शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

कौन हैं जो मीडिया पर नियंत्रण चाहते हैं?






प्रजातंत्र में मीडिया की भूमिका और अभिव्यक्ति की सीमाओं को लेकर जो बहस हो रही है उसके संदर्भ में चुनाव आयोग का ताजा बयान ध्यान आकर्षित करता है, जिसमें कहा गया है कि पांच राज्यों के चुनावों के दौरान आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के संबंध में मीडिया रिपोर्ट को शिकायत के रूप में दर्ज कर कार्रवाही की जायेगी।
मीडिया की विश्वसनीयता और प्रजातंत्र को मजबूत बनाने में सार्थक भूमिका के संदर्भ में चुनाव आयोग का यह प्रेक्षण स्वागतयोग्य तो है ही साथ ही कई मीडिया के संबंध में कई प्रकार के भ्रम को भी दूर करता है। सबसे विचारणीय यह है कि आखिर मीडिया से समाज और सरकार की अपेक्षाएं क्या हैं? कौन हैं जो मीडिया पर नियंत्रण चाहते हैं? क्या मीडिया को एक कठपुतली की तरह व्यवहार करना चाहिये जो सबको पसंद हो? यदि मीडिया के माध्यम से व्यवस्थाओं की खामियां सामने आती हैं तो वह किसके हित में हैं? जब तक कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका मीडिया को सहयोगी और मार्गदर्शक नहीं मानेंगी तो निरंकुशता की स्थिति बती ही जायेगी।
प्रजातंत्र में निरंकुश होने की संभावना हर पल बनी रहती है। चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि चुनाव प्रकि्रया में तटस्थता नहीं बरतने वाले अधिकारियों कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई की जायेगी। कार्यपालिका के कर्तव्य निर्वहन और विश्वसनीयता पर संदेह स्पष्ट रेखांकित होता है। यदि कार्यपालिका के माध्यम से मीडिया को अपने कर्तव्य निर्वहन में किसी प्रकार का सहयोग मिलता है तो यह कोई ऐसा कृत्य नहीं है जिससे कारण मीडिया के व्यवहार को ही आलोचना का शिकार बना दिया जाये। आखिरकार उददेश्य एक है। आम लोगों के हित में शासन प्रशासन ईमानदारी से काम करे। भ्रष्टाचारी उजागर हों। अच्छे कार्यों को जनसमर्थन मिले और लोकतंत्र के फलने फूलने का वातावरण बने।
क्या भारत में समाचार माध्यम मसलनः अखबार, टीवी चैनल और इंटरनेट मीडिया लोकतंत्र के सजग प्रहरी की भूमिका निभा रहे हैं। या फिर बा़ ही खेत खा रही है। कभी पैसे लेकर खबर दिखाने के आरोप तो कभी बडे चिकने चुपड़ो की चर्चा के आक्षेप, क्या मीडिया सच के लिये नेताओं से, न्यायापालिका से एवं व्यवस्था से उनके लिये लड़ रही है। जिन्हें न्याय नहीं मिला? इन सवालों के जवाब खोजने के लिये मीडिया के अतीत पर गौर करना लाजिमी है।
संदर्भो के अनुसार इमरजेंसी के समय समाचार पत्रों ने संपादकीय पृष्ठ खाली छोडकर शालीन तरीके से अपना विरोध दर्ज कराया था। यह सब उस समय के पत्रकारों के बलबूते ही संभव हो सका था। पिछले दो दशकों की बड़ी घटनाएं इस बात की तसदीक करती हैं कि मीडिया कर्तव्यपरायण्ता, ईमानदारी और सजगता से अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर रहा होता तो बोफोर्स जैसा मामला सामने नहीं आता। चाहे मामला कोबरा पोस्ट द्वारा सांसद घूसखोरी के खुलासे का हो अथवा कि्रकेट सम्राट ललित मोदी अथवा शिश थरूर की कुर्सी जाने का। यह सब न्यू मीडिया ने ही किया है। 2जी स्पेक्ट्रम को जनता के सामने लाने का भी काम पत्रकारों ने ही किया है। इसलिये इन पंक्तियों का उल्लेख करना समीचीन होगा ’’पत्रकारिता के पवित्र पेश्ो में सफल होने से बेहतर है पेश्ो में बने रहना’’।
दुनिया के कई देशों को हिला देने वाले विकीलीक्स के संपादक जूलियन असांजे को फ्रांस के प्रमुख समाचार पत्र ने मेन आफ द ईयर 56 प्रतिशत प्राप्त वोट के आधार पर इसलिये घोषित किया। क्योंकि वह पत्रकारिता को ही न्यू मीडिया के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहित कर रहा है।
अब देशदुनिया के लगभग सभी प्रमुख समाचार पत्रों एवं चैनलों के पत्रकार आजकल अपना पक्ष न्यू मीडिया पर बेहिचक रख रहे हैं। बहरहाल, पत्रकार अब पत्रकारिता केवल मीडिया मालिकों के भरोसे नहीं कर रहा है। उनके सामने सोशल मीडिया कंधे से कंधा लगाये खड़ा है।
काबिलेगौर बात यह है कि अभी तक भारत में जितने भी खुलासे हुये हैं वह कोई मीडिया मालिक ने नहीं किये हैं। बल्कि कई मर्तबा बड़े बड़े खुलासे करने के लिये पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर तथ्य जुटाता है, महीनों काम करता है तब बड़ा धमाका या खुलासा हो पाता है। लेकिन आज भी कुछ मीडिया मालिक न केवल स्वयं पत्रकारिता कर रहे हैं बल्कि पीत पत्रकारिता को हतोत्साहित कर रहे है, करना भी चाहिए।
जहां तक सवाल सरकारों द्वारा पत्रकारों को दी जाने वाली सुविधाओं का है तो वह फकत श्रमजीवी पत्रकारों के लिये ही है। पत्रकारों को मिलने वाली सुविधाओं पर अब सवाल उठने लगे हैं। जबकि केन्द्रीय वित्तमंत्री ने तो बजट पेश कर प्रेस कांसिल ऑफ इंडिया तथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय का बजट ही कम कर दिया है।

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