गुरुवार, 7 जुलाई 2011

मीडिया की कक्षा में



राजकिशोर, वरिष्ठ पत्रकार
पत्रकारिता या मीडिया पढ़ाने के प्रोफेशन में तो मैं नहीं हूं, हालांकि कुछ दिनों तक, जब पैसों की जरूरत थी, कोशिश की थी कि कहीं भी यह काम मुझे मिल जाए। निश्चय ही मेरी यह कोशिश गंभीर नहीं थी और इसलिए अपनी विफलता पर ज्यादा दुख भी नहीं हुआ, लेकिन पाया मैंने यह कि पार्ट टाइम या कितनी कक्षाएं लीं, इस आधार पर तय होनेवाले पारिश्रमिक की व्यवस्था में पढ़ाने का काम भी रैकेट के रूप में स्थापित हो चुका है। जैसे मीडिया संस्थानों को वाकई काबिल लोग नहीं चाहिए, वैसे ही पत्रकारिता पढ़ाने वाले संस्थानों को भी वाकई योग्य शिक्षक नहीं चाहिए। मेरी इस स्थापना में किसी प्रकार की आत्म-प्रशंसा की तलाश न की जाए। यह एक यथार्थ है और इस नतीजे पर मैं बहुत कुछ देख और सुन कर ही पहुंचा हूं। सच कहूं तो जैसे ही मुझे इस रैकेटनुमा व्यवस्था की भनक मिली, मैंने इस दिशा में कोशिश करना ही छोड़ दिया। जिंदगी में दूसरे फ्रस्ट्रेशन क्या कम हैं जो एक और के लिए लालायित हुआ जाए !
फिर भी, समय-समय पर, जहां-तहां पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाने या संबोधित करने का मौका मिलता रहा। अन्य शिक्षक क्या पढ़ाते हैं और पत्रकारिता के पाठ्यक्रम का स्वरूप क्या है, यह भी जानने का अवसर मिलता रहा। अपने अनुभव और दूसरों के अभ्यास के बारे में मिली हुई जानकारी के आधार पर मैं यह कहना चाहता हूं कि पत्रकारिता या मीडिया की कक्षाओं में ज्यादातर चर्चा इस माध्यम  के विभिन्न पहलुओं तक ही सीमित रहती है। बेशक, खबर क्या है, क्या नहीं, पत्रकार और पत्र स्वामी के बीच संबंध कैसा होना चाहिए, समाज के प्रति पत्रकार की जिम्मेदारी क्या है आदि-आदि सवालों पर चर्चा पत्रकारिता की कक्षा में नहीं होगी, तो और कहां होगी? मीडिया के बदलते हुए चरित्र की जांच-पड़ताल मीडिया के शिक्षक और छात्र नहीं करेंगे, तो और कौन करेगा? लेकिन पत्रकारिता की पढ़ाई यहीं तक सीमित हो कर रह जाए, तो यह कुछ उसी तरह का मामला है जैसे आंखें दिन-रात अपनी ही चर्चा करती रहें कि उन्हें किस तरह देखना चाहिए, कुछ आंखें गलत क्यों देखती हैं, दृष्टि विकार को दूर करने का तरीका क्या है, जब अलग-अलग आंखें एक ही दृश्य को अलग-अलग तरह से देखने लगें, तो सत्य तक कैसे पहुंचें आदि-आदि। ऐसा करने से दृश्य की तुलना में दृष्टि का महत्व कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है।
मेरा निवेदन यह है कि पत्रकारिता की कक्षाओं मे सिर्फ पत्रकारिता की ही चर्चा नहीं होनी चाहिए; उन तमाम चीजों पर भी बातचीत होनी चाहिए जो पत्रकारिता के विषय हैं। सामान्यत: पत्रकारिता के कोर्स में जो लड़के-लड़कियां प्रवेश लेते हैं, वे ग्रेजुएट होते हैं। ग्रेजुएशन स्तर पर जिसने राजनीतिविज्ञान पढ़ा है, वह वर्तमान राजनीति के बारे में कुछ खास नहीं जानता, जिसने समाजशास्त्र पढ़ा है, उसे समाज के बारे में कुछ पाठ्यपुस्तकीय जानकारी होती है और जिसने अर्थशास्त्र की पढ़ाई की है, वह आज की अर्थव्यवस्था की बारीकियों से अवगत नहीं होता। ये इन विद्यार्थियों की सहज सीमाएं हैं और पत्रकारिता के शिक्षकों को इसका बुरा नहीं मानना चाहिए। लेकिन यह उनका दायित्व जरूर है कि वे अपने छात्रों के सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक सामान्य ज्ञान को अपडेट करते रहें। पत्रकारिता की पढ़ाई जितनी पत्रकारिता के बारे में होनी चाहिए, पत्रकारिता के विषयों के बारे में उससे तनिक भी कम नहीं।
उदाहरण के लिए, अगर किसी छात्र को क्राइम रिपोर्टिंग पढ़ाई जा रही है, तो उसके लिए इतना जानना ही काफी नहीं है कि कहीं अपराध घटित हुआ है, तो उसके किन-किन पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए और अपनी रिपोर्ट किस तरह लिखनी चाहिए। ऐसे पत्रकार को अपराध विज्ञान के मोटे-मोटे सिद्धांतों से भी अवगत होना चाहिए। नहीं तो वह अपराध की बाहरी शक्ल तक ही सीमित रह जाएगा और अपराध की सामाजिक पृष्ठभूमि को भुला देना उसकी आदत बन जाएगी। यह सच है कि रिपोर्टर का काम हर जगह सिद्धांत झाड़ने या बारीक विश्लेषण करना नहीं है। इससे लोग ऊब जाएंगे और आपकी रिपोर्ट पढ़ना छोड़ देंगे। दूसरी तरफ, अपराध का बीट आपसे ले कर किसी और को दे दिया जाएगा, जो लोगों को जानकारी दे, ज्ञान नहीं। इसलिए जिसे सामाजिक पृष्ठभूमि कहा जाता है, वह अंडरकरंट की तरह, इशारे के रूप में या रिपोर्ट में थोड़ी गंभीरता लाने के लिए जोड़ी जानी चाहिए। कहने की जरूरत नहीं कि अपराध सिर्फ घटना नहीं होती, वह एक परिघटना भी होती है।
हर पत्रकार को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि वह समाज की आंख है। समाज हर जगह नहीं पहुंच सकता, इसलिए उसने पत्रकारिता नाम की एक संस्था बनाई है जो उसकी ओर से यह काम करे। इसलिए आप समाज को क्या, कितना और कैसे बताते हैं, इसी से यह तय होता है कि आप अपने समाज से कितना प्यार करते हैं।

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