बुधवार, 27 जुलाई 2011

पत्रकारों को वाजिब वेतन क्यों नहीं / विष्णु राजगढ़िया

बहस





जस्टिस मजीठिया आयोग ने श्रमजीवी पत्रकारों के वेतनमान पर रिपोर्ट दी है. सबका दर्द सुनने-सुनाने वाले पत्रकारों के बड़े हिस्से को वेज बोर्ड के बारे में कुछ मालूम नहीं होता, इसका लाभ मिलना तो दूर. इसके बावजूद अखबार प्रबंधंकों ने वेज बोर्ड को मीडिया पर हमला बताकर हल्ला मचाना शुरू कर दिया है. जबकि मीडिया पर असली हमला तो पत्रकारों का भयंकर आर्थिक शोषण है. आखिर इतनी कठिन परिस्थितियों में लगातार काम करके भी एक पत्रकार किसी प्रोफेसर, सीए, इंजीनियर, डॉक्टर, आइएएस या कंप्यूटर इंजीनियर से आधे या चौथाई वेतन पर क्यों काम करे? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहिए तो यह सवाल हर नागरिक और हर मीडियाकर्मी को पूछना चाहिए.
press
कोयलाकर्मियों और शिक्षक-कर्मचारियों की तरह मीडियाकर्मियों को भी अपने वेज बोर्ड के बारे में जागरूक होना चाहिए. वरना अखबार प्रबंधकों की लॉबी तरह-तरह से टेसुए बहाकर एक बार फिर पत्रकारों को अल्प-वेतनभोगी और बेचारा बनाकर रखने में सफल होगी.

आज जो अखबार प्रबंधक नये वेज बोर्ड पर आंसू बहा रहे हैं, उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि उनके प्रोडक्ट यानी अखबार में जो चीज बिकती है- वह समाचार और विचार है. अन्य किस्म के उत्पादों में कई तरह का कच्चा माल लगता है. लेकिन अखबार का असली कच्चा माल यानी समाचार और विचार वस्तुतः संवाददाताओं और संपादनकर्मियों की कड़ी मेहनत, दिमागी कसरत और कौशल से ही आता है. इस रूप में पत्रकार न सिर्फ स्वयं कच्चा माल जुटाते या उपलब्ध कराते हैं, बल्कि उसे तराश कर बेचने योग्य भी बनाते हैं.

इस तरह देखें तो अन्य उद्योगों की अपेक्षा अखबार जगत के कर्मियों का काम ज्यादा जटिल होता है और उनके मानसिक-शारीरिक श्रम से कच्चा माल और उत्पाद तैयार होता है. तब उन्हें दूसरे उद्योगों में काम करने वाले उनके स्तर के लोगों के समान वेतन व अन्य सुविधाएं पाने का पूरा हक है. दुखद है कि मीडियाकर्मियों के बड़े हिस्से में इस विषय पर भयंकर उदासीनता का लाभ उठाकर अखबार प्रबंधकों ने भयंकर आर्थिक शोषण का सिलसिला चला रखा है.

जो अखबार 20 साल से महत्वपूर्ण दायित्व संभाल रहे वरीय उपसंपादक को 20-25 हजार से ज्यादा के लायक नहीं समझते, उन्हीं अखबारों में किसी चार्टर्ड एकाउंटेंट, ब्रांड मैनेजर या विज्ञापन प्रबंधक की शुरूआती सैलरी 50 हजार से भी ज्यादा फिक्स हो जाती है. सर्कुलेशन की अंधी होड़ में एजेंटों, हॉकरों और पाठकों के लिए खुले या गुप्त उपहारों और प्रलोभनों के समय इन अखबार प्रबंधकों को आर्थिक बोझ का भय नहीं सताता. चार रुपये के अखबार की कीमत गिराकर दो रुपये कर देने या महज एक रुपये में किलो भर रद्दी छापने या अंग्रेजी के साथ कूड़े की दर पर हिंदी का अखबार पाठकों के घर पहुंचाने में भी अखबार प्रबंधकों को गर्व का ही अनुभव होता है. लेकिन जब कभी पत्रकारों को वाजिब दाम देने की बात आती है, तब इसे मीडिया की स्वतंत्रता पर हमले जैसे हास्यास्पद तर्क से दबाने की कोशिश की जाती है.

