शनिवार, 9 जुलाई 2011

स्वाभिमान टाईम्स का बंद होना


हिन्दी मीडिया इस समय सबसे संकट  के साथ साथ अविश्वसनीयता के बुरे दौर में है। कोई एक अखबार ,पत्रिका यकुछ भी शुरू होने से पहले यह कयास लगने लगता है कि कितने दिन? कितने दिन का यह यक्ष सवाल इतना खतरनाक ौर कताता है कि लंबे चौड़े दावों के साथ मीड़िया की सूरत बदलने का दावा करने वालों की ही सूरत कब लापता हो जाए यह पता नहीं चलता। स्वाभिमान टाईम्स भी समय से ज्यादा पत्रकारों का मारा हुआ पेपर दिख रहा है। चर्चा तो यह भी है कि एसपी के चेला एन साहा ने इसको बंद कराने का ही ठेका ले रखा था। अपना काम खत्म करते ही वे मुकेश कुमार की गोद में जा बैठे जो खुद एक चलता फिरता मीडिया हाउस है। नया अखबार शुरू करा के बंद कराने का तो इनका धंधा पुराना हो गया है।समय के साथ ही नहीं समय से भी पहले बदलने में माहिर मुकेश कुमार पिछले 10 साल से चैनलों को लाने और लुटिया डूबोने के कारोबार करने में जुटे है। एक साथ चैनल पेपर और साप्ताहिक पेपर लाकर धूम मचाने का सपना पाले एमके के साथ मिलकर साहा कौन सा तीर चलाते है यह तो समयही बताएगा मगर पेपरों को बंद रकाने में तेज साहा के उपर भी रविवार अक्षरभारत (बांग्ला) के बाद स्वाभिमान पर भी ताला जड़ने का सौभाग्य मिल ही गया। हे भगवान मीड़िया की रक्षा रकरो और बदनाम चेहरो से पत्रकारिता के दामन पर लग रहे लगातार दाग कलंक से रक्षा करे।यही हाल समय सारांश के संपादक कोई श्रीवास्तव ने किया । मुबंई में धूम धड़ाके साथ छपने वाला पेपर हमारा महानगर छह माह भी नहीं चल पाया।मालिको से ज्यादा पत्रकारो और पत्रकारिता के प्रति लोगों की उलटती नजर से पत्रकारों का हाल  भी बेहाल है।

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