गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

पारंपरिक मीडिया का विकास जरूरीः मुजफ्फर हुसैन / गंभीरता के साथ विषय पर पकड़ हो पत्रकारों की



 

 



भोपाल
/ खबर / 23 फरवरी।
वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री मुजफ्फर हुसैन का कहना है कि पत्रकारिता एक भविष्यवेत्ता की तरह है जो यह बताती है कि दुनिया में क्या होने वाला है। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवम संचार विश्वविद्यालय,भोपाल के तत्वाधान में भारतीय संस्कृति में पत्रकारिता के मूल्य विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संविमर्श के दूसरे दिन समापन सत्र में अध्यक्ष की आसंदी से बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि आज सामाजिक मुद्दों से जुड़े समाचार मीडिया में अपनी जगह नहीं बना पा रहे हैं, इसके लिए जरूरत है कि पारंपरिक मीडिया का संवर्धन किया जाए। उन्होंने कहा कि एक आदमी की विचारधारा कभी भी संवाद का रूप नहीं ले सकती। तानाशाही में संवाद नहीं होता और संस्कृति लोकतंत्र को जन्म देती है। उन्होंन कहा कि संवाद रूकता है तो समाज मरता है, चलता है तो समाज सजीव होता है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों का खबरों का चुनाव करते समय उसके प्रभाव को नहीं भूलना चाहिए।
सत्र के मुख्यवक्ता साधना न्यूज के समूह संपादक एनके सिंह ने कहा कि मीडिया पर बाजारवाद हावी है जिसके चलते सामाजिक मुद्दों की उपेक्षा हो रही है। जबकि कोई भी लोकतंत्र निरंतर संवाद से ही प्रभावी होता है। भारत में इलेक्ट्रानिक मीडिया का विकास बहुत नया है किंतु यह धीरे-धीरे परिपक्व हो जाएगा। उन्होंने कहा मीडिया को बदलना है तो दर्शकों को भी बदलना होगा क्योंकि जागरूक दर्शक ही इन रूचियों का परिष्कार कर सकते हैं। श्री सिंह ने देश के इतिहास में इतना कठिन समय कभी नहीं था जब पूरे समाज को दृश्य माध्यम जड़ बनाने के प्रयासों में लगे हैं। इसके चलते विवाह एवं परिवार नाम की संस्थाओं के सामने गहरा संकट उत्पन्न हो रहा है। इस सत्र में स्कूल शिक्षा राज्यमंत्री नानाभाऊ माहोर एवं गोसंवर्धन बोर्ड के अध्यक्ष शिव चौबे ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि पूरे विश्व में मानव सभ्यता आज इस स्तर पर है कि मानव के अस्तित्व और भूमिका पर सवाल और संवाद कर सकती है। पत्रकारिता समाप्त न हो जाए यह चिंता आज सबके सामने है, परंतु भारतीय संस्कृति के आधार पर मीडिया की पुर्नरचना संभव है।
इसके पूर्व प्रातः भारतीय संस्कृति में संवाद की परंपराएं विषय पर चर्चा हुयी जिसके मुख्यवक्ता प्रो. नंद किशोर त्रिखा ने कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य लोकहित होना चाहिए, इसके बिना यह अनर्थकारी हो सकता है। आज पत्रकारिता की आत्मा को अवरोध माना जा रहा है जबकि यह अत्यंत आवश्यकता है। पत्रकार को सत्य , उदारता , स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर अडिग रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को समाज में उच्च आदर्शों को प्रस्तुत करना चाहिए। स्वदेश ग्वालियर के संपादक जयकिशन शर्मा ने कहा कि भारतीय साहित्य का वाङमय संवाद से ही शुरू होता है। हमारे यहां धर्म का अर्थ धारणा से है, हमारे धर्म ग्रंथ सही और गलत के निर्णय का आधार देते हैं। विश्व में अन्य किसी संस्कृति में ऐसा नहीं है। उन्होंने भारतीय संस्कृति में संवाद के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा की समाज के अधिकतम लोगों को शोषण से मुक्ति दिलाने का दायित्व पत्रकार का है। सिर्फ रोजी रोटी के लिए पत्रकारिता करना उचित नहीं। देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय, इंदौर में पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष डॉं. एमएस परमार ने कहा कि आज जब विज्ञान की सारी शक्तियां सब कुछ नष्ट करने में लगी है तव भारतीय ग्रंथों में संवाद की परंपरा इसका हल बताती है। यदि भारतीय ग्रंथों का अनुसरण करें तो पश्चिम की तरफ देखने की जरूरत नही पड़ेगी। हमारी वैदिक मान्यताओं के अनुसार संवाद सत्य पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज लोकतंत्र के चारों स्तम्भों पर भष्टाचार हावी है जो कि लोकतंत्र के लिए अनर्थकारी है। अनावश्यक खबरों को जरूरतों से ज्यादा तूल देने पर उन्होंने अपनी चिंता जाहिर की। साहित्यकार डॉ. विनय राजाराम ने संवाद में बौद्ध परंपरा पर सबका ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि देशाटन पत्रकारिता का अहम हिस्सा है। बौद्ध धर्म का प्रसार तंत्र आज के पत्रकारों के लिए अनुकरणीय है। विद्यार्थी सत्र में विभिन्न विषयों पर छात्र-छात्राओं ने अपने विचार रखे। इनमें सर्वश्री सुनील वर्मा, मयंकशेखर मिश्रा, नरेंद्र सिंह शेखावत, उर्मि जैन, कुंदन पाण्डेय, पूजा श्रीवास्तव, हिमगिरी ने अपने विचार रखे। सत्रों का संचालन प्रो. आशीष जोशी, डॉ. पवित्र श्रीवास्तव एवं स्निग्धा वर्धन ने किया।
संजय द्विवेदी,
अध्यक्षः जनसंचार विभाग,
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,
प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल-462011 (मप्र)
मोबाइलः 09893598888
http://sanjayubach.blogspot.com/
http://sanjaydwivedi.com/


