रविवार, 10 जुलाई 2011

सिनेमा के जाल (बाजार) में फंसा मीडिया




मीडिया की गिरती साख पर चिंता जताते हुए लिखा गया कि पत्रकारिता और मीडिया तो बाज़ार की नब्ज़ नहीं पकड़ पाए, उल्टे बाज़ार ने मीडिया की नब्ज़ पकड़ ली. बात का़फी हद तक सही भी है. आज अ़खबार का हर पन्ना और टीवी कार्यक्रम कोई खबर दिखाने से पहले प्रायोजकों को खुश करता है. लेकिन यहां मसला है मीडिया और बाज़ार के सबसे मज़बूत खिलाड़ी बॉलीवुड यानी हिंदी सिनेमा का. एक समय तक अ़खबार और तब के इकलौते टीवी यानी दूरदर्शन पर अपनी झलक दर्ज कराने के लिए तरसने वाला सिनेमा आज हर अ़खबार और चैनल के प्राइम टाइम न्यूज सेगमेंट में मौजूद है. भले ही किसानों की आत्महत्या, महंगाई और राजनीतिक मुद्दों की खबर चले या न चले, पर बिग बी की ट्विटिंग और बिपाशा एवं शिल्पा के जिस्म दिखाऊ योग के कार्यक्रम ज़रूर चलते हैं.
पिछले कुछ दशकों से मीडिया ने सिनेमा के लिए पीआर यानी प्रचारक और ठेकेदार का काम करना शुरू कर दिया. फिल्मों को हिट-फ्लॉप करने का ज़िम्मा उसने खुद ले लिया. जो निर्माता अपनी फिल्म के इश्तेहार, मेकिंग फुटेज, फर्स्ट प्रोमो और कलाकारों के साक्षात्कार मुहैया कराता है, मीडिया उसकी फिल्म को हिट कराने का ज़िम्मा ले लेता है. और जो निर्माता खर्च नहीं कर सकता, उसकी फिल्म तो डूबी समझिए.
अचानक यह हुआ कैसे? सिनेमा आज मीडिया के अर्थोपार्जन का मुख्य ज़रिया कैसे बन गया? यह बदलाव इसलिए हुआ, क्योंकि पिछले कुछ दशकों से मीडिया ने सिनेमा के लिए पीआर यानी प्रचारक और ठेकेदार का काम करना शुरू कर दिया. फिल्मों को हिट-फ्लॉप करने का ज़िम्मा उसने खुद ले लिया. जो निर्माता अपनी फिल्म के इश्तेहार, मेकिंग फुटेज, फर्स्ट प्रोमो और कलाकारों के साक्षात्कार मुहैया कराता है, मीडिया उसकी फिल्म को हिट कराने का ज़िम्मा ले लेता है. और जो निर्माता खर्च नहीं कर सकता, उसकी फिल्म तो डूबी समझिए. पहले मीडिया का यह कारोबार एक सीमित दायरे में सिमटा हुआ था, पर अब तो यह धंधा कुछ ज़्यादा ही गंदा होता जा रहा है. फिल्मों को ज़बरन हिट और फ्लॉप कराने के लिए कुछ चैनल्स बाक़ायदा कैंपेन चलाते हैं, जिसमें चैनल मालिक से लेकर समीक्षक तक सभी शामिल होते हैं.
आइए, मीडिया के कुछ गंदे खेलों का ज़िक्र करते हैं. 2009 की फिल्म चांदनी चौक टू चाइना के कुछ पेड प्रिव्यू रिलीज के एक दिन पहले यानी गुरुवार को रखे गए. आम तौर पर मीडिया को मुफ्त में फिल्म दिखाई जाती है, लेकिन व्यवसायिक कारणों के चलते फिल्म सभी के लिए प्रीमियर की गई. शो खत्म होते ही फिल्म से जुड़े निगेटिव फीडबैक एसएमएस और फोन के ज़रिए देश भर में फैलाए जाने लगे. हालांकि इसमें ज़्यादातर वही लोग थे, जो अक्षय के बढ़ते कद से परेशान थे. एक चैनल के खुलासे के मुताबिक़, उक्त निगेटिव रिव्यू करन और शाहरुख की पीआर कंपनियों से संबंधित थे, लेकिन यहां मीडिया का रवैया चौंकाने वाला था. रिलीज से पहले ही टाइम्स