शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

गाँधी की पत्रकारिता और राष्ट्रीयता / डॉ. कमल किशोर गोयनका


प्रकाशन :गुरूवार, 1 अप्रेल 2010
डॉ. कमल किशोर गोयनका






















मोहनदास करमचन्द गाँधी जब बैरिस्टरी करने के लिए वर्ष 
 1888 में इंग्लैण्ड जाने लगे तो उनके युवा-मन में अपने समाज और देश के प्रति दायित्व का भाव था। वह नवजागरण का युग था और देश की संस्कृति और स्वाधीनता तथा समाज को सुधारने की चेतना फैलती जा रही है। गांधी भी इंग्लैण्ड से लौटकर हिन्दुस्तान में बड़े-बड़े सुधार करने का संकल्प लेकर ही भारत से जा रहे थे। गांधी इंग्लैण्ड पहुँचकर कुछ महीनों तक अँगरेज़ी रीति-नीति व्यवहार और वेशभूषा के मोहक जाल में फँसे रहे, परन्तु अपनी माँ को दिये तीन वचनों (मांस, मदिरा एवं परस्त्री गमन का निषेध) के कारण उन्होंने अपनी हिन्दुस्तानी अस्मिता को बचाकर रखा। उन्हें देश की ख़ूब याद आती, माता का प्रेम मूर्तिमान होता और रात होने पर रोने लगते। उन्होंने वहाँ गीता का अध्ययन किया और अन्नाहार का प्रचार किया। गांधी दक्षिण अफ्रीका गये तो उनमें भारतीय होने का स्वाभिमान जागृत हुआ और उन्होंने भारतीयों को एक करने के लिए एक मंडल की स्थापना की। गांधी वहाँ कई बार अँगरेज़ों के द्वारा अपमानित हुए और उन्होंने देखा कि वहाँ के प्रवासियों को गिरमिटिया तथा कुली कहकर अपमानित किया जाता है। गांधी ने मंडल बनाकर दक्षिण अफ्रीका के भारतीयों से परिचय बढ़ाया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की तर्ज़ पर निराल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की और अपने विदाई समारोह में भारतीयों से मताधिकार छीनने का समाचार पढक़र उन्होंने समारोह को संघर्ष समिति में बदल दिया। गाँधी के इस देश-प्रेम ने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना को उत्पन्न किया। गांधी ने लिखा, ‘उपस्थित संकट के सामने नीच-ऊँच, छोटे-बड़े, मालिक-नौकर, हिन्दू-मुसलमान, पारसी-ईसाई, गुजराती-मद्रासी-सिन्धी-कलकत्ते वाले आदि का भेद समाप्त हो चुके थे। सब भारत की सन्तान और सेवक थे।’1 गांधी के मताधिकार के मामले में उनके प्रयास यद्यपि सफल नहीं हुए, लेकिन हिन्दुस्तानियों में एक ही देश की सन्तान होने का भाव उत्पन्न हुआ। गांधी ने इस राष्ट्र-प्रेम पर लिखा, ‘सब जानते थे कि यही नतीजा निकलेगा, पर कौम में नवजीवन का संचार हुआ। सब कोई यह समझे कि हम एक कौम हैं, केवल व्यापार-सम्बन्धी अधिकारों के लिए ही नहीं, बल्कि कौम के अधिकारों के लिए भी लडऩा हम सबका धर्म है।’2 इस प्रकार गांधी के राष्ट्रीय स्वाभिमान ने अपमानित, तिरस्कृत एवं अधिकार विहीन गिरमिटिया हिन्दुस्तानियों के मन में देश-प्रेम तथा संस्कृति-बोध का भाव उत्पन्न किया और फिर दोनों ने मिलकर सत्ता के विरुद्ध अहिंसक सत्याग्रह किया। यह गांधी की राजनीतिक और शैक्षणिक लड़ाई थी, जिसमें उनका अपना कोई हित नहीं था, सार्वजनिक हित ही सर्वोपरि था।
