गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

विज्ञापनी पत्रकारिता के बीच / वर्तिका नन्दा


vartika new.jpg
वर्तिका नन्दा, वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक
विज्ञापन के दौर में आ गई पत्रकारिता के लिए यह साल बहुत रोचक और चुनौतीपूर्ण होने वाला है। इंदिंरा के बाद कौन, राजीव के बाद जैसे सवालों से भारतीय जनता का सामना हमेशा हुआ। अब अन्ना के बाद कौन। अन्ना के जिस ब्रांड के भरोसे मीडिया का बाजार गुलाबी हुआ, वह बहुत ही जल्द फीका भी पड़ गया। मुद्दे उठे, लाइव रिपोर्टिंग हुई, संसद तक में हंगामा भी पर फिर सब कुछ पूरी तरह से ठस्स।
              
तो यह पत्रकारिता का एक नया चेहरा है। यहां व्यक्ति विशेष या मुद्दा विशेष एकाएक परम जरूरी हो जाता है और फिर एकाएक गायब। पर न्यूज से विज्ञापन गायब नहीं होते। वे अलग-अलग तरीकों से कायम रहते हैं।
एक न्यूज चैनल पर हाल ही एंकर जिस लैपटाप का इस्तेमाल कर रहे थे, उस पर मसाले की एक कंपनी का विज्ञापन बचकाने तरीके से चिपक था। कुछ यूं कि विज्ञापन बड़ा और लैपटाप छोटा दिख रहा था। यह सीधा विज्ञापन है। लैपटाप इस कंपनी से मुफ्त मिला है सो हम उसे प्रचारित कर रहे हैं । यह हास्यास्पद है पर बहुत खतरनाक नहीं पर दूसरे विज्ञापन तुरंत जनता की पकड़ में नहीं आते। वारदात में यह बताया जाना कि कैसे शाहरूख खान की फिल्म के आने से पहले पाइरेसी का बाजार चल निकला है और कितने करोड़ का कारोबार करने वाला है, महज खबर नहीं है और महज अपराध नहीं है। यह एक प्रचार है। फिल्मी सितारों का बड़े परे की बजाय छोटे परदे पर ज्यादा समय बिताते हुए बार-बार यह बताना कि किस फिल्म के शूट के दौरान क्या-क्या हुआ भी कोई खबर नहीं है।
तो इस साल खबर की दुनिया को गैर-जरूरी प्रचारों से जूझने के बारे में सोचना होगा। जनता फिलहाल नासमझ है पर उसकी नासमझी का थर्मामीटर छ महीने बाद भी यहीं पर टिका रहेगा, यह कतई जरूरी नहीं। कैमरों को अब समाज की तरफ मुड़ने की कोई रणनीति बनानी होगी। जहां पैसा भी आए पर साथ ही मीडिया के मीडिया होने की शर्तें भी पूरी हों। यह जनता है और जनता आखिरकार सब कुछ जानती भी है।  
  • 30/01/2012
    प्रमोद जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

    ऑनलाइन संचार दुनिया भर में विचार का विषय है। बेशक इसके मार्फत धोखाधड़ी और हेरफेर के मामले भी सामने आ रहे हैं, पर किसी भी एक कार्रवाई का प्रभाव कितना दूरगामी होगा, इसे देखने की ज़रूरत भी है।
  • 20/01/2012
    वर्तिका नन्दा, वरिष्ठ मीडिया  विश्लेषक

    तीन दिनों तक प्रियंका ही खबरों में रहीं। उनकी मुस्कुराहट, उनके कपड़ों का रंग, हंसने की अदा, फुर्ती, हाजिरजवाबी, मन को मोहने वाली बातें, अपनी
    दादी से मिलता चेहरा, मिलनसारिता, उनके व्यक्तित्व का करिश्मा और भी न जाने क्या-क्या। हालांकि इनमें से किसी भी बात से इंकार नहीं किया जा सकता पर मीडिया की मुग्ध होती रिपोर्टिंग और रसीली एंकरिंग के कुछ पहलुओं पर इंकार जतलाना जरूरी लगता है।
  • 17/01/2012
    आनंद प्रधान, एसोसिएट एडिटर आईआईएमसी

    इन विरोध प्रदर्शनों और आन्दोलनों खासकर आक्युपाई वाल स्ट्रीट प्रदर्शनों में सिर्फ बड़े कारपोरेट समूह, सत्ता प्रतिष्ठान और राजनीतिक वर्ग ही निशाने पर नहीं थे बल्कि खुद कारपोरेट मीडिया और उसका झूठ भी निशाने पर थे। सच पूछिए तो इस आंदोलन ने जिस तरह से मुख्यधारा के कारपोरेट मीडिया को नकार दिया और नए और वैकल्पिक मीडिया के जरिये लोगों के बीच सूचना-संवाद-बहस और गोलबंदी शुरू की है, वह भविष्य की ओर संकेत करता है।
  • 10/01/2012
    एन. के. सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
    नोबल पुरस्कार विजेता एवं विख्यात अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने इस साल के प्रथम सप्ताह में ही मीडिया की खराब गुणवत्ता की दो घटनाएं झेलीं। लोकपाल से संबंधित एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने जवाब दिया। अगले दिन जब उन्होंने देश के एक बड़े अंग्रेजी अखबार और कई टीवी चैनलों को देखा, तब उसमें शीर्षक पाया ‘लोकपाल विधेयक सूझ-बूझ से लाया गया बिल-अमत्र्य सेन’। जबकि कुछ अखबारों ने शीर्षक दिया था- ‘लोकपाल विधेयक बगैर सोचे-समझे लाया गया बिल- सेन’। एक अन्य आर्थिक समाचार पत्र ने एक दिन पहला शीर्षक दिया और दूसरे दिन दूसरा शीर्षक
  • 28/12/2011

    पीयूष पांडे, साइबर पत्रकार 
    सोशल मीडिया की दुनिया सिर्फ एक साल में कितनी बदल गई ! फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, ब्लॉग और सोशल मीडिया के तमाम दूसरे मंच बीते कई साल से सुर्खियां बटोरते रहे हैं, लेकिन 2011 जैसा साल पहले कभी नहीं दिखा। इस साल सोशल मीडिया के जरिए न केवल बड़े आंदोलन परवान चढ़े बल्कि इसकी ताकत का अहसास दुनिया भर की सरकारों को इस कदर हुआ कि इन मंचों पर पाबंदी के रास्ते खोजे जाने की एक प्रक्रिया शुरु हो गई।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें