मंगलवार, 12 जुलाई 2011

82 साल का खुशवंत सिंह/ बयासी साल का ज़िंदादिल जवान




दिल्ली के साहित्य प्रेमियों को हर साल 28 अगस्त का इंतज़ार रहता है. साहित्यकारों को तो खासतौर पर. हर साल यह दिन दिल्ली में एक उत्सव की तरह मनाया जाता है. दिल्ली के सारे साहित्यकार एक जगह इकट्ठा होते हैं, जमकर खाते-पीते हैं. महानगर की इस भागदौड़ और आपाधापी की ज़िंदगी में कई लोग तो ऐसे भी होते हैं, जो साल भर बाद इस दिन ही मिलते हैं. उत्सव सरीखे जश्न का यह मौक़ा होता है वरिष्ठ लेखक एवं हंस के संपादक राजेंद्र यादव के जन्मदिन का. मैं नब्बे के दशक की शुरुआत में दिल्ली आया. शुरुआत के कुछ वर्ष छोड़ दें तो तबसे लेकर तक़रीबन हर साल यादव जी के जन्मदिन के जश्न का गवाह रहा हूं. एक बार तो बिन बुलाए भी पहुंच गया. कई लोगों से मैं पहली बार राजेंद्र यादव के जन्मदिन के मौक़े पर ही मिला. हिंदी के वरिष्ठतम लेखकों में से एक श्रीलाल शुक्ल जी से मेरी पहली  मुलाक़ात राजेंद्र जी के जन्मदिन के मौक़े पर हुई थी. उस वर्ष राजेंद्र जी का जन्मदिन कवि उपेंद्र कुमार के पार्क स्ट्रीट के सरकारी बंगले पर ही मनाया गया था. श्रीलाल जी से मुलाक़ात और साहित्यकार के अलावा उनके सतरंगे व्यक्तित्व से परिचित होना मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य की तरह था. यादव जी के जन्मदिन के मौक़े पर ही मैंने प्रभाष जोशी को उनका पांव छूते देखा. ख़ैर ये अवांतर प्रसंग हैं, जिन पर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी.
यादव जी का जन्मदिन बेहद क़रीबी लोगों के साथ मनाया जाए. अजय नावरिया को उनकी इस मुहिम में साथ मिला उत्साह और ऊर्जा से लबरेज पत्रकार गीताश्री का. नियत समय पर हम लोग दिल्ली के रायसीना रोड स्थित प्रेस क्लब में इकट्ठा हुए. तीस-चालीस आमंत्रित लोगों के साथ राजेंद्र जी ने केक काटा. सबने हैप्पी बर्थ डे टू यू गाया, तालियां बजीं. लेकिन सबसे दिलचस्प रहा राजेंद्र जी के दोस्त डॉक्टर सक्सेना का गिफ्ट. सक्सेना जी ने यादव जी को एक ढोल दिया, जिसके एक ओर चिपका था- दलित, दूसरी ओर मुसलमान और तीसरी ओर स्त्री. संदेश यह था कि राजेंद्र जी साहित्य में दलित, मुसलमान और स्त्रियों की समस्याओं का ढोल पीटते हैं तो अब उनके गले में असल में ही ढोल डाल दिया जाए.
इस बार अपने जन्मदिन से कुछ रोज पहले राजेंद्र जी की तबियत इतनी बिगड़ गई थी कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था. पता चला था कि शरीर में शुगर की कमी हो गई. अस्पताल से भरपूर मिठास लेकर यादव जी घर लौटे थे. मेरी इस दौरान लगातार बात होती रही. मैं लगातार पूछता रहा कि इस बार जन्मदिन का जश्न कहां हो रहा है, लेकिन यादव जी टालते रहे. फिर एक दिन फोन किया और जश्न-ए-जन्मदिन के बारे में पूछताछ की तो पता चला कि वह तो अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स में भर्ती हैं. जब और हालचाल जानने की कोशिश में बात आगे बढ़ी तो राजेंद्र जी ने बताया कि वह कुछ टेस्ट के लिए भर्ती हुए हैं, चिंता की बात नहीं है. बातचीत करने के बाद लगा कि शायद इस बार यादव जी का जन्मदिन न मनाया जाए, लेकिन सत्ताइस अगस्त की शाम को लेखक अजय नावरिया का एक संदेश प्राप्त हुआ, राजेंद्र यादव जी अपनी ज़िंदगी के 82वें साल में प्रवेश कर रहे हैं, इस मौक़े पर प्रेस क्लब में होने वाले आयोजन में आप आमंत्रित हैं. संदेश के बाद अजय नावरिया ने फोन भी किया. पता चला कि