मंगलवार, 5 जुलाई 2011

पत्रकारिता


 

The second edition of a biography of Mohammad Rafi “Meri Aawaz Suno” hits the stands

नवम्बर 1, 2008

We know Mohammad Rafi as a singer par excellence and have grown up on his songs. But we have barely given a thought that he sung several songs for lesser known characters in films. Click here to read the full story,  published in the Hindu on Nov 01, 2008

कृष्ण कब वादा निभाएंगे

अगस्त 13, 2009
विनोद विप्लव
कृष्ण ने महाभारत के समय वादा किया था कि जब-जब धर्म की ग्लानि होगी और अधर्म बढ़ेगा, तब-तब वह धर्म के उत्थान के लिए, साधुओं के त्राण के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए तथा धर्म संस्था की स्थापना के लिए जन्म लेंगे। जबसे कृष्ण ने यह वादा किया तब से लाखों – करोड़ों भारतवासी कृष्ण के जन्म लेने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, लेकिन कृष्ण हैं कि जन्म लेते ही नहीं। उन्होंने यहां-वहां वादा थोड़े ही किया था। गीता में वादा किया था। इसका लिखित दस्तावेज है। इसके बावजूद वह जन्म लेने के अपने वादे से मुकर रहे हैं। लाखों-करोड़ों लोगों के साथ वादाखिलाफी कर रहे हैं। उनसे अच्छे तो आज के नेता हैं जो कम से कम पांच साल में एक बार जनता के सामने प्रकट हो जाते हैं और अपना वादा निभा जाते हैं लेकिन कृष्ण हैं कि सैकड़ों-हजारों साल से लाखों-करोड़ों लोगों को झांसा पर झांसा दे रहे हैं। गोकुल, मथुरा, द्वारिका और वृंदावन समेत पूरे भारत में कृष्ण का इंतजार है। कहीं गोपियां उनकी विरह में जान दे रही हैं तो कहीं ग्वाल-बाल उनके इंतजार में पागल हो रहे हैं। पूरा भारतवंश उन्हें पुकार रहा है, ‘अब तो दर्शन दो घनश्याम। कितना चकमा दोगे। अब तो गीतावाला वचन निभा जाओ। अब तो हमारा उद्धार करो और अधर्मियों का नाश करो।’ लेकिन कृष्ण हैं कि आते ही नहीं। ऊपर से ही कहला भेजते हैं, ‘अभी अधर्म बढ़ा नहीं है। अगर तुम सब चाहते हो कि मैं इस युग में जन्म लूं, तो तुम सब मिलकर धर्म की ज्यादा से ज्यादा ग्लानि करो, क्योंकि अभी अधर्म उतना नहीं है कि मैं जन्म लूं। जब तक समाज में कूट-कूट कर अधर्म भर नहीं जाता, तब तक मुझे जन्म लेने में मजा नहीं आता।’ कृष्ण के कहे अनुसार भारतवासी पूरे जी-जान से अधर्म बढ़ाने में जुटे हैं। इसके लिए वे दिन-रात एक कर रहे हैं। हर व्यक्ति इसी कोशिश में है कि कैसे ज्यादा से ज्यादा अधर्म बढ़े ताकि कृष्ण जन्म लें। अच्छे खासे अधर्मी अधर्म बढ़ा-बढ़ा कर आजिज आ चुके हैं। अधर्म बढ़ाते-बढ़ाते थक कर चूर हो गए हैं, हिम्मत जवाब दे चुकी है। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि अब कितना अधर्म बढ़ाए। कई तो लस्त-पस्त होकर थक-हार कर बैठ गए हैं कि अब उनसे अधर्म नहीं बढ़ता। वष्रो से तो अधर्म बढ़ा रहें हैं। अधर्म बढ़ाने के चक्कर में खाना-पीना भूल गए, आदमी-आदमी की पहचान भूल गए और यहां तक कि खुद को ही भूल गए। लेकिन कृष्ण कह रहे हैं कि अभी भी अधर्म उतना नहीं बढ़ा है। अधर्म बढ़ने की अभी काफी गुंजाइश है। थोड़ा और जोर लगाओ। लोगों को समझ में यह नहीं आ रहा है कि अब कितना जोर लगाएं। अब हर तरफ तो अत्याचार है, बलात्कार है, लूट है, झूठ है। इससे ज्यादा अधर्म क्या होगा। कोई बताए तो सही कि आखिर अधर्म का कौन-सा रूप है, जो भारत में नहीं है। लेकिन कृष्ण को यह सब दिखाई ही नहीं दे रहा है। वह इस भयानक अधर्म को देखकर भी संतुष्ट नहीं हैं। वह कहते हैं कि उनके लिए इतना अधर्म काफी नहीं, महाभारत काल जितना तो अधर्म पैदा करो, ताकि मैं जन्म ले सकूं। अब पता नहीं, कृष्ण की संतुष्टि लायक अधर्म देश में कब और कैसे पैदा होगा। अब तो अधर्म का घड़ा छलछला रहा है। इसमें अब कुछ और अधर्म कैसे अटेगा। महाभारत काल में तो एक द्रौपदी की साड़ी खींची गई थी। यहां तो हर रोज और हर रोज न जाने कितनी द्रौपदियों को सरेआम नंगा किया जाता है, उन्हें जम कर पीटा जाता है, बाल पकड़ कर घसीटे जाते हैं, उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है। उन्हें घरों में पीटा जाता है, सड़कों पर पीटा जाता है, पार्कों में पीटा जाता है, पबों में पीटा जाता है। उनके साथ जो-जो किया जाता है उसकी कृल्पना खुद कृष्ण ने नहीं की होगी। अत्याचार के एक से बढ़कर एक रूपों का ईजाद किया जा चुका है। अमेरिका तक ने मान लिया कि भारत में अधर्म फैलाने में उसने जो योगदान दिया, वह वाकई सफल रहा। स्लमडॉग मिलिनेयर को ऑस्कर अवार्ड देकर इसकी पुष्टि कर दी है। अब देखना यह है कि कृष्ण अधर्म फैलाने के वर्षों से चल रहे अभियान को कब सफल मानते हैं और भारत को अधर्म से मुक्त करने के लिए कब जन्म लेते हैं। यह व्यंग्य दैनिक भाष्कर में प्रकाशित हो चुका है

