गुरुवार, 7 जुलाई 2011

पत्रकारों के ख़िलाफ़ मालिकों का जेहाद!

Thursday, 07 July 2011 11:51 भूपेन सिंह
भड़ास4मीडिया - लाइफस्टाइल
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भूपेन सिंहअख़बार कर्मियों की तनख़्वाह निर्धारित करने के लिए बने छठे वेज बोर्ड की सिफ़ारिशों को मालिक लॉबी किसी हालत में लागू नहीं होने देना चाहती. अख़बार मालिकों की संस्था इंडियन न्यूज़ पेपर्स सोसायटी (आइएनएस) जस्टिस मजीठिया कमेटी की रिपोर्ट का मखौल उड़ाने में जुटी है. अपने कुतर्कों को सही ठहराने के लिए उसने अख़बारों में लेख छापकर और विज्ञापन देकर सरकार पर दबाव बनाने की मुहिम छेड़ी हुई है.

इस दुष्प्रचार में मालिक अपनी मुनाफ़ाखोरी को छुपाने के लिए फ्री प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे शब्दों की आड़ ले रहे हैं. ऐसे हालात में मालिकों के मनमानेपन और पैसे की ताक़त के आगे बचे-खुचे पत्रकार संगठन भी अप्रासंगिक नज़र आ रहे हैं. भारतीय समाचार माध्यमों के विस्तार और अंधाधुंध व्यवसायीकरण ने कई चुनौतियां खड़ी की हैं. बाज़ार की मार की वजह से ख़बरें सनसनी में बदल गईं. प्राइवेट ट्रीटी, मीडिया नेट, क्रॉस मीडिया ऑनरशिप, पेड न्यूज़ और राडिया कांड जैसी बीमारियों ने इसकी विश्वसनीयता को कम किया. देशभर के अख़बारों और पत्रिकाओं के मालिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले आईएनएस ने इन घटनाओं पर कभी एक भी शब्द बोलना उचित नहीं समझा. लेकिन जैसे ही कर्मचारियों को न्यायसंगत वेतन देने की बात आई तो उसने वेज बोर्ड के ख़िलाफ़ बेशर्मी से प्रोपेगेंडा करना शुरू कर दिया.

जैसे, पत्रकारों और बाक़ी श्रमिकों को अगर अधिकार मिलने लगेंगे तो इससे भारतीय पत्रकारिता का सत्यानाश हो जाएगा! ऐसा करते हुए आईएनएस भूल गया कि वो भारतीय मीडिया उद्योग के विकास के दावे करते नहीं थकता. फ़िक्की-केपीएमजी (2011) की रिपोर्ट भी कहती है भारतीय मीडिया में हर साल चौदह फ़ीसदी की दर से वृद्धि हो रही है. मीडिया ‘उद्योग’ लगातार मुनाफ़े में चल रहा है.

अख़बारों में छपे आईएनएस के विज्ञापन सौ-प्रतिशत झूठ के अलावा और कुछ नहीं हैं. इकोनोमिक टाइम्स में सोलह जून को प्रकाशित एक विज्ञापन कहता है- वेज बोर्ड.... बाइंग लॉयलिटी ऑफ़ जर्नलिस्ट्स (वेज बोर्ड....पत्रकारों के ईमान की ख़रीद ) इस विज्ञापन में आगे बताया गया है कि वेज बोर्ड एक अलोकतांत्रिक संस्था है जिसका उपयोग सरकार पत्रकारों को अपने पक्ष में करने के लिए कर रही है. इस विज्ञापन में दावा किया गया है कि सरकार अगर पत्रकारों की तनख़्वाह का निर्धारण करने लगेगी तो वे अपने काम को निष्पक्ष तरीक़े से नहीं कर पाएंगे. ये भी सवाल उठाया गया है कि जब रेडियो, टीवी, इंटरनेट या बाक़ी उद्योगों के लिए वेज बोर्ड की सिफ़ारिशें लागू नहीं की जाती हैं तो सिर्फ़ प्रिट मीडिया के लिए ही इन सिफ़ारिशों को क्यों लागू किया जा रहा हैं ? इस विज्ञापन का मकसद साफ़ है कि जैसे बाक़ी क्षेत्रों में श्रम कानूनों की अनदेखी की जा रही है वैसे ही समाचार मीडिया में भी की जाए.

