मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष




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May 30, 2011
 प्रतीक यादव|
आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है | हिंदी पत्रकारिता को आज 185 वर्ष हो गए है | हमारे देश में पत्रकारिता की शुरुआत पं. जुगल किशोर शुक्ल ने की थी, उन्होंने उदंत मार्तंड को रूप दिया और इसके साथ काफी लम्बे समय तक पत्रकारिता करते रहे, उदंत मार्तंड इसलिए बंद हुआ क्योंकि पं जुगल किशोर के पास उसे चलाने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे| पिछले 185 साल में काफी चीजे बदली है| आज बहुत से लोग इस क्षेत्र में पैसा लगा रहे है | यह एक बड़ा कारोबार बन गया है | जो हिंदी का क ख ग भी नहीं जानते वे हिंदी में आ रहे है| 185 सालो में हिंदी अखबारों एवं न्यूज़ पत्रकारिता के क्षेत्र में काफी तेजी आई है | साक्षरता बड़ी है | पंचायत स्तर पर राजनेतिक चेतना बड़ी है | इसके साथ ही साथ विज्ञापन बडे है | हिन्दी के पाठक अपने अखबारों को पूरा समर्थन देते हैं। महंगा, कम पन्ने वाला और खराब कागज़ वाला अखबार भी वे खरीदते हैं। अंग्रेज़ी अखबार बेहतर कागज़ पर ज़्यादा पन्ने वाला और कम दाम का होता है। यह उसके कारोबारी मॉडल के कारण है। आज कोई हिन्दी में 48 पेज का अखबार एक रुपए में निकाले तो दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया का बाज़ा भी बज जाए, पर ऐसा नहीं होगा। इसकी वज़ह है मीडिया प्लानर।
कौन हैं ये मीडिया प्लानर? ये लोग माडिया में विज्ञापन का काम करते हैं, पर विज्ञापन देने के अलावा ये लोग मीडिया के कंटेंट को बदलने की सलाह भी देते हैं। चूंकि पैसे का इंतज़ाम ये लोग करते हैं, इसलिए इनकी सुनी भी जाती है। इसमें ग़लत कुछ नहीं। कोई भी कारोबार पैसे के बगैर नहीं चलता। पर सूचना के माध्यमों की अपनी कुछ ज़रूरतें भी होतीं हैं। उनकी सबसे बड़ी पूँजी उनकी साख है। यह साख ही पाठक पर प्रभाव डालती है। जब कोई पाठक या दर्शक अपने अखबार या चैनल पर भरोसा करने लगता है, तब वह उस वस्तु को खरीदने के बारे में सोचना शुरू करता है, जिसका विज्ञापन अखबार में होता है। विज्ञापन छापते वक्त भी अखबार ध्यान रखते हैं कि वह विज्ञापन जैसा लगे। सम्पादकीय विभाग विज्ञापन से अपनी दूरी रखते हैं। यह एक मान्य परम्परा है।
अखबार अपने मूल्यों पर टिकें तो उतने मज़ेदार नहीं होंगे, जितने होना चाहते हैं। जैसे ही वे समस्याओं की तह पर जाएंगे उनमें संज़ीदगी आएगी। दुर्भाग्य है कि हिन्दी पत्रकार की ट्रेनिंग में कमी थी, बेहतर छात्र इंजीनियरी और मैनेजमेंट वगैरह पढ़ने चले जाते हैं। ऊपर से अखबारों के संचालकों के मन में अपनी पूँजी के रिटर्न की फिक्र है। वे भी संज़ीदा मसलों को नहीं समझते। यों जैसे भी थे, अखबारों के परम्परागत मैनेजर कुछ बातों को समझते थे। उन्हें हटाने की होड़ लगी। अब के मैनेजर अलग-अलग उद्योगों से आ रहे हैं। उन्हें पत्रकारिता के मूल्यों-मर्यादाओं का ऐहसास नहीं है।
अखबार शायद न रहें, पर पत्रकारिता रहेगी। सूचना की ज़रूरत हमेशा होगी। सूचना चटपटी चाट नहीं है। यह बात पूरे समाज को समझनी चाहिए। इस सूचना के सहारे हमारी पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था खड़ी होती है। अक्सर वह स्वाद में बेमज़ा भी होती है। हमारे सामने चुनौती यह थी कि हम उसे सामान्य पाठक को समझाने लायक रोचक भी बनाते, पर वह हो नहीं सका। उसकी जगह कचरे का बॉम्बार्डमेंट शुरू हो गया। इसके अलावा एक तरह का पाखंड भी सामने आया है। हिन्दी के अखबार अपना प्रसार बढ़ाते वक्त दुनियाभर की बातें कहते हैं, पर अंदर अखबार बनाते वक्त कहते हैं, जो बिकेगा वहीं देंगे। चूंकि बिकने लायक सार्थक और दमदार चीज़ बनाने में मेहनत लगती है, समय लगता है। उसके लिए पर्याप्त अध्ययन की ज़रूरत भी होती है। वह हम करना नहीं चाहते। या कर नहीं पाते। चटनी बनाना आसान है। कम खर्च में स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन बनाना मुश्किल है। आज के समय में जब हर व्यक्ति अपनी जिन्दगी के रोजमर्रा कामो में बहुत ज्यादा व्यस्त हो चूका है उसके पास इतना समय तक नहीं हे के वह अख़बार के 16 से 22 पेज में से अपने जरुरत की जानकारिय और देश विदेश में हो रही हलचल की जानकारिय पा सके | इसे समय में इ-मीडिया बहुत अच्छा विकल्प बनकर उभरा है जहा पर पाठक अपनी जरुरत के हिसाब से किसी भी क्षेत्र को चुनकर उस क्षेत्र की जानकारी और खबर हासिल कर सकता है |
इ-मीडिया के क्षेत्र में “News Bunch ” एक बेहतर विकल्प बनकर उभरा है | आज के भागमभाग वाले दोर में न्यूज़ बंच अपने पाठको को SMS एवं सोशिअल नेटवर्किंग के द्वारा खबरों को सीधे पाठक तक पहुचने का काम कर रहा है|
पत्रकारिता अमर है बस उसे करने के लिए जोशीले कर्मठ युवाओ की जरुरत है वह समय के साथ-साथ अपना रूप बदलती रहेगी | कभी प्रिंट मीडिया कभी इलेक्ट्रोनिक मीडिया के रूप में| पत्रकारिता को करने के लिए पत्रकारों को चाहिए कि वह अपना काम पुरे जोश और लगन से करते रहे और पत्रकारिता को मजबूत बनाते रहे|
जय हिंद जय भारत
प्रतीक सिंह यादव
सम्पादकीय टिपण्णी:
लेखक प्रतीक सिंह यादव रतलाम में निवास रत हैं और न्यूज़ बंच समूह के सह-संपादक के रूप में अपना अमूल्य योगदान देते हैं..

