रविवार, 10 जुलाई 2011

 समकालीन शायरों पर अहम किताब गज़ल और गीत हिंदी साहित्य की ऐसी विधाएं हैं, जिन्हें अब तक उतनी प्रतिष्ठा हासिल नहीं हो पाई है, जितनी उन्हें मिलनी चाहिए थी. हिंदी में दुष्यंत कुमार ने गज़ल को एक नई ऊंचाई दी, प्रतिष्ठा भी दिलाई. लेकिन गज़ल जानने वालों का कहना है कि हिंदी में यह विधा दुष्यंत के बाद ठहर गई है. अभी मुझे एक किताब मिली, समकालीन हिंदी गज़ल-परंपरा और विकास, जिसके लेखक अनिरुद्ध सिन्हा हैं. इस किताब में लिखा है, गज़ल को हिंदी की अछूत विधा मानकर हिंदी से अलग करने का काफी प्रयास किया गया, लेकिन पाठकीय स्वीकृति अपनी भावनात्मक छटपटाहट के साथ जुड़ी रही. गज़ल और कविता के बीच जो विभाजन की रेखा खींची गई, वह स्वत: ही ध्वस्त हो गई. इसके लिए साहित्य के भीतर न तो कोई गुप्त आंदोलन चलाया गया और न ही आलोचकीय चापलूसी का सहारा लिया गया. ये चंद लाइनें बड़े सवाल खड़े करती हैं. पहला बड़ा सवाल तो यह उठता है कि हिंदी में किसने गज़ल को अछूत विधा मानकर उसे हिंदी से अलग करने की साजिश रची. ज़ाहिर सी बात है कि पूरी किताब को पढ़ने के बाद जो तस्वीर उभरती है, वह यह कि हिंदी के आलोचकों ने गज़ल को यथोचित स्थान नहीं दिया. नतीजा यह हुआ कि गज़ल अपनी भाषा से दूर होती चली गई. छंदोबद्ध कविता का वर्चस्व तोड़ने के लिए गज़लें लिखी गईं, लेकिन हुआ यह कि कविता में छंद के पक्षधर लेखकों ने उसकी उपेक्षा शुरू कर दी, लेकिन लेखक के मुताबिक़ गज़ल को पाठकों का प्यार मिलता रहा. दूसरा बड़ा सवाल जो इस किताब में उठाया गया है, वह यह है कि गज़ल ने आलोचकीय चापलूसी नहीं की. इस वाक्य का एक मतलब यह भी निकलता है कि बग़ैर आलोचकीय चापलूसी के कोई विधा साहित्य के केंद्र में नहीं आ सकती. मेरा मानना है कि अगर रचना और विधा में दम होगा तो उसे किसी भी तरह की चापलूसी की ज़रूरत नहीं है, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि गज़ल में दम नहीं है. मैं पूरी विनम्रता से यह कहना चाहता हूं कि क्यों दुष्यंत कुमार की बात होती है. क्यों हमेशा कहा जाता है कि दुष्यंत की गज़ल के बाद चर्चा ही नहीं हुई. क्या दुष्यंत के ख़िला़फ कोई साजिश नहीं हुई. क्या दुष्यंत ने आलोचकीय चापलूसी की. ख़ैर यह एक अवांतर प्रसंग है, जिस पर कभी और बात होगी. ज़ाहिर सी बात है कि पूरी किताब को पढ़ने के बाद जो तस्वीर उभरती है, वह यह कि हिंदी के आलोचकों ने गज़ल को यथोचित स्थान नहीं दिया. नतीजा यह हुआ कि गज़ल अपनी भाषा से दूर होती चली गई. फिलहाल बात अनिरुद्ध सिन्हा की किताब, समकालीन हिंदी गज़ल-परंपरा और विकास की. अनिरुद्ध सिन्हा नब्बे के दशक की शुरुआत में अच्छी कहानियां लिखा करते थे, जो उस व़क्त पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पाठकों के साथ-साथ आलोचकों का भी ध्यान खींचती थीं. जहां तक मुझे याद पड़ता है कि नब्बे के दशक में ही मीनाक्षी प्रकाशन