मंगलवार, 12 जुलाई 2011

स्त्री के विद्रोह की कहानियां




बात अस्सी के शुरुआती दशक की है. उस व़क्त मैं बिहार के जमालपुर के रेलवे हाईस्कूल का छात्र था. यह वह दौर था, जब टेलीविज़न सुदूर शहरी और ग्रामीण इलाक़ों में नहीं पहुंच पाया था. ख़बरों के लिए हम लोग आकाशवाणी के पटना और दिल्ली केंद्र पर निर्भर रहते थे. शाम साढ़े सात बजे पटना आकाशवाणी से प्रादेशिक समाचारों का प्रसारण होता था, जिसे हमारे घर में नियमित सुना जाता था. इसके अलावा रात पौने नौ बजे राष्ट्रीय समाचार आते थे, जिन्हें सुनकर हम लोग सो जाते थे. लेकिन आकाशवाणी से ज़्यादा हमारा भरोसा उस व़क्त बीबीसी की हिंदी प्रसारण सेवा पर था. व़क्त ठीक से याद नहीं है, लेकिन अगर मेरी स्मृति ठीक है तो शाम सात बजकर चालीस मिनट पर बीबीसी से हिंदी में ख़बरों का प्रसारण होता था. ओंकार नाथ श्रीवास्तव, रमा पांडे आदि की आवाज़ में ख़बरों का जब प्रसारण होता था तो उनके बोलने के अंदाज़ से ख़बरों में गहराई आ जाती थी. आकाशवाणी के समाचारवाचकों की आवाज़ भी बेहद अच्छी थी और उच्चारण एकदम साफ होता था, लेकिन बीबीसी में प्रसारण के तरीक़े और बैकग्राउंड म्यूज़िक से प्रस्तुतिकरण जानदार हो जाता था. तो, हमारी शाम ख़बरों को सुनकर बीतती थी. बीबीसी की हिंदी सेवा से एक और रोचक याद जुड़ी हुई है.
रमा पांडे बताती हैं कि स्कूल के दिनों में राबिया उनकी दोस्त थी और बेहद प्रतिभाशाली एथलीट थी, लेकिन नवीं कक्षा में जाते ही राबिया के  परिवार वालों ने उसके खेल में भाग लेने पर इसलिए रोक लगा दी, क्योंकि वे राबिया का निकाह करना चाहते थे. रमा पांडे को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने राबिया की अम्मी से बात करने की कोशिश की, लेकिन उनके हाथ नाकामी लगी. राबिया के परिवार वाले टस से मस होने को तैयार नहीं थे और परिवार के दबाव में राबिया कोई भी क़दम उठाने को तैयार नहीं थी. जब रमा ने उसे अपने पांव पर खड़े होने की सलाह दी तो उसका जवाब था, जब दौड़ नहीं सकती तो अपने पांव पर क्या खड़ी हो पाऊंगी. लेकिन फिर भी राबिया ने हौसला नहीं छोड़ा और उसने राष्ट्रीय खेलों में भाग लिया.
साल के अंत और नए वर्ष की शुरुआत में प्रसारण के व़क्त समाचारवाचक यह ऐलान करता था कि अगर आपको बीबीसी का कैलेंडर चाहिए तो अमुक पते पर हमें लिखें. यह दिल्ली का पता होता था और पोस्ट बॉक्स नंबर लिखना होता था. मैंने भी जब इसे सुना तो सोचा क्यों न एक पोस्टकार्ड लिख दिया जाए. उस व़क्त पोस्टकार्ड पांच पैसे का आता था. मैंने बेहद विनम्रता से कैलेंडर भेजने का अनुरोध पत्र बीबीसी के बताए पते पर भेज दिया. लगभग दस दिनों के बाद ए फोर साइज़ का एक ख़ूबसूरत ल़िफा़फा मेरे पते पर आया, जिसमें प्रेषक की जगह बीबीसी हिंदी सेवा लिखा था. जब मैं स्कूल से लौटा तो अपने कमरे में वह ल़िफा़फा देखकर बेहद ख़ुश हुआ. जल्दबाज़ी में उसे खोला तो एकदम चमकदार काग़ज़ पर एक पन्ने का कैलेंडर था. ऊपर एक ग्रुप फोटो था, जिसमें बीबीसी हिंदी सेवा से जुड़े लोगों की तस्वीर थी. लगभग तीन दशक बाद स्मृति में अब दो ही नाम हैं-ओंकार नाथ श्रीवास्तव और रमा पांडे. तत्काल लिफाफे से निकालकर उसे स्टडी टेबल के  सामने लगा लिया. लेकिन फिर एक ख़ुराफात सूझी कि अगर एक पांच पैसे का पोस्टकॉर्ड भेजने पर इतने ख़ूबसूरत काग़ज़ पर छपा कैलेंडर मिल सकता है तो क्यों न कुछ और अनुरोध पत्र भेजकर और कैलेंडर मंगवा लिए जाएं तथा दोस्तों में बांटकर रौब ग़ालिब किया जाए. फिर तो मुझे याद है कि मैंने अपने परिवार के हर व्यक्ति के नाम से अनुरोध पत्र बीबीसी हिंदी सेवा को भेज दिया. चूंकि अनुरोध पत्र एक साथ न भेजकर थोड़े अंतराल पर भेजे गए थे, इसलिए उसी हिसाब से कुछ अंतराल के बाद कैलेंडर मिलने शुरू हो गए. पहले तो डाकिया भी चौंका कि हर एक-दो दिन बाद लंदन के पते से मेरे