गुरुवार, 28 जुलाई 2011

फिर याद किए गए उदयन



आज उदयन होते तो क्या करते

नई पीढ़ी के पत्रकारों और पाठकों के लिए उदयन शर्मा को जानना ज़रूरी है, क्योंकि ये दोनों वर्ग आज पत्रकारिता के उस स्वरूप से रूबरू हो रहे हैं, जहां स्थापित मूल्यों में क्षरण देखने को मिल रहा है. उद्देश्य में भटकाव और विचलन की स्थिति है. युवा वर्ग के साथ ही वह पीढ़ी भी, जिसने कभी रविवार और उदयन शर्मा के धारदार लेखन को पढ़ा, देखा या उसके बारे में जाना है, पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नज़र नहीं आ रही है. ऐसे माहौल में स्वर्गीय उदयन शर्मा के 63वें जन्मदिन के मौके पर जब उनके साथ काम कर चुके पत्रकार अपनी राय, अपने अनुभव और मीडिया के सामने नई चुनौतियों के बारे में अपनी बात नई पीढ़ी के साथ साझा करते हैं तो पत्रकारिता के सुनहरे अतीत और वर्तमान हालत को समझने में मदद मिलती है. उदयन शर्मा फाउंडेशन ट्रस्ट की ओर से पिछले दस सालों से एक गोष्ठी का आयोजन किया जाता रहा है. इस बार भी 11 जुलाई को (उदयन शर्मा के जन्मदिन के मौक़े पर) दिल्ली में एक आयोजन हुआ, जिसमें दिग्गज पत्रकार, संपादक शामिल हुए. इस आयोजन का नाम था संवाद और विषय था भ्रष्टाचार का मुद्दा और मीडिया की भूमिका. दरअसल, यह विषय सामयिक था, साथ ही इसने खुद मीडिया के लिए भी आत्मचिंतन का एक मौक़ा दिया. यह मौका तब और अब की पत्रकारिता में फर्क़ को भी समझने का था.
इस सारी चर्चा से यह तो समझ में आता है कि वर्तमान समय के पत्रकार और संपादक पत्रकारिता की वर्तमान समस्याओं एवं चुनौतियों से चिंतित तो हैं, लेकिन यह दु:ख भी होता है कि इन समस्याओं एवं चुनौतियों से निपटने के लिए वे कोई रोडमैप नहीं बना पाते हैं. सारी चिंताएं केवल चर्चा तक ही सीमित रह जाती हैं. खुद को मुख्य धारा का मीडिया मानने वाले पत्रकार और संपादक भी केवल समस्याओं का ज़िक्र करके रह जाते हैं.
चर्चा की शुरुआत करते हुए चौथी दुनिया के संपादक संतोष भारतीय ने कहा कि आज आचरण में जिस तरह का भटकाव है, विचलन है, वही भ्रष्टाचार है. आज वैचारिक भ्रष्टाचार और राजनीतिक भ्रष्टाचार ही सभी तरह के भ्रष्टाचार का जनक है और ऐसे माहौल में मीडिया अपने दायित्व को पूरा नहीं कर रहा है. ज़ाहिर है, एक पत्रकार के रूप में स्टिंग ऑपरेशन, टेलीफोन पर बातचीत और घोटालों पर एक्सक्लूसिव स्टोरी के जरिए भ्रष्टाचार से नहीं लड़ा जा सकता है. इनका एक व़क्त था. इनका यह योगदान भी है कि आज देश में भ्रष्टाचार को लेकर इतनी जागरूकता बढ़ी है, लेकिन अब इसका असर खत्म हो गया है, क्योंकि अब जागरूकता अभियान चलाने का कोई मतलब नहीं रह गया है. जनता जागरूक हो चुकी है. अब भ्रष्टाचार से लड़ने का व़क्त आया है. इसलिए अगर भ्रष्टाचार एक आचरण है तो इसके लिए मीडिया को वैचारिक युद्ध ही करना पड़ेगा. मीडिया को शक्तिशाली बनाना पड़ेगा. किसी चैनल या अ़खबार को नहीं, बल्कि पूरे मीडिया को शक्तिशाली बनाना ज़रूरी है. इस मौक़े पर संतोष भारतीय पत्रकारिता से जुड़े चंद सवाल उठाते हैं. मसलन, वह पूछते