बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

रेडियो समाचार






रेडियो समाचार की प्रकृति                समाचार-पत्र एवं पत्रिकाओं में प्रयुक्त होने वाले समाचार विलोम सतूप प्रकृति के तथा रेडियो के लिए पहलदार हीरे के समान होते हैं। यह प्रकृति समाचार के मूल तत्व को प्रभावी बनाती है।  रेडियो के लिए समाचार लिखते समय सर्वप्रथम षीर्ष पक्तिया देकर मुख्य विवरण और फिर संवाद का वर्णन किया जाता है। अल्प महत्व एवं साधारण विवरण हेतु रेडियो में समय प्रदान करने का     प्रावधान नहीं है। समाचार-पत्रों में मुख्य विवरण को इंट्रों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसके बाद विस्तृत विवरण तथा अन्य कम महत्व को विवरण समाचार की गुणवत्ता, उसका मूल्यांकन तथा स्थान की उपलब्धता को देखते हुए दिया जाता है।  एक अच्छे रेडियो संवाददाता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह समाचारों, संबंधित तथ्यों व आँकड़ों की षुद्धता, सत्यता तथा विष्वसनीयता के प्रति स्वयं आष्वस्त हो लें। उसके बाद ही समाचार को सतर्कतापूर्वक प्रेषित करना चाहिए, क्योंकि कोई भी छोटी सी भूल एक ओर जहाँ संवाददाता की बनी-बनाई प्रतिष्ठा को बट्टा लगा सकती है, वहीं दूसरी ओर इस तरह की खामियों से रेडियो प्रतिष्ठान की छवि प्रभावित होने का खतरा भी बना रहता है। यहाँ यह भी ध्यान रखना आवष्यक है कि समाचार-पत्र दिन में एक बार प्रकाषित होता हैा, परंतु रेडियो द्वारा समाचार प्रायः आधा या एक घंटे की अवधि के उपरांत क्रमषः प्रसारित होते रहते हैं। इस बसके चलते यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि किसी घटना विषेष अथवा विषिष्ट आयोजन से संबंधित दी जानेवाली जानकारियों में त्वरित नवीनता बनी रहे। इसके लिए संवाददाताओं से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे किसी भी मामले की निरंतर ताजा व नवीन जानकारियों से रेडियो स्टेषन को सूचित कराते रहें।
 विपरीत परिस्थितियों एवं प्रतिकूल समय में कार्य करते हुए भी एक अच्छे रेडियो संवाददाता को किसी भी तरह की गलती करने की छूट नहीं होती। तत्काल वास्तविक समाचार प्रेषित करना निरंतर अभ्यास से संभव हो पाता है। एक रेडियो संवाददाता समाचार लिखने के तुरंत बाद बुलेटिन प्रसारित होने वाले स्थान अथवा न्यूज-रूम तक उसे बिना किसी विलंब के प्रेषित करता है। वहाँ क्रम व महत्व के अनुसार समाचार को चयनित करके संबंधित बुलेटिन में षामिल किया जाता है। तथ्यों की सत्यता एवं विवरण की विष्वसनीयता को परखने के लिए अन्य माध्यमों के संवाददाता की भांति रेडियो संवाददाता को भी विभिन्न स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसका एक आसान उपाय यह भी है कि संवाददाता को जब किसी घटना की जानकारी अथवा विवरण का पता चलता है तो उसे उसकी सत्यता को परखे बिना रिपोर्ट नहीं करना चाहिए। इसको जांचने का एक तरीका यह भी है कि अन्य   संबंधित स्रोतों से पूछताछ कर लिया जाए। इस सबका एक ही प्रयोजन है कि श्रोताओं को मिलने वाले समाचार पूर्णतः सत्य एवं सही हों।  एक रेडियो संवाददाता को अपने समाचार में स्रोत का उल्लेख करना उपयोगी रहता है। मसलन किसी दुर्घटना के समाचार में वह लिख सकता है कि ‘आगरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के अनुसार इस बस दुर्घटना में 10 लोगों की मृत्यु हो गई, जबकि 25 के करीब घायल हुए हैं।’ यही नहीं, तथ्यात्मक विवरण में संबंधित जिम्मेदार अधिकारी अथवा व्यक्ति के नाम का उल्लेख करना उचित रहता है। जैसे-‘भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता के अनुसार उनकी पार्टी कांग्रेस सरकार की वित्तीय नीतियों का खुलकर विरोध करेगी।  रेडियो संवाददाता को ‘अपुष्ट सूत्रों के अनुसार’ अथवा ‘समझा जाता है’ या ‘ऐसा होना चाहिए’ आदि ष्षब्दों से पूर्णतः बचना चाहिए। इस तरह के ष्षब्दों का चलन प्रिंट माध्यमों में तो एक हद तक हो सकता है, परंतु रेडियो के लिए ये सर्वथा त्याज्य है। रेडियो संवाददाता को एक सूत्र पर हमेषा अमल करना चाहिए कि वह अपने समाचार में अधिकाधिक प्रामाणिक व विष्वसनीय तथ्य किस भांति प्रस्तुत कर सकता है।  एक रेडियो संवाददाता को ‘डेड लाइन’ का सदैव ध्यान रखना ध्यान रखना पड़ता है। डेड लाइन से मतलब है कि समाचार भेजे जाने का अधिकतम अंतिम समय। उदाहरणार्थ, यदि एक संवाददाता को षाम को आठ बजे प्रसारित होने वाले न्यूज बुलेटिन में अपने भेजे गए समाचार को ष्षमिल करवाना है तो उसे संबंधित समाचार संपादक की कार्य-षैली व सीमाओं को देखते हुए समय से काफी पहले ही समाचार भेजने की प्रक्रिया को अंजाम देना चाहिए। डेस्क पर काम करने वाले संपादकीय सहयोगियों को समय से पूर्व मिले समाचारों में उसकी जरूरत के मुताबिक काट-छांट करने अथवा उसमें पर्याप्त संषोधन-संपादन करने का अवसर मिल जाता है। इससे समाचार की प्रामाणिकता भी पुष्ट होती है और माध्यम की विष्वसनीयता भी बनी रहती है। यही नहीं, गुणवत्ता के अनुरूप समाचार की जाँच पड़ताल के लिए भी पर्याप्त समय मिल जाता है। रेडियो संवाददाता को अंतिम परिणाम आने तक समाचार  को नहीं रोकना चाहिए।
आल इंडिया रेडियो प्रसारण कोड
कोई भी प्रसारण निरपेक्ष स्वतंत्रता में काम नहीं कर सकता। उसे स्वतंत्रता के प्रयोग में कुछ सावधानियाँ बरतनी पड़ती हैं ताकि दूसरों की स्वतंत्रता का हनन न हो। आकाषवाणी प्रसारण के लिए कुछ निष्चित सीमाओं का निर्धारण किया गया है। जिसे एआईआर कोड के नाम से जाना जाता है। किसी भी प्रसारण में निम्न बातों की अनुमति नहीं दी जाती है-
1. किसी भी मित्र देश की आलोचना
2. किसी धर्म या समुदाय पर आक्षेप
3. अश्लील एवं अपमानजनक बातें
4. षांति व्यवस्था को भंग या हिंसा को प्रेरित करने वाली बातें
5. न्यायालय के लिए अनादर सूचक बातें
6. राष्ट्रपति, न्यायालय या राज्यपाल की प्रतिष्ठा पर विपरीत प्रभाव डालने वाली बातें।
7. किसी राजनीतिक दल या पार्टी पर आच्छेप
8. केन्द्र तथा राज्यों की अनुचित आलोचना
9. संविधान या जाति विषेष का अनादर


रेडियो कार्यक्रम के प्रकार
आकाषवाणी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जाता है।
1. समाचार
2. संगीत
3. उच्चरित शब्द
समाचारसमाचार प्रसारण का कार्य अभी तक एकमात्र आकाषवाणी द्वारा किया जाता है। अलग-अलग अवधि के बुलेटिन नियमित अन्तराल पर 24 घण्टे लगातार प्रसारित किए जाते हैं।  आकाशवाणी के प्रसारण में संगीत कार्यक्रमों का प्रमुख स्थान हो। अन्य कई नये साधनों के आने के बावजूद संगीत के लिए शहरों तथा दूर-दराज के क्षेत्रों में रेडियो के प्रसारण सुने जाते हैं। आकाशवाणी द्वारा शास्त्रीय, सुगम, लोक-संगीत भक्ति संगीत तथा देशभक्ति गीत आदि का नियमित प्रसारण किया जाता है।
