गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

मिथक और यथार्थ, मीडिया के हाथ---------- रामशरण जोशी


यदि हम अपने समय को, उसके यथार्थ और मिथकों को किसी एक शब्द में परिभाषित करना चाहें, तो उसके लिए सबसे सटीक शब्द क्या होगा? पश्चिमी चिंतकों का सहारा लें तो थॉमस फ्रीडमैन इसे 'फ्लैट वर्ल्ड' का नाम देते हैं और इस दुनिया को चपटा-चौसर बनाने वाले तीन तत्वों की व्याख्या करते हैं। ये तीनों तत्व सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े हैं, लेकिन इसमें हम यदि सूचना को भी समाहित कर लें तो यथार्थ और मिथकों के बनने-बिगड़ने का खेल समझ में सकेगा। इसी विस्तारित विचार को अपने तरीके से रखते हैं वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी अपनी नई पुस्तक 'मीडिया, मिथ और समाज' में - जिसे पढ़ने के बाद हम जितना ज्यादा वैचारिक रूप से समृध्द होते हैं उतना ही इस बात से कन्विंस भी, कि हमारा समय बुनियादी रूप से मीडिया समय है। मीडिया ही वह केंद्रीय कारक है जो हमारे वक्त की पर्द-बेपर्द सचाइयों, मिथकों, कल्पना, व्यवहार, परिवार, समाज, काम-काज को नियंत्रित कर रहा है।


सूचना माध्यमों के बढ़ते महत्व के चलते आज समाज विज्ञान, मनोविज्ञान और कला-सौंदर्यशास्त्र के क्षेत्रों में इसके प्रभावों को अलग से समझने की कोशिश पश्चिम में जारी है। इस पर वहां काफी काम भी हुआ है, लेकिन हिंदी में इस तरह के प्रयत्न बहुत सीमित हैं। गिने-चुने दो-चार स्तम्भकारों या लेखकों की अखबारी समीक्षाओं को छोड़ दें तो मीडिया की घटनाओं पर गंभीर सामाजिक काम सिफर है। अनुवाद में भी रेमण्ड विलियम्स के अलावा किसी का कायदे का पाठ नहीं मिल पाता। इस लिहाज से यह पुस्तक इस मायने में अलग है कि पिछले कुछ वर्षों में मीडिया द्वारा 'ब्रेक' की गई बड़ी खबरों और 'स्टिंग ऑपरेशनों' का अद्यतन विश्लेषण हिंदी के एक पत्रकार द्वारा खुद किया गया है।
पुस्तक में लेखक द्वारा समय-समय पर लिखे गए लेख संग्रहित हैं और मलयेशिया में आयोजित एक सम्मेलन में पढ़े गए एक पर्चे का अनुवाद 'मीडिया, नागरिक समाज और उसकी चुनौतियां' शामिल है, जो पहला ही अध्याय है। अच्छी बात यह है कि लेखक ने हिंदी पत्रकारिता की पारम्परिक वीरगाथा मार्का मानसिकता को त्याग कर नए माध्यमों और चैनलों की नई प्रवृत्तियों को एक यथार्थ के बतौर स्वीकारा है। फिर यह विश्लेषण किया है कि खबरों से लेकर विज्ञापनों तक सब कुछ हमारे जीवन को कैसे बदल रहा है, 'अनुकूलित' कर रहा है और यथार्थ मिथक के बीच की विभाजक रेखा को धुंधला बना रहा है।


'हिंदी पत्रकारिता का द्वंद्व', 'आइए, हीन ग्रंथि से मुक्ति लें', 'अब चाहिए प्रोफेशनलिज्म', 'स्टिंग ऑपरेशनों की प्रासंगिकता', 'विज्ञापन कुंड में कुरु कुरु स्वाहा' जैसे लेख खासकर हिंदी पत्रकारिता परिदृश्य के प्रति एक अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। लेखक पारम्परिक मुहावरे 'साहित्य समाज का दर्पण है' को त्याग कर नया मुहावरा गढ़ता है 'कैमरा समाज का दर्पण है' उसके बावजूद कहीं से भी कैमरे को 'ग्लैमराइज'+ करने की चेष्टा नहीं दिखती। पुस्तक में तमाम उदाहरणों में लेखक के अपने अनुभव भी शामिल हैं, लेकिन कहीं-कहीं दुहराव के चलते आत्ममुग्धता साफ झलकती है।


