र तो यह भी बताते हैं कि बीबीसी उर्दू का न्यूज चैनल भी शुरू करने की योजना पर काम कर रहा है. हालांकि इसकी सच्चाई पर अंतिम रूप से फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता.तो फिर बीबीसी की हिंदी सेवा के बंद करने की घोषणा के पीछे क्या रणनीति हो सकती है?  इसके जवाब के लिए हमें इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि क्या भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति ने जो पश्चिमी देशों के लिए चुनौती पेश की है, उससे पश्चिम की उम्मीदें भारत के प्रति कुछ बदल रही हैं? क्या भारत अब वह भारत है जो बीस साल पहले था.  बीबीसी हिन्दुस्तानी ( हिंदी-उर्दू) की शुरूआत उस समय हुई थी जब भारत पर से ब्रितानियों की पकड़ ढीली हो चली थी. ऐसे में भारत की जनता को प्रभावित करने उनसे संवाद बनाने के डायरेक्ट रास्ते बंद होते जा रहे थे. ऐसे में उन्हें इस हथियार की जरूरत थी. पर अब भारत के खुले बाजार की नीति के कारण उनके लिए भारत कोई बंद समाज नहीं रहा जहां रेडियो तरंगों से पहुंचने की जरूरत हो. वॉयस ऑफ अमेरिका और बीबीसी के हिंदी प्रसारणों के बंद किये जाने को हमें इसी आईने में देखने की जरूरत है.


(इर्शादुल हक लंदन के कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया में काम कर चुके हैं और फिलहाल तहलका से जुड़े हैं)

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