गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

पत्रकारिता






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ताजा घटनाचक्र, मीडिया, कुछ अटपटा-कुछ चटपटा और कुछ बैठे-ठाले मुखपृष्ठ मीडिया 1947 के बाद मेरा पन्ना लेख इन्हें भी पढ़ें आपकी राय


Monday, August 29, 2011
कैसा संवाद संकलन? [Image]


27 के इंडियन एक्सप्रेस में श्रीमती मृणाल पांडे का लेख प्रकाशित हुआ है, जिसमें हिन्दी अखबारों के संवाददाताओं को विज्ञापन लाने के काम में लगाने का जिक्र है। हिन्दी अखबारों की प्रवृत्तियों पर इंटरनेट के अलावा दूसरे मीडिया पर बहुत कम लिखा जाता है। अन्ना हजारे के अनशन के दौरान कुछ लोगों ने कहा कि हमारी भ्रष्ट-व्यवस्था में मीडिया की भूमिका भी है। ज्यादातर लोग मीडिया से उम्मीद करते हैं कि वह जनता की ओर से व्यवस्था से लड़ेगा। पर क्या मीडिया इस व्यवस्था का हिस्सा नहीं है? और मीडिया का कारोबारी नज़रिया उसे जन-पक्षधरता से दूर तो नहीं करता? बिजनेस तो इस व्यवस्था का हिस्सा है ही।
मीडिया का कारोबारी चेहरा न तो हाल की उत्पत्ति है और न वह भारत में ही पहली बार उजागर हुआ है। संयोग से हाल में ब्रिटिश संसद ने न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड को लेकर उसके मालिक रूपर्ट मर्डोक की जैसी घिसाई की उससे इतना भरोसा ज़रूर हुआ कि दुनिया के लोग किसी न किसी दिन इस तरफ ध्यान देंगे। अब हम मीडिया शब्द का इतना ज्यादा इस्तेमाल करते हैं कि पत्रकारिता शब्द भूलते जा रहे हैं। मीडिया में कारोबार शामिल है। पत्रकारिता शब्द में झलकता है लिखने-पढ़ने का कौशल और कुछ नैतिक मर्यादाएं।अधिक पढ़ें » Posted by pramod joshi 3 comments Links to this post Labels: Monday, March 28, 2011
कॉरपोरेट दलाली और इस दलाली में क्या फर्क है? [Image]चूंकि बड़ी संख्या में पत्रकारों को कॉरपोरेट या राजनैतिक दलाली में कुछ गलत नहीं लगता, इसलिए जीवन के बाकी क्षेत्रों में भी दलाली सम्मानजनक कर्म का रूप ले ले तो आश्चर्य नहीं। अमेरिका के एक पुरस्कृत खेल पत्रकार ने वेश्यावृत्ति की दलाली का काम इसलिए शुरू किया कि उसके संस्थान ने उसका वेतन कम कर दिया था। अखबारों की गिरती आमदनी के कारण उसका वेतन कम किया गया था।
अमेरिका के मैनचेस्टर, न्यू हैम्पशर के केविन प्रोवेंचर को सेलम, मैसाच्यूसेट्स की एक अदालत ने ढाई साल की कैद की सजा दी है। ये सज्जन न्यू हैम्पशर और मैसाच्यूसेट्स में वेश्यावृत्ति का कारोबार चलाते थे। इन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा, डाउनटर्न के कारण अखबार ने मेरा वेतन कम कर दिया था। उसकी भरपाई के लिए यह काम कर रहा था। इस पत्रकार को न्यू हैम्पशर के सर्वश्रेष्ठ स्पोर्ट्स राइटर का पुरस्कार चार बार मिल चुका है।अधिक पढ़ें » Posted by pramod joshi 2 comments Links to this post Labels: Tuesday, March 15, 2011
भारत से जुड़े विकीलीक्स हिन्दू में [Image]भारत से जुड़े विकीलीक्स के केबल का गेट भी खुल गया है। चेन्नई के अखबार हिन्दू ने अमेरिकी दूतावास द्वारा भेजे गए केबल 15 मार्च के अंक से छापने शुरू कर दिए हैं।
हिन्दू द्वारा प्रकाशित केबलों के संदर्भ में आज अखबार के सम्पादक एन राम ने पहले सफे पर लिखा है कि विकीलीक्स के साथ हमारी बातचीत दिसम्बर में शुरू हुई थी। उन्होंने लिखा है--
The India Cables have been accessed by The Hindu through an arrangement with WikiLeaks that involves no financial transaction and no financial obligations on either side. As with the larger 'Cablegate' cache to which these cables belong, they are classified into six categories: confidential, confidential/noforn (confidential, no foreigners), secret, secret/noforn, unclassified, and unclassified/for official use only.
Our contacts with WikiLeaks were initiated in the second week of December 2010. It was a period when Cablegate had captured the attention and imagination of a news-hungry world.
[Image]नीचे मैने वह लिंक भी दिया है जहाँ से आप इन केबल्स को सीधे पढ़ सकते हैं। दरअसल इन्हें पढ़ने और समझने में समय लगाना पड़ेगा। हिन्दू में आज एन राम के अलावा पाँच वरिष्ठ पत्रकारों की आलोख और छपे हैं। इनके नाम हैं सुरेश नामबथ, निरुपमा सुब्रह्मण्यम, सिद्धार्थ वर्दराजन, पी साईनाथ और हसन सुरूर। हिन्दू का दृष्टिकोण आमतौर पर अमेरिका विरोधी होता है। और वह भारतीय विदेशनीति में अमेरिका-समर्थक तत्वों को पसंद नहीं करता। इसलिए उसके आलेख इसी किस्म के हैं, पर यह रोचक है कि भारत में विकीलीक्स का पहला शेयर हिन्दू को मिला.
यहाँ पढ़ें हिन्दू में विकीलीक्स के संदर्भ में एन राम की पूरी टिप्पणी
विकीलीक्स के भारत से जुड़े केबल सीधे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें Posted by pramod joshi 4 comments Links to this post Labels: , , Tuesday, March 08, 2011
पत्रकारीय मर्यादा की स्वर्णिम शपथ [Image]देश के सबसे बड़े बिजनेस अखबार इकोनॉमिक टाइम्स या ईटी ने अपने 7 मार्च के अंक के पहले सफे पर अपने लिए पत्रकारीय मर्यादाओं की आचार संहिता घोषित की है। इसके पहले देश के एक दूसरे बिजनेस डेली मिंट ने भी अपनी आचार संहिता घोषित कर रखी है। कुछ अन्य अखबारों की आचार संहिताएं भी होंगी।हिन्दी के अखबारों में से किसी ने अपनी आचार संहिता बनाई है इसकी जानकारी मुझे नहीं है। इसी तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की आचार संहिता का पता मुझे नहीं है। अलबत्ता उनके एक संगठन एनबीए ने कुछ मर्यादा रेखाएं तय कर रखीं हैं।अधिक पढ़ें » Posted by pramod joshi 2 comments Links to this post Labels: , Wednesday, March 02, 2011
इंटरैक्टिव हैडलाइन [Image]अखबारों को पाठकों से जोड़ने की मुहिम में बिछे पड़े मार्केटिंग प्रफेशनलों को कन्नड़ अखबार कन्नड़ प्रभा ने रास्ता दिखाया है। इसबार 1 मार्च को कन्नड़ प्रभा की बजट कवरेज को शीर्षक दिया उनके पाठक रवि साजंगडे ने।




कन्नड़ प्रभा के नए सम्पादक विश्वेश्वर भट्ट के दिमाग में आइडिया आया कि क्यों न अपनी खबरों की दिशा पाठकों की सहमति से तय की जाय। इसकी शुरुआत उन्होंने 24 फरबरी को राज्य के बजट से की। उन्होंने अपने ब्लॉग, ट्विटर, एसएमएस वगैरह के मार्फत पाठकों से राय लेने की सोची। 24 की रात डैडलाइन 9.30 तक उनके पास 126 बैनर हैडलाइन के लिए सुझाव आ गए। इसके बाद उन्होंने रेलवे बजट के लिए सुझाव मांगे। इसके लिए 96 शीर्षक आए। आम बजट के दिन 60 शीर्षक आए।अधिक पढ़ें » Posted by pramod joshi 8 comments Links to this post Labels: , , Tuesday, March 01, 2011
बजट के अखबार [Image]बज़ट का दिन मीडिया को खेलने का मौका देता है और अपनी समझदारी साबित करने का अवसर भी। आज के   अखबारों को देखें तो दोनों प्रवृत्तियाँ देखने को मिलेंगी। बेहतर संचार के लिए ज़रूरी है कि जटिल बातों को समझाने के लिए आसान रूपकों और रूपांकन की मदद ली जाए। कुछ साल पहले इकोनॉमिक टाइम्स ने डिजाइन और रूपकों का सहारा लेना शुरू किया था. उनकी देखा-देखी तमाम अखबार इस दौड़ में कूद पड़े। हालांकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास तमाम साधन हैं, पर वहाँ भी खेल पर जोर ज्यादा है बात को समझाने पर कम। अंग्रेजी के चैनल सेलेब्रिटी टाइप के लोगों और राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों को मंच देते हुए ज्यादा नज़र आते हैं, दर्शक  को यह कम बताते हैं कि बजट का मतलब क्या है। टाइम्स ऑफ इंडिया की परम्परा बजट को बेहतर ढंग से कवर करने की है। 


एक ज़माने में हिन्दी अखबार का लोकप्रिय शीर्षक होता था 'अमीरों को पालकी, गरीबों को झुनझुना'। सामान्य व्यक्ति यही सुनना चाहता है। अंग्रेजी अखबार पढ़ने वालों की समझदारी का स्तर बेहतर है। साथ ही वे व्यवस्था से ज्यादा जुड़े हैं। उनके लिए लिखने वाले बेहतर होम वर्क के साथ काम करते हैं। दोनों मीडिया में विसंगतियाँ हैं। अधिक पढ़ें » Posted by pramod joshi 12 comments Links to this post Labels: , , , , Tuesday, February 08, 2011
एओएल ने खरीदा हफिंगटन पोस्ट [Image]खबर है कि अमेरिकन ऑनलाइन कम्पनी ने, जो अब एओएल के नाम से जानी जाती है, इंटरनेट के सबसे प्रभावशाली अखबार हफिंगटन पोस्ट को 31.5 करोड़ डॉलर में खरीदने का फैसला किया है। इस खबर के दो अर्थ हैं। एक तो यह कि हफिंगटन पोस्ट की ताकत को कुछ देर से ही सही पहचाना गया है और इंटरनेट के अखबारों की ताकत अब धीरे-धीरे बढ़ेगी। इस खबर के साथ यह खबर भी है कि हफिंगटन पोस्ट की मालकिन एरियाना हफिंगटन इस अखबार की प्रेसीडेंट होंगी, साथ ही वे एओएल की सम्पादकीय प्रमुख भी होंगी। यह खबर एओएल के भविष्य का संकेत भी है। एक साल पहले टाइम वार्नर के साथ आठ साल पुराना रिश्ता टूटने के बाद से एओएल का भविष्य भी डाँवाडोल है। अधिक पढ़ें » Posted by pramod joshi 0 comments Links to this post Labels: , Tuesday, January 25, 2011
गलती जो हो गई [Image]ग्राहम स्टेंस की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर कुछ लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए एक प्रेस नोट ज़ारी किया। इसपर आधारित खबर हिन्दू में भी छपी। इसका रोचक पक्ष यह था कि खबर में कहा गया कि देश के प्रमुख सम्पादकों ने यह बयान जारी किया है। हैरत की बात थी कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का विरोध करने वाले सम्पादकों में एन राम और चन्दन मित्रा के नाम एक साथ थे। अधिक पढ़ें » Posted by pramod joshi 4 comments Links to this post Labels: , , Sunday, January 23, 2011
हमारे मीडिया का प्रभाव