हैं कि मीडिया ने इंवेस्टिगेशन करना बंद क्यों कर दिया है, ज़िम्मेदारी लेना बंद क्यों कर दिया है, ग़लती करने के बाद मा़फी मांगना क्यों बंद कर दिया है, मीडिया के एजेंडे से ग़रीब, दलित, वंचित, अल्पसंख्यक और वे सब जो आवाज़ नहीं उठा सकते, ग़ायब क्यों हो गए हैं? विडंबना यह है कि हमारे बीच के कई राजनीतिक संपादकों और कई राजनीतिक संवाददाताओं का चेहरा पार्टी कार्यकर्ताओं जैसा दिखने लगता है. कई लीडिंग नेशनल टीवी चैनल और पत्र-पत्रिकाएं राजनीतिक दलों के मुखपत्र की तरह बर्ताव करते हैं. ग़ौरतलब है कि संतोष भारतीय और उदयन शर्मा ने एक साथ रविवार में रहते हुए पत्रकारिता के नए प्रतिमान स्थापित किए थे. आज जब संतोष भारतीय यह कहते हैं कि अब तो हम (मीडिया) पर भी आरोप लग रहे हैं तो असल में यह बात पत्रकारिता के दो दौरों के उद्देश्य और सरोकारों के बीच के अंतर को ज़ाहिर करती है. स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर ने मीडिया और समाज के बीच के सोशल कांट्रैक्ट का हवाला देते हुए कहा कि मीडिया को अपना काम करते समय इस सोशल कांट्रैक्ट का ख्याल रखना चाहिए. जबकि हिंदुस्तान हिंदी दैनिक के संपादक शशिशेखर ने मीडिया के कॉरपोरेटाइजेशन और इसकी वजह से आने वाली समस्याओं का ज़िक्र किया, साथ ही इस पेशे में नए एवं टैलेंटेड लोगों की कमी का भी ज़िक्र किया. पुण्य प्रसून वाजपेयी ने नई आर्थिक नीतियों को भ्रष्टाचार की वजह बताया और सीधे-सीधे यह कहकर प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा कर दिया कि आरटीआई के ज़रिए यह जानने की ज़रूरत है कि रोज-रोज पीएमओ में उनसे मिलने कौन-कौन लोग आते हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ. एस वाई कुरैशी ज़रूर मीडिया की पीठ थपथपाते हुए इसे अपना सहयोगी क़रार देते हैं, लेकिन यह सलाह भी देते हैं कि मीडिया को भी खुद मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट बनाना चाहिए, जबकि सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी मीडिया के लिए सेल्फ रेगुलेशन की वकालत करती हैं. बहरहाल, इस सारी चर्चा से यह तो समझ में आता है कि वर्तमान समय के पत्रकार और संपादक पत्रकारिता की वर्तमान समस्याओं एवं चुनौतियों से चिंतित तो हैं, लेकिन यह दु:ख भी होता है कि इन समस्याओं एवं चुनौतियों से निपटने के लिए वे कोई रोडमैप नहीं बना पाते हैं. सारी चिंताएं केवल चर्चा तक ही सीमित रह जाती हैं. खुद को मुख्य धारा का मीडिया मानने वाले पत्रकार और संपादक भी केवल समस्याओं का ज़िक्र करके रह जाते हैं. वे यह नहीं बताते हैं कि आखिर इन समस्याओं से निपटना कैसे है. जो लोग कुछ उपाय बताते भी हैं, उन पर अमल हो पाएगा, कहना मुश्किल है. मसलन, संतोष भारतीय कहते हैं कि एक एक्सक्लूसिव स्टोरी पर सभी मीडिया हाउसों को फॉलोअप स्टोरी करनी चाहिए, ताकि भ्रष्टाचार और शोषण के खिला़फ लड़ाई मज़बूत हो सके. ज़ाहिर है, यह एक नेक सलाह है, लेकिन क्या इस पर अमल भी हो पाएगा?

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