गुरुवार, 7 जुलाई 2011

उर्दू पत्रकारिता-- कैसे मिलेगी वह अजीम परंपरा ?




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एजाज़ुर रहमान, आलमी सहारा, उर्दू न्यूज़ चैनल
ऐसा लग रहा है कि 21वीं सदी की पहली दहाई उर्दू पत्रकारिता के लिए नई क्रांति की दहाई साबित होने वाली है। और एक बार फिर 1857 के बाद की उर्दू पत्रकारिता की लहर देखने को मिलने वाली है। हम इसे ग्लोबलाइजेशन का असर कहें या बाज़ार का बढ़ता दबदबा, सच्चाई ये है कि उर्दू पत्रकारिता में फीलगुड जैसी स्थिति बनने लगी है। इस संदर्भ में सहारा इंडिया परिवार के उस ऐतिहासिक कदम की अहम भूमिका है, जिसके तहत नब्बे के दशक में उसने उर्दू मासिक पत्रिका राष्ट्रीय सहारा की शुरूआत करके उर्दू दुनिया में तहलका मचा दिया था, और बंटवारे के बाद अपनी किस्मत को रो रही उर्दू पत्रकारिता में नई जान पैदा हो गई थी। उसके बाद आज बज़मे सहारा, आलमी सहारा, द संडे इंडियन, और चौथी दुनिया जैसी पत्रिकाएं बाज़ारों की रौनक़ बनी हुई हैं।
आज उर्दू दैनिक अख़बारों की बात करें तो देश में दस केंद्रों से रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा के 15 एडीशन्स प्रकाशित हो रहे हैं। इनके अलावा दिल्ली से सहाफत, हमारा समाज और हिन्दुस्तान एक्प्रेस, मुंबई से सहाफत, इंक़लाब, हैदराबाद में सियासत, एतमाद और मुनसिफ, पटना से क़ौमी तंज़ीम, फारुक़ी तंज़ीम, पिंदार, संगम, कोलकाता से आज़ाद हिन्द, अख़बार-ए-मशरिक़ और उजाला और बैंगलूरु से सालार जैसे अख़बारों की जैसे बाढ़ सी आ गई है।
उर्दू पत्रकारिता के क्षेत्र में आई नई क्रांति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जागरण और आनंद बाज़ार पत्रिका जैसे पेशेवर व्यवसायिक ग्रुप उर्दू के इंक़लाब और आज़ाद हिन्द जैसे अख़बारों को ख़रीद चुके हैं। और दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता और पटना से बहुत जल्द इनके नए एडीशन शुरू होने वाले हैं।
उर्दू पत्रकारिता के विस्तार की लहर प्रिंट मीडिया तक ही सीमित नहीं है बल्कि टीवी पत्रकारिता में भी लगता है इसके दिन लौट आए हैं। हालांकि उर्दू टीवी पत्रकारिता की शुरुआता 1992 में हो गई थी जब दूरदर्शन ने दिल्ली समेत पांच केंद्रों से उर्दू न्यूज़ बुलेटिन की शुरूआत की थी। लेकिन देश के पहले उर्दू चैनल होने का श्रेय ईटीवी उर्दू को जाता है। इसके बाद ही डीडी ने उर्दू चैनल लॉन्च किया फिर 2009 में ज़ी सलाम और 27 दिसंबर 2010 को 24 घंटे का उर्दू न्यूज़ चैनल आलमी सहारा लॉन्च करके सहारा इंडिया परिवार ने उर्दू पत्रकारिता को नए शिखर पर पहुंचा दिया है।
लेकिन अख़बारों, पत्रिकाओं और चैनल्स की ज़्यादा संख्या और चमक-दमक को ही भारत में हाशिए पर पड़ी उर्दू पत्रकारिता के वारे-न्यारे होने वाले हैं ऐसा सोचना भी बिल्कुल ग़लत है। पत्रकारिता चाहे जिस भाषा की भी और जिस किसी भी देश की क्यों न हो, उसे वहां की जनआकांक्षाओं पर खरा उतरना पड़ता है। बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आज की उर्दू पत्रकारिता इस संदर्भ में फिलहाल नाकाम रही है। इसके कारण जो भी रहे हों, लेकिन सच्चाई यही है कि आज़ादी के बाद उर्दू पत्रकारिता की छवि सेमिनारों, मुशायरों, कौव्वालियों और धर्मिक प्रचार तक सिमट कर रह गई है। इसमें अलीगढ़ के माइनारिटी कैरेक्टर, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, आरएसएस, बाबरी मस्जिद, गुजरात