गुरुवार, 7 जुलाई 2011

किताब लिखकर प्रोफेसर बनने का दौर


लेखक- गौतम चटर्जी 

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बात दिलचस्प है और इस तरफ हमने कभी ध्यान नहीं दिया। हमारे देश की समस्त भाषाओं को मिलाकर कुल जनसंख्या की चालीस प्रतिशत आबादी शिक्षित नहीं है और उसमें दस प्रतिशत आबादी भी लेखक नहीं है लेकिन आपको बताने के लिए हमारे पास एक रोचक तथ्य यह है कि देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की आबादी का शत-प्रतिशत हिस्सा आज लेखक बनता जा रहा है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियम के अनुसार यदि लेक्चरर को रीडर और फिर रीडर से प्रोफेसर बनना है तो उसके पास सम्बद्ध विषय की उसकी अपनी प्रकाशित पुस्तक होनी चाहिए। जितनी किताबें, उतनी जल्दी प्रमोशन। किताब नहीं तो योग्यता के बावजूद न लेक्चरर पद पर नियुक्ति सम्भव है न फिर पदोन्नति। इस नियम को पूरा करने के लिए पिछले करीब एक दशक से हर विद्यार्थी स्नातकोत्तर के बाद पीएचडी और नेट की परीक्षा उत्तीर्ण कर पहले किताब लिखने की कवायद कर रहा है और तब कहीं अध्यापन के लिए आवेदन कर रहा है। जो किसी विश्वविद्यालय में पहले से लेक्चरर पद पर नियुक्त हैं वे वर्षों से उसी पद पर बने हैं क्योंकि उनके पास अपनी लिखी कोई किताब नहीं है, इसलिए साक्षात्कार के बावजूद वे पदोन्नति से वंचित हैं। जो सीधे या क्रमिक साक्षात्कार से रीडर और प्रोफेसर बन रहे वे साक्षात्कार से पहले अपनी किताब लिख कर तैयार रख रहे या फिर साक्षात्कार की तिथि आते ही रातोरात बल्कि फौरन से पेशतर किताब छपवा कर मुस्तैद हैं।
विश्वविद्यालयों में पढ़ाये जाने वाले सभी विषयों में यूजीसी की यही अनिवार्यता है। इसलिए सभी विषयों में नियुक्ति और पदोन्नति की यही स्थिति है। नतीजा यह है कि जो लिख नहीं सकते वे लेखक हैं, प्रायः हर दूसरी किताब पूर्वप्रकाशित अन्य लेखकों की किताबों के संशोधित संस्करण हैं और किताबें इस कदर गलतियों से भरी हैं कि विद्यार्थी परेशान है कि आखिर वह किस किताब को पढ़ने के लिए चुने और किसे रिजेक्ट करे। इस सिरे से उस सिरे तक एक ही नजारा है। यहाँ हम फिलहाल हिन्दी में लिखी जा रही किताबों की बात कर रहे। इनमें पचास फीसदी किताबें पीएचडी थिसिस की अविकल प्रस्तुति हैं और उनचास फीसदी कूड़ा, यानी दस छपी किताबों के आधार पर तैयार की गई एक और किताब। सिर्फ एक फीसदी किताबें वे हैं जो उन लेखकों द्वारा लिखी गयी हैं जो प्रोफेसर न भी होते तो भी वे स्वाभाविक रूप से लिखते ही। तो इन अधिसंख्य प्रोफेसरों से चाहें तो हिन्दी के लेखक लिखना सीख सकते हैं। हाल में कई प्रोफेसरों की ऐसी किताबें सामने आयी हैं जिनमें पूर्वप्रकाशित अन्य प्रोफेसरों की किताबों की बहुशः अंश हैं। ये देखते-देखते लेक्चरर से रीडर और रीडर से प्रोफेसर बने हैं सिर्फ ऐसी किताबों की बदौलत। लगभग सभी विषयों में लिखी गयी कुछ आधार पुस्तकें हैं जिन पर ये जल्दबाज पुस्तकें सिरे से आश्रित और मुद्रित होती हैं। पत्रकारिता में कुछ अधिक हैं। इस क्षेत्र में हिन्दी में ऐसे प्रोफेसर हैं जो तीस से अधिक किताबें लिख चुके हैं।