से अनिरुद्ध सिन्हा की कहानियों का संग्रह, और वे चुप हो गए, प्रकाशित हुआ था. उसी दौरान अनिरुद्ध ने एक लघु पत्रिका तर्जनी निकाली थी. मुंगेर में रहते हुए कहानी लिखकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके अनिरुद्ध सिन्हा अचानक कहानी से विमुख हो गए और गज़ल लिखने लगे. फिर तो अनिरुद्ध सिन्हा गज़ल में इतने रमे कि उन्होंने गज़ल गायकी में भी शोहरत हासिल की. गज़ल में उस्ताद होने के बाद अब उन्होंने गज़ल की आलोचना करते हुए किताब लिख डाली. पहले दो लेख, गज़ल सबसे पहले सृजन की उत्पत्ति है एवं हिंदी में गज़ल का उदय जानकारी देने वाले हैं. मेरे जैसा आदमी जिसकी गज़ल के बारे में जानकारी कम है, उसके लिए दोनों लेख उपयोगी हैं. इन दो लेखों के अलावा अनिरुद्ध ने दुष्यंत कुमार से लेकर लोक श्रीवास्तव तक को कसौटी पर कसा है. शायरों के चयन में लेखक ने उदारता बरती है. इसमें कई अनाम किस्म के गज़ल गो भी हैं. लेकिन दुष्यंत के बाद अनिरुद्ध ने उद्भ्रांत को रखकर चौंका दिया. लेखक ने लिखा है, उद्भ्रांत प्रगतिशील चेतना के शायर हैं. यह साहित्य के विपथन का समय है. ज़ाहिर है, इस समय साहित्य को विपथन से बचाने के लिए वैकल्पिक पथों के अन्वेषण का काम पूरी तरह सत्ता की राजनीति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. इसे भी पढ़े... * शीला दीक्षित, श्‍लाका और छीछालेदार * पौराणिक आख्यान, नई व्याख्या * सफलता तलाशता विवाद * अनुवाद से जगती उम्मीदें * दलित चिंतन को मिटाने की मुहिम



समकालीन शायरों पर अहम किताब

गज़ल और गीत हिंदी साहित्य की ऐसी विधाएं हैं, जिन्हें अब तक उतनी प्रतिष्ठा हासिल नहीं हो पाई है, जितनी उन्हें मिलनी चाहिए थी. हिंदी में दुष्यंत कुमार ने गज़ल को एक नई ऊंचाई दी, प्रतिष्ठा भी दिलाई. लेकिन गज़ल जानने वालों का कहना है कि हिंदी में यह विधा दुष्यंत के बाद ठहर गई है. अभी मुझे एक किताब मिली, समकालीन हिंदी गज़ल-परंपरा और विकास, जिसके  लेखक अनिरुद्ध सिन्हा हैं. इस किताब में लिखा है, गज़ल को हिंदी की अछूत विधा मानकर हिंदी से अलग करने का काफी प्रयास किया गया, लेकिन पाठकीय स्वीकृति अपनी भावनात्मक छटपटाहट के साथ जुड़ी रही. गज़ल और कविता के बीच जो विभाजन की रेखा खींची गई, वह स्वत: ही ध्वस्त हो गई. इसके लिए साहित्य के भीतर न तो कोई गुप्त आंदोलन चलाया गया और न ही आलोचकीय चापलूसी का सहारा लिया गया. ये चंद लाइनें बड़े सवाल खड़े करती हैं. पहला बड़ा सवाल तो यह उठता है कि हिंदी में किसने गज़ल को अछूत विधा मानकर उसे हिंदी से अलग करने की साजिश रची. ज़ाहिर सी बात है कि पूरी किताब को पढ़ने के  बाद जो तस्वीर उभरती है, वह यह कि हिंदी के आलोचकों ने गज़ल को यथोचित स्थान नहीं दिया. नतीजा यह हुआ कि गज़ल अपनी भाषा से दूर होती चली गई. छंदोबद्ध कविता का वर्चस्व तोड़ने के लिए गज़लें लिखी गईं, लेकिन हुआ यह कि कविता में छंद के