गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

बिहार में हिंदी पत्रकारिता के कुछ आयाम / श्रीकांत




(वाणी प्रकाशन द्वारा श्रीकांत की सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘‘ बिहार राज और समाज ’’ में बिहार की राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक सहित तमाम पहलूओं को खंगालने की कोशिश की गई है। इसमें श्रीकांत ने बिहार की पत्रकारिता में जो बदलाव आया है उस पर भी पैनी नजर डाली हैं आइये डालते हैं एक नजर-संपादक)
श्रीकांत / मुद्दा / एक दिन अपने एक मित्र के साथ एक अखबार के दफ्तर में बैठा था। वे बड़े अखबार के कोआर्डिनेटर हैं। देखा एक मजदूर यूनियन के हैंड आउट को उन्होंने डस्टबीन में डाल दिया। यह 27 फरवरी, 2007 की बात है। मैंने उनसे कहा कि यार, ऐसा तो पहले नहीं होता था। हमें सिखाया गया था कि किसी का हैंडआउट हो, छोटा-बड़ा, छापा जाए। उन्होंने कहा कि जमाना बदल गया है और तुम हो कि नब्बे के दशक में फंसे हुए हो। पत्रकारिता मिशन नहीं रही। लेकिन यहां तो न्यूनतम जनतंत्र की बात है।
बिहार के अखबारों में 26 जनवरी की एक घटना प्रमुखता नहीं पा सकी। वह खबर थी एक गांव में एक दलित को राष्ट्रीय झंडा फहराने से सामंतों ने रोक दिया था। पांच बड़े अखबार राजधनी से निकलते हैं, लेकिन एक अखबार ने इसे सिंगल कालम में पहले पन्ने पर छापा था। इस घटना पर किसी भी अखबार ने स्टोरी नहीं बनाई थी। जबकि मार-पीट और हिंसा से जुड़ी घटनाओं को कापफी प्रमुखता से परोसा गया था। बिहार में नई और आधुनिक पत्रकारिता का यह नया रूप है।
आपने देखा होगा कि सभी अखबारों में ऐश्वर्या राय की मंदिर में सिंदुर लगाए हुए अखबारों में तसवीर छपी है। इस तसवीर को बड़े खबर के साथ अखबारों ने दिल लगा कर छापा। उसी दिन के अखबार में कमलेश्वर के निधन की खबर थी। पटना से निकलने वाले एक अखबार को छोड़ कर किसी अखबार ने उसे डबल कालम छापने की जहमत नहीं उठाई। अखबारों को पढ़ कर इतना पता चलेगा कि कमलेश्वर ने आँधी की स्क्रीप्ट लिखी थी और उन्होंने डाकबंगला लिखा था। अखबारों को पढ कर यह पता नहीं लग सकता कि वे एक बड़े उपन्यासकार और कहानी लेखक थे। नई कहानी आंदोलन को उन्होंने एक पहचान दी थी। उन्होंने आम आदमी का नारा बुलंद किया था। बाद में 29 जनवरी को अखबारों ने कमलेश्वर पर एक पेज छापा तो पता चला कि कमलेश्वर क्या थे।
मित्रों, बिहार को एक सामंती राज्य के रूप में जाना जाता है। दलितों, गरीबों पर आए दिन जुल्म और दमन की घटनाएं सामने आती रहती हैं। जुल्म ऐसा वैसा नहीं – मारते भी हैं और रोने भी नहीं देते हैं। पुलिस सामंतों की संरक्षक के रूप में काम करती है। यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है और उदारीकरण के बाद तो इसमें भारी परिवर्तन आया है। अखबारों की दुनिया बदल गई है। लाल-पीले रंगीन पेज निकलने लगे हैं। पहले पेज पर अध्नंगी लड़कियों की तस्वीरों का छपना स्थायी भाव हो गया है। इसमें भारी बदलाव हुआ है। पर असली बात है कि बिहार में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आधी आबादी के बारे में खबरे कम से कमतर होती जा रही हैं। कहा जाता है कि इसका मार्केट नहीं है। मार्केट बिकने वाले समाचारों का है-मसलन विधयक ने पी कर विधानसभा परिसर में उत्पात मचाया। विधानसभा में गाली-गलौज हुआ। मुख्यमंत्री ने भोज दिया। लालू प्रसाद ने अपने गांव में पूजा किया और मंदिर बनवाया। इन खबरों को चटखारे लेकर छापा जाता है।
