रविवार, 10 जुलाई 2011

मीडिया की साख ताक पर

गैरजिम्‍मेदार मीडियाका काला चेहरा

ऐसे ढेर सारे उदाहरण देश के सामने हैं जो यह संकेत देते हैं कि मानव अधिकार और देश हित की समझ को लेकर मीडिया या तो बिल्कुल नासमझ है या हिंदुस्तान की एकता और सामाजिक तानेबाने को तहस-नहस करने की साज़िश में लगी शक्तियों के साथ मिलीभगत का हिस्सा है.
अभी हाल ही दक्षिणी कमान की तैनाती से दिल्ली सेना मुख्यालय आए हैं. उन्होंने दक्षिण के एक प्रमुख मीडिया की करतूत बताई और कहा कि उस मीडिया ने शहीदों के सम्मान में इंडिया गेट पर जलने वाली अमर जवान ज्योति के सामने उल्टी रखी राइफल के नीचे सेना के कुछ घोटालों से सम्बन्धित दस्तावेज रख कर एक कार्टून बनाया. उक्त अधिकारी ने कहा कि सेना के कुछ घोटालों को दिखाने के लिए शहीदों के सम्मानजनक चिन्ह का अपमान करने जैसी हरकतें क्या मीडिया ने फैशन बना लिया है? ऐसे कार्टून बनाने वाले पत्रकार को बेहतरीन कार्टून का पुरस्कार दिया गया और उसे सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया गया.
छत्तीसगढ़ में फिर से सीआरपीएफ के जवान नक्सलियों के हाथों मारे गए. मीडिया ने फिर से खबर बनाई और एक बार फिर से सरकार पर दबाव बना, नक्सलियों के खिला़फ सेना उतारने का, लेकिन आपने कभी सोचा है कि मीडिया इस खबर की ओर कभी ध्यान क्यों नहीं देता कि नक्सलियों के निशाने पर हमेशा अर्धसैनिक बल ही क्यों होते हैं? हमेशा सीआरपीएफ के जवान ही क्यों मारे जाते हैं? किसी भी नक्सली ऑपरेशन में सिविल पुलिस वाले क्यों नहीं मारे जाते? कश्मीर में भी हमेशा सैनिक या अर्ध सैनिक बल ही आतंकवादियों के निशाने पर क्यों होते हैं? मीडिया को यह आम बात समझ में क्यों नहीं आती? देश की मीडिया को कश्मीर में या पूर्वोत्तर में हमेशा सेना की गोली ही क्यों दिखती है? आतंकवादियों की गोली उन्हें क्यों नहीं दिखती? अपने ही देश की सेना और अर्ध सैनिक बल का मनोबल गिराने पर आमादा मीडिया को इससे क्या हासिल होने वाला है? ऐसी खबरें जो देश की एकता बढ़ाने में मदद करें, ऐसी खबरें जो धार्मिक, जातीय या सामाजिक सौहार्द कायम करने में सार्थक भूमिका अदा करे, मीडिया से गुल क्यों रहती हैं? यह देश और उसकी अखंडता को लेकर मीडिया की समझ है.