समेत अधिकतर अ़खबारों ने समीक्षा में फिल्म की जमकर आलोचना करते हुए उसे द्रोणा, टशन एवं लव स्टोरी-2050 से भी बदतर बता डाला. जबकि दर्शकों के मुताबिक़ यह फिल्म टाइमपास कॉमेडी थी. लेकिन रातोरात मीडिया ने फिल्म के खिला़फ ऐसा कैंपेन चलाया कि रिलीज से पहले ही फिल्म फ्लॉप! कारण, अक्षय भारतीय मीडिया से ज़्यादा फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित करने में लगे हुए थे. किस्से और भी हैं. 2007 में दीवाली के मौके पर ओम शांति ओम एवं सांवरिया रिलीज हुईं. दीवाली में ज़्यादातर बिग प्रोडक्शन की फिल्में ही रिलीज होती हैं और मुना़फे के चक्कर में दूसरी छोटी फिल्में आगे-पीछे खिसका दी जाती हैं. ऐसे में शाहरुख के सामने अपनी फिल्म रिलीज करने की हिम्मत दिखाई संजय लीला भंसाली ने. सांवरिया को जैसे ही दीवाली में रिलीज करने की घोषणा की गई, तभी से दोनों फिल्मों की टक्कर के बहाने अ़खबार और चैनलों ने जनता को यह बताना शुरू कर दिया कि ओम शांति ओम के सामने सांवरिया कितनी छोटी फिल्म है. ज़ाहिर है शाहरुख को मीडियामैन यूं ही नहीं कहते.
पीआर का सिद्धांत होता है कि कुछ समय पहले से कैंपेन चलाकर किसी भी उत्पाद के प्रति लोगों की न स़िर्फ राय बदली जाए, बल्कि उन्हें यह मानने पर मजबूर किया जाए कि उसका ही उत्पाद बेहतर है. इसके लिए भले ही ओम शांति ओम जैसी चलताऊ मसाला फिल्म के सामने एक रूमानी फिल्म को घटिया साबित कर दिया जाए. यह सिद्धांत काम कर गया. बाद में भंसाली को सार्वजनिक तौर पर कहना पड़ा कि वह खुली आलोचना के लिए तैयार हैं और मीडिया कैंपेन उन्हें फेल नहीं कर सकते. ताज़ा उदाहरण राम गोपाल वर्मा की फिल्म रण का लिया जा सकता है. यह फिल्म टीआरपी की लड़ाई में किसी भी हद तक गिरने वाले दो मीडिया ग्रुपों पर आधारित थी. फिल्म काल्पनिक थी, पर मीडिया को लगा कि यह फिल्म उसे उसका गिरहबान दिखाने की कोशिश कर रही है. बस फिर क्या था, रामू और रण के खिला़फ ऐसा कैंपेन चलाया गया कि फिल्म को फ्लॉप करके ही दम लिया गया. आजकल जनता भी पहले रिव्यू देखती है फिर फिल्म देखने जाती है. जबकि ज़्यादातर रिव्यू पेड होते हैं. ऐसी कई बेहतरीन फिल्मों में शुमार किया जाता है, पर रिलीज के दौरान मीडिया के मार्केटिंग रवैए के चलते उन्हें फ्लॉप करार दिया गया था. इनमें राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता पुकार, रज़िया सुल्तान, नायक, ब्लैक फ्राइडे, ज़ख्म, मेरा नाम जोकर और संघर्ष के नाम लिए जा सकते हैं.
खैर फिल्मों का व्यापार तो चलता रहेगा, पर असल चिंता मीडिया के व्यवसायिक रु़ख और गिरते स्तर की है. आज मीडिया बाज़ार और मुना़फे के चंगुल में कुछ ऐसा फंसा है कि वह फिल्मों का बॉक्स ऑफिस और पीआर डिपार्टमेंट भर बनकर रह गया है. इसीलिए जनता और सिनेमा, दोनों ही तरफ से मीडिया की विश्वसनीयता पर अक्सर सवाल उठते रहते हैं.

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