पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है, जिसकी क़ीमत क्या है, अभी यह तय नहीं हुआ है. पत्रकारिता में जो लोग आते हैं उन्हें कम से कम यह ध्यान में रखकर आना चाहिए कि पत्रकारिता के पेशे की क़ीमत उनकी अपनी जान हो सकती है. मुंबई में मिड डे के पत्रकार जेडे की हत्या इस सत्य को एक बार फिर रेखांकित कर रही है. जेडे निर्भीकता से अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह कर रहे थे. बुनियादी तौर पर वह क्राइम रिपोर्टर थे और मुंबई के अंडरवर्ल्ड और मुंबई पुलिस के गठजोड़ तथा कौन स़फेदपोश ऐसे हैं, जो अपराध को प्रश्रय देते हैं, इसके बारे में वह लगातार लिखते रहते थे. उनके पास जानकारियां भी थीं और ज़्यादातर जानकारियां उनके पास अपने आप पहुंच रही थीं. पत्रकारिता में एक ऐसी स्थिति आती है जब आप खुद को स्थापित कर लेते हैं तो सारी खबरें अपने आप चलकर आ जाती हैं. जेडे इसी श्रेणी के पत्रकार थे. जेडे को श्रद्धांजलि देने के साथ हम पत्रकारिता के अपने अनुभव के बारे में बात करना चाहेंगे. हमारे बीच में ऐसे पत्रकारों की भरमार है, जो पत्रकारिता के बुनियादी पेशे की ज़िम्मेदारी का निर्वाह करने के बजाय पीआर जर्नलिज़्म यानी पब्लिक रिलेशन जर्नलिज़्म करने में ज़्यादा रुचि दिखाते हैं.
हिंदुस्तान में बहुत सारे पत्रकार स़िर्फ इसलिए मार दिए गए, क्योंकि उन्होंने अपने क़स्बे में चीनी की चोरबाज़ारी के बारे में रिपोर्टें लिखी थीं. बांदा में रामकृष्ण गुप्ता ऐसे पत्रकार थे, जिनकी इसी वजह से हत्या हुई, क्योंकि वह स्थानीय कालाबाज़ारियों के ख़िला़फ रिपोर्ट लिखते थे. वह दैनिक अख़बार के पत्रकार थे. फेहरिस्त लंबी है, हर प्रदेश में, हर ज़िले में भ्रष्टाचार और अपराध में लिप्त ऐसे संगठित गिरोह मिल जाएंगे, जिन्होंने सच लिखने वाले पत्रकारों पर हमले कराए.
पत्रकारों की जानें कई और वजहों से भी जाती हैं. अगर आप दंगा कवर करते हैं, युद्ध कवर करते हैं, भूकंप कवर करते हैं तो कहीं ऐसी घटना हो जाती है, जिसमें आपकी जान जाने का ख़तरा रहता है और यही हमारे पेशे की क़ीमत है. मुझे याद है, अ़फग़ानिस्तान में ल़डाई चल रही थी. मैं उसे कवर कर रहा था. मैंने यह घटना अपनी आंखों से देखी. एक पत्रकार कवर कर रहा था, दूसरा पत्रकार उसके साथ था. वह पीस टू कैमरा कर रहा था. अचानक एक गोली आई और कैमरे के सामने बोलने वाले पत्रकार को लग गई और वह वहीं गिर गया. मैं सलाम करता हूं, दूसरे पत्रकार को जिसके हाथ में कैमरा था. उसनेहाथ से कैमरा गिरने नहीं दिया और शूटिंग जारी रखी. उसी नेबताया कि किस तरह पीस टू कैमरा करने वाले को गोली लगी और उनके पीछे क्या घटनाएं चल रही थीं.
