रविवार, 10 जुलाई 2011

उदयपुर सांप्रदायिक दंगाः राजस्‍थान पुलिस ने गुजरात दोहराया




पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की राजस्थान के उदयपुर ज़िले के सारदा नामक क़स्बे में हुई सांप्रदायिक हिंसा की जांच रिपोर्ट मेरे सामने है. यह हिंसा एक मीणा आदिवासी की हत्या के बाद भड़की. यह हत्या विशुद्ध आपराधिक थी. पीयूसीएल के दल में वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश नंदवाना, विनीता श्रीवास्तव, अरुण व्यास, श्यामलाल डोगरा, श्रीराम आर्य, हेमलता, राजेश सिंह एवं रशीद शामिल थे. इस क़स्बे में कुछ वर्ष पहले भी सांप्रदायिक हिंसा हुई थी. रिपोर्ट के अनुसार, 2 जुलाई को शहजाद ख़ान और उसके दो साथियों ने मोहन मीणा का कत्ल कर दिया. मोहन मीणा अवैध शराब का धंधा करता था और शराब पीने के बाद हुए झगड़े में उसका ख़ून हो गया. इसके बाद तीन दिनों तक (3 से 5 जुलाई) आदिवासियों ने योजनाबद्ध तरीक़े से मुसलमानों की दुकानों में जमकर आगजनी की. जिन मुसलमानों की दुकानें जलाई गईं, उनका हत्या से कोई लेना-देना नहीं था. फिर आठ जुलाई को निकटवर्ती बोरीपाल के भाजपा नेता अमृतलाल मीणा और उनके साथियों ने घोषणा की कि मुस्लिम परिवारों का नाश करना उनका प्राथमिक लक्ष्य है.
जब तक सरकार नहीं चाहेगी, तब तक किसी राज्य में कभी कोई दंगा या बड़ी सांप्रदायिक घटना नहीं हो सकती. बिहार और पश्चिम बंगाल इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं. मुस्लिम और यादव वोटों के सहारे सत्ता में आने के बाद लालू यादव ने बहुत आसानी से राज्य में सांप्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण पा लिया था. उन्होंने साफ कर दिया कि अगर चौबीस घंटे के भीतर सांप्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो संबंधित पुलिस अधिकारियों को तुरंत निलंबित कर दिया जाएगा.
क्षेत्र के एसडीएम एवं पुलिस उपाधीक्षक ने दोनों पक्षों की बैठक बुलाई और समस्या का हल निकालने की पेशकश की. बैठक में आदिवासियों के प्रतिनिधियों, जो सभी बजरंगदल के सदस्य थे, ने कहा कि वे मुस्लिम परिवारों का नाश करने का अपना इरादा तभी त्यागेंगे, जब स्थानीय मुसलमान यह घोषणा करें कि वे मोहनलाल मीणा की हत्या में शामिल तीनों आरोपियों का पूर्णत: बहिष्कार करेंगे और इस आशय की सूचना अख़बारों में छपवाई जाएगी. यद्यपि इस मांग की कोई क़ानूनी वैधता नहीं थी और आरोपियों पर क़ानून के अनुसार मुक़दमा चलाया जाना चाहिए था, परंतु शांति बनाए रखने की खातिर स्थानीय मुसलमानों ने इस मांग को स्वीकार कर लिया. तीनों आरोपियों को बिरादरी से बाहर करने की घोषणा कर दी गई. इस बारे में सारदा के तहसीलदार को आधिकारिक रूप से सूचित किया गया और उदयपुर से प्रकाशित एक राष्ट्रीय दैनिक में यह ख़बर छपवाई गई. पीयूसीएल की रिपोर्ट के अनुसार, हिंदू संगठनों के बहकावे में आकर आदिवासियों ने अपना वादा नहीं निभाया और 18 जुलाई को क़स्बे में बड़े पैमाने पर ऐसे पर्चे बांटे गए, जिनमें कहा गया कि आदिवासी मुस्लिम परिवारों के ख़िला़फ अपनी लड़ाई जारी रखेंगे. पीयूसीएल ने ऐसे सुबूत इकट्ठे किए हैं, जिनसे यह ज़ाहिर होता है कि 18 से 24 जुलाई के बीच विभिन्न संगठनों द्वारा क्षेत्र के आदिवासियों को हथियार बांटे गए. रिपोर्ट के अनुसार, पालसारदा, पालसाईपुर सहित कई गांवों में सेवानिवृत्त शिक्षक धनराज मीणा एवं पंचायत के उपसचिव कालू शंकर मीणा ने हथियार बांटे.