[Image]1983 में राजेन्द्र माथुर ने टाइम्स ऑफ इंडिया में हिन्दी के दैनिक अखबारों की पत्रकारिता पर तीन लेखों की सीरीज़ में इस बात पर ज़ोर दिया था कि हिन्दी के पत्रकार को हिन्दी के शिखर राजनेता की संगत उस तरह नहीं मिली थी जिस तरह की वैचारिक संगत बंगाल के या दूसरी अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों- पत्रकारों को मिली थी। आज़ादी से पहले या उसके बाद प्रेमचंद, गणेश शंकर विद्यार्थी या राहुल बारपुते को नेहरू जी की संगत नहीं मिली।अधिक पढ़ें » Posted by pramod joshi 3 comments Links to this post Labels: , , Saturday, December 18, 2010
विकीलीक्स [Image]जुलाई में मैने विकीलीक्स यानी साहस की पत्रकारिता शीर्षक पोस्ट लिखी थी। वह पोस्ट आज तक पढ़ी जा रही है।  हिन्दी में गूगल सर्च करने पर सबसे पहले वही पोस्ट सामने आती है। विकीलीक्स ने दुनिया को हिला दिया है। साथ ही विकीपीडिया को विकीलीक्स शीर्षक लेख में सबसे पहले यह लिखने को मजबूर कर दिया है कि विकीपीडिया का विकीलीक्स से वास्ता नहीं है।




विकीलीक्स से लेकर राडिया टेप्स तक आपने एक बात पर गौर किया होगा कि दुनिया पीछे-पीछे कैसी बातें करती है। सामने-सामने सब महान हैं, उदार हैं। बहरहाल इस वक्त सबसे बड़ी बात सामने यह है कि विकीलीक्स को अमेरिकी व्यवस्था टार्गेट कर रही है वहीं दुनियाभर के पारदर्शिता समर्थक उसे सहारा दे रहे हैं। मैने अपनी शुरुआती पोस्ट में विकीलीक्स का जो लिंक दिया था वह अब लापता है। इस वक्त का लिंक है यह http://www.wikileaks.ch/ । हो सकता है कल यह भी बदल जाए। इसलिए अब ज़रूरी हो गया है कि ठिकाना बदलते ही पाठकों को सूचित किया जाय। Posted by pramod joshi 2 comments Links to this post Labels: , Friday, December 03, 2010
मीडिया की शक्ल क्या बताती है? [Image]मीडिया के नकारात्मक पहलुओं पर विचार करते-करते व्यक्तियों की भूमिका तक पहुँचना स्वाभाविक है। बल्कि पहले हम व्यक्तियों की भूमिका देखते हैं, फिर उसके मीडिया की। कुछ व्यक्ति स्टार हैं। इसलिए उनकी बाज़ार में माँग है।




स्टार वे क्यों हैं? जवाब देने की हिमाकत करने के पहले देखना पड़ेगा कि स्टार कौन हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया के उदय के बाद से ज्यादातर स्टार वे हैं जो प्राइम टाइम खबरें देते हैं, या शो करते हैं या महत्वपूर्ण मौकों पर कवरेज के लिए भेजे जाते हैं। ध्यान से देखें तो अब स्टार कल्टीवेट किए जाते हैं। वे अपने ज्ञान, लेखन क्षमता या वैचारिक समझ के कारण महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि अपनी पहुँच के कारण हैं। कुछ की बनी-बनाई पहुँच होती है। परिवार या दोस्ती की वजह से। और कुछ पहुँच बनाते हैं। जिसकी बन गई उसकी लाटरी और जिसकी नहीं बनी तो उसके लिए कूड़ेदान।अधिक पढ़ें » Posted by pramod joshi 0 comments Links to this post Labels: , , Friday, October 22, 2010
अपने आपको परिभाषित करेगा हमारा मीडिया [Image]एक ज़माना था जब दिल्ली के अखबार राष्ट्रीय माने जाते थे और शेष अखबार क्षेत्रीय। इस भ्रामक नामकरण पर किसीको बड़ी आपत्ति नहीं थी। दिल्ली के अखबार उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हिमाचल-पंजाब-हरियाणा तक जाकर बिकते थे। इन इलाकों के वे पाठक जिनकी दिलचस्पी स्थानीय खबरों के साथ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों में होती थी, इन्हें लेते थे। ऐसे ज्यादातर अखबार अंग्रेज़ी में थे। हिन्दी में नवभारत टाइम्स ने लखनऊ, पटना और जयपुर जाकर इस रेखा को पार तो किया, पर सम्पादकीय और व्यापारिक स्तर पर विचार स्पष्ट नहीं होने के कारण तीनों संस्करण बंद हो गए। लगभग इसके समानांतर हिन्दुस्तान ने पहले पटना और फिर लखनऊ में अपनी जगह बनाई।




नवभारत टाइम्स के संचालकों ने उसे चलाना नहीं चाहा तो इसके गहरे व्यावसायिक कारण ज़रूर होंगे, पर सम्पादकीय दृष्टि से उसका वैचारिक भ्रम भी जिम्मेदार था। पाठक ने शुरूआत में उसका स्वागत किया, पर उसकी अपेक्षा पूरी नहीं हो पाई। नवभारत टाइम्स की विफलता के विपरीत हिन्दुस्तान का पटना संस्करण सफल साबित हुआ। संयोग है कि एक दौर ऐसा था जब पटना से नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान दोनों प्रकाशित होते थे। हिन्दुस्तान ने स्थानीयता का वरण किया। प्रदीप के उत्तराधिकारी के रूप में हिन्दुस्तान को बेहतर स्पेस मिला। पर प्रदीप का आधार बहुत व्यापक नहीं था। हिन्दुस्तान ने काफी कम समय में अपना लोकल नेटवर्क बनाया। प्रायः सभी प्रमुख शहरों में दफ्तर बनाए। वहाँ से खबरें संकलित कर मुजफ्फरपुर, भागलपुर और रांची जैसे प्रमुख शहरों के संस्करण छपकर आए तो पाठकों ने उनका स्वागत किया।




राजस्थान पत्रिका ने उदयपुर, बीकानेर और कोटा जैसे शहरों में प्रेस लगाकर संस्करण शुरू किए। उत्तर प्रदेश में आगरा के अमर उजाला ने पहले बरेली से संस्करण शुरू किया। कानपुर का जागरण वाराणसी में आज के गढ़ में प्रवेश कर गया और सफल हुआ। जवाब में आज ने कानपुर संस्करण निकाला। अमर उजाला मेरठ और कानपुर गया। मध्य प्रदेश में नई दुनिया के मुकाबले भास्कर और नवभारत ने नए संस्करण शुरू करने की पहल की। खालिस्तानी आंदोलन के दौरान पंजाब केसरी ने तमाम कुर्बानियाँ देकर पाठक का मन जीता। रांची में प्रभात खबर नए इलाके में ज़मीन से जुड़ी खबरें लेकर आया। उधर नागपुर और औरंगाबाद में लोकमत का उदय हुआ। ये अखबार ही आज एक से ज्यादा संस्करण निकाल रहे हैं। अभी कुछ नए अखबारों के आने की संभावना भी है।




आठवें, नवें और दसवें दशक तक संचार-टेक्नॉलजी अपेक्षाकृत पुरानी थी। सिर्फ डाक और तार के सहारे काम चलता था। ज्यादातर छपाई हॉट मेटल पर आधारित रोटरी मशीनों से होती थी। इस मामले में इंदौर के नई दुनिया ने पहल ली थी। पर उस वक्त तक ट्रांसमीशन टेलीप्रिंटर पर आधारित था। इंटरनेट भारत में आया ही नहीं था। नब्बे के दशक में मोडम एक चमत्कारिक माध्यम के रूप में उभरा। अस्सी के दशक में भारतीय ऑफसेट मशीनें सस्ते में मिलने लगीं। संचार की तकनीक में भी इसके समानांतर विकास हुआ। छोटे-छोटे शहरों के बीच माइक्रोवेव और सैटेलाइट के मार्फत लीज़ लाइनों का जाल बिछने लगा। सूचना-क्रांति की पीठिका तैयार होने लगी।




हिन्दी अखबारों के ज्यादातर संचालक छोटे उद्यमी थे। पूँजी और टेक्नॉलजी जुटाकर उन्होंने अपने इलाके के अखबार शुरू किए। ज्यादातर का उद्देश्य इलाके की खबरों को जमा करना था। राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित ज्यादातर बड़े प्रकाशन अंग्रेजी अखबार निकालते थे। हिन्दी अखबार उनके लिए दोयम दर्जे पर थे। इसके विपरीत हिन्दी इलाके की छोटी पूँजी से जुटाकर निकले अखबार के पास सूचना संकलन के लिए बड़ी पूँजी नहीं थी। पत्रकारीय कौशल और मर्यादा को लेकर चेतना नहीं थी। वह आज भी विकसित हो पाई है, ऐसा कहा नहीं जा सकता। पत्र स्वामी के इर्द-गिर्द सेठ जी वाली संस्कृति विकसित हुई। पत्रकार की भूमिका का बड़ा हिस्सा मालिक के हितों की रक्षा से जुड़ा था। ऐसे में जो पत्रकार था वही विक्रेता, विज्ञापन एजेंट और मैनेजर भी था। स्वाभाविक था कि संचालकों की पत्रकारीय मर्यादाओं में दिलचस्पी वहीं तक थी जहाँ तक वह उनके कारोबार की बुनियादी ज़रूरत होती।




खबर एक सूचना है, जिसका साँचा और मूल्य-मर्यादा ठीक से परिभाषित नहीं हैं। विचार की अवधारणा ही हमारे समाज में अधकचरी है। हिन्दी इलाके की सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनैतिक संरचना भीषण अंतर्विरोधों से ग्रस्त है। पाठक भी नया है। उसे सूचना की ज़रूरत है। उस सूचना के फिल्टर कैसे होते हैं, उसे पता नहीं। अचानक दस-पन्द्रह वर्ष में मीडिया का जबर्दस्त विस्तार हुआ इसलिए ट्रेनिंग की व्यवस्था भी विकसित नहीं हो पाई। ऐतिहासिक परिस्थितियों में जो सम्भव था वह सामने है। जो इससे संतुष्ट हैं उनसे मुझे कुछ नहीं कहना, पर जो असंतुष्ट हैं उन्हें रास्ते बताने चाहिए।




हिन्दी अखबारों का कारोबारी मॉडल देसी व्यपारिक अनुभवों और आधुनिक कॉरपोरेट कल्चर की खिचड़ी है। दूसरे शब्दों में पश्चिम और भारतीय अवधारणाओं का संश्लेषण। हिन्दी अखबारों में कुछ समय पहले तक लोकल खबरों को छापने की होड़ थी। आज भी है, पर उसमें अपवार्ड मोबाइल कल्चर और जुड़ गया है। सोलह से बीस पेज के अखबार में आठ पेज या उससे भी ज्यादा लोकल खबरों के होते हैं। इसमें सिद्धांततः दोष नहीं, पर लोकल खबर क्रिएट करने के दबाव और जल्दबाज़ी में बहुत सी निरर्थक सामग्री प्रकाशित होती है। इसके विपरीत एक पनीली आधुनिकता ने और प्रवेश किया है। इसकी शुरुआत भाषा में अंग्रेजी शब्दों के जबरन प्रवेश से हुई है। पुरानी हिन्दी फिल्मों में जॉनी वॉकर हैट लगाए शहरी बाबू बनकर आता था तकरीबन उसी अंदाज़ में आधुनिकता गाँवों और कस्बों में आ रही है। यह जल्द गुज़र जाएगी। इसका अगला दौर अपेक्षाकृत गम्भीर होगा। इसमें महत्वपूर्ण भूमिका शिक्षा की होगी।




