शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

आलोक तोमर


आलोक तोमर

आलोक तोमर को लोग जानते भी हैं और नहीं भी जानते. उनके वारे में वहुत सारे किस्से कहे जाते हैं, ज्यादातर सच और मामूली और कुछ कल्पित और खतरनाक. दो बार तिहाड़ जेल और कई बार विदेश हो आए आलोक तोमर ने भारत में काश्मीर से ले कर कालाहांडी के सच बता कर लोगों को स्तब्ध भी किया है तो दिल्ली के एक पुलिस अफसर से पंजा भिडा कर जेल भी गए हैं. वे दाऊद इब्राहीम से भी मिले हैं और रजनीश से भी. वे टी वी, अखबार, और इंटरनेट की पत्रकारिता करते हैं.

Sunday, November 29, 2009


SUPRIYA ROY ABROAD








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Sunday, June 29, 2008


एक लटकती हुई चार्जशीट



आलोक तोमर

दो साल, चार महीने और पाँच दिन। इतना वक्त लगा दिल्ली पुलिस को एक चार्जशीट दाखिल करने में। वो भी ऐसे मामले मैं जिसमें वह अभियुक्त की जमानत रद्द करवाने के लिए हाई कोर्ट में एक साल से अर्जी लगाये हुए है और वहां पुलिस का तर्क है कि अभियुक्त अगर आजाद रहा तो देश और न्याय के लिए भारी खतरा है।

ये मामला है 2006 के फरवरी महीने का जब एक संपादक पर इल्जाम लगाया गया था कि उसने वे डेनिश कार्टून भारत में छाप कर भारत में सांप्रदायिक अशांति फैलाने की कोशिश की है जिन्हें ले कर पूरी दुनिया के कई हिस्सों में फतवे जारी किए जा रहे है और खास तौर पर डेनमार्क में तो कार्टून छापने वाले संपादक को भूमिगत होना पड़ा है। तब पुलिस को इतनी फ़िक्र और इतनी जल्दी थी कि इस 'अभियुक्त संपादक' को बिना उचित अदालत में ले जाए, सीधे तिहाड़ जेल भेज दिया गया-इस आदेश के साथ कि इसे उस उच्च सुरक्षा बैरक में बंद करो जहाँ कश्मीरी आतंकवादी आदि बंद होते हैं। बारह दिन जेल में रहने के बाद जमानत हुई और इस बात का इंतजार भी कि कब अभियोग लगेंगे और कब मुक़दमा शुरू होगा। इस बीच संसार के लगभग हर देश के पत्रकार संगठनो ने भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को इंटरनेट पर और सीधे भी अपीलें भेजी। सर्वोदयी प्रभाष जोशी से ले कर वामपंथी कमलेश्वर तक अदालत में हाजिर हुए और उन्होने संपादक की बेगुनाही और धर्मनिरपेक्षता की कसमें खाई और संबंधित मजिस्ट्रेट ने जमानत के आदेश में ही पुलिस के आरोप की धज्जियां उड़ा दी। लेकिन दिल्ली की पुलिस कसम खाए बैठी थी कि संसार के इस सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी में अभिव्यक्ति की आजादी का जो संवैधानिक मूल अधिकार है, उसे अपने बूटो ंके नीचे रौंद दिया जाय। दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी गृह मंत्री शिवराज पाटिल से इस गिरफ्तारी ंके खिलाफ अपील कर रहे थे तो झारखंड ंके उन्ही की पार्टी ंके एक नेता संपादक का सिर कलम करने वाले को करोड़ो रुपए का इनाम देने का ऐलान कर रहा था।

इस मामले में सवा दो साल में 17 जांच अधिकारी बदले गए, तीन थानेदार और तीन डीसीपी बदल गए लेकिन चार्ज शीट को न पेश होना था न वो हुई। हार कर कर अभियुक्त पत्रकार ने दिल्ली हाईकोर्ट से ही कहा कि मी लार्ड, अगर इल्जाम है तो मुक़दमा चलवाइए या फिर एफ़ आई आर को ही खारिज कीजिए। अदालत ने पुलिस से पूछा औए एक थकी हारी एफ़ आई आर 5 जून को पेश कर दी गयी। अब मुक़दमा चलेगा, तारीखें पड़ेंगी और पत्रकार लिखने की वजाय अदालत में मुजरिम बना रहेगा।

गिरफ्तारी के वक्त वहुत खबरें बनी थी, टीवी चेनलों के ओ वी वैन लगे थे। बहुत सारे संपादक टीवी पर प्रेस की आजादी का राग गा रहे थे तो एक तो ऐसे थे जो संपादक को ही नालायक करार दे रहे थे। इसके बाद वे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर गए होंगे और अपने होम थियेटर पर कोई फिरंगी फिल्म देखी होगी। अपनी अपनी बुध्दि, अपने अपने सरोकार। कोई ये नहीं देख पा रहा था कि तत्कालीन पुलिस आयुक्त की ख़ुद इस मामले में क्या दिलचस्पी थी, यह भी नहीं कि इस आयुक्त के के पॉल की धर्मं पत्नी ज़िंदगी भर कांग्रेस के एक ठिगने महाबली मंत्री के साथ-तू जहाँ जहाँ रहेगा, मेरा साया साथ होगा-की अदा में काम करती रहीं थी, आज भी कर रही हैं। शिखंडी की तरह आचरण कर रहे गृह मंत्री को आगे रख कर चलाया गया था ये हथियार।

के के पॉल का गुस्सा कितना निजी था ये इसी से ज़ाहिर है कि एक और मामले में, इसी पत्रकार को गिरफ्तार करने के लिए, कुछ ही महीने बाद पुलिस टीम हवाई अड्डे पर जहाज़ के नीचे खड़ी कर दी और पत्रकार को उठवा लिया। इस बार गिरफ्तारी दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने की थी। ये सेल आतंकवादियों और माफिया से निपटने के लिए वनाया गया है। फिर तिहाड़ जेल। इस बार संगत सांसद पप्पू यादव से ले कर नवी वार रूम लीक केस के अभियुक्तों की मिली। फिर जमानत हुई और ये लो, मामला अदालत की पहली पेशी में,दस- पन्द्रह मिनट में खारिज। कार्टून वाले मामले में चार्ज शीट तब तक भी नहीं आयी थी।

इस बीच के के पॉल को संघ लोक सेवा आयोग का सदस्य बना दिया गया। एक लापता इन्स्पेटर से जान का खतरा बहाना बना और पहले उन्हें ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा मिली और फिर जेड प्लस श्रेणी की। अपने देश में भूतपूर्व पुलिस आयुक्त होना कितने खतरे की बात है? लापता इंस्पेक्टर वापस भी आ गया, उसे धमकी के आरोप में गिरफ्तार भी नहीं किया गया। मगर के के पौल की सुरक्षा अब भी कायम है। बेटा वकालत कर रहा है और पत्नी एनजीओ भी चलाती हैं और देश ंके विदेश मंत्री की सलाहकार भी हैं। यह जोड़ा इतना करामाती है कि एनजीओ के लिए हरियाणा सरकार से करोड़ो की जमीन मिल गई और पत्नी ंके नाम से गुड़गांव ंके महंगे बीएलएफ ईलाके में एक करोड़ रुपए की लागत से और यह सिर्फ मकान बनाने की लागत है उनकी एक तीन मंजीला कोठी भी तैयार हो गयी। इस कोठी की जानकारी बिल्डर एमएल आहुजा की बेबसाईट-www.mlahujaassociates.com से मिल सकती है। लेकिन लोग तरक्की करे और बीबी के नाम से उसके जीते जी ताजमहल बनवाए, खुद को शाहजहां साबित करें, अपना क्या जाता है।

ये में अपनी कहानी लिख रहा हूँ। गुणों की खान नहीं हूँ इस लिए न्यायोचित रूप से निरासक्त नहीं रह पाया तो न्याय और आप क्षमा करें। न मर्यादा पुरुषोत्तम हूँ और न महात्मा गांधी, फिर भी चार अक्षर बेच कर रोजी चलाता हूँ। मेंरा एक सवाल है आप सब से और अपने आप से। जिस देश में एक अफसर की सनक अभिवक्ति की आजादी पर भी भरी पड़ जाए, जिस मामले में रपट लिखवाने वाले से ले कर सारे गवाह पुलिस वाले हों, जिसकी पड़ताल, 17 जांच अधिकारी करें और फिर भी चार्ज शीट आने में सालों लग जायें, जिसमें एक भी नया सबूत नहीं हो-सिवा एक छपी हुई पत्रिका के-ऐसे मामले में आज में कटघरे में हूँ, कल आप भी हो सकते हैं।

मित्रो, ग़लत फहमी मत पालिए। में न मुकदमा लड़ने ंके लिए चंदा मांग रहा हूँ और न जुलूस निकालने के लिए भीड़। न्याय या दंड भी मुझे अदालत से मिलेगा। मेरा सवाल सिर्फ़ यह है कि जब एक साथी पूरी व्यवस्था से निरस्त्र या ज्यादा से ज्यादा काठ की तलवारों के साथ लड़ता है तो आप सिर्फ़ तमाशा क्यों देखते हैं? समर शेष है, नही पाप का भागी केवल व्याध / जो तटस्थ है, समय लिखेगा, उनका भी अपराध।

अब चाहें तो वो लेख (मूल हिन्दी के इंग्लिश अनुवाद का हिन्दी अनुवाद ) पढ़ लें जिस पर सारा बवाल कटा है---

'पिछले दिनों इस्लाम धर्म की स्थापना करने वाले पवित्र हजरत मोहम्मद के एक कार्टून पर, जो डेनमार्क में छपा है, काफ़ी प्रदर्शन हुए, और अब भी चल रहे हैं। हजरत मोहम्मद के कार्टून छापने वाली पत्रिका वाही है जिसने च्रिस्ट के कार्टून छपने से इनकार कर दिया था। अब जॉर्ज बुश भी कहते हैं कि मुस्लिमों में परिहास बोध नहीं होता और इसी से उनके धर्म के मूल आधार का पता चलता है। अमेरिका की इन मूर्खता भरी टिप्पणियों से आतिशबाजी उठनी स्वाभाविक हैं। आप किसी भी धर्म की मूल आधार को चुनौती दे कर बच नहीं सकते।

माना कि किसी भी धर्मं की महानता का पैमाना उसकी सहिष्णुता है और यह तथ्य भी कि वह अपने पर की गयी टिप्पणियों को कितना सहन कर सकता है। किंतु अगर कोई धर्म अगर अपने पर मजाक का बुरा मानता हो तो उसे अपने पथ का संधान करने के लिए ख़ुद छोड़ देना चाहिए।'

कुछ ग़लत लिखा था?

Friday, June 20, 2008


रोटी चाहिए या यूरेनियम?


आलोक तोमर

रात को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एटमी करार की भव बाधाओं से जूझ और एक हद तक निपट कर सोए थे लेकिन जागे तो एक जोरदार झटका उनका इंतजार कर रहा था। मुद्रास्फीति का इंडेक्स आ चुका था और यह कोई अच्छी खबर नही थी कि बाजार में एक सप्ताह में महंगाई की दर साढ़े ग्यारह फीसदी तक पहुंच गई है और सरल भाषा में कहें तो आलू-प्याज से गाजर-मूली और साबुन तेल तक के दाम बढ़ गए हैं और बाजार आम आदमी और सरकार दोनों की पकड़ से बाहर हो गया है।

यह कोई शुभ सूचना नही है। सब लोग और खासतौर पर विपक्षी यह याद दिलाने में कतई नही चुक रहे कि यह महंगाई तेरह साल का एक रिकॉर्ड है और पिछली बार भी यह रिकॉर्ड तभी बना था जब मनमोहन सिंह नरसिंह राव सरकार में वित्ता मंत्री हुआ करते थे। मनमोहन सिंह वित्ता मंत्री रहने के पहले रिजर्व बैंक के गर्वनर भी रह चुके हैं और उन्हें अच्छी तरह पता है कि मुद्रास्फीति क्यों होती है और इसके क्या-क्या उपाय हो सकते हैं। अब तो खैर बहुत देर हो गई है मगर चिदम्बरम को वित्तामंत्री बना कर मनमोहन सिंह ने कोई बहुत शानदार फैसला नही किया था। जब उनको मोंटेक सिंह अहलुवालिया को भारत सरकार में लाना ही था तो उन्हें ही वित्ता मंत्री बना देते। या प्रधानमंत्री रहते हुए भी वित्ता मंत्रालय वे खुद अपने पास रख सकते थे। पहले भी कई बार ऐसा हुआ है।

अब जब महंगाई पर हाहाकार मचा हुआ है और कोई निदान बताने की बजाय सभी धिक्कार मंत्र जपने में लगे हुए हैं तो एक बात पर हैरत होती है। जिस दिन पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़े थे उसी दिन वित्ता मंत्री चिदम्बरम ने घोषित कर दिया था कि इसका असर बाजार पर पड़ना लाजमी है। जब ये भाव बढ़ाए गए थे तो दुनिया के तेल बाजार में पेट्रोलियम की कीमत 135 डॉलर प्रति बैरल थी। आज की ताजा खबर यह है कि यह कीमत इसी साल 200 डॉलर तक पहुंच सकती है। सरकार को अगर दीवालिया नही होना है तो उसे फिर से पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने पडेेंग़े और जाहिर है कि मनमोहन सिंह सरकार को और जूते पड़ेंगे। एक बैरल में 119 लीटर से कुछ ज्यादा का आंकड़ा होता है और इस हिसाब से कच्चे तेल का दाम ही लगभग 38 रुपए प्रति लीटर बैठता है। इसके बाद रिफाइनरी का खर्चा और पेट्रोल पंपो से ले जाने और पंप मालिकों के कमीशन आदि को मिला कर अगर 200 डॉलर का भाव हो गया तो हमें तमाम रियायतों के बावजूद एक लीटर पेट्रोल लगभग 75 रुपए में पड़ेगा। उस हालत में चुनाव में कांग्रेस का क्या हाल होगा यह समझा जा सकता है।

कृषि मंत्री शरद पवार आज बहुत हैरत में बता रहे थे कि हमारे पास इतना अनाज और आलू प्याज हुआ है कि किसानों के पास उसे रखने के लिए जगह नहीं है। भारतीय खाद्य निगम के गोदाम भी पूरी तरह भरे हुए हैं। श्री पवार का कहना यह है कि किसानों को सरकार उचित दाम नही दे पा रही और यह भी बाजार में आए संकट की एक जड़ है। अब श्री पवार को यह कौन याद दिलाए कि दो साल पहले जब अनाज के भंडार खाली थे तो विदेशों से खराब श्रेणी का गेंहू आयात करने के लिए भारत सरकार ने शायद उन्हीं की सहमति से जो दाम दिया था वही भारतीय किसानों को क्यों नही दिया जा सकता। अगर आप किसान की जेब और पेट भरा रखेंगे तो उनका कर्जा माफ करने की नौबत ही नही आएगी।

वामपंथी सबके सब लगता है कि अपने किचन गार्डन में सब्जियां और अनाज उगाते हैं। पूरा देश जब महंगाई को ले कर हैरान और परेशान था तो माक्र्सवादी पोलित ब्यूरो के महासचिव प्रकाश करात ने लगभग खीझ कर पत्रकारों से कहा कि महंगाई क्यों बढ़ी यह आप मुझसे क्यों पूछते हैं। उनसे पूछिए जिन्होंने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए हैं और उन्हें एटमी करार की चिंता ज्यादा है। इस संदर्भ में कुत्तो की दुम वाला मुहावरा अपने आप याद आ जाता है। देश में सुनामी हो या चक्रवात अपने कामरेड भाई इंकलाब जिंदाबाद ही करते रहेंगे।

भारत में सिर्फ खाना ही महंगा नही हो रहा। थोक भाव इंडेक्स के आधार पर ही महंगाई का हिसाब किया जाता है और यह शुक्रवार की रात तक ग्यारह से काफी आगे निकल गया था। रिजर्व बैंक की सुरक्षित सीलिंग सीमा इस मामले में साढ़े पांच प्रतिशत की है। इसका सीधा असर बैंकों पर पड़ा है और घर से ले कर गाड़ी खरीदने तक के कर्जे फटाफट महंगे हो गए हैं। फरवरी में जब मुद्रास्फीति साढ़े पांच प्रतिशत के आस पास थी तो बैंकों को छुट दी गई थी कि वे अपनी आधार पूंजी यानी नकद कर्ज अनुपात यानी केश क्रेडिट रेशियो का प्रतिशत छह तक ले जा सकते हैं। आज की तारीख में यह प्रतिशत नौ करने की जरूरत आ गई है और इतना पैसा खुद रिजर्व बैंक के खजाने में भी नही है।

बहुत साल पहले जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री थे तब यह नौबत आई थी कि रिजर्व बैंक का सोना भी विदेशी बैंकों के पास गिरवी रखना पड़ा था ताकि रुपए का दाम डॉलर के अनुपात में बहुत ज्यादा नही घट जाए। फिलहाल उलटी धारा चल रही है। रुपया डॉलर की तुलना में मजबूत होता जा रहा है और इस बात से चिदम्बरम भले ही खुश हों लेकिन कमल नाथ नाराज हैं क्योंकि निर्यात करने के लिए उन्होंने जो लक्ष्य अपने सामने रखा था वह अब डॉलर की कीमत से निर्धारित होता है और यह कीमत बदलने से निर्यात का इंडेक्स नीचे चला जाता है। निर्यात नही होगा तो देश में विदेशी मुद्रा नही आएगी और विदेशी मुद्रा का अभाव कम से कम कमल नाथ की राय में भारत को दुनिया के व्यापार जगत में बहुत पीछे ले जाएगा।

इस तर्क को अगर उलट कर देखें तो अगर निर्यात नही भी हो और रुपए का भाव बढ़ता रहे तो डॉलर का अनुपातिक दाम गिरेगा और भारत को मिलने वाला कच्चा तेल भी उन्ही बढ़े हुए डॉलर वाले दामों पर प्राप्त होगा। जाहिर है कि इसका असर महंगाई पर भी पड़ेगा और फिलहाल महंगाई के आंकड़ो को न सरकार अनदेखा कर सकती है और न किसी भी पार्टी के नेता। भाजपा के जो नेता उछल उछल कर बोल रहे हैं कि मनमोहन सिंह की सरकार महंगाई के मामले में फेल हो गई वे भी अगर किसी संयोग से सत्ताा में आए तो यही महंगाई उन्हें भी विरासत में मिलने वाली है और इससे सुलझने के लिए वे कोई ऐसे मौलिक प्रयास नही कर पाएंगे जिन्हें करने से वे अपने आप को महंगाई के इस प्रपंच से निकाल सकें।