जिस एक चीज़ की कमी पुस्तक में खटकती है वह है दुनिया भर में पत्रकारों पर हो रहे हमलों के प्रति चिंता और सरोकार, हालांकि एक अध्याय 'सवालों के घेरे में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' इसे छूता है, लेकिन मुहम्मद साहब के कार्टून वाले प्रकरण के विश्लेषण से आगे नहीं जा पाता। हाल ही में एक टीवी चैनल के पत्रकार पर बिहार के विधायक द्वारा किए गए हमले की चौतरफा निंदा हुई है। इससे पहले भी देहरादून में एक कवरेज के दौरान पत्रकारों को दमन का सामना करना पड़ा था। बर्मा में एक जापानी पत्रकार को सैन्य शासन के हाथों जान गंवानी पड़ी और आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले वर्ष दुनिया भर में 113 पत्रकार कवरेज के दौरान मारे गए, 871 को गिरफ्तार किया गया, 1472 पर शारीरिक हमले हुए, 56 का अपहरण कर लिया गया ओर 912 मीडिया संस्थानों को प्रतिबंधित कर दिया गया। ऐसी भयावह स्थिति में पत्रकारों पर हमलों के कारणों को इस पुस्तक में जगह मिल पाना सवाल खड़े करता है।


इसे इस रूप में समझा जा सकता है कि आम तौर पर मीडिया विश्लेषक और आलोचक वे लोग होते हैं जिन्हें आज के समय में 'न्यूज़रूम' में काम नहीं करना पड़ रहा। ज़ाहिर तौर पर पत्रकारों की संगठन के भीतर आंतरिक दुश्वारियों और फील्ड में दबावों का अनुभव उनका भोगा हुआ नहीं होता। इसी वजह से तमाम किस्म के बौध्दिक विश्लेषण करने के बावजूद पत्रकारिता की निजी सीमाओं, दायरों प्रतिबध्दताओं के बारे में सभी टिप्पणीकार चुप लगा जाते हैं। यह पुस्तक भी इस अर्थ में लेखक के अतीत के अनुभवों का ही खाका पेश करती है, चूंकि कॉरपोरेट पत्रकारिता के लिपिकीय चरित्र से वह खुद अपरिचित रहे हैं।


इसके अलावा पुस्तक में सम्पादन की पर्याप्त गलतियां भी हैं जो कहीं-कहीं पढ़ने में बाधा पैदा करती हैं। किन्हीं स्थानों पर भाषा पर अनुवाद का असर दिखाई देता है और 'सनसनीखेजीकरण' जैसे कुछ शब्द परेशान भी करते हैं। इसके बावजूद पिछले दिनों पत्रकारिता पर आई तमाम अकादमिक या कहें लगभग स्कूली पुस्तकों की तुलना में 'मीडिया, मिथ और समाज' एक गंभीर पुस्तक है और मीडियाकर्मियों को इसे एक बार पढ़ जाना चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि पत्रकारिता भले ही खांटी व्यावहारिक पेशा हो, लेकिन अक्सर इस पेशे में कुछ अदृश्य वैश्विक सांस्थानिक ताकतें काम कर रही होती हैं जिनके चलते हम अपनी क्षमताओं, प्रतिबध्दताओं और असंतोष को महीने की पहली तारीख तक जेब में दफ्न कर देते हैं।


- अभिषेक श्रीवास्तव


पुस्तक: मीडिया मिथ और समाज, लेखक: रामशरण जोशी,प्रकाशन: शिल्पायन प्रकाशन,दिल्ली-32,मूल्य: 200 रु.
Posted 17th June 2011 by समीक्षा

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