और नरेंद्र मोदी से बाहर निकलने की ना तो इच्छा शक्ति है और ना ही आगे निकलकर सोच पाने की क्षमता। ना ही इसे देश के खेतों और खलियानों से कोई सरोकार है और ना ही नई अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कारोबार से। इसकी नज़र मस्जिदों, मदरसों, क़ब्रिस्तानों से निकलती है तो सीधी अमेरिका की अंधी मुखालफत और मुस्लिम हुकमतों की अंधी हिमायत में जा कर टिक जाती है। और उन्हीं की बयानबाज़ियों में डूबती इतराती रहती है।
यही कारण है कि भारतीय उर्दू चैनल का नाम आते ही इस्लामिक सवालों, मुशायरों, धारावाहिकों और पुराने फिल्मी गीतों से भरपूर टीवी स्क्रीन दिमाग़ में धूमने लगती है। ऐसा भी नहीं कि उर्दू पत्रकारिता आज उंगली पकड़कर चलना सीख रही हो, बल्कि इसका इतिहास जनआकांक्षाओं की मशाल लेकर आगे चलने वाले रहबर का रहा है। सच्चाई ये है कि भारतीय उपमहादीप में पुनर्जागरण की बयार उर्दू पत्रकारिता से ही छनकर आई है। ग़ुलामी, आज़ादी, इंसाफ, सेक्यूलरिंज़्म, फासिज़्म और जम्हूरियत का मतलब शुरू के दिनों में उर्दू पत्रकारिता ने ही जनमानस को समझाया है।
डॉ. सन्त कुमार अपने एक लेख ‘उर्दू पत्रकारिता’ में लिखते हैं ‘उर्दू पत्रकारिता की परंपरा कुछ उदाहरणों को छोड़कर देश प्रेम की भावना से ओतप्रोत रही है। बीसवीं सदी के शुरूआती दशकों में ही पंजाब, लाहौर और दिल्ली से प्रकाशित होने वाले आफताब, फ्रंटियर, वंदे मातरम, हिन्दुस्तान, आकाश, भारत माता, एडवोकेट और पेशवा आदि अख़बारों ने आज़ादी की मशाल जलाए रखी थी। जबकि इसके लिए इनके संपादकों को क़ैद बामशक़्क़त की सज़ा काटनी पड़ी थी।’ इसी लेख में आगे लिखते हैं कि ‘उर्दू पत्रकारिता बुनियादी तौर पर राष्ट्रीय पत्रकारिता और राष्ट्रीय एकता की एक जीती जागती मिसाल बन गई थी।’
इसी तरह प्रमिला शर्मा ने 16 दिसम्बर 1992 के नवभारत टाईम्स में छपे अपने लेख में लिखती हैं ‘भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में उर्दू के अख़बारों का योगदान गर्वान्वित करने वाला है, लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि तलाश करके उन अख़बारों और पत्रिकाओं को फिर से प्रकाशित किया जाए। ताकि खुले विचारों से उनकी बेहतर समीक्षा की जा सके, और आज तो इसकी इतनी आवश्यकता है जितनी पहले कभी नहीं रही। क्योंकि सनसनीखे़ज़ और पेशवर पत्रकारिता ने पत्रकारिता के बुनियादी नियमों को ही तोड़ मरोड़ दिया है।’
दरअसल, प्रमिला शर्मा जी ने जिस आवश्यकता की ओर इशारा किया है वही आवश्यकता आज उर्दू पत्रकारिता की असल चुनौती है। सच पूछा जाए तो उर्दू भाषा आज भी दक्षिण-पूर्व एशिया और ख़ासकर भारतीय उपमहादीप में कश्मीर से कन्याकुमारी तक लिंग्वाफ्रैंका की हैसियत रखती है। ऐसे में आज की पत्रकारिता की दौड़ में उर्दू पत्रकारिता के पीछे रहने के कारणों को समझना बहुत ज़रूरी है।
लेकिन हमें ये भी याद रखना चाहिए कि किसी भी समाज में समस्या मात्र किसी व्यक्ति, परिवार या समूह विशेष की ही नहीं होती है। उसके ताने-बाने उस समाज के दूसरे व्यक्तियों, परिवारों या समूहों से भी परस्पर जुड़े होते हैं। ऐसे में किसी समस्या का समाधान मात्र किसी व्यक्ति, परिवार या समूह विशेष के लिए ही नहीं किया जा सकता है। उसकी पूर्ति सामाजिक समूहों के परस्पर सहयोग में ही तलाश किया जाना चाहिए। उर्दू को भी हाशिए से मुख्यधारा में आने के लिए ऐसे ही प्रयास करने होंगे।