January 31, 2011 at 10:35 pmadmin

गंभीरता के साथ विषय पर पकड़ हो पत्रकारों की



मनमीत कुमार/ मुद्दा। मीडिया जिसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का दर्जा प्राप्त है, ऐसे में लोकतंत्र की सफलता में मीडिया की जबावदेही बढ़ जाती है। मीडिया समस्त जनसमाज को सांसारिक भौगोलिक परिदृश्य के साथ एक कड़ी के रूप मं जोड़ता हैं। आज जब दुनिया इतनी हाईटेक हो गयी है और हर क्षण की खबरों को जानने के लिए लोग उत्सुक हो गये है, ऐसे में मीडिया का काम और भी कठिन और महत्वपूर्ण हो गया है। एक वक्त था जब संचार के साधन इतने विकसित नहीं थे। ऐसी परिस्थितियों में खबरों का आदान प्रदान बहुत ही कठिन था। अगर कोई खबर प्राप्त होती भी तो इतने लम्बे समय अंतराल पर कि उसका महत्व और विश्वसनीयता दोनों लगभग सामप्त हो चुके होते थे, लेकिन आज परिस्थिति एकदम विपरीत है। लोग आज हर खबरों से तुरंत वाकिफ होना चाहते है जिसका माध्यम इलेक्ट्रानिक मीडिया में टेलिविजन, नेट या फिर हाथों-हाथ घुमने वाला मोबाइल फोन ही क्यों न हो, आज क्षण भर की भी देर करने वाले माध्यम को लोग तुरंत नकार देते है। अतः इस प्रतियोगिता के दौड़ में प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया दोनों खबरों को सबसे पहले ब्रेक करने की प्रतिस्पर्धा मंा तत्पर रहते है, ताकि उनका टीआरपी बना रहे या बढ़ता जाए।
लेकिन आगे बढ़ने के इस अंधे दौड़े में मीडिया के सभी माध्यमों में बहुत सी खामियों को अपना लिया है। आज मीडिया का बाजारीकरण हो गया है। अब चैनल या अखबारों का संबंध कारपोरेट और बिजनेस घरानों से है। ऐसे में स्वच्छ मीडिया के होने पर सवालिया निशान लग रहा है। आज लगभग हर खबर कहीं न कहीं से प्रभावित और प्रेरित रहती है। मीडिया में भी अब किसी के हाथ और साथ होने की बात होने लगी है। इससे जुड़े लोग अब इसे मिशन के रूप में न लेकर प्रोफेशन के रूप में ज्यादा ले रहे है। ‘‘जो दिखेगा वह बिकेगा’’ के कथन पर अब मीडिया का ज्यादा फोकस हो रहा है, और दिखाने के चक्कर में नौतिकता और मानवता पीछे छुटती जा रही है। इसका प्रमाण हैं कि देश में प्रतिदिन अनेक महत्वर्पूण घटनाऐं घटित होती है या फिर सरकार के अनेक फैसलों और योजनाओं की जानकारी जनता तक देर से पहुंचती है और मसाला खबरों की महत्ता मीडिया के दोनों माध्यमों में अधिक बढ़ जाती है। कभी-कभी तो ऐसा भी देखा जाता है कि हमारे देश में होने वाली घटनाओं को विदेशों में जब महत्वपूर्ण घटना के रूप में दिखाया या छापा जाता है उसके बाद यहां के लोगो की आंख खुलती है। भारत के संसद में आए दिन पास होने वाले बिलो और र्निणयों पर वाशिंगटन और लंदन के पत्रकार पूरी तरह सजग होते है। वहां भारत के खबरों को जब महत्ता दी जाती है और खबरें प्रकाशित या प्रसारित होते है। उसे देख या जानकर यहां लोगों को उसकी महत्ता समक्ष में आती है।