वैसे सही बात यह है कि भारत सरकार को कम से कम आने वाले कुछ महीनों तक सारी और चिंताएं भूल कर महंगाई से सुलझने में ध्यान लगाना पड़ेगा क्योंकि एटमी करार इंतजार कर सकता है लेकिन अगर देश की जनता भूखी मरी और लोगों की जिंदगी दुभर हुई तो सरकार को कोई नही बचा पाएगा और यह सरकार ऐसे कारणों से गिरेगी जो दरअसल कुछ दिनों बाद उसके नियंत्रण से बाहर चले जाएगें। सोनिया गांधी के इस तर्क में कुछ नही धरा है कि राज्य सरकारें असल में इस महंगाई के लिए जिम्मेदार हैं। फिलहाल दामों पर राजनीति की बजाय राजनीति के मूल्य ठीक से तय किए जाने चाहिए और मूल्यों पर राजनीति नही की जानी चाहिए।

Thursday, June 19, 2008


दुर्भाग्य में वासना खोजते लोग



सुप्रिया रॉय

जब तक आप नाम रहते है और संज्ञा होने की सीमा से बाहर नही जाते, तब तक यह आभास कर पाना भी असंभव है कि आपके अस्तित्व का अर्थ आपके आस पास के समाज के लिए क्या है। चौदह साल की नादान और सपनो की दुनिया मे रहने वाली आरूषि तलवार को अपनी यह कीमत जान का दाम देकर चुकानी पड़ी। जिन लाल बत्तिायो पर वह अपनी स्कूल बस मे बैठ कर साथियो से हॅसी मजाक करते हुए निकल जाती थी, वहा पर लगें मजमो मे भी उसकी बात हो रही है और जिन अखबारो का उसने कभी नाम तक नही सुना था, उनमे भी उसकी मौत को ले कर किस्से और कहानियां रचे जा रहे है।

इस देश मे बल्कि हमारी दुनिया मे अक्सर यह होता है कि एक जीता जागता शख्स अचानक शीर्षको और फाइल नंबरो मे तब्दील हो जाता है और फिर उसके बारे मे वे लोग भी कहानियां कहने लगते है जिनसे उसका कभी वास्ता नही रहा होता। तलवार परिवार जिसे आम तौर पर गुमनाम और एक हसमुख परिवार कहा जाता था, जिसकी पूरी दुनिया अपनी बेटी के लाड प्यार के आस पास घूमती थी, अचानक दंत कथाओ की चीज बन गई है और इस घर का चप्पा-चप्पा इस तरह सार्वजनिक हो गया है जितना शायद ताजमहल या कोई दूसरी मशहूर इमारत भी नही रही होगी।

लोग और उससे भी ज्यादा सीबीआई इन दंत कथाओ की नियमित रचनाकार बन गई है। निष्पाप लोग अचानक गुनाहगार साबित कर दिये जाते है, सीबीआई डॉ. तलवार के यहा कंपाउडर कृष्णा को गैर कानूनी हिरासत मे ले कर उसके तमाम तरह के कानूनी परीक्षण करवा लेता है और बाद मे उसको हत्या के आरोप मे गिरफ्तार कर लिया जाता है। मोहल्ले, पड़ोस और दोस्तो का घेराव होता है और कभी आरूषि को चरित्रहीन बताया जाता है तो कभी उसके पिता की चरित्रहीनता को इस कांड की वजह बताया जाता है। एक त्रासदी मे भी स्वाद खोजने वाले इतने तल्लीन है कि आईपीएल का फाइनल भी टीआरपी मे इस खबर के सामने पिट जाता है। रामदेव से ले कर राजू श्रीवास्तव तक सब फेल हो जाते हैं और हमारी विकृत कल्पनाओं में एक विभत्स हत्या कांड मनोरंजन का पर्याय बन कर जीवित रहता है।

चलिए, पहले पुलिस और अब सीबीआई की बुरी से बुरी कल्पना को एक बार सच मान लें और यह मंजूर कर लें कि जेल में बंद राजेश तलवार ने ही अपनी फुल सी बेटी का पहले सिर फोड़ा और गला काट दिया। लेकिन इस पूरी कथा में आनंद लेने वालों को यह समझ में नही आता कि कानून की अदालत में जाने के पहले समाज की अदालत में अचानक फैसले क्यों होने लगे? एक पिता जिसे अपनी इकलौती बेटी खोने का संताप सता रहा है, उसे सहानुभूति मिलने की बजाय जेल में बंद कर दिया गया और इसके बावजूद बंद रखा गया जब सीबीआई के जासूस सरेआम कह चुके थे कि उन्हें कृष्णा के तौर पर असली कातिल मिल गया है।

विकृत आनंद लेने वालों में सिर्फ हमारे आपके जैसे टीवी देखने वाले या अखबार पढ़ने वाले लोग नही हैं बल्कि उस समय उत्तार प्रदेश पुलिस के आई जी गुरबख्श सिंह का वह चेहरा भुलाए नही भुलता जब वे मीडिया को यह बताने में लगे थे कि कैसे डॉक्टर साहब घर में घुसे और उन्होंने नौकर हेमराज और अपनी बेटी को आपत्तिाजनक स्थिति में देखा और आपे में दोनों की हत्या कर दी। सरदार गुरबख्श सिंह की वर्दीधारी वासना को सिर्फ यह कह कर चैन नही पड़ा, उन्होंने फिर से कहा कि आपत्तिाजनक स्थिति थी लेकिन वे लोग यानी वह नन्ही बच्ची और बूढ़ा हो रहा नौकर भोगविलास में नही डूबे थे। इस मूर्ख ने यह खुलासा करते हुए अपने परम मूर्ख अधिकारियों द्वारा तैयार केस डायरी भी ठीक से नही देखी थी जिसमें पिता अपनी बेटी के कमरे में बैठ कर उसके कम्पयूटर से किस किस को मेल कर रहा है और कौन कौन सी वेबसाइट देख रहा है, इसका पूरा ब्यौरा दर्ज है। अब तो सीबीआई भी कहती है कि नोएड़ा पुलिस ने जांच का कबाड़ा कर दिया।

जैसे सीबीआई ने जांच का बहुत कल्याण किया हो। पन्द्रह दिन से साले जांच करते घूम रहे थे और अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान के विशेषज्ञ साथ में थे लेकिन सोलहवें दिन अचानक राज खुलता है कि पोस्टमॉर्टम में आरूषि के साथ बलात्कार के संकेतों की ठीक से जांच नही की गई। इतने दिन तक इतने वैज्ञानिक परीक्षण करने और आकाश पाताल एक कर देने वाले इन अनपढ़ो को सबसे मूल प्रमाण और कारण की याद इतनी देर में आई। जाहिर है कि उनके लिए भी आरूषि तलवार अब फाइल नंबर से ज्यादा कुछ नही रह गई है।

आखिर यह समझ में आता है कि जिस देश में अपराध पत्रिकाएं और धार्मिक पत्रिकाएं दोनों ही सबसे ज्यादा बिकती हैं, वहां अपराध को और उसके दर्शन को धर्म करार दे देने वाले लोग भी कम नही होंगे। सीबीआई अब मीडिया पर तोहमत मढ़ने में लगी है कि उसे ठीक से और शांति से जांच नही करने दी गई। आज तक सीबीआई, पिछले पन्द्रह वर्षो में अपने द्वारा जांच किए गए मामलों में पन्द्रह फीसदी लोगों को भी सजा नही दिलवा पाई। उस पर वह बात करती है कि उसे सबूत मिलते जा रहे हैं और वह मामला सुलझाने के कगार पर ही है। सीबीआई भी न्याय पालिका की तरह आचरण कर रही है और बयान सबूत होने के पहले ही चाहे जिस को मुजरिम करार देने में जूट जाती है।

आरूषि की मौत के तीसवें दिन मुंबई में भी लगभग मिलती जूलती घटना घटी। इंजीनियरिंग कॉलेज की एक छात्रा अचानक लापता हो गई और उसके खास दोस्तों को ला कर झूठ पकड़ने वाली मशीन पर बिठा दिया गया। इस मशीन से करंट वगैरा तो नही लगता लेकिन उन पर सामाजिक लांछन तो लगा ही। आखिरकार इस लड़की की लाश उसके घर के पलंग के भीतर बने बॉक्स से बरामद हुई और अब उसके माता पिता को झूठ पकड़ने वाली मशीन पर बिठा दिया गया है। जांच में गोपनीयता बनाए रखने के नाम पर हमारी पुलिस और जांच एजेंसियां जितने झूठ बोलती हैं उस हिसाब तो इन सबका दैनिक लाई डिटेक्टर टेस्ट करवाना चाहिए।

यहां आरूषि या मुंबई की वह अभागी लड़की मुल विषय नही है। मूल विषय है हमारे अंत:करण में छिपी बैठी वह वासना और हर घटना के पीछे अपनी दमित कल्पनाओं को आकार देने वाली वह भावना जिसकी वजह से आरूषि तलवार एक दुर्भाग्यवश मरे पात्र का नाम नही बल्कि एक धारावाहिक कथा बन जाती है और जिसे टीवी सीरियल में शामिल होने से रोकने के लिए चैनल को एक सरकारी पत्र लिखना पड़ता है। टीआरपी और सर्कुलेशन धंधें के हिसाब से अच्छे शब्द हैं लेकिन हर शब्द की और हर कर्म की अपनी सीमा होती है और इस सीमा को तोड़ने वालों का अपराध भी तो किसी को तय करना चाहिए। वैसे आप चाहें तो यह भी कह सकते हैं कि इस विषय पर इतना लिख कर मैंने भी लोकप्रियतावाद की इस दौड़ में शामिल होने की कोशिश की है। आजाद देश है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है।

कांग्रेस अब चुनाव की मुद्रा में

कांग्रेस अब चुनाव की मुद्रा में
आलोक तोमर

कांग्रेस ने भले ही एटमी करार के मामले पर वाम मोर्चा को भले ही उसकी औकात बता दी हो और फिर भी अपनी नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को टिकाए रखने का इंतजाम कर दिया हाें मगर सोनिया गांधी कोई खतरा मोल नही लेना चाहती। उन्होने चुनाव अभियान की शैली मे देश घूमना शुरू कर दिया है। इसी महीने वे लगभग पंद्रह साल बाद मिजोरम गयी थी जहां उनकी बांस की टोपी पहने तस्वीरे आपने अब तक देंख भी ली होगी।

इसके बाद उन्होने महाराष्ट्र के औरंगाबाद के दौरे का कार्यक्रम बनाया। यह विदर्भ का वह इलाका है जहां शरद पवार की खूब चलती है और भाजपा ने भी अच्छा खासा वोट बैंक विकसित किया है। शिव सेना का भी यहां खूब असर है। कांग्रेस जानती हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार के बाद अगर महाराष्ट्र भी हाथ से गया तो सरकार बनाने मे अच्छी खासी दिक्कते आ सकती है। कांग्रेस के पास श्रीमती सोनिया गांधी से ज्यादा बड़ा और जीत सुनिश्चित करवाने वाला कोई दुसरा नेंता नही है और जाहिर है कि सोनिया गांधी अपनी इस महिमा को अच्छी तरह समझती है और इसलिए वे अभी से चुनाव अभियान मुद्रा मे आ गयी है।

सोनिया गांधी के भाषण भी खासे चुनावी अंदाज मे होते है। इसके पहले कि दुसरे लोग महंगाई को मुद्दा बनाएं, खुद सोनिया गांधी मुद्रास्फीति और महंगाई की बात छेड़ देती है और लगे हाथ एटमी करार को सभी मुसीबतो का निदान बता कर एक तीर से कई निशाने साध लेती है। वे मनमोहन सिंह को उनकी गैर हाजिरी में देश का अब तक का सबसे काबिल प्रधानमंत्री करार दे देती है और इस चक्कर मे नेहरू जी, इंदिरा गांधी और अपने पति राजीव गांधी का नाम भी किनारे कर देती है। सोनिया गांधी वर्तमान मे रहने की राजनैतिक ललित कला सीख गई है।

मिजोरम की सभा उस दिन हुई जिस दिन के अखबारो के शीर्षक पेट्रोलियम के दाम और ज्यादा बढ़ने की आशंकाओ से भरे हुए थे। सोनिया गाधी अपने भाषण मे कहा - भाइयो और बहनो, आपको हमारे माक्र्सवादी मित्रो और देश की आत्म निर्भरता मे से एक का चुनाव करना है। एटमी करार को एक चुनावी मुद्दा बना देना न आकस्मिक है और न अनायास। अ्रगर यूपीए की सरकार दोबारा बनी तो बहुत आराम से यह कहा जा सकता है कि अब तो इस समझौते को जनादेश भी मिल गया है। अगर कांग्रेस और उसके साथी सरकार बनाने लायक बहुमत नही जुटा सके और भाजपा सहित किसी तीसरे चौथे या पांचवे मोर्चे की सरकार आई तो इस करार पर फैसला लेने की जिम्मेदारी होगी। भाजपा तो वैसे भी इस करार का विरोध बहुत मुखर हो कर नही कर रही है। उसका कहना सिर्फ यह है कि भारत के हितो को सर्वोपरि रखना चाहिए। इस मामले मे मनमोहन सिह पहले ही भारतीय हितो की रक्षा करने वाले दस्तावेज तैयार कर चुके है।

अब यह मनमोहन सिह का कसूर नही है कि माक्र्सवादियो को यह दस्तावेज और उसकी भाषा पसंद नही आ रही है। लेकिन यह कांग्रेस की चिंता का विषय जरूर है। वामपंथी सरकार के अस्तित्व के लिए पच्चीस जून तक की समय सीमा दे चुके है। इसके बाद अगर एटमी करार पर उनकी बात नही मानी गई तो वे समर्थन वापस लेगें और पक्की बात है कि अविश्वास प्रस्ताव ले कर आएगें। भाजपा उनका समर्थन करेगी और अभी तक जो गणित है उसके अनुसार सरकार यह विश्वास मत जीत भी सकती है मगर इसके लिए उसे मुलायम सिंह यादव आदि को बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी और यह कीमत सिर्फ राजनैतिक नहीं होगी। इसीलिए कांग्रेस अव्वल तो वामपंथियो को सरकार गिराने का सुख नही लेने देगी और बाइज्जत विश्वास मत जीत कर लोक सभा भंग करने की सिफारिश करेगी और फिर शान से चुनाव के मैदान में जाएगी।

जैसे कांग्रेस यह मान कर चल रही है कि अगले आम चुनाव में माक्र्सवादियों के सांसदों की गिनती बीस तक घटेगी तो यही हाल लालू यादव का भी होने वाला है। वे दस जनपथ के वफादार सही लेकिन यूपीए के लिए गणित में मददगार नही होगें। लालू यादव का नुकसान नीतिश कुमार का लाभ होगा और कांग्रेस का मानना है कि वह धर्मनिरपेक्षता के टोटके के सहारे नीतिश कुमार और उड़ीसा के नवीन पटनायक को भी अपने साथ जोड़ने में कामयाब हो सकेगी।

समीकरणों पर और गणित पर ही जब पूरी राजनीति चलनी है तो एटमी करार से बढ़िया मुद्दा कांग्रेस को नही मिल सकता। जहां बिजली नही है, और वह देश के ज्यादातर हिस्सों में नही है, मतदाता को आसानी से समझाया जा सकता है कि अगर लेफ्ट वालों ने यह करार होने दिया होता तो आपके घर इस समय दीवाली मन रही होती। सौ बातों की एक बात यह है कि कांग्रेस अब आम चुनाव की मुद्रा में आ चुकी है और जाहिरा तौर पर वामपंथियों को ब्लैकमेलर साबित करने पर तुल गई है। शुरूआत बहुत पहले ही खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कर दी थी जब हरियाणा की एक सभा में कई महीने पहले उन्होंने गरज कर कहा था कि वामपंथी सरकार कल गिरा रहे हों तो आज गिरा दें लेकिन यूपीए उनकी धमकियों के बीच नही चलेगा और हमें कुर्सी से कोई खास मोह नही है।

उधर कांग्रेस भी जानती है कि भाजपा को भले ही साथियों की कमी खल रही हो, उसे हल्का प्रतिपक्ष मान कर नही चला जा सकता। आखिरकार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस लगातार हारती जा रही है और भाजपा उसका सफाया करती जा रही है। जब यूपीए सरकार बनी थी तो उसके पास चौदह राज्य सरकारे थीं जो अब घट कर चार रह गई हैं। इसी साल होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को कोई बहुत चमकदार नतीजों की उम्मीद नही करनी चाहिए। जिस राजस्थान में भाजपा घिसटती हुई दिख रही थी वहां भी गुर्जरों और उनके साथ दूसरी जातियों के गरीबों को आरक्षण दे कर वसुंधरा राजे ने तुरप चाल चल दी है। सोनिया गांधी को इन राज्यों में लोकल नेता की तरह मेहनत करनी पड़ेगी क्योंकि मध्य प्रदेश, छत्ताीसगढ़ और राजस्थान में जो लोकल नेता उन्होंने भावी शासक बना कर भेजे हैं उनमें से ज्यादातर का कोई जनाधार ही नही है। इसके अलावा कांग्रेस को यह अच्छी तरह याद है कि तीन विधानसभा चुनाव के नतीजे लोकसभा चुनाव की पृष्ठभूमि तैयार करेंगे। इसीलिए आश्चर्य नही होना चाहिए कि सरकार विश्वास मत जीते और अगले दिन लोकसभा चुनाव की घोषणा कर दे।

Tuesday, June 10, 2008


चंदन मित्र का नया पता





राजेन्द्र जोशी
डेटलाइन इंडिया
देहरादून, 8 जून-उत्तराखंड में भाजपा की सरकार आने का सबसे बडा लाभ तो खैर मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने वाले भुवन चंद्र खंडूडी को हुआ है लेकिन वामपंथी से भाजपा के सांसद बने पत्रकार और फिल्माें तथा वास्तविक जीवन की हीरोइनों के प्रेमी चंदन मित्र भी कम फायदे मे नहीं रहे।