आयोजकों ने यह तय किया है कि इस बार यादव जी का जन्मदिन बेहद क़रीबी लोगों के साथ मनाया जाए. अजय नावरिया को उनकी इस मुहिम में साथ मिला उत्साह और ऊर्जा से लबरेज पत्रकार गीताश्री का. नियत समय पर हम लोग दिल्ली के रायसीना रोड स्थित प्रेस क्लब में इकट्ठा हुए. तीस-चालीस आमंत्रित लोगों के साथ राजेंद्र जी ने केक काटा. सबने हैप्पी बर्थ डे टू यू गाया, तालियां बजीं. लेकिन सबसे दिलचस्प रहा राजेंद्र जी के दोस्त डॉक्टर सक्सेना का गिफ्ट. सक्सेना जी ने यादव जी को एक ढोल दिया, जिसके एक ओर चिपका था- दलित, दूसरी ओर मुसलमान और तीसरी ओर स्त्री. संदेश यह था कि राजेंद्र जी साहित्य में दलित, मुसलमान और स्त्रियों की समस्याओं का ढोल पीटते हैं तो अब उनके गले में असल में ही ढोल डाल दिया जाए. डॉक्टर सक्सेना इसके पहले भी राजेंद्र जी को बेहद अजूबे गिफ्ट देते रहे हैं. इसके पहले उन्होंने एक ऐसा मुखौटा भेंट किया था, जिसमें दस सिर लगे थे यानी एक लेखक के दस चेहरे. उसके पहले वह हुक्का भेंटकर सबको चौंका चुके थे. जिस तरह से सबको यादव जी के जन्मदिन का इंतज़ार रहता है, उसी तरह हर किसी की यह जानने में भी दिलचस्पी रहती है कि डॉक्टर सक्सेना इस बार क्या भेंट लेकर आने वाले हैं.
बेहद आत्मीयता से फिर खाने-पीने का दौर शुरू हुआ. गीताश्री एक बेहतरीन होस्ट की तरह सबके खाने-पीने का ध्यान रख रही थीं. जैसे ही उन्हें यह जानकारी मिलती कि कोई बग़ैर खाए जाने की बात कर रहा है, किसी को उसके पीछे लगा देतीं और तब तक निश्चित होकर नहीं बैठती थीं, जब तक कि वह खाना खा नहीं लेता. इस आयोजन में निर्मला जैन, भारत भारद्वाज, असगर वजाहत, पंकज विष्ट, साधना अग्रवाल के अलावा वरिष्ठ पत्रकार शाजी जमां, आशुतोष, अजीत अंजुम, परवेज अहमद और श्रीनंद झा भी मौजूद थे. अशोक वाजपेयी थोड़ी देर से ज़रूर पहुंचे, लेकिन अंत तक डटे रहे. यहां भी अशोक जी के साथ एक मजेदार वाकया हुआ. वह राजेंद्र जी एवं निर्मला जैन के साथ बैठे बातें कर रहे थे. अचानक डॉक्टर सक्सेना अशोक जी के पास पहुंचे और कहा, अशोक जी, जनसत्ता का आपका कॉलम बहुत अच्छा रहता है, आपकी भाषा बेहद शानदार है. यहां तक तो अशोक जी के चेहरे पर वही भाव थे, जो अपनी प्रशंसा सुनकर किसी भी व्यक्ति के चेहरे पर हो सकती है. लेकिन इसके बाद डॉक्टर सक्सेना ने जो कहा, उससे अशोक जी के चेहरे की चमक ग़ायब हो गई. डॉक्टर सक्सेना ने उनकी भाषा की प्रशंसा करते-करते यह कह डाला कि आपकी भाषा में वही रवानगी और ताज़गी है, जो किसी जमाने में शिवानी के लेखन में महसूस की जा सकती थी. यह अगर सक्सेना जी का व्यंग्य था तो बेहद शानदार था और अगर अनजाने में गंभीरतापूर्वक यह बात कही गई थी तो अशोक जी कभी-कभार में इसकी ख़बर ज़रूर लेंगे.
सभी लोग यादव जी से मजे ले रहे थे और उन्हें बयासी साल का होने पर बधाई दे रहे थे. राजेंद्र जी भी इस बेहद आत्मीय आयोजन से प्रसन्न दिख रहे थे. अपने साथी लेखकों से चुटकी भी ले रहे थे. यादव जी की जो एक ख़ूबी है, वह यह है कि उनके साथ रहकर साहित्यिक, ग़ैर साहित्यिक, बच्चा, बूढ़ा, जवान कोई भी बोर नहीं हो सकता. यादव जी जैसे बयासी साल के जवान और गीताश्री जैसी ज़िंदादिल होस्ट ने उस जश्न-ए-सालगिरह को एक यादगार लम्हा बना दिया. अंत में मैं इतना ही कह सकता हूं कि तुम जियो हज़ारों साल, साल के दिन हों पचास हज़ार.
(लेखक आईबीएन-7 से जुड़े हैं)

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