गांधी अपनी राष्ट्रीय भावना तथा हिन्दुस्तानियों के उद्धार के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिकारियों, पत्र-पत्रिकाओं के सम्माद कों, भारत के राष्ट्रीय नेताओं आदि के बराबर सम्पर्क में रहे। उन्होंने कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भाग लिया और दक्षिण अफ्रीका के हिन्दुस्तानी प्रवासियों की दुर्दशा एवं उन्हें क़ानूनी अधिकार दिलवाने का प्रस्ताव स्वीकार कराया। उन्होंने जब दक्षिण अफ्रीका में ‘इंडियन ओपिनियन’ समाचार पत्र निकाला तो उसमें हिन्दुस्तानी (इंडियन) दृष्टिकोण ही प्रमुख था। गांधी ने जब वर्ष 1919 में ‘यंग इंडिया’, ‘नवजीवन’ तथा 1933 में ‘हरिजन’ निकाला तो उनके सम्मुख युवा भारत, भारत का नवजीवन तथा भारतीय जनता ही थी। समाचार पत्रों के इन नामकरणों से सिद्ध होता है कि गांधी की पत्रकारिता की बुनियाद भारत-प्रेम और राष्ट्रीयता ही थी। गांधी ने ‘इंडियन ओपिनियन’ में कई बार अपने उद्देश्यों की घोषणा की ओर उनमें मुख्यत: हिन्दुस्तानी समाज के कल्याण का ही लक्ष्य था। गांधी ने लिखा कि उनका उद्देश्य सेवा करना तथा शिक्षा एवं स्वाभिमान में वृद्धि करना है। ‘इंडियन ओपिनियन’ के द्वारा वे भारतीयों के कष्टों को दूर करने तथा उन्हें सुनीति की शिक्षा देना चाहते थे। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का लक्ष्य आजीविका कमाना नहीं है, बल्कि लोक-शिक्षा ही उसका मुख्य कार्य है। इसी कारण गांधी ने ‘इंडियन ओपिनियन’ को समाचार-पत्र न बनाकर विचार-पत्र बनाया, बल्कि वह ‘जागरण-पत्र’ भी था। दक्षिण अफ्रीका में जो भारतीय समाज था, वह एक प्रकार से ‘मिनी भारत’ ही था जिसमें कई धर्मों, जातियों, भाषियों एवं क्षेत्रों के लोग शामिल थे। इसी कारण गांधी ने ‘इंडियन ओपिनियन’ (20 अप्रैल,1906) को लिखा कि इस समाचार-पत्र की मदद करना हर एक भारतीय का फ़र्ज़ है, क्योंकि इसके कर्मचारी तक स्वदेशाभिमान के कारण अत्यल्प साधनों पर भी काम कर रहे हैं। गांधी ने जब ‘फीनिक्स आश्रम’ खोला था तब भी गांधी ने लिखा था कि जो लोग भारत की सेवा करना चाहते हैं, उनके लिए फीनिक्स महान क्षेत्र है।3 गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि ‘इंडियन ओपिनियन’ मेरे जीवन का निचोड़ है और इसने हिन्दुस्तानी समाज की अच्छी सेवा भी है। इस अख़बार के बिना सत्याग्रह की लड़ाई चल नहीं सकती थी। गांधी ने लोक-सेवा, लोक-शिक्षा, लोक-जागृति एवं लोक-संघर्ष से ‘इंडियन ओपिनियन’ को जोडक़र प्रवासी हिन्दुस्तानियों का मुख-पत्र बना दिया और अपने देश बन्धुओं को एक मंच पर लाकर मुक्ति और संघर्ष के अपने दर्शन का सहभागी बना दिया।
इस प्रकार ‘इंडियन ओपिनियन’ की बुनियाद गांधी की अपराजेय राष्ट्रीयता, देशभक्ति तथा भारतीयता पर टिकी थी। उनकी सन् 1909 में लिखी ‘हिन्द स्वराज्य’ पुस्तक इसका ज्वलन्त प्रभाव है। गांधी ने इसे इंग्लैण्ड से लौटते समय जहाज पर इसे गुजराती में लिखा था और इंडियन ओपिनियन के गुजराती स्तम्भ में छपवाया था। हिन्द स्वराज्य अहिंसा और आत्मबल की श्रेष्ठता का ही आख्यान नहीं है, उसमें तो भारतीय संस्कृति, जीवन-पद्धति, मानवीय मूल्यों की श्रेष्ठता एवं युग के नवजागरण का शंखनाद भी है। हिन्द स्वराज्य से ली गयीं निम्नलिखित पंक्तियों इसी गांधी-दर्शन की प्रभाव हैं:—
1. कांग्रेस ने हिन्दुस्तानियों में ‘हम एक राष्ट्र हैं’, ऐसा जोश पैदा किया।
2. बंग-भंग से देश में सही जागृति आयी और अब जागा हुआ देश सोयेगा नहीं। इस जागृति ने अँगरेज़ी जहाज में हमेशा के लिए दरार डाल दी है।