सत्यवादी क्रांति

अगस्त 13, 2009

- विनोद विप्लव

भारत दिनों एक महान क्रांति के दौर से गुजर रहा है। वैसे तो हमारे देश और दुनिया में कई क्रांतियां हुयी हैं। मसलन औद्योगिक क्रांति, साम्यवादी क्रांति, समाजवादी क्रांति, पूंजीवादी क्रांति, और श्वेत एवं हरित जैसी रंगवादी क्रांतियां। लेकिन भारत में आज जिस क्रांति की लहर चल रही है उसकी तुलना में बाकी क्रांतियंा पसांग भर भी नहीं हैं। इसी महान क्रांति का असर है कि आज हर आदमी सच बोलने के लिये छटपटा रहा है। ऐसा लग रहा है कि मानो उन्होंने अगर सच नहीं बोला तो उनका दम घुट जायेगा, देश का बंटाधार हो जायेगा, धरती फट जायेगी और दुनिया रसातल में चली जायेगी। यही कारण है हर भारतीय सच बोलने का एक मौका देने की गुजारिष कर रहा है। लोग दिन-रात फोन करके गुहार लगा रहे हैं, ‘‘प्लीज, एक बार मुझे भी सच बोलने के लिये बुला लो।’’ लोग फोन करने के लिये इस कदर उमड़ पड़े हैं कि फोन लाइनें ठप्प पड़ गयी हंै। लोग रात में जाग-जाग कर फोन कर रहे हैं। सच बोलने के प्रति लोगों में ऐसा भयानक जज्बा इतिहास में शायद ही कभी देखा गया। वैसे भी हमारे देश में सच बोलने की परम्परा नहीं रही है। हमारे इतिहास में सच बोलने वाले केवल एक ही व्यक्ति का जिक्र आता है – राजा हरिश्रचन्द्र का। लेकिन उनके बारे में भी ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता कि उन्होंने कभी अपनी निजी जिंदगी के बारे में सच बोला हो। उन्होंने कभी भी खुलासा नहीं किया कि उनके अपनी पत्नी के अलावा कितनी महिलाओं से संबंध थे, उन्होंने अपनी पुत्री से कम उम्र की कितनी लड़कियों से संबंध बनाये थे, उन्होंने पांच सितारा सरायों से कितनी सफेद या अन्य रंगों की चादरें चुरायी थी। लेकिन इसके वाबजूद उन्हें सत्यवादी का खिताब दे दिया गया जो दरअसल इस बात का सबूत है कि उनके जमाने में सच बोलने वालों का कैसा भयानक अकाल था। वाकई हमारा देष सच बोलने के मामले में पूरी तरह कंगाल रहा है। यहां सच उगलवाने के लिये हमारी बहादुर पुलिस को लोगों को बर्फ की सिल्लियों पर लिटाना पड़ता रहा है और मार-मार कर उनकी चमड़ी उधेड़नी पड़ती रही है। यहां गीता और ईश्वर से लेकर मां-बहन की कसमें खाकर, सत्यनिष्ठा की शपथ लेकर और अदालत में एफिडेविट देकर झूठ बोले जाते रहे हैं। लेकिन अब झूठ का यह अंधकार युग गुजर चुका है। अब सच और सत्यवादियों का बोलवाला हो चुका है। आज लोग वैसे-वैसे सच बोल रहे हैं जिसके कारण उनकी जिंदगी नर्क बन सकती हैं, उनका दाम्पत्य जीवन नर्क बन सकता है, समाज में उनकी इज्जत मिट्टी में मिल सकती है। लेकिन इन्हें इन सबकी परवाह नहीं है, उन्हें तो सच बोलना है – इसकी कीमत चाहे जो भी चुकानी पड़े या जो भी कीमत पानी पड़े। ऐसे सत्यवादियों को शत्-शत् नमन। आश्चर्य तो यह है इतनी महान क्रांति एक टेलीविजन कार्यक्रम ने कर दी। लेकिन कुछ समाज विरोधियों की साजिष तो देखिये। वे इस क्रांति का सूत्रपात करने वाले कार्यक्रम पर ही प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। यह तो हम सबका सौभाग्य है कि हमें बहुत ही समझदार सरकार मिली है जिसे पता है कि ऐसी मांग करने वाले लोगों की क्या मंशा है। सरकार जानती है कि ऐसे लोग देश को आगे बढ़ने नहीं देना चाहते। वे जनता को दाल, रोटी, पानी, बिजली, पानी, पेट्रोल, रसोई गैस और सड़क जैसे पुरातन और बेकार मुद्दों में ही उलझाये रखना चाहते हैं, लोगों को पिछड़ा बनाये रखना चाहते हैं। आज जब लोग ऐसे टेलीविजन कार्यक्रमों की बदौलत सच बोल रहे हैं, जमीन से उपर उठकर समलैंगिकता, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स, राखी सावंत, मल्लिका शेरावत, माइकल जैक्सन, सरकोजी और बू्रनी के बीच के संबंध आदि उच्च स्तरीय मुद्दों के बारे में सोच रहे हैं तो देश और समाज को पीछे ले जाने वाले कुछ मुट्ठी भर लोगों को यह पच नहीं पा रहा है। सरकार को चाहिये कि देश में सच बोलने की क्रांति पैदा करने वाले एंकर को भारत रत्न से सम्मानित करे। उसे ऐसी योजनायें बनानी चाहिये ताकि देश के हर टेलीजिवन चैनल ऐसे ही बल्कि इससे भी आगे के कार्यक्रम प्रसारित करें ताकि यह क्रांति देश के दूरदराज के इलाकों में भी फैले। मुझे तो पूरा विश्वास है कि ऐसा जरूर होगा। सत्य की विजय होगी। कहा भी तो गया है – सत्यमेव जयते।
यह व्यंग्य नवभारत टाईम्स में ०७-०८-२००९ को प्रकाशित हो चुका है


