बुधवार, 13 जुलाई 2011

बांग्ला चैनलों में प्रतिगामी राजनीति का अंत




जगदीश्‍वर चतुर्वेदी
बांग्ला चैनलों के आने बाद से पश्चिम बंगाल का राजनीतिक वातावरण बुनियादी तौर पर बदला है। बांग्ला चैनलों ने नए सिरे से राजनीतिक ध्रुवीकरण किया है। नव्य उदार आर्थिक नीतियों और पूंजीवाद विरोधी वातावरण को तोड़ा है। यह प्रक्रिया 2006 में आरंभ हुई थी। इस समय तारा न्यूज,महुआ खबर,स्टार आनंद,24 घंटा,न्यूज टाइम,कोलकाता टीवी, आर न्यूज , आकाश आदि आधे दर्जन से ज्यादा समाचार चैनल हैं जिनसे अहर्निश खबरों का प्रसारण होता है। इनमें ’24 घंटा’ और ‘आकाश’ चैनल की ‘वामचैनल’ हैं।माकपा के प्रति इनकी सहानुभूति है। अन्य चैनलों का किसी दलविशेष से संबंध नहीं है। इन्हें ‘अ-वाम चैनल’ कहना समीचीन होगा। इन चैनलों की राजनीतिक खबरों का फ्लो वामविरोध पर आधारित है। वामविरोधी समाचार फ्लो बनाए रखने के नाम पर वाम उत्पीड़न पर इन चैनलों ने व्यापक कवरेज दिया है। अन्य विषयों को मुश्किल से 5 फीसदी समय दिया है।
‘अ-वाम चैनलों’ की प्रस्तुतियों ने स्टीरियोटाइप वक्ता और रूढ़िबद्ध तर्कों के आधार पर वाम राजनीति के बारे में नए आख्यान को जन्म दिया है। इससे वामविरोधी राजनीतिक दलों की इमेज चमकी है। इससे वामविरोधी समूहों को एकताबद्ध करने में मदद मिली और नव्यउदार राजनीति के प्रति आकर्षण हुआ है। साथ ही माकपा की वैचारिक घेराबंदी टूटी है। मसलन् एक जमाने में वामदलों ने नव्य आर्थिक उदारवाद के खिलाफ जमकर प्रचार अभियान चलाया था लेकिन विगत पांच सालों में चैनल संस्कृति का असर है कि वामदलों ने नव्य उदारतावाद के खिलाफ अपना राजनीतिक प्रतिवाद धीमा किया है। साथ ही नव्य उदार संस्कृति के विभिन्न रूपों को धीमी गति से राज्य में पैर फैलाने में मदद की है। आज टीवी संस्कृति के दबाव के कारण वाम और गैर-वाम दोनों ही धड़े नव्य उदार संस्कृति के प्रभावमंडल में चमक रहे हैं।
टेलीविजन में अंतर्वस्तु महत्वपूर्ण नहीं होती ‘फ्लो’ महत्वपूर्ण होता। वामचैनलों ‘चौबीस घंटा” और “आकाश” ने अधिनायकवादी मॉडल को आधार बनाकर इसबार विधानसभा का चुनाव कवरेज दिया है। इन चैनलों की समस्त कार्यप्रणाली और अंतर्वस्तु को माकपा के मीडिया बॉस ऊपर से नियंत्रित करते हैं। संवाददाताओं की रिपोर्ट में किसी भी किस्म का पेशेवर भाव नहीं होता। वे बड़े उग्र भाव से पार्टी सदस्य की तरह डिस्पैच भेजते हैं। संवाददाता जब पार्टी का भोंपू बन जाता है तो सत्य की हत्या कर बैठता है। यह बीमारी किसी भी दल में पैदा हो सकती है। ‘वाम चैनल’ मानकर चल रहे हैं जनता अनुगामी है और उसे जो बताया जाएगा वह उस पर विश्वास करेगी। यह मॉडल आम दर्शकों में साख नहीं बना पाता क्योंकि दर्शक अन्य चैनलों का कवरेज भी देखते हैं। वाम चैनलों की आक्रामक प्रस्तुतियों में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों पर जोर कम है और वामदलों की नीतियों पर जोर ज्यादा रहा है। इस तरह का प्रसारण दर्शक को लोकतंत्र से बांधने की बजाय विचारधारा से बांधता है। फलतः वामचैनल तटस्थ दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पाते। इसबार वामचैनलों ने ममता बनर्जी की रेल मंत्रालय की गतिविधियों को निशाना बनाया था। मजेदार बात यह है रेल मंत्रालय का राज्य विधानसभा चुनाव से कोई संबंध नहीं है। इस प्रौपेगैण्डा मॉडल की स्थिति यह है कि इसमें सत्य अनुपस्थित नहीं रहता अपितु भिन्न किस्म का सत्य रहता है। इसमें अर्द्ध सत्य,सीमित सत्य और संदर्भ के बाहर का सत्य भी शामिल है। रेल मंत्रालय का सत्य पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाहर का सत्य है।