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हिंदी पत्रकारिता दिवस के मौक़े पर पत्रकार और मीडिया कर्मी की परिभाषा तय हो
आज यानी 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस है। कम से कम आज के दिन ये बहस ज़रूर होनी चाहिए थी कि आज हिंदी पत्रकारिता किस मोड़ पर है। ज़रूरी नहीं कि इस विषय पर चर्चा के लिए सुनामधन्य पत्रकार अपने न्यूज़ चैनलों पर आदर्श पैकेजिंग ड्यूरेशन के तहत 90 सेकेंड की स्टोरी ही दिखाते या अधपके बालों वालों धुरंधरों को बुलाकर बौद्धिक जुगाली करते या फिर हिंदी पत्रकारिता की आड़ में अंग्रेज़ी पत्रकारिता को कम और पत्रकारों को ज़्यादो कोसते। टीवी वालों को क्या दोश दें । बौद्धिक संपदा पर जन्मजात स्वयंसिद्ध अधिकार रखनेवाले प्रिंट के पत्रकारों ने भी डीसी, टीसी तो छोड़िए , सिंगल कॉलम भी इस दिवस की नहीं समझा। कहीं कोई चर्चा नहीं कि क्या सोचकर पत्रकारिता की शुरूआत हुई थी और आज हम कर क्या रहे हैं।
ग्लोबलाइज़ेशन के इस दौर में गणेश शंकर विद्यार्थी, तकवी शकंर पिल्ले, राजेंद्र माथुर,सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय की ज़माने की पत्रकारिता की कल्पना करना मूर्खता होगी। लेकिन इतना तो ज़रूर सोचा जा सकता है कि हम जो कर रहे हैं , वो वाकई पत्रकारिता है क्या। सब जानते हैं कि भारत में देश की आज़ादी के लिए पत्रकारिता की शुरूआत हुई। पत्रकारिता तब भी हिंदी और अंग्रेज़ी के अलावा कई भाषाओं में होती थी। लेकिन भाषाओं के बीच में दीवार नहीं थी। वो मिशन की पत्रकारिता थी। आज प्रोफोशन की पत्रकारिता हो रही है। पहले हाथों से अख़बार लिखे जाते थे। लेकिन उसमें इतनी ताक़त ज़रूर होती थी कि गोरी चमड़ी भी काली पड़ जाती थी। आज आधुनिकता का दौर है। तकनीक की लड़ाई लड़ी जा रही है। फोर कलर से लेकर न जाने कितने कलर तक की प्रिटिंग मशीनें आ गई हैं। टीवी पत्रकारिता भी सेल्युलायड, लो बैंड, हाई बैंड और बीटा के रास्ते होते हुए इनपीएस, विज़आरटी, आक्टोपस जैसी तकनीक से हो रही है। लेकिन आज किसी की भी चमड़ी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। शायद चमड़ी मोटी हो गई है।
आख़िर क्यों अख़बारों और समाचार चैनलों से ख़बरों की संख्या कम होती जा रही है। इसका जवाब देने में ज़्यादातर कथित पत्रकार घबराते हैं। क्योंकि सत्तर –अस्सी के दशक से कलम घिसते –घिसते कलम के सिपाही संस्थान के सबसे बड़े पद पर बैठ तो गए लेकिन कलम धन्ना सेछ के यहां गिरवी रखनी पड़ी। कम उम्र का छोरा ब्रैंड मैनेजर बनकर आता है और संपादक प्रजाति के प्राणियों को ख़बरों की तमीज़ सिखाता है। ज़रूरी नहीं कि ब्रैंड मैनेजर पत्रकार हो या इससे वास्ता रखता हो। वो मैनेजमैंट पढ़कर आया हुआ नया खिलाड़ी होता है। हो सकता है कि इससे पहले वो किसी बड़ी कंपनी के जूते बेचता हो। तेल, शैंपू बेचता हो। वो ख़बर बेचने के धंधे में है। इसलिए उसके लिए ख़बर और अख़बार तेल , साबुन से ज़्यादा अहमियत नहीं रखते। वो सिखाता है कि किस ख़बर को किस तरह से प्ले अप करना है। सब बेबस होते हैं। क्योंकि सैलरी का सवाल है। ब्रैंड मैनेजर सेठ का नुमाइंदा होता है। उसे ख़बरों से नहीं, कमाई से मतलब होता है। अब कौन पत्रकार ख़्वामखाह भगत सिंह बनने जाए।
कुछ यही हाल टीवी चैनलों का भी है। ईमानदारी से किसी न्यूज़ चैनल में न्यूज़ देखने जाइए तो न्यूज़ के अलावा सब कुछ देखने को मिल जाएगा। कोई बता रहा होगा कि धोना का पहले डेढ़ फुट का था अब बारह इंच का हो गया है। ये क्या माज़रा है – समझने के लिए देखिए ..... बजे स्पेशल रिपोर्ट। कोई ख़बरों की आड़ में दो हीरोइनों को लेकर बैठ जाता है और दर्शकों को बताता है कि देखिए ये पब्लिसिटी के लिए लड़ रही हैं। ये लेस्बियन हैं। ये लड़ाई इस उम्मीद से दिखाई जाती है ताकि दर्शक मिल जाए और टीआरपी के दिन ग्राफ देकर लाला शाबाशी दे। कोई किसी ख़ान को लेकर घंटो आफिस में जम जाता है। सबको पता है कि उसकी फिल्म रिलीज़ होने वाली है। ये सब पब्लिसिटी का हिस्सा है। लेकिन वो अपने धुरंधरों के साथ जन सरोकार वाले पवित्र पत्रकारिता की मिशन में लगा होता है।
इसमें कोई शक़ नहीं कि हिंदी पत्रकारिता समृद्ध हुई है। इसकी ताक़त का दुनिया ने लोहा माना है। अंग्रेज़ी के पत्रकार भी थक हार कर हिंदी के मैदान में कूद गए। भले ही उनके लिए हिंदी पत्रकारिता ठीक वैसे ही हो, जैसा कहावत है- खाए के भतार के और गाए के यार के। लेकिन ये हिंदी की ताक़त है। लेकिन इस ताक़त की गुमान में हमने सोचने समझने की शक्ति को खो दिया। एक साथ, एक ही समय पर अलग अलग चैनलों पर कोई भी हस्ती लाइव दिख सकता है। धरती ख़त्म होनेवाली है- ये डरानेवाली लाल- लाल पट्टी कभी भी आ सकती है।
ये सच है कि एक दौर था जब अंग्रेजी की ताक़त के सामने हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की मानी जाती थी। मूर्धन्य लोग पराक्रमी अंदाज़ में ये दावा करते थे- आई डोंट नो क , ख ग आफ हिंदी बट आई एम एडिटर आफ..... मैगज़िन। लेकिन तब के हिंदी के पत्रकार डरते नहीं थे। डटकर खड़े होते थे और ताल ठोककर कहते थे- आई फील प्राउड दैट आई रिप्रजेंट द क्लास आफ कुलीज़ , नॉट द बाबूज़। आई एम ए हिंदी जर्नलिस्ट। व्हाट वी राइट, द पीपुल आफ इंडिया रीड एंड रूलर्स कंपेल्स टू रीड आवर न्यूज़। आज इस तरह के दावे करनेवाले पत्रकारों के चेहरे नहीं दिखते। लालाओं को अप्वाइनमेंट लेकर आने को कहनेवाले संपादक नहीं दिखते। नेताओं को ठेंगे पर रखनेवाले पत्रकार नहीं मिलते। कलम को धार देनेवाले पत्रकार नहीं मिलते । आज बड़ी आसानी से मिल जाते हैं न्यूज़रूम में राजनीति करते कई पत्रकार। मिल जाते हैं उद्योगपतियों के दलाली माफ कीजिएगा संभ्रात शब्दों में लाइजिंनिंग करनेवाले पत्रकार। नेताओं के पीआर करते पत्रकार। चुनाव में टिकट मांगनेवाले पत्रकार। ख़बर खोजनेवाले पत्रकारों को खोजना आज उतना ही मुश्किल है, जितना कि जीते जी ईश्वर से मिल पाना। इसलिए आज 30 मई के दिन हिंदी पत्रकारिता के मौक़े पर ऐसे पत्रकारों को नमन करें , जिन्होने हिंदी को इतनी ताक़त दी कि आज हम अपनी दुकान चला पा रहे हैं। बेशक़ इसके लिए हमें रोज़ी रोटी और पापी पेट की दुहाई देनी पड़ी। लेकिन आज भी शायद हिंदी पत्रकारिता को बचाए रखने का रास्ता बचा हुआ है। खांटी पत्रकारिता करनेवालों को हम आदर सहित हिंदी पत्रकार कहें और दूसरे लंद फंद में लगे सज्जनों को मीडियाकर्मी कहकर पहचानें और पुकारें।