पक्षधर लेखकों ने उसकी उपेक्षा शुरू कर दी, लेकिन लेखक के मुताबिक़ गज़ल को पाठकों का प्यार मिलता रहा. दूसरा बड़ा सवाल जो इस किताब में उठाया गया है, वह यह है कि गज़ल ने आलोचकीय चापलूसी नहीं की. इस वाक्य का एक मतलब यह भी निकलता है कि बग़ैर आलोचकीय चापलूसी के कोई विधा साहित्य के  केंद्र में नहीं आ सकती. मेरा मानना है कि अगर रचना और विधा में दम होगा तो उसे किसी भी तरह की चापलूसी की ज़रूरत नहीं है, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि गज़ल में दम नहीं है. मैं पूरी विनम्रता से यह कहना चाहता हूं कि क्यों दुष्यंत कुमार की बात होती है. क्यों हमेशा कहा जाता है कि दुष्यंत की गज़ल के बाद चर्चा ही नहीं हुई. क्या दुष्यंत के ख़िला़फ कोई साजिश नहीं हुई. क्या दुष्यंत ने आलोचकीय चापलूसी की. ख़ैर यह एक अवांतर प्रसंग है, जिस पर कभी और बात होगी.
ज़ाहिर सी बात है कि पूरी किताब को पढ़ने के  बाद जो तस्वीर उभरती है, वह यह कि हिंदी के आलोचकों ने गज़ल को यथोचित स्थान नहीं दिया. नतीजा यह हुआ कि गज़ल अपनी भाषा से दूर होती चली गई.
फिलहाल बात अनिरुद्ध सिन्हा की किताब, समकालीन हिंदी गज़ल-परंपरा और विकास की. अनिरुद्ध सिन्हा नब्बे के दशक की शुरुआत में अच्छी कहानियां लिखा करते थे, जो उस व़क्त पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पाठकों के  साथ-साथ आलोचकों का भी ध्यान खींचती थीं. जहां तक मुझे याद पड़ता है कि नब्बे के दशक में ही मीनाक्षी प्रकाशन से अनिरुद्ध सिन्हा की कहानियों का संग्रह, और वे चुप हो गए, प्रकाशित हुआ था. उसी दौरान अनिरुद्ध ने एक लघु पत्रिका तर्जनी निकाली थी. मुंगेर में रहते हुए कहानी लिखकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके अनिरुद्ध सिन्हा अचानक कहानी से विमुख हो गए और गज़ल लिखने लगे. फिर तो अनिरुद्ध सिन्हा गज़ल में इतने रमे कि उन्होंने गज़ल गायकी में भी शोहरत हासिल की. गज़ल में उस्ताद होने के बाद अब उन्होंने गज़ल की आलोचना करते हुए किताब लिख डाली. पहले दो लेख, गज़ल सबसे पहले सृजन की उत्पत्ति है एवं हिंदी में गज़ल का उदय जानकारी देने वाले हैं. मेरे जैसा आदमी जिसकी गज़ल के बारे में जानकारी कम है, उसके लिए दोनों लेख उपयोगी हैं. इन दो लेखों के अलावा अनिरुद्ध ने दुष्यंत कुमार से लेकर लोक श्रीवास्तव तक को कसौटी पर कसा है. शायरों के  चयन में लेखक ने उदारता बरती है. इसमें कई अनाम किस्म के गज़ल गो भी हैं. लेकिन दुष्यंत के बाद अनिरुद्ध ने उद्भ्रांत को रखकर चौंका दिया. लेखक ने लिखा है, उद्भ्रांत प्रगतिशील चेतना के शायर हैं. यह साहित्य के विपथन का समय है. ज़ाहिर है, इस समय साहित्य को विपथन से बचाने के लिए वैकल्पिक पथों के अन्वेषण का काम पूरी तरह सत्ता की राजनीति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.

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