मंगलवार, 26 जुलाई 2011

पत्रकारिता तेरा रूप अनोखा-ग्रामीण पत्रकारों के लिए संपादकों के दर्शन दुर्लभ हैं




साथियों आप तो सब कुछ जानते हैं आपको लेख लिखकर बताने और समझाने की जरूरत नहीं। यह लेख उन लोगों के लिए लिख रहा हूं जो पत्रकारिता से बहुत प्रभावित रहते हैं। ईमानदारी से न्याय प्रिय, कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारिता की बात कर स्वस्थ समाज के निर्माण के समर्थक हैं। समाज की हर समस्या पर लगभग रोज समाचार प्रकाशित होते हैं। फिर भी पत्रकारों की समस्याओं को छापने के लिए अखबारों में स्थान क्यों नहीं मिलता। ग्लैमर वाली इस पत्रकारिता की दुनिया पर चर्चा करें। तो इसमें ग्रामीण पत्रकारिता उसी तरह है जिस प्रकार शहरी जीवन और ग्रामीण जीवन है। यहाँ के पत्रकारों के लिए सुविधाओं और साधनों का टोटा है। जो पत्रकारिता जगत में थोड़ी भी पहचान बनाने में कामयाब रहा वह शहर जाकर ही अपना कैरियर बनाता है। जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छे पत्रकार नहीं टिक सके।
वास्तविकता भी है कि ग्रामीण स्तर पर अगर कोई दिमाग से तेज और धन से कमजोर व्यक्ति पत्रकारिता करना चाहे तो उसकी ऐसी सोच शेखचिल्ली का सपना भर साबित होगी। अगर किसी सक्षम परिवार का विचारवान व्यक्ति पत्रकारिता करना चाहे तो उसको अपने आप या बाप की गाढ़ी कमाई गंवाने पर ही ईमानदारी से पत्रकारिता करने को मिलेगी। यह किसी किताब में नहीं पढ़ा बिल्कुल हकीकत है। ऐसा कोई नहीं जो यश, पद, मान, सम्मान, वैभव ना चाहता हो। हालाँकि आज के समाज में ऐसे लोगों की तादात बहुत है,  जो इन सब चीजों को सिर्फ पैसे की दम पर अर्जित कर रहे हैं। आज पत्रकारिता चाहे ग्रामीण स्तर पर हो चाहे शहरी स्तर पर मिशन से प्रोफेशन में तब्दील हो रही है। पत्रकारिता जगत में बता दें कि जो ग्रामीण स्तर के पत्रकार हैं उनको अखबार के दफ्तरों में हाकर की संज्ञा से नवाजा जाता है। वह अपने सम्पादक के दर्शन को तरसते हैं। जो सम्पादक हैं उनको भी ग्रामीण पत्रकारों के प्रति खास दिलचस्पी नहीं। वह भी सिर्फ जिला प्रतिनिधि तक ही सीमिति रहते हैं। अब जिला प्रतिनिधि सिर्फ समाचार नहीं अखबार के समाचार, प्रसार व विज्ञापन का जिम्मेदार माना जा रहा है।
बड़े अखबारों में बता दें कि ग्रामीण संवाददाता को परिचय पत्र तक नहीं दिया जाता, जिस अखबार के लिए वह काम कर रहे हैं। उसके अधिकृत व्यक्ति हैं भी या नहीं इसका पता लगाने के लिए ब्यूरोचीफ से सम्पर्क कर ही जाना जा सकता है। पत्रकारों पर उंगली उठाने वालों मुझे बताइये यह सब क्या है?  ग्रामीण पत्रकार हौंसले से इस पत्रकारिता जगत में प्रवेश करते हैं। निराश होकर वापस होते हैं। क्यों शहर के पत्रकार पत्रकारिता क्षेत्र में जाकर तरक्की करते हैं। मैं अपने आसपास इलाके के कई ऐसे पत्रकारों को जानता हूं, जो बड़े हौंसले से इस क्षेत्र में आकर अलविदा कह गए। ऐसों को भी जानता हूं,  जिनकी जवानी अखबार के लिए खबर में गारद हो गई,  उनको आखिरी में अखबार से धक्का देकर फिर एक नौजवान को दौड़ में शामिल कर लिया गया। क्या यह शोषण नहीं पोषण है। जीवन के अमूल्य समय को पत्रकारिता में लगाने से क्या हासिल किया महज पहचान और सम्मान। इससे भइया रोजी रोटी नहीं चलने वाली।