किसी भी चैनल या अखबार का अगर कोई रीढ़ है तो वे हैं उसके उसके पत्रकार, रिर्पाटर या एंकर है। ऐसी परिस्थिति में एक पहलू यह भी है कि इनलोगों को अपने क्षेत्र और बीट में ज्ञान और सूचानएं ज्यादा से ज्यादा हो। उन्हें विषय के हर पहलू पर ज्यादा से ज्यादा पकड़ हो। ताकि उनमें भटकाव न हो। सरकार और चैनल का यह भी कर्तव्य बनता है कि वे रजिस्टर्ड पत्रकारों को दुनिया के विभिन्न देशों में भेजकर वहां के लोगों के रहन-सहन, सभ्यता-संस्कृति, शासन-प्रणाली, विकास और पिछडे़पन के मुख्य कारणों तथा खास करके संसदीय कार्य-प्रणाली को अच्छी तरह से जान-समक्ष कर अपने देश के उन्हीं चीजों का तुलानात्मक अध्ययन करें और फिर मीडिया के माध्यमों से लोगों के बीच रखें।
लेकिन मुश्किल से ऐसा होता है यदि कोई पत्रकार देश के प्रधानमंत्री, मंत्री या विदेश सचिव के साथ विदेश दौरा पर जाते है तो उनका फोकस इन सब मुद्दो पर न रहकर टूरिजम पर ज्यादा रहता हैं। वहां के प्रशासनिक और संसदीय कार्यप्रणाली से ज्यादा रूचि वहां के बाजारों और टूरिस्त स्थानों को घुमने और खरीदारी करनें में ज्यादा होती है। वहां से सूचनाऐं लाना जो उनका मुख्य दायित्व है उससे वे विमुख होकर वहां अपने प्रियजनों के लिए पसंद की समाग्री लाने में जुट जाते है।
मीडियों कर्मियों को अपने दायित्वों और कत्र्तव्यों को भली-भांती समझना होगा। थोड़ा जिंदगी का लुत्फ उठाना गलत नहीं है परंतु अपने दायित्वों से पूरी तरह विमुखता इस पद को मजाक बना देता है। इन सब से मीडिया कर्मियों को आज उपर उठने की आवश्यकता है। मीडिया कर्मियों को अपने आप को ग्लैमर के बढ़ते प्रभाव से बचना होगा, उन्हें इस अपने उपर हावी नहीं होने देना होगा। वरना इसकी विश्वसनियता समाप्त हो जाएगी, और यह बनावटी लगने लगेगा। मीडिया को लोकतंत्र के सही संचालन के लिए विधान सभा, राज्यसभा और लोकसभा में जो भी बहस हो, निर्णय हो या फिर कोई बिल पास हो। उसके पक्ष और विपक्ष दोनों पहलुओं पर मीडिया के सभी माध्यमों की पकड़ होनी चाहिए। संसद चलने पर या नहीं चलने पर दोनों अवस्था में मीडिया का यह कर्तव्य बनता है कि उन पर नजर बनाए रखें। किसी भी खबर को मसाला बनाकर पेश करने से ज्यादा उन्हें फोकस अपने कत्र्तव्यों और दायित्वों पर करना चाहिए। विधानसभा, राज्यसभा और लोकसभा के कार्या, वहां उठने वाले मामलों और पारित होने वाले बिलों की एक संगोष्ठी करके समीक्षा की जानी चाहिए और उसके हर पहलू को जनता के समक्ष रखना ही मीडिया का सबसे अहम् काम इस लोकतंत्र में है।
मीडिया लोकतंत्र का प्रहरी के रूप में है। लोकतंत्र जनता के हित की शासनप्रणाली है। इसलिए जनता के हित के सभी पहलुओं पर मीडिया को सजग रहना अत्यंत आवश्यक है। सही क्या है और गलत क्या है आज इसका सबसे बड़ा विश्लेषक के तौर पर मीडिया को देखा जाता है। लोग हर पहलु पर मीडिया के सभी माध्यमों पर र्निभर करते है, ताकि उन्हें पूरी और परफेक्ट जानकारी प्राप्त हो सके। इसलिए मीडिया को अपनी साख बनाए रखने के लिए अपने प्रत्येक कर्तव्यों और दायित्वों को पूरी सावधानी और सजगता से निभाने की जरूरत है।
मनमीत कुमार
(पत्रकारिता का छात्र,कॉमर्स कॉलेज पटना )
मो0 9308715037


