रविवार, 10 जुलाई 2011

मीडिया के दलाल और ए.राजा, टाटा, अंबानी और नीरा राडिया


लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर लोकसभा में झारखंड के गोड्डा के एक युवा सांसद निशिकांत दुबे ने आम बजट परिचर्चा में भाग लेते हुए सरकार की ओर ज्वलंत सवालों के कई गोले दनादन एक साथ दाग दिए तो एकबारगी पूरा सत्तापक्ष भी सन्न रह गया था. भाजपा के इस युवा सांसद ने सरकार से पूछा कि एक टेप आया है, एक पीआर एजेंसी के बारे में. इस टेप में देश के बड़े उद्योगपतियों से लेकर सरकार तक का ज़िक्र है कि कैसे केंद्र सरकार के मंत्री, प्रधानमंत्री नहीं, अपितु बाहर के लॉबिस्ट तय कर रहे हैं. दुबे स्पष्ट करते हैं कि इसी टेप को आधार बनाकर जब डायरेक्टर इंवेस्टीगेशन दिल्ली को गोपनीय काग़ज़ात भेजे जाते हैं तो वे लीक हो जाते हैं और आनन-फानन में सरकार डायेक्टर इंवेस्टीगेशन को बदल देती है तथा यह तय करती है कि अब इस मामले को एसेसमेंट अफसर नहीं, अपितु सेटलमेंट कमीशन तय करेगा. और, सबको मालूम है कि सेटलमेंट कमीशन में सरकार के कृपापात्र सेवानिवृत्त अफसरों की बहाली होती है.
जब मधु कोड़ा झारखंड के मुख्यमंत्री थे तो रतन टाटा झारखंड सरकार के साथ अपने खनन लीज अनुबंध को आगे बढ़ाना चाहते थे और इस कार्य को पूरा करने के लिए टाटा ने राडिया का चुनाव किया. और, समझा जाता है कि टाटा ने राडिया के मा़र्फत मधु कोड़ा को तब 180 करोड़ रुपये का भुगतान किया और इस पूरे कार्य में राडिया की फीस क्या थी, इसका अभी खुलासा नहीं हो पाया है. पर हां, टाटा ने इस कार्य में जुटी राडिया की पीआर कंपनी से जुड़े सहकर्मियों को एक करोड़ रुपये का पारितोषिक ज़रूर दिया था.
दरअसल यह पूरा मसला देश में पीआर और लॉबिंग की सिरमौर नीरा राडिया से जुड़ा है. यह वही राडिया हैं, जब एनडीए शासनकाल में अनंत कुमार शहरी विकास मंत्री हुआ करते थे तो मैडम राडिया उनकी सबसे करीबियों में शुमार होती थीं. बाद में नीरा राडिया एक एयरलाइंस शुरू करना चाहती थीं. पर चूंकि फंड की पारदर्शिता नहीं थी, समझा जाता है कि शायद इसीलिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उन्हें अपना एयरलाइंस शुरू करने की इजाज़त नहीं दी. बाद के दिनों में राडिया मुकेश अंबानी और रतन टाटा सरीखे देश के शीर्ष उद्योगपतियों के साथ जुड़ गईं. जब मधु कोड़ा झारखंड के मुख्यमंत्री थे तो रतन टाटा झारखंड सरकार के साथ अपने खनन लीज अनुबंध को आगे बढ़ाना चाहते थे और इस कार्य को पूरा करने के लिए टाटा ने राडिया का चुनाव किया. और, समझा जाता है कि टाटा ने राडिया के मा़र्फत मधु कोड़ा को तब 180 करोड़ रुपये का भुगतान किया और इस पूरे कार्य में राडिया की फीस क्या थी, इसका अभी खुलासा नहीं हो पाया है. पर हां, टाटा ने इस कार्य में जुटी राडिया की पीआर कंपनी से जुड़े सहकर्मियों को एक करोड़ रुपये का पारितोषिक ज़रूर दिया था. आईबी ने ऐसा इस टेप को आधार बनाकर खुलासा किया. पर इस मामले में कुछ बड़े कांग्रेसी नेताओं के नाम सामने आने पर केंद्र सरकार मधु कोड़ा को बचाने में जुट गई है.