 उच्चरित शब्द (स्पोकन वर्ड) के अन्तर्गत वार्ताएं, परिचर्चा, साक्षात्कार, कविता, कहानी, नाटक, रूपक आदि आते हैं। वार्ता, परिचर्चा, नाटक तथा कुछ अन्य कार्यक्रम निर्धारित आवृति पर दिल्ली केन्द्र से अखिल भारतीय स्तर पर प्रसारित किए जाते हैं। अर्थात् इनका प्रसारण दिल्ली केन्द्र से होता है तथा अन्य केन्द्र इसे रिले करते हैं। इसके अन्तर्गत प्रसारित अधिकांश कार्यक्रम केन्द्रीय एकांश द्वारा तथा कुछ क्षेत्रीय केन्द्रों द्वारा पे्रषित होते हैं।  इन कार्यक्रमों के अतिरिक्त प्रत्येक केन्द्र अपने कार्यक्रमों की योजना एवं निर्माण स्वयं करता है। कार्यक्रम योजना एवं निर्माण की इस विकेन्द्रित व्यवस्था के कारण क्षेत्रीय आवष्यकताओं, महिलाओं, बच्चों एवं युवाओं के लिए कार्यक्रम आकाषवाणी के सभी केन्द्रों द्वारा प्रसारित किए जाते हैं।
         युवाओं के लिए विषेष रूप से होने वाला युववाणी कार्यक्रम जुलाई 1969 में षुरू हुआ। युववाणी पन्द्रह से तीस वर्ष की आयु वर्ग को एक मंच प्रदान करता है। उनकी समस्याएँ, रचनात्मक प्रतिभा, विभिन्न विषयों पर उनके दृष्टिकोण को सामने लाने का यह एक माध्यम है। इसके अन्तर्गत परिचर्चा, इंटरव्यू परिसंवाद, प्रष्नोत्तरी, रचनात्मक लेखन तथा स्थल ध्वन्यांकन के कार्यक्रम किए जाते हैं। युववाणी कार्यक्रम सभी केन्द्रों से प्रसारित होता है। दिल्ली, कलकत्ता, हैदराबाद, जम्मू, श्रीनगर केन्द्र पर अलग युववाणी चैनल हैं।  वरिष्ठ नागरिकों के लिए सत्रह प्रमुख आकाषवाणी केन्द्रों से 30 मिनट का कार्यक्रम प्रति सप्ताह प्रसारित किया जाता है। श्रमिकों के लिए विषेष कार्यक्रम का प्रसारण चालीस केन्द्रों से किया जाता है। इसकी आवृति तथा अवधि हर केन्द्र पर अलग-अलग है। कुछ केन्द्रों पर यह प्रतिदिन तथा कुछ पर सप्ताह के कुछ निष्चित दिनों में प्रसारित होता है।
 खेलों को लोकप्रिय बनाने में आकाषवाणी की महत्वपूर्ण भूमिका  रही है। अंतर्राष्ट्रीय तथा महत्वपूर्ण क्षेत्रीय खेल गतिविधियाँ प्रत्येक समाचार बुलेटिन में षमिल रहती हैं। आकाषवाणी से प्रतिदिन खेल समाचार का एक बुलेटिन प्रसारित किया जाता है।
            खेल पत्रिका कार्यक्रम प्रायः सभी केन्द्रों पर प्रसारित किया जाता है। आकषवाणी से महत्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्पर्धाओं का आँखों देखा हाल प्रसारित किया जाता है। आम लोगों में खेलों के प्रति रूचि जगाने में इन कार्यक्रमों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।  श्रोताओं की कार्यक्रम में प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ाने के लिए आकाषवाणी ने अपनी प्रसारण सेवा में कई नए आयाम जोड़े हैं। आकाषवाणी के कई केन्द्रों से जनमंच श्रेणी के कार्यक्रम किए जाते हैं। इनकी रिकार्डिंग केन्द्र पर की जाती है, जहाँ सम्बन्धित अधिकारी तथा सीमित संख्या में लोग आमन्त्रित रहते हैं। वे सम्बन्धित अधिकारी से प्रश्न करते हैं।  कई बार ये कार्यक्रम स्थल ध्वन्यांकन पर आधारित होते हैं। तकनीकी विकास के कारण अब इस श्रेणी के कार्यक्रमों में फोन-इन कार्यक्रम जुड़ गया है। आकाषवाणी में फोन-इन के अंतर्गत समस्या आधारित तथा मनोरंजन आधारित, दोनों तरह के कार्यक्रम प्रसारित हो रहे हैं।  आकाषवाणी द्वारा रेडियो ब्रिज कार्यक्र.म भी किए जाते रहे हैं। इसके अन्तर्गत आकाषवाणी के विभिन्न केन्द्रों का आपसी सम्पर्क स्थापित हो जाता है तथा ये सभी एक-दूसरे से संवाद करते हुए कार्यक्रम में भाग ले सकते हैं। आकाषवाणी के बीस केन्द्रों पर अपलिंकिंग की सुविधा उपलब्ध है।
संगीतसंगीत के विकास में आकाषवाणी का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे कलाकारों को पहले रियासतों-रजवाड़ों का संरक्षण प्राप्त हुआ करता था। रेडियो प्रसारण की षुरूआत ने संगीत से जुड़े कलाकारों के लिए अवसरों का एक नया संसार खोल दिया। इससे पहले सीमित संख्या में ही कलाकार अपनी कला के सार्वजनिक प्रदर्षन तथा मान्यता का अवसर पाते थे।