उन्नीस सौ छप्पन से ही पत्रकारों के लिए वेजबोर्ड बनता रहा है. तब भी बाक़ी क्षेत्रों में (इक्का-दुक्का उदाहरणों को छोड़कर) वेज बोर्ड कभी बन नही पाया. ज़रूरत इस बात की है कि वेज बोर्ड में सभी तरह के पत्रकारों को शामिल किया जाए, चाहे वे टीवी में हों, रेडियो में हों या वेब में. मीडिया ही नहीं बाक़ी क्षेत्रों में भी श्रम का मूल्य निर्धारित किया जाए इसमें ग़लत क्या है? जब पहला वेज बोर्ड बना तो सरकार का यही तर्क था कि अख़बारों में श्रमिक संगठन मज़बूत नहीं हैं इसलिए उनके पास मोलभाव की क्षमता (बार्गेनिंग पावर) नहीं है इसलिए वेज बोर्ड बनाया गया. नेशनल वेज बोर्ड फ़ॉर जर्नलिस्ट एंड अदर न्यूज पेपर एम्पलॉइज के परिचय में यही सारी बातें अब तक लिखी हुई हैं.

आज के हालात को अगर देखा जाए तो श्रमिक अधिकारों के मामले में हालत कई गुना बदतर हो चुके हैं. ऐसे में अगर सरकार पर दबाव नहीं रहेगा तो वो निश्चित तौर पर मालिकों के पक्ष में ही फ़ैसला लेगी. नब्बे के दशक की शुरुआत में उदारीकरण की नीतियां अपनाने के बाद उद्योगपतियों को हर तरह की छूट मिलती रही है और श्रमिक अधिकारों में लगातार कटौती की जाती है. अख़बारों में भी धीरे-धीरे पत्रकार संगठन ख़त्म होते चले गए. मालिकों ने उन्हें एक तरह से अनैतिक घोषित करने का अभियान चलाया और उसमें कामयाबी हासिल की, परिणामस्वरूप मालिकों पर पत्रकारों का कोई दबाव नहीं रहा.

ठेके पर भर्तियां शुरू हुई. हायर एंड फ़ायर सिस्टम लागू हो गया. पत्रकारों को हमेशा असुरक्षा में रखा गया ताक़ि वो नौकरी बचाने में जुटे रहें और मालिकों की मनमानी के ख़िलाफ़ न बोल पाएं. आज बड़े-बड़े महानगरों से लेकर छोटे-छोटे शहरों में काम करने वाले पत्रकार जानते हैं कि उनके काम के घंटे और छुट्टियां तक तय नहीं हैं. अधिकार मांगने पर उन्हें सीधे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. इस वजह से आम तौर पर पत्रकारिता में लंबे समय तक सिर्फ़ वही लोग टिक पाते हैं जो भयानक तरीक़े से मजबूर हैं या फिर चापलूसी में मज़ा लेने लगे हैं. अच्छे और पढ़े-लिखे लोगों का पत्रकारिता में बचे रहना लगातार मुश्किल होता जा रहा है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसा विशालकाय समूह अपने मुनाफ़े के तमाम दावों के बावजूद अपने कर्मचारियों को सही तनख़्वाह देने के पक्ष में नहीं है. इस अख़बार ने वेज बोर्ड की सिफ़ारिशों के ख़िलाफ़ जून महीने के पहले पख़वाड़े में चार लेख छपवाए. मीडिया रिसर्चर वनीता कोहली खांडेकर के मुताबिक़ दो हज़ार आठ में टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह यानी बैनेट एंड कोलमैन कंपनी लिमिटेड (बीसीसीएल) का सालाना टर्नओवर चार हज़ार दो सौ बयासी करोड़ रुपए था. शेयर मार्केट में लिस्टेड कंपनी न होने की वजह से इसके ताज़ा और वास्तविक आंकड़े पाना थोड़ा मुश्किल है.

तब इसका शुद्ध मुनाफ़ा एक हज़ार तीन सौ अठाईस करोड़ रुपए था. अख़बार दावा करता है कि उसका मुनाफ़ा साल दर साल बढ़ रहा है. तो क्या इस मुनाफ़े में वहा काम करने वाले श्रमिकों का कोई हक़ नहीं ? ये अख़बार इससे पहले वेज बोर्ड की सिफ़ारिशें मानता रहा है. लेकिन अब पत्रकार संगठन के प्रभावी न होने से इसने भी मनमानी की छूट ले ली है. ये इस बात की बानगीभर है कि लोकतंत्र का तथाकथित चौथा स्तंभ आज पूरी तरह उद्योग में बदल गया है. इसलिए अकूत मुनाफ़ा कमाने के बाद भी वो श्रम बेचने वालों को इतना भी पैसा नहीं देना चाहता कि वे आसानी से अपना घर चला पाएं.

बीस जून को इकोनोमिक टाइम्स में ही दिए एक विज्ञापन में आइएनएस सवाल उठाता है कि कैन योर न्यूज़ पेपर सर्वाइव इफ़ इट इज फोर्स्ड टू पे अप टू फोर्टी फ़ाइव थाउजेंड पर मंथ टू अ पियन एंड फ़िफ्टी थाउजेंड पर मंथ टू अ ड्राइवर? (जब एक चपरासी को पैंतालीस हज़ार और ड्राइवर को पचास हज़ार सालाना तनख़्वाह देने का दबाव होगा तो क्या आपका अख़बार बच पाएगा?) इस तरह के शीर्षक वाला विज्ञापन चालाकी और धूर्तता का जीता-जागता नमूना है. वेज बोर्ड की सिफ़ारिशें अख़बारों में काम करने वाले पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए होती हैं. विज्ञापन में चपरासी और ड्राइवर को लेकर विज्ञापनदाताओं की हिकारत साफ़ देखी जा सकती है. विज्ञापन के नीचे बहुत छोटे अक्षरों में लिखा गया है कि यह शर्त सिर्फ़ एक हज़ार करोड़ सालाना के कारोबार वाले अख़बारों पर ही लागू हो सकती है. फिलहाल सिर्फ़ दो ही विज्ञापनों का जिक्र काफ़ी है लेकिन यह जानना ज़रूरी है कि आईएनएस ने इस तरह के विज्ञापनों की पूरी सीरीज प्रकाशित करवाई है, जो हर तरह से वेज बोर्ड को ग़लत ठहराती है.

आइएनएस के विज्ञापनों में चपरासी और ड्राइवर की जिस संभावित तनख़्वाह की बात कर लोगों की सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर रहा है. उसमें मालिकों की कुटिलता भरी हुई है. वे बड़ी संख्या में इस श्रेणी के कर्मचारियों को आउटसोर्स कर रहे हैं. सारे श्रमिक नियमों को ताक पर रखकर उन्हें ढाई से पांच हज़ार रुपए तक ही दिया जाता है. इस तरह निजीकरण की मार सबसे कमज़ोर व्यक्ति पर ही पड़नी है जो हमेशा मालिकों की आंख की किरकिरी बना रहता है. हर कर्मचारी को जॉब सिक्योरिटी के साथ ही उचित वेतन क्यों नहीं मिलना चाहिए? चपरासी और ड्राइवर की तनख़्वाह पैंतालीस और पचास हज़ार तक होने की ‘आशंका’ व्यक्त की जा रही है, पहली बात तो वो टटपुंजिया कंपनियों पर लागू नहीं होना है. दूसरा एक हज़ार करोड़ रुपए सालाना के टर्नओवर वाली कंपनियों में भी उस ख़ास कर्मचारी को सारी सुविधाएं जोड़कर उतना पैसा मिल सकता है जिसने पूरी उम्र अख़बार में बिता दी हो और वो रिटायरमेंट की उम्र में पहुंच चुका हो.

विज्ञापनों के अलावा मालिकों ने अख़बारों में भी वेजबोर्ड को लेकर इकतरफ़ा ख़बरें प्रचारित करनी शुरू की हैं. दो जून को टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सीईओ रवि धारीवाल ने अपने अख़बार में मीडिया पर निशाना (मजलिंग द मीडिया) नाम से एक लेख लिखा. इसमें वे यही बताने की कोशिश करते हैं कि वेज बोर्ड की सिफ़ारिशें गैर संवैधानिक और लोकतंत्र विरोधी हैं. नौ जून को आईएनएस के अध्यक्ष कुंदन व्यास ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया में फ्यूचर ऑफ़ प्रेस एट स्टेक? (क्या प्रेस का भविष्य दांव पर है?) शीर्षक से एक लेख लिखा. इसमें उन्होंने वेज बोर्ड को प्रेस के भविष्य के लिए ख़तरनाक करार दिया. इंडिया टुडे ग्रुप के सीईओ आशीष बग्गा ने भी इंडिया टुडे में लिखा, हाव टू किल प्रिंट मीडिया? (प्रिंट मीडिया को कैसे ख़त्म करें?) नाम से लेख लिखा है. वहीं हिंदुस्तान टाइम्स पंद्रह जून को ख़बर लगाता है वेज बोर्ड आउटडेटेड-एक्सपर्ट (वेज बोर्ड बीते जमाने की चीज है-विशेषज्ञ) इन सारी प्रायोजित विचारों को देखकर एक बार फिर इस बात का स्पष्ट पता चलता है कि निजी मीडिया में मालिक का पक्ष कितना ताक़तवर होता है. वो पूरी कोशिश कर रहा है कि मजीठिया कमेटी की सिफ़ारिशें लागू न होने पाएं.