इन्हीं पन्नो पर आप पढ़ चुके है कि चंदन मित्र को भाजपा ने उत्तराखंड के मामले में रिपोर्ट तैयार करने और वहां के कामकाज की जानकारी हाई कमान को देने के लिए अधिकृत किया था। इस सिलसिले में देहरादून गए चंदन मित्र अपने अखबार के लिए भी मोटे विज्ञापन वसूल लाए। यह कहानी का सिर्फ एक पहलू है। नई कहानी यह है कि नैनीताल जिले के खूबसूरत हिल स्टेशन रामगढ के पास चंदन मित्र अचानक पचास लाख रुपये की जमीन के मालिक हो गए है और अब वहां एक करोड़ रुपये की अनुमानीत लागत से उनका बागान और रमणीय रिसॉर्ट बन रहा है। चंदन मित्र को जिस अखबार पायनियर का मालिक बनवाने और अखबार चलाने में लालकृष्ण आड़वाणी ने एक बडी बैंक से एनडीए सरकार के दौरान दिल खोल कर मदद दिलवाई थी, उसका दिल्ली संस्करण अब भी घाटे में चल रहा बताया जाता है और कर्मचारियों को समय पर वेतन भी नहीं मिलता। और तो और, अंग्रेजो द्वारा स्थापित इस अखबार में विश्व प्रसिध्द जंगल बुक के लेखक रूडयार्ड किपलिंग के काम करने का प्रचार बहुत जोर शोर से पायनियर के विज्ञापनों में किया जाता है, उनका इलाहाबाद स्थित मकान जर्जर हालत में है और कभी भी गिर सकता है।

एक तरफ अखबार के संपादक करोडों का आसियाना बनवा रहे है तो दूसरी ओर इस अखबार से जूडे रहे एक बडे नाम की विरासत को सहेजने के लिए भी यह अखबार पैसा नहीं खर्च करना चाहता। भाजपा की जैसे जैसे राज्य सरकारो में स्थापना होती जा रही है, जाहिर है कि चंदन मित्र का अखबार और निजी तौर पर खुद श्री मित्र भी अच्छी-खासी तरक्की करेंगे। दिल्ली में भी चंदन मित्र की अच्छी खासी कोठी है और उसका दाम चार करोड़ रुपये से कम नहीं आंका जा सकता। इसके पहले वे इंडियन एयरलाइंस की सहयोगी संस्था अलायंस एयर के यात्रियों के लिए एक पत्रिका दर्पण निकाला करते थे और इस पत्रिका मेंं भी भाजपा शासित राज्यों के , खासतौर पर पर्यटन विभागों के विज्ञापन बहुत धडल्ले से छपा करते थे। इन विज्ञापनों की आमदनी की साझेदारी को लेकर इंडियन एयरलाइंस से उनका विवाद हुआ और एयरलाइंस ने ये पत्रिका चंदन मित्र से छीन ली। वियाग्रह के चलते फिरते विज्ञापन चंदन मित्रा से बहुत लोगों को इर्श्या हो सकती ह।ै लेकिन सब भगवा झंडा ओढ़ने के लिए वामपंथी दोस्तो को दगा नहीं दे पाते।

Tuesday, June 3, 2008


हत्या, मंत्री, पत्रकार और रिश्वत





डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 3 जून - असम के शिक्षा मंत्री रिपुन बोरा आज जब दिल्ली में सीबीआई के एक अधिकारी को रिश्वत देते पकड़े गए तो पत्रकारों और दिल्ली के व्यापारियों के बीच एक बहुत विवादास्पद गठजोड़ का भी खुलासा हो गया। रिपुन बोरा असम में हत्या के आरोप में गिरफ्तार हो चुके हैं और कुख्यात सांसद मणिकुमार सुब्बा के सहयोगी माने जाने वाले रिपुन बोरा को मंत्रिमंडल से फिर भी नही हटाया गया था।

रिपुन बोरा पर छात्र नेता डेनियल टोपो की हत्या का आरोप है। टोपो चाय बगान मजदूरों के छात्र बेटों का संगठन चलाते थे और 1996 विधानसभा चुनाव में रिपुन बोरा चुनाव हार गए थे। और इसके लिए वे टोपो को जिम्मेदार मानते थे। 2001 में हुए विधानसभा चुनाव में उसी गोहपुर सीट से रिपुन बोरा लड़े और जीते लेकिन इसके पहले 27 सितंबर 2000 को डेनियल टोपो की हत्या कर दी गई थी। रिपुन बोरा मंत्री थे इसलिए असम पुलिस ने जांच खत्म कर दी और कहा कि हत्याकांड का पता नही चल रहा है। इसके बाद जांच सीबीआई ने अपने हाथ में ली और रिपुन बोरा के खिलाफ लगातार सबूत मिलते चले गए।

रिपुन बोरा आतंकित थे और उन्होंने दिल्ली में असम के एक अखबार के संवाददाता मुकुल पाठक के जरिए सीबीआई के जांच अधिकारी से संपर्क किया। बगैर मांगे इस अधिकारी को दस लाख रुपए की रिश्वत का प्रस्ताव दिया गया ताकि वह मामला खत्म कर सके। सीबीआई ने जाल बिछा लिया था और रिपुन बोरा ने असम में कारोबार करने वाले दिल्ली के एक व्यापारी रमेश महेश्वरी को दस लाख रुपए का इंतजाम करने के लिए कहा। यह खुलेआम रिश्वत का मामला था। पैसे का इंतजाम हुआ।

असम भवन की कार में बिठा कर अधिकारी को मथुरा रोड़ पर एक मकान में लाया गया और रिपुन बोरा ने खुद एक हजार के नोटों की शक्ल में दस लाख रुपए अधिकारी को सौंपे। वे नही जानते थे कि जाल बिछा हुआ है और वे बुरी तरह फंसने वाले हैं। बोरा ने जैसे ही पैसे दिए, अधिकारी ने मोबाइल पर पहले से निर्धारित और तैयार एसएमएस भेज दिया। सीबीआई की पूरी टीम अंदर घुसी और मामला बिगड़ता देख कर मंत्री जी ने पिछले दरवाजे से भागने की कोशिश की। लेकिन उन्हें वहां भी सीबीआई के अधिकारी इंतजार करते मिले। पत्रकार पाठक भागा हुआ है लेकिन दस लाख देने वाले व्यापारी रमेश महेश्वरी को कैद कर लिया गया। बोरा को यह खबर मिलते ही मंत्रिमंडल से निकाल दिया गया है और उन्हें सीबीआई मुख्यालय में ले जा कर पूछताछ जारी है।

सीबीआई की जांच के पहले दिन खुले रहस्य
हरियाणा के बड़े नामों पर नजर


डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 3 जून- सीबीआई ने दिल्ली पुलिस के सहायक आयुक्त राजबीर सिंह की हत्या का मामला आज औपचारिक रूप से अपने हाथ में लिया और फिलहाल गुड़गांव पुलिस की एफआईआर के अनुसार हत्यारे विजय भारध्दाज के खिलाफ ही जांच शुरू नही की। अब सीबीआई राजबीर सिंह के पूरे परिवार और उसके परिचित लोगों और उनके निवेशों के बारे में पड़ताल कर रही है और सिर्फ आज की तारीख में एजेंसी ने आठ बैंको में बीस खाते जांच के दायरे में ले लिए हैं।


चौबीस मार्च को दिल्ली पुलिस के एनकांउटर स्पेशलिस्ट राजबीर सिंह को गुड़गांव में गोली से उड़ा दिया गया था और प्रोपट्री डीलर विजय भारध्दाज ने ही खुद स्वीकार किया था कि उसने राजबीर सिंह को पैसे अदा ना कर पाने के कारण मारा था। सीबीआई ने बहुत हिम्मत कर के एक पत्र केबिनेट सचिवालय को भी भेज दिया है जिसके अनुसार जेड प्लस सुरक्षा वाले राजबीर सिंह के सुरक्षा कर्मियों की लापरवाही के बारे में हुई जांच की रिपोर्ट मांगी गई है। इसके अलावा हरियाणा की राजनीति और कारोबार के कई बड़े नाम सीबीआई की सूची में हैं जिनसे एक एक कर के पूछताछ की जाएगी।


गुड़गांव पुलिस दिल्ली पुलिस की मदद ले कर भी अब तक राजबीर सिंह की लेन देन वाली डायरी बरामद नही कर सकी है और सीबीआई अधिकारियों के अनुसार राजबीर सिंह के हत्या के उद्देश्य को ले कर उसकी पहली प्राथमिकता इस डायरी की बरामदगी है। इसीलिए राजबीर सिंह के परिवार और खासतौर पर उसकी बहन और पत्नी से पूछताछ की जाएगी। सीबीआई निदेशक विजय शंकर ने अपनी एजेंसी को इस मामले में चार्ज शीट दाखिल करने के लिए तीन महीने का समय दिया है। यह बात अलग है कि अगले ही महीने विजय शंकर रिटायर हो रहे हैं। राजबीर सिंह अपनी हिम्मत और मुठभेड़ो में सफलताओं के कारण सब इंस्पेक्टर से एसीपी के पद पर पहुंचे थे लेकिन संपत्तिा विवादों को ले कर उन पर कई बार गंभीर आरोप भी लग चुके थे।

सीबीआई की जांच के दायरे में दिल्ली पुलिस के कई वर्तमान और भूतपूर्व अधिकारी भी हैं और सीबीआई अधिकारियों के अनुसार राजबीर सिंह के अंडर वर्ल्ड से भी संबंध थे। अधिकारियों ने स्वीकार किया कि पहली नजर में विजय भारध्दाज कातिल तो है लेकिन इस पूरे मामले में वह अकेला नही है। जिस पिस्तौल से राजबीर की हत्या की गई वह सरकारी थी और हरियाणा पुलिस के अधिकारी अशोक शरण को आबंटित की गई थी। अशोक शरण का कहना है कि एक छापे के दौरान हिसार जिले के दादरी इलाके में 21 जुलाई 2007 को यह पिस्तौल खो गई थी। सीबीआई इस गुत्थी को सुलझाने के लिए अशोक शरण से भी नए सिरे से पूछताछ करेगी।

सीबीआई को बहुत लोगों पर शक

डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 3 जून - आरूषि-हेमराज हत्याकांड में सीबीआई चौबीस घंटे की रिमांड में भी आरूषि के पिता डॉक्टर राजेश तलवार से कुछ निकलवा नही पाई।

वैसे भी सीबीआई अब एक एक कर के इस जांच से जुड़े नोएडा पुलिस के अधिकारियों को बुलाने वाली है और उन्हें बताने वाली है कि इस जांच में उन्होंने कितनी बड़ी मूर्खताएं की हैं। सीबीआई अधिकारियों को राजेश तलवार को दो दिन की रिमांड और मिल गई है और नॉर्को टेस्ट के बारे में अभी उसे अनुमति नही मिली है।

खुद सीबीआई अधिकारी मानते हैं कि इस मामलें में राजेश तलवार एक तो मुख्य अभियुक्त नही हैं क्योंकि खुद एफआईआर उन्होंने लिखवाई थी और इसमें हेमराज को कातिल बताया गया था। तब तक हेमराज की लाश नही मिली थी। इसके अलावा आज अदालत में सीबीआई के वकील ने यह भी कहा कि राजेश तलवार से नोएडा पुलिस द्वारा की गई पूछताछ समय की बर्बादी थी और अगर घर सील कर के जांच की जाती तो पहले ही दिन मामला सुलझ जाता। नतीजा साफ था।

नोएडा के एसएसपी और तलवार को कातिल घोषित करने वाले आई जी गुरदर्शन सिंह से भी सीबीआई अब पूछताछ कर सकती है। पहले दिन की जांच में सीबीआई ने इतना पता लगा लिया है कि आरूषि से बलात्कार की कोशिश या बलात्कार नही हुआ था, उस रात घर में कम से कम तीन बाहरी लोग आए थे, हेमराज की हत्या अचानक नही बल्कि काफी गुत्थमगुत्था होने के बाद हुई थी, हेमराज नेपाली होने के बावजूद खुखरी नही रखता था इसलिए उसे हत्या का हथियार नही माना जा सकता, और आखिर में यह भी जब तक हत्या का हथियार बरामद नही हो जाता तब तक राजेश तलवार की इस कांड में भूमिका के बारे में निश्चित तौर पर कुछ नही कहा जा सकता।

सीबीआई की छह सदस्यों वाली टीम हरिद्वार भी हो आई है और वहां आरूषि के अस्थि विसर्जन करने वाले पंडो को पूरे छह घंटे तक एक स्थानीय होटल में पूछताछ के लिए बंदं रखा। मुख्य पंडे के मोबाइल रिकॉर्ड उसके बयानों को झूठ साबित करते हैं। यह झूठ इस पंडे ने खुद बोला या इसकी कीमत वसूल की, सीबीआई को यह भी पता लगाना है। पंडे ने तलवार परिवार का आने और जाने का जो समय बताया है वह गलत पाया गया है और यह भी पाया गया है कि जो समय वह अस्थि विसर्जन का बता रहा है उस समय वह अपना बिजली का बिल भरने गया हुआ था।


इस दौरान तलवार से उसकी तीन बार बात हुई और तलवार परिवार उस समय घाट पर ही मौजूद था। राजेश तलवार धीरे धीरे हत्या के आरोप के दायरे से तो दूर होता जा रहा है लेकिन उसके अटपटे बयान सीबीआई की समझ में नही आ रहे। सच जानने का तरीका सिर्फ नॉर्को टेस्ट बचता है।

Sunday, June 1, 2008


अतीत और भविष्य में जाने की तैयारी

अतीत और भविष्य में जाने की तैयारी

डेटलाइन इंडिया
कैप कार्निवाल, अमेरिका, 1 जून- अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के पास एक पूरा कार्यक्रम भी है और इसके लिए पर्याप्त पैसा भी, लेकिन एक प्रयोग को ले कर खुद अमेरिका की सरकार से उसकी ठनी हुई है। यह प्रयोग सापेक्षता के नियम को इस्तेमाल करते हुए अतीत और भविष्य में यात्रा का है।

नोबेल पुरस्कार विजेता अल्बर्ट आइंस्टीन के इस सिध्दांत कें उनसार प्रकाश की गति से चलने पर पृथ्वी के समय से बहुत आगे और बहुत पीछे जाया जा सकता है। अब तक की अंतरिक्ष उड़ानों में इस बात की पुष्टि भी हो चुकी है कि अंतरिक्ष यात्री यात्रा में छह महीने रहते हैं तो पृथ्वी पर छह साल का औसतन समय बीत जाता है। मंगल पर गए फीनिक्स को पृथ्वी के समय के हिसाब से वहां पहुंचने में छह महीने और दो दिन लगे जब कि फीनिक्स की घड़ियां बताती हैं कि यह यात्रा तिरेपन घंटे में पूरी हो गई। नासा के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि सिध्दांत के तौर पर धरती के समय की सीमा को पार करते हुए अतीत और भविष्य दोनों में जाया जा सकता है।

1981 से लगातार नासा के प्रशासक अमेरिका सरकार से यह प्रयोग करने की अनुमति चाह रहे हैं लेकिन अमेरिकी सीनेट ने इस प्रयोग की नैतिकता और परिणामों पर लंबा विचार करके रपट अपने पास रख ली है। समिति की आपत्तिायां काफी व्यवहारिक और सनसनीखेज हैं। पहली आपत्तिा तो यह है कि मनुष्य अगर भविष्य में पहुंच गया तो वह अपनी अगली कई पीढ़ियों से एड़वांस में मिल लेगा और उससे सामाजिक रचना और व्यक्ति का जीवन भी प्रभावित होगा। वह अपनी मौत भी देख लेगा और खुद को दफनाए जाते हुए भी देख लेगा। ऐसा होने पर व्यक्ति का मानसिक संतुलन बिगड़ने की पूरी संभावना है।

अमेरिकी सीनेट की कमेटी ने अतीत में जाने के बारे मे बहुत मनोरंजक उदाहरण दिया है। इसके अनुसार कोई व्यक्ति तीन पीढ़ी पीछे अतीत में पहुंचा और उसने वहां अपने दादा-दादी को जवानी की हालत में पाया। उसने किसी तरह उनकी हनीमून रोक दी, तो जाहिर है कि न उसके पिता पैदा होगें और न उसके इस संसार में आने का कोई कारण बचेगा। धारणा काल्पनिक ही है लेकिन अतीत में एक बार पहुंच कर वर्तमान हो जाने के बाद ऐसी किसी घटना से इंकार नही किया जा सकता। इसी तरह सीनेट ने यह भी एक तर्क दिया है कि आज की तारीख में अतीत में पहुंचने वाले किसी व्यक्ति का जमीन जायदाद का झगड़ा किसी से चल रहा है तो वह अतीत में जा कर उसके पूर्वजों को ही निपटा देगा और इस आधार पर आने वाली पीढ़ियां ही मिट जाएगीं।

नासा का यह सबसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रम प्रयोग के तौर पर भी इसीलिए खटाई में पड़ा है। चूहों और खरगोशों पर इस तरह के प्रयोग किए जा चुके हैं और वे सफल भी हुए हैं। एक खरगोशों के जोड़े को अंतरिक्ष में भेजा गया और तीन महीने बाद जब यह जोड़ा लौटा तो उसकी पीढ़ी के खरगोश बूढ़े हो कर मर भी चुके थे और उनकी तीसरी पीढ़ी चल रही थी। यह बहुत कुछ ऐसा ही है कि आप आज अंतरिक्ष में जाए, दो साल बाद लौटें तो अपने सारे दोस्तों की तस्वीरों पर माला चढ़ी देखें और शाम को जब टहलने निकले तो उन दोस्तों के बेटे या पोते पार्क में छड़ी ले कर टहलते हुए नजर आएं। सीनेट ने ईसाई धर्म का हवाला देते हुए इसे प्रकृति और ईश्वर के सिध्दांत के साथ अन्याय बताया है।

अभिषेक वर्मा ब्लैकमेल पर उतरा


डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 1 जून- नेवी वॉर रूम मामले में जमानत पर छूटे अभिषेक वर्मा ने कल पूरी रात अपने खास दोस्तों के साथ दक्षिण दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में पार्टी की। भुगतान उन्होंने अपने क्रेडिट कार्ड से किया। लगभग दो लाख रुपए का यह भुगतान होटल को तो मिल गया मगर सवाल अब भी बाकी बचा है कि लगभग चार साल तिहाड़ जेल में रहने के बाद भी उनका कार्ड चालू कैसे था और इसका इस्तेमाल और भुगतान कौन कर रहा था।

अभिषेक के अपने सारे ज्ञात बैंक खाते तो सील हैं। इसी पार्टी में अभिषेक ने जो बड़े बड़े बयान दिए वे बहुत गंभीर हैं। इन बयानों से जाहिर है कि वे कांग्रेस के बड़े नेताओं और यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी तक को ब्लैकमेल करना चाहते हैं। ब्लैकमेल का उपकरण र्स्कोपियन पनडुब्बी सौदे में दलाली का मामला है और अभिषेक वर्मा इतना भी बोल पा रहा है तो इसकी वजह यह है कि केन्द्रीय जांच ब्यूरो - सीबीआई ने आपस में जुड़े नेवी वॉर रूम लीक और इस सौदे की दलाली के मामले में अदालत के बार बार कहने और समय सीमा तय करने बावजूद अब तक अपनी अंतिम रपट नही दी है। सीबीआई के अधिकारी इस संबंध में यह भी नही बता पाए हैं कि नेवी वॉर रूम लीक और पनडुब्बी सौदे में आपस में सीधे क्या संबंध है। सीबीआई ने इस मामलें में अब तक कई जांच अधिकारी बदले हैं, अदालत में सरकारी वकील बार बार बदले गए हैं और जो सीबीआई अभी दो महीने पहले तक यह कह रही थी कि अभिषेक वर्मा को जिंदगी भर जेल में रखने के लिए उसके पास पर्याप्त प्रमाण हैं, उसी ने अब अदालत को कहा है कि उसके पास सूचनाएं तो हैं लेकिन इनके बारे में प्रमाण मिलना बाकी है।

