मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

ग्रामीणों की सशक्त आवाज बनता अखबार






Press Woman-
तरन्नमुम मंजुल
कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में  अचानक बदलाव आया। यहां की चंद महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से संचार के एक छोटे माध्यम की शुरुआत की इन महिलाओं ने ग्रामीण समाचार पत्र (न्यूजलेटर) निकालना शुरू किया।
इसका उद्देश्य महिलाओं के बीच संवाद की शुरुआत, सूचना के आदान-प्रदान और उनके विचारों को एक मंच देना था। उस वक्त हाथ से लिखे और हाथ से ही डिजायन किए गए ये समाचार पत्र उत्तर प्रदेश की ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण को दिखाते थे।
अब ये अखबार किसी खास वर्ग की आवाज न रहकर पूरे गांव की आवाज बन गया है। उत्तर प्रदेश के कई ग्रामीण अखबार सिर्फ वर्ग विशेष की खबरें नहीं छापते, बल्कि गांव की समस्याओं और कुछ विशेष रूप में विश्व की घटनाओं को भी शामिल करते हैं। राष्ट्रीय परिदृश्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए इनमें से एक अखबार ‘खबर लहरिया’ को चमेली देवी जैन पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
जौनपुर से निकलने वाले अखबार ‘गुनागर’ के अप्रैल 2004 के अंक में भीमराव अंबेडकर के जन्म दिवस पर उनके जीवन संबंधी बातें छपी हैं। उड़िया न्यूजलेटर ‘मित्र’ के दिसम्बर 2004 अंक में गांव के प्राथमिक विद्यालयों में होने वाली जाति संबंधी परेशानियों पर लिखा गया, जिसकी एक प्रति प्रखंड विकास पदाधिकारी के पास भेजी गई। अधिकारियो ने इसे शिकायत के तौर पर दर्ज कर दोषी स्कूल शिक्षक के विरूद्ध कार्रवाई की। इनके अलावा अन्य कई समाचार पत्र जैसे वाराणसी से पुरवई, प्रतापगढ़ से भिंसर, सीतापुर से देहरिया, मथुरा से भैयली और चित्रकूट से महिला डाकिया (इस श्रृंखला का पहला न्यूजलेटर) ने भी समय के साथ अपनी पहचान बनाई है।
महिलाओं के शिक्षा और सशक्तिकरण के लिए काम करने वाली उत्तर प्रदेश  की एक गैर सरकारी संस्था महिला सामख्या इन ग्रामीण समाचार पत्र (न्यूजलेटर) की मदद करती है। चित्रकूट से निकलने वाले ‘खबर लहेरिया’ को महिलाओं के लिए काम करने वाली दिल्ली स्थित एक गैर सरकारी संस्थान का निरन्तर सहयोग प्राप्त है। इन न्यूजलेटर में से कुछ महीने में एक, कुछ तीन महीने में एक और कुछ साल में दो बार निकलते हैं।
इन न्यूजलेटर में चापाकल, खरंजा सड़क जैसी मूलभूत समस्याओं से लेकर दहेज, नशाखोरी और महिलाओं से हिंसा जैसे मुद्दों पर खबरें प्रकाशित होती हैं। इसके अलावा हत्या और अन्य अपराध से जुड़ी खबरें भी होती हैं। घर और बागीचा सम्भालने से जुड़ी जानकारी, हालिया शोध की विस्तृत जानकारी आदि इन न्यूजलेटर के अन्य आकर्षण हैं। ये जानकारियां वहां की महिलाएं स्वयं जुटाती हैं। इन समाचार पत्र के न्यूजरूम में झांकना बहुत ही मनोरंजक है। इसके सम्पादकीय में सामख्या केन्द्र का एक व्यक्ति, एक सहयोगी और संघ की कुछ शिक्षित महिलाएं होती हैं। इनमें से कुछ का काम न्यूजलेटर डिजायन करना होता है। ये डिजायन में लोककला का प्रयोग करती हैं। अच्छा और गांव से जुड़ा दिखाने की कोशिश करती हैं।
केन्द्र की गतिविधियों के आधार पर और महिलाओं के द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार समाचार इकट्ठा किया जाता है। जिसे ये कागज पर लिखते हैं या उसे टाइपिंग जानने वाली महिलाएं टाइप कर लेती हैं। फिर महिलाएं इसे 25 से 30 किलोमीटर दूर प्रिंटर के पास ले जाती हैं। वहां कुछ प्रतियों का चुनाव कर प्रिंट कर लिया जाता है। हर महीने या हर तीसरे महीने इन न्यूजलेटर की 700 से 1000 प्रतियां छपती हैं इसकी लागत लगभग 2500 से 3000 रुपये तक है। इस लागत का कुछ हिस्सा महिला सामख्या से आता है और कुछ हिस्सा आय बनाने वाली कुछ गतिविधियों से इकट्ठा किया जाता है।