आनंद बाज़ार पत्रिका समूह की तरफ़ से पहले ही मजीठिया कमेटी की सिफ़ारिशों को चुनौती देने वाली एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दर्ज की गई है. याचिका में वेज बोर्ड को गैर संवैधानिक और ग़ैर क़ानूनी घोषित करने की मांग की गई है. आईएनएस के आक्रामक प्रचार के सामने पत्रकार संगठनों की कार्रवाई बिल्कुल नगण्य लग रही है. इन हालात में वेज बोर्ड की सिफ़ारिशों का लागू होना आसान नहीं है. पत्रकारों और मालिकों की इस लड़ाई में फिलहाल सरकार तमाशबीन की भूमिका में है. अंदरखाने मालिकों के सांठ-गांठ जारी है लेकिन सार्वजनिक तौर पर पत्रकारों का पक्ष लेने का दिखावा भी जारी है. अगर ऐसा नहीं होता तो मुनाफ़े पर टिके मीडिया उद्योग को लेकर अब तक उसने नियमन की ठोस व्यवस्था कर ली होती. निजी मीडिया घराने नियमन की बात पर भी अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ लेते हुए अब तक बच निकलने में कामयाब रहे हैं. यह सवाल उठाने का वक़्त है कि क्या मीडिया मालिकों की मुनाफ़ा कमाने की आज़ादी अभिव्यक्ति की आज़ादी है या पत्रकार के निर्भीक और निष्पक्ष होकर ख़बर दे पाने की बात अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़ी है? इस पूरी लड़ाई में पत्रकार सबसे बड़ा पक्षकार है लेकिन उदारीकरण के इस दौर में उसके पास अपनी आवाज़ को दमदार तरीक़े से उठाने के सारे फोरम लगभग ख़त्म हो गए हैं.

नेशनल वेज बोर्ड में श्रमजीवी पत्रकारों के साथ मालिकों का भी बराबर का प्रतिनिधित्व है. बोर्ड के कुल दस सदस्यों में से तीन श्रमजीवी पत्रकार तो तीन मालिकों के प्रतिनिधि हैं. बाक़ी चार स्वतंत्र व्यक्ति होते हैं, जिनकी नियुक्ति सरकार पर निर्भर करती है. बोर्ड के बाक़ी सदस्यों का कहना है कि रिपोर्ट तैयार करने में मालिकों के प्रतिनिधि भी उनके साथ पूरी तरह शामिल थे लेकिन अंतिम वक़्त पर वे धोखा दे गए.

मजीठिया बोर्ड की सिफ़ारिशों से मालिकों की लॉबी सिर्फ़ इसलिए बौखलाई हुई है कि वो श्रमिकों के पक्ष में न्यायसंगत और तार्किक बातें करती है, जिससे पत्रकारों की आत्मनिर्भरता तुलनात्मक रूप से बढ़ सकती है और वे अपनी जिम्मेदारियों को ज़्यादा बेहतर तरीक़े से निभा सकते हैं. अगर ऐसा हो पाया तो वे मालिकों के मनमानेपन पर सवाल उठाने की हिम्मत भी कर सकते हैं. मालिक यही नहीं चाहते. सरकार पर पत्रकारों के पक्ष में वेज बोर्ड बनाने का आरोप लगाने वाले मालिक इस बात को भूल रहे हैं कि उन्होंने पत्रकारों को गुलाम बनाकर रखा है, उन्हें कोई अधिकार देने की उनकी इच्छा नहीं है.