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Sunday, May 30, 2010
हिन्दी पत्रकारिता दिवस



आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस है। 184 साल हो गए। मुझे लगता है कि हिन्दी पत्रकार में अपने कर्म के प्रति जोश कम है। तमाम बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत है। उदंत मार्तंड इसलिए बंद हुआ कि उसे चलाने लायक पैसे पं जुगल किशोर शुक्ल के पास नहीं थे। आज बहुत से लोग पैसा लगा रहे हैं। यह बड़ा कारोबार बन गया है। जो हिन्दी का क ख ग नहीं जानते वे हिन्दी में आ रहे हैं, पर मुझे लगता है कि कुछ खो गया है। क्या मैं गलत सोचता हूँ?


पिछले 184 साल में काफी चीजें बदलीं हैं। हिन्दी अखबारों के कारोबार में काफी तेज़ी आई है। साक्षरता बढ़ी है। पंचायत स्तर पर राजनैतिक चेतना बढ़ी है। साक्षरता बढ़ी है। इसके साथ-साथ विज्ञापन बढ़े हैं। हिन्दी के पाठक अपने अखबारों को पूरा समर्थन देते हैं। महंगा, कम पन्ने वाला और खराब कागज़ वाला अखबार भी वे खरीदते हैं। अंग्रेज़ी अखबार बेहतर कागज़ पर ज़्यादा पन्ने वाला और कम दाम का होता है। यह उसके कारोबारी मॉडल के कारण है। आज कोई हिन्दी में 48 पेज का अखबार एक रुपए में निकाले तो दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया का बाज़ा भी बज जाए, पर ऐसा नहीं होगा। इसकी वज़ह है मीडिया प्लानर।

कौन हैं ये मीडिया प्लानर? ये लोग माडिया में विज्ञापन का काम करते हैं, पर विज्ञापन देने के अलावा ये लोग मीडिया के कंटेंट को बदलने की सलाह भी देते हैं। चूंकि पैसे का इंतज़ाम ये लोग करते हैं, इसलिए इनकी सुनी भी जाती है। इसमें ग़लत कुछ नहीं। कोई भी कारोबार पैसे के बगैर नहीं चलता। पर सूचना के माध्यमों की अपनी कुछ ज़रूरतें भी होतीं हैं। उनकी सबसे बड़ी पूँजी उनकी साख है। यह साख ही पाठक पर प्रभाव डालती है। जब कोई पाठक या दर्शक अपने अखबार या चैनल पर भरोसा करने लगता है, तब वह उस वस्तु को खरीदने के बारे में सोचना शुरू करता है, जिसका विज्ञापन अखबार में होता है। विज्ञापन छापते वक्त भी अखबार ध्यान रखते हैं कि वह विज्ञापन जैसा लगे। सम्पादकीय विभाग विज्ञापन से अपनी दूरी रखते हैं। यह एक मान्य परम्परा है।