1980-1990
कुछ साल पहले पटना के दक्षिण किसी गांव के 14 निर्दोष निवासियों पर पुलिस ने गोली चला कर हत्या कर दी। तत्काल ही इस घटना की रपट पेश की कि यह मुठभेड़ नक्सवादियों के साथ हुई थी, लेकिन एक निजी पड़ताल से पता चला कि इन साधरण ग्रामीणों की निर्ममता से हत्या की गई।
पटना के अखबारों से वस्तुस्थिति का पूरा अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। बहुत सी छिटपुट हत्याएं और गांवों या बस्तियों को जलाने की सूचनाएं संपादक बाबूओं तक नहीं पहुंच पाती। उनके संवाददाता ग्रामीण क्षेत्रों में घूमने की जहमत नहीं उठाना चाहते और जो खबरे छपती हैं उसकी अच्छी तरह लीपापोती होती है। चूंकि हत्या और आगजनी करना, पीटना और डराना- धमकाना उग्रवादियों का काम है, अतः घटनाएं अक्सर उनका दुष्कर्म बना कर छपी जाती हैं। विडम्बना यह है कि प्रशासन और प्रेस ने पिछले एक दशक से उग्रवादी और नक्सवादी को एक दूसरे का पर्याय बना दिया है। इसी तरह प्रशासन और प्रेस भूस्वामियों को किसान कहते हैं। राज्य के सुदूर बसे गांवो में 1970 के बाद प्रेस ने पुलिस और भूस्वामियों की संयुक्त हिंसा को जायज ठहराया। या यों कहें प्रेस भूस्वामियों के पक्ष में खड़ा था। ग्रामीण अंचलों में घटी कोई एक घटना, जिसमें किसी व्यक्ति की हत्या हुई अथवा पुलिस और भूस्वामियों ने मार गिराया। अखबार पुलिस के हवाले से यह खबर छाप कर – ‘पुलिस मुठभेड़ में एक नक्सलवादी या उग्रवादी मारा गया’ अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। घटना की तह में जाने के बदले अखबार सरकारी बयानों पर यकीन करने के हिमायती हैं – यह गांवों में रोज-ब-रोज घटने वाली घटनाओं और उसकी रिर्पोटिंग से साफ-साफ पता चलता है।
वस्तुतः इन अखबारों ने सदियों से शोषण की चक्की में पीसे जा रहे गरीब किसानों और हरिजनों के बारे में यह सोचने की कभी कोशिश नहीं की कि अचानक दबे कुचले लोग लड़ने के लिए तैयार कैसे हो गये। वे तो अनपढ़ जाहिल, गंवार थे। वे तो पहले हर बात को सिर झुका कर मान लेते थे। वे तो जमींदारों के गुलाम थे। उनकी अपनी कोई औकात नहीं थी और न ही कोई स्वतंत्रा पहचान। बल्कि अखबारों ने संगठित किसान आंदोलन को हरिजन-पिछड़ा बनाम सवर्णों की लड़ाई के रूप में प्रचारित प्रसारित करने की कोशिश की। कुछ ने इसे हरिजनों पर अत्याचार के रूप में देखा।
बक्सर, बेलछी, पथड़ा छौड़ादानों, गोपालपुर, धरमपुरा और बाद के दौर में भोजपुर, जहानाबाद, गया, औरंगाबाद में सैकड़ों घटी घटनाओं में मजदूरी और जमीन की लड़ाई थी, सो इन्हें हरिजनों पर अत्याचार कहना एकांगी होगा। जब इन घटनाओं को सिपर्फ हरिजनों पर अत्याचार कह कर पेश किया जाता है तो मजदूरी का सवाल गौण हो जाता है।
