रविवार, 10 जुलाई 2011

वर्धा में दो दिन




बेहद सर्द सुबह थी, कोहरा इतना घना था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. मैं बात कर रहा हूं जनवरी के पहले हफ्ते की, जब अचानक दिल्ली में सर्दी कम हुई थी और कोहरा घना हो गया था. मुझे वर्धा जाना था और उसके लिए नागपुर की फ्लाइट लेनी थी, जो दिल्ली एयरपोर्ट से सुबह सवा पांच बजे थी. ज़ाहिर तौर पर मुझे घर से तड़के  साढ़े तीन बजे निकलना था. टैक्सी लेकर घर से निकला तो कार की लाइट और कोहरे के बीच संघर्ष में कोहरा जीतता नज़र आ रहा था. इंदिरापुरम का इलाक़ा कुछ खुला होने की वजह से कोहरा और भी ज़्यादा था. एक जगह तो हमारी गाड़ी डिवाइडर से टकराते-टकराते बची. सामने कुछ दिख नहीं रहा था, अंदाज़ से गाड़ी चल रही थी, लेकिन वर्धा का गांधी आश्रम और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय देखने की इच्छा मन में इतनी ज़्यादा थी कि वह कोहरे पर भारी पड़ रही थी. किसी तरह चलते-चलाते हम हवाई अड्डे तक पहुंचने वाले थे, लेकिन ड्राइवर के सुझाव पर हम हवाई अड्डे के ठीक पहले चाहरदीवारी से घिरे गांव मेहरमपुर में घुस गए. हवाई अड्डे के पहले इतनी बड़ी बस्ती, जिसका हमें आज तक एहसास भी नहीं था. वह पूरी बस्ती तो सुबह चार-सवा चार बजे पूरी तरह से जगमगा रही थी. चाय की दुकानें खुली थीं और कुरियर कंपनी के कर्मचारी अपने काम में तन्मयता से लगे थे. उन्हें देखकर लग रहा था कि न तो उन्हें ठंड का एहसास था और न ही कोहरे का भय. हमने भी वहां रुककर चाय पी. उस हाड़ कंपा देने वाली ठंड में चाय पीने का आनंद ही कुछ और था. इच्छा थी उस बस्ती में घूमकर वहां की ज़िंदगी को देखता, लेकिन फ्लाइट छूटने से घंटे भर पहले पहुंचने की मजबूरी की वजह से यह संभव नहीं हो पाया.
वरिष्ठ पत्रकार एवं ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव एन के सिंह, जी न्यूज़ के एंकर एवं राजनीतिक संपादक पुण्य प्रसून वाजपेयी, आगरा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष गिरिजा शंकर शर्मा और मैं. एन के सिंह ने बीज वक्तव्य में जोर देकर इस बात को कहा कि आज समाज के हर क्षेत्र में मूल्यों में गिरावट देखी जा सकती है, चाहे वह राजनीति हो, कार्यपालिका हो या फिर विधायिका. उन्होंने तर्कपूर्ण तरीक़े से अपनी बात रखते हुए कहा कि मूल्यों के क्षरण की समस्या हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में खामी की वजह से है.