मार्केटिंग के महारथी अंग्रेज़ीदां भी हैं। वे अंग्रेज़ी अखबारों को बेहतर कारोबार देते हैं। इस वजह से अंग्रेज़ी के अखबार सामग्री संकलन पर ज्यादा पैसा खर्च कर सकते हैं। यह भी एक वात्याचक्र है। चूंकि अंग्रेजी का कारोबार भारतीय भाषाओं के कारोबार के दुगने से भी ज्यादा है, इसलिए उसे बैठने से रोकना भी है। हिन्दी के अखबार दुबले इसलिए नहीं हैं कि बाज़ार नहीं चाहता। ये महारथी एक मौके पर बाज़ार का बाजा बजाते हैं और दूसरे मौके पर मोनोपली यानी इज़ारेदारी बनाए रखने वाली हरकतें भी करते हैं। खुले बाज़ार का गाना गाते हैं और जब पत्रकार एक अखबार छोड़कर दूसरी जगह जाने लगे तो एंटी पोचिंग समझौते करने लगते हैं।

पिछले कुछ समय से अखबार इस मर्यादा रेखा की अनदेखी कर रहे हैं। टीवी के पास तो अपने मर्यादा मूल्य हैं ही नहीं। वे उन्हें बना भी नहीं रहे हैं। मीडिया को निष्पक्षता, निर्भीकता, वस्तुनिष्ठता और सत्यनिष्ठा जैसे कुछ मूल्यों से खुद को बाँधना चाहिए। ऐसा करने पर वह सनसनीखेज नहीं होता, दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में नहीं झाँकेगा और तथ्यों को तोड़े-मरोड़ेगा नहीं। यह एक लम्बी सूची है। एकबार इस मर्यादा रेखा की अनदेखी होते ही हम दूसरी और गलतियाँ करने लगते हैं। हम उन विषयों को भूल जाते हैं जो हमारे दायरे में हैं।

मार्केटिंग का सिद्धांत है कि छा जाओ और किसी चीज़ को इस तरह पेश करो कि व्यक्ति ललचा जाए। ललचाना, लुभाना, सपने दिखाना मार्केटिंग का मंत्र है। जो नही है उसका सपना दिखाना। पत्रकारिता का मंत्र है, कोई कुछ छिपा रहा है तो उसे सामने लाना। यह मंत्र विज्ञापन के मंत्र के विपरीत है। विज्ञापन का मंत्र है, झूठ बात को सच बनाना। पत्रकारिता का लक्ष्य है सच को सामने लाना। इस दौर में सच पर झूठ हावी है। इसीलिए विज्ञापन लिखने वाले को खबर लिखने वाले से बेहतर पैसा मिलता है। उसकी बात ज्यादा सुनी जाती है। और बेहतर प्रतिभावान उसी दिशा में जाते हैं। आखिर उन्हे जीविका चलानी है।
अखबार अपने मूल्यों पर टिकें तो उतने मज़ेदार नहीं होंगे, जितने होना चाहते हैं। जैसे ही वे समस्याओं की तह पर जाएंगे उनमें संज़ीदगी आएगी। दुर्भाग्य है कि हिन्दी पत्रकार की ट्रेनिंग में कमी थी, बेहतर छात्र इंजीनियरी और मैनेजमेंट वगैरह पढ़ने चले जाते हैं। ऊपर से अखबारों के संचालकों के मन में अपनी पूँजी के रिटर्न की फिक्र है। वे भी संज़ीदा मसलों को नहीं समझते। यों जैसे भी थे, अखबारों के परम्परागत मैनेजर कुछ बातों को समझते थे। उन्हें हटाने की होड़ लगी। अब के मैनेजर अलग-अलग उद्योगों से आ रहे हैं। उन्हें पत्रकारिता के मूल्यों-मर्यादाओं का ऐहसास नहीं है।
अखबार शायद न रहें, पर पत्रकारिता रहेगी। सूचना की ज़रूरत हमेशा होगी। सूचना चटपटी चाट नहीं है। यह बात पूरे समाज को समझनी चाहिए। इस सूचना के सहारे हमारी पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था खड़ी होती है। अक्सर वह स्वाद में बेमज़ा भी होती है। हमारे सामने चुनौती यह थी कि हम उसे सामान्य पाठक को समझाने लायक रोचक भी बनाते, पर वह हो नहीं सका। उसकी जगह कचरे का बॉम्बार्डमेंट शुरू हो गया। इसके अलावा एक तरह का पाखंड भी सामने आया है। हिन्दी के अखबार अपना प्रसार बढ़ाते वक्त दुनियाभर की बातें कहते हैं, पर अंदर अखबार बनाते वक्त कहते हैं, जो बिकेगा वहीं देंगे। चूंकि बिकने लायक सार्थक और दमदार चीज़ बनाने में मेहनत लगती है, समय लगता है। उसके लिए पर्याप्त अध्ययन की ज़रूरत भी होती है। वह हम करना नहीं चाहते। या कर नहीं पाते। चटनी बनाना आसान है। कम खर्च में स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन बनाना मुश्किल है।
चटपटी चीज़ें पेट खराब करतीं हैं। इसे हम समझते हैं, पर खाते वक्त भूल जाते हैं। हमारे मीडिया मे विस्फोट हो रहा है। उसपर ज़िम्मेदारी भारी है, पर वह इसपर ध्यान नहीं दे रहा। मैं वर्तमान के प्रति नकारात्मक नहीं सोचता और न वर्तमान पीढ़ी से मुझे शिकायत है, पर कुछ ज़रूरी बातों की अनदेखी से निराशा है।
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पत्रकारिता के मानदंड
रामदत्त त्रिपाठी |
रविवार, 30 मई 2010,