बिहार में नक्सलवादी आंदोलन की जड़ जमाने के पूर्व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चलाये जाने वाले आंदोलन के प्रति अखबारों का रुख भी आंदोलन विरोध्ी था, जो कई मौकों पर अभिव्यक्त हुआ। 30 नवम्बर, 72 को दरभंगा के सेलीबली गांव में सात खेत मजदूर महंथ और उसके गुंडों द्वारा मार डाले गये। इस घटना के बाद इंडियन नेशन ने अपने संपादकीय में लिखा- ‘पफसल कोई बोये और रोपे, पर कम्युनिस्टों के बहकावे पर गरीब लोग काटेंगे, क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी अराजकता पफैलाना चाहती है।’
इंडियन नेशन और आयावर्त ने एक डेढ़ सालों में दरभंगा में कानून और व्यवस्था पर खतरे का प्रचार किया है। उन लोगों ने लगातार खेत मजदूरों के आंदोलन का फैलाव, बटाईदारी आदि पर चिंता व्यक्त करते हुए सरकार से आग्रह किया है कि वहां सशस्त्रा पुलिस बल की तैनाती की जाये तथाकथित ‘समाजद्रोही’ तत्वों को कुचला जाये।’
‘बिहार में आजादी के समय से दो तरह के प्रेस हैं- राजा प्रेस और जूट प्रेस। दोनों अखबार किसान सभा के गांवों में मजदूरी बढ़ाने की मांग पर रोक लगाने और भूमि सुधरों के प्रति ग्रामीणों के बीच आयी जागृति ने गरीबों को संगठित किया तो दूसरी ओर भूस्वामियों, नवोदित जमींदारों और पुलिस की सांठ-गांठ से गावों, खेतों- खलिहानों में हिंसा की संस्कृति का बीज बोया। अखबारों ने ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस बल बैठाने की वकालत की। जमींदारों की हिंसा को छुपे तौर पर जायज ठहराया। यहां तक कहा गया कि नक्सलियों के अत्याचार से किसान संगठित हो रहें हैं। ऐसे में ग्रामीणों पर पुलिस-जमांदार जुल्म की ऐसी ही तसवीर पेश की गयी गोया वे ताड़न के अध्किारी ही थे। कहने की जरूरत नहीं कि यह वही वक्त था जब समाज के सबसे निचले तबके ने गुलामी के जुए को उतार फेंका था। सतही तौर पर बिहार के पेंचीदा जातीय समीकरण में यह जातीय संघर्ष के रूप में दिखाई पड़ता है, लेकिन, वस्तुतः यह अपने आगोश में वर्ग को समेटे हुए था। भोजपुर के नक्सली आंदोलन के दौरान जितने सवर्ण भूस्वामी नक्सलियों के शिकार बने उससे कहीं ज्यादा पिछड़ी जातियों के दलाल तथा लठैत कहे जाने वाले लोग मार डाले गये। भोजपुर में जहां उनका आंदोलन सवर्ण भूस्वामियों के खिलाफ था, पटना जिला में उनका आंदोलन कुर्मी जाति के भूस्वामियों के खिलाफ केंद्रित था। बर्बर दमन और संघर्ष इस काल में जातिगत सवाल गौण था।
अखबारों ने भोजपुर से पटना तक के किसान आंदोलन को एक आतंक के रूप में चिन्हित किया, फलस्वरूप जन दमन के लिए आपरेशन और उसके दमन का माहौल बना। बिहार के पुलिस उप महानिरीक्षक शिवाजी प्रसाद सिंह ने नक्सवादियों से निबटने का एलान किया- ‘बिहार सरकार भोजपुर और पटना जिले के सभी स्वस्थ व्यक्तियों को हथियारों से लैस करेगी।’
इसी वर्ष नक्सलवादी आंदोलन को कुचलने के लिए ‘आपरेशन थंडर’ शुरू किया गया। 1975 का वर्ष हरिजनों के लिए खून खराबे का वर्ष था। पुलिस ने किसानों की ठंडे दिमाग से हत्याएं की।’ सहार में हुई मुठभेड़ों ने रक्तपात की एक मिसाल कायम की। आपरेशन थंडर ने जनता के खून के प्यासे जवानों को भोजपुर के असंख्य गांवों की बस्तियों में घेराव और विनाश अभियान के लिए जिस तरह छुट्टा छोड़ा गया, वह बेमिसाल है।
