बुधवार, 27 जुलाई 2011

खुशवंत सिंह की अतृप्त यौन फड़फड़ाहट


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18 अप्रैल के हिन्दुस्तान में खुशवंत सिंह साहब का लेख छपा था। खुशवंत सिंह ने चार हिंदू महिलाओं उमा भारती, ऋतम्भरा, प्रज्ञा ठाकुर और मायाबेन कोडनानी पर गैर-मर्यादित टिप्पणी की थी। फरमाया था कि ये चारों ही महिलाएं ज़हर उगलती हैं लेकिन अगर ये महिलाएं संभोग से संतुष्टि प्राप्त कर लेतीं तो इनका ज़हर कहीं और से निकल जाता। चूंकि इन महिलाओं ने संभोग करने के दौरान और बाद मिलने वाली संतुष्टि का सुख नहीं लिया है इसीलिए ये इतनी ज़हरीली हैं। वो आगे लिखते हैं कि मालेगांव बम-धमाके और हिंदू आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद प्रज्ञा सिंह खूबसूरत जवान औरत हैं, मीराबाई के अंदाज़ में रहती हैं। यानि अपनी पोती की उम्र की लड़की को भी खुशवंत सिंह भौंडी नज़र से देखते हैं। और तो और वो कृष्ण-भक्त मीराबाई को भी अपनी घिनौनी कामुकता के दायरे में ले आते हैं।
93 साल के बुजुर्ग खुशवंत सिंह की टिप्पणियां ये दर्शाती हैं कि वो पूरी तरह से पागल हो चुके हैं। इस तरह की वाहियात सोच और उसका भौंड़ा मुज़ाहिरा खुशवंत सिंह जैसा कोई सिरफिरा ही कर सकता है। आखिर खुशवंत सिंह साहब ये बताएंगे कि उन्होने इन चार हिंदू महिलाओं के ही नाम क्यों लिखे? क्यों उन्होने मायावती, जयललिता, ममता बैनर्जी इत्यादि नेत्रियों के नाम नहीं लिखे? क्या मायावती का नाम लिखने की हिम्मत है खुशवंत सिंह में? मायावती छठी का दूध याद दिला देतीं खुशवंत को। बुढ़ापे का ठरकपन सीधा कब्र में जाकर ही ख़त्म होता !

दरअसल, खुशवंत सिंह एक नंबर के लंपट हैं और उनकी ये सोच उनकी लंपटता की मिसाल है। एक नंबर के डरपोक भी हैं, इसीलिए अपने से ताकतवर के खिलाफ कुछ लिखने की हिमाकत नहीं करते। खुशवंत सिंह के चरित्र और कारगुज़ारियों के बारे में कौन नहीं जानता। ख़ासे बदनाम हैं वो अपनी लतों और हरकतों की वजह से। पुराने रईस हैं, उम्रदराज़ हैं, इसीलिए सब चल जाता है। लोग ये भी समझ बैठते हैं कि आज मरे कल दूसरा दिन, कौन बेकार में पंगा ले।

समाचार पत्र में प्रकाशित खुशवंत सिंह के ताज़ा लेख का संज्ञान लेते हुए, हमने 'वॉयस ऑफ इंडिया' पर ख़बर दिखाई। खुशवंत सिंह को फोन लगाया, उन्होने फोन काट दिया। उन्हे फिर फोन लगाया, बात हुई। साहब कहते हैं कि उन्हे जो कहना था लिख दिया, अब कुछ नहीं बोलेंगे। ख़ैर, इसी मु्ददे पर उमा भारती से बात की। तुंरत ही उन्होने अपनी पार्टी भारतीय जनशक्ति पार्टी के लैटर-हैड पर अपनी प्रतिक्रिया ज़ाहिर कर दी। खुशवंत सिंह को नसीहत दी और साथ ही गो-मूत्र की एक शीशी भेज दी। सलाह ये दी गो-मूत्र पीजिए, दिल और दिमाग को शुद्ध कीजिए।