अभी दो दिन पहले कानपुर गया था, आईआईटी प्रवेश परीक्षा में सफल एक ग़रीब मोची के बेटे से साक्षात्कार करने. लेकिन वहाँ मुझे एक और सच्चाई से साक्षात्कार करना पड़ा.
अपना काम खत्म करके चलने लगा तो एक सज्जन सकुचाते हुए आए अपनी समस्या बताने.
वो कोई डिप्लोमा होल्डर डॉक्टर हैं और उसी ग़रीब बस्ती में प्रैक्टिस करते हैं. मोहल्ले के लोग उनकी बड़ा आदर करते हैं.
उनकी समस्या ये है कि किसी लोकल चैनल के एक पत्रकार आए. उनकी क्लीनिक की तस्वीरें उतारीं, फिर डराया कि वो झोलाछाप डाक्टर हैं और अगर उनसे लेन देन करके मामले में कुछ समझौता नहीं कर लेते तो वह अफसरों से कहकर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करा देंगे.
पत्रकारों के इस तरह के ब्लैकमेलिंग के किस्से काफ़ी दिनों से सुनाई दे रहे हैं. लेकिन दूसरों के मुंह से. पहली बार किसी भुक्तभोगी के मुंह से यह बात सीधे सुनने को मिली.
रविवार को हिंदी पत्रकारिता दिवस है और इस मौक़े पर यही किस्सा मेरे दिमाग में गूंज रहा है. लोग पत्रकार क्यों बनते हैं. जन सेवा के लिए या फिर जैसे- तैसे पैसा कमाने के लिए.
यह बात केवल लोकल चैनल के पत्रकारों पर लागू नहीं होती. कई बड़े बड़े चैनलों और अख़बारों के पत्रकारों, संपादकों और मालिकों के बारे में भी यही बातें सुनने को मिलती हैं.
कई अखबार और चैनल रिपोर्टर बनाने के लिए अग्रिम पैसा लेते हैं.
अनेक अपने संवाददाताओं से नियमित रूप से विज्ञापन एजेंट का काम करवाते हैं, जो बिजनेस बढ़ाने के लिए ख़बरों के माध्यम से दबाव बनाते हैं. फिर कई चैनल और अख़बार बाकायदा पेड न्यूज़ छापते या दिखाते हैं.
प्रेस काउन्सिल है मगर वह भी कुछ कर नही सकती.
हिंदी पत्रकारिता दिवस पर जब हम लोग गोष्ठियों में गणेश शंकर विद्यार्थी और पराडकर जी का गुणगान करेंगे, शायद हमें सामूहिक रूप से इस समस्या पर भी आत्मचिंतन करना चाहिए.
माना कि पत्रकारिता अब मिशन नहीं, यह एक प्रोफेशन और बिजनेस है. मगर क्या हर प्रोफेशन और बिजनेस का कोई एथिक्स नही होता?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
 Ankit :
पहले तो मैं आपको बधाई दूंगा कि आपने पत्रकारिता के इस विषय को उठाने की हिम्मत की. आप सही कह रहे हैं कि आज का भारतीय मीडिया अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा है. मीडिया के काफी बड़े हिस्से ने सरकार से हाथ मिला लिया है और एक ने उससे भी आगे बढ़कर अपने व्यावसायिक हितों के लिए समानांतर सरकार चलाने जैसी कोशिश भी की है.



 Surjeet Rajput Dubai :
रामदत्त जी, मैं आपकी बात से सहमत हूं. पत्रकारिता एक व्यवसाय का रूप ले चुकी है. इस समय भारत में देशभक्ति से पूर्ण पत्रकारिता की जरूरत है जो आजादी से पहले हुआ करती थी. आज सस्ती टीआरपी की होड़ लगी है. एक बार भारत ने अग्नि मिसाइल का सफल प्रक्षेपण किया, यह महत्वपूर्ण समाचार भारतीय समाचार पत्रों और टीवी में बड़ी खबर बनकर नहीं आई लेकिन दूसरे देशों के समाचार पत्रों में इस खबर को कहीं अधिक प्राथमिकता दी.


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 Prem Verma:
आज पत्रकारिता दिवस पर बीबीसी हिंदी की पूरी टीम और आपको ढेर सारी बधाइयां. इस दिवस के परिप्रेक्ष्य में आपकी ओर से उठाया गया मसला काफी ज्वलंत है. समाज में व्याप्त बुराइयां इस पवित्र पेशे को भी दागदार बना चुकी हैं. जब दर्पण ही दागदार हो गया तो वह भला कैसे बता सकेगा समाज की सच्ची तस्वीर. सुंदर ब्लॉग के लिए साधुवाद.

 Navinchandra Daund:

भद्र लोगों के पेशे पत्रकारिता में आज के समय दिखाई देने वाला ट्रेंड काफी निराशाजनक है. पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है. जब न्यायपालिका को छोड़कर लोकतंत्र के बाकी स्तंभ भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की समस्याओं से जूझ रहे हैं, तो ऐसे समय पत्रकारिता की सामाजिक जिम्मेदारी कहीं अधिक बढ़ जाती है. अब तो समाचारों की विश्वसनीयता पर भी संदेह होने लगा है. पत्रकारों का यह दायित्व है कि वे लोगों को सही खबरों से अवगत कराएं और उनमें लोकतंत्र की आस्था को मजबूत करें.
विजय शर्मा:
आपने एक बहुत ही गंभीर समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है. एक ईमानदार मीडिया लोकतंत्र की सफलता के लिए बहुत जरूरी है. परंतु आजकल ज्यादातर चैनल खबर में मसाला लगाकर सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को बेच देते हैं. एक गलत और झूठी खबर से तो खबर का न होना ज्य़ादा अच्छा है.

brajkiduniya:
रामदत्तजी ग्रास रूट लेवल से लेकर ऊपर तक हिंदी पत्रकारों का यही हाल है. बिहार में पत्रकारिता करते हुए मैंने इसे महसूस भी किया है. जब अख़बारों के मालिक ही राजनीतिक दलों से डील कर पैसे लेकर उनके पक्ष में समाचार छापते हैं तब फिर मातहत अधिकारी और कर्मी भी तो यही करेंगे. गंगा गंगोत्री से ही मैली हो रही है. सफाई की शुरुआत भी वहीं से करनी होगी लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा ?