आज भी हिंदुस्तान में हर जगह ईमानदारी से पत्रकारिता का धर्म निभाने वाले लोग हैं, लेकिन उन सब पर अपनी-अपनी तरह के खतरे मंडरा रहे हैं. कहीं किसी ज़िले में ठेकेदार, नेता और प्रशासन का गठजोड़ है, तो कहीं प्रदेश स्तर पर नेताओं और अपराधियों की साठगांठ है. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मा़फिया उन पत्रकारों पर नज़र रखे हुए है, जिनकी क़लम पैनी और सख्त है. पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है, जिसे समाज और आम लोगों ने मान्यता और इज़्ज़त दी है. संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि पत्रकारिता देश का चौथा खंभा है. इसे जन मान्यता मिली हुई है. न ही कहीं यह लिखा हुआ है और न ही ऐसा कोई नियम है कि पत्रकार किसी को कहीं भी रोक सकता है, लेकिन जनमानस ने समाज में पत्रकारों को यह हक़ दिया है कि वह कहीं भी किसी को रोककर सवाल पूछ सकता है. पत्रकार की यह समानता कोई दूसरा वर्ग या किसी दूसरे पेशे से जु़डा व्यक्ति नहीं कर सकता है. पत्रकार चाहे तो किसी भी ज़िलाधिकारी या मंत्री को रोककर, कह सकता है कि मैं अमुक अख़बार या पत्रिका का संवाददाता हूं, मुझे आपसे सवाल पूछना है. वह आदमी रुकेगा और वह कह सकता है कि मैं इस सवाल का जवाब नहीं दूंगा, लेकिन ऐसा नहीं है. हो सकता है कि वह बिना रुके और अनसुना करके भी चला जाए. यह ताक़त पत्रकारों को समाज ने दी है. समाज ने ही पत्रकारों को यह भी ताक़त दी है कि वे इस लोकतंत्र को चलाने वाले चौथे खंभे के रूप में जाने जाएं. जनता के किसी वर्ग को जब अपनी समस्याओं का समाधान नहीं मिलता, या किसी नेता या प्रशासन के अधिकारी के सामने उसकी सुनवाई नहीं होती है तो उसके सामने स़िर्फ एक रास्ता बचता है कि वह किसी पत्रकार या अख़बार वालों के पास जाए और अपनी समस्या बताए.
आज भी लोगों की समस्याएं सुनने वाले पत्रकार हैं, जो उन्हें अपने अख़बार या अपनी पत्रिका में जगह देते हैं. इसलिए पत्रकारिता के पेशे का सम्मान जनता के मन में बहुत ज़्यादा है. लोग आपस में कहते भी हैं कि अगर हमारी कहीं भी सुनवाई नहीं होगी या अगर आप हमारी बात नहीं सुनेंगे तो हम अख़बार वालों के पास चले जाएंगे. अ़खबार में प्रकाशित जन समस्याओं पर सरकार और प्रशासन कार्यवाही भी करता है. आज भी अख़बारों में छपी रिपोर्ट पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट संज्ञान लेता है और अपनी तऱफ से नोटिस भी जारी करता है.
जेडे की मौत एक ऐसे पत्रकार की शहादत है, जो बड़ा क्राइम रिपोर्टर था, लेकिन उसके पास भी मोटरसाइकिल थी. वह चाहते तो कहीं से भी समझौता करके अपने लिए मुंबई में अच्छी सुविधाएं जुटा सकते थे, लेकिन जेडे ने ऐसा नहीं किया. जेडे की मौत भी मोटरसाइकिल पर चलते हुए उन लोगों की वजह से हुई, जो सही पत्रकारिता से बुरी तरह घबरा जाते हैं. इसमें कोई पुलिस अधिकारी शामिल है, पता नहीं. इसमें कोई अंडरवर्ल्ड शामिल है, पता नहीं. जेडे की हत्या की जांच कहीं पहुंच भी पाएगी, पता नहीं, क्योंकि इतने सारे पत्रकार जिन्हें दुख हुआ है, वे भी रोज़ी रोटी के काम में थोड़े दिनों में लग जाएंगे और जेडे का नाम स़िर्फ यादों में रह जाएगा. लगता है कि उनके हत्यारों की तलाश को लेकर पड़ने वाला दबाव भी थोड़े दिनों में कम हो जाएगा, लेकिन जेडे जैसी माैत और जेडे जैसी पत्रकारिता करने वाले लोग समाज में हमेशा इज़्ज़त की निगाहों से देखे जाएंगे. पत्रकारिता के पेशे की यही क़ीमत है.