आज इन मुद्दों पर एक सर्वेक्षण हो तो दिलचस्प आंकड़े सामने आयेंगे-
1. किस-किस मीडिया संस्थान में वर्किंग जर्नलिस्ट वेज बोर्ड लागू है?
2. जहां लागू है, उनमें कितने प्रतिशत मीडियाकर्मियों को वेज बोर्ड का लाभ सचमुच मिल रहा है?
3. मीडिया संस्थानों में प्रबंधन, प्रसार, विज्ञापन जैसे कामों से जुड़े लोगों की तुलना में समाचार या संपादन से जुड़े लोगों के वेतन व काम के घंटों में कितना फर्क है?
4. मजीठिया वेतन आयोग के बारे में कितने मीडियाकर्मी जागरूक हैं और इसे असफल करने की प्रबंधन की कोशिशों का उनके पास क्या जवाब है?
5. जो अखबार मजीठिया वेतन आयोग पर चिल्लपों मचा रहे हैं, वे फालतू की फुटानी में कितना पैसा झोंक देते हैं?

जो लोग यह कह रहे हैं कि पत्रकारों को वाजिब वेतन देने से अखबार बंद हो जायेंगे, वे देश की आखों में धूल झोंककर सस्ती सहानुभूति बटोरना चाहते हैं. जब कागज-स्याही या पेट्रोल की कीमत बढ़ती है तो अखबार बंद नहीं होते. दाम चार रुपये से घटाकर दो रुपये करने से भी अखबार चलते रहते हैं. हाकरों को टीवी-मोटरसाइकिल बांटने और पाठकों के घरों में मिठाई के डिब्बे, रंग-अबीर-पटाखे पहुंचाने से भी अखबार बंद नहीं होते. प्रतिभा सम्मान कार्यक्रमों और महंगे कलाकारों के रंगारंग नाइट शो से भी कोई अखबार बंद नहीं हुआ. शहर भर में महंगे होर्डिंग लगाने और क्रिकेटरों को खरीदने वाले अखबार भी मजे में चल रहे हैं. तब भला पत्रकारों को वाजिब मजूरी मिलने से अखबार बंद क्यों हों? इससे तो पत्रकारिता के पेशे की चमक बढ़ेगी और अच्छे, प्रतिभावान युवाओं में इसमें आने की ललक बढ़ेगी, जो आ चुके हैं, उन्हें पछताना नहीं होगा. इसलिए यकीन मानिये, मजीठिया वेतन बोर्ड के कारण कोई अखबार बंद नहीं होने जा रहा. वक्त है पत्रकारिता को वाजिब वेतन वाला पेशा बनाने का. सबको वाजिब हक मिलना चाहिए तो मीडियाकर्मियों को क्यों नहीं?

एक बात और. पत्रकारों की इस दुर्दशा के लिए मुख्यतः ऐसे संपादक जिम्मेवार हैं, जो कभी खखसकर अपने प्रबंधन के सामने यह नहीं बोल पाते कि अखबार वस्तुतः समाचार और विचार से ही चलते हैं, अन्य तिकड़मों या फिड़केबाजी से नहीं. प्रबंधन से जुड़े लोग एक बड़ी साजिश के तहत यह माहौल बनाते हैं कि उन्होंने अपने सर्वेक्षणों, उपहारों, मार्केटिंग हथकंडों, ब्रांड कार्यक्रमों वगैरह-वगैरह के जरिये अखबार को बढ़ाया है. संपादक भी बेचारे कृतज्ञ भाव से इस झूठ को स्वीकार करते हुए अपने अधीनस्थों की दुर्दशा पर चुप्पी साध लेते हैं. पत्रकारिता का भला इससे नहीं होने वाला. समय है सच को स्वीकारने और पत्रकारिता को गरिमामय पेशा बनाने का, ताकि इसमें उम्र गुजारने वालों को आखिरकार उस दिन को कोसना न पड़े, जिस दिन उन्होंने इसमें कदम रखा था.

