गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

हिन्दी पत्रकारिता दिवस



Sunday, May 30, 2010



 आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस है। 184 साल हो गए। मुझे लगता है कि हिन्दी पत्रकार में अपने कर्म के प्रति जोश कम है। तमाम बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत है। उदंत मार्तंड इसलिए बंद हुआ कि उसे चलाने लायक पैसे पं जुगल किशोर शुक्ल के पास नहीं थे। आज बहुत से लोग पैसा लगा रहे हैं। यह बड़ा कारोबार बन गया है। जो हिन्दी का क ख ग नहीं जानते वे हिन्दी में आ रहे हैं, पर मुझे लगता है कि कुछ खो गया है। क्या मैं गलत सोचता हूँ?

पिछले 184 साल में काफी चीजें बदलीं हैं। हिन्दी अखबारों के कारोबार में काफी तेज़ी आई है। साक्षरता बढ़ी है। पंचायत स्तर पर राजनैतिक चेतना बढ़ी है। साक्षरता बढ़ी है। इसके साथ-साथ विज्ञापन बढ़े हैं। हिन्दी के पाठक अपने अखबारों को पूरा समर्थन देते हैं। महंगा, कम पन्ने वाला और खराब कागज़ वाला अखबार भी वे खरीदते हैं। अंग्रेज़ी अखबार बेहतर कागज़ पर ज़्यादा पन्ने वाला और कम दाम का होता है। यह उसके कारोबारी मॉडल के कारण है। आज कोई हिन्दी में 48 पेज का अखबार एक रुपए में निकाले तो दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया का बाज़ा भी बज जाए, पर ऐसा नहीं होगा। इसकी वज़ह है मीडिया प्लानर।

कौन हैं ये मीडिया प्लानर? ये लोग माडिया में विज्ञापन का काम करते हैं, पर विज्ञापन देने के अलावा ये लोग मीडिया के कंटेंट को बदलने की सलाह भी देते हैं। चूंकि पैसे का इंतज़ाम ये लोग करते हैं, इसलिए इनकी सुनी भी जाती है। इसमें ग़लत कुछ नहीं। कोई भी कारोबार पैसे के बगैर नहीं चलता। पर सूचना के माध्यमों की अपनी कुछ ज़रूरतें भी होतीं हैं। उनकी सबसे बड़ी पूँजी उनकी साख है। यह साख ही पाठक पर प्रभाव डालती है। जब कोई पाठक या दर्शक अपने अखबार या चैनल पर भरोसा करने लगता है, तब वह उस  वस्तु को खरीदने के बारे में सोचना शुरू करता है, जिसका विज्ञापन अखबार में होता है। विज्ञापन छापते वक्त भी अखबार ध्यान रखते हैं कि वह विज्ञापन जैसा लगे। सम्पादकीय विभाग विज्ञापन से अपनी दूरी रखते हैं। यह एक मान्य परम्परा है।



मार्केटिंग के महारथी अंग्रेज़ीदां भी हैं। वे अंग्रेज़ी अखबारों को बेहतर कारोबार देते हैं। इस वजह से अंग्रेज़ी के अखबार सामग्री संकलन पर ज्यादा पैसा खर्च कर सकते हैं। यह भी एक वात्याचक्र है। चूंकि अंग्रेजी का कारोबार भारतीय भाषाओं के कारोबार के दुगने से भी ज्यादा है, इसलिए उसे बैठने से रोकना भी है। हिन्दी के अखबार दुबले इसलिए नहीं हैं कि बाज़ार नहीं चाहता। ये महारथी एक मौके पर बाज़ार का बाजा बजाते हैं और दूसरे मौके पर मोनोपली यानी इज़ारेदारी बनाए रखने वाली हरकतें भी करते हैं। खुले बाज़ार का गाना गाते हैं और जब पत्रकार एक अखबार छोड़कर दूसरी जगह जाने लगे तो एंटी पोचिंग समझौते करने लगते हैं।