मीडिया संस्थानों के लिए ग्रामीण पत्रकार 'यूज एण्ड थ्रो माने सिर्फ निरोध' हैं। पत्रकारों के प्रवेश का न कोई सर्टिफिकेट है न निकास का इस्तीफा। बस धड़ाधड़ पत्रकार बनाओ, अखबार बिकवाओ, विज्ञापन वसूली कराओ जो विज्ञापन से इनकार कर दे उसके पीछे पड़कर मिशनरी पत्रकारिता छेड़ दो। इससे ऐसा लगता है कि पत्रकारिता अपने सिद्वान्त से हटी नहीं बल्कि सिद्वान्तों के विपरीत उसकी स्थापना हो गई है। आप ध्यान से यहाँ तक लेख पढ़ चुके हैं तो आप इसको अनुभव भी करते जाइए। अगर आप किसी ग्रामीण पत्रकार को जानते हों तो उससे भली भाँति पूछ सकते हैं। आपका कोई सम्पर्की प्रधान, कोटेदार, ठेकेदार, थानेदार हो तो उससे ग्रामीण पत्रकारों की चर्चा करके देखना,  अगर आपको बहुत अदब करता हो तो शायद आपको छोड़ दे, नहीं तो आपको उनके साथ भला बुरा कह जाएगा। उसकी वजह मुख्य होगी विज्ञापन। अखबार के दप्तर से अब ग्रामीण पत्रकारों पर विज्ञापन और प्रसार के लिए बहुत दबाव है। जो गलत कार्यों में संलिप्त हैं, उनसे मित्रता कर अखबार बढ़ाओ, विज्ञापन लाओ तभी सच्चे पत्रकार कहलाओ।
यह लेख नहीं एक एहसास है। जिसमें लेखक ने पत्रकारिता की गिरती साख पर अपने मन की बात लिखी। बुद्विजीवियों को ग्रामीण पत्रकारिता में बदलाव लाने के लिए एक सार्थक प्रयास की पहल की जाय,  जिससे इन बेपैसों के नौकरों को आजादी मिल सके। अखबार में समाचार, प्रसार और विज्ञापन का दर्द जितना सम्पादक को होता है उससे अधिक ग्रामीण पत्रकार को दर्द पैदा किया जाता है। समाचार के संकलन से लेकर उसको दप्तर तक पहुँचाने में बड़ी ही मशक्कत करनी पड़ती है। क्या मिलता है जानते हो, बस 15प्रतिशत विज्ञापन पर कमीशन। कोटेदार और प्रधान की क्या जरूरत पड़ी जो वह विज्ञापन दे बस भयवश उनको पोट फुसलाकर और अखबार का भौकाल दिखाकर विज्ञापन लिया जाता है। अखबार में विज्ञापन का पैसा जमा करने पर ग्रामीण पत्रकार को रशीद भी मुहैया नहीं होती। विज्ञापन छपवाने के लिए नकद रकम देनी पड़ती है। जिसकी कोई रशीद नहीं दी जाती,  जो जब छप आए बस ठीक है। अगर विज्ञापनदाता को लगा कि उसका विज्ञापन कम है तो इसकी शिकायत करता है, जिसमें उसका यह आरोप ग्रामीण पत्रकार को झेलना पड़ता है। इस तरह समाजसेवा के पथ पर विचरण कर रहे ग्रामीण पत्रकारों के पत्रकारिता की डगर बहुत कठिन है उसके बाद भी जैस- तैसे और कैसे भी इस क्षेत्र में ईमानदारी का परचम फहरा रहे हैं। वास्तव में वह हमारे आदर्श पत्रकारिता के शुभ चिन्तक हैं। रहस्यमयी ग्रामीण पत्रकारिता पर और भी तमाम अपने जीवन की कसौटी पर उतरने वाले कड़वे सच आपके सामने जरूर रखूँगा। आज सिर्फ इतना ही....।
लेखक सुधीर कुमार अवस्‍थी हरदोई जिले में जनसंदेश टाइम्‍स के संवाददाता

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