मजीठिया बोर्ड के मुताबिक़ पत्रकारों और ग़ैरपत्रकारों के लिए जो सिफ़ारिश की है. उसके बाद उनकी बेसिक तनख़्वाह में ढाई से तीन गुना तक की बढ़ोतरी हो सकती है. रिटायर होने की उम्र साठ से बढ़कर पैंसठ हो जाएगी. सरकार इन सिफ़ारिशों को मान लेती है तो इऩ्हें आठ जनवरी दो हज़ार आठ से लागू माना जाएगा. एक ठीक-ठाक संस्थान में काम करने वाले पत्रकार को शुरुआती स्तर पर कम से कम नौ हज़ार और वरिष्ठ होने पर कम से कम पचीस हज़ार रुपए मिलेंगे. इसके साथ मकान का किराया और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं देने का भी प्रावधान है. देखा जाए तो वेज बोर्ड की सिफ़ारिशें भी पूरी तरह अख़बार के कर्मचारियों के साथ न्याय नहीं करती. उनमें अभी बहुत कुछ और जोड़े जाने की ज़रूरत है लेकिन अख़बार मालिक दी गई मांगों को भी मानने के लिए तैयार नहीं हैं.

ऐसा नहीं कि सरकार श्रमिक नियमों का सख्ती से पालन कराना चाहती है. उदारीकरण के दौर में श्रम नियमों को उसने किस तरह तिलांजलि दी है ये किसी से छिपा नहीं. ये तो उसकी मज़बूरी है कि भारतीय लोकतंत्र में कुछ समाजवादी रुझान वाली चीज़ें संस्थागत रूप ले चुकी हैं जिन से मुंह मोड़ पाना सरकार के लिए अब भी आसान नहीं है. अख़बारों के पत्रकारों और कर्मचारियों के लिए बना वेज बोर्ड उसी श्रेणी में आता है. ये बोर्ड तब अस्तित्व में आया जब बाक़ी संचार माध्यमों का विकास नहीं हुआ था. सरकार की अगर सदइच्छा होती तो वो वक़्त बदलने के साथ टेलीविजन, रेडियो और वेब के भी सारे पत्रकारों और कर्मचारियों को वेज बोर्ड में शामिल कर लेती या सभी क्षेत्रों के श्रमिकों के लिए वेज बोर्ड बना लेती.

मतलब साफ़ है कि अतीत से चली आ रही संस्थागत परंपराओं को पूरी तरह त्यागने में सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं इतना वो भी जानती है. ये कुछ ऐसा ही है जैसे सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियों को निजी हाथों में सौंपने की पूरी इच्छा के बाद भी जन विरोध की वजह से उन्हें वो अब तक निजी हाथों के हवाले नहीं कर पाई है. पत्रकारों और बाक़ी अख़बारी कर्मचारियों के लिए बने वेज बोर्ड की सिफ़ारिशें जिन उलझनों में फंसी है उससे लगता नहीं है कि ये सिफ़ारिशें आसानी से लागू हो पाएंगी. सिर्फ़ पत्रकारों की एकता ही उद्योगपतियों और सरकार से अपने अधिकार छीन सकती है. इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है.

फिलहाल पत्रकार संगठनों की हालत देखकर लगता नहीं कि वे कोई बड़ी पहल लेने में सक्षम हैं. राष्ट्रीय स्तर पर आज जितने भी संगठन काम कर रहे हैं वे सिर्फ़ कुछ प्रभावशाली लोगों की निजी संस्थाएं बनकर रह गई हैं. उनके नेता अपनी कुर्सी बचाने के लिए ही सालभर जोड़तोड़ में लगे रहते हैं. श्रमजीवी पत्रकारों के हितों से उन्हें ज़्यादा कुछ लेना-देना नहीं है. ट्रेड यूनियन का नाम सिर्फ़ कुछ सरकारी कमेटियों में पहुंचने और विदेश घूमने का माध्यमभर बनकर रह गया है. श्रमिकों की बात करने वाली कम्युनिस्ट और समाजवादी पार्टियों की भी इस दिशा में कोई पहलकदमी नहीं दिखाई देती. कुछ-एक पार्टियों की पत्रकार संगठनों में प्रभावशाली हिस्सेदारी है भी तो वहां भी पार्टीगत संकीर्णता/दंभ और नौकरशाही ज़्यादा हावी है. हर मीडिया घराने/यूनिट में पत्रकार संगठन की अनिवार्य मौज़ूदगी ही मालिकों के बेलगाम फ़ैसलों पर कुछ रोक लगा सकती है. इसके लिए उनका श्रमिक आंदोलनों के राजनीतिक इतिहास से जागरूक होना भी ज़रूरी है. वरना विकल्पहीनता छाई रहेगी!
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(लेखक भूपेन सिंह युवा, प्रतिभाशाली और एक्टिविस्ट जर्नलिस्ट हैं. वे इन दिनों इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मास कम्युनिकेशन, दिल्ली में प्राध्‍यापक हैं. उनका यह लिखा समयांतर में प्रकाशित हो चुका है.)

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