ऐसे में सबसे ज़रूरी है आधुनिक भारत में उर्दू पत्रकारिता की चुनौतियों को समझने की। और इसके लिए इसके इतिहास और ख़ासकर इस भाषा के उदभव और विकास को समझना बहुत ज़ुरूरी है। भाषाविद् सुनीति कुमार चटर्जी के शब्दों में उर्दू या आधुनिक हिन्दी या उर्दू का उद्भव खड़ी बोली से हुआ है। जो संस्कृत, पाली, प्राकृत और शौरसेनी अपभ्रंश के क्रमवार विकास का निखरा हुआ आधुनिकतम रूप है। यही कारण है कि इसमें संस्कृत और प्रकृतियों के साथ देश में प्रचलित अनेक भाषाओं और जनबोलियों की छाया अपने तद्भव रूप में वर्तमान है। भाषाविज्ञानियों ने खड़ी बोली को अनेक नामों से याद किया है जैसे- हिंदुई, हिंदवी, दक्खिनी, दखनी या दकनी, रेखता, हिंदोस्तानी, हिंदुस्तानी आदि।
इस लिहाज़ से अगर अमीर खुसरो की भाषा वही हिंदवी है, अगर कुलीकुतुब शाह और मुल्ला वजही की भाषा भी वही दक्खिनी या दखनी है, और वली, मीर और ग़ालिब की भाषा वही रेखता है तो उर्दू की परंपरा, धर्म और फिलासफी को समझने में शायद ही किसी को कठिनाई महसूस होगी। ख़ास तौर पर अगर उर्दू के मज़हबी सरोकार की बात की जाए तो उर्दू के शहनशाहे तग़ज़्ज़ुल कहे जाने वाले शायर मीर की इन पंक्तियों को ज़रूर याद करना चाहिए।
मीर के दीन-ओ-मज़हब को क्या पूछो हो उनने तो
क़शक़ा ख़ैंचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया
- मीर तक़ी मीर

ईमां मुझे रोके है तो खैंचे है मुझे कुफ्र
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे
- मिर्ज़ा असद्दुल्लाह खां ग़ालिब
आगरा के नज़ीर भी इसी परंपरा की एक मज़बूत कड़ी हैं जिनकी फिलासफी को समझने के लिए उनकी आदमीनामा, मुफलिसी, ईद, होली और उमस को पढ़ लेना काफी होगा।
उर्दू इस देश की ऐसी भाषा है जिसका जन्म मेलों और बाज़ारों में हुआ है जहां अलग-अलग समाज, धर्म और संस्कृतियों के लोगों के आपसी मेल मिलाप की वजह से हुआ है। फिर सूफियों, संतों और फकीरों ने अपनी ख़ानकाहों में इसका लालन-पालन किया। लिहाज़ा उर्दू का सरोकार भी बिना किसी मज़हब और मिल्लत का भेद किए आम लोगों से रहा है। साधू, संतों और फकीरों के जीवन का एक मात्र एक उद्देश्य जनाकांक्षाओं की पूर्ति करना और उनके दुख-दर्द पर अपनी मीठी बोली से मरहम लगाना था। और इस काम के लिए जिस आम ज़बान को चुना गया वही उर्दू का आरंभिक स्वरूप था। जिसमें संप्रेषण क्षमता गज़ब की है।  
शुरूआती उर्दू पत्रकारिता में भी इसी परंपरा का खमीर है, जिसने अपने कैनवस में पूरी दुनिया को समेट लिया और मानवतावादी मुल्यों को अपना लिया। मिसाल के तौर पर 1822 के बाद कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले उर्दू के पहले अख़बार का नाम जाम-ए-जहांनुमा रखा गया। और उर्दू पत्रकारिता का स्वर्ण युग वही युग है जब देश में 1857 की क्रांति की स्थितियां पैदा हो रही थीं। 1857 के बाद देश के हालात उर्दू भाषा के मिजाज़ के एन मुताबिक थे लिहाज़ा भक्ति रस अब देश प्रेम में बदल गया था। 1857 की क्रांति के दौरान 1858 तक उर्दू अखबारों की संख्या 35 हो गई थी। और ये वही दौर था जब अख़बारों से संपादकों को फांसी के तख्तों पर लटकाना आम बात थी।
उर्दू पत्रकारिता के बैचारिक सरोकारों को समझने के लिए 1859 में लखनऊ से प्रकाशित होने वाले उर्दू साप्ताहिक अवध अख़बार का ज़िक्र करना ज़रूरी है जिसके संपादक पंडित रतन नाथ सरशार थे। 1878 से 1885 के बीच लगातार प्रकाशित होने वाले उनका कालम फसाना-ए-आज़ाद एक अमिट रचना है। और एंग्लो-परशियन परंपरा से प्रभावित इस रचना में पंडित रतन नाथ सरशार ने अतिवादी विचारधारा और कट्टर पंथी सोच की जिस खूबसूरती धज्जियां उड़ाईं हैं वह आज भी अपनी मिसाल आप है।