शिक्षा-प्राप्त व्यक्ति जब अपने ज्ञान का इस्तेमाल करेगा तो स्वाभाविक रूप से उसकी दिलचस्पी जीवन के व्यापक फलक को समझने में होगी। अभी ऐसा लगता है कि हमारा समाज ज्ञान के प्रति उदासीन है। यह भी अस्थायी है। वैचारिक-चेतना के लिए वैश्विक गतिविधियों से जुड़ाव ज़रूरी है। मीडिया इसकी सम्भावनाएं बढ़ा रहा है। आज की स्थितियाँ अराजक लगतीं हैं, पर इसके भीतर से ही स्थिरता निकल कर आएगी। अखबारों और खबरिया मीडिया की खासियत है कि इसे अपनी आलोचना से भी रूबरू होना पड़ता है। यह आलोचना व्यापक सामाजिक-विमर्श का हिस्सा है। इनके बीच से ही अब ऐसे मीडिया का विकास होगा जो सूचना को उसकी गम्भीरता से लेगा। उच्छृंखल और लम्पट मीडिया का उदय जितनी तेजी से होता है, पराभव भी उतना तेज़ होता है। इंतज़ार करें और देखें।


समाचार फॉर मीडिया डॉट कॉम में प्रकाशित Posted by pramod joshi 3 comments Links to this post Labels: , , , Wednesday, September 29, 2010
सलमान खान तो हमारे पास भी है
[Image]रविवार के इंडियन एक्सप्रेस का एंकर सलमान खान पर था। यह सलमान बॉलीवुड का सितारा नहीं है, पर अमेरिका में सितारा बन गया है। बंग्लादेशी पिता और भारतीय माता की संतान सलमान ने सिर्फ अपने बूते दुनिया का सबसे बड़ा ऑनलाइन स्कूल स्थापित कर लिया है। हाल में गूगल ने अपने 10100 कार्यक्रम के तहत सलमान को 20 लाख डॉलर की मदद देने की घोषणा की है। इस राशि पर ध्यान दें तो और सिर्फ सलमान के काम पर ध्यान दें तो उसमें दुनिया को बदल डालने का मंसूबा रखने वालों के लिए महत्वपूर्ण संदेश छिपे हैं।

सलमान खान की वैबसाइट खान एकैडमी पर जाएं तो आपको अनेक विषयों की सूची नज़र आएगी। इनमें से ज्यादातर विषय गणित, साइंस और अर्थशास्त्र से जुड़े हैं। सलमान ने अपने प्रयास से इन विषयों के वीडियो बनाकर यहाँ रखे हैं। छात्रों की मदद के लिए बनाए गए ये वीडियो बगैर किसी शुल्क के उपलब्ध हैं। सलमान ने खुद एमआईटी और हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से डिग्रियाँ ली हैं। शिक्षा को लालफीताशाही की जकड़वंदी से बाहर करने की उसकी व्यक्तिगत कोशिश ने उसे गूगल का इनाम ही नहीं दिलाया, बिल गेट्स का ध्यान भी खींचा है। बिल गेट्स का कहना है कि मैने खुद और मेरे बच्चों ने इस एकैडमी में प्राप्त शिक्षा सामग्री मदद ली है। पिछले साल सलमान को माइक्रोसॉफ्ट टेक एवॉर्ड भी मिल चुका है।
सलमान की इस कहानी का हमारे जैसे देश में बड़ा अर्थ है। इसके पीछे दो बातें है। दूसरों को ज्ञान देना और निशुल्क देना। सलमान का अपना व्यवसाय पूँजी निवेश का था। उसने अपनी एक रिश्तेदार को कोई विषय समझाने के लिए एक वीडियो बनाया। उससे वह उत्साहित हुआ और फिर कई वीडियो बना दिए। और फिर अपनी वैबसाइट में इन वीडियो को रख दिय़ा। सलमान की वैबसाइट पर जाएं तो आपको विषय के साथ एक तरतीब से वीडियो-सूची मिलेगी। ये विडियो उसने माइक्रोसॉफ्ट पेंट, स्मूद ड्रॉ और कैमटेज़िया स्टूडियो जैसे मामूली सॉफ्टवेयरों की मदद से बनाए हैं। यू ट्यूब में उसके ट्यूटोरियल्स को हर रोज 35,000 से ज्यादा बार देखा जाता है।
गूगल ने उसे जो बीस लाख डॉलर देने की घोषणा की है उससे नए वीडियो बनाए जाएंगे और इनका अनुवाद दूसरी भाषाओं में किया जाएगा। सलमान ने सीएनएन को बताया कि स्पेनिश, मैंडरिन(चीनी), हिन्दी और पोर्चुगीज़ जैसी भाषाओं में इनका अनुवाद होगा। सलमान का लक्ष्य है उच्चस्तरीय शिक्षा हरेक को, हर जगह। शिक्षा किस तरह समाज को बदलती है इसका बेहतर उदाहरण यूरोप है। पन्द्रहवीं सदी के बाद यूरोप में ज्ञान-विज्ञान का विस्फोट हुआ। उसे एज ऑफ डिस्कवरी कहते हैं। इस दौरान श्रेष्ठ साहित्य लिखा गया, शब्दकोश, विश्वकोश, ज्ञानकोश और संदर्भ-ग्रंथ लिखे गए। उसके समानांतर विज्ञान और तकनीक का विकास हुआ।
दुनिया में जो इलाके विकास की दौड़ में पीछे रह गए हैं, उनके विकास के सूत्र केवल आर्थिक गतिविधियों में नहीं छिपे हैं। इसके लिए वैचारिक आधार चाहिए। और उसके लिए सूचना और ज्ञान। यह ज्ञान अपनी भाषा में होगा तभी उपयोगी है। हिन्दी के विस्तार को लेकर हमें खुश होने का पूरा अधिकार है। अपनी भाषा में दुनियाभर के ज्ञान का खजाना भी तो हमें चाहिए। हमारे भीतर भी ऐसे जुनूनी लोग होंगे, जो ऐसा करना चाहते हैं, पर बिल गेट्स और गूगल वाले हिन्दी नहीं पढ़ते हैं। हिन्दी पढ़ने वाले और हिन्दी का कारोबार करने वालों को इस बात की सुध नहीं है। यह साफ दिखाई पड़ रहा है कि हिन्दी के ज्ञान-व्यवसाय पर हिन्दी के लोग हैं ही नहीं। जो हैं उन्हें या तो अंग्रेजी आती है या धंधे की भाषा।
इंटरनेट के विकास के बाद उसमें हिन्दी का प्रवेश काफी देर से हुआ। हिन्दी के फॉण्ट की समस्या का आजतक समाधान नहीं हो पाया है। गूगल ने ट्रांसलिटरेशन की जो व्यवस्था की है वह पर्याप्त नहीं है। वहरहाल जो भी है, उसका इस्तेमाल करने वाले बहुत कम हैं। दुनिया में जिस गति से ब्लॉगिंग हो रही है, उसके मुकाबले हिन्दी में हम बहुत पीछे हैं। विकीपीडिया पर हिन्दी में लिखने वालों की तादाद कम है। अगस्त 2010 में विकीपीडिया में लिखने वाले सक्रिय लेखकों की संख्या 82794 थी। इनमें से 36779 अंग्रेजी में लिखते हैं। जापानी में लिखने वालों की संख्या 4053 है और चीनी में 1830। हिन्दी में 70 व्यक्ति लिखते हैं। इससे ज्यादा 82 तमिल में और 77 मलयालम में हैं। भारतीय भाषाओं के मुकाबले भाषा इंडोनेशिया में लिखने वाले 244, थाई लिखने वाले 256 और अरबी लिखने वाले 522 हैं।
[Image]करोड़ों लोग हिन्दी में बात करते हैं, फिल्में देखते हैं या न्यूज़ चैनल देखते हैं। इनमें से कितने लोग बौद्धिक कर्म में अपना समय लगाते हैं?  मौज-मस्ती जीवन का अनिवार्य अंग है। उसी तरह बौद्धिक कर्म भी ज़रूरी है। अपने भीतर जब तक हम विचार और ज्ञान-विज्ञान की लहर पैदा नहीं करेंगे, तब तक एक समझदार समाज बना पाने की उम्मीद न करें। बदले में हमें जो सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था मिल रही है उसे लेकर दुखी भी न हों। यह व्यवस्था हमने खुद को तोहफे के रूप में दी है। प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग में हिन्दी की किताबें खोजें। नहीं मिलेंगी। गूगल बुक्स में देखें। थोड़ी सी मिलेंगी। हिन्दी की कुछ वैबसाइटों में हिन्दी के कुछ साहित्यकारों की दस से पचास साल पुरानी किताबों का जिक्र मिलता है। कुछ पढ़ने को भी मिल जाती हैं। इनमें हनुमान चालीसा और सत्यनारायण कथा भी हैं। पुस्तकालयों का चलन कम हो गया है। स्टॉल्स पर जो किताबें नज़र आतीं हैं, उनमें आधी से ज्यादा अंग्रेजी में लिखे उपन्यासों, सेल्फ हेल्प या पर्सनैलिटी डेवलपमेंट की किताबों के अनुवाद हैं। सलमान खान के वीडियो देखें तो उनके संदर्भ अमेरिका के हैं। हमारे लिए तो भारतीय संदर्भ के वीडियो की ज़रूरत होगी।
समाज विज्ञान, राजनीति शास्त्र, इतिहास, मनोविज्ञान, मानव विज्ञान से लेकर प्राकृतिक विज्ञानों तक हिन्दी के संदर्भ में किताबें या संदर्भ सामग्री कहाँ है? नहीं है तो क्यों नहीं है? हिन्दी में शायद सबसे ज्यादा कविताएं लिखीं जाती हैं। हिन्दी के पाठक को विदेश व्यापार, अंतरराष्ट्रीय सम्बंध, वैज्ञानिक और तकनीकी विकास, यहाँ तक कि मानवीय रिश्तों पर कुछ पढ़ने की इच्छा क्यों नहीं होती है? हाल में मुझसे किसी ने हिन्दी में शोध परक लेख लिखने को कहा। उसका पारिश्रमिक शोध करने का अवसर नहीं देता। शोध की भी कोई लागत होती है। वह कीमत हबीब के यहाँ एक बार की हजामत और फेशियल से भी कम हो तो क्या कहें? सलमान खान तो हमारे पास भी है, पर वह मुन्नी बदनाम के साथ नाचता है।
समाचार फॉर मीडिया डॉट कॉम में प्रकाशित Posted by pramod joshi 3 comments Links to this post Labels: , , , Tuesday, September 07, 2010
कहाँ गया हमारा सामाजिक संवाद


