शनिवार, 9 जुलाई 2011

एक आईएएस की करतूत से पत्रकारिता के छात्रों का भविष्‍य अधर में!

Written by NewsDesk Category: सियासत-ताकत-राजकाज-देश-प्रदेश-दुनिया-समाज-सरोकार Published on 18 June 2011
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अजमेर : शिक्षाविद की जगह आईएएस अधिकारी को अजमेर के महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय का कुलपति पद सौंपे जाने का खामियाजा पत्रकारिता के विद्यार्थियों को भुगतने की नौबत आ रही है। उन्हें पढ़ाने के लिए आज एक भी शिक्षक उपलब्ध नहीं है। भविष्य में भी उपलब्ध हो पाएगा या नहीं कहा नहीं जा सकता! अजमेर के महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के कुलपति भागीरथ सिंह की सेवानिवृति के बाद अशोक गहलोत सरकार ने अजमेर के संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा को कुलपति का अतिरिक्त कार्यभार सौंप दिया। शर्मा ने कुलपति की हैसियत से पत्रकारिता विभाग के लिए एक नया नियम लागू कर दिया जिसके चलते अब वहां यूजीसी की पात्रता रखने वाले शिक्षक ही अध्यापन करवा सकते हैं। अब तक वहां गेस्ट फैकल्टी से काम चलाया जा रहा था।
सन 2008 से विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के कोर्स एमजेएमसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशंस)  की शुरुआत की गई थी। राजस्थान में काफी लंबे समय तक पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा का अभाव रहा। वर्षों तक राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से एक वर्षीय पत्रकारिता के पत्राचार डिप्लोमा की सुविधा थी। इस डिप्लोमा के आधार पर कई लोग सरकार के जनसंपर्क या प्रचार अधिकारी की नौकरी कर रहे हैं। कोटा खुला विश्वविद्यालय ने बीजेएमसी और एमजेएमसी की डिग्री शुरू की तब पत्रकारिता में अध्ययन का विकल्प मिला और इसके प्रति रूझान भी बढ़ा। यही वजह है कि आज भी राजस्थान में पत्रकारिता के शिक्षकों की कमी है। ज्यादातर जगहों पर एमजेएमसी किए पत्रकार ही विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में भी मुख्य रूप से राजेंद्र गुंजल अध्यापन से जुड़े थे। जनसत्ता, राजस्थान पत्रिका और नवज्योति में पत्रकारिता के साथ उन्हें अध्यापन का भी खासा अनुभव है।

संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा के आदेश के बाद गुंजल और बाकी अन्य को जवाब दे दिया गया है। विश्वविद्यालय के सामने अब संकट यह है कि यूजीसी की पात्रता रखने वाले शिक्षक लाए कहां से? यूजीसी की पात्रता में एमजेएमसी और यूजीसी की नेट परीक्षा उत्तीर्ण होना आवश्यक है। पत्रकारिता शिक्षा में राजस्थान में अवसर इतने सीमित हैं कि कोई भी पहले स्नातक, फिर बीजेएमसी, उसके बाद एमजेएमसी यानी छह साल की कॉलेज पढ़ाई और फिर नेट परीक्षा के भरोसे जीवन यापन की सोच भी नहीं सकता। अजमेर में ऐसा योग्यताधारी लगभग नहीं है। विश्वविद्यालय अब जयपुर का मुंह ताक रहा है कि वहां से कुछ ऐसे बंदे मिल जाएं जो अजमेर आकर एमजेएमसी प्रीवियस के बीस और फाइनल के बीस यानि कुल चालीस विद्यार्थियों को करीब दस विषयों का अध्ययन करवाकर उनके भविष्य की बागडोर थाम सकें। 

दो दिलचस्प पहलुओं के जिक्र के बगैर खबर अधूरी रहेगी। पहला- विश्वविद्यालय में भी कोई शिक्षक पत्रकारिता के लिए यूजीसी पात्रता नहीं रखता। डॉ. शिवप्रसाद को पत्रकारिता विभाग का प्रमुख बनाया हुआ है जो स्वयं मैनेजमेंट विभाग से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने चूंकि पत्रकारिता की डिग्रियां भी ली हुई है इसलिए उन्हें मैनेजमेंट में अध्यापन के अतिरिक्त पत्रकारिता विभाग के प्रमुख की जिम्मेदारी भी दे दी गई है। दूसरा-विश्वविद्यालय अपने मौजूदा शिक्षकों को दो सौ रूपए प्रति लेक्चर और पचास रूपए वाहन भत्ता देता है। इतने कम मानदेय पर जयपुर या कहीं और से कौन आएगा, कहा नहीं जा सकता।
राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट

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