सूत्रों के अनुसार, भारतीय खुफिया एजेंसी आईबी ने गृह मंत्रालय की इजाज़त पर नीरा राडिया और उनके सहकर्मियों की टेलीफोन लाइनों पर लगातार नज़र रखी. ज़ाहिरा तौर पर नीरा राडिया देश के कई बड़े उद्योगपतियों का राजनैतिक प्रबंधन देखती हैं. राडिया अपने कॉरपोरेट क्लांइट्‌स के व्यवसायिक हितों के लिए सरकारी महकमों में उच्च स्तर पर नीतियों में मनमाफिक फेरबदल करवाने के साथ-साथ मंत्रियों की नियुक्तियों में भी हस्तक्षेप करती हैं. नीरा अपना साम्राज्य सुनियोजित तरीके से अपनी चार कंसल्टिंग  कंपनियों द्वारा चलाती हैं. वैष्णवी कॉरपोरेट मुख्यत: टाटा समूह, यूनिटेक एवं स्टार टीवी के साथ-साथ अन्य उद्योगपतियों के मीडिया और सरकारी महकमों से जुड़े कामकाज देखती हैं. नीरा ने नियोकॉम कंसल्टिंग की शुरुआत नवंबर 2008 में मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह का राजनैतिक प्रबंधन देखने के लिए की, जबकि नियोसिस की शुरुआत का उद्देश्य आधिकारिक तौर पर सेवानिवृत्त नौकरशाहों द्वारा टेलीकॉम, ऊर्जा, उड्डयन और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कार्य देखना बताया जाता है. नियोसिस पर भी पूरा नियंत्रण मैडम राडिया का ही है. तथ्यों के अनुसार, टाटा समूह का सिंगूर प्रोजेक्ट जब फेल हो गया था तो नीरा और उनके सहकर्मियों ने नैनो प्रोजेक्ट को अपने तंत्र की मदद से गुजरात में स्थानांतरित करवाया था. इसके लिए उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण माकपा नेताओं को मैनेज किया था. कहा जाता है कि नीरा के लेफ्ट और सीटू के कई नेताओं से बेहद घनिष्ठ संबंध हैं.
एक प्रमुख उद्योगपति घराने को एक न्यूज़ चैनल पर पूर्ण नियंत्रण पाना था. इसके लिए नीरा राडिया और जहांगीर पोचा ने एक दैनिक हिंदी अखबार नई दुनिया के मालिक अभय छजलानी से बातचीत की और इस काम को पूरा किया गया. मीडिया प्रबंधन में नीरा और उनके सहकर्मियों का काम करने का तरीका थोड़ा अलग है. वे पत्रकारों को खुश करने के लिए उन्हें सपरिवार विदेश घूमाते हैं, महंगे उपहार देते हैं. इस रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि एक अंग्रेज़ी दैनिक के पूर्व संपादक और एक अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल की वरिष्ठ पत्रकार को महंगी कारें भेंट की गईं. बातचीत से उजागर हुए तथ्यों के अनुसार, मुकेश अंबानी और उनके छोटे भाई अनिल अंबानी के व्यवसायिक विवादों खासकर केजी बेसिन झगड़े में श्रीमती राडिया मुकेश की ओर से ज़ोरदार लॉबिंग कर रही हैं. खु़फिया सूत्रों के अनुसार, मुकेश अंबानी के सहयोगी मनोज मोदी और परिमल नैथाणी द्वारा नीरा के सहकर्मियों के साथ हुई बातचीत में यह उजागर हुआ कि कुछ एनजीओ द्वारा दायर की पीआईएल को वापस लेने के लिए स्टिंग ऑपरेशन भी करवा कर दबाव डाला गया. मुकेश अंबानी हल्दिया पैट्रो केमिकल्स को अपने प्रभुत्व में लेना चाहते हैं, लेकिन हल्दिया पेट्रोकैम के चेयरमैन सरकार द्वारा मनोनीत फिक्की चीफ तरुण दास हैं. अंबानी के इस हित को पूरा करने के लिए नीरा राडिया तरुण दास के संपर्क में रहीं. सूत्र बताते हैं कि इसके लिए तरुण दास ने माकपा नेता निरूपम सेन को राजी किया तथा निरूपम ने प्रकाश करात से राडिया की मुलाकात भी करवाई. प्रकाश करात और निरूपम सेन यह पूरा प्रोजेक्ट मुकेश अंबानी को दिलाने के लिए तत्पर हैं, पर उन्हें भय था कि माकपा के एक अन्य वरिष्ठ नेता इसमें उलझनें पैदा कर सकते हैं. सो इस नेता को मैनेज करने की जिम्मेदारी मुकेश अंबानी पर छोड़ी गई.