 

 

बाजार की देन है मीडिया की ‘‘भाषा’’


संदीप कुमार श्रीवास्तव /
 समय जो है वह अपने हर पल का इतिहास लिखता है। और आने वाले कल के पथ का संधान भी करता है। वक्त की इस सृजनात्मक प्रक्रिया का फिलहाल अब तक का सबसे महत्वपूर्ण सहचर ’’मीडिया’’ ही है। मीडिया का एक मिशन रहा करता था कि वह समाज की सही तस्वीर पेश करें और उसके साक्ष्य को आधार बनाकर समय अपने मुहाने का इतिहास लिख सकें। यहां था का होना थोड़ा सा आश्चर्य पैदा कर सकता है लेकिन सत्यता तो यही है। आज मीडिया मिशन से पृथक मूलतः एक व्यावसायिक उपक्रम बनकर रह गया है।
इस व्यावसायिकता के दबाब में प्रिंट मीडिया जहां एक ओर अपने उत्तरदायित्वों से हटकर अपने बिकाऊ होने की तस्वीर रच रहा है वहीं दूसरी ओर इलेक्ट्रानिक मीडिया का पिछलग्गू बना हुआ है। इलेक्ट्रानिक मीडिया का पिछलग्गू होने का सीधा सा तात्पर्य है कि कुछ देह दर्शना छवियों को प्रथम पृष्ठ की ओर खींचों और यौन कुंठित मानसिक प्रवृति के पाठकों को जितना सम्भव हो उतना बेचो , और बौद्धिक चेतना से समर्थ पाठकों को यौन कुठित बनाने की चेष्ठा करों। कुछ अखबार तो इस हइ पर भी उतर आये हैं कि देह की नग्नता को आंखों की चाकलेट ;आई कैण्डी कहकर अखबार के पन्नों पर चश्पा कर देते हैं। पर विडम्बना महज इतनी ही नहीं है कि प्रिन्ट मीडिया नग्नता और स्त्री देह की उत्तेजक छवि को प्रथम पृष्ठ पर परोसने को उत्सुक है बल्कि सबसे ज्यादा दुखद भाषा और साहित्य को नष्ट करने वाली आज की अखबारी सोच है।
आज से लगभग दस साल पहले मैंने अपने भाषा के संस्कार हिन्दी के अखबार पढ़ कर ही हासिल किया था पर अफसोस कि हम जैसे-जैसे तकनीकी विकास करते जा रहे हैं वैसे-वैसे हमारी रचना प्रक्रिया अपने भाषाई शिल्प और व्याकरण सम्मत संस्कार भी खोती जा रही है। हमारी अखबारी भाषा सरलता और सहजता के नाम पर फुटपाथी भाषा का शिकार हुयी। चलताऊ शब्दों को जैसा का तैसा लिखने की प्रवृत्ति ने विकसित भाषा के पाठकों को हर सम्भव तरीके से व्याथित किया। इसकी शुरूआत प्राथमिक तौर पर कुछ छोटे-छोटे अखबारों ने की जिनका उद्देश्य सिर्फ इतना था कि ऐने-केन प्रकारेध बस और ट्रेन का इन्तजार कर रहे तथाकथित साक्षर किस्म के पाठकों के मस्तिष्क पर अपनी चटपटी शब्दावली से क्लिक किया जाय और झटके से एक रूपये का सिक्का उनकी जेबों से निकाल लिया जाये।
छोटे अखबारों की यह बाजारू सोच धीरे-धीरे व्यावसायिक सफलता प्राप्त करने में समर्थ होती गयी लटके-झटके वाली भाषा की इस सफलता ने धीरे-धीरे अच्छी रचनात्मक सोच के अखबारों को भी अपनी चमत्कार पूर्ण भाषा के मोह जाल में फंसाने का उपक्रम शुरू कर दिया। परिणामतः हिन्दी अखबारों के भाषायी मुहावरे, अलंकारिक शब्दावली , कावयात्मक रचानात्मक जैसी शिल्पगत अवधारणा विखण्डित होती चली गयी।
समय के साथ हम भाषा विखण्डन के उस मुहाने पर आ गये हैं जहां अखबार ने हिन्दी भाषा पर ऐसा संकट खड़ा कर दिया है कि यदि तमाम मीडिया सहचरों ने अपनी भाषा को बचाने के लिए आन्दोलनात्मक प्रयास नहीं किया तो आने वाली पीढ़ी के बहुत से शब्दों को जान ही नहीं सकेगी। आज कुछ अखबार एक ऐसी भाषा गढ़ने में लगे हुए हैं जहां सरलता के लिए बहुतेरे अंग्रेजी शब्दों को देवनागरी लिपि में चस्पा कर लिया गया है।