[Image]नया दौर सन 1957 की हिन्दी फिल्म है। उसमें औद्योगिक बदलाव और सामाजिक परिस्थितियों का सवाल उठा था। फिल्म का नायक शंकर(दिलीप कुमार) मोटर गाड़ी के मुकाबले अपने तांगे को दौड़ाने की चुनौती स्वीकार करता है। उसकी मदद में आता है अखबार का रिपोर्टर शहरी बाबू जॉनी वॉकर। आजादी के करीब एक दशक पहले और डेढ़-दो दशक बाद तक खासतौर से पचास के पूरे दशक में हमारे वृहत् सामाजिक-सरोकारों को शक्ल लेने का मौका मिला। अभिनेताओं, संगीतकारों, लेखकों, कवियों और शायरों की जमात ने पूरे देश को सराबोर कर दिया। हिन्दी फिल्मी गीतों ने जैसा असर भारतीय समाज पर डाला उसकी दुनिया में मिसाल नहीं मिलेगी। यह सोशल डिसकोर्स या सामाजिक-विमर्श जारी था। उसमें तमाम संदेश छिपे थे। पर इसमें गुणात्मक अंतर आया है। यह अंतर है संदेशवाहक की बदली भूमिका का। सिनेमा, रेडियो और अखबार हमारा शुरूआती मास-मीडिया था। तीनों में एक खास तरह का जोशो-ज़ुनून था। सरकारी होने के बावज़ूद हमारे रेडियो का भी खास अंदाज़ था। कम से कम वह सही वक्त बताता था, शुद्ध खबरें और अच्छे लेखकों, संगीतकारों और कलाकारों को अभिव्यक्ति का मौका देता था।
नब्बे के दशक तक भारतीय मीडिया के सामाजिक सरोकार उतने भटके हुए नहीं थे, जितने आज लगते हैं। सत्तर के दशक में देश ने बांग्लादेश की लड़ाई के अलावा भ्रष्टाचार के खिलाफ गुजरात और बिहार-आंदोलन, नक्सली आंदोलन, जेपी-आंदोलन, इमर्जेंसी और उसके बाद संवैधानिक सुधार के आंदोलन देखे। अस्सी का दशक जबर्दस्त खूंरेज़ी और संकीर्णता लेकर आया। खालिस्तानी आंदोलन और उसके दमन ने मीडिया को साँसत में डाल दिया। एक ओर आतंकी धमकी दूसरी ओर राज-व्यवस्था का दबाव। फिर मंडल और कमंडल आए। इसने हालांकि हमारी सामाजिक बुनियाद पर असर डाला, पर सार्वजनिक विमर्श का स्तर कमज़ोर हो गया।
[Image]टेलीविज़न सत्तर के दशक में ही आ चुका था, पर नब्बे के दशक में दूरदर्शन में कुछ बाहरी कार्यक्रम शुरू होने से ताज़गी का झोंका आया। इसके बाद निजी चैनलों की क्रांति शुरू हुई, जो अभी जारी है। पर इस क्रांति ने बजाय सामाजिक-विमर्श को कोई नई दिशा देने के दर्शक के सामने कपोल-कल्पनाओं, सनसनी और अंधी मौज-मस्ती की थालियां सजा दीं। इसकी सबसे बड़ी वजह वह उपभोक्ता बाज़ार था, जिसके विज्ञापनों की बौछार होने वाली थी। 1995 में एक साथ दो भारत सुंदरियाँ मिस वर्ल्ड और मिस युनीवर्स बनाई गईं। यह सिर्फ संयोग नहीं था। टीवी के सोप ऑपेरा में हम लोग और बुनियाद के सीधे-सच्चे पात्रों की जगह लिपे-पुते मॉडल अभिनय करने के लिए मैदान में कूद पड़े। उनके मसले बदल गए। पहली बार चैनलों ने खबरें पढ़ने के लिए पत्रकारों की जगह मॉडलों को बैठाया। ऐसा दुनिया में कहीं और हुआ, मुझे पता नहीं।
देश के मीडिया से राष्ट्रीय महत्व के मसले इसके पहले इमर्जेंसी के दौर में गायब हुए थे। उन दिनों फिल्म और खेल की सामग्री अखबारों में बढ़ गई थी। राजनैतिक गतिविधियों को रिपोर्ट करने में जोखिम था, बल्कि अनुमति नहीं थी। अब तो वह बात नहीं है। इस वक्त प्राथमिकता बदली हुई है। हाल में पीपली लाइव और उसके कुछ पहले रणने विचार-विमर्श का मौका दिया है। इस बार एक मीडिया ने दूसरे मीडिया की खबर ली है। टीवी भी चाहे तो सिनेमा की वास्तविकता को दिखा सकता है, पर वह दिखाना नहीं चाहेगा। टीवी या अखबारों में बॉलीवुड की कवरेज प्रचारात्मक होती है, विश्लेषणात्मक नहीं। इस वक्त अखबार, टीवी और सिनेमा तीनों से एक साथ सामाजिक-विमर्श गायब हुआ है। वह इंटरनेट के रास्ते सिर उठा रहा है, पर इंटरनेट की व्याप्ति अभी सीमित है।
[Image]हमारे सिनेमा ने अछूत कन्या, दो बीघा ज़मान, प्यासा, आवारा, श्री 420, जागते रहो, मदर इंडिया, नीचा नगर, गरम कोट, सुजाता, इंसान जाग उठा, पड़ोसी और दो आँखें बारह हाथ जैसी तमाम फिल्में दीं और सब सफल हुईं। यह सूची सत्यकाम और गर्म हवा तक आती है। सत्तर के दशक में श्याम बेनेगल की अंकुर और निशांत ने सिनेमा को नया आयाम दिया। गोविन्द निहलानी ने आक्रोश, पार्टी, अर्ध सत्य, तमस और हजार चौरासी की माँ, प्रकाश झा ने दामुल, मृत्युदंड, गंगाजल, अपहरण और अब राजनीति बनाई। एक ज़माने तक फिल्मों में पत्रकार और नेता बड़े आदर्शवादी और प्रायः लड़ाई जीतने वाले होते थे। धीरे-धीरे फिल्मों के आदर्शवादी पत्रकार पात्र संकट में आने लगे या फिर व्यवस्था का हिस्सा बन गए। रमेश शर्मा और गुलज़ार की न्यू डेल्ही टाइम्स ऐसी ही फिल्म थी। कुंदन शाह की जाने भी दो यारो के पत्रकार धंधेबाज़ हैं। पेज थ्री में कोंकणा सेन शर्मा इस कारोबार के द्वंद में फँसी रह जाती है।
मीडिया के अंतर्विरोधों को बेहतर शोध और रचनात्मक प्रतिभा के मार्फत सामाजिक विमर्श का माध्यम बनाया जा सकता है। जनता जानना चाहती है। पत्रकार, नेता और अभिनेता जिस ज़मीन पर खड़े हैं वह काल्पनिक नहीं है। उसके सच और उसके अंतर्विरोध सामने आने चाहिए। यह आत्मविश्लेषण मीडिया को ही करना है। आश्चर्यजनक यह है कि टेलीविजन और अखबार इन विषयों को अपनी कवरेज का विषय नहीं बनाते। ऐसा भी नहीं कि उसमें शामिल लोग इस पर चर्चा करना न चाहते हों। मीडिया के जिन लोगों से मेरी बात होती है, उनमें से ज्यादातर अपने आप से संतुष्ट नहीं होते। वे ज्यादा से ज्यादा यह बताने का प्रयास करते हैं कि अभी शुरुआत है। हम अपने पैर जमा रहे हैं। ये बातें जल्द खत्म हो जाएंगी। टीवी के मामले में यह बात समझ में आती है। यह मीडिया अपेक्षाकृत नया है। उसने अपनी औपचारिक या अनौपचारिक आचार संहिता तैयार नहीं की है। पर प्रिंट मीडिया को तो अपना स्पेस नहीं छोड़ना चाहिए। यह सोचना गलत है कि जनता गहरे मसलों को पढ़ना नहीं चाहती। दरअसल हमें ज्यादा मेहनत करने की ज़रूरत है। 
मीडिया में कंटेंट यानी सामग्री की उपेक्षा को लेकर चिंता व्यक्त करने वालों में ज्यादातर लोग पत्रकार या लेखक हैं। कारोबारी लोगों की चिंता के कारण वही नहीं होते जो लेखक-पत्रकार और पाठक के होते हैं। पर कारोबारी समझ को ही कंटेंट की महत्ता समझनी चाहिए। इस वक्त जो भी सफल अखबार हैं, वे कंटेंट में ही सफल हैं। और कंटेंट निरंतर सुधरना चाहिए। अखबारों का इनवेस्टमेंट कवरेज में सुधार पर बढ़ना चाहिए। हिन्दी अखबारों को तमाम नए विषयों के विशेषज्ञों की पत्रकार के रूप में ज़रूरत है। अखबार अपने बिजनेस के लिए बड़े वेतन पर एमबीए लाना चाहते हैं। पर पत्रकारों को सस्ते में निपटाना चाहते हैं। खासतौर से भाषायी पत्रकारों के साथ ऐसा ही हो रहा है। भारतीय भाषा के पत्रकारों के ऊपर सामाजिक-विमर्श को आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी है। भारतीय भाषाओं के पाठक ही संख्या में बढ़ रहे हैं। अखबार सिर्फ खबर नहीं देता। वह अपने पाठक से संवाद करता है। उसे शिक्षित करता है, दिशा देता है। नए पत्रकार को उसके सामाजिक संदर्भों की जानकारी देना उसके संस्थान का काम है। मुझे नहीं लगता कि ऐसा कोई विचार आज अखबारों की विस्तार-योजना में शामिल है। इसकी एक वजह है कारोबारी समझ। मेरे विचार से अखबारों का कारोबार देखने वालों को भी पत्रकारिता के वैल्यू सिस्टम की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। पत्रकारों की ट्रेनिंग में सामाजिक जिम्मेदारी का भाव खत्म हो गया है। अखबार को प्रोडक्ट कहना ही इस जिम्मेदारी का गला दबोचना है।   




समाचार फॉर मीडिया डॉट कॉम में प्रकाशित Posted by pramod joshi 1 comments Links to this post Labels: , , Wednesday, September 01, 2010
बदलाव कहाँ से आता है?