सेवानिवृत्त नौकरशाह प्रदीप बैजल, जो नीरा के लिए काम करते हैं, पाइप लाइन रेगुलेटरी एजेंसी और रिलायंस के बीच मध्यस्थता कर रहे हैं. तथ्यों के अनुसार, वित्त मंत्रालय के साथ लॉबिंग की जा रही है कि रिलायंस गैस को खनिज तेल के अनुसंधान के रूप में सात वर्ष तक करमुक्त किया जाए. इसके अलावा रिलायंस ने वी के सिब्बल जो हाइड्रोकार्बंस के महानिदेशक हैं, को आलीशान घर खरीद कर दिया है. आरकॉम के चार अफसरों के खिला़फ सीवीसी द्वारा जांच चल रही है. जांच 53,000 करोड़ रुपये के घपले से जुड़ी है. एक दूसरे प्रकरण में नीरा राडिया द्वारा भारतीय स्टेट बैंक के उच्चाधिकारियों को रिलायंस के लिए बैंक गारंटी के लिए मैनेज किया गया. यह गारंटी रिजर्व बैंक द्वारा उक्त सूचना के खिला़फ दी गई, जिसमें कंपनी की वित्तीय गड़बड़ियों का ज़िक्र था.
भारती एयरटेल कंपनी के मालिक सुनील मित्तल ने भी नीरा की सेवाएं अपनी कंपनी के लिए अनौपचारिक तौर पर लीं. मित्तल ने नीरा की सेवाएं टेलीकॉम में तीन कारणों के लिए लीं. पहला टेलीकॉम मंत्रालय का स्पैक्ट्रम मामले में सीडीएमए लॉबी के प्रति रुझान देखते हुए जीएसएम लॉबी के लिए लॉबिंग कराना. दूसरा मित्तल ने नीरा द्वारा दयानिधि मारन को मंत्री बनवाने के लिए लॉबिंग करवाई. सूत्रों के अनुसार, सुनील मित्तल को नीरा से सुहेल सेठ ने मिलवाया था. नीरा राडिया ने मित्तल को अपनी सेवाएं देते समय इस बात का ध्यान रखा कि उनके इस कार्य से कहीं भी टाटा के व्यवसायिक हितों का अहित न हो. नीरा एवं रतन टाटा के बीच टेप हुई बातचीत में तथ्य और उजागर हुआ कि टाटा दयानिधि मारन को टेलीकॉम मंत्री किसी भी हालत में बनने देने के पक्ष में नहीं थे. सूत्रों के अनुसार, नीरा के संबंध ए राजा से काफी नज़दीकी हैं. और, अपने इन्हीं संबंधों के कारण नीरा ने टेलीकॉम मंत्री द्वारा अपने क्लाइंट्‌स स्वान टेलीकॉम, एयरसेल, यूनीटेक वायरलेस और डाटाकॉम को लाइसेंस दिलवाए. ग़ौरतलब है कि डाटाकॉम में रिलायंस समूह के कर्मचारी मनोज मोदी का पैसा लगा है.
राजनैतिक प्रबंधन के साथ-साथ श्रीमती राडिया विदेशों से भी धन उगाहने के काम में लिप्त हैं. उन्होंने अपने क्लाइंट यूनीटेक के मुंबई प्रोजेक्ट में लेहमैन ब्रदर्स से तीन क़िस्तों में पैसा निवेश करवाया था. पहली क़िस्त लगभग 740 करोड़ रुपये की, शिवालिक वेंचर प्राइवेट लिमिटेड, जो यूनिटेक की होल्डिंग है और रोहन डेवलपर्स मुंबई को दी गई. शिवालिक में यूनिटेक के पचास फीसदी शेयर हैं. बकाया राशि दो क़िस्तों में लगभग 550 मिलियन डॉलर के रूप में दी गई. आईबी की इस रिपोर्ट में और भी कई महत्वपूर्ण खुलासे हैं, पर नीरा के ऊंचे सियासी रसूख को देखते हुए लगता है कि ऐसे मामलों से उनका कुछ भी बाल बांका नहीं हो पाएगा.

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