चलिए, अब ज़रा मैं खुशवंत सिंह साहब की औकात पर आता हूं। उनकी कुछ किताबें मैनें भी पढ़ी हैं। 'ट्रेन टू पाकिस्तान' और 'कंपनी ऑफ वूमेन'। इन दोनों ही किताबों में खुशवंत ने अपनी यौन कुंठाओं का टनाटन ज़िक्र किया है। जिन कुंठाओं को निकालने में वो सेक्स क्रियाओं को अपनाने की दलीलें देते हैं, वही कुंठाएं उनके लेखन में भरी पड़ी हैं। एकबारगी तो लगता है कि लेखक नहीं, यौन फिल्मों में बेशर्मी से काम करने वाले पोर्न स्टार रहे हों खुशवंत सिंह। ये और बात है कि उम्र ने उन्हे लाचार कर दिया है वरना अभी किसी हरम में पड़े होते जनाब। ख़ैर, उनका दिमाग तो मानसिक-हरम में ही सड़ा जा रहा है। लगता है 'मानसिक-एड्स' के शिकार हो गए हैं खुशवंत सिंह।

हां, तो हम उनकी पुस्तकें 'ट्रेन टू पाकिस्तान' और 'कंपनी ऑफ वूमेन' की बात कर रहे थे। 'ट्रेन टू पाकिस्तान' में उन्होने भारत-पाकिस्तान के विभाजन के दर्द को उकेरा है। शुरू के कुछ पन्नों में तो वाकई दर्द है लेकिन आगे वही दर्द यौन कुंठा की बानगी में परिवर्तित हो जाता है। एक तरफ लोगों की जान जा रही थी, घर बार छूटा जा रहा था और दूसरी तरफ एक लंपट लेखक को ट्रेन के भीतर सैक्स का सीन नज़र आ रहा था। वो एक जवान लडकी का चित्रण करता है और उसके साथ अपनी शाब्दिक यौन कुंठाओं से संतुष्टि प्राप्ति का ढ़ोंग रचता है। वो धड़ल्ले से अत्याधिक अश्लील शब्दावली का इस्तेमाल करता है। 'कंपनी ऑफ वूमेन' में खुशवंत सिंह ने अपने मित्र नायक 'राम' का ज़िक्र किया है। वो कहते हैं कि राम विदेश जाता है। वहां उसकी कई लड़कियों से दोस्ती हो जाती है। वो उन सभी के साथ सेक्स करता है। उसके बाद वो हर लड़की में सेक्स की संभावनाएं तलाशने लगता है। अपने घर पर काम करने वाली नौकरानियों को भी वो नहीं छोड़ता। उनके साथ भी शारीरिक संबंध बनाता है। उसका लिंग काफी बड़ा एवं मोटा होता है। औरतों के बीच हिंदू-लिंगम के नाम से मशहूर होता जाता है उसका लिंग। वगैरह-वगैरह। ऐसी ही ऊल-जुलूल बातें इन्होने अपनी किताबें 'औरतें' और 'सच, प्यार और शरारत' में भी लिखीं थीं। 'पैराडाइज़' में इन्होने जिस तरह से औरत की मर्यादा के खिलवाड़ किया है वो वाकई शर्मनाक है।

अब आप ही बताइए, ऐसी बकवास बातें लिखने वाला शख्स क्या संतुलित मानसिकता वाला हो सकता है? क्या कोई भी सभ्य इंसान इस तरह की असभ्य भाषा का इस्तेमाल कर सकता है? क्या हिंदू महिलाओं अथवा किसी भी जाति की महिलाओं पर इस तरह की ओछी टिप्पणी करने वाला बदतमीज़ न कहलाए तो उसे क्या कहा जाए? ज़ाहिरा तौर पर बुद्धि खराब हो गई लगती है ठरकी खुशवंत सिंह की। सठिया तो वो कई साल पहले ही गए थे लेकिन अब लगता है कि सड़िया गए हैं खुशवंत सिंह जी। वो कहते भी हैं कि बुझने के पहले दिए की लौ बहुत तेज़ी से फड़फड़ाती है... हो सकता है कि ये खुशवंत सिंह जी की फड़फड़ाहट हो, एक अतृप्त यौन फड़फड़ाहट... !

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