IBRAHIM KUMBHAR PAKISTAN:

रामदत्त जी आपने आज जिस मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिखा है वो कम से कम मेरे लिए इस वजह से है कि इस मामले पर कोई लिखने को तैयार ही नहीं. आपकी बात दो अलग अलग मुद्दों पर है-एक वो डाक्टर हैं जिनके पास सही डिग्री नहीं होती. वो या तो डिप्लोमा होते हैं या टेक्नीशियन होते हैं जो शहरों या गावों में अस्पताल खोल कर बैठ जाते हैं. आपने यह उल्लेख नहीं किया है कि ये नान प्रोफेशनल डॉक्टर किस तरह तबाही करते हैं. मैं अपने देश पाकिस्तान की बात करुंगा जहां सरकारी आंकड़ों के मुताबिक नान प्रोफेशनल डाक्टर प्रोफेशनल डॉक्टरों से ज्यादा हैं. पाकिस्तान में तो ये मुसीबत है और भारत में भी यकीनन होगी कि किसी डाक्टर से एक दो सप्ताह काम सीखा और बस अपनी क्लीनिक खोलकर कारोबार शुरू. स्वास्थ्य विभाग का कोई अधिकारी देख ले या पूछ ले तो इसका हफ़्ता बांध लो बस. मैं मानता हूँ कि आपका मुद्दा उन अनपढ़ डॉक्टरों के हवाले से नहीं है लेकिन आपको इस मामले की ओर भी ध्यान देना चाहिए. जहां तक बात है उन ब्लैकमेल करने वाले पत्रकारों की तो ऐसे लोगों को सज़ा मिलनी चाहिए. आपने सही कहा है कि यहां खाली पत्रकार ही नहीं, बड़े संस्थाओं और समूहों के मालिक इस काम से जुड़े हुए हैं. आपने सही सवाल उठाया है कि लोग पत्रकार क्यों बनते हैं-जन सेवा के लिए या फिर जैसे- तैसे पैसा कमाने के लिए. माना अब पत्रकारिता अब मिशन नहीं रहा, लेकिन इसको मिशन बनाया जा सकता है. आपने जो सच लिखा है ये भी किसी मिशन से कम नहीं और आप जैसे लोग इन ब्लैकमेलरों के खिलाफ़ आवाज़ उठाते रहें, हम आपके साथ हैं.

 नीरज वशिष्ठख, नयी दिल्लीभ :

हर व्य वसाय का अपना एथिक्स होता है और होना भी चाहिए, मगर इसके बावजूद इन एथिक्स से छेड़छाड़ और अपने स्वासर्थ के लिए एक रास्ताा बनाना मानवीय स्व भाव है, जो काफी चिंताजनक है. यह स्वोभाव ही समाज को दुखों और अवसाद की ओर ले जाता है. और यह पत्रकारिता जैसे व्येवसयाय के साथ ही नहीं हो रहा है बल्‍िक हर व्यैवसाय आज इस कुचक्र से घिरा है. दरअसल, कोई व्यनवसाय अच्छाी या बुरा नहीं होता है, यह तो व्यइवसायी पर निर्भर करता है कि उसका चरित्र कैसा है. डॉक्टारी का पेशा कितना मानवीय है और भगवान जैसा दर्जा है उसको, मगर कोई डाक्टवर जब किडनी बेचता है या पैसों के अभाव में किसी को मरने छोड़ देता है तो. इसलिए पत्रकारिता ही नहीं, कई व्योवसाय इस रोग से ग्रस्तर हैं. मैं समझता हूं जब मानव अपना स्वीभाव, चरित्र नहीं बदलेगा तब तक समाज में इस प्रकार दुख कायम रहेंगे. मनुष्यह जब अपना उत्तगरदायित्व समझता है तो वह मनुष्यतता के पराकाष्ठाव पर होता है और यही होना उसका स्व‍भाव है. हमें अपना स्व्भाव पहचानना चाहिए. यही जीवन का सही मापदंड हो सकता है.
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• 10. 21:55 IST, 30 मई 2010 अमित कुमार यादव:
पत्रकारिता अब प्रोफ़ेशन भी नहीं रहा अब ये फ़ैशन बन गया है....हर कोई ग्लैमर और चमक-दमक से आकर्षित होकर मुंह उठाकर इधर चला आता है....ऐसे में नैतिकता की बात करना ही बेमानी लगता है....
 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:
वाह रामदत्त जी मैं आपको सलाम करता हूं सच्चाई को खुल कर लिखने पर. हक़ीक़त ये है कि ये पेशा लोगों को ब्लैकमेल करने का नंबर-1 पेशा बना हुआ है. रहा सवाल पत्रकारिता में ईमानदारी या ग़रीबों की मदद करने का तो आप राजस्थान के बीकानेर ज़िले के सूई गांव में जाकर देखें कि दो पत्रकारों लूना राम और नारायण बारेठ ने एक ग़रीब की मदद कर किस प्रकार उसकी ज़िंदगी में बहार पैदा कर दिया है. इसलिए ये कहना कि सब बेईमान हैं उससे मैं सहमत नहीं हूं. लेकिन 90 प्रतिशत पत्रकार अपने पेशे के प्रति ईमानदार नहीं हैं.
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• 12. 07:38 IST, 31 मई 2010 Bibhu Bhusal:
आपका लेख दमदार हैं. मगर मिडिया मालिक पत्रकारों का बहुत शोषण करते हैं. मुलतः ये समस्या ग़रिब मुल्क के पत्रकारों को झेलनी पड़ रही है. बढ़ती महँगाई एवं बंधा वेतन और जब अनिश्चित्ता मुख्य समस्याएँ है तो वे क्यों ऐसा न करें. और भी कई समस्याएँ हैं पत्रकारिता में...
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• 13. 11:55 IST, 31 मई 2010 dinesh prajapati:
बात बहुत पते की है. लेकिन सामने कौन आ रहा है. इस प्रकार की प्रतिक्रिया करने वालों को लोग तवज्जो भी देते हैं. लेकिन जो ईमानदारी से काम कर रहा है उसका कहीं सहयोग किया क्या. यह भी सही है कि ऐसे लोग बेमतलब में शिकार बन रहे हैं और बेईमान पर हाथ डालने की हिम्मत पत्रकारों में नहीं है.
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0 jigyasa:
मैं आपसे 100 प्रतिशत सहमत हूँ. मैं भी एक मीडिया संस्थान से जुड़ी रही हूँ. दोस्ती के लिए यहां सबकुछ चलता है चाहे उस दोस्त ने कितना ही बड़ा कारनामा क्यों न कर रखा हो. लेकिन दूसरों के लिए नियम एकदम अलग थे उनके चेहरे परसे नक़ाब हटाने का दबाव हमारे बॉस हम पर हर दम बनाए रखते. लेकिन अब उनकी कथनी और करनी का अंतर मालूम हो चुका है. हमें पत्रकारिता में सच्चाई के लिए लड़ना सिखाया गया था और मेरा भी वही उद्देश्य था और इसीलिए मैं मीडिया से जुड़ी भी थी लेकिन आज उससे बहुत दूर जा चुकी हूं क्योंकि उसकी सच्चाई वो नहीं थी वो तो सिर्फ़ एक परछाई थी जिसे मैं पकड़ने की कोशिश कर रही थी.
 ranjeet gupta:
सर, आपने जो कानपुर में सुना है, वह बिलकुल सत्य है क्योंकि मैं पिछले महीने अपनी इंटर्नशिप कर रहा था, उस समय, मैं जब भी दिल्ली सरकार के सचिवालय जाता था तो वहां नामी गिरामी चैनलों के रिपोर्टर ख़बर पर कम दिल्ली सचिवालय के अधिकारीयों को ढूंढ़ कर उनसे अपने निजी काम करवाने को ज़्यादा प्रयासरत रहते थे.
दूसरी घटना अपने गृहनगर टुंडला की बता रहा हूँ , ये दिल्ली हावड़ा रूट पर है, मेरे यहाँ एक निजी केबल आपरेटर ने अपना सिटी न्यूज़ चैनल डाला है उन्होंने जो सिटी रिपोर्टर बनाए हैं, उनकी हालत जब मैंने सुनी तो मैं सुनकर दंग रह गया. ये लोग थाने में जाकर पुलिस वालों से 100 - 100 रुपए वसूल करते हैं, और यदि कोई ना करे तो उन्हें ब्लैक मेल करते हैं ........सर अब तक पुलिस के बारे में तो सुनता था, लेकिन पुलिस वालों को ब्लैक मेल किया जाने लगा है. इस पेशे में ये सोच कर आया था कि इमानदारी का इकलौता पेशा यही बचा है जिसके माध्यम से देश और समाज की सेवा कर सकता हूँ लेकिन क़रीब आने पर पता चला कि यहाँ भी सफ़ाई की ज़रूरत है. स्वतंत्रता जैसे शब्द के मायने भी इस पेशे से ख़त्म हो गए हैं. बड़ी मछली छोटी मछली को निगलने के लिए तैयार बठी है, शायद इसी कारण पत्रकारिता सिर्फ़ शब्द बनकर रह गया है.
RANDHIR KUMAR JHA:
आजकल जिस प्रकार के समाचार हमें देखने या सुनने को मिलते हैं उसमें लगभग 80 प्रतिशत तो मसालेदार होते हैं और जो 20 प्रतिशत महत्वपूर्ण होते हैं उसमें भी 60 प्रतिशत से भी ज़्यादा मिलावट होती है या सामाचार का झुकाव उस ओर होता है जिस ओर से समाचार चैनलों का फ़ायदा हो या वह उस समाचार के ज़रिए अपनी रंजिश निकाल सकते हों. इसलिए वर्तमान समाचार में एक साधारण नागरिक को किसी भी समाचार को देख या पढ़ कर बिना विचारे उसपर विश्वास करना बेवक़ूफ़ी है. मीडिया या पत्रकारिता आज भारत में व्याप्त भ्रष्ट क्षेत्रों में से एक है.