सितम्बर 1982 में यूएसए टुडे की शुरुआत टीवी के मुकाबले अखबारों को आकर्षक बनाए रखने की एक कोशिश का हिस्सा थी। दुनिया का पहला पूरी तरह रंगीन अखबार शुरू में बाजीगरी लगता था, पर जल्द ही अमेरिका का वह नम्बर एक अखबार बन गया। आज भी वॉल स्ट्रीट जर्नल के बाद यह दूसरे नम्बर का अखबार है। खबर यह है कि यूएसए टुडे अब प्रिंट की तुलना में अपने डिजिटल संस्करण पर ज्यादा ध्यान देगा। इसके अलावा यह एक और मेकओवर की तैयारी कर रहा है। अखबार के वैब, मोबाइल, आई पैड और दूसरे प्लेटफॉर्म बदले जाएंगे। सर्कुलेशन, फाइनेंस और न्यूज़ के विभागों में बड़े बदलाव होंगे। पिछले हफ्ते अखबार के कर्मचारियों को दिखाए गए एक प्रेजेंटेशन में नए विभागों की योजना बताई गई। यह भी स्पष्ट है कि इस काम में 130 कर्मचारियों की छँटनी की जाएगी।
यूएसए टुडे के बारे में हम अपने संदर्भों में सोचें तो चिंता की बात नहीं है। भारत में डिजिटल अखबारों का दौर कुछ साल बाद की बात है। पर साफ है कि यह दौर भारत में भी आएगा। हमारे यहाँ जो कुछ होता है वह अमेरिका की नकल में होता है। अधकचरा होता है। अखवार की स्वामी गैनेट कम्पनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि हम अपने रेवेन्यू को बढ़ाने के प्रयास में पत्रकारीय-प्रतिबद्धता से पीछे नहीं हटेंगे। इस बात को कहा जाय या न कहा जाय पर अमेरिका में आज भी अखबार के स्वामी अपने धंधे का गुणगान उतने खुले ढंग से नहीं करता जितने खुले अंदाज़ में हमारे यहाँ होता है।
[Image]बदलाव एक मनोदशा का नाम है। उसे समझने की ज़रूरत है। बदलाव हमें आगे भी ले जा सकता है और पीछे भी। एक मोहरा हटाकर उसकी जगह दूसरा मोहरा रखना भी बदलाव है, पर महत्वपूर्ण है मोहरे की भूमिका। पिछले कुछ साल से मुझे नए ‘एस्पायरिंग पत्रकारों’ में ‘बुद्धिजीवियों’ और बौद्धिक कर्म के प्रति वितृष्णा नज़र आती है। पढ़ने-लिखने और ज्ञान बढ़ाने के बजाय कारोबारी शब्दावली का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। इसके विपरीत सारे कथित बुद्धिजीवी और पुराने लोग भी दूध के धुले नहीं होते। उनका बड़ा तबका हर नई बात के प्रति शंकालु रहा है। उन्हें हर बात में साजिश नज़र आती है। अखबारों का रंगीन होना भी साम्राज्यवादी साजिश लगता है। इस द्वंद का असर अखबारों और मीडिया के दूसरे माध्यमों की सामग्री पर पड़ा है। बहुत से लोग इसके लिए बाज़ार को कोसते हैं, पर मुझे लगता है कि आज भी बाज़ार संजीदा और सरल पत्रकारिता को पसंद करता है और बाज़ीगरी को नापसंद। बाज़ार कौन है? हमारा पाठक ही तो हमारा बाज़ार है। वह छपाई और नई तकनीक को पसंद करता है, जो स्वाभाविक है। पर तकनीक तो फॉर्म है कंटेंट नहीं। रंग महत्वपूर्ण है यह यूएसए टुडे ने साबित किया।
1982 में यूएसए टुडे जब सामने आया तब उसने कंटेंट को बदल थोड़े दिया। सिर्फ उसे बेहतर तरीके से सजाया। मौसम जैसे उपेक्षित विषय की जानकारी और आर्थिक इंडिकेटरों को नया अर्थ दिया। उसके पहले मौसम की जानकारी यों ही दे दी जाती थी। यूएसए टुडे ने उसे बेहतर ग्रैफिक के साथ पेज एक पर एक खास जगह लगाया। अखबार के अलग-अलग सेक्शनों को अलग-अलग रंग की पहचान दी। पेज के बाईं ओर सार संक्षेप यानी रीफर शुरू किए। परम्परागत अखबारों से हटकर लीड खबर पेज पर दाईं ओर लगाना शुरू किया। सबसे रोचक थे यूएस टुडे स्नैपशॉट्स। ये कॉस्मेटिक बदलाव तो थे, पर सामग्री का मर्म पहले से बेहतर और साफ हुआ। यूएसए टुडे ने बदलाव की वह लहर शुरू की जिसने सारी दुनिया को धो दिया। इस बदलाव में न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबार देर से शामिल हुए। यूएसए टुडे के 15 साल बाद 1997 में न्यूयॉर्क टाइम्स रंगीन हुआ। भारत में हिन्दू ने अप्रेल 2005 में रिडिजाइन किया। यों इंटरनेट पर जाने वाला भारत का पहला अखबार हिन्दू था, जिसने 1995 में अपनी साइट लांच की। यह उसकी तकनीकी समझ थी।
बदलाव बंद दिमाग से किया जाय तो वह निरर्थक होता है। यूएसए टुडे ने शुरुआत में जितने तीखे रंग लगाए वे अब नहीं हैं। डिजाइन में पुरानेपन की भी वापसी हो रही है। आठ कॉलम के ग्रिड पर कायम रहना, ब्लैक एंड ह्वाइट स्पेस का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना ताकि रंग बेहतर उभरें, बाद का विचार है। किसी चीज़ का प्रवेश भविष्य के बदलाव के रास्ते नहीं रोकता। पर कुछ चीजें ऐसी हैं, जो सैकड़ों साल तक नहीं बदलतीं। जैसे अखबारों के सम्पादकीय पेज। सम्पादकीय पेज की निरर्थकता का शोर तमाम दिलजले मचाते रहते हैं, पर इस पेज को खत्म नहीं कर पाते। इन दिनों हिन्दी के कुछ अखबार इस पन्ने में चाट-मसाला भरने की कोशिश करते नज़र आ रहे हैं। हो सकता है वे कोई नई चीज़ निकाल दें, पर अतिशय बदलाव अस्थिर दिमाग की निशानी है। मैग्जीनों के मास्टहैड पूरे पेज में फ्लोट करते रहे हैं, पर अखबारों के मास्टहैड में फॉण्ट और रंग तो तमाम बदले, पर पोजीशन नहीं बदल पाई।  
डिजाइन और कॉस्मेटिक्स से थोड़ा फर्क पड़ता है। असल चीज़ है जर्नलिज्म। देश के सबसे लोकप्रिय अखबारों का उदाहरण सामने है। टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दू, टेलीग्राफ, इंडियन एक्सप्रेस, जागरण, भास्कर, मलयाला मनोरमा और आनन्द बाज़ार पत्रिका किसी न किसी मामले में लीडर हैं। इनके डिजाइन और कद को देखें। इनमें भास्कर ने हाल के वर्षों में डिजाइन और कंटेंट में कई प्रयोग किए हैं। शेष अखबार समय के साथ मामूली बदलाव करते रहे हैं, पर डिजाइन को लेकर बहुत चिंतित नहीं रहे। भास्कर का डिजाइन भी परम्परा के करीब है। जागरण शक्ल-सूरत से सामान्य लगता है, पर उसकी ताकत है सामान्य खबरें। न्यूज़ ऑफ द डे जागरण में होती है।
जो अखबार खबर को सादगी से देने के बजाय उसकी बाज़ीगरी में जुटते हैं, वे बुरी तरह पिटते हैं। सादा और सरल खबर लिखना मुकाबले बाज़ीगरी के ज्यादा मुश्किल काम है। दिक्कत यह है कि डिजाइन को स्वीकृति देने वाले लोगों का विज़न उस क्षण तक सीमित होता है, जिस क्षण वे डिजाइन देखते हैं। मसालेदार पकवान के मुकाबले सादा भोजन हमेशा फीका लगता है, फिर भी दुनिया में सबसे ज्यादा सादा भोजन ही खाया जाता है। हाल में अमर उजाला ने डिजाइन में बदलाव किया है, जो स्पेस मैनेजमेंट के लिहाज से आँख को कुछ खटकता है, पर पहले से सुथरा और बेहतर है। डिजाइन को कंटेंट की फिलॉसफी से जोड़ने के लिए एक बैचारिक अवधारणा भी किसी के पास होनी चाहिए। झगड़ा मार्केटिंग या सम्पादकीय का नहीं है। दोनों का उद्देश्य बाज़ार में सफल होना है। महत्वपूर्ण यह है कि हम पाठक के दिमाग को कितना समझते हैं। इसके लिए हमें भी तो खुद पाठक बनकर सोचना चाहिए।  
समाचार फॉर मीडिया डॉट कॉम से