सारदा के मुसलमानों को जब इस घटनाक्रम का पता लगा तो उन्होंने उच्चाधिकारियों एवं स्थानीय नेताओं को इसकी जानकारी दी और अनुरोध किया कि क़स्बे में सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए जाएं. इसके बाद 25 जुलाई को अपरान्ह लगभग चार बजे बड़ी संख्या में आदिवासी एक छात्रावास के नज़दीक इकट्ठा हुए और मुसलमानों की दुकानों और मकानों पर हमले करने लगे. इनमें से एक मकान सेवानिवृत्त प्राचार्य अहमद हुसैन का था, जिन्हें पत्थरबाज़ी में गंभीर चोटें भी आईं. यह अफवाह फैलाई गई कि एक मुस्लिम ने आदिवासियों पर गोली चला दी, परंतु बाद में पुलिस ने इस अफवाह को सही नहीं पाया. आदिवासी ढोल बजाते हुए इकट्ठा होकर अपने साथियों को मुसलमानों पर हमला करने के लिए उकसा रहे थे, परंतु प्रशासन ने कोई कार्यवाही नहीं की. आदिवासी मुस्लिम मुहल्लों पर हमले करते रहे. सुरक्षा के लिए पुलिस मुसलमानों को थाने ले आई. मौक़ा पाकर आदिवासियों ने खाली घरों को जमकर लूटा और उनमें आग लगा दी. ऐसे घरों की संख्या लगभग 70 बताई जाती है. सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि ज़िला प्रशासन ने हिंसा को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया. जिस समय मुसलमानों के घर जलाए जा रहे थे, उस समय सारदा में ज़िला मजिस्ट्रेट, पुलिस अधीक्षक एवं अन्य अधिकारी मौजूद थे. ज़िले के उक्त शीर्ष अधिकारी आदिवासियों द्वारा मुसलमानों के घरों को लुटता-फुंकता देखते रहे.
चौंकाने वाली बात यह है कि इन अधिकारियों के ख़िला़फ आज तक राज्य के मुख्यमंत्री या गृहमंत्री द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई है. मेरे निवेदन पर मुसलमानों का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल प्रोफेसर मोहम्मद हसन एवं प्रोफेसर सलीम इंजीनियर के नेतृत्व में दो दंगापीड़ितों के साथ मुख्यमंत्री से मिला और उनसे अनुरोध किया गया कि वह ज़िले के उन उच्चाधिकारियों को निलंबित करें, जिनकी आंखों के सामने मुसलमानों के 70 घर लूटे-जलाए गए. मुख्यमंत्री ने कहा कि वह संभागायुक्त से मामले की जांच कराएंगे. राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है. मुसलमानों ने पिछले चुनाव में कांग्रेस को अपना पूरा समर्थन दिया था, क्योंकि उन्होंने राज्य में भाजपा शासन के दौरान हुए भगवाकरण को देखा और भुगता था. गुजरात के दंगों के प्रकाश में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सांप्रदायिक हिंसा विधेयक तैयार कर रही है, ताकि भविष्य में गुजरात जैसी घटनाएं न हों. लेकिन दु:ख की बात यह है कि जब मुसलमानों के घर जलाए-लूटे जा रहे थे, तब वहां जिले के आला अधिकारियों के अलावा एक कांग्रेस विधायक भी मौजूद था. यह विधायक भी मीणा आदिवासी है. क्या केंद्र सरकार वाकई सांप्रदायिक हिंसा पर रोक लगाने की इच्छुक है? उदयपुर के अधिकारियों ने जिस तरह का व्यवहार किया, उससे कई प्रश्न उभरते हैं. क्या मुख्यमंत्री को इस गंभीर घटना की जानकारी नहीं थी? अगर नहीं तो संबंधित अधिकारियों ने उन्हें अंधेरे में क्यों रखा और यदि हां तो फिर मुख्यमंत्री ने दोषी अधिकारियों के विरुद्ध त्वरित और कड़ी कार्यवाही क्यों नहीं की?
गुजरात में पुलिस ने दंगाइयों का साथ दिया था. क्या कांग्रेस शासित राजस्थान की पुलिस का व्यवहार कुछ अलग था? यह तर्क दिया जा सकता है कि गुजरात में जो कुछ हुआ, उसे सरकार का अपरोक्ष समर्थन हासिल था. राजस्थान के मामले में शायद ऐसा नहीं रहा होगा, परंतु क्या हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि मुख्यमंत्री को अधिक सतर्क रहना था और सांप्रदायिक सोच वाले अधिकारियों के ख़िला़फ कठोर कार्यवाही करनी थी. जब तक सरकार नहीं चाहेगी, तब तक किसी राज्य में कभी कोई दंगा या बड़ी सांप्रदायिक घटना नहीं हो सकती. बिहार और पश्चिम बंगाल इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं. मुस्लिम और यादव वोटों के सहारे सत्ता में आने के बाद लालू यादव ने बहुत आसानी से राज्य में सांप्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण पा लिया था. उन्होंने साफ कर दिया कि अगर चौबीस घंटे के भीतर सांप्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो संबंधित पुलिस अधिकारियों को तुरंत निलंबित कर दिया जाएगा. उन्होंने यादवों को भी चेतावनी दी कि अगर वे सत्ता का मजा लूटते रहना चाहते हैं तो सांप्रदायिक हिंसा भड़काने या उसमें भाग लेने से बाज आएं.