लगभग सवा घंटे की उड़ान के बाद जब सुबह सवा सात बजे नागपुर पहुंचा तो बेहद शांत हवाई अड्डा शहर के मिजाज़ का भी एहसास करा रहा था. थोड़ी देर वहां रुकने के बाद मैं वर्धा के लिए रवाना हो गया, क्योंकि सुबह ग्यारह बजे से वहां दो दिनों का राष्ट्रीय सेमिनार होना था, जिसमें भाग लेने के लिए व़क्त पर पहुंचना ज़रूरी था. नागपुर से तक़रीबन डेढ़ घंटे में वर्धा पहुंचा. विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश करते ही सामने फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास दिखा. वहीं हमारे रुकने का इंतज़ाम था और पत्रकारिता के उत्साही छात्र हमारे स्वागत के लिए खड़े थे. वहीं हमारी मुलाक़ात जनमोर्चा के संपादक एवं बुज़ुर्ग पत्रकार शीतला सिंह और वरिष्ठ लेखक गंगा प्रसाद विमल से हुई. विमल जी सुबह की सैर से लौटकर आए थे और शीतला सिंह छात्रावास के बाहर धूप सेंक रहे थे. सुबह वहां भी ठीकठाक ठंड थी, लेकिन लोग बता रहे थे कि दिन में मौसम गर्म हो जाता है. शीतला सिंह से गपशप करते हुए पुराने हिंदुस्तानी प्रदीप सौरभ से मुलाक़ात हो गई. खुले आकाश के नीचे बैठकर ठंड में धूप का आनंद लेना दिल्ली में तो कभी नसीब नहीं हुआ, इसलिए छात्रों के बार-बार कमरे में जाकर आराम करने की सलाह को नज़रअंदाज़ करते हुए वहीं बैठा रहा. कुछ देर बाद पत्रकारिता विभाग के युवा एवं उत्साही प्रोफेसर और अध्यक्ष अनिल के राय अंकित भी आ गए, जो इस कार्यक्रम के संयोजक थे. उनसे गपशप करने के बाद विश्वविद्यालय के दिल्ली केंद्र प्रभारी मनोज राय के साथ मैं कैंपस घूमने निकल गया. हम वहां भी गए, जहां बैरकनुमा चार कमरों से विश्वविद्यालय शुरू हुआ था. सड़क के आमने-सामने विश्वविद्यालय के दो कैंपस हैं, लेकिन अभी मुख्य कैंपस में ही ज़्यादा हलचल और चहलपहल थी, क्योंकि विश्वविद्यालय के तमाम अधिकारियों के दफ्तर और आवास इसी कैंपस में हैं. पूरे विश्वविद्यालय कैंपस के  चारों ओर रिंग रोड बनाकर उसे सुरुचिपूर्ण तरीक़े से एक आकार दिया जा रहा है. ऊपर एक जगह गांधी हिल है, जहां पहाड़ी के हिस्से को एक छोटे पार्क के तौर पर विकसित किया गया है, जिसमें तीन बंदरों की मूर्तियों के अलावा गांधी जी की घड़ी और उनका चश्मा भी है. पहाड़ी के  ऊपर पानी की कमी के बावजूद गांधी हिल पर तमाम फूल-पौधे लहलहा रहे थे. छात्रों ने बताया कि कुलपति की व्यक्तिगत रुचि की वजह से ही यह हो पाया.
नियत समय पर हम लोग विश्वविद्यालय के हबीब तनवीर सभागार में पहुंचे और बाबू विष्णुराव पराड़कर को नमन कर कार्यक्रम शुरू हुआ. बनारस से आए विद्वान प्रोफेसर राममोहन पाठक और कोलकाता विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग की प्रोफेसर ताप्ती बसु का भाषण हुआ. बोझिल से कार्यक्रम में गर्मी आई, जब हरिभूमि के संपादक हिमांशु द्विवेदी ने जोशीले अंदाज़ में यह साबित करने की कोशिश की कि पत्रकारिता भी कारोबार है और पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए पाठक भी ज़िम्मेदार हैं. हिमांशु ने कहानियां, चुटकुले और शेर सुनाकर ख़ूब तालियां बटोरीं, लेकिन बाद में जब गंगा प्रसाद विमल और कुलपति विभूति नारायण राय बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने हिमांशु के भाषण की धज्जियां उड़ा दीं. जोश में विमल जी ने तो सारे संपादकों और पत्रकारों को बिचौलिया क़रार दे दिया. कुलपति ने भी डंके की चोट पर कहा कि पत्रकारिता और किसी व्यवसाय की तरह