3. मेरी कल्पना में स्वराज्य में हिन्दुस्तान अँगरेज़ नहीं बनेगा।
4. मुझे धर्म प्यारा है और हिन्दुस्तान धर्म-भ्रष्ट होता जा रहा है।
5. जब अंग्रेज हिन्दुस्तान में नहीं थे तब हम एक राष्ट्र थे हमारे विचार एक थे, हमारा रहन-सहन एक था। जिन दूरदर्शी पुरुषों ने सेतु बन्ध रामेश्वर, जगन्नाथपुरी और हरिद्वार की यात्रा ठहराई, उन्होंने सोचा कि कुदरत ने हिन्दुस्तान को एक देश बनाया है, इसलिए वह एक राष्ट्र होना चाहिए। इसलिए उन्होंने अलग-अलग स्थान तय करके लोगों को एकता का विचार इस तरह दिया, जैसा दुनिया में और कही ही दिया गया है।
6. जो सभ्यता हिन्दुस्तान ने दिखायी है, उसको दुनिया में कोई नहीं पहुँच सकता।
7. स्वदेशाभिमान का अर्थ है मैं देश का हित समझता हूँ।
8. मेकॉले ने शिक्षा में गुलामी की बुनियाद डाली।
9. सारे हिन्दुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होनी चाहिए।
10. स्वराज्य गोला-बारूद से नहीं, सत्याग्रह से ही मिलेगा।
इस प्रकार हिन्द स्वराज्य गांधी के स्वराज्य दर्शन का जीवन बिम्ब है, जिसके मूल में भारत का राष्ट्र-हित एवं सांस्कृतिक उत्कर्ष है। गांधी की यह राष्ट्रीयता ही भारतीय पत्रकारिता का मूलाधार है। पराधीन भारत में पत्रकारिता का यही एकमात्र प्रतिमान हो सकता था। गांधी अपने समय के अन्य विचारकों तथा संस्कृत के महान ग्रंथों के प्रभावानुसार भारत को अपनी माता मानकर पुत्र के नाते उसकी सेवा का संकल्प लेते हैं। वे ‘यंग इंडिया’ के 3 अप्रैल, 1924 के अंक में लिखते हैं, ‘मैं भारत की आजादी के लिए प्रयत्न क्यों कर रहा हूँ? इसलिए कि मेरा स्वदेशी धर्म मुझे सिखाता है कि इस देश में मेरा जन्म हुआ है। इस देश की संस्कृति मुझे विरासत में मिली है, इसलिए मैं अपनी माता की सेवा करने का ही अधिक-से-अधिक पात्र हूँ और मेरी सेवा पर पहला हक इस जन्म-भूमि का है, परन्तु मेरी स्वदेश-भक्ति मुझे दूसरे देश की सेवा से विमुख नहीं करती।’5 गांधी की देशभक्ति में देश के साथ माता-पुत्र के सम्बन्ध का विचार हिन्दू संस्कृति से मिला है। गांधी का यह राष्ट्र-धर्म च्स्वच्छ देश-सेवा है।6 और इसका सबसे बड़ा आधुनिक साधन समाचार-पत्र है।7 गांधी का मत था कि पत्रकारिता नि:स्वार्थ भाव से देश की सेवा के लिए होनी चाहिए तथा जनता के मनोभावों को निर्भयता तथा निश्चयात्मक रूप में व्यक्त करना चाहिए। इसीलिए वे घोषणा करते हैं कि ‘नवजीवन’ का उद्देश्य स्वराज्य-प्राप्ति है।8 नवजीवन भारतीय भाषा गुजराती में और बाद में हिन्दी आदि भाषाओं में निकलता था, जो गांधी की राष्ट्रीय चेतना का प्रमाण था। भारतीय भाषाओं वाला समाज ही वास्तविक भारत था और उस तक देशीय भाषाओं की पत्रकारिता से ही पहुँचा जा सकता था। इस भारत-लोक की सेवा तथा लोक-शिक्षा ही गांधी की राष्ट्रीयता के अंग थे।