डॉक्टर के बारे में कहा जाता है कि वह अपने मरीज़ों के लिए 24 घंटे उपलब्ध रहेगा. बहुत सारे लोग नहीं रहते हैं, लेकिन यह सच नहीं है. सच वह डॉक्टर है जो 24 घंटे अपने मरीज़ों के लिए उपलब्ध रहता है. पुलिस के पेशे की क़ीमत है 24 घंटे क़ानून व्यवस्था के ऊपर नज़र बनाए रखे. फौज की क़ीमत है 24 घंटे अपने सीने पर गोली खाने के लिए तैयार रहे. फायर ब्रिगेड के पेशे की क़ीमत है 24 घंटे आग से जूझने के लिए तैयार रहे. वहां न बीमारी का बहाना चलता है और न ही तबीयत ख़राब होने का. पत्रकारिता के पेशे की क़ीमत है अपनी जान. जेडे की मौत ने इसे साबित किया है. जिन लोगों को पत्रकारिता के पेशे में आना है, उन्हें इस सबक़ को दोबारा याद करना चाहिए. वे पीआर जर्नलिज़्म करने वालों की सेना में शामिल हो जाएं या फिर सही पत्रकारिता करने वाले लोगों के पदचिन्हों पर चलें और अगर सही पत्रकारिता करने वालों के पदचिन्हों पर चलना है तो इ़ज़्ज़त मिलेगी, सम्मान मिलेगा, लोगों का प्यार मिलेगा. हो सकता है कहीं से कोई गोली भी मिल जाए. जेडे को हम सच्ची श्रद्धांजलि देते हैं और जेडे से यह वादा करते हैं कि हम उस क़तार में हमेशा बने रहेंगे, जो सच्ची पत्रकारिता की पक्षधर है.
जेडे सत्य के साथ खड़े होने वाले पत्रकारों में से एक थे. इसलिए जेडे की शहादत हमें कई सीख देती है. पहली सीख यह देती है कि अगर सही पत्रकारिता करने वाले लोग एकजुट नहीं हुए तो अपराध, ख़ासकर स़फेदपोश लोगों के साए में चलने वाला अपराध उन्हें अभी और परेशान करेगा. जेडे की मौत यह भी सीख देती है कि सही पत्रकारिता करने वाले लोग अगर आसान ज़िंदगी जीना चाहेंगे तो यह उनके लिए संभव नहीं होगा. अगर हम इतिहास में देखें तो पहला नाम याद आता है गणेशशंकर विद्यार्थी का, जिनकी हत्या कानपुर में सत्य लिखने की वजह से हुई थी.बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो प्रेस कटिंग के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार करते हैं. ऐसे बहुत कम लोग बचे हैं, जो फील्ड में जाते हैं और तथ्यों की जांच पड़ताल करते हैं और सत्य के साथ खड़े होते हैं. जेडे सत्य के साथ खड़े होने वाले पत्रकारों में से एक थे. इसलिए जेडे की शहादत हमें कई सीख देती है. पहली सीख यह देती है कि अगर सही पत्रकारिता करने वाले लोग एकजुट नहीं हुए तो अपराध, ख़ासकर स़फेदपोश लोगों के साए में चलने वाला अपराध उन्हें अभी और परेशान करेगा. जेडे की मौत यह भी सीख देती है कि सही पत्रकारिता करने वाले लोग अगर आसान ज़िंदगी जीना चाहेंगे तो यह उनके लिए संभव नहीं होगा. अगर हम इतिहास में देखें तो पहला नाम याद आता है गणेशशंकर विद्यार्थी का, जिनकी हत्या कानपुर में सत्य लिखने की वजह से हुई थी.
हिंदुस्तान में बहुत सारे पत्रकार स़िर्फ इसलिए मार दिए गए, क्योंकि उन्होंने अपने क़स्बे में चीनी की चोरबाज़ारी के बारे में रिपोर्टें लिखी थीं. बांदा में रामकृष्ण गुप्ता ऐसे पत्रकार थे, जिनकी इसी वजह से हत्या हुई, क्योंकि वह स्थानीय कालाबाज़ारियों के ख़िला़फ रिपोर्ट लिखते थे. वह दैनिक अख़बार के पत्रकार थे. फेहरिस्त लंबी है, हर प्रदेश में, हर ज़िले में भ्रष्टाचार और अपराध में लिप्त ऐसे संगठित गिरोह मिल जाएंगे, जिन्होंने सच लिखने वाले पत्रकारों पर हमले कराए.
