शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

उत्तर प्रदेश में पत्रकारों पर हमलाः सच कहने की सजा




मायावती सरकार और उसके नुमाइंदों ने हर उस आवाज़ को कुचल देने की कसम खाई है, जो मुख्यमंत्री मायावती या उनके राजकाज के ख़िला़फ उठाई गई हो. विरोधियों पर लाठी-डंडों की बौछार और व्यापारियों का उत्पीड़न करने, क़ानून के रक्षकों एवं शिक्षा मित्रों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटने वाले मायावती के कथित गुर्गों का निशाना अबकी बार मीडिया बना. डिप्टी सीएमओ डॉक्टर सचान की हत्या को मौत साबित करने में लगे शासन-प्रशासन को जब यह लगा कि मीडिया के कारण सच का पर्दाफाश हो सकता है तो पुलिस द्वारा उसकी आवाज़ दबाने की मुहिम चला दी गई, लेकिन पत्रकारों की एकजुटता के सामने सरकार को झुकना पड़ा. मामला इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े एक पत्रकार का था, जिसे स़िर्फ इसलिए पुलिस के उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा, क्योंकि वह डॉक्टर सचान हत्याकांड की सच्चाई बेबाक होकर दिखा रहा था. बताया जाता है कि सीएमओ बी पी सिंह की हत्या के मामले में मुख्य आरोपी डिप्टी सीएमओ वाई एस सचान की बीते 22 जून को ज़िला जेल अस्पताल में रहस्यमय परिस्थितियों में हुई मौत के बारे में इस समाचार चैनल की रिपोर्टिंग कथित तौर पर सरकार के लिए असुविधाजनक थी. विपक्ष के दबाव और भारी फज़ीहत के बाद राज्य सरकार को झुकना पड़ा और लखनऊ में इस समाचार चैनल के ब्यूरो प्रमुख के साथ कथित रूप से मारपीट करने के आरोप में दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के ख़िला़फ मुक़दमा दर्ज किया गया.
डिप्टी सीएमओ डॉक्टर सचान की हत्या को मौत साबित करने में लगे शासन-प्रशासन को जब यह लगा कि मीडिया के कारण सच का पर्दाफाश हो सकता है तो पुलिस द्वारा उसकी आवाज़ दबाने की मुहिम चला दी गई, लेकिन पत्रकारों की एकजुटता के सामने सरकार को झुकना पड़ा. मामला इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े एक पत्रकार का था, जिसे स़िर्फ इसलिए पुलिस के उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा, क्योंकि वह डॉक्टर सचान हत्याकांड की सच्चाई बेबाक होकर दिखा रहा था.
यह मुक़दमा समाचार चैनल आईबीएन-7 के ब्यूरो प्रमुख शलभ मणि त्रिपाठी ने राजधानी लखनऊ के हजरतगंज थाने में अपर पुलिस अधीक्षक बी पी अशोक और क्षेत्राधिकारी अनूप कुमार के ख़िला़फ भारतीय दंड विधान (आईपीसी) की धारा 323 (चोट पहुंचाना), 342 (अवैध तरीक़े से बंधक बनाना), 504 (जानबूझ कर अपमान करना) और 506 (डराना-धमकाना) के तहत दर्ज कराया. ग़ौरतलब है कि पुलिस अफसरों बी पी अशोक और अनूप कुमार ने शलभ मणि को बीते 26 जून को उनके कार्यालय के पास से कथित तौर पर जबरन उठवा लिया था और उनके साथ बदसलूकी तथा मारपीट की थी. पुलिस ने त्रिपाठी के सहयोगी मनोज राजन को भी पकड़ने की कोशिश की थी. इस घटना से नाराज़ पत्रकारों ने मुख्यमंत्री मायावती के आवास के बाहर प्रदर्शन किया था. बाद में मुख्यमंत्री के सचिव नवनीत सहगल ने दोनों आरोपी पुलिस अधिकारियों के निलंबन की घोषणा करते हुए शलभ मणि से इन अफसरों के ख़िला़फ मामला दर्ज कराने के लिए कहा. सहगल ने पत्रकारों को बताया कि दोनों पुलिस अधिकारियों के ख़िला़फ त्रिपाठी की शिकायत के आधार पर जांच कराई जाएगी. पत्रकारों ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने न स़िर्फ त्रिपाठी के साथ धक्कामुक्की की, बल्कि उनके सहयोगी को पीटा और ज़बरदस्ती उन्हें थाने ले गए. उनका आरोप है कि पुलिस ने त्रिपाठी को झूठे मामले में फंसाने की धमकी भी दी. घटना के विरोध में राजधानी के पत्रकारों ने जब मुख्यमंत्री मायावती के सरकारी आवास के पास प्रदर्शन किया तो बाद में त्रिपाठी को छोड़ दिया गया. पत्रकारों के उत्पीड़न के ख़िला़फ उत्तर प्रदेश के विभिन्न ज़िलों से लेकर दिल्ली तक में धरना-प्रदर्शन का दौर शुरू हो गया. 