यंग इंडिया (अँगरेज़ी) का वैचारिक आधार भी राष्ट्रीयता ही थी। समाचार-पत्र की भाषा बदलने से उसके पाठक तो बदलते हैं, परन्तु गांधी के विचार पूर्ववत् रहते हैं। यंग इंडिया के प्रकाशन का कारण यह था कि गांधी देश-विदेश तथा सरकार में अँगरेज़ी में ही समझने वाले लोगों तक अपने विचार तथा कार्यक्रम पहुँचाना चाहते थे। गांधी मानते थे कि अँगरेज़ी में अखबार निकालना उनके लिए कोई प्रसन्नता की बात नहीं है, लेकिन वे उसे छोड़ नहीं सकते क्योंकि अँगरेज़ मानते हैं कि उनकी अँगरेज़ी में कुछ ख़ूबी है और पश्चिम से भी उनका सम्बन्ध बढ़ा है।9 गांधी, ‘यंग इंडिया’ के प्रवेशांक (8 अक्टूबर, 1919) में ‘देश की सेवा’ और ‘पत्रकारिता की शुद्धता’ पर बल देते हुए उसके उद्देश्य पर लिखते हैं, ‘यह व्यक्तियों के प्रति होने वाले अन्यायों की ओर ध्यान आकृष्ट करने का अपना कत्र्तव्य तो निभायेगा ही, साथ ही रचनात्मक सत्याग्रह और यदा-कदा परिशोधक सत्याग्रह की ओर से शक्ति लगायेगा ।’10 गांधी का यह रचनात्मक सत्याग्रह ‘लोकमत के जागरण’ और ‘स्वराज्य’ के लिए था। गांधी इस स्वराज्य की परिभाषा में अख़बारों 12 जनवरी, 1922 को यंग इंडिया में लिखते हैं कि अन्याय का विरोध करने के लिए भाषण, सभा-सम्मेलन तथा मुद्रणा की स्वतन्त्रता शक्तिशाली और महत्वपूर्ण है और इन तीनों अधिकारों की पुन: स्थापना लगभग पूर्ण स्वराज्य के समान है। 11 गांधी की पत्रकारिता इन तीनों स्वतंत्रताओं के लिए संघर्ष करती है, लोकमत जागृत करती है और स्वराज्य आन्दोलन को राष्ट्रव्यापी बनाती है। गांधी ऐसे समाचार-पत्रों को ‘राष्ट्रवादी अखबार’ कहते हैं और अपनी पत्रकारिता को ‘स्वदेश-धर्म’, जो उन्हें भारत-माता की सेवा का अधिकार देता है।12 इसी कारण, गांधी के अनुसार, उनकी पत्रकारिता, पत्रकारिता के लिए नहीं है, उनके जीवन को जो ध्येय है, उसके सहायक के रूप में है और जीवन का ध्येय है—अत्यंत संयतपूर्ण जीवन और संयत उपदेश के द्वारा सत्याग्रह के अद्भुत अस्त्र का प्रयोग सिखाना, सत्याग्रह, सत्य और अहिंसा से सीधा फलित होने वाला व्यवहार है।13 गांधी ने ‘हरिजन’ का सम्पादन-प्रकाशन कुछ मिनी रूप में किया, क्योंकि उन्होंने ब्रिटिश सरकार के इस प्रतिबन्ध को स्वीकार कर लिया था कि वे हरिजन-सेवा तक सीमित रहेंगे और ‘राजनीतिक विषयक सामग्री’ से दूर रहेंगे। इस कारण ‘हरिजन’ अस्पृश्यता-निवारण और उसके आन्दोलन तक सीमित रहा, क्योंकि अब उनका विश्वास था कि छूआछूत का भूत रहते हुए स्वराज्य आकाश पुरूष सा ही रहेगा।14 गांधी अब सामाजिक सुधार से स्वराज्य तक पहुँचना चाहते थे और अब वे किसी सरकारी आज्ञा की अवज्ञा भी करना नहीं चाहते थे। गांधी ‘अँगरेज़ों भारत छोड़ो’ तथा ‘करो या मरो’ के राष्ट्र-व्यापी आंदोलन में भी वे समाचार-पत्रों को यह संदेश देते रहे कि हिन्दुस्तान के समाचार-पत्र निर्भयता पूर्वक राष्ट्रीय हित का प्रतिपादन करें तथा राष्ट्रीय-हित की भावना से प्रेरित भारतीयों को यह चेतावनी देते रहें कि अँगरेज़ों के विरूद्ध या परस्पर हिंसा का कोई काम न करें, क्योंकि हिंसा हमारे ध्येय को प्राप्त करने में बाधक बनेगी।15 स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद तो गांधी को हरिजन समाचार पत्र की भी अनावश्यक प्रतीत होने लगा था। निष्कर्षत: गांधी के व्यक्तित्व का विकास और पत्रकारिता से उनका सम्बन्ध नवजागरण में भारत की जनता और बुद्धिजीवी अपने राष्ट्रीय बिम्ब और अस्मिता की खोज में थे। मैथिलीशरण गुप्त की यह पँक्ति नवजागरण की इस राष्ट्रीय चेतना का ही उद्घाटन करती है— ‘हम कौन थे क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी/ आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।’