अभिषेक वर्मा की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि उसने सीधे श्रीमती सोनिया गांधी से मिलने के लिए भी समय मांगा है। यह समय उसे मिलेगा या नही इस बारे में कांग्रेस नेता एकदम खामोश हैं और अभिषेक वर्मा की माँ रीता वर्मा असली धर्म संकट में हैं क्योंकि वे अब भी कांग्रेस की सदस्य हैं और भूतपूर्व सांसद होने के नाते अब भी संगठन की कई समितियों में हैं। अभिषेक वर्मा ने आज असली मुसीबत में कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोती लाल वोरा को डाला। अभिषेक उनके बंगले पर पहुंचे और अंकल कह कर बाकायदा उनके पांव छुए।

श्री वोरा को और कुछ नही सूझा तो उन्होंने एक फोन करने के बहाने बंगले के भीतर जाने में ही खैरियत समझी। हालांकि उनका सचिव मोबाइल और कॉर्डलैस फोन ले कर साथ में ही खड़ा हुआ था। अभिषेक भाजपा के नेताओं से भी मिलना चाहते हैं और उन्होंने एक साझा मित्र के जरिए भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी से भी समय मांगा है। जाहिर है कि जेल से निकले अभिषेक वर्मा अपनी इस आजादी को अपनी अदालती मुक्ति के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं। लेकिन श्रीमती सोनिया गांधी और दूसरे कांग्रेसी नेताओं को ब्लैकमेल कर के वे कुछ कर पाएंगे इसकी संभावना बहुत कम दिखती है। उन्होंने तीस लाख रुपए जमानत के तौर पर कहां से जमा करवाए इसकी भी जांच की जा रही है।

अमरिंदर और उनकी आरूसा


अमरिंदर और उनकी आरूसा
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 1 जून - प्रकाश सिंह बादल की सीआईडी ने पिछले मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की हसीन प्रेमिका या मित्र अरूसा आलम के बारे में पड़ताल करके पूरी जानकारी गृह मंत्रालय को भेज दी है और मांग की है कि गुप्तचर ब्यूरो से भी पड़ताल करवा के अमरिंदर सिंह के खिलाफ देशद्रोह और आफीशियल सीक्रेट एक्ट के तहत मुकदमा कायम किया जाए। इन दोनों अपराधों में फांसी से ले कर उम्र कैद तक की सजा है।

अभी तक जमा की गई जानकारी के अनुसार पहले पाकिस्तान के सैनिक शासक याह्या खान और फिर कुछ समय जुलफिकार अली भूट्टो की अंतरंग मित्र रही और अपने प्रभाव के कारण रानी जनरल के नाम से कुख्यात माँ की बेटी अरूसा आलम के आईएसआई से सीधे संपर्को के सबूत मिले हैं और भारत के एक निर्वाचित राजनेता का उसके साथ अंतरंगता बढ़ाना संदेह का विषय है। सीआईडी रिपोर्ट में विदेश सचिव श्री शिव शंकर मेनन का भी नाम है जिनकी अरूसा से दोस्ती तब हुई थी जब मेनन पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त थे और उन्हीं के कहने पर अरूसा आलम को भारत में असीमित प्रवेश वाला वीजा मिला था। यह विशेषाधिकार भारत सरकार ने आज तक किसी दूसरे पाकिस्तान पत्रकार को नही दिया है। हाल ही में सरबजीत सिंह को छुड़ाने में लगे पाकिस्तान के भूतपूर्व मंत्री अजीज बर्नी को दिल्ली हवाई अव्े से ही वापस लौटा दिया गया था। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार बावन साल की हो चुकी अरूसा अब भी काफी हसीन दिखती हैं और रसिया पटियाला नरेश हाल ही में हिमाचल की वादियों में उनके साथ हनीमून की मुद्रा में घूम कर आए हैं।

अरूसा आलम पेशे से पत्रकार हैं और उन्हें राजनयिक और जासूसी मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है। परवेज मुशर्रफ के सबसे करीबी लोगों में उनकी गिनती है और मुशर्रफ जब भी किसी विदेश यात्रा पर गए तो यह देवी जी जरूर साथ गई। जब श्री मुशर्रफ पिछली भारत यात्रा पर आए थे तब भी अरूसा उनके साथ आए पत्रकारों के दल में थी और यह संयोग नही हो सकता कि बाकी पत्रकारों से अलग, ताज होटल के पास पंजाब सरकार के महल कपूरथला हाउस जिसे अब अतिथि गृह बना दिया गया है, में ठहरीं और इस दौरान राजा अमरिंदर सिंह भी दिल्ली में ही रहे। अमरिंदर सिंह की पत्नी रानी परणीत कौर लोक सभा की सदस्य हैं और वे अपने पति के इस बुढ़ापे के प्रेम की शिकायत कई बड़े कांग्रेसी नेताओं से कर चुकी हैं जिनमें अब कांग्रेस से बाहर कर दिए गए अमरिंदर सिंह के बहनोई और भूतपूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह भी हैं। अरूसा ने कॉलेज से निकतते ही इस्लामाबाद के पहले अंग्रेजी अखबार डेली मुस्लिम में रक्षा संवाददाता के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था। उन्हें सीधे रक्षा और राजनयिक संवाददाता बना दिया गया। इस दौरान आईएसआई के कई बड़े अधिकारियों के संपर्क में आईं और उस समय उन्हें भारत विराधी कामों के लिए जाना जाता था। इसके अलावा उन्होंने एक मीडिया एनजीओ भी बनाया जिसे सीधे सीधे आईएसआई से मदद मिलने की खबर आम हैं।

फिलहाल रावलपिंडी-इस्लामाबाद प्रैस क्लब की उपाध्यक्ष अरूसा पाकिस्तान ऑबजर्वर में काम करती हैं जिसके मालिक जाहिद मलिक पाकिस्तान के एटम बम के संस्थापक और फिलहाल एटमी रहस्यों की तस्करी के आरोप में घर में नजरबंद है। अरूसा ने एक ब्रिटिश राजनयिक गार्डन हाईलेंडर के पाकिस्तानी औरताें के साथ संबंध उजागर किए थे और यह करने के लिए वे उनके बेडरूम में भी चली गईं थीं। वह भी तब जब वे अपनी हनीमून से लौटीं ही थीं। दो बच्चों की माँ अरूसा मशहूर गायक अदनान सामी की मौसेरी बहन हैं और उन्होंने अपने बेटे को भी एक पॉप बैंड बनाने में अदनान सामी की मदद की है। पाकिस्तान अखबारों के अनुसार वहां के राजनेता भी अमरिंदर और अरूसा के रिश्तों को ले कर चिंतित हैं और हाल ही में अरूसा ने रावलपिंडी में एक कोठी खरीदी है जिसका दाम पाकिस्तानी मुद्रा में सात करोड़ रुपए बताया जाता है। सीआईडी का आरोप है कि यह रकम श्री अमरिंदर सिंह ने अपनी खूबसुरत मित्र को भेंट की थी।

अमरिंदर सिंह पर आरोप सिर्फ सीआईडी ही नही लगा रही बल्कि अकाली दल के ही एक संगठन के नेता और भूतपूर्व आईपीएस अधिकारी सिमरनजीत सिंह मान ने भी यही आरोप अमरिंदर सिंह पर लगाए हैं। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि आरूसा को कश्मीर में भी घूमने का खास इंतजाम अमरिंदर सिंह ने ही करवाया और गुलाम नबी आजाद ने उनकी इस काम में पूरी मदद की। जहां तक आरूसा का सवाल है तो वे इन दिनों पेरिस में एक फैशन शो में हिस्सा लेने गई हैं।

Saturday, May 31, 2008


एक कलंकित कांग्रेसी अभिषेक




आलोक तोमर

पैंतीस साल की उम्र में अरबपति बन कर लंदन में घर खरीदने और पिकनिक के लिए पानी का जहाज, दिल्ली और लंदन में रहने के लिए कोठियां रखने वाले छत्ताीसगढ़ के बिलासपुर के एक परिवार के लड़के अभिषेक वर्मा को आज तिहाड़ जेल से मुक्ति मिल गई। सांसद पिता श्रीकांत वर्मा और सांसद मांँ रीता वर्मा के बेटे अभिषेक पर पनडुब्बी घोटाले में दलाली करने और नौ सेना के रहस्य खरीद कर बेचने वाले नेवी वार रूम लीक मामले में मुख्य अभियुक्त होने का आरोप है और उसके जमानत पर रिहा होने का मतलब कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की आफत आ जाना है।

इन नेताओं में सबसे पहली कतार में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और छत्ताीसगढ़ के कांग्रेसी नेता और कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोती लाल वोरा के अलावा श्रीमती सोनिया गांधी के सचिव विन्सेंट जॉर्ज के भी नाम हैं। इस तथाकथित घोटाले की जांच सीबीआई कर रही है और इसके सिलसिले में नौ सेना के एडमिरल से ले कर सेना के कर्नल तक स्तर के अधिकारी अब भी बगैर सुनवाई के तिहाड़ जेल में बंद हैं। यह मामला फ्रांँस की एक कंपनी का है जिसमें भारत की नौ सेना को स्कोर्पियन नाम की पनडुब्बियां बेचने का सौदा किया था और इस सौदे के खिलाफ नौ सेना अधिकारी, रक्षा मुख्यालय और खुद प्रणब मुखर्जी बताए जाते थे लेकिन इस सौदे में लगभग सात सौ करोड़ रुपए की सिर्फ दलाली शामिल है।

जाहिर है कि आकार और रकम के मामले में यह सौदा बोफोर्स का भी बाप है। अभिषेक वर्मा जवान होने के पहले ही करामाती हो गए थे और सबसे पहले उनका नाम तब उछला था जब उन्होंने करोल बाग दिल्ली के एक ज्वेलर सुभाष चंद्र बड़जात्या को इनकम टैक्स अधिकारी अशोक अग्रवाल के साथ मिल कर करोड़ों रुपए का चुना लगाया था। इस मामले में लाभ पाने वालों में विन्सेंट जॉर्ज का नाम आने के बाद मामला दब गया था और सिर्फ अशोक अग्रवाल को नौकरी से हाथ धोना पड़ा और जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा।

यह सीबीआई ने सच पाया है कि दलाली ली गई थी और इस भुगतान की कहानी बड़ी मनोरंजक है। अक्टूबर 2005 में तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी ने फ्राँस की थेल्स कंपनी से पनडुब्बियों का करार किया और अगले ही दिन थेल्स चेरिटेबल ट्रस्ट 2, डेशवुड लांग रोड, हडलिस्टन, सरे, इंग्लैंड में पांच करोड़ डॉलर दो किस्तों में स्विटजरलैंड की यूबीएस बैंक ज्यूरिक के खाता नंबर 0026324 से एलजीटी बैंक बडूज, लिंकेस्टिन में जमा करवा दिए। सीबीआई के पास इस बात का रिकॉर्ड है कि इसके तुंरत बाद अभिषेक वर्मा लिंकेस्टिन गया और वहां से इस एकाउंट से सारे पैसे निकाल कर वापस अपने स्विस बैंक एकाउंट में रख दिए। सौदा पूरा हुआ।

कांग्रेस को असली चिंता हो सकती है तो अभिषेक वर्मा की रिकॉर्ड की हुई बातचीत और उसके ई मेल रिकॉर्ड से हो सकती है। आखिर जब स्कोर्पियन बनाने वाली थेल्स कंपनी के प्रेसिडेंट भारत में थे तो अभिषेक वर्मा ने इस सौदे से संबंधित कई लोगों को ई मेल लिखी और एक ई मेल में साफ लिखा है कि थेल्य के प्रेसिडेंट सीधे सोनिया गांधी से मिलना चाहते हैं लेकिन जो भी सौदा होगा वह कांग्रेस की ओर से मैं करूगां और मैं ही संबंधित महिला यानी श्रीमती सोनिया गांधी को पैसा पहुंचाऊगां। इसी दौरान अभिषेक ने अपने पिता के दोस्त और कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोती लाल वोरा से 28 मई 2005 को फोन पर दिन के एक बज कर तैंतीस मिनट से एक बज कर चालीस मिनट तक यानी पूरे सात मिनट बात की और यह बातचीत सीबीआई के रिकॉर्ड में है। कांग्रेस का खजांची अगर हथियारों के किसी दलाल से सात मिनट तक बात करता है तो वह कम से कम हनुमान चालीसा तो नही पढ़ रहा होगा। इस घोटाले में नौ सेना अध्यक्ष अरुण प्रकाश के भतीजे रवि शंकरन भी शामिल हैं और सीबीआई ने उसके खिलाफ इंटरपोल से वांरट निकलवा लिया है।

यह न समझ में आने वाली बात है कि शंकरन का लंदन का पता सीबीआई और इंटरपोल के पास है और उसे दो बार पूछताछ के लिए लंदन में बुलाया जा चुका है लेकिन अब तक भारत नही लाया जा सका। अभिषेक की ई मेल में उसकी तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी से कई बहुत 'संतोषजनक और फलदायी' बातचीत का भी वर्णन है। यह फल किसके लिए है और किसको मिला यह तो पता नही मगर जेल अभिषेक वर्मा ही गए। श्रीमती सोनिया गांधी की दिक्कत वही है जो उनके पति राजीव गांधी की थी। दोनों बहुत भले लोग कहे जा सकते हैं लेकिन अपने को बचाने और उनकी मदद करने के चक्कर में वे अक्सर मुसीबत में फंसत रहे हैं। बोफोर्स और एचडीडल्यू पनडुब्बी कांड की विस्तार से जांच करने वाले महेश दत्ता शर्मा और इसे अदालत में ले जाने वाले अरुण जेटली से भी पूछिए तो वे भी कहते हैं कि बेचारे राजीव गांधी को तो पता ही नही था कि बोफोर्स में हो क्या रहा है।

वित्त मंत्री के नाते विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस सौदे पर आपत्तिा की थी और बाद में जब रक्षा मंत्री बने तो खुद ही इस सौदे को मंजूरी दी थी। उनके पहले रक्षा मंत्री रहे कृष्ण चंद पंत आज भाजपा में हैं लेकिन जब वे कांग्रेस में थे तब भी इस बात पर स्तब्ध रहते थे कि वी पी सिंह उन्हें उत्तार प्रदेश वापस भेजने पर क्यों तुले हुए थे। प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह पर भी इस मामले की आंच आनी स्वाभाविक है और यह तब है जब कोई भी जांच के नतीजे आने के पहले ही कसम खा कर कह सकता है कि मनमोहन सिंह ने इस पूरे कर्मकंाड में एक धेला भी नही खाया। लेकिन जो मनमोहन सिंह खुद इस सौदे के खिलाफ थे वे अचानक इसे मंजूरी क्यों दे बैठे, इस सवाल का जवाब तो उन्हें ही देना पड़ेगा। उनके मंत्रिमंडल से वोलकर रपट के बाद बाहर हो चुके विदेश मंत्री नटवर सिंह भी कहते हैं कि मनमोहन सिंह या सोनिया गांधी ने उनके काम में कभी हस्तक्षेप नही किया। अभिषेक वर्मा का पासपोर्ट जब्त कर लिया गया है।

हर महीने दूसरे और चौथे सोमवार को उसे अदालत में हाजिर हो कर भारत में ही होने का प्रमाण भी देना पड़ेगा। किसी भी बहाने और किसी भी तरह कोई विदेश यात्रा वह नही कर सकेगा। तीस लाख रुपए का जूर्माना उस पर लगाया गया है और उसके सारे बैकों के सारे ज्ञात खाते सील कर दिए गए हैं। इस मामले में वर्तमान रक्षा मंत्री ए के एंटनी की भी जवाबदेही बनती है और इस जवाबदेही के साथ उन्हें प्रणब मुखर्जी के जमाने की फाइलों पर भी शोध करनी पड़ेगी। रही बात सीबाआई की तो वह मोती लाल वोरा और प्रणब मुखर्जी को बुला कर पूछे तो कि फोन पर क्या बात हुई थी और संतोषजनक और फलदायी चर्चाए क्या क्या हुई थीं।