यह देखने और पढ़ने में कितना भी आर्कषक क्यांे न लगे पर इसका खतरा हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं के लिए भयावह है। अंग्रजी अखबार फिलहाल आज भी अपनी भाषा की शुच्छता के प्रति फिक्रमन्द हैं पर हिन्दी के अखबार नवीस हीन भावना के शिकार हैं। इस हीनता बोध में उन्होंने स्वयं ही यह अवधारणा बना ली कि हिन्दी पिछड़ों गवारों की भाषा है इसका व्यावसायिक लाभ भी न के बराबर है पर यह सोच ठीक नहीं है। हिन्दी की मजबूरी या कमजोरी महज इतनी ही है कि वह ऐसे कमजोर लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है जो किसी भीड़ में अपनी मां को मां कहने में सिर्फ इसलिए कतरा जाते हैं कि उनकी मां की धोती साड़ी में न तो क़ल्फ किया गया है न उस पर सेन्ट छिड़का गया है। हिन्दी को यह तकलीफ उसी देश में उठानी पड़ रही है जहां कथित तौर पर उसे राष्ट्रभाषा और राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। क्या हम तमाम आंचलिक भाषा के लोगांे का अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव देखकर भी कुछ नहीं सीख सकते। तमिल ,मराठी , उड़िया , बंगाली हर भाषा का आदमी अपनी भाषा में अपने स्वाभिमान अपने अस्तित्व की महक खोजता है। अपने होने की अर्थवत्ता साबित करता है। समझ में नहीं आता कि आखिर हिन्दी भाषी स्वाभिमान कैसे इतना कमजोर हो गया है।
शिल्प के साथ सोच के स्तर पर भी आज हिन्दी अखबारों में गिरावट आ रही है। हम जो स्वय्र को लोकतंत्र का चतुर्थ खंभा कहने में अपनी छाती चैड़ी करते नहीं थकते। आज तमाम लोक-तांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने में भी अक्षम साबित हो रहे हैं। जनकवि गोरख पाण्डेय ने कभी मीडिया के भविष्य पर कयास लगाते हुए लिखा था कि -
’’इक्कीसवीं सदी की सुबह
क्या होगा अखबार पर
खून के धब्बे
या कबूतर
क्या होगा
उन अगले सालों की
शुरूआत पर लिखा।’’
जिसका सीधा सा तात्पर्य था कि समाज को हमसे उम्मीद थी कि हम इक्कीसवीं सदी की सुबह शांति के अभ्युदय से करेंगे पर हमने वहीं किया जिसका समाज को हमसे भय था हम नरपुण्डों की माला थामें अखबार को खून की छींटों से तर-बतर करने में कुछ इस तरह मशगूल हुए कि हमारी सृजनात्मकता चेतना ही कुंद हो गयी। फिलहाल सृजनात्मक का यह बिखराव भाषा का विखराव हमारे लिये बेहतर नहीं है , पर रचनात्मक उम्मीदें सहजता से खत्म नहीं होती और मैं भी अभी नाउम्मीद नहीं हूं। बस आप सब से गुजारिश है कि अपनी भाषा और अपनी सृजनात्मक चेतना की अश्रुण्ता के प्रति आगे आइये ताकि हम समय के इस मुहाने पर एक क्रांितकारी परिवर्तन का नाद भर सकें और अखबार को विवेकशील साहित्य का सहचर बनाने के लिए उद्यत हों।


लेखक :- संदीप कुमार श्रीवास्तव
स्ंपादक-जनसंचार विमर्श शोध पत्रिका और अतिथि प्रवक्ता 
-स्कूल आफ फिल्म एण्ड मास कम्यूनिकेशन
शियाटस, इलाहाबाद।
e-mail- sandeepkumarsri@gmail.com

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