1857 के बाद उर्दू पत्रकारिता का नया युग आरंभ हुआ। कुछ महत्वपूर्ण समाचार पत्रों में अवध अखबार लखनऊ, साइंटिफिक गजट अलीगढ़, तहजीव उल अख्लाक अलीगढ़, अवध पंच लखनऊ, पंजाब अखबार लाहौर के नाम लिए जा सकते हैं। इनमें से अवध अखबार लंबे समय तक प्रकाशित होता रहा तथा दैनिक में तब्दील हुआ। इस अखबार ने मुंशी नवल किशोर के प्रकाशन में तथा रतन नाथ के संपादन में कई उपलब्धियां हासिल कीं। उर्दू में प्रथम दैनिक होने का श्रेय उर्दू गाइड कलकत्ता को प्राप्त है, जिसकी स्थापना 1858 में मौलवी कबीर उद-दिर- अहमद खान ने की थी। 1857 के बाद 18 नई पत्रिकाएं आरंभ हुई, जिसमें 11 उर्दू की थीं। उर्दू पत्रकारिता की यही परंपरा मुंशी दंपत राय प्रेम चंद्र तक आती है जिन्होंने प्रगतिशील आंदोलन की नींव डाली और देश भर के साहित्य में एक सी वैचारिक क्रांति को जन्म दिया।
लेकिन इसी के समानांतर उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में हिन्दी-उर्दू और हिन्दू-मुसलमान को दो अलग-अलग धार्मिक समूहों के तौर पर प्रचारित करने की परंपरा भी शुरू हो चुकी थी। जिसमें हिन्दू, हिन्दू, हिन्दुस्तान के नारे को प्रताप नारायण मिश्र और बंकिम चंद्रटर्जी बुलंद करने का प्रयास कर रहे थे तो अल्लामा शिबली नोमानी उर्दू में सफरनामा-ए-मिस्रो-शाम और मौलाना हाली हयाते जावेद लिख रहे थे। फ़िरदौस-ए-बरीं और ज़वाले बग़दाद जैसे उपन्यास इसी ज़ेहनियत के लोगों की रचनाएं हैं जिनमें इस्लाम धर्म के हवालों से मुसलमानों की वीर-गाथाओं, बुलंद हौसलों, दयालू स्वभाव और धार्मिक जोशो-खरोश को पैन इस्लामिक सतह पर पेश किया गया है।
हालांकि, स्वतंत्रता संग्राम के जोश और प्रगतिशील आंदोलन की बयार में ऐसे विचारों को ज़्यादा फलने-फूलने का मौक़ा तो नहीं मिला। लेकिन ऐसी सोच ने धार्मिक संगठनों का रूप लेकर अपने ज़मीन तैयार करने में ज़रूर सफलता हासिल कर ली। और देश का बंटवारा होते ही इसके फलने-फूलने का भरपूर मौक़ा मिला। यही वजह थी की बंटवारे के बाद उर्दू की उस परंपरा को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचा, जिसकी धारा अमीर खुसरो से चलकर प्रेम चंद्र तक पहुंची थी। उर्दू पत्रकारिता भी उसी के प्रहार की शिकार बनी।
बंटवारे के बाद उर्दू की उस सर्वमान्य परंपरा को हिन्दी सिनेमा में ठिकाना मिला, जो आधुनिक भारतीय संस्कृति के नए केंद्र के तौर पर अपने पैर जमा रहा था। आज उस उर्दू की जिस परंपरा की हमें कभी-कभी छिट-फुट खुशबू मिलती है, उसे हिन्दी सिनेमा से जुड़े कुछ प्रगतिशील लेखकों और कवियों ने ही बचा कर रखा है। जिसमें अली सरदार जाफरी, कैफी आज़मी,मजरूह सुलतानपूरी, नीरज, जां निसार अख्तर, अखतरुलईमान और गुलज़ार सरीखे लेखकों के नाम शामिल हैं।
इस तरह हम कह सकते हैं कि आज के तकनीकी संसाधनों से लैस प्रिंट या इलेक्ट्रानिक उर्दू पत्रकारिता के हाशिए से निकलकर मुख्यधारा की पत्रकारिता में शामिल होने की संभावनाएं बहुत ज़्यादा हैं। शर्त ये है कि उर्दू पत्रकारिता उर्दू की उस अज़ीम परंपरा में दोबारा वही जान फूंकी जाए जिसके लिए वह अबतक जानी पहचानी और पसंद की जाती है।

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