Monday, May 19, 2008


इंटरनेट पर चली पतित राजनीति



राहुल गांधी पर घिनौने आरोप

आलोक तोमर
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 19 मई-अमेरिका की एक अरबपति इंटरनेट कंपनी ने पूरी दुनिया में यह कुप्रचार फैलाया हुआ है कि कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और उनके दोस्तों ने अमेठी में लगभग ढाई साल पहले एक युवती से सामूहिक बलात्कार किया था। पता नहीं किन कारणों से इस इंटरनेट कंपनी की वेबसाइट को न भारत में प्रतिबंधित किया गया और न इसके खिलाफ कोई सख्त कानूनी कार्रवाई की गई। यू टयूब नाम की यह कंपनी अमेरिका में रजिस्टर्ड है और कुछ ही समय पहले गूगल्स ने बहुत मोटी रकम दे कर इसे खरीदा है। निशुल्क वीडियो दिखाने और किसी के भी वीडियो अपनी साईट पर होस्ट करने वाली इस कंपनी के संस्थापकों में जावेद मीर नाम का एक बांग्लादेशी भी है जो 1992 में अपने देश से भाग कर अमेरिका चला गया था। यू टयूब पर मौजूद वीडियो में छह वीडियो मौजूद हैं जिनमें आरोप लगाया गया है कि भारत बलात्कारियों का देश है और राहुल गांधी ने 3 दिसंबर 2006 को संयुक्ता नाम की एक युवती के साथ अपने कुछ विदेशी दोस्तों के साथ मिल कर शराब पिला कर बलात्कार किया और चुप रहने के लिए 50 हजार रुपए देने की पेशकश भी की। संयुक्ता के पिता का नाम बलराम सिंह और मां का नाम सुमित्रा देवी बताया गया है और वेबसाइट पर भारतीय कानून के खिलाफ बलात्कार की कथित शिकार महिला की तस्वीर भी प्रकाशित की गई। विचित्र बात यह है कि वेबसाइट में चश्मदीद गवाहों के तौर पर कुछ लोगों के बयान भी दिखाए गए हैं लेकिन उनके चेहरे नहीं दिखाए गए। इरादों का खतरनाक होना इसी बात से जाहिर है कि वेबसाइट ने किसी भी तथाकथित प्रत्यक्षदर्शी का नाम तक नहीं जाहिर किया। यह झूठी सूचनाएं वेबसाइट पर प्रकाशित करते वक्त बहुत जोर शोर से राहुल गांधी को देश का भावी प्रधानमंत्री भी घोषित किया गया है जिससे अपने आप जाहिर हो जाता है कि यह षडयंत्र उनके राजनैतिक दुश्मनों का है। कांग्रेस ने अपनी ओर से एक और वेबसाइट जिस पर यह सामग्री उपलब्ध थी, को कानूनी नोटिस भेज कर काम चला लिया है। यह दूसरी वेबसाइट थी अमेरिका में रजिस्टर्ड है और नोटिस भेजने वाले प्रसिध्द वकील और कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघ्वी के नीति मार्ग स्थित कार्यालय से सिर्फ यह जवाब मिला कि श्री सिंघ्वी लंदन में हैं और उनके जिस सहयोगी जॉय बोस ने नोटिस भेजा था वे उपलब्ध नहीं है। कमाल की बात यह है कि एक विदेशी वेबसाइट भारत के एक होनहार सांसद के चरित्र पर कीचड उछालती है और उसके खिलाफ भारत में एफआईआर भी दर्ज नहीं की जाती। यू टयूब से वीडियो उठा कर प्रकाशित करने वाली वेबसाइट को नोटिस भेजा जाता है और मूल वेबसाइट भारत में धडल्ले से चलती रहती है। यू टयूब अपनी इन हरकतों की वजह से कई देशों में प्रतिबंधित कर दी गई है और इस पर भारतीय फिल्मों तथा अश्लील दृश्यों की भरमार है। अभिषेक मनु सिंघ्वी भारत के अतिरिक्त महाधिवक्ता रह चुके हैं और संयोग से शासन करने वाली पार्टी के प्रवक्ता है लेकिन अपनी ही पार्टी के नेता राहुल गांधी के अपमान के खिलाफ उन्होंने कोई ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं की। वेबसाइट के अनुसार यह लडकी इसका परिवार और वीडियो रिकॉर्ड करने वाले पत्रकार सभी लापता हैं और शायद उनकी हत्या कर दी गई है। यह अलग बात है कि देश के किसी भी थाने में इस बारे में कोई रपट दर्ज नहीं है। मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग दोनों में भी शिकायत की गई बताई गई है लेकिन इस शिकायत का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

Sunday, May 18, 2008


उत्तराखंड में भी है एक कारगिल



आलोक तोमर
डेटलाइन इंडिया
गमशाली;भारत चीन सीमा;,18 मई- तिब्बत की आजादी और वहां चीनी दमन पूरी दूनिया की खबरो मेंं है लेकिन गमशाली और उसी के जैसे आस पास के सैकड़ो गावों की कहानी, उनकी दहशत और उनकी गुमनामी कभी खबर नहीं बनती। इन गांवों की सुरक्षा चीन के प्रकोप से भारत तिब्बत सीमा पुलिस करती है लेकिन सच यह है कि इन गावों के लोगों की भूमिका भी भारतीय सैनिकों से कम नहीं है। भोटिया जनजाति के लोगों की बहुलता वाले इन गावों के निवासिंयों के लिए चीनी सेनाओं की उपस्थिति भी उनकी जिन्दगी की तरह एक पूरा सच है। ये लोग साहस न दिखाएं तो चीन से बड़ी संख्या में घुसपैठ बड़े पैमाने पर हो सकती है और वही कहानी दोहराई जा सकती है जो लद्दाख इलाके के कारगिल में लगभग आठ साल पहले घटित हुई थी। अब लेकिन इन लोगों का साहस भी जवाब देने लगा है। वे भारत के नागरिक हैं और तेजी से विकसित हो रहे उत्तराखण्ड राज्य के हिस्से हैं। मगर जैसा कारगिल,द्रास,बटालिक और आसपास की सीमावर्ती बस्तियों में नही हो पा रहा वैसे ही विकास का कोई हिस्सा देश की सुरक्षा के लिए जरूरी इन उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों तक नहीं पहुंच पा रहा है। स्कूल एक इस गांव में भी है लेकिन सिर्फ कक्षा पांच तक। अस्पताल के नाम पर बीस पहाड़ी किलोमीटरों का दुर्गम सफर करके मलारी कस्बे तक जाना पड़ता है और वहां का अस्पताल भी कोई पूरी सुविधाओं से लैस नहीं है। बीमारियां या दुर्घटनाएं यहा मृत्यु का परिणाम बन कर आती हैं, जीवन की जरूरी सुविधाएं हैं नहीं, बर्फ साल में सिर्फ एक फसल होने देती है और इसी लिए अघोषित अकाल इलाके का चिर सत्य बन गया है। नतीजा स्वाभाविक तौर पर वही है जो हो सकता था। ज्यादातर गांवों के लोग अपने घर-आंगनों को वीरान छोड़ कर मैदानी इलाकों में बसने लगे हैं और उत्तराखण्ड की चीन सीमा भारत के लिए लगातार ज्यादा असुरक्षित होती जा रही है। राज्य सरकार को इन लोगों के अस्तित्व की कोई चिंता नही है। आंखे शायद तब खुलेंगी जब चीन खामोशी से भारत के एक और बड़े हिस्से पर कब्जा कर लेगा और फिर देहरादून के बस में तो कुछ रहेगा नहीं, दिल्ली से भी राजनयिक किस्म के बयान आते रहेंगे जिनका गमशाली और उसके आसपास के मासूम लोगों के लिए एक निर्वासन के अलावा र्कोई महत्व नहीं होगा। ं

Friday, May 9, 2008


बच्चन जी का सच्चा स्मारक




आलोक तोमर

अमिताभ बच्चन ने अपने बाबू जी, हरिवंश राय बच्चन का स्मारक बनाने की घोषणा की है। कायदे से यह घोषणा देश में हिंदी के विकास के लिए काम कर रही दर्जनों संस्थाओं में से किसी को करनी चाहिए थी। उनके पास करोड़ो का बजट है जो ज्यादातर फूहड़ अनुवादों और बैठकों के यात्रा भत्ताों में खर्च होता है। आखिर कवि बच्चन का बेटा होने का सौभाग्य तो अमिताभ को ही मिला है लेकिन अगर आधुनिक हिंदी कविता की बात की जाए तो बच्चन रिश्ते में पूरी समकालीन हिंदी कविता के बाप लगते हैं। एक पूरी पीढ़ी है जिसने गोदान और मधुशाला पढ़ने के लिए बाकायदा हिंदी सीखी। आज कवि सम्मेलन बहुत बड़ा बाजार बन गए हैं लेकिन कवि बच्चन ने ही कवि सम्मेलनों में पारिश्रमिक लेने की परम्परा शुरू की थी।

मेरी विनम्र राय में कवि बच्चन का सबसे बड़ा स्मारक देश भर में बिखरा हुआ है और उसे संजोने की जरूरत है। यह स्मारक है बच्चन जी ध्दारा लिखे गए हजारों पत्र जो पूरे देश के शहरों और कस्बों में लोगों की फाइलों में लगे हुए हैं। बच्चन जी उन्हें लिखे गए हर पत्र का जवाब देते थे। गरीबी में थे तो पोस्ट कार्ड पर देते थे और जब चार पैसे जुड़ गए तो लैटर पैड पर बहुत कलात्मक लिखावट में संक्षिप्त ही सही, जवाब आते जरूर थे।

बात तब की है जब मैं चम्बल घाटी के एक छोटे से कस्बे भिंड में रहता था। बच्चन जी की आत्मकथा का पहला हिस्सा- क्या भूलूं, क्या याद करूं, प्रकाशित हो चुका था और अपने मन में भी कवि बनने की इच्छा जाग गई थी। तुकबंदियां करने लगा था और हिम्मत देखिए कि सीधे बच्चन जी को उनके प्रतीक्षा वाले पते पर भेजने लगा था। जवाब हर बार आता था और हमेशा शाबाशी का नही होता था फिर भी एक ध्वनि जरूर होती थी कि चलो कोई तो कविता लिख रहा है।

इस बीच लगा कि इलाहाबाद, जो साहित्य राजधानी थी, गए बगैर अपन साहित्यकार नही बन पाएंगें। सोलह साल की उम्र में वहां रहने वाली अपनी मौसी के घर जा कर बस गया। साईकिल चलाना सीखा, बच्चन जी ने जिन जगहों का वर्णन किया था जैसे कटघर, मुट्ठीगंज, सिविल लाइंस, एलफ्रेड पार्क की लाईब्रेरी- सब घुम डाली। नवाब यूसूफ रोड पर इलाचंद्र जोशी से मिला, लुकरगंज में महादेवी वर्मा के दर्शन किए, खुसरोबाग की सड़क पर नरेश मेहता के घर गया और उनके साहित्य पर तो निहाल था ही, उनकी बेटी पर भी मुग्ध हो गया।

इसी सड़क पर आगे उपेन्द्र नाथ अश्क एक बड़े सरकारी बंगले पर कब्जा किए बैठे थे। उनका उपन्यास निमिषा उन दिनों साप्ताहिक हिन्दुस्तान में धारावाहिक छप रहा था और मेरे जैसे किशोर को वे टॉलस्टाय नजर आने लगे थे। उन्होनें दर्शन दिए, नीबू पानी पिलाया और मेरे जैसे बच्चे से रहस्योद्धाटन करने के अंदाज में कहा कि अमिताभ बच्चन असम में इलाहाबाद विश्वविघालय के कुलपति रह चुके झा साहब के बेटे हैं। सबूत के तौर पर उन्होनें कहा कि बच्चन जी कितने छोटे कद के हैं और अमिताभ का कद कितना लंबा है। यही इस बात का सबूत है। इतने बड़े आदमी से इतनी छोटी बात सुन कर दिल को चोट लगी लेकिन वे जैसे भी थे अपने लिए उस समय गुनाहों के देवता थे इसलिए थके कदमों से साईकिल उठाई और वापस आ गया।

भिंड लौट कर बच्चन जी को एक पत्र में, जो शायद चार पेज का होगा, अश्क जी की बेहयाई के बारे में विस्तार से लिखा। आज्ञा भी मांगी कि अगर बच्चन जी कहें तो अपनी चंबल घाटी की शैली में अश्क जी को उनके खुसरो बाग में ठोक कर चला आऊं। तब तक इलाके की परम्परा के अनुसार देसी पिस्तौल चलाना सीख लिया था। पत्र का जवाब पंद्रह दिन बाद आया और वह भी पांच लाईन का। पहले आर्शीवाद अंत में शुभकामनाएं और बीच में सिर्फ यह कि मैनें लोगों का और उनके काम का आदर सीखा है और मुझे नही लगता कि मुझे अपनी आत्मा के अलावा और किसी को जवाब देना है। अश्क जी का तो उन्होनें कहीं नाम ही नही लिया। इसके बाद भी मैं कविताएं भेजता रहा, जवाब आते रहे। मधुशाला का सम्मोहन इतना था कि साथ पढ़ने वाली माधवी नाम की एक लड़की से एक तरफा प्रेम हो गया तो उसकी शान में, मधुशाला के छंद में ही, चौंसठ पन्ने की कॉपी में मधुबाला नाम की कृति लिख कर भेज दी। इस बार दो लाईन का जवाब आया। पहली लाईन थी कि तुम्हारी भाषा और छंद की समझ बढ़ती जा रही है और दूसरी लाईन में लिखा था कि हमेशा मौलिकता की ओर बढ़ो, नकल और अनुसरण की कोई मंजिल नही होती। फिर पत्रकार बना तो शीर्षकों ने कविता को पीछे धकेल दिया मगर मन का कवि मरने को तैयार नही था। उस जमाने की बम्बई में जनसत्ताा में नौकरी करने गया तो पहली कोशिश बच्चन जी से मिलने की थी जो अन्नू कपूर ने जया जी से कह कर पूरी करवाई। अब सारी कहानी कहने चला हूं तो यह भी बता दूं कि चौदह साल की उम्र में फिल्म गुव्ी देखी थी, जया जी पर फ़िदा हो गया था और दिल्ली से रैपीडेक्स का हिंदी बांग्ला कोर्स मंगा कर बांग्ला सीखनी शुरू कर दी थी। इस कहानी का अंत यही हुआ कि आखिरकार मैनें जया जी की तरह ही सुंदर एक बंगाली लड़की से शादी की और अब हमारी सोलह साल की एक बेटी है जिसे मैं बच्चन जी के बारे में सुनाया करता हूं। वह अभिषेक की फैन है और हम अमिताभ के लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है। यह पूरी कहानी इसलिए लिखी कि अमिताभ बच्चन अगर एक अपील कर दें तो पूरे देश से बच्चन जी की चिट्ठियों का अंबार निकल आएगा और वह उनका सच्चा स्मारक होगा।

कवियों, साहित्यकारों, आलोचकों, राजनेताओं और प्रसिध्द मित्रों को लिखे गए बच्चन जी के पत्र इधर-उधर प्रकाशित हुए हैं लेकिन जिन लोगों की असली पूंजी खुद गुमनाम होते हुए भी इतने बड़े साहित्यकार और उससे भी बड़े इंसान के एक दो या ज्यादा पत्र हैं, वे ही बच्चन जी का असली स्मारक हैं। कायदे से इंटरनेट की दुनिया में इनका अभिलेखागार बनना चाहिए और लोगों को प्रेरणा मिलनी चाहिए कि कितनी भी लंबी ई मेल एक छोटे से पोस्ट कार्ड की जगह नही ले सकती।

बच्चन जी का सच्चा स्मारक



Thursday, May 8, 2008


एक संसदीय षडयंत्र की कहानी



एक संसदीय षडयंत्र की कहानी
आलोक तोमर
अगर आप इसे पढ पा रहे हैं तो आप भाग्यशाली हैं क्योंकि आप तमाम सामाजिक भव बाधाओं के बावजूद स्कूल जा पाए और साक्षर बन पाए। लेख चूंकि हिंदी में है इसलिए इसे पढने वाले समाज के प्रभु वर्ग से नही आते और जो कुछ लोग भाग्यशाली हैं वे अंग्रेजी भी पढ लेते हैं। उनके लिए दुनिया थोडी ज्यादा आसान है। फिर भी दुनिया तो दुनिया है और यहां हर मामले में विरोधाभास चलते रहते हैं।
अब जैसे बहुत बैंड बाजे के साथ देश की शिक्षा के मसीहा अर्जुन सिंह और सौभाग्य से दुनिया के कई विश्वविघालयों में पढ़े प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ऐलान किया था कि भारत के संविधान में शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने के लिए बजट सत्र में ही विधेयक पेश कर के कानून बना दिया जाएगा। सत्र खत्म भी हो गया और तीन साल से लोकसभा के सचिवालय में पडा यह विधेयक, विधेयक ही रह गया। कानून नही बन पाया। दूसरे शब्दों में आज भी दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र में निरक्षर रहना कानूनी हैं और तकनीकी तौर पर सरकार की कोई जिम्मेदारी नही बनती कि हमारे आपके बच्चे र्व।ामाला भी सीख पाएं। सरकार में जो लोग बैठे हैं वे बहुत आसानी से और अपनी सुविधा से शिक्षा और साक्षरता का भेद मिटा देना चाहते हैं। शिक्षा हर तरह से मिल सकती है, गांव का किसान फसल च और मौसम के परि।ाामों के बारे में अच्छी तरह शिक्षित होता है लेकिन भारतीय खाध निगम के गोदामों और गन्ना मिलों के खरीद काउंटरो पर उसके साथ जो राजपत्रित बेईमानी की जाती है उससे सुलझने का उसके पास कोई उपाय नही है। उसे नही मालूम कि दो और दो चार ही होते हैं। एनडीए सरकार ने भी छ: से चौदह साल के बच्चों की पढाई को अनिवार्य बनाने के लिए एक विधेयक पास किया था। इस सरकार के ज्यादातर समर्थक और नेता या तो सेठ साहुकार हैं, या रिटायर्ड अफसर हैं या साधू संत हैं। जैसे संतो को कहावत के अनुसार सीकरी से कोई काम नही होता वैसे ही एनडीए सरकार ने यह नही सोचा कि सिर्फ कानून बनाने से तस्वीर बदल नही जाती।
गांव में और शहरों में भी बच्चे चलने लायक होते हैं तो खेतों में खर पतवार बीनने से लेकर शहरों में कूडा उठाने में लग जाते हैं। जिन्हें पाठशालाओं में होना चाहिए वे परिवार का संसाधन बन जाते हैं। वैसे भी अपने देश के शिक्षा मंत्रालय को फिरंगी तर्ज पर राजीव गांधी के जमाने में मानव संसाधन विकास मंत्रालय नाम दे दिया गया था। इस नाम का तात्विक अर्थ यही है कि अपन जो लोग हैं वे सब प्रतिष्ठान के संसाधन हैं और भारत सरकार हमारा विकास करना चाहती है। इस पु।य कामना के लिए हमें उन लोगों का कृतज्ञ होना चाहिए जो हमारे ही वोटों से जीत कर हमारे भाग्य विधाता बन जाते हैं। जहां तक मेरा सवाल है तो मैं अपने देश को उस समय सर्म्पू।ा लोकतंत्र मानने पर राजी होऊंगा जब वोटिंग मशीनों से चुनाव चिन्ह गायब कर दिए जाएगें। चुनाव चिन्ह का मतलब ही यह है कि निरक्षर मतदाताओं, तुम्हें उम्मीदवार से क्या लेना देना, वह चोर है तो बना रहे तुम तो हाथ हाथी या कमल पर बटन दबाओ और लौट कर अपनी मजूरी में लग जाओ। जो जीतेगा वह आपका विकास करेगा क्योंकि आप उसके राजनैतिक संसाधन भी हैं। समाज के पिछड़े वर्गो के लिए आरक्षण हुआ, भला हुआ और अब तो सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसे मान्यता दे दी है। यह जीत सिर्फ अर्जुन सिंह की जीत नही है, उन सबका सशक्तीकरण है जो पीढ़ियों से लगातार इस लिए पिछडते आ रहे थे क्योंकि उनके पूर्वजों को व।र्ााश्रम ने समानता की मान्यता और विकास का अधिकार नही दिया था। हंगामा इस पर भी हुआ और तब जा कर थमा जब अर्जुन सिंह ने याद दिलाया कि जो लोग अपना हिस्सा छिन जाने के भय से आतुर हैं, उन्हें चिंता नही करनी चाहिए क्योंकि अवसर नए बनाए जा रहे हैं और उपलब्ध अवसरों में कटौती नही की जा रही है। जिन्हें अदालत के फैसले में भी राजनीति नजर आती है उनका तो भगवान ही मालिक है। फिर भी शिक्षा के मामले में सब कुछ ठीक नही है। मान लिया कि आपने विश्वविघालयों, आई आई टी, आई आई एम और मेडीकल कॉलेजों में आरक्ष।ा दे कर पिछडे वर्गो का भला किया और गरीबों को आगे बढने का मौका दिया लेकिन सही यह भी है कि जब तक बच्चे पहले दर्जे से इंटर तक की पढाई नही करेगें तब तक वे इस राजकीय परोपकार का लाभ उठाने की स्थिति में नही होगें। यह मुर्गी पहले या अंडा वाला सवाल है। इंटर तक वे ही बच्चे पहुंच पाएगें जिन के परिवार गरीबी की तथाकथित रेखा से नीचे नही है और जो रोटी की बजाय किताब और कॉपियां खरीदने की हिम्मत रखते हैं। देश में सर्व शिक्षा अभियान भी है और उसके अरबों रुपए से चलने वाले जन शिक्षण संस्थान भी। इस संस्थानों में इतना पैसा है कि जैसे पेट्रोल पम्प के लिए अर्जियां और राजनैतिक सिफारिशें लगती हैं, वैसे ही इन संस्थानों के लिए दांव पेच किए जाते हैं। यह तो कोई नही मानेगा कि हमारे देश में परोपकारियों की बाढ आ गई है। लोग आवंटित पैसे में से कारें खरीदते हैं, बेटियों के ब्याह करते हैं और आम तौर पर फर्जी ऑडिट करवा के भेज देते हैं। फाइलों में देश साक्षर होता रहता है। जिस देश में उदार सरकारी और संदिग्ध अनुमानों के हिसाब से भी चालीस फीसदी आबादी वही बाइस सौ कैलोरी वाली गरीबी की सीमा रेखा के नीचे रहती है। वहां इस प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य किए बगैर किसी भी आरक्ष।ा या प्रशिक्षण या संवैधानिक अनुरक्षण का कोई मतलब अपनी तो समझ में नही आता। अपनी समझ में यह भी नही आता कि जिस देश में बेटियों को अभिशाप माना जाता है वहां संसद में महिलाओं के लिए तैंतीस प्रतिशत आरक्षण दे कर, कौन सा तीर मार लिया जाएगा। हाल ही में उत्तार प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की जो जीवनी प्रकाशित हुई है उसमें भी दो टूक शब्दों में स्वीकार किया गया है कि बेटी होने के नाते उनके परिवार में भी शिक्षा के मामले में उनके साथ पारिवारिक स्तर पर खासा भेदभाव किया गया। उनके पिताजी प्रभुनाथ इतने उर्वर थे कि तीन बेटियों के बाद उन्होनें छ: बेटे और पैदा किए। आज पूरा कुनबा मायावती के नाम से जाना जाता है।

