बुधवार, 13 जुलाई 2011

आम आदमी के नहीं सत्ता के साथ हैं पत्रकार


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कांग्रेस मुख्यालय में जनार्दन द्विवेदी को जूता दिखाने के मामले में पुलिस,  नेता और पत्रकारों की असलियत एक बार फिर उजागर हो गई। इस मामले से ही आसानी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आज लोकतंत्र की हालत खराब क्यों है? इस मामले में किस ने क्या भूमिका निभाई और क्या निभानी चाहिए थी? पुलिस, नेता और पत्रकारों की भूमिका पर सवालिया निशान लग गया है। राजस्थान के सुनील कुमार ने पहले द्विवेदी से कोई सवाल पूछा। उसके बाद वह द्विवेदी के पास गया और जूता निकाल कर उनको दिखाने लगा। द्विवेदी इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यकत करते इसके पहले ही एक पत्रकार आगे बढ़ा उसने सुनील को पकड़ा और उसकी पिटाई करने लगा,  यह देख कर कुछ और पत्रकार भी सुनील को पीटने लगे। न्यूज चैनलों में यह दिखाया गया कि सुनील को पीटने वालों में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी शामिल थे।
किसी को भी किसी की पिटाई करने का कोई हक नहीं और साथ ही यह अपराध भी है। ऐसे में कुछ पत्रकारों द्वारा की गई यह हरकत शर्मनाक तो है ही अपराध भी है। ऐसे करने वाले पत्रकार कहलाने के हकदार नहीं है। ये पत्रकार के रूप में नेताओं के चमचे है और अपने आका नेता को खुश करने की लिए इन कथित पत्रकारों ने वो हरकत की जो नेता के चेले करते है। पत्रकार होते तो सुनील कुमार से बात कर ये पता लगाने की कोशिश करते कि उसने जूता दिखा कर विरोध प्रकट करने जैसा कदम क्यों और किन हालात में उठाया। बाकी सुनील की हरकत पर कार्रवाई करने का फैसला उस नेता और पुलिस पर छोड़ देते। लेकिन पत्रकारों ने तो खुद ही कानून अपने हाथों में ले लिया। ऐसा सिर्फ वे कथित पत्रकार करते है जो अपने स्वार्थपूर्ति के लिए नेताओं के तलुए चाटते हैं। द्विवेदी जो कि वरिष्ठ नेता है,  ने भी सुनील को पीटने वालों को रोका नही। दूसरी और दिग्विजय तो पिटाई करने वालों में शामिल दिखाए गए।
पुलिस की भूमिका :  पुलिस का कहना है कि पुलिस नियंत्रण कक्ष को मिली सूचना के आधार पर सुनील को सीआरपीसी की धारा 107/151 के तहत गिरफतार किया गया। धारा 151 के अनुसार पुलिस संज्ञेय अपराध को होने से रोकने के लिए एहतियातन गिरफ्तार कर सकती है। शांति भंग करने पर धारा 107 लगाई जाती है। लेकिन सवाल यह है कि सुनील ने कोई संज्ञेय अपराध तो किया नहीं था। ऐसे मामलों को सामान्यत:  पुलिस अंसज्ञेय अपराध की श्रेणी में दर्ज करके उसकी रिपोर्ट मजिस्‍ट्रेट के सामने पेश करती। मजिस्‍ट्रेट उस पर कार्रवाई करता है। असंज्ञेय अपराध के मामले में पुलिस अपने आप गिरफ्तार नहीं करती। लेकिन इस मामले में पुलिस ने अपने आका नेताओं को खुश करने के लिए बिना नेता से शिकायत लिए अपने आप ही धारा 107/151 के तहत कार्रवाई का तरीका अपनाया ताकि सुनील को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा सके। एक ओर तो पुलिस आम आदमी की रिपोर्ट तक आसानी से दर्ज नहीं करती दूसरी ओर मामला सत्ताधारी नेता का हो तो 100 नंबर पर मिली सूचना के आधार पर ही कार्रवाई कर देती है।
पुलिस अगर स्वतंत्र, निष्पक्ष और ईमानदार होती तो कानून का पालन करती और उन कथित पत्रकारों और नेताओं को भी गिरफ्तार करती जिन्होंने ने सुनील को पीटने का अपराध किया। न्यूज चैनलों पर देश और पूरी दुनिया ने उनको सुनील की पिटाई करते देखा। पिटाई करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए इससे बड़ा और स्पष्ट सबूत और क्या हो सकता है। लेकिन पुलिस ने उसे अनदेखा कर सिर्फ सुनील के खिलाफ एकतरफा कार्रवाई कर दी। पुलिस को द्विवेदी से शिकायत लेकर आईपीसी की असंज्ञेय अपराध की धारा के तहत मामला दर्ज करना चाहिए था। तब कोर्ट उस मामले में कार्रवाई करता। कोर्ट में शिकायतकर्ता द्विवेदी को भी जाना पड़ता। सत्ताधारियों के मन मुताबिक पुलिस कार्रवाई करती है। इसलिए कोई भी दल सत्ता में हो वह पुलिस को स्वतंत्र नहीं रखना चाहता है।
नेताओं की भूमिका : कांग्रेस ने बिना जांच पड़ताल तुरन्त सुनील को आरएसएस का आदमी बता दिया। पत्रकार जरनैल सिंह ने गृह मंत्री पर जूता फेंका था।  सिख दंगों के आरोपियों को टिकट देने के विरोध में उसने जूता फेंका था। उस समय सिखों की वोट की खातिर कांग्रेस ने किसी संगठन पर कोई आरोप नहीं लगाया बल्कि दो नेताओं के टिकट काट दिए। भारत में नेताओं पर जूते फेंकने का सिलसिला तब से जारी है। किसी संगठन पर आरोप लगा देने या नेताओं द्वारा सिर्फ ऐसी घटना की निन्दा कर देने से समस्या समाप्त नहीं होने वाली। सभी दलों के नेताओं को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। संसद और विधान सभाओं में जूतम पैजार,  मारपीट और तोड़फोड़ तक की हरकतें करने वाले नेताओं द्वारा इस तरह के मामलों की निन्दा करना हास्यास्पद और दिखावा है। भ्रष्ट नेताओं के कारण लोगों के मन में उनके लिए गुस्सा भर गया है। इस लिए सुनील जैसा आम आदमी ही नहीं पत्रकार भी अपना गुस्सा प्रकट करने के लिए जूते का सहारा ले रहा है। इसके लिए नेता जिम्मेदार हैं। नेताओं को इन घटनाओं से सबक लेकर अपना आचरण,  व्यवहार और चरित्र सुधार लेना चाहिए। क्‍योंकि जैसा राजा वैसी प्रजा होती है। नेता ईमानदार होंगे तभी लोग उनकी इज्जत करेंगे।

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