 Syyed Faizan Ali:

सही बात तो ये है कि हम आजकी पत्रकारिता को किसी प्रोफ़ेशन और बिज़नेस से भी नहीं मिला सकते. क्यूँकि किसी प्रोफ़ेशन और बिज़नेस में भी किसी को डरा धमकाकर पैसा नहीं कमाया जाता बल्कि अपनी सुविधाएं या ज़रूरत की चीज़ें बेचकर कमाया जाता है. लेकिन पत्रकारिता एक बेहद ग़लत दिशा में बढ़ रही है. मेरी राय में इसको रोकने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक शिकायत सेन्टर स्थापित करना चाहिए जिससे इस तरीक़े की असामाजिक चीज़ों को रोका जा सके.
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• 18. 19:14 IST, 31 मई 2010 Anubhav:
आपका लेख पढ़कर, मुझे 'जाने भी दो यारों' के ख़बरदार अख़बार की संपादक शोभा की याद आ गई.

नवीन जोशी:

राम दत्त जी, शुक्रिया कि आपने यह बात उठाई. हम लोग सचमुच इस गिरावट से चिंतिंत हैं. समाज में पत्रकार का सम्मान ख़त्म होता जा रहा है. कुछ लोग धंधा करने के लिए पत्रकार का चोला ओढ़ लेते हैं तो कई पत्रकार धीरे-धीरे यह धंधा अपना लेते हैं. इसे बढ़ावा देने में संस्थानों का भी कम हाथ नहीं.

Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

आपने बिल्कुल सही लिखा. पत्रकारिता भ्रष्ट हो चुकी है. सच्चाई कम और नाटक ज़्यादा किया जाता है. सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए कि न्यूज़ चैनल पर ड्रामा न दिखाया जाए. अब तो सरकार को पत्रकारों को मिलने वाली सरकारी सुविधा वापस ले लेनी चाहिए जिससे इन्हें सबक़ मिले.

santosh kumar pandey: क्या आप इसको ब्लॉग के माध्यम से लिख देने से ही समस्या का समाधान समझते हैं. अगर हां तो ठीक है... लेकिन इसको मुहिम के रूप में चलाने की ज़रूरत है.
sushil gangwar: ---कल का चोर आज का पत्रकार ---
ये बात क़रीब 15 साल पूरी नहीं है, हमारे गांव में छिदु नामक एक आदमी था वह अक्सर घर आता जाता था. हमारी माँ को दीदी कह कर पुकारता हम भी मामा कहने से नहीं चूकते थे एक दिन गांव में पुलिस आई तो जानकारी मिली ,छिदु मामा को पुलिस ने चोरी इल्ज़ाम में पकड़ लिया है. एक दिन छिदु मामा से हमारी मुलाक़ात हो गई. मामा बोले कि आजकल क्या कर रहे हो भांजे , मैंने भी कह दिया मामा मैं डेल्ही में पत्रकार हूँ. मामा बोले अरे फिर तो हम दोनों की ख़ूब जमेगी. मैंने पूछा वो कैसे... अरे हम भी पत्रकार हैं - मुझे याद है कि छिदु मामा तो काला अक्षर भैंस बराबर हैं. फिर फटाक से जेब से डेल्ही के समाचार पत्र का आईकार्ड दिखाया. फिर बोले भांजे मैं crime रिपोर्टर हूँ. मैंने पूछा ये कैसे बनवाया. अरे यार मैंने 500 /- रूपये में डेल्ही से मंगवाया है ख़ूब नोट छाप रहा हूँ. मैं उनकी बातें सुन कर हैरान कम परेशान ज़्यादा था....