यह विशुद्ध रूप से राष्ट्रीय- सांस्कृतिक जागरण था जो अँगरेज़ी साम्राज्यवाद, औपनिवेशिक कुशासन, दमन एवं दासता तथा पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान की श्रेष्ठता तथा चमत्कारों के दबाव में अपने राष्ट्रीय सांस्कृतिक स्वरूप में पारिभाषित करके अपनी स्वतन्त्रता तथा संस्कृति के लिए जनता को जागृत कर रहा था। गांधी ने इसके लिए सामाजिक सुधार तथा एकख के लिए प्रयत्न किया, भारतीयों को संगठित किया, स्वाभिमान और अधिकारों के लिए समाचार-पत्र निकाले और जेल-यात्राएँ की। दक्षिण अफ्रीका में इंडियन ओपिनियन परदेश में भी स्वदेशानुभूति एवं देशाभिमान से परिपूर्ण समाचार-पत्र था। गांधी ने सही लिखा था कि इंडियन ओपिनियन में उन्होंने अपनी आत्मा उड़ेल दी थी। यह भारतीय आत्मा ही थी जिसने गांधी से ‘नेटाल इंडियन कांग्रेस’ की स्थापना करायी, हरी पुस्तिका एवं हिन्द स्वराज्य लिखवाया, इंडियन ओपिनियन , नवजीवन, यंग इंडिया, हरिजन आदि समाचार पत्रों को निकलवाया और समाचार पत्रों का उपयोग राष्ट्रीय चैतन्य एवं मुक्ति के लिए करवाया। दक्षिण अफ्रीका हो या भारत, पत्रकारिता एवं राष्ट्रीय मुक्ति के लिए एक ही दर्शन था। अन्तर केवल इतना था कि दक्षिण अफ्रीका में हिन्दुस्तानियों की अन्यायी कानूनों एवं भेदभाव से मुक्ति और उनके स्वाभिमान की लड़ाई थी और भारत में ब्रिटिश साम्राज्वाद को समूह नष्ट करके स्वराज्य प्राप्ति का संघर्ष था। हिन्दुस्तानियों के इस स्वराज्य संघर्ष में गांधी ने अपनी पत्रकारिता का उपयोग लोक-सेवा, लोक-शिक्षा, लोक-जागरण और लोक-संघर्ष में करके उसे राष्ट्रीयता के उच्चतम शिखर तक पहुँचा दिया। गांधी का लक्ष्य जनता का स्वराज्य था, इस कारण गांधी ने देश की भाषाओं में पत्रकारिता को महत्व दिया। उनका उद्देश्य पवित्र था, अत: पत्रकारिता भी पवित्र थी। उनकी पत्रकारिता में पवित्रता, नैतिकता, शुद्धता, सत्यता, लोक-हित, लोक-सेवा, स्वार्थ विसर्जन तथा मानवीयता विद्यमान थी। गांधी स्वयं को ‘शौक़िया पत्रकार’ कहते थे, परन्तु वे राष्ट्रीय पत्रकार थे। उन्होंने अपनी पत्रकारिता में राष्ट्रीयता को मूलाधार बनाकर पत्रकारिता की एक ‘सर्वोत्तम परम्परा’ विकसित की तथा उसे अपने आचरण में उतार एक सर्वोत्तम प्रतिमान एवं परम्परा को रूप दिया और अपने युग का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय-दर्शन बना।
1. आत्मकथा अथवा सत्य के प्रयोग, पृष्ठ 83-84
2. वही, पृष्ठ 117
3. संपूर्ण गांधी वाड्मय, खंड 14, पृष्ठ 83
4. वही, खंड, 12, पृष्ठ 476
5. वही खंड 23, पृष्ठ 363
6. वही खंड 25, पृष्ठ 222
7. वही खंड, टिप्पणी संख्या 380 तथा जुलाई, 1919 की टिप्पणी
8. वही खंड 41, पृष्ठ 220
9. वही खंड 90, पृष्ठ 427
10. वही खंड 16, पृष्ठ 230
11. वही खंड 22, पृष्ठ 188-90
12. वही खंड 22, पृष्ठ 84 एवं खंड 23, पृष्ट 363
13. वही खंड 27, पृष्ठ 334
14. वही खंड 72, पृष्ठ 501
15. वही खंड 76, पृष्ठ 402

 डॉ. कमल किशोर गोयनका
९८, अशोक विहार, फेज-प्रथम
दिल्ली-110052
ई-मेल- kkgoyanka@gmail.com
 

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