यूएसए टुडे के रंग-विकास पर रिचर्ड कर्टिस से तीन मिनट का इंटरव्यू --मारियो गार्सिया की वैबसाइट से Posted by pramod joshi 1 comments Links to this post Labels: , , Tuesday, August 03, 2010
पत्रकारिता के समांतर चलता है उसका कारोबार
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जब हम मीडिया के विकास, क्षेत्र विस्तार और गुणात्मक सुधार की बात करते हैं, तब सामान्यतः उसके आर्थिक आधार के बारे में विचार नहीं करते। करते भी हैं तो ज्यादा गहराई तक नहीं जाते। इस वजह से हमारे एकतरफा होने की संभावना ज्यादा होती है। कहने का मतलब यह कि जब हम मूल्यबद्ध होते हैं, तब व्यावहारिक बातों को ध्यान में नहीं रखते। इसके विपरीत जब व्यावहारिक होते हैं तब मूल्यों को भूल जाते हैं। जब पत्रकारिता की बात करते हैं, तब यह नहीं देखते कि इतने लोगों को रोजी-रोज़गार देना और साथ ही इतने बड़े जन-समूह के पास सूचना पहुँचाना मुफ्त में तो नहीं हो सकता। शिकायती लहज़े में अक्सर कुछ लोग सवाल करते हैं कि मीडिया की आलोचना के पीछे आपकी कोई व्यक्तिगत पीड़ा तो नहीं? ऐसे सवालों के जवाब नहीं दिए जा सकते। दिए भी जाएं तो ज़रूरी नहीं कि पूछने वाला संतुष्ट हो। बेहतर है कि हम चीज़ों को बड़े फलक पर देखें। व्यक्तिगत सवालों के जवाब समय देता है।
[Image]पत्रकार होने के नाते हमारे पास अपने काम का अनुभव और उसकी मर्यादाओं से जुड़ी धारणाएं हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हम कारोबारी मामलों को महत्वहीन मानें और उनकी उपेक्षा करें। मेरा अनुभव है कि मीडिया-बिजनेस में तीन-चार तरह की प्रवृत्तियाँ हैं, जो व्यक्तियों के मार्फत नज़र आती हैं। एक है कि हमें केवल पत्रकारीय कर्म और मर्यादा के बारे में सोचना चाहिए। कारोबार हमारी समझ के बाहर है। पत्रकारीय कर्म के भी अंतर्विरोध हैं। एक कहता है कि हम जिस देश-काल को रिपोर्ट करते हैं, उससे निरपेक्ष रहें। जिस राजनीति पर लिखते हैं, उसमें शामिल न हों। दूसरा कहता है कि राजनीति एक मूल्य है। मैं उस मूल्य से जुड़ा हूँ। मेरे मन में कोई संशय नहीं। मैं एक्टिविस्ट हूँ, वही रहूँगा।
[Image]तीसरा पत्रकारीय मूल्य से हटकर कारोबारी मूल्य की ओर झुकता है। वह कारोबार की ज़रूरत को भी आंशिक रूप से समझना चाहता है। चौथा कारोबारी एक्टिविस्ट है यानी वह पत्रकार होते हुए भी खुलेआम बिजनेस के साथ रहना चाहता है। वह मार्केटिंग हैड से बड़ा एक्सपर्ट खुद को साबित करना चाहता है। पाँचवाँ बिजनेसमैन है, जो कारोबार जानता है, पर पत्रकारीय मर्यादाओं को तोड़ना नहीं चाहता। वह इस कारोबार की साख बनाए रखना चाहता है। छठे को मूल्य-मर्यादा नहीं धंधा चाहिए। पैसा लगाने वाले ने पैसा लगाया है। उसे मुनाफे के साथ पैसे की वापसी चाहिए। आप इस वर्गीकरण को अपने ढंग से बढ़ा-घटा सकते हैं। इस स्पेक्ट्रम के और रंग भी हो सकते हैं। एक संतुलित धारणा बनाने के लिए हमें इस कारोबार के सभी पहलुओं का विवेचन करना चाहिए।
[Image]इन दिनों ब्लॉगिंग चर्चित विषय है। चिट्ठाजगत से हर रोज तकरीबन दस-पन्द्रह नए चिट्ठों के पंजीकरण की जानकारी दी जाती है। वास्तविक नए ब्लॉगों की संख्या इससे कहीं ज्यादा होगी। चिट्ठाजगत में पंजीकृत चिट्ठों की संख्या पन्द्रह हजार के पास पहुँच रही है। हर रोज चार सौ से पाँच सौ के बीच ब्लॉग पोस्ट आती हैं। यानी इनमें से पाँच प्रतिशत भी नियमित रूप से नहीं लिखते। एक तरह की सनसनी है। एक नई चीज़ सामने आ रही है। एक लोकप्रिय एग्रेगेटर ब्लॉगवाणी के अचानक बंद हो जाने से ब्लॉगरों में निराशा है। इस बीच दो-एक नए एग्रेगेटर तैयार हो रहे हैं। यह सब कारोबार से भी जुड़ा है। कोई सिर्फ जनसेवा के लिए एग्रेगेटर नहीं बना सकता। उसका कारोबारी मॉडल अभी कच्चा है। जिस दिन अच्छा हो जाएगा, बड़े इनवेस्टर इस मैदान में उतर आएंगे। ब्लॉग लेखक भी चाहते हैं कि उनके स्ट्राइक्स बढ़ें। इसके लिए वे अपने कंटेंट में नयापन लाने की कोशिश करते हैं। इसके लिए कुछ ने सनसनी का सहारा भी लिया है। अपने समूह बना लिए हैं। एक-दूसरे का ब्लॉग पढ़ते हैं। टिप्पणियाँ करते हैं। वे अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं। साथ ही इसे व्यावसायिक रूप से सफल भी बनाना चाहते हैं। मिले तो विज्ञापन भी लेना चाहेंगे। ध्यान से पढ़ें तो मीडिया बिजनेस की तमाम प्रवृत्तियाँ आपको यहाँ मिलेंगी।
भारत में अभी प्रिंट मीडिया का अच्छा भविष्य है। कम से कम दस साल तक बेहतरीन विस्तार देखने को मिलेगा। इसके साथ ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का विस्तार हो रहा है। वह भी चलेगा। उसके समानांतर इंटरनेट का मीडिया आ रहा है, जो निश्चित रूप से सबसे आगे जाएगा। पर उसका कारोबारी मॉडल अभी शक्ल नहीं ले पाया है। मोबाइल तकनीक का विकास इसे आगे बढ़ाएगा। तमाम चर्चा-परिचर्चाओं के बावज़ूद इंटरनेट मीडिया-कारोबार शैशवावस्था में, बल्कि संकट में है।
[Image]दुनिया के ज्यातर बड़े अखबार इंटरनेट पर आ गए हैं। वॉशिंगटन पोस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स, गार्डियन, टेलीग्राफ, इंडिपेंडेंट, डॉन, टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दू से लेकर जागरण, भास्कर, हिन्दुस्तान और अमर उजाला तक। ज्यादातर के ई-पेपर हैं और न्यूज वैबसाइट भी। पर इनका बिजनेस अब भी प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मुकाबले हल्का है। विज्ञापन की दरें कम हैं। इनमे काम करने वालों की संख्या कम होने के बावजूद उनका वेतन कम है। धीरे-धीरे ई-न्यूज़पेपरों की फीस तय होने लगी है। रूपर्ट मर्डोक ने पेड कंटेंट की पहल की है। अभी तक ज्यादातर कंटेंट मुफ्त में मिलता है। रिसर्च जरनल, वीडियो गेम्स जैसी कुछ चीजें ही फीस लेकर बिक पातीं हैं। संगीत तक मुफ्त में डाउनलोड होता है। बल्कि हैकरों के मार्फत इंटरनेट आपकी सम्पत्ति लूटने के काम में ही लगा है। मुफ्त में कोई चीज़ नहीं दी जा सकती। मुफ्त में देने वाले का कोई स्वार्थ होगा। ऐसे में गुणवत्ता और वस्तुनिष्ठा नहीं मिलती। डिजिटल इकॉनमी को शक्ल देने की कोशिशें हो रहीं हैं।
कभी मौका मिले तो हफिंगटनपोस्ट को पढ़ें। इंटरनेट न्यूज़पेपर के रूप में यह अभी तक का सबसे सफल प्रयोग है। पिछले महीने इस साइट पर करीब ढाई करोड़ यूनीक विज़िटर आए। ज्यादातर बड़े अखबारों की साइट से ज्यादा। पर रिवेन्यू था तीन करोड़ डॉलर। साधारण अखबार से भी काफी कम। हफिंगटन पोस्ट इस वक्त इंटरनेट की ताकत का प्रतीक है। करीब छह हजार ब्लॉगर इसकी मदद करते हैं। इसके साथ जुड़े पाठक बेहद सक्रिय हैं। हर महीने इसे करीब दस लाख कमेंट मिलते हैं। चौबीस घंटे अपडेट होने वाला यह अखबार दुनिया के सर्वश्रेष्ठ अखबारों की कोटि की सामग्री देता है। साथ में वीडियो ब्लॉगिंग है। सन 2005 से शुरू हुई इस न्यूज़साइट के शिकागो, न्यूयॉर्क, डेनवर, लॉस एंजलस संस्करण निकल चुके हैं। पिछले साल जब फोर्ब्स ने पहली बार मीडिया क्षेत्र में सबसे प्रभावशाली महिलाओं की सूची छापी तो इस साइट की को-फाउंडर एरियाना हफिंगटन को बारहवें नम्बर पर रखा।
[Image]इंटरनेट के मीडिया ने अपनी ताकत और साख को स्थापित कर दिया है। पर यह साख बनी रहे और गुणवत्ता में सुधार हो इसके लिए इसका कारोबारी मॉडल बनाना होगा। नेट पर पेमेंट लेने की व्यवस्था करने वाली एजेंसी पेपॉल को छोटे पेमेंट यानी माइक्रो पेमेंट्स के बारे में सोचना पड़ रहा है। जिस तरह भारत में मोबाइल फोन के दस रुपए के रिचार्ज की व्यवस्था करनी पड़ी उसी तरह इंटरनेट से दो रुपए और दस रुपए के पेमेंट का सिस्टम बनाना होगा। चूंकि नेट अब मोबाइल के मार्फत आपके पास आने वाला है, इसलिए बहुत जल्द आपको चीजें बदली हुई मिलेंगी। और उसके बाद कंटेंट के कुछ नए सवाल सामने आएंगे। पर जो भी होगा, उसमें कुछ बुनियादी मानवीय मूल्य होंगे। वे मूल्य क्या हैं, उनपर चर्चा ज़रूर करते रहिए।
चलते-चलतेद इकोनॉमिक्स ऑफ कंटेंटवॉशिंगटन पोस्ट ने न्यूज़वीक को बेचाएंड्रॉयड ने आईफोन को पीछे छोड़ा  Posted by pramod joshi 6 comments Links to this post Labels: , , Monday, July 26, 2010
विकीलीक्स यानी साहस की पत्रकारिता [Image]इराक और अफगानिस्तान में नागरिकों की हत्या हो रही है, यह बात खबरों में कब से है। पर जब आप अपनी आँख से हत्याएं देखते हैं, तब दिल दहल जाता है। अमेरिकी सेना के ऑफीशियल वीडियो इस बात की जानकारी देते हैं, तब हमें सोचना पड़ता है।




[Image]आज खबर है कि विकीलीक्स ने अमेरिकी सेना के करीब 92,000 गोपनीय दस्तावेज़ दुनिया के तीन अखबारों को सौंपे हैं, जिनसे अमेरिका के अफगान युद्ध के क्रूर मुख पर रोशनी पड़ती है। बताते हैं यह लीक 1970 के पेंटागन पेपर्स से भी ज्यादा बड़ा है।साथ वाला चित्र अफगानिस्तान में हेलीकॉप्टर से नागरिकों पर गोलीबारी का है। यूट्यूब पर यह वीडियो उपलब्ध है। लिंक नीचे दिया है।




हमारे अधिकतर पाठक विकीलीक्स से परिचित नहीं हैं। हम पत्रकारिता के पेज3 मार्का मनोरंजन-मुखी चेहरे को ही देखते आए हैं। विकीलीक्स धीरे-धीरे एक वैश्विक शक्ति बनता जा रहा है। यह पत्रकारिता वह मिशनरी पत्रकारिता है, जो इस कर्म का मर्म है। जिस तरह से विकीपीडिया ने ज्ञान की राह खोली है उसी तरह विकीलीक्स ने इस ज़माने की पत्रकारिता का रास्ता खोला है।




[Image]यह न तो कोई खुफिया संस्था है और न अमेरिका-विरोधी। यह सिर्फ अनाचार और स्वयंभू सरकारों के विरुद्ध है। इसने अमेरिका, चीन, सोमालिया, केन्या और आइसलैंड तक हर जगह असर डाला है। कुछ समय पहले तक कोई नहीं जानता था कि इसके पीछे कौन है। केवल ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार जूलियन  असांज सामने आते हैं। शायद वे इसके संस्थापकों में से एक हैं। बाईं ओर का चित्र असांज का है। उनसे बातचीत का वीडियो लिंक भी नीचे है।




दुनिया की सबसे ताकतवर सरकारों के बारे मे निगेटिव सामग्री का प्रकाशन बेहद खतरनाक है। विकीलीक्स के पास न तो इतना पैसा है और न ताकत। अदालतें उसके खिलाफ कार्रवाई करतीं है। धीरे-धीरे इसे दुनिया के सबसे अच्छे वकीलों की सेवाएं मुफ्त मिलने लगीं हैं। जनता के दबाव के आगे संसदें झुकने लगीं हैं। शायद अभी आपकी निगाहें इस ओर नहीं गईं हैं।








बीबीसी की खबर
विकीलीक्स वैबसाइट
कोलेटरल मर्डरः वीडियो देखें, आप दहल जाएंगे 
जूलियन असेंज क्या कहते हैं
क्या है विकीलीक्स Posted by pramod joshi 6 comments Links to this post Labels: , Friday, July 23, 2010
पत्रकारिता का मृत्युलेख [Image]रामनाथ गोयनका पत्रकारिता  पुरस्कार समारोह के दौरान पेड न्यूज़ को लेकर परिचर्चा भी हुई। ऐसी परिचर्चा पिछले साल के समारोह में भी हो सकती थी। हालांकि उस वक्त तक यह मामला उठ चुका था। यों पिछले साल जब हिन्दू में पी साईनाथ के लेख प्रकाशित हुए तब इस मामले पर बात शुरू हुई। वर्ना मान लिया गया था कि इस सवाल पर मीडिया मौन धारण करे रहेगा।




गुरुवार के समारोह में अभिषेक मनु सिंघवी ने ठीक सवाल उठाया कि मीडिया तमाम सवालों पर विचार करता है, इसपर क्यों नहीं करता। इस समारोह में मौज़ूद कुमारी शैलजा, सचिन पायलट और दीपेन्द्र हुड्डा ने बताया कि उनके पास मीडिया के लोग आए थे। बात इतनी साफ है तो क्यों नहीं हम इस मामले पर आगे जाकर पता लगाएं कि कौन पैसा माँगने आया था। किसने किसको कितना पैसा दिया। वह पैसा कहाँ गया वगैरह का पता तो लगे।




पेज3 की पेड न्यूज़ और चुनाव की पेड न्यूज़ में फर्क नहीं करना चाहिए। यह सब अपनी साख को तबाह करना है। इस समारोह मे हालांकि ज्यादातर वे लोग शामिल थे, जो इन बातों से ज्यादा नहीं जुड़े रहे हैं, पर उनमे से ज्यादातर के मासूम सवाल जनता के सवाल हैं। मसलन रविशंकर प्रसाद का यह सवाल कि क्या पत्रकारिता सीधे-सीधे ट्रेड और बिजनेस है? क्या ऐसा है? ऐसा है कहने के बाद पूरी व्यवस्था धड़ाम से ज़मीन पर आकर गिरती है। अरुणा रॉय कहती हैं कि डैमोक्रेसी में मीडिया का रोल है। मीडिया को प्रॉफिट-लॉस का कारोबार नहीं बनना चाहिए।