सबसे दयनीय और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति मंचकला विषयों पर लिखी पुस्तकों की है। जैसे शास्त्रीय संगीत पर लिखी बाजार में उपलब्ध किताबें। इस गम्भीर विषय पर छपी अगम्भीर पुस्तकों की बहुतायत हास्य रस का उत्तर आधुनिक उदाहरण है। एक प्रकाशित उदाहरण से बात शुरू करें। 'हरि महाराज के बेटे पण्डित किशन महाराज संत स्वभाव के व्यक्ति और कूटताल के विशेषज्ञ थे। उनका निधन 1966 में हुआ था।'  यह अंश है अमलदाश शर्मा की पुस्तक 'विश्व संगीत का इतिहास'  का जिसे पाठक एक अर्से से पढ़ते आ रहे हैं। यहाँ तक कि एक साल पहले (5 अप्रैल 2008) दिवंगत पण्डित किशन महाराज की नजरों से भी यह किताब गुजरी थी। दिलचस्प यह भी है कि इस पुस्तक की भूमिका सरोदशिल्पी उस्ताद अमजद अली खाँ ने लिखी है।
आगे कहने को और भी बहुत कुछ दिलचस्प है। दिलचस्प और दुर्भाग्यपूर्ण। खेदजनक है कि शास्त्रीय संगीत पर लिखने वाले शास्त्रीय संगीत से ही जुड़े लोग हैं लेकिन इरादा यदि गलत हो तो अच्छा-भला काम कितना नुकसानदेह हो सकता है इसे हम इन तथ्यों से समझेंगे। शास्त्रीय संगीत पर पिछले एक दशक से देश में और हिन्दी में हर साल सैकड़ों किताबें छप रही हैं यह इस दौर का सुखद आश्चर्य है। लेकिन दुःखद है कि फर्जीपन इन प्रकाशित हो रही और गेटअप में महत्वपूर्ण समझी जा रही पुस्तकों का आम चेहरा हो गया है। इन पुस्तकों से अनजाने ही ढेरों पाठक और विद्यार्थी अनवरत गुजर रहे।
ऐसा नहीं कि यह सिर्फ हिन्दी में ही हो रहा। आम बांग्ला पाठकों में बहुपठित और सुपरिचित एक पुस्तक के अनुसार, किशन महाराज कण्ठे महाराज की बहन के बेटे हैं। सभी जानते हैं कि किशन महाराज हरि महाराज के बेटे थे। उनसे ही जुड़ा एक और उदाहरण देखें। अंग्रेजी के प्रसिद्ध पत्रकार रहे राघव मेनन, जिन्होंने कुमार गन्धर्व पर किताब 'ए म्युजिकल जर्नी विथ कुमार गन्धर्व'  लिखकर ख्याति प्राप्त की थी, की मृत्यु के बाद उनकी एक और पुस्तक आयी 'दी पेंगुइन डिक्शनरी ऑफ इण्डियन क्लासिकल म्युजिक'। इसमें अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर 'के' के अन्तर्गत कण्ठे महाराज का परिचय दिया गया है जो हम जानते हैं कि हरि महाराज के बड़े भाई थे। परिचय में बताया गया है कि वे (कण्ठे महाराज) वही हैं जो प्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज और किशन महाराज के पिता थे।
हिन्दी, बांग्ला और अंग्रेजी में ऐसे ही असंख्य उदाहरण मिल जायेंगे। वर्तमान संगीतशास्त्रियों में अशोक रानाडे वरिष्ठ हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक 'ए कन्साइज डिक्शनरी ऑफ हिन्दुस्तानी म्युजिक'  में आलाप को प्रस्तार कहा है और मुनि मतंग का हवाला देते हुए देशी संगीत को मार्गी संगीत का विलोम या कन्ट्रास्ट बताया है। नेशनल बुक ट्रस्ट ने 1997 में उनकी पुस्तक प्रकाशित की थी-हिन्दुस्तानी म्युजिक। इसमें