पत्रकारों की जानें कई और वजहों से भी जाती हैं. अगर आप दंगा कवर करते हैं, युद्ध कवर करते हैं, भूकंप कवर करते हैं तो कहीं ऐसी घटना हो जाती है, जिसमें आपकी जान जाने का ख़तरा रहता है और यही हमारे पेशे की क़ीमत है. मुझे याद है, अ़फग़ानिस्तान में ल़डाई चल रही थी. मैं उसे कवर कर रहा था. मैंने यह घटना अपनी आंखों से देखी. एक पत्रकार कवर कर रहा था, दूसरा पत्रकार उसके साथ था. वह पीस टू कैमरा कर रहा था. अचानक एक गोली आई और कैमरे के सामने बोलने वाले पत्रकार को लग गई और वह वहीं गिर गया. मैं सलाम करता हूं, दूसरे पत्रकार को जिसके हाथ में कैमरा था. उसनेहाथ से कैमरा गिरने नहीं दिया और शूटिंग जारी रखी. उसी नेबताया कि किस तरह पीस टू कैमरा करने वाले को गोली लगी और उनके पीछे क्या घटनाएं चल रही थीं.
आज भी हिंदुस्तान में हर जगह ईमानदारी से पत्रकारिता का धर्म निभाने वाले लोग हैं, लेकिन उन सब पर अपनी-अपनी तरह के खतरे मंडरा रहे हैं. कहीं किसी ज़िले में ठेकेदार, नेता और प्रशासन का गठजोड़ है, तो कहीं प्रदेश स्तर पर नेताओं और अपराधियों की साठगांठ है. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मा़फिया उन पत्रकारों पर नज़र रखे हुए है, जिनकी क़लम पैनी और सख्त है. पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है, जिसे समाज और आम लोगों ने मान्यता और इज़्ज़त दी है. संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि पत्रकारिता देश का चौथा खंभा है. इसे जन मान्यता मिली हुई है. न ही कहीं यह लिखा हुआ है और न ही ऐसा कोई नियम है कि पत्रकार किसी को कहीं भी रोक सकता है, लेकिन जनमानस ने समाज में पत्रकारों को यह हक़ दिया है कि वह कहीं भी किसी को रोककर सवाल पूछ सकता है. पत्रकार की यह समानता कोई दूसरा वर्ग या किसी दूसरे पेशे से जु़डा व्यक्ति नहीं कर सकता है. पत्रकार चाहे तो किसी भी ज़िलाधिकारी या मंत्री को रोककर, कह सकता है कि मैं अमुक अख़बार या पत्रिका का संवाददाता हूं, मुझे आपसे सवाल पूछना है. वह आदमी रुकेगा और वह कह सकता है कि मैं इस सवाल का जवाब नहीं दूंगा, लेकिन ऐसा नहीं है. हो सकता है कि वह बिना रुके और अनसुना करके भी चला जाए. यह ताक़त पत्रकारों को समाज ने दी है. समाज ने ही पत्रकारों को यह भी ताक़त दी है कि वे इस लोकतंत्र को चलाने वाले चौथे खंभे के रूप में जाने जाएं. जनता के किसी वर्ग को जब अपनी समस्याओं का समाधान नहीं मिलता, या किसी नेता या प्रशासन के अधिकारी के सामने उसकी सुनवाई नहीं होती है तो उसके सामने स़िर्फ एक रास्ता बचता है कि वह किसी पत्रकार या अख़बार वालों के पास जाए और अपनी समस्या बताए.
आज भी लोगों की समस्याएं सुनने वाले पत्रकार हैं, जो उन्हें अपने अख़बार या अपनी पत्रिका में जगह देते हैं. इसलिए पत्रकारिता के पेशे का सम्मान जनता के मन में बहुत ज़्यादा है. लोग आपस में कहते भी हैं कि अगर हमारी कहीं भी सुनवाई नहीं होगी या अगर आप हमारी बात नहीं सुनेंगे तो हम अख़बार वालों के पास चले जाएंगे. अ़खबार में प्रकाशित जन समस्याओं पर सरकार और प्रशासन कार्यवाही भी करता है. आज भी अख़बारों में छपी रिपोर्ट पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट संज्ञान लेता है और अपनी तऱफ से नोटिस भी जारी करता है.