अच्छी बात है कि हम मीडिया की भूमिका पर बात कर रहे हैं, पर हम क्यों उम्मीद करें कि मीडिया प्रॉफिट-लॉस के मोह-जाल से ऊपर उठकर काम करेगा। उसे निकालने के पीछे की मनोभावनाएं वही रहेंगी तो इसमें कोई बदलाव नहीं होगा। ज़रूरत इस बात की है कि हम मीडिया का मालिक कौन हो इस सवाल को उठाएं।  यह सब जनता के दरवार में तय होना है। जनता बहुत सी बातों से अपरिचित है। वह हमपर ही भरोसा करती थी, पर हम उसे बताना नहीं चाहते। इसलिए इस मीडिया के भीतर से साखदार मीडिया के उभरने की ज़रूरत है। यह बेहद मुश्किल काम है, क्योंकि दूध का जला हर दूध को जलाने वाला समझेगा।




मुझे लगता है पत्रकारिता को जिस तरह से राजनेताओं और सत्ता से जोड़ा गया है, उसे देखते हुए जल्द किसी बदलाव की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। आखिरकार इंडियन एक्सप्रेस का यह समारोह भी पीआर एक्सरसाइड़ थी जिसमें अखबार की रपट के अनुसार शामिल होने वाले गणमान्य लोगों में गिनाने लायक नाम राजनेताओं के ही थे। एकाध पत्रकार भी था, तो वही पेज3 मार्का। पत्रकारिता का व्यवस्था के साथ 36 का रिश्ता होना चाहिए, पर यहाँ वैसा है नहीं। इसलिए सारी बातें ढोंग जैसी लगती हैं।




इंडियन एक्सप्रेस के पेज 2 पर इस गोष्ठी की बड़ी सी खबर है जिसका शीर्षक है 'पेड न्यूज़ कुड मार्क डैथ ऑफ जर्नलिज़्म'। यह खुशखबरी है या दुःस्वप्न?




