मंगलवार, 12 जुलाई 2011

नया ज्ञानोदय--



बेव़फाई का सुपर धमाका

हिंदी साहित्य में रवींद्र कालिया की ख्याति उपन्यासकार, कहानीकार और संस्मरण लेखक के अलावा एक ऐसे बेहतरीन संपादक के रूप में भी है, जो लगभग मृतप्राय: पत्रिकाओं में भी जान फूंक देते हैं. रवींद्र कालिया हिंदी के उन गिने-चुने संपादकों में से एक हैं, जिन्हें पाठकों की नब्ज़ और बाज़ार का खेल दोनों का पता है. धर्मयुग में जब रवींद्र कालिया थे तो पत्रिका के तेवर और कलेवर में उनका भी योगदान था. लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है कि हर बड़ी जीत का सेहरा टीम के कप्तान के सिर बंधता है. बाद के दिनों में जब कालिया जी की धर्मवीर भारती से खटपट हुई तो वह लौट कर इलाहाबाद चले आए. यह वही दौर था, जब कालिया जी ने काला रजिस्टर लिखा था. इलाहाबाद लौट कर रवींद्र कालिया ने जब गंगा-जमुना निकाला तो उसने भी साहित्य जगत में धूम मचा दी थी. हिंदी के पाठकों को 1991 में निकले वर्तमान साहित्य के दो कहानी महाविशेषांक अब भी याद होंगे. वर्तमान साहित्य के दो भारी-भरकम अंक अप्रैल और मई 1991 में प्रकाशित हुए थे. उस दौर में मैं कॉलेज का छात्र था और मुझे याद है कि जमालपुर के व्हीलर के स्टॉल चलाने वाले पांडे जी ने हमें वर्तमान साहित्य के वे अंक चुपके से इस तरह सौंपे थे, जैसे कोई बेहद क़ीमती चीज छुपाकर देता हो. उस व़क्त मुझे अजीब लगा था. कई दिनों बाद जब मैंने पांडे जी से पूछा तो उन्होंने बताया था कि उक्त अंकों की दस ही प्रतियां आई थीं और साहित्यानुरागी पांडे जी के मुताबिक़ उसके ज़्यादा ख़रीदार हो सकते थे. सो उन्होंने अपने चुनिंदा ग्राहकों को छुपाकर वर्तमान साहित्य का कहानी महाविशेषांक दिया था. यह हिंदी में पहली बार हुआ था, जब किसी भी विशेषांक को महाविशेषांक बताया गया हो. जैसा कि मैं ऊपर कह चुका हूं कि कालिया जी को पाठकों की रुचि के साथ-साथ बाज़ार की भी समझ है. वर्तमान साहित्य से पहले इस तरह का आयोजन 1958-60 में कहानी पत्रिका ने किया था, जिसके संपादक श्रीपत राय थे. कहानी के उन अंकों में अमरकांत की डिप्टी कलेक्टरी, कमलेश्वर की राजा निरवंसिया, मार्कंडेय की हंसा जाई अकेला जैसी बेहद प्रसिद्ध रचनाएं छपी थीं.
जब रवींद्र कालिया वागर्थ के संपादक होकर कोलकाता गए तो उन्होंने भारतीय भाषा परिषद की उस दम तोड़ती पत्रिका को भी न केवल खड़ा कर दिया, बल्कि हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में लाकर उसे एक अहम पत्रिका बना दिया. वागर्थ का संपादन छोड़कर जब वह नया ज्ञानोदय आए तो इस पत्रिका का हाल भी बेहाल था और साहित्य के  नाम पर बेहद ठंडी और विचारोत्तेजक सामग्री के अभाव में ज्ञानोदय एक सेठाश्रयी पत्रिका बनकर रह गई थी, जो इसलिए निकल पा रही थी, क्योंकि उसका प्रकाशन टाइम्स जैसे बड़े ग्रुप से हो रहा था.
यही बात वर्तमान साहित्य के कहानी महाविशेषांक के साथ भी हुई. कालिया जी ने उन दो अंकों में लगभग संपूर्ण हिंदी साहित्य को समेट कर रख दिया था. कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ए लड़की वर्तमान साहित्य के उस महाविशेषांक में ही छपी थी. बाद में स्पीड पोस्ट में उस पर तीन गंभीर टिप्पणियां छपने से कहानी को ख़ासी चर्चा मिली. बाद में यह उपन्यास के रूप में स्वतंत्र रूप से प्रकाशित हुई. साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त मशहूर लेखिका अलका सरावगी की पहली कहानी आपकी हंसी भी वर्तमान साहित्य के महाविशेषांक में ही प्रकाशित हुई थी. उस अंक में उपेंद्र नाथ अश्क का एक बेहद धमाकेदार लेख-महिला कथा लेखन की अर्धशती भी प्रकाशित हुआ था. किसी भी संपादक की दृष्टि पत्रिका को एक ऊंचाई देती है और कालिया ने इसे एक बार नहीं, कई बार साबित किया.