19.06.2011, 01.03 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ
Sanjeev Kumar [] Ranchi - 2011-07-02 13:25:09
Rajgadia Sir, you have raised very important issue but this is shame that the Journalists are too much ignorant on their right whether it is for their wage board or for the working journalists act, leave and working hours related rights. You have told right that the Editors are the main culprit to keep the Journalists low paid. Thanks for raising
these issues. Although I am sure that most of the Journalists will never think upon the issues and most of the newspapers will also not going to implement the recommandations of MAJITHIYA WAGE BOARD. Fir bhi, dil ko bahalane ko galib ye khayal achcha hai kyoki hamako maloom
hai Jannat ki HAKIKAT!
dk purohit [diliprakhai@gmail.com] jodhapur - 2011-07-02 10:39:41
आपका कहना सही है, मगर कलम के धनी को पैसों की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. साहित्याकर और पत्रकार की दुनिया ऐसी होती है, जिसमें अभिव्यक्ति का खतरा है मगर पैसों के लिए कोई स्थान नहीं है. पैसों के लिये काम करने वाले तो नौकर होते हैं. शब्दों का शहंशाह कैसे हो सकते हैं.
ABDUL ASLAM [aslam.media4u@gmail.com] KORBA - 2011-06-23 14:23:45
विष्णु जी, आप ने पत्रकारो के दर्द को अपने आलेख में बेहतर ढंग से पेश किया है. दूसरों के दर्द को कलम से दूर करने वाले खबरनविशों का दर्द कोई सुनने वाला नहीं. जस्टिस मजीठिया आयोग की बात करें तो कोई आयोग आज तक पत्रकारो को जायज़ वेतन नहीं दिला पाया है. आज पत्रकारिता उद्योग बन गई. कोई लखपति अखबार शुरू करता है, अपना सिक्का जमाता है, लेकिन पत्रकार जहां था, वहीं रह जाता है. भारत के तमाम पत्रकारों के लिए बनाये संगठनों को भी पत्रकारो के साथ हो रहे जायज़ मांगों को उठाने की फुर्सत नहीं है. आपने जिन मुद्दों पर सर्वे कराने की बात कही है, अगर सच में उन मुद्दों पर सर्वे करा दिया जाये तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आयेंगे. पत्रकारिता करने वालों से दुनिया के तमाम लोग डरते हैं लेकिन पत्रकारों को मालिकों ने गुलाम बना रखा है, जो चुपचाप सारे अन्याय सहता है.
yogesh jadon [chingi0802@gmail.com] agra - 2011-06-22 17:59:08
एक मजीठिया वैज बोर्ड ही क्यों। अब तक किस बोर्ड की सिफारिश इन प्रेस के मालिकों ने लागू की। इस मामले में तो पत्रकारों की दशा देख मन में आता है कि इससे अच्छा तो प्रेस का राष्ट्रीकरण कर देना चाहिए। वैसे भी सत्ताधारियों के चापलूस मालिक कौन सच की लड़ाई लड़ रहे है। अगर कुछ कर रहे तो बस अपनी यूनिटों और धधों को बढ़ाने की चिंता। इस चिंता में वह कई बार तो सत्ताधारियों के हाथों ही अपने गले में पट्टा डालने को तैयार हैं, तो फिर भला पत्रकार ही क्यों खटे। उसे कम से कम अपने काम की पूरी कीमत तो मिले।
