रविवार, 26 फ़रवरी 2012

कलेवर के साथ अखबारों के तेवर भी बदल गए




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इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार, जल्दी ख़बरें पेश करने और दृश्यों की प्रधानता ने अख़बारों को सोचने पर मजबूर कर दिया। न्यूज़ चैनलों के मार्केट में आने से न सिर्फ़ अख़बार के पाठकों की संख्या में कमी आई बल्कि पाठकों ने उन अख़बारों को तरजीह देना शुरू कर दिया जो अपने आप में संपूर्णता परोसते हैं। उन्हें ख़बरों में भी मनोरंजन नज़र आने लगा। ऐसे में अख़बारों के सामने नई चुनौती पेश आ गई, कुछ बड़े ब्रांड ने हाथों-हाथ अपने कंटेंट में परिवर्तन कर लिया और कुछ ने मार्केट में रिसर्च कर ये पता लगाने की कोशिश की कि आख़िर सुधी पाठक इस कंपटिशन के दौर में कैसी ख़बरें पढ़ना पसंद करते हैं। ज्यादातर अख़बारों ने न सिर्फ़ अपना क्लेवर बदला बल्कि अपनी ख़बर को पेश करने का अंदाज़ भी बदल डाला, आख़िर मार्केट में जो टिके रहना था। कुछ अख़बारों ने अपनी भाषा में आम बोलचाल यानी हिंग्लिश को तरजीह दी तो किसी ने अपनी भाषा को हिंदी के साथ-साथ दूसरी भाषाओं के शब्दों को अपनाने से भी गुरेज़ नहीं किया।
न्यूज़ चैनल के तेज़ ख़बर पेश करने के दबाव में अख़बार ने भी ख़बरों में तेजी लाना शुरु कर दिया, व्यूज़ की जगह न्यूज़ को ज़्यादा तरजीह दी गई ताकि लोगों को अख़बार किसी भी सूरत में बासी न लगे। हालांकि आज भी हिंदुस्तान में आम लोगों के पास न्यूज़ पंहुचाने का सबसे सस्ता और सरल माध्यम अख़बार ही हैं। दो से चार रुपए की क़ीमत में आपको न सिर्फ़ देश-दुनिया की ख़बरें बल्कि साहित्य और कैरियर से जुड़ी जानकारियां भी प्राप्त होती हैं, ये सब न्यूज़ चैनलों से हो रही प्रतिस्पर्धा के कारण ही संभव हुआ।
एक वक्त था जब प्रिंट को विश्वसनीय माना जाता था क्योंकि प्रिंट ख़बरों का विश्लेषण करता था कोई भी ख़बर हो अख़बार उसे छापने से पहले उसकी पूरी जांच-परख़ करता था परंतु आज के दौर में ये संभव ही नहीं है, अब न तो अख़बारों में काम करने वाले पत्रकारों में ख़बरों की समीक्षा की क्षमता है औऱ न ही वो ख़बरों को सामाजिक पहलू में आंकते हैं उनके लिए ख़बर एक मात्र वस्तु बन गई है। जिसे वो बढ़िया पैकिंग में लपेटकर अपने पाठकों को परोस देते हैं बिना ये जाने कि इसका उनकी मानसिकता पर कोई असर पड़ने वाला है। आज अख़बारों से शब्दों की दोस्ती भी तकरीबन ख़त्म सी हो गई है,एक दौर था जब अख़बारों में ठेठ हिंदुस्तानी शब्द और मुहावरे पेश किए जाते थे,  ऐसे शब्द जो न सिर्फ़ अनपढ़ बल्कि सुदूर गांव में चौपाल पर चारपाई लगाऐ अख़बार पढ़ते हमारे बुजुर्गों की समझ में ख़बर पढ़ते ही आ जाते थे। मगर आज की भागमभाग वाली जीवनशैली में हम एक से दो मिनट में अख़बार पढ़ डालते हैं। क्योंकि अख़बार में ऐसा कुछ होता ही नहीं है जिस पर हमारी नज़र टिक सके।
आज किसी भी अख़बार का ध्यान से विश्लेषण कीजिए आपको सच्चाई नज़र आ जाऐगी, कोई भी अख़बार ऐसा नहीं है जो अपने पाठकों के हितों का ख़्याल रखता हो, उस पर अख़बार के मालिकों का तुर्रा ये कि मार्केट में टिके रहने के लिए अख़बार को ब्रांड बनाकर पेश नहीं करेंगे तो मार्केट में टिके रहने मुश्किल है, अख़बार बंद हो गया तो, बिल्कुल सही बात है मार्केट का तो ख़्याल है आपको... मगर उस पाठक का ज़रा भी ख़्याल नहीं जो सच्ची और मनोरंजक ख़बरों के लिए आप पर निर्भर है। आप उसे सुबह-सुबह चाय के प्याले के साथ क्या पेश कर रहे हैं, अपराध और रेप से जुड़ी ख़बरें या फ़िर लूट-खसोट वाली ख़बरें जिससे कि उसका मन पहले ही खिन्न हो चुका है।
न्यूज़ चैनलों की देखादेखी अख़बारों ने भी अपनी ख़बरों के क्लेवर में बदलाव कर दिया, अख़बारों को रंगीन बना दिया गया उसके पहले पन्ने को अपनी साख दिखाने के लिए विज्ञापन से पाट दिया गया ताकि लोगों को लगने लगे कि मार्केट में इस अख़बार की काफ़ी अच्छी रेपो है और ये जो ख़बरें पेश करता है वो विश्वसनीय हैं। लेकिन सवाल ये पैदा होता है कि सिर्फ़ विज्ञापन के दम पर अपने पाठकों को बेवकूफ़ बनाना कहां की समझदारी है।

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