रविवार, 10 जुलाई 2011

परस्पर अविश्वास से गहराया लेह का सांप्रदायिक विवाद




वर्ष 1989 के आसपास कश्मीर में आतंकवाद के उदय के बाद लेह की बौद्ध जनता को यह अंदेशा होने लगा कि जम्मू एवं कश्मीर में उसका भविष्य सुरक्षित नहीं है. अधिकांश बौद्धों को यह डर सताने लगा कि मुस्लिम समुदाय पूरे इलाक़े पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकता है. इस डर के पीछे दो वजहों की अहम भूमिका थी. पहली, लद्दाख सहित पूरे जम्मू-कश्मीर राज्य की पूर्ण स्वतंत्रता अथवा पाकिस्तान के साथ उसके विलय की मांग. दूसरी वजह यह थी कि लेह के मुक़ाबले कारगिल क्षेत्र में जनसंख्या वृद्धि की दर काफी ज़्यादा थी. इसका स्पष्ट मतलब यही था कि अगले कुछ दशकों में बौद्ध समुदाय लद्दाख में अल्पमत में आ जाता. इसके अलावा राज्य सरकार द्वारा विकास योजनाओं एवं सरकारी नौकरियों में बौद्धों के साथ भेदभावपूर्ण नीति ने इस डर में और इज़ा़फा किया. लेह के लिए प्रांतीय स्वायत्तता की मांग अब तेज़ी से सांप्रदायिक रंग लेती जा रही थी और इसे बौद्धों एवं मुस्लिमों के बीच आपसी संघर्ष के नज़रिए से देखा जाने लगा था. जुलाई 1989 में लेह में एक बौद्ध और चार मुस्लिम युवकों के बीच एक साधारण झड़प ने इतना विषाक्त रूप धारण कर लिया कि पूरे लेह में विरोध प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया. जम्मू-कश्मीर पुलिस बल पर यह आरोप लगा कि उसने बौद्ध प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग की, जिसमें कई प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई. ऐसे आरोप भी लगे कि पुलिस बल के जवान ज़बरदस्ती बौद्धों के घर में घुस आए, उनके धार्मिक स्थलों पर तोड़फोड़ की और संपत्तियां लूट लीं. पुलिस की इन ज़्यादतियों के चलते एलबीए (लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन) एक बार फिर लद्दाख के लिए अलग संवैधानिक व्यवस्था और केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने की मांग करने लगा. इसके ठीक बाद एलबीए ने मुस्लिम समुदाय के पूर्ण सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की घोषणा कर दी.
1995 में जब लेह ऑटोनोमस हिल काउंसिल का गठन किया गया तो उसी समय कारगिल के लिए भी ऐसे ही एक निकाय के गठन का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन कारगिल के लोगों ने इसे मानने से इंकार कर दिया. उनका मानना था कि इससे कश्मीर सरकार के अधिकारों का हनन होता है, जिसे वे अपना दोस्त समझते थे. बाद के दिनों में लेह में विकास की तेज़ गति को देखते हुए वे इसके लिए राजी हो गए और 2003 में कारगिल ऑटोनोमस हिल काउंसिल का गठन किया गया, लेकिन कारगिल के जांस्कर क्षेत्र में रहने वाले बौद्धों का एक छोटा तबका इसके विरोध में खड़ा हो गया. बौद्धों को लगा कि यह उनके हितों के ख़िला़फ है और वे अपने लिए अलग स्वायत्तशासी क्षेत्र की मांग करने लगे.
बहिष्कार की यह घोषणा शुरू में कश्मीरी मुस्लिमों को ध्यान में रखते हुए की गई थी, जो स्थानीय प्रशासन में प्रभावशाली भूमिका में थे. इसके अलावा सुन्नी मुसलमान भी एलबीए के निशाने पर थे, जो लेह शहर की अर्थव्यवस्था में गहरी दख़ल रखते थे. सुन्नी मुसलमानों को कश्मीरी एजेंट के रूप में देखा जाता था, क्योंकि वे बौद्धों की स्वायत्तता की मांग का विरोध करते थे. बाद में बाल्टियों को भी बहिष्कार के दायरे में शामिल कर लिया गया, क्योंकि वे सुन्नियों के समर्थन में आ गए थे और इस संघर्ष को सांप्रदायिक पुट देने में सबसे आगे थे. बहिष्कार की इस घोषणा को 1992 में वापस ले लिया गया, क्योंकि भारत सरकार ने एलबीए को स्पष्ट रूप से बता दिया कि ऐसा न होने पर वह उसकी मांगों पर विचार नहीं करेगी. इसके बाद एलबीए और लद्दाख मुस्लिम एसोसिएशन (एलएमए) के बीच एक समझौता हुआ. एलएमए शिया और सुन्नी, दोनों ही समुदायों का प्रतिनिधित्व करती थी. काफी जद्दोजहद के बाद भारत सरकार ने लेह ऑटोनोमस हिल काउंसिल का गठन किया, जिसके अंतर्गत लेह को व्यापक स्वायत्तता हासिल हुई. इसके साथ ही एलबीए की अधिकांश मांगें पूरी हो गईं.