29 जून को लखनऊ में पत्रकारों ने जोरदार तरीक़े से प्रदर्शन करके मांग की कि जिस तरह की कार्रवाई सरकारी काम में बाधा पहुंचाने वालों के साथ की जाती है, वैसी ही कार्रवाई पत्रकारों के काम में बाधा पहुंचाने वालों के साथ भी होनी चाहिए. पत्रकारों ने उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब से जीपीओ स्थित गांधी प्रतिमा तक एक रैली निकाली, जिसमें बड़ी संख्या में पत्रकारों ने हिस्सा लिया. इनमें प्रमुख रूप से राम दत्त त्रिपाठी, शरत प्रधान, योगेश मिश्रा, अजय कुमार, सुनील दूबे, हसीब सिद्दीकी, मुदित माथुर, अनूप श्रीवास्तव एवं संजय सक्सेना आदि मौजूद थे. पत्रकारों ने ज़िला प्रशासन के माध्यम से मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन भेजा. इसके साथ ही पत्रकारों के एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल बी एल जोशी से भी मिलकर उन्हें अपनी समस्याओं से अवगत कराया.
उधर गिल्ड ने अपने एक बयान में कहा कि आईबीएन-7 के दो पत्रकारों शलभ मणि त्रिपाठी और मनोज राजन को कथित रूप से इसलिए पुलिस का दुर्व्यवहार झेलना पड़ा, क्योंकि उन्होंने लखनऊ जेल के अस्पताल में मुख्य सहायक चिकित्सा अधिकारी वाई एस सचान की हत्या के पीछे की साजिश का ख़ुलासा करने में मदद की थी. गिल्ड के अध्यक्ष टी एन नेनन और सचिव कूमी कपूर ने अपने बयान में कहा कि उक्त पत्रकार लखनऊ पुलिस की ओर से उनके ख़िला़फ दर्ज झूठे मामलों से इसलिए बच पाए, क्योंकि उनमें से एक पत्रकार पुलिस हिरासत से भागने में कामयाब रहा और शहर के पूरे मीडिया समूह ने ग़लत गिरफ़्तारी के ख़िला़फ विरोध प्रदर्शन किया. इसके साथ ही गिल्ड ने मायावती सरकार द्वारा दोषी पुलिस अधिकारियों को निलंबित करने के क़दम का स्वागत किया. ये पुलिसकर्मी इन दोनों पत्रकारों को गिरफ़्तार करने और धमकी देने के लिए ज़िम्मेदार थे. गिल्ड ने इस बात पर चिंता जताई कि राज्य में मीडिया का पुलिस उत्पीड़न बहुत आम बात हो गया है. एडिटर्स गिल्ड आफ इंडिया ने मुख्यमंत्री मायावती को पत्र लिखकर उनके शासन-प्रशासन की ओर से पत्रकारों के ख़िला़फ बढ़ रहे धमकी, भय और हिंसा के मामलों पर अपना विरोध जताया है. समाचार चैनल आईबीएन-7 के उक्त दो पत्रकारों के साथ कथित रूप से हुए दुर्व्यवहार के मामले को संज्ञान में लेते हुए गिल्ड ने मायावती से सभी ज़रूरी क़दम उठाने के लिए कहा है, ताकि राज्य में मीडिया स्वतंत्र रूप से अपना काम कर सके.
इस संदर्भ में लखनऊ सचिवालय एनेक्सी स्थित मीडिया सेंटर में उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति की एक आपात बैठक हुई. समिति के अध्यक्ष हिसामुल इस्लाम सिद्दीकी ने पत्रकार शलभ मणि एवं मनोज राजन के साथ पुलिस अधिकारियों द्वारा की गई अभद्रता को दुर्भाग्यपूर्ण बताया. बैठक में पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग सरकार से की गई. साथ ही यह भी कहा गया कि यदि पत्रकारों के साथ कोई पुलिस अधिकारी या कर्मचारी आगे से ऐसी हरकत करे तो उसके ख़िला़फ तुरंत सख्त क़ानूनी कार्रवाई की जाए. बैठक में समिति के उपाध्यक्ष मुदित माथुर, सचिव डॉ. योगेश मिश्रा, पूर्व अध्यक्ष रामदत्त त्रिपाठी, प्रमोद गोस्वामी एवं उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष शिव शंकर गोस्वामी आदि मौजूद थे.