घर क्या आ रहा है. दबी ज़ुबान से वह यह दरियाफ्त भी करने की कोशिश करने लगा कि इस ल़िफा़फे में होता क्या है. एक दिन मैंने उसकी जिज्ञासा ख़त्म करते हुए उसके सामने ही ल़िफा़फा खोलकर उपहार स्वरूप वह कैलेंडर उसे ही दे दिया. अब तो यह हर साल का नियम सा बन गया था. कैलेंडर में चश्मा लगाए ओंकार नाथ श्रीवास्तव और बेहद ख़ूबसूरत रमा पांडे अपने बोलने के अंदाज़ की वजह से भी याद हैं. अभी जब मित्र जयप्रकाश पांडे ने बताया कि रमा पांडे के कथा संग्रह की डीवीडी लंदन के नेहरू ऑडिटोरियम में जारी हुई है तो मैं चौंका, कहानी संग्रह की डीवीडी! बातों-बातों में ही जयप्रकाश जी ने यह भी बताया कि रमा पांडे गायिका इला अरुण और पीयूष पांडे की बहन हैं. बात आई-गई हो गई. लेकिन अभी कुछ दिनों पहले किसी संदर्भ के लिए एक किताब ढूंढने में जुटा था तो अचानक फैसले पर नज़र गई, जिसकी लेखिका रमा पांडे थीं और दिल्ली के मंजुलिका प्रकाशन से छपी थी किताब. उसे निकाल कर अलग रख लिया. फिर उसे पढ़ना शुरू किया. स्त्री विमर्श के इस दौर में पिछले वर्ष प्रकाशित इस किताब की साहित्य जगत में नोटिस ली जानी थी, लेकिन अफसोस कि हिंदी के कर्ताधर्ताओं की नज़र इस अहम किताब पर नहीं गई. मुस्लिम महिलाओं को केंद्र में रखकर लिखी गई कहानियां इनके संघर्ष और व्यवस्था के ख़िला़फ उठ खड़े होने की कहानी है. रमा पांडे बहुआयामी प्रतिभा की धनी हैं. वह देश की पहली महिला प्रोड्यूसर हैं, जिन्होंने लंबे अरसे तक दूरदर्शन के लिए काम करते हुए अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ी.
जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि फैसले देश की मुस्लिम महिलाओं की संघर्ष की दास्तां है. इसकी एक कहानी दौड़ती हिरणी की नायिका रमा पांडे की दोस्त हैं. रमा पांडे बताती हैं कि स्कूल के दिनों में राबिया उनकी दोस्त थी और बेहद प्रतिभाशाली एथलीट थी, लेकिन नवीं कक्षा में जाते ही राबिया के  परिवार वालों ने उसके खेल में भाग लेने पर इसलिए रोक लगा दी, क्योंकि वे राबिया का निकाह करना चाहते थे. रमा पांडे को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने राबिया की अम्मी से बात करने की कोशिश की, लेकिन उनके हाथ नाकामी लगी. राबिया के परिवार वाले टस से मस होने को तैयार नहीं थे और परिवार के दबाव में राबिया कोई भी क़दम उठाने को तैयार नहीं थी. जब रमा ने उसे अपने पांव पर खड़े होने की सलाह दी तो उसका जवाब था, जब दौड़ नहीं सकती तो अपने पांव पर क्या खड़ी हो पाऊंगी. लेकिन फिर भी राबिया ने हौसला नहीं छोड़ा और उसने राष्ट्रीय खेलों में भाग लिया. कई वर्षों तक रमा और राबिया नहीं मिलीं, लेकिन वर्षों बाद जब वे मिलीं तो राबिया की उम्र बयालिस की हो चुकी थी और उसने शादी न करने का फैसला कर लिया था. यह एक ऐसी लड़की का विद्रोह था, जो एक पारंपरिक मुस्लिम परिवार से आती थी. लेखिका पर इस बात का गहरा असर पड़ा और दौड़ती हिरणी इसी असर के परिणामस्वरूप सामने आई. फैसले में और भी कई कहानियां हैं, जिन्हें लेखिका ने बेहद क़रीब से अपनी आंखों के सामने घटते हुए देखा है. चाहे वह उनके ख़ुद के रिश्तेदार के पैरा जंपर से एक स्कूल के  हेडमिस्ट्रेस बनने की कहानी हो या फिर हैदराबाद की शाइस्ता की दास्तां. फैसले संग्रह की अमूनन सारी कहानियां यथार्थ का चित्रण हैं. इस कहानी संग्रह में जो एक बात रेखांकित की जा सकती है, वह है नायिकाओं का समाज और व्यवस्था के प्रति विद्रोह. रमा पांडे की भाषा में शास्त्रीयता नहीं है, जो इसे बोझिल बनाने के बजाय पठनीय बनाती है. स्त्री विमर्श के झंडाबरदारों के लिए रमा की कहानियां एक चुनौती की तरह हैं और मुझे लगता है कि देर-सबेर उन्हें इस संग्रह का नोटिस लेना ही पड़ेगा.
(लेखक आईबीएन-7 से जुड़े हैं)

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