यह राज्य का सत्य नहीं है। माकपा नियंत्रित चैनलों ने माकपा समर्थक बुद्धिजीवियों और शिक्षितों को सबसे ज्यादा असुरक्षित किया है। ये लोग इकतरफा प्रचार अभियान से सबसे ज्यादा परेशान हैं और अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं। वाम चैनलों ने वाम की पूर्वनिर्मित इमेज,धारणाओं और एटीट्यूट को प्रचारित किया। वाम की पहले से जो राय रही है उसका ही प्रचार करता है। सिर्फ गौतमदेव के भाषणों में वाम की पूर्व निर्धारित नीतियों का विकल्प तेजी से सामने आया। माकपा नियंत्रित प्रचार अभियान लोकतंत्र को आधार नहीं बनाता बल्कि पार्टी और उसकी नीतियों को आधार बनाता है। इस तरह के प्रचार का लक्ष्य है पार्टी के पीछे आम लोगों को गोलबंद करना। इस प्रचार का सामान्य लोकतांत्रिक प्रचार मॉहल के साथ तीखा अंतर्विरोध है।इसके विपरीत ‘अ-वाम चैनलों’ के समूचे समाचार फ्लो और टॉकशो फ्लो ने तटस्थ सूचनाओं और गैर वाम विकल्पों को व्यापक कवरेज दिया है। इस क्रम में विभिन्न रूपों में लोकतंत्र को बुनियादी आधार के रूप में प्रचारित किया। ‘अ-वाम चैनलों’ ने सत्ता और जनता के बीच में व्याप्त असमानता और वैषम्यपूर्ण संबंधों को उजागर किया । सत्ता में जनता के प्रति उपेक्षा, अलगाव और संवेदनहीनता से जुड़ी खबरों को तत्परता के साथ उजागर किया है। सत्ता के अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने की भावना पैदा करके आंदोलनों में जनता की शिरकत को बढ़ाया है। जनता की आंदोलनों में शिरकत बढ़ाना मीडिया की लोकतांत्रिक भूमिका है। इन चैनलों से जो खबरें आयी हैं उनमें कम से कम झूठी खबरें अभी तक दिखाई नहीं दी हैं। ऐसी खबर नहीं दिखाई गयी जो घटना घटी ही न हो। ‘अ-वाम चैनलों’ ने उन समस्याओं,घटनाओं ,राजनीतिक विकल्पों को सामने रखा जिनकी राज्य प्रशासन और वामचैनलों ने उपेक्षा की या दबाया। ‘अ-वाम चैनल’ उस वातावरण को नष्ट करने में सफल हुए हैं जिसे वामदलों ने भय और असुरक्षा के आधार पर निर्मित किया था। निर्भीक होकर बोलने की आजादी का विस्तार किया है। बंद दिमागों को खोला है। यह संदेश भी दिया है कि मुक्त दिमाग के खिलाफ पार्टीतंत्र का बौना है। इस तरह की प्रस्तुतियां स्वैच्छिक और विकेन्द्रित हैं। इसके विपरीत ‘वाम चैनलों’ में आत्म-नियमन और आत्म-सेंसरशिप हावी रही है। इन चैनलों ने एक ओर समाचारों को नियंत्रित करने की कोशिश की वहीं दूसरी ओर खबरों को नियंत्रित किया। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने वाम चैनलों के अलावा अन्य चैनलों को एकदम समय नहीं दिया।यह स्वयं में अलोकतांत्रिक है। दूसरी ओर ममता बनर्जी का वामचैनलों ने इंटरव्यू नहीं लिया। राज्य के दो बड़े नेताओं का यह भावबोध भविष्य में टीवी और इन दो नेताओं के बीच में टकराव के बने रहने का संकेत है।
May 11th, 2011 | Category: मीडिया | Print This Post

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