शिक्षा देना किसी भी प्रतिष्ठान के लिए परोपकार का नही, अनिवार्यता का विषय है। जब तक देश का हर बच्चा शिक्षित नही हो जाता तब तक देश की पूंजी की हर पाई साक्षरता में लगनी चाहिए। चंद्रमा पर उपग्रह भेजने से हमारी पग़डी में कोई चंद्रमा नही जुड़ जाने वाला है। देश में कितने बच्चे हैं जो अंतरिक्ष में शोध करने के लिए लाखों रुपए खर्च कर के बडे संस्थानों में पहुंच पाते हैं? देश की स्वायत्तता और संप्रभुता तब तक अधूरी और निरर्थक है जब तक हम अक्षरों को हर आगंन तक नही पहुंचा पाते। अनिवार्य शिक्षा को संविधान से जोड़ने से रोकने का संसदीय षडयंत्र सबकी समझ में आ रहा है लेकिन सब खामोश हैं। दिनकर की पक्तियां याद आती है - जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध। (शब्दार्थ)
हमारे लोकतंत्र का सुब्बाकरण
सुप्रिया रॉय
अब यह पता नही कि देश के कानून निर्माताओं में से एक, संसद की गृह मंत्रालय सलाहकार समिति के सम्मानित सदस्य और असम के तेजपुर से कांग्रेस के सासंद मणि कुमार सुब्बा को सीबीआई की रिपोर्ट के आधार पर भारत, भारत के संविधान और देश की संसद के साथ धोखाधडी करने के आरोप में जेल भेजा जाएगा, अपने गुनाहों की सजा पूरी करने के लिए नेपाल वापस किया जाएगा या जैसे अब तक मिलता रहा है, वे नोटों के बोरे खोल देगें और कांग्रेस फिर उन्हें लोकसभा चुनाव में टिकट दे देगी। अभी यह भी पता नही कि आखिरकार म।ाि कुमार सुब्बा को अपने असली बाप का नाम याद आता है या नही। बहुत सारे सरकारी दस्तावेजों में वे अलग अलग जन्म स्थान और अलग अलग पिता का नाम बताते रहे हैं। मनुष्यों के साथ तो यह होता नही, सुब्बा जरूर कोई अवतार होगें। आखिर इतनी सारी धांधली कर के एक अनपढ आदमी लॉटरी का अरबों रुपए का तकनीकी कारोबार चला सकता है, विभिन्न राज्य सरकारों के पच्चीस हजार करोड़ रुपए हजम कर सकता है और कानूनी नोटिसों का जवाब भी नही देता तो यह आम आदमी के बस की बात तो नही। सुब्बा की कहानी अनोखी और अनूठी जरूर है लेकिन इस तरह की कहानियां हमारे लोकतंत्र में कोई अजनबी नही है। दूर जाने की जरूरत नही हमारे माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में सब जानते हैं कि वे पंजाब में पैदा हुए, पंजाब विश्वविघालय से ले कर लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स में पढे। नौकरी विश्व बैंक से ले कर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में बडी नौकरियां की और वहीं से पेंशन पाते हैं। इसके बावजूद वे असम से राज्य सभा में चुन कर आते हैं और उनका पता है मकान नंबर 3989, नंदन नगर, वार्ड नंबर 51 सारूमातरिया, दिसपुर, जिला कामरूप-781006,असम। घर में या तो फोन है नही या फिर वे भारत के संसद में दर्ज अपने जीवन परिचय के बारे में बताना नही चाहते। वैसे राज्य सभा में निर्वाचित होने के लिए अनिवार्य तौर पर राज्य का नागरिक होना कानून में नही है इसलिए यह धोखाधडी चल जाती है। अपनी राज्य सभा में बहुत सारे सांसद ऐसे मौजूद हैं। खुद लालकृष। आडवा।ाी दो बार ग्वालियर की सिंधी कॉलोनी का एक पता दे कर मध्य प्रदेश से राज्य सभा में पहुंच चुके हैं। जैसे चार्ल्स शोभराज की होती है, वैसे ही म।ाि कुमार सुब्बा की भी कुछ मामलों में तारीफ करनी पडेगी। आखिर नेपाली मूल के इस आदमी ने सडक पर मिट्टी ढोई, चाय बिस्किट की दुकान चलाई और वहीं पर लॉटरी के टिकट बेचना शुरू किया। थोड़ी कामयाबी मिली तो ऐजेंसी ले ली। और कोई नाम नही सूझा तो अपने म।ाि और सुब्बा को जोड़ कर एम एस एसोसिएट बना ली। जल्दी ही पहले वे करोड़ों में और फिर अरबों में खेलने लगे। कमाते थे मगर सरकारों को हिस्सा नही देते थे। नोटिस आते थे तो उन्हें फाड कर फेंक देते थे। ऐसी प्रचंड प्रतिभा के साथ कानून से खेलने वाला दूसरा आदमी चार्ल्स शोभराज ही नजर आता है और वह सुब्बा की तरह अवतार नही है और शायद इसी लिए सुब्बा के मूल देश नेपाल में जेल में पडा है। म।ाि कुमार सुब्बा दो बार असम में विधायक रहे। पैसा बहुत आ गया था इसलिए पार्टी के कोषाध्यक्ष बना दिए गए। दिल्ली में तालकटोरा रोड़ पर एक नंबर के अपने बंगले में दो नंबर का काम करते हुए जब वे मिलते हैं तो अगर आपको उनके अतीत और खजाने के बारे में पता ना हो तो चेहरा देख कर दया आ जाती है। बात बात में वे कहते हैं कि लॉटरी की कम्पनी उनकी नही है वह उनकी चार या पांच पत्नियों में से किसी की है, वे कहते हैं मुझे तो गिनना भी नही आता और मैं तो गरीब आदमी हूं। मगर यदि आप उनकी राजनैतिक या मीडिया के जरिए मदद करने के लिए राजी हैं तो जाते हुए उनका सचिव आपको एक लिफाफा थमा देगा जिससे आप अपनी या अपने दल या संस्थान की हैसियत के मुताबिक स्कूटर से ले कर कार तक कुछ भी खरीद सकते हैं। म।ाि कुमार सुब्बा के मामले में एक बात और कही जानी चाहिए कि उनमें वह आत्मविश्वास है जो या तो राम में था या राव।ा में था। यह हमें सर्वोच्च न्यायालय ही बताएगा कि सुब्बा की गिनती आखिर नायकों में होगी या खलनायकों में। फिर भी इतना जरूर है कि म।ाि कुमार सुब्बा पर हत्या से ले कर हेराफेरी तक के तमाम इल्जाम लग चुके हैं, पांच राज्य सरकारें अपना पैसा वसूलने के लिए उनके पीछे पडी हैं लेकिन इस तथाकथित गरीब आदमी के चेहरे पर शिकन तक नही आती। या तो वह अपने सरकारी बंगले में एयरकंडीशनर चला कर मौज कर रहा होता है या दक्षि।ा दिल्ली में अपने दो फार्म हाउसों में से एक में रास रचा रहा होता है। उसके दूसरे फार्म हाउस पर तिहाड जेल में बैठे दाऊद इब्राहिम के गुर्गे रोमेश शर्मा का कब्जा है। धन कुबेर सुब्बा पता नही क्यों अभी तक दाऊद इब्राहिम से कोई रिश्ता स्थापित नही कर पाया। पिछले दिनों अरु।ाांचल के ईटानगर से जहाज पकडने के लिए सुब्बा के तेजपुर आना पडा। रास्ते में सुब्बा को निकलना था इसलिए जैसे दिल्ली में प्रधानमंत्री के लिए होता है, वैसे ही स्थानीय पुलिस ने उनके काफीले के लिए रास्ता रोका हुआ था। बहुत अनुरोध किया कि भैया निकल जाने दो, वर्ना जहाज छूट जाएगा लेकिन वह हवलदार मानने को ही राजी नही हुआ। आखिरकार उससे खुद सुब्बा का नाम लिया और दावा किया कि सुब्बा साहब हमारे दिल्ली के दोस्त हैं तो फिर वह हवलदार गाडी की अगली सीट पर बैठ कर रास्ता बताते हुए हवाई अव्े तक छोड़ कर आया और उसने अनुरोध सिर्फ यह किया कि इसी गाडी से उसे वापस उसके चौराहे तक पहुंचा दिया जाए क्योंकि वह अपने माई-बाप सुब्बा साहब को सलाम करने के लिए जल्दी से जल्दी पहुंचना चाहता है। सुब्बा कानून के लिए और बाकि देश के भले ना सही लेकिन तेजपुर की जनता के लिए बाकायदा एक अवतार है। अवतारों की तरह ही उनकी पूजा होती है और अवतारों की तरह ही वे अपनी प्रजा का टके पैसे से पूरा ध्यान रखते हैं। कर्नाटक का चंदन तस्कर वीरप्पन भी अपने इलाके में ऐसे ही मसीहा माना जाता था और उसका अंत कितना भयानक हुआ वह सब जानते हैं। उसकी विधवा अब उसका स्मारक बनानी चाहती है और उस पर एक और फिल्म बनाने की घोषणा हो चुकी है लेकिन सुब्बा के मामले में तो बहुत सारी पत्नियां आएंगी और बहुत सारे स्मारक बनेगें। उसकी जिंदगी की कहानी भी फिल्म बनाने लायक है लेकिन हर बात में मुकदमा ठोकने की जो उसकी आदत है उसे देखते हुए लोग हिम्मत नही करते। मुकदमे की बात चली है तो दिल्ली की एक पत्रिका ने सर्वोच्च न्यायालय के रिकॉर्ड के आधार पर ही सुब्बा की जीवन गाथा छाप दी थी तो उसने तेजपुर की अदालत में उसके और उसके सभी कर्मचारियों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया था और सुब्बा की महिमा इतनी अपार थी कि सिर्फ डेढ़ महीने में अदालत के तीन जमानती और दो गैर जमानती वारंट दिल्ली पहुंच गए। जिस देश में अदालतों की तारीखें महीनों बाद पडती हैं वहां सुब्बा का यह कमाल भी उन्हें कम से कम लोकतंत्र का अवतार तो सिध्द करता ही है। भारत की राजनीति में आनंद मोहन भी हैं, मुख्तार अंसारी भी हैं, सैयद सहाबुद्दीन भी हैं, डी पी यादव भी है और पप्पू यादव भी है। ये सब जेल में हैं और इनमें से जो आज की तारीख में निर्वाचित हैं उनके मतदाताओं का लोकतंत्र के सदनों में कोई प्रतिनिधि नही है। उनकी समस्याओं को उजागर करने वाला कोई नही उन्हें आपदाओं में राहत दिलवाने वाला कोई नही और यह सब लोकतंत्र का नही लोकतंत्र के सुब्बाकरण का कसूर है। हमें अगर अपनी लोकतांत्रिक मान्यता बरकरार रखनी है तो अपने संविधान और दंड विधान दोनों को लगातार समकालीन बनाते रहना पडेगा वर्ना ना सुब्बाओं की कमी हैं और ना नोटों की बोरियों की।

Sunday, May 4, 2008


सांसद सुब्बा की जेल यात्रा तय





सांसद सुब्बा की जेल यात्रा तय


डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 4 मई-कांग्रेस सांसद मणि कुमार सुब्बा का जालसाजी और देशद्रोह के आरोप में जेल जाना तय है। देखना यह है कि असम, बंगाल, दिल्ली और अन्य प्रदेशों के कितने बड़े नेता और बहुत बड़े और वर्तमान और भूतपूर्व अधिकारी इस जाल में फंसते हैं।

मणि कुमार सुब्बा को सीबीआई की खोज रपट का जवाब अगले एक महीने में देना है लेकिन वे मीडिया के जरिए सीबीआई को गालियां देने पर तुल गए है। एक एनआरआई द्वारा चलाई जा रही न्यूज एजेंसी का इस्तेमाल करके सुब्बा ने कहा कि उन पर नेपाल के जिस अपराधी मणि कुमार लिंबो होने का आरोप लगाया जा रहा है वह आदमी 1982 तक नेपाल की जेल में था और आज भी जिंदा है। सीबीआई के अधिकारी कांग्रेस सांसद सुब्बा के इस विचित्र बयान पर दुखी हैं और चकित भी। उनका सवाल है कि अगर सुब्बा को इतने वर्षो से यह जानकारी थी तो वे अपने बचाव में अब जा कर क्यों बोल रहे हैं। सीबीआई के एक अधिकारी के मुताबिक उन्हें कोई आश्चर्य नहीं होगा कि सुब्बा अपने पैसे के दम पर नेपाल का कोई भूतपूर्व अपराधी मणि कुमार लिंबो बना कर खड़ा कर दें और अगर उन्होंने ऐसा किया तो उन पर जालसाजी का मुकदमा और गंभीर हो जाएगा। इस बीच सुब्बा की कई पत्नियों में एक ने भी उनके खिलाफ बयान दे दिया है और सर्वोच्च न्यायालय ने सुब्बा के चुनाव क्षेत्र असम के तेजपुर से एक और याचिका जामिनी कुमार वैश्य ने डाली है जिसके अनुसार सुब्बा का व्यक्तित्व शुरू से आखिर तक फर्जी है। उनके जन्म प्रमाण पत्र, तथाकथित शिक्षा रिकॉर्ड और बार बार बदलते रहे इसका सुबूत है। वैश्य की याचिका में कहा गया है कि मतदाता सूची में सुब्बा का नाम भी जाली है। तेजपुर के जिस मतदान केंद्र नंबर 21 पर सुब्बा का नाम सूची में होना बताया गया है वह चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार 537 नंबर पर खत्म हो जाती है लेकिन सुब्बा का मतदाता नंबर 630 है। याचिका के अनुसार 28 अगस्त 1971 को अपनी चचेरी बहन काली माई की हत्या के आरोप में केस नंबर 201 में उम्रकैद की सजा दी गई थी। तेपलेजुम जिला अदालत द्वारा दी गई सजा की पुष्टि 29 नवंबर 1972 को नेपाल के सर्वोच्च न्यायाल ने कर दी थी और बाद में नेपाल नरेश के पास अपील की गई थी जो नामंजूर हो गई थी।

सीबीआई के अनुसार सुब्बा और लिंबो नेपाल की ईलाम जेल से ईलाम अस्पताल ले जाते वक्त फरार हो कर भारत आ गया इस बात की पुष्टि सुब्बा की दूसरी पत्नी कर्मा कनु ने भी की है। सुब्बा के भाई संजय राज सुब्बा ने माफी की अपील नेपाल नरेश के पास की थी और यही यह बताने के लिए काफी है कि मणि कुमार लिंबो एक ही व्यक्ति हैं। इसके अलावा सुब्बा पर नागालैंड, असम और मेघालय लॉटरियों के कुल मिला कर 25 हजार करोड़ रुपए और उत्तर प्रदेश में 35 सौ करोड़ रुपए व्यापार के टैक्स के तौर पर हजम कर जाने का आरोप है।
सुब्बा ने लोकसभा का नामंकन करते समय अपनी हैसियत सिर्फ 20 करोड़ रुपए की बताई है, जबकि सिर्फ उसका दिल्ली का फार्महाउस दो सौ करोड़ का है। कांग्रेस में सुब्बा के खिलाफ आवाज उठनी शुरू हो गई है। असम के गृह मंत्री ने उनका इस्तीफा मांगा है और आज उनके इलाके तेजपुर में उनके पुतले जलाए गए। सुब्बा बहुत बड़ी आफत में हैं और देखना यह है कि वे अपने साथ कितने अधिकारियों और राजनेताओं को ले कर डूबते हैं।