kishore diwase [kishore_diwase@yahoo.com] bilaspur - 2011-06-22 16:22:05
Vishnu ji,you have said right and issues are highly inflammable. The advantage of professionalism goes to all others than editorial in general. On the contrary editor is no more than a puppet and engaged is \\\" Save chair campaiign\\\".Journalist associations are playing in the hands of political stalwarts and became a tool of their safeguard.So called high profile scribes are playing individual game in context to their vested interests.unity is dream- weighing frogs on balance. Still some move ment should be there. But - who will bell the cat????
zulaikha jabeen [] Raipur - 2011-06-21 20:42:07
मीडिया लाभ कमाने वाला उद्योग बन गया है, इसे मान लेना चाहिये. जिस तरह दूसरे उद्योगों में श्रम और वेतन के नियम निर्धारित होते हैं, मीडिया में भी उसे सख्ती से लागू करने की जरुरत है. लेकिन हमारे मुल्क में ऐसा नहीं किया जा रहा है. कोई बंदा अखबार शुरु करता है औऱ थोड़े ही दिन में लखपति-करोड़पति बन जाता है, कैसे? किसके दम पर ? अखबारों के मालिक अब ठेकेदार बन गई हैं औऱ ठेकेदारों ने अब अखबार बेचना शुरु कर दिया है. आज अखबार मिशन के लिये, उनके मालिकों के एम्बिशन के लिये निकाले जा रहे हैं. तो उनके मुनाफे में पत्रकारों को शामिल क्यों न किया जाये? बड़े अखबारी घराने बेपर्दा हैं लेकिन छोटे स्थानीय अखबार सरकार और नेताओं के साथ संबंध गांठ कर अपने कुनबे के लिये ऐश का सामान बना रहे हैं. अपनी नाकाबिल औलादों को संपादक बना कर पत्रकारों के सर पर बैठा रहे हैं और चांदी काट रहे हैं. जो लोग कहते हैं कि मजिठिया आयोग को लागू करने के बाद कई अखबार मजबूरी में बंद हो जायेंगे तो ऐसे अखबारों को तो बंद कर ही जाना चाहिये. इन अखबारों में आम जनता की आवाज नहीं होती, सत्ता और कारपोरेट की दलाली होती है. जनता की कमाई पर सरकारों से अपनी पीढ़ियों के लिये मिल्कियत बनाने वाले मालिक ईमानदार और मेहनती पत्रकारों के हक में उठने वाली हर आवाज को दबाते रहे हैं. ऐसे मालिक ही छोटे अखबारों का घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं. ये मालिक ही भ्रष्ट लोगों को ब्लैकमेलिंग करके अपने कमरे को ठंढ़ा करने के लिये एयरकंडिशन चला रहे हैं, कीमती गाड़ियों में घूम रहे हैं और अपनी चमड़ी और कपड़े उजले रख रहे हैं. हमारे मुल्क में आयोग हाथी के दांत की तरह होते हैं, खाने के और, दिखाने के और. सभी पत्रकारों को चाहिये कि उनके जायज हक़ पर डाका डालने वाली आवाज़ों के मुकाबले, अपनी एकजुट आवाज उठायें. वैसे भी अब सरकारें सुपारी देकर पत्रकारों को सिर्फ धमका नहीं रहीं, मरवा भी रही हैं. इसलिये यह समय संगठित होकर लड़ाई छेड़ने का है. पत्रकारों की इस लड़ाई में एक बहुत बड़ा तबका उनके साथ हमेशा खड़ा होगा, यह विश्वास रखना चाहिये.
sunil gupta [good_do36@rediffmail.com] chirmiri (c.g.) - 2011-06-21 16:53:04