समाज में भेदभाव की खाई को और गहरा करने वाले मुद्दों पर आप मीडिया पर होने वाली विद्वत बहसें सुन-सुन कर आप पक चुके होंगे. सगोत्र विवाह का मसला हो, सगे रिश्तेदार से शादी का मसला हो, घरेलू कलह का मसला हो या देश की एकता से जुड़ा मसला, विचार और बहस के नाम पर आप मीडिया को सब तहस-नहस करता हुआ पाएंगे. 1984 के दंगे पर मीडिया की भूमिका आपको याद ही होगी. एक तथाकथित स्वयंभू बुद्धिमान पत्रकार के नेतृत्व में चलने वाले एक न्यूज़ चैनल ने तो तीन दिनों का विशेष कार्यक्रम ही चला डाला, जिसमें 1984 के दंगे की तमाम वीभत्सता का री-प्ले देश भर के दर्शकों को दिखाया गया. यह देश को जोड़ने की ज़िम्मेदार कोशिश थी या एक बार फिर से समाज में ऩफरत का विष बोने की शातिराना साज़िश? सेना के एक आला अधिकारी ने मीडिया की हरकतों पर बेसाख्ता कहा, गंगा में कोई पेशाब कर दे तो क्या आप कह देंगे कि गंगा पवित्र नदी नहीं, पेशाब है? इस अधिकारी ने कहा कि मीडिया को गुजरात के दंगे का ज़ख्म कुरेदने की जैसे बीमारी हो गई है. लेकिन वे कभी यह मसला नहीं उठाते कि गुजरात का दंगा हुआ क्यों था? आप क्या यह समझते हैं कि पब्लिक ये सब नहीं समझती? बाबरी मस्जिद पर चलने वाले हथौड़ों की वीभत्स ध्वनि क्या आपको हर साल सुनाने की लत पड़ गई है? मीडिया क्या चाहता है यह सब दिखा कर? आप भारतीय मीडिया हैं या पाकिस्तानी मीडिया या दुनियाभर में समाज को तोड़फोड़ कर अपना धंधा चलाने वाली दुष्ट शक्तियों के घटिया एजेंट? सेना के इस आला अधिकारी की बातें मीडिया के प्रति लोगों में घर करती जा रही घृणा की सनद देती हैं. उक्त अधिकारी की बातें अगर आप मीडिया अलमबरदारों के सामने रख दें तो बड़ा सा विद्वत चेहरा बना कर वे उस सैन्य अधिकारी का धर्म पूछने लगेंगे. अगर वह सेनाधिकारी हिन्दू हुए तो मीडिया के ये विकृत चेहरे उस सेनाधिकारी को भाजपाई या संघी बताने से नहीं हिचकेंगे और अपने चैनलों पर उन्हें फिर से विद्वत-बहस आयोजित कराने का मौक़ा मिल जाएगा.
तो आपको यह बता दें कि ये सेनाधिकारी मुस्लिम हैं. अभी हाल ही दक्षिणी कमान की तैनाती से दिल्ली सेना मुख्यालय आए हैं. उन्होंने दक्षिण के एक प्रमुख मीडिया की करतूत बताई और कहा कि उस मीडिया ने शहीदों के सम्मान में इंडिया गेट पर जलने वाली अमर जवान ज्योति के सामने उल्टी रखी राइफल के नीचे सेना के कुछ घोटालों से सम्बन्धित दस्तावेज रख कर एक कार्टून बनाया. उक्त अधिकारी ने कहा कि सेना के कुछ घोटालों को दिखाने के लिए शहीदों के सम्मानजनक चिन्ह का अपमान करने जैसी हरकतें क्या मीडिया ने फैशन बना लिया है? ऐसे कार्टून बनाने वाले पत्रकार को बेहतरीन कार्टून का पुरस्कार दिया गया और उसे सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया गया. लोकतंत्र की पहरेदारी करने वाला मीडिया इस घटिया स्तर का होगा तो देश का तो अल्ला ही मालिक है…