लालू यादव के 15 वर्षीय शासनकाल में बिहार में एक भी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ. चूंकि नीतीश कुमार मुसलमानों को लालू शिविर से अपने शिविर में लाना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने भी अब तक बिहार को दंगामुक्त राज्य बना रखा है. यही नहीं, मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए नीतीश कुमार ने यह सुनिश्चित किया कि भागलपुर दंगों के दोषियों को सज़ा मिले. लालू ने इस काम में कोई रुचि इसलिए नहीं ली थी, क्योंकि अधिकांश आरोपी यादव थे. इसी तरह एक समय पश्चिम बंगाल सांप्रदायिक हिंसा का बड़ा केंद्र था, परंतु वाममोर्चा सरकार ने सत्ता में आते ही एक सर्कुलर जारी किया कि जो पुलिस अधिकारी 24 घंटे के भीतर सांप्रदायिक हिंसा रोकने में विफल रहते हैं, उन्हें स्वयं को निलंबित समझना चाहिए. पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा तीस वर्षों से भी अधिक समय से शासन कर रहा है, परंतु इस अवधि में राज्य में एक भी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ. एकमात्र अपवाद मुर्शिदाबाद में हुई सांप्रदायिक हिंसा थी, जिस पर बहुत जल्दी नियंत्रण पा लिया गया था.
सांप्रदायिक दंगों के मामले में सरकार की इच्छाशक्ति का बहुत महत्व होता है. यह खेदजनक है कि उदयपुर के उन दोषी अधिकारियों के ख़िला़फ कोई कार्यवाही नहीं की गई, जिनकी उपस्थिति में मुसलमानों के घर लूटे और जलाए गए. राजस्थान में दस वर्ष तक भाजपा का शासन रहा. इस दौरान संघ की पृष्ठभूमि और मानसिकता वाले राज्य पुलिस-प्रशासनिक सेवाओं के अनेक अधिकारियों को आईएएस एवं आईपीएस में पदोन्नत किया गया. इससे राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा गई और आरएसएस, विहिप एवं बजरंग दल आदि जैसे संगठनों की ताकत में ज़बरदस्त वृद्धि हुई. जैसा कि हम जानते हैं कि पिछले कुछ दशकों से आरएसएस आदिवासी क्षेत्रों में बहुत सक्रियता से काम कर रहा है और आश्चर्य नहीं कि मुसलमानों के घरों में लूटपाट-आगजनी करने वाले आदिवासी हिंदू संगठनों के सदस्य थे. राजस्थान के मुख्यमंत्री की छवि एक धर्मनिरपेक्ष नेता की है. वह निश्चित रूप से इन सभी तथ्यों से  अवगत होंगे और उन्हें ज़िला स्तर के अधिकारियों को स्पष्ट शब्दों में यह संदेश देना चाहिए कि पुलिस-प्रशासन में सांप्रदायिकता को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि के कारण राजस्थान में भाजपा के कई वर्षों के कुशासन के बाद कांग्रेस सत्ता में आई है और उसे राज्य प्रशासन को सांप्रदायिक तत्वों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए तत्परता से कदम उठाने चाहिए. खेद का विषय है कि यह तत्परता कहीं दिखाई नहीं दे रही है.
मुस्लिम बुद्धिजीवियों को सांप्रदायिक सद्भाव-शांति बनाए रखने में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी और सरकार को इस बात के लिए मजबूर करना होगा कि वह दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही करे. मुख्यमंत्री को यह सुनिश्चित करना होगा कि सांप्रदायिक मानसिकता वाले अधिकारियों को हटाया जाए और उनके स्थान पर धर्मनिरपेक्ष एवं उदार सोच वाले ऐसे अधिकारियों की पदस्थापना की जाए, जो सांप्रदायिक सद्भाव और शांति को बढ़ावा दें. अगर उदयपुर के ज़िला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक को तुरंत निलंबित कर दिया जाता है तो नौकरशाही तक सही संदेश जाएगा. अगर ऐसा नहीं किया गया तो फिरकापरस्त नौकरशाहों की हिम्मत बढ़ेगी और राजस्थान को दूसरा गुजरात बनने में देर नहीं लगेगी. भाजपा यही चाहती है. उसने अपने दस वर्ष के शासन में सांप्रदायिकता का मूलभूत ढांचा खड़ा कर दिया है. अभी भी देर नहीं हुई है. अगर मुख्यमंत्री अपनी छवि को बेदाग बनाए रखना और कांग्रेस को एक धर्मनिरपेक्ष दल के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं तो उन्हें चुप नहीं बैठना चाहिए. मैं चालीस साल से सांप्रदायिक सद्भाव के लिए काम कर रहा हूं और मेरा यह अनुभव है कि धर्मनिरपेक्षता के प्रति कांग्रेस की सैद्धांतिक प्रतिबद्धता है, परंतु वह अक्सर आकार नहीं ले पाती. इसके विपरीत जनता दल, आरजेडी एवं अन्य पार्टियां सांप्रदायिकता के ख़िला़फ बोलती हैं और उससे लड़ती भी हैं.
(लेखक जाने-माने इस्लामिक विद्वान हैं)

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