पुलिस का असली चेहरा

उत्तर प्रदेश पुलिस लाठी और गोली के बल पर सबका मुंह बंद करने की महारथ रखती है. गुनाहगारों की तारणहार और बेगुनाहों के लिए भस्मासुर की तरह काम करने वाली राज्य पुलिस अपने कारनामों से अक्सर चर्चा में रहती है. यही वजह है कि उसके ख़िला़फ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सर्वाधिक शिकायतें मिली हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2010-11 में आयोग को उत्तर प्रदेश पुलिस के ख़िला़फ 8,768 शिकायतें मिलीं. इनमें हिरासत में मौत, प्रताड़ना, अत्याचार, फर्जी मुठभेड़ और क़ानूनी कार्रवाई करने में नाकामी जैसे मामले सबसे अधिक हैं.

हर तऱफ भर्त्सना

प्रदेश में पत्रकारों पर हमले की चारों तऱफ निंदा हो रही है. विभिन्न सामाजिक एवं मज़दूर संगठनों और विपक्षी दलों ने मीडियाकर्मियों पर पुलिस के हमले को कलंक बताया. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने कहा कि मीडियाकर्मियों पर हमले से यह ज़ाहिर होता है कि राज्य में अब कोई भी शख्स सुरक्षित नहीं है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि वारदात में शामिल लोगों के ख़िला़फ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए. सपा-लोकदल ने भी इसे गंभीर घटना बताते हुए मायावती सरकार से सूबे के पत्रकारों की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखने की मांग की, ताकि वे अपना काम निर्भीकता के साथ कर सकें. समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दो पुलिस अफसरों द्वारा पत्रकारों के साथ कथित मारपीट की निंदा करते हुए कहा कि ऐसे अधिकारियों को निलंबित नहीं, बल्कि बर्खास्त किया जाना चाहिए. यादव ने कहा कि भविष्य में प्रदेश में सपा की सरकार बनने पर ऐसे अधिकारियों की जांच कराई जाएगी और इन्हें सलाखों के पीछे भेजा जाएगा. उन्होंने प्रदेश में क़ानून व्यवस्था ख़राब होने का आरोप लगाते हुए कहा कि वह राज्यपाल बी एल जोशी को पत्र लिखकर मायावती सरकार को बर्खास्त करने की मांग करेंगे. उत्तर प्रदेश कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता एवं महासचिव सुबोध श्रीवास्तव ने लोकतंत्र के चौथे खंभे पर खाकी के हमले को सत्ता पक्ष का तानाशाही रवैया बताते हुए कहा कि बिना सरकार की मर्जी के कोई अधिकारी मीडिया से लड़ने की कोशिश नहीं करेगा. जो कुछ भी हो रहा है, उसके लिए पुलिस से अधिक मायावती सरकार ज़िम्मेदार है.

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