 आकाषवाणी ने ष्षास्त्रीय, सुगम तथा लोक-संगीत के कलाकरों को अपनी प्रतिभा प्रदर्षन तथा लाखों लोगों तक पहुंचने का एक मंच प्रदान किया। देष की संगीत धरोहर ने एक जीवन्त संग्रह का रूप ले लिया। आकाषवाणी के श्रव्य अभिलेखागार में हर तरह के संगीत का एक बड़ा संग्रह है। इसमें देष के सभी बड़े कलाकारों की रेकाॅर्डिंग्स उपलब्ध है। आकाषवाणी के माध्यम से सामान्य जन को अत्यन्त उत्कृष्ट कोटि के कलाकारों को सहजता से सुनने का अवसर प्राप्त हुआ।  सामान्य जन की संगीत रूचि को परिष्कृत करने तथा षास्त्रीय संगीत में लोगों की रुचि बढ़ाने में आकाषवाणी की महती भूमिका रही है। आकाषवाणी के प्रसारण में 32 प्रतिषत समय संगीत के लिए निष्चित है।  जुलाई 1952 में संगीत के अखिल भारतीय कार्यक्रम तथा रविवार को रविवासरीय अखिल भारतीय संगीत सभा का प्रसारण किया जाता है। इसके अंतर्गत देष के ख्याति प्राप्त कलाकारों का गायन सुनने का अवसर श्रोताओं को प्राप्त होता है।  आकाषवाणी प्रतिवर्ष आमन्त्रित श्रोताओं के समक्ष आकाषवाणी संगीत सम्मेलन का आयोजन करती है। इसमें षास्त्रीय संगीत के प्रतिष्ठित कलाकार आमन्त्रित रहते हैं। इन कार्यक्रमों की रिकार्डिंग अखिल भारतीय स्तर पर प्रसारित की जाती हैं।
        देश के तीन प्रमुख संगीत समारोह- हरिदास, त्यागराज तथा तानसेन को आकाषवाणी द्वारा रिकार्ड किया जाता है तथा इसका प्रसारण राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर किया जाता है।  आकाषवाणी ने लोक-संगीत के संरक्षण तथा प्रोत्साहन की दिषा में बहुत योगदान दिया है। अखिल भारतीय स्तर पर क्षेत्रीय तथा सुगम संगीत का एक कार्यक्र प्रति ब्रहस्पतिवार प्रसारित किया जाता है।  आकाषवाणी का प्रत्येक केन्द्र अपने क्षेत्र के लोक-संगीत की रिकाॅर्डिंग नियमित रूप से करता है। इससे स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन तथा संरक्षण मिलता है। सुगम तथा षास्त्रीय संगीत की रिकार्डिंग भी प्रायः सभी प्रमुख केन्द्रों पर की जाती है।
 शास्त्रीय, सुगम तथा लोक-संगीत के कलाकारों का पैनल बनाने के लिए प्रसारण केन्द्र स्वयं परीक्षा का आयोजन थोड़े-थोड़े अनतराल पर करते रहते हैं। आकाषवाणी ने इस क्षेत्र में एक निष्चित स्तर कायम रखा है, अतएव इस स्वर-परीक्षा का लाभ कलाकारों को अन्य स्थानों में मान्यता के रूप में भी मिलता है। भक्ति-संगीत में एक महत्वपूर्ण योगदान आकाषवाणी द्वारा मानस गान का प्रसारण है। यह प्रसारण बड़ी संख्या में सुना जाता है।  राष्ट्रीय एकता की भावना को प्रोत्साहित करने के लिए आकाषवाणी से सामुदायिक गान का कार्यक्रम आरम्भ किया गया। इसके अन्तर्गत देष की सभी प्रमुख भाषाओं में समूह गान तैयार किए गए। इनका प्रसारण आकाषवाणी के सभी केन्द्रों द्वारा पाठ सहित किया गया।  आकाषवाणी के सभी बड़े केन्द्रों पर नियमित स्टाफ में संगीत के कलाकार रखे गए हैं। इनमें वादक, संगीतकार आदि हैं। दिल्ली तथा चेन्नई में आकाषवाणी के अपने अलग वाद्यवृन्द समूह (आरकेस्ट्रा ग्रुप) हैं।  हिन्दुस्तानी तथा कर्नाटक षैली, उपषास्त्रीय, सुगम संगीत, जनजातीय तथा लोक-संगीत को अपने प्रसारण का अभिन्न अंग बनाकर आकाषवाणी के कारण सुदूर क्षेत्रों में रहनेवाले कलाकरों को प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर मिलता है।

1 टिप्पणी:

  1. आपका यह लेख हमारे लिए उपयोगी साबित हुआ धन्यवाद

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