कुछ महत्वपूर्ण लिंक


प्रेस काउंसिल रपट
काउंटरपंच में पी साइनाथ का लेख
हिन्दू में पी साइनाथ का लेख
इंडिया टुगैदर
सेमिनार
द हूट
न्यूज़ फॉर सेलः द हूट
सैलिंग कवरेजः द हूट
प्लीज़ डू नॉट सैल-विनोद मेहता  Posted by pramod joshi 10 comments Links to this post Labels: , , , Monday, July 12, 2010
संकट और समाधान के दोराहे पर [Image]
यह सवाल अब बार-बार पूछा जाने लगा है कि पत्रकारिता क्या खत्म हो जाएगी? इसके मूल्य, सिद्धांत और विचार कूड़ेदान में चले जाएंगे? मनी और मसल पावर की ही जीत होगी?  काफी लोगों को लगता है कि पत्रकारिता के सामने संकट है और इससे निकलने का रास्ता कोई खोज नहीं पा रहा है। इस कर्म से जुड़े ज्यादातर लोग यों किसी भी दौर में व्यवस्था को लेकर संतुष्ट नहीं रहे, पर इस वक्त वे सबसे ज्यादा व्यथित लगते हैं। रविवार की दोपहर दिल्ली के कांस्टीट्यूशन हॉल में उदयन शर्मा फाउंडेशन के संवाद-2010 में विचार व्यक्त करने और दूसरों को सुनने के लिए जिस तरह से मीडिया से जुड़े लोग जमा हुए उससे इतनी आश्वस्ति ज़रूर होती है कि सब लड़ाई को इतनी आसानी से हारने को तैयार नहीं हैं। गोकि इस मसले को अलग-अलग लोग अलग-अलग ढंग से देखते हैं।
खबरों को बेचना सारी बात का एक संदर्भ बिन्दु है, पर घूम-फिरकर हम इस बिजनेस के व्यापक परिप्रेक्ष्य को छूने लगते हैं। फिर बातें पूँजी, कॉरपोरेट कंट्रोल और राजनैतिक-व्यवसायिक हितों के इर्द-गिर्द घूमने लगती हैं। ऐसा भी लगता है कि हम बहुत सी बातें जानते हैं, पर उन्हें खुलकर व्यक्त कर नहीं पाते या करना नहीं चाहते। भारतीय भाषाओं का मीडिया पिछले तीन दशक में काफी ताकतवर हुआ है। यह ताकत राजनीति-समाज और बिजनेस तीनों क्षेत्रों में उसके बढ़ते असर के कारण है। पर तीनों क्षेत्रों में हालात तीन दशक पहले बाले नहीं हैं।   राजनीति-बिजनेस और पत्रकारिता तीनों में नए लोगों, नए विचारों और नई प्रवृत्तियों का प्रवेश हुआ है। राजनीति में अपराध और बिजनेस के प्रतिनिधि बढ़े हैं। अपराध का एक रूप यूपी और बिहार में नज़र आता है। इसमें अपहरण, हत्या, फिरौती वगैरह हैं। दूसरा रूप आर्थिक है। यह नज़र नहीं आता, पर यह हत्याकारी अपराध से ज्यादा खतरनाक है। यह गुलाबजल और चांदी के वर्क से पगा है। राजनीति में अपराधी का प्रवेश सहज है। वह सत्ता का सिंहासन लेकर चलती है। ऐसा ही मीडिया के साथ है। वह भी व्यक्ति के सामाजिक रुतबे और रसूख को बनाता है। पुराने पत्रकार को पाँच-सौ या हज़ार के नोट दिखाने के बजाय आज बेहतर तरीके मौज़ूद हैं। चैनल शुरू किया जा सकता है। अखबार निकाला जा सकता है। [Image]
पत्रकारिता एक नोबल प्रोफेशन है। और नब्बे फीसदी या उससे भी ज्यादा पत्रकार इसे अपने ऊपर लागू करते हैं। इसीलिए वे व्यथित हैं। और उनकी व्यथा ही इसे भटकाव से रोकेगी। पेड न्यूज़ पर पूरी तरह रोक लग पाएगी, ऐसा नहीं कहा जा सकता, पर वह उस तरीके से ताल ठोककर जारी भी नहीं रह पाएगी। जिस पेड न्यूज़ पर हम चर्चा कर रहे हैं वह पत्रकारों की ईज़ाद नहीं है। यह पैसा उन्हें नहीं मिला। मिला भी तो कुछ कमीशन। एक या दो संवाददाता अपने स्तर पर ऐसा काफी पहले से करते रहे होंगे। पर इस बार मामला इंस्टीट्यूशनलाइज़ होने का था। इसका इलाज़ इंस्टीट्यूशनल लेवल पर ही होना चाहिए। यानी सरकार, इंडियन न्यूज़पेपर सोसायटी और पत्रकारों की संस्थाओं को मिलकर इस पर विचार करना चाहिए। सार्वजनिक चर्चा या पब्लिक स्क्रूटनी से इस मंतव्य पर प्रहार हुआ ज़रूर है, पर कोई हल नहीं निकला है। एक विडंबना ज़रूर है कि मीडिया जो पब्लिक स्क्रूटनी का सबसे महत्वपूर्ण मंच होता था,  इस सवाल पर चर्चा करना नहीं चाहता। एक-दो अखबारों को छोड़ दें तो, ज्यादातर चर्चा मीडिया के बाहर हुई है। इस मामले के असली प्लेयर अभी तक सामने नहीं आए हैं। शायद आएंगे भी नहीं।
कुछ महीने पहले इसी कांस्टीट्यूशन क्लब में एडीटर्स गिल्ड और वीमेंस प्रेस कोर ने मिलकर एक गोष्ठी की थी, जिसमें टीएन नायनन ने कहा था कि सम्पादक को खड़े होकर ‘ना’ कहना चाहिए। रविवार की गोष्ठी में किसी ने गिरिलाल जैन का उल्लेख किया, जिन्होंने सम्पादकीय विभाग में आए विज्ञापन विभाग के व्यक्ति से कहा कि इस फ्लोर पर सम्पादकीय विभाग की बातों पर चर्चा होती है, बिजनेस की नहीं। कह नहीं सकते कि उस अखबार में आज क्या हालात हैं। पर हमें गिरिलाल जैन के कार्यकाल का अंतिम दौर याद है। उस मसले पर ‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ में कवर स्टोरी छपी। यह बात उस दौर के मीडिया हाउसों के मालिकों के व्यवहार और उसमें आते बदलाव पर रोशनी डालती है। [Image]
सम्पादक वह छोर है, जहाँ से प्रबंधन और पत्रकारिता की रेखा विभाजित होती है। सम्पादक कुछ व्यक्तिगत साहसी होते हैं, कुछ व्यवस्था उन्हें बनाती है। बहुत से तथ्य शायद अभी सामने आएंगे या शायद न भी आएं। पर इतना साफ है कि मीडिया की साख बनाने की जिम्मेदारी समूचे प्रबंधतंत्र की है। इनमें मालिक भी शामिल हैं। सामान्य पत्रकार कभी नहीं चाहेगा कि उसकी साख पर बट्टा लगे। इसमें व्यक्तिगत राग-द्वेष, महत्वाकांक्षाएं और दूसरे को पीछे धकेलने की प्रवृत्तियाँ भी काम करती हैं। पैराडाइम बदलता है, तब ऐसे व्यक्ति आगे आते हैं, जो खुद को संस्थान और बिजनेस के बेहतर हितैषी के रूप में पेश करते हैं। ऐसे अनेक अंतर्विरोध और विसंगतियां हैं।
इस मामले के दो प्रमुख सूत्रधारों की ओर हम ध्यान नहीं देते। एक मीडिया ओनरिशप और दूसरा पाठक या ग्राहक। देश के पहले प्रेस कमीशन ने मीडिया ओनरशिप का सवाल उठाया था। हम प्रायः दुनिया के दूसरे देशों का इंतज़ार करते हैं। या नकल करते हैं। कहा जाता है कि यही एक मॉडल है, हम क्या करें। पर हमें कुछ करना होगा। जो हालात हैं वे ऐसे ही नहीं रहेंगे। या तो वे सुधरेंगे या बिगड़ेंगे। तत्व की बात यह है कि यह सब किसी कारोबार का मसला नहीं है। यह काम हम पाठक-जनता या लोकतंत्र के लिए करते हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जानकारी पाने का हमारा अधिकार जाने-अनजाने दुनिया की सबसे अनोखी संवैधानिक व्यवस्था है। अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था की तरह यह केवल प्रेस की फ्रीडम नहीं है। अपने  लोकतांत्रिक कर्तव्यों को निभाने के लिए हमें सूचना की मुक्ति चाहिए। यह सूचना बड़ी पूँजी या कॉरपोरेट हाउसों की गिरफ्त में कैद रहेगी तो इससे नागरिक हितों को चोट पहुँचेगी। राइट टु इनफॉरमेशन ही नहीं हमें फ्रीडम ऑफ इनफॉरमेशन चाहिए। सूचना का अधिकार हमें सरकारी सूचना का अधिकार देता है। पर हमें सार्वजनिक महत्व की हर सूचना की ज़रूरत है। पूँजी को मुक्त विचरण की अनुमति इस आधार पर मिली है कि उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संगति है। उसकी आड़ में मोनोपली, कसीनो या क्रोनी कैपिटलिज्म का प्रवेश अनुचित है। मीडिया की ताकत पूँजी नहीं है। जनता या पाठक-दर्शक है। यदि मीडिया का वर्तमान ढाँचा अपनी साख को ध्वस्त करके सूचना को खरीदने और बेचने लायक कमोडिटी में तब्दील करना चाहता है तो मीडिया की ओनरशिप के बारे में सोचा जाना चाहिए। [Image]
चूंकि सार्वजनिक महत्व के प्रश्नों पर पहल स्टेट और सिविल सोसायटी को लेनी होती है, इसलिए यह राजनेताओं और जन-प्रतिनिधियों के लिए भी महत्वपूर्ण विषय है। इसके कानूनी और सांस्कृतिक पहलू भी हैं। कानूनी व्यवस्था से भी सारी बातें ठीक नहीं हो जातीं। सार्वजनिक व्यवस्था में बीबीसी और जापान के एनएचके काम कर सकते हैं, पर हमारे यहां तमाम कानूनी बदलाव के बावजूद प्रसार भारती कॉरपोरेशन नहीं कर पाता। हमारा लोकतंत्र और व्यवस्थाएं इवॉल्व कर रहीं हैं। उसके भीतर से नई बातें निकलेंगी। नई प्रोसेस, नए चैक्स एंड बैलेंसेज़ और मॉनीटरिंग आएगी। शायद पाठक भी हस्तक्षेप करेगा, जो अभी तक मूक दर्शक है। पेड न्यूज समस्या नहीं समस्या का एक लक्षण है। उसे लेकर पब्लिक स्क्रूटनी शुरू हुई है, यह उसके समाधान का लक्षण है।
समाचार फॉर मीडिया डॉट कॉम में प्रकाशित Posted by pramod joshi 0 comments Links to this post Labels: , , , Tuesday, July 06, 2010
चमत्कार को मीडिया का नमस्कार
टेलीशॉपिंग या होम शॉपिंग के किसी चैनल पर आपने अक्सर विज्ञापन देखे होंगे, जिनमें किसी की बुरी नज़र से बचाने या दुर्भाग्य से मुक्ति पाने के लिए किसी सिद्ध कवच को खरीदने का आग्रह किया जाता है। किसी सुखी परिवार को देखकर किसी स्त्री या पुरुष की आँखों से बुरी नज़र की किरणें निकलतीं हैं। वे उस परिवार का जीवन तबाह कर देती हैं। ऐसे ही किसी का चलता कारोबार बिगड़ जाता है। हमारे जीवन में ऐसे कवच, गंडे-ताबीज़ों की कमी नहीं है। बड़े-बड़े सेलेब्रिटी भी इनका सहारा लेते हैं। खराब वक्त प्रायः हर व्यक्ति के जीवन में आता है। ज्यादातर सेलेब्रिटीज़ के सेलेब्रिटी एस्ट्रॉलॉजर होते हैं। ज्यादातर चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं में भाग्य बताने वाले कॉलम होते हैं। यह व्यक्तिगत आस्था का मामला है। कोई इनपर यकीन करता है, तो उसके यकीन करने पर रोक नहीं लगाई जा सकती। पर गंडे-ताबीज़, कवच और जादुई चिकित्सा के प्रचार पर हमारे देश में कानूनी रोक है। फिर भी ऐसे विज्ञापन आराम से छपते हैं। ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज़ (ऑब्जेक्शनेबल एडवर्टीज़मेंट्स) एक्ट 1954 के अंतर्गत कई तरह के औषधीय दावों और रोगों के इलाज की चमत्कारिक दवाओं के विज्ञापन गैर-कानूनी हैं। खासकर जिन दावों को साबित न किया जा सके। इस आरोप में छह महीने से साल भर तक की सज़ा और ज़ुर्माने की व्यवस्था है। हिन्दी या अंग्रेजी का शायद ही कोई अखबार हो, जिसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में ऐसे दावे के विज्ञापन न छपते हों। कुछ विज्ञापनों पर ध्यान दीजिएः-खुला चैलेंजः शक्ति चमत्कार देखें अपनी आँखों सेगुरूजी कमाल खान बंगाली
[Image]लव मैरिज, वशीकरण, सौतन, दुश्मन से छुटकारा आदि सभी का A to Z समाधानबाबा खान बंगाली
जापानी ऑटोमेटिक इन्द्रीयवर्धक यंत्र
डायबिटीज़ः हैरतंगेज़ नई खोज
लम्बाई बढ़ाएं
नज़र रक्षा कवच
दुर्गा रक्षा कवच
इनमें मालिश करने वाले, एस्कॉर्ट्स और मैत्री के विज्ञापन भी शामिल हैं, जो अश्लीलता, अभद्रता और सार्वजनिक जीवन की मर्यादा से ताल्लुक रखते हैं। कुछ साल पहले ऋषिकेश के नीरज क्लीनिक के मामले को लेकर काफी विवाद हुआ था। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन तक ने उसमें हस्तक्षेप किया। देश की एडवर्टाइज़िंग स्टैंडर्ड काउंसिल ने भी दबाव डाला और वह विज्ञापन बंद हुआ। पर वह मनोवृत्ति कायम है। इसकी वजह विज्ञापन देने वालों के अलावा विज्ञापन लेने वाले भी हैं। केरल के अखबारों में एक विज्ञापन छपता था जिसमें ऊँचाई बढ़ाने का वादा था। नादिया नाम की एक लड़की उसके चक्कर में फँस गई। उसकी ऊँचाई बढ़ना तो बाद की बात है, चलना-फिरना मुश्किल हो गया। अंततः अपोलो अस्पताल में उसे इलाज कराना पड़ा। हालांकि इस कानून के तहत सरकारी अधिकारी अपने तईं हस्तक्षेप करके सम्बद्ध व्यक्ति या संस्था के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं, पर व्यावहारिक रूप से कुछ नहीं होता। एडवर्टाइज़िग स्टैंडर्ड काउंसिल के दिशा-निर्देशों के अनुसार विज्ञापन को स्वीकार करते वक्त उसके नैतिक पक्ष की जाँच होनी चाहिए। विज्ञापन का अर्थ यह नहीं होता कि आप पैसा देकर कुछ भी छपवा लें। काउंसिल के सेल्फ रेग्युलेशन कोड के मुताबिक विज्ञापन देने वाले के साथ-साथ विज्ञापन बनाने वालों, उसे प्रकाशित करने वालों और इसमें सहयोग करने वालों की जिम्मेदारी भी इसमें है। यह देखना ज़रूरी है कि विज्ञापन में कही गई बातें भ्रम तो नहीं फैला रहीं। इस गैर-जिम्मेदारी से हिन्दी का पाठक ज्यादा प्रभावित होता है। खासकर दुर्गा रक्षा-कवच या शिव रक्षा-कवच की गुणवत्ता को सर्टिफाई करने वाली कोई संस्था देश में नहीं है। ऐसे कवच विज्ञापन के बगैर भी बिकेंगे, पर विज्ञापन से उसे वैधानिकता मिलती है। सरकार के पास कानून का सहारा है, जो आसानी से उसे रोक सकती है। वहीं, जिन चैनलों पर ऐसे विज्ञापन नज़र आते हैं, उनकी भी जिम्मेदारी बनती है। दिक्कत यह है कि कानूनी व्यवस्था होने के बावजूद ऐसे विज्ञापन धड़ल्ले से दिखाए जाते हैं। तकरीबन हर शहर में दुनिया के सारे रोगों का इलाज करने वाली दवाएं मिलतीं हैं। इसकी एक वजह हमारा अवैज्ञानिक मन, दूसरे चमत्कार में यकीन और तीसरे महंगी आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था तक पहुँच न हो पाने की वजह से वैकल्पिक व्वस्था को खोजना है। विकल्प है देशी और वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियाँ। बेशक इन पद्धतियों की चिकित्सा को बढ़ावा देने की ज़रूरत है। इनके पीछे हजारों साल का अनुभव है। पर इनकी आड़ में कमाई करने वाले भी हैं। अमेरिका में औषधि नियम बहुत सख्त हैं। शायद हमारे यहाँ उतना सख्त करना व्यावहारिक नहीं, पर कानून इतना लचर भी नहीं होना चाहिए कि उसका मज़ाक बन जाए। इधर अनेक चमत्कारिक दवाएं फूड सप्लीमेंट के रूप में बेची जा रहीं हैं। ताकत, स्फूर्ति और मर्दानगी की तमाम दवाएं इसी श्रेणी में आतीं हैं। हिन्दी के अखबारों में इनके विज्ञापन ज्यादा होते हैं। इसे वह वर्ग पढ़ता है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के बाहर हो चुका है और जिसके पास विशेषज्ञों से कंसल्ट करने की न तो आर्थिक शक्ति है और न आत्मविश्वास। वह ठगे जाने को अभिशप्त है। उसके पक्ष में खड़े होने की ज़िम्मेदारी मीडिया की है, जो जाने-अनजाने अपनी ज़िम्मेदारी को भूल गया है। पहले पत्रकारिता का जन्म हुआ था। उसके करीब सौ साल बाद विज्ञापन आए थे। पर सारी नकारात्मक भूमिका विज्ञापन की नहीं है। कंटेंट मे भी यही सब है। ऐसे में उसे कानून से नहीं रोका जा सकेगा। दूर-दराज़ की बात नहीं है दिल्ली के अखबारों तक में ‘जाको राखे साइयाँ’ टाइप खबरें छपतीं हैं। 1995 में गणेश प्रतिमाओं के दुग्धपान की खबरें छपते वक्त हम इसे देख चुके हैं। ऐसा ही दिल्ली में काले बंदर की खबरों को लेकर हुआ था। कोई रिपोर्टर खोज पर निकले तो उसे हिन्दी प्रदेशों के शहरों और कस्बों में अनेक कथाएं इस किस्म की चर्चित और प्रचारित मिलेंगी। चमत्कारी बकरी, तीन सिर वाला बच्चा, आसमान से बरसे फूल ऐसी खबरें गाहे-बगाहे अखबारों में जगह पाती हैं। लोक-रुचि के नाम पर वैज्ञानिक विषयों की खबरें भी चमत्कारिक ढंग से लिखी जाती हैं। विज्ञान को किसी अखबार ने गम्भीरता से नहीं लिया। विज्ञान के नाम पर टेक्नॉलजी खूब छपती है, क्योंकि उसका कमर्शियल पहलू है। विज्ञान बड़े स्तर पर उपेक्षित है।   अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार हमें अंधविश्वास को बढ़ावा देने की अनुमति भी देता है। ज्योतिषीय परामर्श तक बात ठीक है, पर आए दिन चमत्कारों की कहानियों का क्या अर्थ है? वैज्ञानिक खबरों के साथ भी यही होता है। उन्हें चमत्कार के रूप में लिखने की कोशिश की जाती है। आधुनिकता सिर्फ खाने-पीने, पहनने और बोलने की रह गई है, जो वस्तुतः नकल और प्रकारांतर से पिछड़ापन है। विवेक-विचार और विश्लेषण की आधुनिकता नहीं। इसे सुधारना तभी सम्भव है जब विज्ञान और चमत्कारों के बारे में मीडिया कोई कोड ऑफ कंडक्ट बनाए। बीटी बैंगन, जेनेटिक्स और विज्ञान की नैतिकता पर विमर्श करने से अधकचरा ज्ञान रोकता है।
समाचार फॉर मीडिया में प्रकाशित Posted by pramod joshi 0 comments Links to this post Labels: , , , नई पोस्ट पुराने पोस्ट मुखपृष्ठ सदस्यता लें संदेश (Atom) Follow by Email
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