बुधवार, 27 जुलाई 2011

'पंजाब रत्न' खुशवंत ने 'खुश कीता'

रेणु अगाल
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली


खुशवंत सिंह का नाम आते ही एक बेलौस और बिंदास शख़्सियत की छवि उभरकर आती है. उनकी उम्र चाहे 91 की हो गई हो पर उनकी आँखों की चमक कम नहीं हुई है और न ही उनकी बातों की शरारत.
पंजाब सरकार की ओर से पंजाब रत्न सम्मान दिए जाने के मौके पर उन्होंने इसका प्रमाण भी दे दिया.
रद बलाई, दूर पांई, तोड़ तांई, रखे सांई - ये थे खुशवंत की दादी के दुलार भरे शब्द और शायद इन्हीं आशीर्वादों की लय-ताल खुशवंत सिंह की लेखनी में भी आ गई.
खुशवंत सिंह ने पूरी ज़िंदगी एक ‘‘डर्टी ओल्ड मैन’’ की छवि बनाने में लगाई और इस मौके पर उन्होंने इसे दिखाया भी. उन्होंने जो फुलझड़ियां छोड़ी उसमें भाषा पर उनकी पकड़ और रंगीन मिजाज़ी दोनों खूब दिखे.
शराब के सुरूर के बिना ही उन्होंने पंजाबियों, मेहरबानों और कद्रदानों के बीच अपना पिटारा खोलकर रख दिया. यहाँ मौजूद लोगों में से कुछ हँसते-हँसते लोटपोट हो गए तो कुछ के कान लाल हो गए... शायद उनके जिन्होंने सोचा था कि उम्र के इस पड़ाव में सरदार साहब मोटी-मोटी गालियों से परहेज़ करेंगे.
लेकिन वे नादान निकले. उन्हें इल्म न था कि खुशवंत सिंह को शुरू होने के लिए किसी पटियाला पैग की ज़रूरत नहीं है.
लेखन और भाषा शैली से आम आदमी को जोड़ने की जो क्षमता खुशवंत सिंह के पास है, वो अंग्रेज़ी के किसी भी समकालीन लेखक के पास नहीं है. सालों से ‘‘बल्ब में बंद’’ इस सरदार जी ने अपने कॉलम ‘‘विद मैलिस टूवार्ड्स वन एंड ऑल’’ से जो संवाद स्थापित किया उसने उन्हें आम आदमी से जोड़ा.
ट्रकों और बसों के पीछे लिखी शायरी को साहित्य का दर्जा देना हो या स्वयं पर हँसने की हिम्मत– सरदार जी दा जवाब नहीं.
उनके भद्दे मज़ाकों का पिटारा शायद ख़त्म नहीं होगा और न ही उनके चाहने वालों का. इसीलिए चाचा-चाची, अंकल- आँटी, सरदार-सरदारनी, देश की बड़ी-बड़ी हस्तियां हों या पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए विशेष आमंत्रित मेहमान खुशवंत सिंह के जादू को सबने महसूस किया.
आखिर हो भी क्यों न ... कहीं न कहीं सभी उनकी तरह कभी न कभी बिना सही-ग़लत की परवाह किए अपने अंदाज़ में जीने और अपनी बात कहने की इच्छा मन में रखते हैं.

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