श्रीलंका में लिट्‌टे के खिला़फ चले निर्णायक सैन्य अभियान में मीडिया को ऑपरेशन-फील्ड में प्रवेश की इजाज़त नहीं दी गई. यह मीडिया की आज़ादी से जुड़ा मसला नहीं बल्कि देश की अखंडता को अक्षुण्ण रखने की व्यवस्था थी. इसमें श्रीलंका की मीडिया ने भी साथ दिया. लिट्‌टे के खिला़फ चलाए गए सैन्य ऑपरेशन की कई सूचनाएं वहां और भारत में भी नए सिरे से हिंसा को जन्म दे सकती थीं. लेकिन वहां की मीडिया के दायित्वबोध के कारण ऐसा संभव नहीं हुआ. लेकिन भारतीय मीडिया ने जो किया उसके परिणाम सामने हैं. करगिल युद्ध के दौरान मीडिया की हरकतों के कारण दुश्मन को भारतीय सेना की सटीक पोजिशनिंग का पता चलता रहा और टीवी देख-देख कर वे निशाने लगाते रहे और भारतीय सैनिक शहीद होते रहे. हीरो बनने की कोशिश करती एक महिला पत्रकार के कारण सेना का एक पूरा बंकर तबाह हुआ और विक्रम बतरा जैसे अफसर की शहादत हुई. वो पत्रकार इतनी जिम्मेदार निकलीं कि सत्ता के गलियारे में दलाली करने वाले कुछ खास लोगों में आज उनका नाम है. मुंबई हादसे के दौरान भी तो ऐसा ही हुआ था. टीवी देख कर मॉनिटरिंग कर रहे आतंकी सरगनाओं को निशाना साधने में कोई दिक्कत नहीं हुई. इसी बेवकूफाना हीरोगिरी में मीडिया ने अपनी ही एक साथी अंग्रेजी अ़खबार की एक पत्रकार को आतंकवादियों का निशाना बनवा दिया. न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले में मारे गए लोगों में से एक की भी लाश आपने टीवी पर देखी थी? इसका मतलब क्या अमेरिकी मीडिया बेवकूफहै और हम बुद्धिमान! चुनावों में मीडिया की पतंगबाजी आपने देखी ही है अब तो विज्ञापन के बजाय खबरें बेचकर नेताओं से पैसे कमाने जैसी हरकतें पूरा देश जानता है. इन्हीं हरकतों के कारण भारतीय मीडिया ने खुद पर अंकुश लगाए जाने के इंतजाम कर लिए हैं. सरकार को तो बहाना चाहिए और वह बहाना खुद मीडिया अपनी ग़ैरज़िम्मेदाराना हरकतें कर दे रहा है.
  • बीच सड़क पर अर्ध सैनिक बल के जवान को दौड़ा दौड़ा कर पीटे जाने और उसकी हत्या पर आमादा भीड़ का बर्बर चेहरा मीडिया के लिए प्राथमिकता का मुद्दा नहीं. जवान को हिंसक भीड़ से बचाने के लिए सीआरपीएफ द्वारा चलाई गई गोली मीडिया के लिए मुद्दा है.
  • कर्नल और ब्रिगेडियर स्तर के शीर्ष सैनिक अधिकारियों समेत अन्य फौज़ियों की कश्मीर में आम तौर पर रोज़ाना होने वाली हत्याएं मीडिया के लिए मानवाधिकार हनन का मसला नहीं, लेकिन पगलाई भीड़ को क़ाबू में करने के लिए चलाई गई गोली से किसी के मारे जाने की घटना मीडिया के लिए मानवाधिकार का मसला है.
  • मॉडल ने आत्महत्या कर ली तो मीडिया के लिए खबर है. लेकिन किसानों की लगातार हो रही आत्महत्याएं मीडिया के लिए इश्यू नहीं.
  • फिल्मी हस्तियों के गर्भवती होने की खबरें मीडिया में सुर्खियां बनती हैं, लेकिन प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में असमय गर्भपात से लाखों महिलाओं के मरने की खबरें मीडिया की प्राथमिकता में स्थान नहीं बना पातीं.
  • किसी मॉडल का कपड़ा खुल जाए तो मीडिया दिन रात भोंपू बजाए, लेकिन अधनंगे वस्त्र के सहारे उम्र काट देने वाले लोगों की बढ़ती जमात इनके लिए ध्यानाकर्षण का विषय नहीं.
  • दिलों को जोड़ने की समाज में चल रही सार्थक कोशिशों पर मीडिया का ध्यान नहीं, पर हर छह दिसम्बर को बाबरी ढांचा तोड़े जाने का दृश्य दिखाना इनकी सेरिमोनियल (त्यौहारी) अनिवार्यता है.
  • एक तरफ नक्सलियों के खिला़फ सेना उतारने की वक़ालत तो दूसरी तरफ आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पावर एक्ट को वापस लेने की मांगों को हवा देने वाली खबरों का नासमझ विरोधाभासी प्रसारण.

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