जेडे की मौत एक ऐसे पत्रकार की शहादत है, जो बड़ा क्राइम रिपोर्टर था, लेकिन उसके पास भी मोटरसाइकिल थी. वह चाहते तो कहीं से भी समझौता करके अपने लिए मुंबई में अच्छी सुविधाएं जुटा सकते थे, लेकिन जेडे ने ऐसा नहीं किया. जेडे की मौत भी मोटरसाइकिल पर चलते हुए उन लोगों की वजह से हुई, जो सही पत्रकारिता से बुरी तरह घबरा जाते हैं. इसमें कोई पुलिस अधिकारी शामिल है, पता नहीं. इसमें कोई अंडरवर्ल्ड शामिल है, पता नहीं. जेडे की हत्या की जांच कहीं पहुंच भी पाएगी, पता नहीं, क्योंकि इतने सारे पत्रकार जिन्हें दुख हुआ है, वे भी रोज़ी रोटी के काम में थोड़े दिनों में लग जाएंगे और जेडे का नाम स़िर्फ यादों में रह जाएगा. लगता है कि उनके हत्यारों की तलाश को लेकर पड़ने वाला दबाव भी थोड़े दिनों में कम हो जाएगा, लेकिन जेडे जैसी माैत और जेडे जैसी पत्रकारिता करने वाले लोग समाज में हमेशा इज़्ज़त की निगाहों से देखे जाएंगे. पत्रकारिता के पेशे की यही क़ीमत है.
डॉक्टर के बारे में कहा जाता है कि वह अपने मरीज़ों के लिए 24 घंटे उपलब्ध रहेगा. बहुत सारे लोग नहीं रहते हैं, लेकिन यह सच नहीं है. सच वह डॉक्टर है जो 24 घंटे अपने मरीज़ों के लिए उपलब्ध रहता है. पुलिस के पेशे की क़ीमत है 24 घंटे क़ानून व्यवस्था के ऊपर नज़र बनाए रखे. फौज की क़ीमत है 24 घंटे अपने सीने पर गोली खाने के लिए तैयार रहे. फायर ब्रिगेड के पेशे की क़ीमत है 24 घंटे आग से जूझने के लिए तैयार रहे. वहां न बीमारी का बहाना चलता है और न ही तबीयत ख़राब होने का. पत्रकारिता के पेशे की क़ीमत है अपनी जान. जेडे की मौत ने इसे साबित किया है. जिन लोगों को पत्रकारिता के पेशे में आना है, उन्हें इस सबक़ को दोबारा याद करना चाहिए. वे पीआर जर्नलिज़्म करने वालों की सेना में शामिल हो जाएं या फिर सही पत्रकारिता करने वाले लोगों के पदचिन्हों पर चलें और अगर सही पत्रकारिता करने वालों के पदचिन्हों पर चलना है तो इ़ज़्ज़त मिलेगी, सम्मान मिलेगा, लोगों का प्यार मिलेगा. हो सकता है कहीं से कोई गोली भी मिल जाए. जेडे को हम सच्ची श्रद्धांजलि देते हैं और जेडे से यह वादा करते हैं कि हम उस क़तार में हमेशा बने रहेंगे, जो सच्ची पत्रकारिता की पक्षधर है.
|
Tags: Corruption Jede Journalism Vidyarthi death journalist law murder newspapers press अख़बार गणेशशंकर विद्यार्थी जान जेडे पत्रकार पत्रकारिता प्रेस भ्रष्टाचार मौत व्यवस्था हत्या
One Response to “पत्रकारिता की क़ीमत जान हो सकती है”
- मैं आपकी बात की ताइद करता हूं। आज ही नहीं, जब से यह दुनियां वजुद में आई है, तभी से सच कहने वालों ने अपनी सच्चाई के लिए समय समय पर अपनी जान की कुरबानी दी है। सुकरात, ईसा मसीह से लेकर आज जे डी इत्यादि सरीखे लोगों ने समाज और सच्चाई के लिए अपनी-अपनी जाने कुरबान की।