अब मणिपुर में भी सल्वा जोडुम

डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 4 मई-सर्वोच्च न्यायालय कुछ भी कहता रहे मगर सुदूर उत्तर पूर्व में मणिपुर की सरकार ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह से प्रेरणा लेने का फैसला किया है। छत्तीसगढ़ में माओवादियों से निपटने के लिए सल्वा जोडुम अभियान की तरह ही मणिपुर में भी राज्य सरकार आतंकवाद प्रभावित इलाके के लोगों को हथियार देगी और आतंकवादियों से जूझने में मदद करेगी।हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका के आधार पर स सल्वा जोडुम के मामले में टिप्पणी की थी कि किसी भी राज्य सरकार को निजी सेनाएं बनाने यह उन्हें प्रोत्साहन देने का कोई अधिकार नहीं है। एक तरह से यह फैसला तो नहीं था लेकिन इस बात का संदेश अवश्य था कि सर्वोच्च न्यायालय सल्वा जोडुम को भी एक तरह का सरकारी आतंकवाद मान कर चल रही है।

मणिपुर के मुख्यमंत्री ओ इडोबी सिंह ने कल मंत्रिमंडल की बैठक में खुद छत्तीसगढ़ का उदाहरण देते हुए यह प्रस्ताव रखा और मंत्रिमंडल में आम सहमति से इसकी पुष्टि कर दी। ठीक सल्वा जोडुम की तर्ज पर ही मणिपुर सरकार भी अपने नागरिकों को हथियार उपलब्ध कराएगी और इन हथियारों के लिए थाने के गोदामों में रखे गए उस खजाने का सहारा लिया जाएगा जिसमें आतंकवादियों से जब्त हथियार रखे हुए है।

मणिपुर सरकार के सूत्रों के अनुसार राज्य की पुलिस ग्रामीणों को प्रशिक्षण देगी और उन्हें आतंकवाद से जूझने तरीके सिखाएगी। इतना ही नहीं जहां आतंकवादियों का सबसे ज्यादा खतरा होगा वहां सल्वा जोडुम जैसे नेक प्रयासों में कोई गैर कानूनी बात नहीं है। खुद केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने सल्वा जोडुम की उपलब्धियों को महत्वपूर्ण बताया है और यह भी कहा है कि जनता की लड़ाई लड़ने में सरकार को हर संभव मदद देनी चाहिए। अगर मणिपुर में छत्तीसगढ़ के सल्वा जोडुम का अनुसरण हो सकता है तो आतंकवाद से प्रभावित दूसरे राज्य भी छत्तीसगढ़ को अपनी प्रेरणा मान कर चलेंगे। इससे एक नए अभियान का सूत्रपात्र हो सकता है। सिर्फ सरकार या सरकारी बलों द्वारा संगठित माओवादियों का मुकाबला नहीं किया जा सकता।

सुनीता देवी का शिकार एक सिपाही



डेटलाइन इंडिया
पटना, 4 मई-बिहार की विधायक सुनीता देवी पर यौन शोषण का आरोप लगाने वाले सिपाही बालेश्वर शर्मा को सिर्फ इसलिए निलंबित कर दिया गया क्योंकि उसने कांग्रेस की एक विधायक सुनीता देवी पर अपने साथ बलात्कार करने का विचित्र आरोप लगाया था पुलिस का कहना है कि बालेश्वर शर्मा को निलंबित करने का कारण यह है कि उसने अपने अधिकारियों को सूचना दिए बगैर पुलिस में रपट लिखा दी।41 वर्षीय इस कांग्रेसी विधायक को बचाने के लिए राज्य सरकार तो हरकत में आ गई है लेकिन पता नही वह बालेश्वर शर्मा के पास मौजूद उन पत्रों और चित्रों का क्या करेग जो बालेश्वर शर्मा के पास मौजूद हैं और इस जबरन किए गए प्रेम की कहानी खुद कहते हैं। अब तो वे टेप भी निकल आए हैं जिनमें विधायिका सुनीता देवी अपने अंगरक्षक से एक नेहाल प्रेमिका के अंदाज बात कर रही हैं और उन्हें राजा और छैला जैसे संबोधन दे रही हैं। एक तस्वीर है जिसमें सुनीता देवी और बालेश्वर शर्मा बहुत अंतरंग मुद्रा में एक साथ दिखाई पड़ते हैं लेकिन सुनीता देवी का कहना है कि यह तस्वीर राखी के दिन ली गई थी। कहने को वे कुछ भी कहती रहें लेकिन सच यही है कि यह भाई बहन की तस्वीर नजर नहीं आती। कांग्रेस खुद भी अपनी विधायिका की इस टुच्ची हरकत से आहत है और उसने भी पार्टी स्तर पर इस पूरे मामले की जांच करने के लिए कमेटी बिठा दी है। यह पता नहीं कि कमेटी की रिपोर्ट पहले आएगी या पुलिस की, लेकिन इस पूरे अभियान में बिहार पुलिस का एक आम सिपाही जरूर बलि चढ़ गया है जहां तक सुनीता देवी की बात है तो वे बहुत समय से अपने पति से अलग रहतीं हैं और बालेश्वर शर्मा के अलावा उनके अन्य राजनैति और गैर राजनैतिक लोगों से संबंधों जानकारी भी पुलिस को मिल चुकी है।

Tuesday, April 29, 2008


सामने आई शाहरूख की ब्लू फिल्म

सामने आई शाहरूख की ब्लू फिल्म

डेटलाइन इंडिया

मुंबई, 29 अप्रैल- शाहरूख खान आज सफलता की बुलंदियों पर हैं लेकिन उनकी एक तथाकथित ब्लू फिल्म इन दिनों मुंबई में मौजूद और इसे इंटरनेट बेबसाइट पर भी डाल दिया गया है। शाहरूख के लगभग 12 मिनट की इस फिल्म के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को तलाश रहे हैं और हो सके तो उससे सौदा करने के लिए भी तैयार हैं।

यह गरमागरम सीन शाहरूख खान की शुरूआत की एक फिल्म माया मेमसाहब का हिस्सा हैं। यह फिल्म केतन मेहता ने बनाई थी और उनकी पत्नी दीपा साही इस फिल्म की हीरोइन थीं। केतन मेहता ने 15 साल पहले असाधारण उदारता का परिचय देते हुए शाहरूख और दीपा के बीच लगभग आधे घंटे तक एक बंद स्टूडियो में वास्तविक प्रेम लीला करवायी थी और उसे फिल्म में रखा था।

सेंसर बोर्ड को ये दृश्य इतने आपत्ति जनक लगे कि इन्हें फिल्म से निकाल दिया गया। फिल्म के फुटेज में ये दृश्य फिर भी मौजूद थे और अब किसी ने इनकी डीवीडी बना कर बाजार में उतार दी और एक बेबसाइट पर भी डाल दी है। एक आदर्श गृहस्थ की छवि प्रस्तुत करने वाले शाहरूख खान अब फिल्में के अलावा खेल की दुनिया के बादशाह भी बन गए हैं और उन्हें छवि के स्तर पर यह डीवीडी सार्वजनिक होना काफी भारी पड़ सकता है। पिछले दिनाें एक शोरूम के उद्धाटन के सिलसिले में दिल्ली आए शाहरूख ने कहा कि वे इस डीवीडी के सार्वजनिक होने से बहुत आहत हैं और किसी भी कीमत पर इसका मूल प्रिंट खरीद लेना चाहते हैं। उन्हें यह पता नहीं कि वे फिल्म के अधिकार कैसे खरीदेंगे लेकिन पहले तो उन्हें बेचने वाले की तलाश है।

फिल्म के निर्माता और दीपा साही के पति केतन मेहता का कहना है कि उन्होंने फिल्म के प्रिंट इन्हें डेवलेप करने वाली लैव के पास छोड़ दिए थे और यह जानते कि वे इन प्रिंट के सार्वजनिक होने के लिए किसको जिम्मेदार माने। केतन मेहता ने कहा कि दीपा साही आज उनकी पत्नी नहीं हैं फिर भी वे उनकी बहुत इज्जत करते हैं और सपने में भी शाहरूख और उनके प्रेम दृश्यों को सार्वजनिक करने का विचार नहीं कर सकते।

सोनिया पर ज्योति बसु का हमला


डेटलाइन इंडिया

नई दिल्ली, 29 अप्रैल-माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि उनके बुजुर्ग नेता ज्योति बसु सीधे सोनिया गांधी पर हमला बोल देंगे। एक जमाने में सोनिया गांधी को सरेआम अपनी बेटी करार देने वाले ज्योति बसु ने इतना हास्यास्पद बयान दिया है कि दिल्ली में कामरेडों को मुंह छिपाना मुश्किल पड़ रहा है।

कोलकाता में पोलित ब्यूरो की बैठक के बाद ज्योति बसु जिस तरह सोनिया गांधी पर बरसे वह अप्रत्याशित था। 93 साल के होने जा रहे ज्योति बसु ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को राजनैतिक तौर पर नाबालिग करार दे दिया और कहा कि नंदीग्राम तो छोड़िए, सोनियां गांधी को पश्चिम बंगाल के भूगोल की भी पूरी जानकारी नहीं है।

नंदीग्राम एक ऐसा मुददा है जिस पर बंगाल की वामपंथी सरकार बार बार घेरे में आ रही है। उसके पास बचाव का कोई उपाय नही है लेकिन किसी को सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि महंगाई पर बोलते बोलते ज्योति बसु इतना बहक जाएंगे कि सीधे श्रीमती गांधी को गालियां देने लगेंगे। जब मौका आया तो ज्योति बसु ने यह कहने से परहेज नहीं किया कि यूपीए गठबंधन के धर्म का पालन नहीं करेगी। उन्होने कहा कि सोनिया गांधी नंदीग्राम के लोगों के साथ झूठी सहानुभूति दिखा रही हैं और पश्चिम बंगाल सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रही हैं।

ज्योति बसु के इस बयान के बाद कांग्रस और वामपंथियों के बीच पहले से तनाव में चले आ रहे संबंध और ज्यादा बिगड़ गए थे और कोई नहीं जानता कि यह किस हद तक गिरेंगे। जहां तक ज्योति बसु की बात है तो वे तो अपनी तरफ से रिटायर्ड हो ही चुके हैं और पार्टी उन्हें सिर्फ इज्जत देने के लिए पोलित ब्यूरो का सदस्य बनाए हुए है।

सुब्बा ने सीबीआई से जवाब मांगा

डेटलाइन इंडिया

नई दिल्ली, 29 अप्रैल-कांग्रेस के बदनाम लोकसभा सदस्य मणिकुमार सुब्बा के खिलाफ सीबीआई ने भले ही अपनी रपट दे दी हो और उन्हें भारत का नागरिक मानने से भी इनकार कर दिया हो लेकिन सुब्बा ने आज साफ कर दिया कि वे सीबीआई को देश की प्रीमियम जांच एजेंसी की बजाय सरकारी नौकर मानते हैं।

कांग्रेस द्वारा अनपढ़ घोषित सुब्बा की ओर से आज सीबीआई मुख्यालय में अंग्रेजी में लिखी हुई एक चिटठी पहुंची जिसमें साफ शब्दों में निर्देश दिया गया था कि सीबीआई अपने वे आधार बताए जिनको उसने सर्वोच्च न्यायालय के सामने दी गई रपट में इस्तेमाल किया। आपको याद होगा कि सर्वोच्च न्यायालय ने सुब्बा को सीबीआई जांच रपट का जवाब देने के लिए एक महीने का समय दिया है और उसमें से तीन दिन निकल चुके हैं।

सुब्बा दिल्ली में एक तालकटोरा रोड पर रहते हैं और उनका एक बड़ा फार्महाउस ही दिल्ली में है। सीबीआई अधिकारियों को आशंका है कि वे सच खुल जाने के बाद देश छोड़ कर भाग सकते हैं और इसीलिए सीबीआई अधिकारियों ने उन पर निगरानी रखने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति मांगने का फैसला किया है। इन अधिकारियों के मुताबिक सुब्बा आम तौर पर अपने सरकारी निवास पर नहीं रहते हैं और कहां कहां राते बिताते है यह उनके स्टाफ को भी नहीं पता होता है।

सुब्बा ने अब कांग्रेस को ब्लेकमेल करना शुरू कर दिया है। एक जमाने में उनके बंगले में मेहमान रहे एक भूतपूर्व मंत्री और वर्तमान सांसद के अनुसार सुब्बा ने उन्हें फोन करके कहा है कि अगर ऐसे मौके पर उनकी मदद नहीं की गई तो वे जिन जिन नेताओं को उन्होंने आर्थिक मदद दी है वे उन सबका खुलासा कर देगे। इसके अलावा उत्तर पूर्व की जिन पांच सरकारों ने सुब्बा पर सैकड़ों करोड़ रुपए हजम कर जाने के मामले दर्ज किए हैं, उन्हें भी सुब्बा कोई जवाब देने से इनकार कर रहे हैं। असम सरकार का नोटिस ले कर आए एक अधिकारी को तो कल ही बुरी धमका कर भगा दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय सीबीआई के जांच पत्र का जवाब मिलने के बाद फैसला करेगा कि सुब्बा के अतीत के बारे में कोई जानकारी नेपाल सरकार से मांगी जाए या नहीं।

रामदौस अब माल्या से भिड़े


डेटलाइन इंडिया

नई दिल्ली, 29 अप्रैल-केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदौस अब किंगफिशर के मालिक और राज्य सभा के सदस्य विजय माल्या से भिड़ गए हैं। अपने आपको शराब और सिगरेट का दुश्मन करार देने वाले रामदौस ने आरोप लगाया है कि विजय माल्या आईपीएल मैचों के जरिए शराब का प्रचार कर रहे हैं।

रामदौस को असली आपत्ति विजय माल्या की टीम के नाम पर है। माल्या की कंपनी रॉयल चैलेंज नाम की व्हिसकी बनाती है। रामदौस का कहना है कि माल्या ने अपनी टीम का नाम रॉयल चैलेंजर रख कर अपनी शराब के ब्रांड का प्रचार करने का फैसला किया है। रामदौस ने आज दिल्ली में कहा कि विजय माल्या चाहे जितने रईस सांसद हों, उन्हें समाज के हितों के साथ नहीं खेलने दिया जाएगा।

रामदौस की असली दिक्कत यह है कि वे खुद माल्या का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। उन्हें रॉयल चैलेंजर के मैचों के प्रसारण रोकने के लिए सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दास मुंशी से शिकायत करनी पड़ेगी और श्री मुंशी पहले भी कई बार रामदौस की शिकायतों को गैर कानूनी बताते हुए अनदेखा और अनसुना कर चुके हैं। रामदौस ने कुछ महीने पहले सूचना और प्रसारण मंत्रालय से मांग की थी कि एल्कोहल और सिगरेट के विज्ञापन किसी भी रूप में प्रसारित होने से रोकने के लिए कानून बनना चाहिए।

श्री मुंशी ने जवाब दिया था कि शराब और उसके विज्ञापनों पर रोक लगाना राज्यों का काम है। रामदौस का यह भी प्रस्ताव है कि महात्मा गांधी के जन्म दिन दो अक्टूबर को किसी भी तौर पर शराब विरोधी दिवस घोषित किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार महात्मा गांधी के नाम के साथ इस तरह का कोई नया प्रयोग करने को तैयार नहीं है। वैसे भी महात्मा गांधी के जन्म प्रदेश गुजरात में पूरी नशाबंदी है।

दलाई लामा को चीनी लॉली पॉप


डेटलाइन इंडिया

नई दिल्ली, 29 अप्रैल-चीन ने अपना ओलंपिक बचाने के लिए अब दलाई लामा को ही हथियार बनाने का फैसला किया है। चीन सरकार ने दलाई लामा को बीजिंग ओलंपिक के उदघाटन समारोह में विशेष अतिथि के तौर पर बुलाने की तैयारी कर ली है और इस बारे में आधिकारिक पत्र कभी भी आ सकता है।

खुद दलाई लामा अपने समर्थकों और तिब्बत वासियों के प्रचंड विरोध को बावजूद कई बार कह चुके हैं कि चीन में ओलंपिक हों इससे उन्हें कोई एतराज नहीं हैं। उन्होंने इस आशय के कई बयान दिए है। दलाई लामा के समर्थक इन बयानों से बहुत नाराज हैं और उनमें से कई दलाई लामा की पूज्यता को भूलते हुए सरेआम उनके बयानों की आलोचना कर चुके हैं।

चीन सरकार की ओलंपिक कमेटी ने अपनी एक विशेष बैठक में यह प्रस्ताव पास किया है कि जिन विभूतियों को ओलंपिक के उदघाटन सत्र में बुलाया जा सकता है उनमें दलाई लामा भी एक हो सकते हैं। यह प्रस्ताव चीन के विदेश मंत्रालय को भेजा जाएगा और वहीं इस पर फैसला होगा।

भारत स्थित चीनी दूतावास का कहना है कि अभी तक उन्हें दलाई लामा को ओलंपिक के लिए आमंत्रित करने की कोई सूचना नहीं दी गई है लेकिन यह जरूर है कि चीन ने अपने भारत स्थित अधिकारियों को दलाई लामा के बारे में किसी भी तरह का काई भी बयान देने से रोक दिया है। अधिकारियों इस बात की पुष्टि की है। दलाई लामा के सचिवालय ने इस बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है। एक अधिकारी ने अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि दलाई लामा को बुलाने के पहले चीन सरकार को पहले यह तय करना होगा कि उन्हें बुलाया किस हैसियत से जा रहा है, अगर उन्हें तिब्बत राष्ट्र प्रमुख के तौर पर बुलाया जाएगा तो ही वे जाएंगे।

Friday, April 18, 2008


राहुल गांधी को मोहरा बनाने की कोशिश





आलोक तोमर
अर्जुन सिंह पहले आदमी नही हैं जिन्होने राहुल गांधी को देश का भावी प्रधानमंत्री बनाने का ऐलान किया हो। इसके बहुत पहले अमेठी के जगदीश पीयूष और लखनऊ के जगदंबिका पाल भी यही मांग कर चुके थ। वैसे भी कांग्रेस में राहुल गांधी को युवराज कहने का चलन हो गया है और अर्जुन सिंह ने अगर युवराज को महाराज बनाने की मांग कर डाली तो कौन सा गुनाह कर दिया? वे बोले तो प्रणव मुखर्जी भी चुप क्यों रहते, उन्हें तो मनमोहन सिंह से वैसे भी पुराना हिसाब चुकाना था जब सोनिया गांधी ने प्रणव बाबू की पुरानी वफादारियों को भूलते हुए राजनीति का रा भी नही जानने वाले मनमोहन सिंह को देश का नेता घोषित कर दिया था।