1995 में जब लेह ऑटोनोमस हिल काउंसिल का गठन किया गया तो उसी समय कारगिल के लिए भी ऐसे ही एक निकाय के गठन का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन कारगिल के लोगों ने इसे मानने से इंकार कर दिया. उनका मानना था कि इससे कश्मीर सरकार के अधिकारों का हनन होता है, जिसे वे अपना दोस्त समझते थे. बाद के दिनों में लेह में विकास की तेज़ गति को देखते हुए वे इसके लिए राजी हो गए और 2003 में कारगिल ऑटोनोमस हिल काउंसिल का गठन किया गया, लेकिन कारगिल के जांस्कर क्षेत्र में रहने वाले बौद्धों का एक छोटा तबका इसके विरोध में खड़ा हो गया. बौद्धों को लगा कि यह उनके हितों के ख़िला़फ है और वे अपने लिए अलग स्वायत्तशासी क्षेत्र की मांग करने लगे. लेह ऑटोनोमस हिल काउंसिल के गठन के बाद शुरुआत में लगा कि अधिकतर समस्याएं सुलझ गई हैं, लेकिन 2000 में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने राज्य विधानसभा में एक प्रस्ताव रखकर यह मांग की कि जम्मू- कश्मीर को 1953 के पहले की व्यवस्था की तरह भारतीय संघ के अंतर्गत स्वायत्तशासी क्षेत्र का दर्जा दिया जाए. इस प्रस्ताव के साथ ही एलबीए फिर विरोध में खड़ी हो गई और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देने की मांग करने लगी. एलबीए की यह मांग इस डर पर आधारित थी कि 1953 के पूर्व की व्यवस्था फिर से बहाल होने पर लद्दाख कश्मीर के एक उपनिवेश के रूप में तब्दील होकर रह जाएगा.
जून 2000 में एक सप्ताह तक चले आंदोलन के बाद एलबीए के अध्यक्ष शेरिंग सांफेल ने ज़ोर देकर कहा कि समस्या का एकमात्र समाधान यही है कि लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया जाए. उन्होंने यह घोषणा भी की कि मांग न माने जाने पर लद्दाख की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए एलबीए संयुक्त राष्ट्र की शरण में जाएगी. एलबीए की युवा शाखा के नेता लोबजांग न्यांटक ने केंद्र और राज्य सरकारों को चेतावनी देते हुए कहा कि भगवान में गहरी आस्था रखने वाले बौद्धों की मांगों को अगर नहीं माना गया तो वे हथियार उठाने को मजबूर हो जाएंगे और इसके लिए प्रशासन ज़िम्मेदार होगा. इस हिंसा का स्वरूप बेशक धर्म विरोधी लगे, लेकिन इसका असल उद्देश्य अपनी पहचान बनाए रखना है. कोई आश्चर्य नहीं कि राज्य को धर्म के आधार पर तीन हिस्सों में बांटने की एलबीए की मांग को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी का समर्थन मिला, जिनके बारे में कहा जाता है कि मुस्लिमों के ख़िला़फ अपने अभियान में वे एलबीए को सहयोगी के रूप में देखते थे. लेह की बहुसंख्यक बौद्ध जनता केंद्र शासित प्रदेश की मांग का समर्थन करती है, जबकि लेह में रहने वाले मुस्लिम समुदाय का एक हिस्सा भी इसके समर्थन में है. संभव है कि ज़्यादा विकसित बौद्धों के डर से कुछ स्थानीय मुस्लिम समुदाय इसका विरोध कर रहे हों, लेकिन वे भी इसे खुलेआम प्रदर्शित नहीं करना चाहते. इसी तरह कारगिल की बहुसंख्यक मुस्लिम जनता लद्दाख के लिए केंद्र शासित प्रदेश के दर्जे का विरोध करती है. उसे डर है कि लेह के मुक़ाबले कम विकसित कारगिल इस केंद्र शासित प्रदेश में शामिल होने से बौद्धों के प्रभुत्व वाली प्रशासनिक व्यवस्था में उपेक्षा का शिकार हो जाएगा. फिर वे मुस्लिम बहुल कश्मीर से भी अलग नहीं होना चाहते. हालांकि वे घाटी में चल रहे अलगाववादी आंदोलन के ख़िला़फ हैं. धार्मिक रंग में रंगी यह राजनीतिक समस्या ज़्यादा गंभीर इसलिए भी है, क्योंकि पूरा लद्दाख क्षेत्र, जिसमें कारगिल और लेह भी शामिल है, एक ही संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है. चुनावों के दौरान बौद्ध और शिया नेता वोटों के लिए मतदाताओं की धार्मिक भावनाओं को भड़काने से बाज नहीं आते. कई लोगों का मानना है कि सीटों की संख्या बढ़ाने से, जिसके अंतर्गत शिया बहुल कारगिल और बौद्ध बहुल लेह के लिए अलग-अलग संसदीय क्षेत्र हों, समस्या का समाधान निकल सकता है. या फिर सीटों की रोटेशन प्रणाली से भी समस्या का हल निकाला जा सकता है.
लेह में सांप्रदायिक अलगाव का मूल कारण बेशक़ राजनीतिक है, लेकिन इसके साथ धार्मिक पहलू भी जुड़े हैं. देश के अन्य हिस्सों की तरह लद्दाख में भी राजनीतिक दल धर्म का इस्तेमाल लोगों को अपने पक्ष में लामबंद करने के लिए एक हथियार के रूप में करते हैं, जिसके चलते दोनों समुदायों के बीच अविश्वास की भावना और बढ़ जाती है. इसके अलावा अधिकांश धार्मिक नेता अन्य धर्मों और उनके अनुयायियों को ग़लत निगाहों से देखते हैं. हालांकि ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो इसका विरोध करते हैं और विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच बेहतर संबंधों के लिए हरसंभव प्रयास करते हैं.

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