पिछले कुछ समय से अखबार इस मर्यादा रेखा की अनदेखी कर रहे हैं। टीवी के पास तो अपने मर्यादा मूल्य हैं ही नहीं। वे उन्हें बना भी नहीं रहे हैं। मीडिया को निष्पक्षता, निर्भीकता, वस्तुनिष्ठता और सत्यनिष्ठा जैसे कुछ मूल्यों से खुद को बाँधना चाहिए। ऐसा करने पर वह सनसनीखेज नहीं होता, दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में नहीं झाँकेगा और तथ्यों को तोड़े-मरोड़ेगा नहीं। यह एक लम्बी सूची है। एकबार इस मर्यादा रेखा की अनदेखी होते ही हम दूसरी और गलतियाँ करने लगते हैं। हम उन विषयों को भूल जाते हैं जो हमारे दायरे में हैं।

मार्केटिंग का सिद्धांत है कि छा जाओ और किसी चीज़ को इस तरह पेश करो कि व्यक्ति ललचा जाए। ललचाना, लुभाना, सपने दिखाना मार्केटिंग का मंत्र है। जो नही है उसका सपना दिखाना। पत्रकारिता का मंत्र है, कोई कुछ छिपा रहा है तो उसे सामने लाना। यह मंत्र विज्ञापन के मंत्र के विपरीत है। विज्ञापन का मंत्र है, झूठ बात को सच बनाना। पत्रकारिता का लक्ष्य है सच को सामने लाना। इस दौर में सच पर झूठ हावी है। इसीलिए विज्ञापन लिखने वाले को खबर लिखने वाले से बेहतर पैसा मिलता है। उसकी बात ज्यादा सुनी जाती है। और बेहतर प्रतिभावान उसी दिशा में जाते हैं। आखिर उन्हे जीविका चलानी है।

अखबार अपने मूल्यों पर टिकें तो उतने मज़ेदार नहीं होंगे, जितने होना चाहते हैं। जैसे ही वे समस्याओं की तह पर जाएंगे उनमें संज़ीदगी आएगी। दुर्भाग्य है कि हिन्दी पत्रकार की ट्रेनिंग में कमी थी, बेहतर छात्र इंजीनियरी और मैनेजमेंट वगैरह पढ़ने चले जाते हैं। ऊपर से अखबारों के संचालकों के मन में अपनी पूँजी के रिटर्न की फिक्र है। वे भी संज़ीदा मसलों को नहीं समझते। यों जैसे भी थे, अखबारों के परम्परागत मैनेजर कुछ बातों को समझते थे। उन्हें हटाने की होड़ लगी। अब के मैनेजर अलग-अलग उद्योगों से आ रहे हैं। उन्हें पत्रकारिता के मूल्यों-मर्यादाओं का ऐहसास नहीं है।

अखबार शायद न रहें, पर पत्रकारिता रहेगी। सूचना की ज़रूरत हमेशा होगी। सूचना चटपटी चाट नहीं है। यह बात पूरे समाज को समझनी चाहिए। इस सूचना के सहारे हमारी पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था खड़ी होती है। अक्सर वह स्वाद में बेमज़ा भी होती है। हमारे सामने चुनौती यह थी कि हम उसे सामान्य पाठक को समझाने लायक रोचक भी बनाते, पर वह हो नहीं सका। उसकी जगह कचरे का बॉम्बार्डमेंट शुरू हो गया। इसके अलावा एक तरह का पाखंड भी सामने आया है। हिन्दी के अखबार अपना प्रसार बढ़ाते वक्त दुनियाभर की बातें कहते हैं, पर अंदर अखबार बनाते वक्त कहते हैं, जो बिकेगा वहीं देंगे। चूंकि बिकने लायक सार्थक और दमदार चीज़ बनाने में मेहनत लगती है, समय लगता है। उसके लिए पर्याप्त अध्ययन की ज़रूरत भी होती है। वह हम करना नहीं चाहते। या कर नहीं पाते। चटनी बनाना आसान है। कम खर्च में स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन बनाना मुश्किल है। 



चटपटी चीज़ें पेट खराब करतीं हैं। इसे हम समझते हैं, पर खाते वक्त भूल जाते हैं। हमारे मीडिया मे विस्फोट हो रहा है। उसपर ज़िम्मेदारी भारी है, पर वह इसपर ध्यान नहीं दे रहा। मैं वर्तमान के प्रति नकारात्मक नहीं सोचता और न वर्तमान पीढ़ी से मुझे शिकायत है, पर कुछ ज़रूरी बातों की अनदेखी से निराशा है।  