वाकई कम से कम बड़े अखबार समूह तो वेतन में सुधार कर ही सकते हैं क्योंकि आज के तारीख में वे इतने बड़े कारपोरेट हो गए हैं कि वे शापिंगमॉल,पावरप्लांट जैसी जगहों में पैसा लगा रहे है और वह पैसा मीडिया के जरिये ही कमाया गया है. उससे बड़ी बात मीडिया के प्रसार विभाग, अक्सर सम्पादकों,पत्रकारों की लेखनी पर निजी हितो हेतु दबाव बनाते हैं. शर्मनाक...
Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] Noida - 2011-06-21 02:04:01
सवाल केवल इस आयोग का नहीं है. हमें यह भी देखना चाहिये कि दूसरे जितने आयोग बने, क्या उनकी सिफारिश लागू हुईं ? आवास भत्ता, परिवहन भत्ते, रात्रि पाली भत्ते, विषम परिस्थितिजन्य भत्ते, अवकाश यात्रा भत्ते और चिकित्सा भत्ते की क्या हालत है? समाजवाद और समतावाद का नारा बुलंद करने वाले दलाल संपादकों से उम्मीद मत करें कि वो कुछ करेंगे. पत्रकार खुद अपने हक के लिये आगे आयें, तो बात बने.
Pallav [] Delhi - 2011-06-20 18:11:45
मजा आ गया, मालिकों के तर्कों की धज्जियां उड़ा दी आपके इस लेख ने। बस पत्रकारों की ओर से दायर की जाने वाली याचिका में इस लेख से बहुत से हिस्से जरूर शामिल किए जा सकते हैं। पत्रकारों को चीजों को समझना होगा -निजता-यानी इंडीवीज्यूलिज्म से बाहर आना होगा और असंगठित क्षेत्र जिसमें तमाम बड़े अखबार शामिल हैं, के पत्रकारों को भी खुद के ट्रेड यूनियन आंदोलन से जुड़ना होगा।
ratan jaiswani [ratan.jaiswani@gmail.com] janjgir, chhattisgarh - 2011-06-20 17:00:45
इसे ही कहते हैं-चिराग तले अंधेरा
Suman Baghel [] Kanpur - 2011-06-20 02:15:34
पत्रकार खुद ही दलाली कर रहे हैं, उन्हें वेतन की क्या जरुरत है. आपका मुद्दा सही है लेकिन क्या अपने हक के लिये ये पत्रकार सड़क पर उतरेंगे ? नहीं न ? क्योंकि ये पत्रकार मालिकों की दलाली, नेताओं की दलाली में बेचारे जुड़े हुये हैं.
Ajaybhan Singh [ajaybhan2000@gmail.com] New Delhi - 2011-06-19 08:11:02
आपने बहुत ज़रुरी सवाल उठाये हैं लेकिन इसमें एक बाद छूट गई है कि अखबार के मालिक जो लगातार अखबार के घाटे में होने या नो प्राफिट-नो लॉस की बात करते रहते हैं, उनकी अपनी संपत्ति, उनके अपने ऐश-ओ-आराम, उनके अपने दौरे में कितनी बढ़ोत्तरी हुई है. आपको पता चलेगा कि मालिक साहब तो मजे कर रहे हैं लेकिन पत्रकारों को वेतन देने के नाम पर उनकी नानी मरने लगती है. दोहरे चेहरे वाले इन मालिकों को बेनकाब करने की जरुरत है.
akash rajgaria [akashrajgaria@yahoo.com] rourkela - 2011-06-19 07:46:38
आपकी मांग जायज है. पत्रकार हमेशा अपनी जान को जोखिम में डाल कर खबरें लाता है. हर दंगे और प्राकृतिक आपदा के बीच वह अपनी खबरों के लिये उपस्थित रहता है. किसी अपराधी के पास जाना हो तो पत्रकार को ही बलि का बकरा बन कर जाना होता है. कई जगहों पर धक्का-मुक्की रोज झेलता है. ये है पत्रकार...उसके बाद भी इन्हीं का शोषण होता है. ये शायद इसलिये है क्योंकि ये भारत है.

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