shashi kumar:
लोकतंत्र का चौथा खंभा बुरी तरह हिल रहा है. जनता को वही ख़बरें मिल रही हैं जिससे चैनल या अख़बारों को फ़ायदा हो.अपने फ़ायदे और पैसे के लिए वे किसी भी विज्ञापन को ख़बर बनाकर पेश कर रहे हैं. सबसे शर्म की बात यह है कि वे पैसे की लालच में वे राय भी दे रहे हैं. मीडिया का काम केवल जनता तक ख़बरें पहुँचाना है, राय देना नहीं. इस संवेदनशील मुद्दे को उठाने के लिए रामदत्त जी को धन्यवाद.
 yaswant:
 आनन्दे राय- दैनिक जागरण लखनऊ :
आपने बहुत सही मुद्दा उठाया है। पर यह गंभीर मसला देश व्यादपी है। बड़े बड़े चैनल भी तो स्टिंग आपरेशन के नाम पर यह गोरखधंधा कर रहे हैं। सचमुच इस पर विमर्श होना चाहिये और सामूहिक जवाबदेही तय होनी चाहिये।

पवन कुमार अरविंद:

आपने बहुत जोरदार विषय उठाया है, इसके लिए आपको धन्यवाद.
लेकिन केवल विषय उठाने से क्या होगा, आज करने की ज्यादा जरूरत है, कहने की कम.
यदि प्रेस परिषद कुछ नहीं कर पाती तो इसके जिम्मेदार हम खुद ही हैं.

 अक्षय कुमार झा: मेरा मानना है कि ये सारा खेल आज से नहीं बल्कि कई दशकों से चला आ रहा है... और जब-तक मीडिया में इंट्री का कोई मापदंड नहीं होता है यही होगा. जिनको क,ख लिखने जिनको नहीं आता है, वो जब शीर्ष पर बैठता है तो शायद ऐसा ही होता है.
 mansi: यह भी देखना चाहिए कि पत्रकार किस हालत में हैं? खुद मीडिया हाउस भी इन्हें ग्लैमर का लालच दिखाकर पैसे ऐंठते हैं. बाद में इंटर्न बनाकर इनका शोषण करते हैं. खबरों के लिए कितनी मसक्कत करनी पड़ती है और फिर हाथ में मुट्ठी भर पैसे. मेरे साथ तो कम से कम यही बीती है और अपने आस-पास यही देखा है.

vipul rege:
बड़ी-बड़ी बातें करने वाले इन बुद्धिजीवियों से मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या उन्हें पता है कि छोटे शहरों में काम करने वाले पत्रकारों को वेतन कितना मिलता है? अपनी जिंदगी पत्रकारिता को समर्पित करने वाले ये पत्रकार अगर ईमानदारी से काम करें तो उनके बीवी-बच्चे भूखे मर जाएँगे. त्रिपाठी जी का पेट भरा हुआ है तो वे बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं. क्या आपको पता है कि केबिन में बैठकर एसी की हवा खाने वाले संपादक की तनख़्वाह एक लाख रुपए तक होती है, वहीं एक रिपोर्टर का वेतन सात हज़ार रुपए से अधिक नहीं होता है. वह भी ईमानदार हो सकता है, अगर उसपर ध्यान दिया जाए. कोई भी अपना घर फूंककर तमाशा नहीं देखता है. इसलिए रामदत्त जी अपने श्रीवचन अपने पास रखें.

जमीन बदल गयी तो मायने बदल गये। मायने बदले तो चेहरा बदल गया, रहन-सहन और जीवन की शर्तें बदल गयीं। वैश्विक अर्थशास्त्र की इस बाढ के चलते खासा बदलाव आ गया है समाज में। तो फिर कैसा पत्रकार और कैसा पत्रकारिता दिवस। मौजूदा हालातों में तो यह सवाल ही बेमानी हो जाते हैं। अब तो एड्स डे है, वेलंटाइन डे है, वगैरह-वगैरह।


इंतजार कीजिए, अभी तो और ना जाने कितने नये नये डे और यह नये आगंतुक डे, हमारे अतीत के सारे दिवसों को सुरसा की तरह निगलते दिखेंगे। नामोनिशान मिट जाएगा इन दिवसों का।
मुझे याद है 26 साल पहले का वह दौर, जब मेरे पिता स्व र्गीय सियाराम शरण त्रिपाठी जी, पत्रकारिता दिवस और मजदूर दिवस जैसे अवसरों पर बेहद मसरूफ हो जाया करते थे। हफ्तों तैयारियां चलती थीं। नौकरी से अवकाश लेकर वे हर जिलों-कस्बों के पत्रकारों को एकजुट किया करते थे। वे लखनऊ में तब के सर्वाधिक शक्तिशाली अखबार स्व,तंत्र भारत में मुख्यल उप संपादक थे। उनमें एक दर्शन था, जुझारूपन था, जिसके चलते यूपी के ज्यारदातर जिलों में उन्होंमने पत्रकारों का संगठन खडा किया। अब है किसी में वह जज्बा । न पत्रकारों में रहा और न ही पत्रकारों की एकता की बात करने वाले संगठनों में। यह तो होना ही था। तब पत्रकार अपनी कलम से पहचाना जाता था, अब पत्रकार क्याा, संपादक तक इस बात के लिए अपनी तनख्वा हें मोटी करवाते घूमते हैं, कि उनकी पहंच फलां नौकरशाह या मंत्री तक है और वे जब चाहेंगे, मालिक का कोई भी काम सेकेंडों में करा देंगे। मालिक भी खुश पत्रकार भी खुश। दसियों लाख रूपये की मोटी तनख्यागव पाने वालों से आप क्याभ उम्मीमद करते हैं कि उनमें जनपक्षधरता आ जाए, या वे पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए खुद को बलि चढा दें।

अरे अब तो वह दौर आ चुका है कि पैसे के लिए वे अपने ही किसी साथी की बलि बहुत ही संयत भाव से चढा सकते हैं। तो विदा कीजिए हिंदी पत्रकारिता दिवस को। श्रद्धांजलियां दीजिए। और जुट जाइये इस दिवस को मर्सिया पढने के लिए। आमीन।

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