इमर्जेन्सी और चुनाव के बाद तीन साल का काल ध्क्के से उबरे किसान आंदोलन को पुनः संगठित करने का मौका दे दिया। जेलों में बंद नक्सलवादी छोड़े गये। हालांकि दमन की घटनाएं पूर्वत थी। ‘बिहार में जमींदारों द्वारा भूमिहीनों की हत्या की घटना रोज अखबारों में छप रही हैं। हर रोज औसतन आठ से दस लोगों की हत्या होती है। इनमें से कम की खबर अखबारों के पास पहुंचती है। इध्रर तो अखबारों में कुछ छपने लगी है, इमर्जेंसी के पहले बहुत कम छपती थी, इमर्जेंसी में तो एकदम नहीं।’ 1977 के बाद हरिजनों पर अत्याचार की कई घटनाएं प्रकाश में आयीं और पत्रिकाओं में रपटें प्रकाशित हुई। पत्राकार अरुण सिन्हा ने इस दौर की पत्राकारिता के बारे में लिखा है कि संपादक और पत्राकार अध्किांशतः उच्च वर्ग तथा मध्यवर्ग से या सीधे शासक वर्ग से आते हैं। महानगरों में पत्रकारिता उच्च वर्ग के लोग ही करते हैं। जबकि बिहार जैसे सामंती राज्य में इस पेशे में बड़े भूपतियों के सुपुत्र भी हैं। यह सही है कि शहर में निम्न वर्ग के लोग भी पत्रकार हैं परंतु उनका चरित्र वही जो जमींदारों के लठैतों का होता है। समाजशास्त्राी और विश्लेषक योगेंद्र यादव की टीम द्वारा दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अखबारों के सर्वेक्षण में यह तथ्य अरुण सिन्हा की बातों को पुष्ट करते हैं- अखबारों का चरित्र कैसा है। यों इसके अनेक अपवाद भी हैं। पत्रकार भी हैं और अखबार भी जो अपनी भूमिका का निर्वहन आज भी शिद्दत के साथ कर रहे हैं।
बहरहाल, बिहार में 1985 के बाद इस नजरिए में परिवर्तन आया इसका मूल कारण यह था कि नए पत्रकारों की जमात उभरी। पत्रकारों की यह जमात जेपी आंदोलन अथवा नक्सलवादी आंदोलन की उपज थी। बड़े घरानों के अखबारों ने पटना से अपने संस्करण शुरू किए थे। 1986 से पटना से हिन्दुस्तान टाईम्स समूह का हिन्दुस्तान और टाईम्स समूह का नवभारत टाईम्स और टाईम्स आफ इंडिया का प्रकाशन शुरू हुआ। इसने परंपरागत पत्रकारिता को विचार के स्तर पर बदल कर रख दिया। छोटी पत्रिकाएं एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक भूमिका अदा कर ही रही थीं।
1990-2007
रेलमंत्री लालू प्रसाद और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आईआईएम में लैक्चर देने की खबरें खूब छपीं अखबारों में लगातार कई दिनों तक छपने वाली खबरों में इस का उल्लेख नहीं हुआ कि उन्होंने क्या पाठ पढ़ाया। लेकिन दूसरी तरफ बिहार से आईआईएम में लेक्चर देने वाले गणितज्ञ आनंद कुमार के बारे में सिपर्फ सूचना देकर अखबारों ने अपना काम खत्म मान लिया। उनकी संस्था आईजी अभयानंद के साथ मिल कर हर साल 25 से 30 बच्चों को मुफ्रत में कोचिंग करा कर आईआईटी भेजता है-जिसे सुपर 30 के नाम से जाना जाता है। टाटा मेमोरियल इंस्टीच्यूट में माले महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य लेक्चर देने जाते हैं तो अखबारों के लिए यह खबर नहीं बनती है। बाद में उनके द्वारा दिए गए लेक्चर को इक्नामिक पालिटिकल विकली ने छापा। अब इसे आप क्या कहेंगे। सूचना के अधिकार के जमाने में सूचना से दूर होते जा रहे हम।