10 comments:

  1. सर मुझे लगता है की १८४ साल की जगह ८४ होनी चाहिए
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  2. सर मुझे लगता है की १८४ साल की जगह ८४ होनी चाहिए
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  3. 30 मई 1826 को उदंत मार्तंड का पहला अंक निकला। इस हिसाब से 184 साल ही होंगे।
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  4. लतिकेश जी शायद गणेश संकर विद्यार्थी के डाक टिकट पर लिखी तारीख से संशय में पड़ गए। दर असल मैं उदंत मार्तंड का चित्र लगाना चाहता था। मिला नहीं, इसलिए विद्यार्थी जी और माथुर जी का चित्र लगा दिया. यह सिर्फ प्रतीक भर है।
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  5. एक विचारणीय आलेख । पत्रकारिता कोई धंधा नहीं है,यह तो सत्य को सामने लाने का एक मिशन है, हिंदी पत्रकारिता में सत्यनिष्ठ पत्रकारों की बहुत जरूरत है । इस ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए धन्यवाद ।
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  6. एक बार फिर जानकारिओं से भरी सच्ची तस्वीर......पर सवाल वही है..हमे अब करना क्या है...?
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  7. आभार . माथुरजी का चित्र क्यों लगा है ? गणेश शंकर विद्यार्थी के साथ नहीं जँचा !
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  8. धन्मुयवाद। मुझे माथुर जी याद रखने लायक पत्रकार लगते हैं।
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  9. सर नमस्ते, आपका लेख मुझे बहुत ही अच्छा लगा, वैसे आपके लेख को मेरे जैसी छोटी पत्रकार की प्रतिक्रिया की कोई आवश्यकता तो नहीं है लेकिन फिर भी एक पाठक का यह उत्तर दायित्व बनता है की वह पढ़ कर प्रतिक्रिया दे, प्रतिक्रिया से ही लेखक का लिखना सफ़र मन जाता है, यह मेरी अपनी राय है, सर यह बात तो रही आपके लेख की, अब मैं आपसे यह जानना चाहती हूँ की आपने अपने ब्लॉग के हेडर पर जो तस्वीर लगाईं है उसका क्या सन्देश है, यक़ीनन मुझे जिज्ञासा हुई जानने की , अंत में अपना छोटा सा परिचय शुरुआत में इसलिए नहीं लिखा की अगर शुरू में ही लिख देती तो शायद आप मेरी जिज्ञासा नहीं जान पाते और मेरा परिचय पढ़कर ही छोड़ देते, सर मेरा नाम प्रीती पाण्डेय है, एक छोटे अखबार में सहायक संपादक हूँ, पत्रकारिता की पगडण्डी पर अभी कदम भर रखा है, अभी मेरा बस यही छोटा सा परिचय है, हिन्दुस्तान में इन्टरन के दोरान ही आपसे एक- दो बार मिलना का सोभाग्य प्राप्त हुआ था.
    www.merikoshish.blogspot.com
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  10. प्रीति जी धन्यवाद। हैडर पर चार जिज्ञासु चार सुन्दर और जिज्ञासु नज़र आने वाले कुत्तों का चित्र लगाते वक्त मैं इनकी आँखों की जिज्ञासा से प्रभावित हुआ था। दूसरे अपने काम को मैं समाज के वॉचडॉग के रूप में भी देखता हूँ। यों कुत्ते मनुष्य के सबसे अच्छे मित्रों में से एक होते हैं। महाभारत के अंत में पांडवों का अंत तक साथ एक कुत्ते ने दिया था। तीसरे मुझे यह एक रोचक चित्र लगा। मेरे ब्लाग में नचे एक दाईं ओर के कॉलम में एक विजेट है जिसमें एक पपी की तस्वीर रोज़ बदलती है। यह भी सिर्फ एक चित्र है।


    आपकी जिज्ञासा का मैं स्वागत करता हूँ। मेरे विचार से मनुष्य के पास जो सबसे अच्छी निधियाँ हैं उनमें एक जिज्ञासा भी है। वह उसे श्रेष्ठतम राह पर ले जाने में सहायक हो सकती है।


    प्रति आपने यह नहीं बताया कि आप किस अखबार में काम करतीं हैं। शुभकामनाएं।

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