समाचार पत्र निकालने में शामिल एक महिला के अनुसार अब गांव के अन्य लोग आकर अपनी समस्याएं बताते हैं। वे उम्मीद करते हैं कि समाचार पत्र में उनकी समस्याएं प्रकाशित की जाए। उनका कहना है कि उनके लिए अपनी समस्याओं को उजागर करने का यह सबसे सशक्त माध्यम है। महिला सामख्या जौनपुर की किरण और सुषमा कहती हैं कि हमने संघ की जानकारी बांटने के लिए इसकी शुरूआत की थी। अब गांव के लोग भी इससे जुड़ गए हैं। आगे गांव वालों की अपनी समस्याएं बताते और न्यूजलेटर में इसके छपने के कई उदाहरण बताती हैं। वह यह भी कहती हैं कि चूंकि यह एक समाचार पत्र है तो इसमें ग्रामीणों की सभी खबरें छापी जा सकती हैं।
कुछ मुद्दों के बारे में इन न्यूजलेटर में छपने के बाद कई गांव में बदलाव भी हुए हैं। जैसा कि एक बार एक गांव वाले ने गांव की एक मात्र सड़क की मरम्मत के लिए प्रधान से बार-बार की गई प्रार्थना के बारे में संघ की एक महिला को बताया। उस महिला ने समाचार पत्र में उसकी इस शिकायत को छापकर एक प्रति प्रखण्ड विकास पदाधिकारी को भेज दी। इस खबर को पढ़कर अधिकारी ने तत्काल सड़क बनवाने के आदेश दे दिए। महिला सामख्या की उजाला महासंघ से जुड़ी राजुमारी कहती हैं, ”हम अपने आपको एक सच्चा पत्रकार महसूस करते हैं। क्योंकि, हमारी खबरों में असर होता है। हमने अपने समाचार पत्र के एक अंक में गांव वालों के स्वीकृति पत्र भी प्रकाशित किए थे।”
एक दूसरी घटना में एक लड़की को उसके माता-पिता ने स्कूल जाने से रोक दिया था। लड़की ने रोते हुए अपने माता-पिता के लिए लिखी एक भावपूर्ण कविता संघ के कार्यकर्ताओं को दिखाई। उन्होंने पत्र में वह कविता छापकर उसकी प्रति लड़की के माता-पिता को भेज दी। महिला सामख्या चित्रकूट की वर्षा कहती हैं कि, ‘इसके बाद उन्होंने फिर कभी अपनी लड़की को स्कूल जाने से नहीं रोका।’ समय-समय पर महिलाएं भी अपनी समस्याओं का हल समाचार पत्र के माध्यम से निकालती हैं। आम जीवन की कई समस्याएं हैं जिसमें महिलाओं को परेशानी उठानी पड़ती है। समाचार पत्र में इन मुद्दों पर लिखकर प्रखण्ड के अधिकारियों के पास भेजती हैं। महिला सामख्या सीतापुर की नीलम बताती हैं कि प्रखण्ड के अधिकारी इन रिपोर्ट को पढ़कर तुरन्त कार्रवाई करते हैं।
इन समाचार पत्र की वृद्धि को देखकर इसकी पहल करने वाले को भी हैरानी होती है। महिला सामख्या उत्तर प्रदेश की उपनिदेशक डा. कुमकुम त्रिपाठी का मानना है कि महिलाओं की कड़ी मेहनत और समर्पण की बदौलत ही समाचार पत्र को इतनी कामयाबी मिली है। आगे कहती हैं कि समाचार पत्र इनके नियमित प्रकाशनों में से एक है और किसी भी हालत में इसको छापना वे नहीं रोकेंगी। ”हमने समाचार पत्र की शुरूआत नए शिक्षित हुए लोगों में शैक्षणिक पहल को बढ़ावा देने के लिए की थी। लेकिन, हमें ये जानकर आश्चर्य होता है कि बीते सालों में न्यूजलेटर की सफलता ने इसे समाचार पत्र की शक्ल दे दी है।
जिनमें विश्व समाचार के लिए भी जगह होती है।” इन समाचार पत्र में न सिर्फ महिलाओं बल्कि पुरुषों की समस्याओं पर भी ध्यान दिया जाता है। महिलाओं के साथ गांव के शिक्षित पुरुष भी इसे पढ़ते हैं। वाराणसी जिले के ग्राम प्रधान रामकिशोर यादव कहते हैं ”पहले महिलाओं द्वारा की गई इस पहल को स्वीकार करना हमारे लिए मुश्किल था। लेकिन, अब हमने महसूस किया है कि यह पूरे गांव के लिए उपहार की तरह है।” यादव की तरह ही गांव के अन्य कई पुरुष भी ऐसा ही सोचते हैं।
नि:संदेह ग्रामीणों के लिए इस तरह की पहल काफी महत्व रखती है। यह उनके लिए संचार का एक माध्यम मात्र नहीं है बल्कि, गांवों और समुदायों में बदलाव लाने का एक सशक्त तरीका है। यह दु:खद है कि गांवों में रहने वाले जनसंख्या के बहुत बड़े हिस्से को प्रस्तुत करने वाली मीडिया को ही वैकल्पिक मीडिया कहा जाता है।
(चरखा फीचर्स)

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