जब रवींद्र कालिया वागर्थ के संपादक होकर कोलकाता गए तो उन्होंने भारतीय भाषा परिषद की उस दम तोड़ती पत्रिका को भी न केवल खड़ा कर दिया, बल्कि हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में लाकर उसे एक अहम पत्रिका बना दिया. वागर्थ का संपादन छोड़कर जब वह नया ज्ञानोदय आए तो इस पत्रिका का हाल भी बेहाल था और साहित्य के  नाम पर बेहद ठंडी और विचारोत्तेजक सामग्री के अभाव में ज्ञानोदय एक सेठाश्रयी पत्रिका बनकर रह गई थी, जो इसलिए निकल पा रही थी, क्योंकि उसका प्रकाशन टाइम्स जैसे बड़े ग्रुप से हो रहा था. लेकिन कालिया ने संपादक का दायित्व संभालते ही ज्ञानोदय को हिंदी साहित्य की अनिवार्य पत्रिका बना दिया. रवींद्र कालिया के ज्ञानोदय के संपादक बनने के पहले हंस और उसके संपादक राजेंद्र यादव समकालीन हिंदी साहित्य का एजेंडा सेट किया करते थे, लेकिन जब मई 2007 में कालिया के संपादन में युवा पीढ़ी विशेषांक निकला तो पहली बार ऐसा लगा कि हंस के अलावा कोई और पत्रिका है, जो साहित्य का एजेंडा सेट कर सकती है. संपादक ने दावा किया कि 2007 में छपे युवा पीढ़ी विशेषांक की मांग इतनी ज़्यादा हुई थी कि उसे पुनर्मुद्रित करना पड़ा था. नया ज्ञानोदय के उक्त अंक को लेकर उस व़क्त अच्छा खासा बवाल भी मचा था, लेकिन आख़िरकार रचना ही बची रहती है, सो उस अंक का एक स्थायी महत्व बना रहा. उन्होंने धीरे-धीरे पहले नवलेखन अंकों से कहानीकारों की एक नई फौज़ खड़ी कर दी. उसके बाद चार लगातार अंकों में प्रेम विशेषांक निकाल कर बिक्री के भी सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले. संपादक के दावे के मुताबिक़, प्रेम विशेषांकों की कड़ी के पहले अंक को पाठकों की मांग पर कई बार प्रकाशित करना पड़ रहा है. आज जब हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक पाठकों की कमी और बिक्री न होने का रोना रो रहे हैं, ऐसे में कालिया का यह दावा एक सुखद आश्चर्य की तरह है.
अब कालिया जी ने नया ज्ञानोदय का बेव़फाई सुपर विशेषांक-1 निकाला है. कहानी महाविशेषांक वह पहले ही निकाल चुके हैं. पाठकों को हर बार कोई नई चीज देनी होती है, लिहाज़ा अब सुपर विशेषांक. संपादकीय की पहली ही लाइन है, अगर व़फा का अस्तित्व न होता तो बेव़फाई नहीं होती. कई शायरों के मा़र्फत भी कालिया जी ने बेव़फाई को परिभाषित किया है. तक़रीबन सवा दौ सौ पन्नों के इस महाविशेषांक में वह हर रचना मौजूद है, जो पाठकों को न केवल बांधे रखेगी, बल्कि उसकी साहित्यिक व़फा को और मज़बूत करेगी. इस विशेषांक में प्रेमचंद, मंटो, इस्मत चुगताई से लेकर ओ हेनरी, मोपासां, हेमिंग्वे तक मौजूद हैं. बेव़फाई पर गुलज़ार ने जब ज्ञानोदय के संपादक को अपनी नज़्में भेजी तो लिखा, जनाब रवींद्र कालिया साहब. बे-पर कुछ नज़्में. मेरे यहां कुछ इल्ज़ाम और गिले-शिकवे नहीं हैं. मेरा ख्याल है, वह बे-भी नहीं. बस अलग हो गए. बे-कैसी. नज़्में ज़्यादा हैं, ताकि आप कुछ रद्द कर सकें. बे-को बस अलग हो गए मानने वाले गुलज़ार की नज़्म देखिए, और तुम ऐसे गई जैसे/कि बिजली चली जाए अचानक जैसे/मुझको/कमरे में बहुत देर तलक कुछ भी दिखाई नहीं दिया/तारीक़ी से मानूस हुई तो…फिर से दरवाजे का खाका सा नज़र आया.
स़िर्फ गुलज़ार ही नहीं, बेव़फाई पर बशीर बद्र की नज़्में भी बेहतरीन हैं. इसके अलावा विदेशी उपन्यासों, मीडिया, फिल्मों और इंटरनेट की बेव़फाइयों पर भी अहम लेख हैं. कुल मिलाकर यह अंक पठनीय तो है ही, संग्रहणीय भी है. बेव़फाई सुपर विशेषांक-2 का भी ऐलान है, जिसमें नोवोकोब का प्रसिद्ध उपन्यास लोलिता भी प्रकाश्य है. आख़िरकार लोलिता भी तो अंत में बेव़फाई पर ही ख़त्म होती है. कालिया जी का यह प्रयोग क़ाबिले तारी़फ है.

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