वास्तव में प्रेस का अखबारों के पूंजीगत ढांचे में भारी परिवर्तन हुआ है। उनका व्यवसायिकरण हुआ है। दफ्रतरों में आधुनिक जमाने की सारी सुविधएं उपलब्ध् करा दी गई हैं। कम्प्यूटर और नेट का जमाना है। बिहार जैसे राज्य में मुजफ्रपफरपुर और भागलपुर से अखबारों के संस्करण छपने लगे हैं। इसे आप अखबारों की दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन कह सकते हैं। अखबारों के संस्करण निकलने से स्थानीयता का बोध् जरूर हावी हुआ है। लेकिन एक शहर की खबर दूसरे शहरों के संस्करणों में नहीं छपती। आप बिहार की राजधनी में बैठ कर यह पता नहीं लगा सकते कि चम्पारण में खेत मजदूर जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं और आज भी उनपर सामंती जुल्म हो रहा है। उस संस्करण में खबर छप गई तो छप गई। अगर बड़ी घटना हुई, गोली चली अथवा आंदोलन के दौरान कोई मारा गया तो हो सकता है कि खबर सभी संस्करणों में छप जाए।
सरकार और विज्ञापन नीति
बिहार में विज्ञापन नीति में परिवर्तन हुआ है। विज्ञापन नीति में परिवर्तन का अर्थ है कि सरकार विज्ञापनों के लिए अब केंद्रित व्यवस्था काम कर रही है। केंद्रित व्यवस्था का अर्थ यह है कि सरकार जिसे चाहेगी उसे विज्ञापन देगी। पहले विज्ञापन जिलों के सूचना विभाग के माध्यम से आता था। केंद्रित व्यवस्था के कारण सरकार ने अखबारों पर शिकंजा कस दिया है। विज्ञापन देना और रोकना अब मौखिक चलता है। अखबारों को नियंत्रित रखने का अच्छा हथियार बन गया है। इस हथियार का इस्तेमाल हो रहा है।
विज्ञापन की अघोषित नीति यह भी है कि किसी भी अखबार ने सरकार के खिलापफ छापा तो उसका विज्ञापन बंद कर दिया जाए। यह विज्ञापन अघोषित तौर पर बंद किया जाता है। बिहार से निकलने वाले अखबारों के पास इसके कई उदाहरण हैं। इस तरह का अघोषित प्रतिबंध् लगने के बाद अखबार के संपादक अथवा अखबार के व्यवस्थापकों की परेशानियां बढ़ जाती है। ऐसे मौकों पर दरबार में कई बार अखबार के व्यवस्थापक अथवा संपादक को हाजिरी बजानी पड़ी है। अखबारी दुनिया के जानकारों के पास इस तरह के अनगिनत किस्से हैं।
चुनाव, राजनीति, अखबार और बाजार
बिहार में पहली बार अखबारों ने खबरों की तरह विज्ञापन छापे। प्रत्याशियों ने अपने हिसाब से विज्ञापन दिए और अखबारों ने हू-ब-हू उसे प्रकाशित किया। यह बिहार की अखबारी दुनिया के लिए नई चीज रही। कुछ अखबारों ने प्रत्याशियों द्वारा प्रकाशित विज्ञापन को विज्ञापन लिखने की जहमत नहीं उठाई। कुछ अखबारों ने ऐसे विज्ञापनों को नहीं छापा और इसके खिलाफ अभियान भी चलाया।

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(श्रीकांत। वरिष्‍ठ पत्रकार।
जनमत से पत्रकारिता की शुरुआत। रविवार पत्रिका के लिए भी कई बार खोजी रपट की। 1986 से दैनिक हिंदुस्‍तान, पटना के विशेष संवाददाता। पत्रकारिता में विधिवत आने से पहले आरा की नाटक मंडली युवा नीति से भी जुड़े रहे और कई कहानियां भी लिखीं। प्रसन्‍न कुमार चौधरी के साथ मिल कर इन दिनों बिहार के अनलिखे इतिहास का दस्‍तावेजीकरण।)

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