ग्रन्थ और ग्रन्थकार सम्बन्धी कई जानकारियाँ गलत हैं। जैसे उन्होंने पार्श्वदेव के संगीतग्रन्थ 'संगीत समयसार'  को 'संगीत सार'  और ग्रन्थ 'संगीतोपनिषद्सारोद्धार'  की रचयिता सुधाकलश को सुधाकर बताया है। आचार्य पार्श्वदेव के ग्रन्थ 'संगीत समयसार' पर दिल्ली में रहकर आचार्य बृहस्पति (कैलाश चन्द्र बृहस्पति) ने अपने जीवनकाल में जो काम किया था वह पुस्तक उनके अवर्तमान में भारतीय ज्ञानपीठ ने छापी है लेकिन कवर पर पार्श्वदेव की जगह पार्श्वनाथ छाप दिया है जिससे जैनमुनि का भ्रम होता है।
अद्वैत आश्रम कोलकाता से स्वामी हर्षानन्द की किताब 'ऐन इन्ट्रोडक्शन टु हिन्दू कल्चर'  के कई संस्करण निकल चुके हैं जिससे पता चलता है कि इस किताब को बेतरह पढ़ा जा रहा लेकिन जोड़ा यह जाना चाहिए कि संस्करण छप रहे 'अशुद्धियों के साथ'। अभी हाल के संस्करण में बताया गया है कि भरत मुनि के ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' पर लिखी अभिनवगुप्त की टीका भी अब हमें प्राप्त हुई है 'लेकिन महज कुछ अंश ही मिले हैं'। स्वामी जी को जानना चाहिए कि सैंतीस अध्यायों की पूरी टीका हमें मिले कुल पचास साल हो गये। चार भागों में पचास के दशक में बड़ौदा से प्रकाशित इस टीका पर अब तक सौ से ज्यादा काम हो चुके हैं।
सिरे से गलत सूचनाएँ देतीं इन बेसुरी किताबों की ओर अगर संगीतसमीक्षकों और संगीतसचेतकों का ध्यान नहीं है और आसानी से समझा जाना चाहिए कि शास्त्रीय संगीत आज भी शिक्षितों के बहुसंख्य अभिजात्य वर्ग के लिए एक अजूबा है जिसे समझने का दावा हर कोई करता है। यह स्थिति इस ओर भी इशारा करती है कि शास्त्रीय संगीत के अधिकारी समीक्षक आज कितने कम होते गये हैं, खासकर हिन्दी में, जिनकी कॉपी को देखे भी तो कौन! वह जो लिखेगा वह सही समझा जायेगा और छप जायेगा। बहरहाल, इन किताबों को लिखने वालों का एक तबका वह है जिनकी शास्त्रीय संगीत में रुचि और समाज में प्रतिष्ठा है। जैसा कि उपरोक्त उदाहरण बताते हैं। दूसरा तबका विश्वविद्यालयों के शिक्षकों का है जिन्हें जल्दी से जल्दी लेक्चरर, लेक्चरर से रीडर और फिर रीडर से प्रोफेसर हो जाना है, क्योंकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियम के अनुसार नियुक्ति के लिए और फिर पदोन्नति के लिए किताब आवश्यक है। बाकी सारी शिक्षा अर्हताएँ उज्ज्वल हैं लेकिन किताब नहीं छपी तो नियुक्ति नहीं होगी। अन्य विषयों की तरह मंच या प्रदर्शनकारी कलाओं के शिक्षकों के लिए यह अनिवार्यता तार्किक नहीं, इस पर अविलम्ब पुनर्विचार होना चाहिए।
तो लिहाजा इस अनिवार्यता की बिना पर इनकी किताबें भी रातोंरात छपकर आ जा रहीं। देश के कुछ प्रकाशक ऐसे अभ्यर्थियों को एक रात में लेखक बना कर उनकी पुस्तकें छापने के धंधे में कामयाब होते गये हैं। आप जानिए कि इन किताबों और लेखकों में अपनी कोई मौलिक दृष्टि, अनुभवचेतना और नयी समझ नहीं होती बल्कि दूसरे लेखकों की पुस्तकों को ही थोड़े हेरफेर से बस दोहरा दिया गया होता है, जाहिर है उन्हीं