नहीं है. जब भी मीडिया की आज़ादी पर हमला हुआ तो पूरा समाज उसके ख़िला़फ खड़ा हो गया. इस वजह से मीडिया से समाज की अपेक्षा भी है. लेकिन जोश में कुलपति ने भी मीडिया संपादकों को भ्रष्ट क़रार दे दिया. जिस पर बाद में उन्होंने अगले दिन, जब यह मुद्दा उठा तो सफाई देते हुए कहा कि उन्हें मिसकोट किया गया. दो सत्रों में यह विमर्श हुआ. दोनों सत्रों में बुज़ुर्ग प्रोफेसरों और पत्रकारों ने विमर्श किया, जिनकी बातें सुनकर मैं बहुत ज़्यादा निराश हुआ. पत्रकारिता कहां से कहां चली गई, लेकिन वे लोग अब भी मिशन की लकीर पीट रहे हैं. मुझे लगता है कि पत्रकारिता पर बात हो तो युवा पत्रकारों को ज़्यादा मौक़ा मिलना चाहिए, क्योंकि विश्वविद्यालय के बुज़ुर्ग प्रोफेसर न तो नई तकनीक से अवगत हैं और न मीडिया में पिछले दशक में आए बदलाव से. ऐसे में पत्रकारिता के छात्रों को हम नैतिकता और मिशन की घुट्टी तो पिला देते हैं, लेकिन व्यवहारिकता छूट जाती है. अनिल के राय अंकित युवा विभागाध्यक्ष हैं और उम्मीद करता हूं कि भविष्य में इस तरह के सेमिनार में वह युवाओं को भी बराबरी का मौक़ा देंगे. इससे छात्रों को नई तकनीक और माहौल में काम करने का तरीक़ा और दबाव दोनों का पता चलेगा.
अगले दिन टीवी पर केंद्रित सत्र था, जिसकी अध्यक्ष कोलकाता विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग की अध्यक्ष ताप्ती बसु थीं और वक्ता थे वरिष्ठ पत्रकार एवं ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव एन के सिंह, जी न्यूज़ के एंकर एवं राजनीतिक संपादक पुण्य प्रसून वाजपेयी, आगरा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष गिरिजा शंकर शर्मा और मैं. एन के सिंह ने बीज वक्तव्य में जोर देकर इस बात को कहा कि आज समाज के हर क्षेत्र में मूल्यों में गिरावट देखी जा सकती है, चाहे वह राजनीति हो, कार्यपालिका हो या फिर विधायिका. उन्होंने तर्कपूर्ण तरीक़े से अपनी बात रखते हुए कहा कि मूल्यों के क्षरण की समस्या हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में खामी की वजह से है. मैंने पूर्ववर्ती वक्ताओं द्वारा पूरे मीडिया को भ्रष्ट और संपादकों को बिचौलिया कहे जाने पर गहरी आपत्ति जताते हुए कहा कि विभूति नारायण राय और गंगा प्रसाद विमल की समाज में एक अहमियत है और जब वे बोलते हैं तो समाज पर असर डालते हैं. इस वजह से उन्हें इस तरह के स्वीपिंग रिमार्क से बचना चाहिए. प्रसून ने अपने अंदाज़ में बोलते हुए गूगल को पत्रकारिता का पर्याय न मानने की सलाह दी. इसके बाद भी एक सत्र हुआ, जिसमें प्रकाश दूबे एवं विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति अरविंदाक्षन ने अपनी बात रखी. कुल मिलाकर दो दिनों तक चला यह कार्यक्रम बेहद सफल रहा. लेकिन जैसा कि मैं ऊपर भी कह चुका हूं कि ऐसे कार्यक्रमों में युवा पत्रकारों की भागीदारी इस विमर्श को एक अलग स्तर पर लेकर जाएगी, क्योंकि विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की राय पुरानी पड़ चुकी है और वे अपनी विद्वता के बोझ तले इतने दब चुके होते हैं कि उन्हें जो कुछ नया हो रहा है, उसे जानने में रुचि नहीं रहती. दो दिनों तक वर्धा प्रवास के दौरान मैं गांधी आश्रम भी गया, मैंने उनके कमरे की हर चीज को देखा-छुआ. मैं इस स्तंभ में आश्रम के अपने अनुभवों को भी लिखूंगा.
(लेखक आईबीएन-7 से जुड़े हैं)

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