यों तो अर्जुन सिंह और प्रणब मुखर्जी के रिश्ते राजनैतिक और निजी तौर पर बहुत मधुर नही हैं लेकिन जहां तक मनमोहन सिंह का सवाल है तो दोनों ही अपने-अपने कारणों से प्रधानमंत्री महोदय को खास पसंद नही करते। आप देख चुके हैं कि राहुल गांधी के राजतिलक वाले बयान को लेकर कितना हंगामा हुआ और कांग्रेस में लिफाफे पर गोंद की भूमिका निभाने वाली जयंती नटराजन को भी मौका मिल गया कि वे बडे नेताओं को उपदेश दे सकें। वह तो अर्जुन सिंह सीधे दस जनपथ पहुंच गए और उन्होने श्रीमती गांधी से साफ कह दिया कि वे उन नेताओं में से नही हैं जो अपने शब्द वापस लेते हैं। वैसे भी जब पत्रकारों ने उनसे राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बारे में पुछा था तो उन्होने सिर्फ इतना कहा था कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री क्यों नही बन सकते। इसके बाद कांग्रेस के महा प्रवक्ता वीरप्पा मोइली ने जल्दबाजी में पत्रकारों से कहा कि कांग्रेस की ओर से अपने किसी भी नेता को निशाना नही बनाया गया है और यह एक तरह का खुद को दिया गया अभय दान था।

कांग्रेस में वे लोग जो मनमोहन सिंह का वफादार होने का अब भी दावा कर रहें हैं और यह दावा उनके प्रधानमंत्री होने की वजह से है, का कहना है कि उनसे बडा विध्दान प्रधानमंत्री आज तक देश को मिला ही नही। यह लोग जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री का तो अपमान कर ही रहें हैं लेकिन पी वी नरसिंह राव को भुला रहे हैं जिन्हें ग्यारह भाषाएं आती थी और जो चंद्रास्वामी के आध्यात्मिक प्रभामंडल में बहुत भीतर तक शरीक थे। मनमोहन सिंह महान अर्थशास्त्री हैं इससे किसको ऐतराज हो सकता है लेकिन अगर अर्थशास्त्री होना ही प्रधानमंत्री होने की कसौटी है तो अपने अमर्त्य सेन ने किसी का क्या बिगाडा है। उन्हें तो अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार भी मिल चुका है। रही मनमोहन सिंह ध्दारा लाई गई आर्थिक उदारवाद की बात तो इसका डंका पीटना कृपया बंद कर देना चाहिए। भारत अपने आप में इतनी बडी लेकिन बिखरी हुई आर्थिक महाशक्ति है कि दुनिया के बाजार में हमारे सिर्फ उतरने की देर थी। अमेरिका में तो यह बाजारवाद वहां के अर्थतंत्र का मूल सिध्दांत है और मनमोहन सिंह ने पूरी जिंदगी अमेरिका में विश्व बैंक से लेकर अंर्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष में नौकरियां की है और उन्हें पंचायती नही, कॉरपोरेट अर्थव्यवस्था ही समझ में आती है। इसी लिए अपने देश में ऐसा हो रहा है कि अंबानी कुटुंब दुनिया के सबसे बडे रहीशों में शामिल हो गया है और खुद मनमोहन सिंह जिस गांव के रहने वाले है उसकी ग्राम पंचायत के पास अपना भवन बनाने तक का पैसा नही है।

बात राहुल गांधी की हो रही थी। खुद उनकी माताश्री कह चुकी है कि राहुल की मंत्री बनने में कोई दिलचस्पी नही है और वे सिर्फ पार्टी का काम करना चाहते हैं। जाहिर है कि सोनिया गांधी अपने लाडले को प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार कर रही हैं और इसके लिए जरूरी प्रशासनिक अनुभव दिलवाने की तैयारी करना चाहती थी। राहुल गांधी ने मेहरबानी की जो अपनी मां से कह दिया कि वे मंत्री नही बनना चाहते। वैसे ही वे सुपर प्रधानमंत्री है इसलिए मंत्री और वह भी राज्य मंत्री बन कर वे क्या कर लेगें। राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन जाएं तो उसमें अपने को क्या ऐतराज होने वाला है? जब देवगौड़ा बन गए थे और इंद्रकुमार गुजराल बने थे तो किसी ने उनका क्या बिगाड लिया था? उनकी किस्मत उन्हें उठा कर लाई थी और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जब तक किस्मत में लिखा था तब तक के लिए बिठा कर चली गई थी। इन दोनों को देश ने कभी नही चुना था। इससे ज्यादा तो प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी गुलजारी लाल नंदा की थी जो तीन बार देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री रह चुके थे और इसके बावजूद दिल्ली की डिफेंस कॉलोनी की जिस बरसाती में वे किराए पर रहते थे वहां से मकान मालिक ने उनका सामान उठा कर फेंक दिया था और इलाके के थाने में इस घटना की रपट भी नही लिखी थी।

विरासत और वंश का जहां तक सवाल है तो हम राहुल गांधी को ही निशाने पर लेकर क्यों चलते हैं? खुद अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह मध्य प्रदेश में मंत्री रह चुके हैं और इस समय कांग्रेस की ताकतवर चुनाव अभियान समिति के मुखिया है वे अगर श्री सिंह के बेटे नही होते तो क्या उन्हें यह सम्मान और पद नसीब होता? प्रणब मुखर्जी के बारे में तो ये कहा जा सकता है कि उन्होने अपनी किसी संतान को राजनीति में नही उतारा। उनके बेटों और बडी बेटी का तो नाम भी किसी को नही पता। छोटी बेटी शास्त्रीय नृत्य में अपनी मेहनत से नाम कर चुकी है और पूरी दुनिया में घूमती रही है। हमारे देश का समाज अब भी मानसिकता के लिहाज से नेता नही, नायक या राजा खोजता है। हाल के वर्षो में दलित चेतना का जिस तरह उत्थान हुआ है उसे देखते हुए अब यह हालत बदलती जा रही है, लेकिन आप अगर गौर करें तो भारत में दलित चेतना का साक्षात प्रतीक मानी जाने वाली मायावती का रवैया क्या खुद किसी महारानी से कम है?

जैसे सबको यह आपत्तिा है कि राहुल गांधी को सिर्फ उनके राहुल गांधी होने के कारण प्रधानमंत्री नही बना देना चाहिए वैसे ही उन्हें अपने आप से सवाल करना चाहिए कि उनका नाम और वंश का नाम उनकी अयोग्यता क्यो साबित करना चाहिए? उनके पिता राजीव को इस देश ने असाधारण बहुमत देकर प्रधानमंत्री बनाया था लेकिन एक ही कार्यकाल के बाद कांग्रेस की हालत खराब हो गई और सच पुछिए तो अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी की जो दशा हुई थी उसमें नरसिंह राव अगर झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को आर के आनंद और चंद्रास्वामी के तत्वाधान में मोटी रकम नही खिलाते और दुश्मन पार्टी के नेताओं को भी मंत्री का दर्जा नए-नए पद ग़ढ कर नही देते तो कांग्रेस की वह सरकार भी पुरे समय चलने वाली नही थी। इसी सरकार में प्रणब मुखर्जी का पूरा पुर्नवास हुआ था और अर्जुन सिंह को पार्टी से निकल कर अपनी एक कागजी पार्टी बनानी पडी थी और जल्दी ही वे वापस कांग्रेस में आ गए उनकी वापसी की भूमिका भी प्रणब मुखर्जी ने तैयार की थी। इन दोनों राजनैतिक महारथियों की इस ऐतिहासिक बैठक का एक गवाह मैं भी हुं। यह बैठक प्रणब मुखर्जी की सखी और तकनीकी तौर पर उस योजना आयोग में उनकी अफसर अमिता पॉल के घर हुई थी। यह अमिता पॉल दिल्ली के भूतपूर्व पुलिस कमिश्नर कृष्णकांत पॉल की पत्नी हैं और ये वही पॉल साहब हैं जिन्होनें बाद में अपने बेटे की पोल खुलने से दुखी हो कर किसी और बहाने से मुझे तिहाड जेल पहुंचा दिया था।

राहुल गांधी इस समय अपने पुज्य पिता की शैली में दुनिया को जानने और समझने का पूरा अभ्यास कर रहे हैं। वे गरीबों की झोपडी में सोते हैं और उन्हीं के साथ खाना खाते हैं। बहन मायावती का भरोसा करें तो इसके बाद वे दिल्ली आ कर अपने बाथरुम में किसी खास साबुन से नहाते भी हैं ताकि उनकी शुध्दि हो जाए। मायावती अगर इस साबुन का नाम भी घोषित कर देतीं तो कम्पनी का विज्ञापन का खर्चा बच जाता और हो सकता है यह पैसा पार्टी फंड में काम आ जाता। अब राहुल गांधी को इस साबुन का मॉडल बनने के बारे में विचार करना चाहिए। यह कहानियां तो आती जाती रहेगीं लेकिन असली सवाल राहुल गांधी की राजनैतिक पात्रता को ले कर किया जा रहा है और यह सवाल अपने आप में निपट आपत्तिाजनक है।

देश का प्रधानमंत्री मतदाता चुनते हैं और यह सवाल मतदाता की सामुदायिक बुध्दि पर संदेह करने जैसा है। हालांकि यह पुरानी बात हो गई मगर अब भी पुछा जा सकता है कि राजीव गांधी अगर अपनी मां ही हत्या के बाद चुनाव में नही उतरते तो भी क्या वैसा प्रचंड और ऐतिहासिक बहुमत ला पाते जैसा उनके नाम पर दर्ज है। युवा पीढी में अकेले राहुल नही है ज्योतिरादित्य सिंधिया भी है, मिलिंद देवडा भी हैं और सचिन पायलट भी हैं। पिछले मंत्रीमंडल विस्तार में बेचारे सचिन पायलट का नाम सिर्फ इसलिए कट गया क्योंकि वे कश्मीरी नेता फारुख अबदुला के दामाद भी हैं और फारुख अबदुला और सोनिया गांधी के बीच कोई खास घनिष्ठ रिश्ता नही चल रहा है, होने को ज्योतिरादित्य सिंधिया की बहन भी कश्मीर के महाराजा कर्ण सिंह के परिवार की बहु है और सिंधिया के जीजाजी कांग्रेस छोड़ कर चले गए हैं। लेकिन गनीमत है कि राजनीति का गुणा भाग करने वालों को यह तथ्य याद नही आया। या फिर मध्य प्रदेश की राजनीति में संतुलन बिठाने के लिए ग्वालियर के राज कुमार को मंत्री मंडल में जगह दी गई। ज्योतिरादित्य नाकाबिल नही है लेकिन उन्हें सिर्फ समीकरणों के कारण मंत्री बनाया गया है। अगर योग्यता के आधार पर बनाना होता तो कब का बना दिया गया होता। राहुल गांधी की शिखर की दावेदारी पर ऐतराज भी नही करना चाहिए और ना सिर्फ आनुवांशिक आरक्षण की तर्ज पर उन्हें सिर्फ इसलिए प्रधानमंत्री बनाने की बात की जानी चाहिए कि वे उस वंश के वारिस हैं जिसने देश को अब तक चार प्रधानमंत्री दिए हैं। (शब्दार्थ)

काठमांडू और रायपुर की दूरी

सुप्रिया रॉय

देश की सबसे बडी अदालत में छत्तीसग़ढ में माओवादियों से जूझने के लिए राज्य सरकार द्वारा शुरू किए गए सल्वा जोडुम अभियान की निंदा की है और कहा है कि आतंकवादियों से निपटने के लिए किसी राज्य सरकार को यह हक नहीं दिया जा सकता कि वह निजी सेनाएं ख़डी कर दें। अदालती फैसलों पर बहस करने में खतरा बहुत होता है लेकिन सब जानते हैं कि सल्वा जोडुम अभियान छत्तीसग़ढ के नागरिकों का एक प्रतिरोध मंच है और चूंकि यह भला और एक मात्र विकल्प है, इसलिए रमन सिंह सरकार ने भी अपने साधनों और संसाधनों का सहारा इसे दिया है।

जिन लोगों ने छत्तीसग़ढ देखा है और खासतौर पर उसके सुदूर, सुरम्य और दुर्गम जंगलों तक गए हैं वे जानते हैं कि इन वनों में रहने वाले वनवासी और आदिवासी कितने आतंकित और असहाय हो चुके हैं। अचानक आधुनिकतम हथियारों से लैस माओवादियों का एक जत्था वहां आता है और पहले धमकी की भाषा में बात करता है और फिर वनों की हरियाली में खून का लाल रंग बिखेर कर चला जाता है। जनता के लिए जनता द्वारा जनसंघर्ष के बहाने जनता के वघ यह सिलसिला आपत्तिजनक भी है और शर्मनाक भी।

छत्तीसग़ढ तो क्या किसी भी राज्य के पास कितनी पुलिस और हथियार बंद फौज नहीं होती कि वह हर घाटी और हर जंगल में निगरानी रख सके और रखवाली कर सके। इसके लिए जो एक विकल्प उपलब्ध था वह यही था कि आम लोगों का सशक्तीकरण किया जाए, उनके मन से भय निकाला जाए और उन्हें हथियारों का जवाब देने के लिए हथियारों का ही कवच दिया जाए। बस्तर इलाके में बहुत सारे गांव इन माओवादी गुंडो की वजह से वीरान हो चुके हैं और उनके लिए सरकारी शिविर बनाए तो गए हैं लेकिन शिविर की जिंदगी एक तरह से जेल की जिंदगी होती है और वक्त पर मिलने वाला खाना और सुरक्षा का आश्वासन किसी को उनके घर जैसी नैसर्गिकता और सहजता नहीं दे सकती। सरकारें भी कब तक इन शिविरों पर सिर्फ इस लिए खर्चा करतीं रहेंगी क्योंकि उनके पास लडाई के विकल्प नहीं हैं।

यह एक शुभ संयोग है कि खुद केंद्रीय गृह मंत्रालय में सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से असहमति जाहिर की है और कहा है कि सल्वा जोडुम के नाम से जो संगठन बनाया गया है उसे रणवीर सेना या भुजवाहिनी सेना की तरह जमीदारों की जातीय सेना से बराबरी पर नहीं देखा जाना चाहिए। छत्तीसग़ढ चूंकि असल में बहुत सारे प्रदेशों का रास्ता है और यह एक नया प्रदेश है इसलिए यहां संसाधन कम होने स्वाभाविक हैं। छत्तीसग़ढ के चारों ओर आंध्र प्रदेश झारखंड, बिहार और उडीसा हैं जहां माओवाद अपनी ज़डें जमा चुका है। खासतौर पर आंध्र प्रदेश में जब से माओवादियो पर वहां की पुलिस ने हंटर चलाया है तब से वे छत्तीसग़ढ के वनों में जमा होने लगे हैं।

माओवाद कोई भारतीय विचार नहीं है। ऐसा नहीं है कि भारत के समाज में सब कुछ शुभ ही शुभ हो रहा हो। यहां भी शोषण है, जातीयों के नाम पर होने वाले भेदभाव हैं, सरकारी बाबुओं से लेकर सरकार के शिखर तक बिखरा भ्रष्टाचार है, एक सामाजिक असहायता है लेकिन इस सबसे निजात पाने के लिए हम विचारों और हिंसा को क्या आयात होने देंगे। जिन माओवादियों को भारत में आदर्श बनाने के लिए एक महापुरूष नहीं मिला वे कैसे हमारे समाज का चेहरा बदलेंगे और उनके दिए गए आदर्शो से देश में समता मूलक व्यवस्था कायम हो जाएगी। भ्

भारत सरकार ने अपनी ओर से माओवाद को भारतीय संर्दभों में शतुत्रता के दायरे से निकालने की पूरी कोशिश की है। कम लोग जानते है कि नेपाल में माओवादियों को राजनीति की मुख्य धारा में शामिल करने और आखिरकार सरकार बनाने की हैसियत तक पहुंचने में भारत सरकार के दूतों ने काफी बडी भूमिका निभाई है। भारत के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री के कई दूत नेपाल में पडे रहे और आखिरकार 7 मार्च 2008 को एक राजनैतिक सहमति बनी जिसके तहत चुनाव हुए और बूढ़े और बीमार गिरिजा प्रसाद कोइराला के नेतृत्व को अस्वीकार करके वहां के मतदाता ने माओवादियों को उनके पुराने हिंसक पापों के बावजूद खुला समर्थन दिया। जाहिर है कि पिछले लगभग ढाई सौ साल से राजा को भगवान मानने वाली प्रजा को भी बदलाव का एक बहाना और अवसर चाहिए था। यह अवसर उनके लिए कितना श्रेयस्कर होगा यह अभी से कौन कह सकता है। इतना जरूर है कि भारत सरकार छत्तीसग़ढ और दूसरे सात आठ राज्यों में बिखरे माओवादियों के जहरीले जाल को तोड़ने में मदद पाने की उम्मीद कर सकते हैं। आखिर वामपंथी दलों भी कह ही दिया है कि भारत के माओवादियों को नेपाल से प्रेरणा लेनी चाहिए।

बेहतर तो यह होता कि रमन सिंह नेपाल के शासक बनने जा रहे कामरेड प्रचंड को छत्तीसग़ढ आने का आमंत्रण भेजते और उन्ही से यह कहलवाते की छत्तीसग़ढ में मौजूद माओवादी गोलियों की बजाए वोटों का रास्ता चुनें और चूंकि चुनाव इस राज्य में होने ही वाले हैं। इसलिए यह विकल्प शायद उनकी समझ में आ भी जाता। यह जब होगा तब होगा और अगर कामरेड प्रचंड चाहेंगे तभी होगा। तब तक सल्वा जोडुम एक मात्र ऐसा विकल्प है जो माओवादियों की संगठित हिंसा के खिलाफ विकल्प देता है और असहाय नागरिकों को सहायता का आश्वासन भी देता है।

अपने देश में कभी हिंसा से सामाजिक या राजनैतिक परिवर्तन संभव नहीं हुए और यह बात खुद महान ांतिकारी सरदार भगत सिंह भी अपनी डायरी में मंजूर कर चुके हैं। माओवाद के नाम से हिंसा का जो नंगा नाच चल रहा है उससे सुलझने के लिए सल्वा जोडुम के अलावा अगर दूसरा कोई विकल्प दिखता हो तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए मगर सर्वोदय के बाद पहली बार अगर समाज मेंं हिंसा से मुक्ति के लिए सल्वा जोडुम के बहाने ही कोई रास्ता निकला है तो उसे सिर्फ इसलिए खारिज नहीं कर देना चाहिए क्योंकि किसी जज साहब को यह तरीका पसंद नहीं है। सिंध्दातों की लडाई सिध्दांतों से लडी जाती है और और बंदूक के जवाब में बंदूक ही चलाई जाती है। नागरिक मरें तो वह कानून है और मारें तो गुनाह, यह किसी न्यायशास्त्रों में होता हो तो हो लेकिन अपनी समझ में नहीं आने वाला। (शब्दार्थ)

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