अशुद्धियों के साथ, या फिर शोध को पुस्तक में बदल दिया गया होता है। अपनी पुस्तक 'संगीत स्वरित'  में अपने बारे में लेखक डाँ. रमाकान्त द्विवेदी बताते हैं कि उन्होंने संगीत की शिक्षा पद्मश्री सियाराम तिवारी, पद्मश्री बलवन्त राय भट्ट, उस्ताद सईदुद्दीन डागर, प्रो. प्रेमलता शर्मा आदि विद्वानों से प्राप्त की है और किताब में अशुद्धियाँ इतनी है कि प्रूफ भी शरमा जाये। जैसे मणिपुर चक्र और विशुद्धि चक्र को क्रमशः मणिपूर्ण चक्र और विशुद्ध चक्र लिखा गया है। एक बार फिर किशन महाराज। इसमें उन्होंने किशन महाराज और अनोखेलाल मिश्र को गुदई महाराज के पारिवारिक घराने का शिष्य बताया है।
यूजीसी की इस अनिवार्यता को देखते हुए अब शोधविद्यार्थी शोध से पहले किताब लिख रहे। जिन्होंने कभी पढ़ाई में रुचि नहीं ली और संगीतसाधना करते रहे वे अब प्रोफेसर पद के अगले साक्षात्कार से पहले किताब के नाम पर कुछ भी लिख लेने की साधना कर तैयार हैं कि साक्षात्कार हो और वे छठे वेतन आयोग के अनुसार प्रोफेसर बन जायें। विश्वविद्यालयों में आज हर संगीतशिक्षक लेखक है। भले ही लिखने का सुर और सम अगले जन्म में लगे। समाज को अब लेखकों की ऐसी फौज को भी स्वीकार कर लेना होगा।
एक तबका उनका भी है जिनकी किताबें हिन्दीभाषी प्रदेशों के लगभग सभी संगीत विद्यालयों-विश्वविद्यालयों में चालीस-पचास साल से चल रहीं। ये सिर्फ गलत जानकारियों का पुलिन्दा हैं। इनमें किसी में कुमार गन्धर्व की जन्मतिथि गलत मिलेगी तो कहीं अमीर खाँ को किराना घराने का गायक बताया गया होगा, तो कहीं काले खाँ को कहा गया होगा कि वे बड़े गुलाम अली खाँ के पिता थे। इलाहाबाद और हाथरस से छपी बहुत सी किताबों का यही आलम है। हाथरस से छपी एक किताब संगीत के विद्यार्थियों के बीच एक अरसे से मशहूर है, वे इसे जरूरी तौर पर अपने साथ रखते हैं, सन्दर्भग्रन्थ की तरह। किताब है वसन्त की संगीत विशारद। इसके हर पाँचवें पर दी गई सूचनाएँ गलत हैं। सिद्धेश्वरी देवी को छोटे रामदास की शिष्या बताया गया है जो सिया मिश्र की शिष्या थीं तो एक बार फिर, किशन महाराज को कण्ठे महाराज की बहन का बेटा और अनोखेलाल मिश्र को भैरो सहाय का शिष्य बताया गया है। पण्डित अनोखेलाल जी पण्डित राम सहाय के शिष्य भैरो प्रसाद के शिष्य थे जो साधना में ना धिं धिं ना के जादूगर माने गये।
ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि बड़े स्तर पर पढ़ी-पढ़ाई जा रही इन गलतियों की ओर ध्यान दिलाने का जिम्मा और जोखिम आखिर कौन उठायेगा? पाठकों और विद्यार्थियों के साथ हो रही इस धारावाहिक हिंसा के विरुद्ध उनके पक्ष में पहल तो यह होना चाहिए कि ऐसी बेसुरी किताबों को शिक्षा परिसरों से बेदखल कर अनुदान आयोग अपनी प्राचीन नियमावलियों पर पुनर्विचार करे और शिक्षक और कलाकारों का गम्भीर समवाय अच्छी और गम्भीर पुस्तकों की एक ऐन्थोलॉजी तैयार करे। उम्मीद करें कि कपिल सिब्बल दौर में एक पहल ऐसी भी होगी।

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