सच की नगरी और चोरों का राजा

जुलाई 27, 2009
एक जमाने में एक मुल्क हुआ करता था जिसकी सरहदें हिमालय की गगनचुंबी चोटी से लेकर हिन्द महासागर की अतल गहराई तक फैली हुई थीं। यह आजाद देश था और लिहाजा यहां के नागरिकों को और उनसे अधिक विदेशियों को अपनी मर्जी के अनुसार कुछ भी करने, कुछ भी बोलने, कुछ भी देखने और कुछ भी दिखाने की पूरी आजादी थी। इस देश में चोरों का ही जलवा था। चोर ही सरकार, चोर ही मंत्रिपरिषद, चोर ही संसद, चोर ही बड़े-बड़े उद्योग और अरबों-खरोबों का मुनाफा कमाने वाली कंपनियां, चोर ही स्कूल-कालेज, चोर अखबार और चोर ही टेलीविजन चैनल चलाते थे। लोकतंत्र के चारों खंभे इन चोरों के कंघे पर ही टिके थे।
एक बार की बात है कि इस देश में चोरों का आतंक इस कदर बढ़ गया कि आम लोग ही नहीं कुछ खास लोग भी चोरों की कारगुजारियों से दुखी हो गये थे। ये चोर पूरी तरह से बेलगाम हो गयेे। इन पर किसी का नियंत्रण नहीं रह गया – न राजा का, न मंत्री का, न संसद का और न अदालत का। लोगों की फरियाद सुनने वाला कोई नहीं था। आखिरकार जनता के चुने हुये कुछ प्रतिनिधियों ने देश की सर्वोच्च सभा मानी जाने वाली उस संसद में इस मामले को उठाने का दुस्साहस किया जहां चोरों के पैसों और उनकी मेहरबानियों की बदौलत चुने गये लोग का ही बोलवाला था। जैसे हर चीज का अपवाद होता है यहां भी कुछ प्रतिनिध अपवादस्वरूप थे। इनमें से एक ने हिम्मत जुटा कर कहना शुरू किया – ‘‘मैं महामहिम अध्यक्ष महोदय के माध्यम से आदरणीय प्रधानमंत्री, माननीय मंत्रियों और जनप्रिय सरकार का ध्यान चोरों की बढ़ रही कारगुजारी और उसके कारण जनता को हो रही परेशानियों की तरफ दिलाना चाहता हूं। ये चोर इतने बेखौफ हो गये हैं कि इन्हें सरकार, कानून और पुलिस का कोई डर नहीं रहा। सरकार ने इन्हें जिन शर्तों और मानदंडों के आधार पर चोरी करने के लाइसेंस दिये थे उनकी ये खुलेआम धज्जियां उडा रहे हैं। ये चोर अपने अपने संगठनों के नियमों का भी पालन नहीं कर रहे हैं। इन्होंने सरकार को आष्वासन दिया था कि ये आत्म नियममन के मानदंड बनायेंगे लेकिन ये अपने ही मानदंडों का उल्लंघन कर रहे हैं। अब तो माननीय अध्यक्ष महोदय हद हो गयी है। ये चोर लोगों के घरों में घुस कर केवल चोरी ही नहीं करते बल्कि लोगों के बेडरूम में घुस जाते हैं और पति – पत्नी को वैसे काम करने के लिये मजबूर करते हैं जो नितांत निजी क्षणों में किया जाता है और फिर बेडरूम के दृश्यों को शूट करके अपने टेलीविजन चैनलों पर प्रसारित कर देते हैं। इस काम में इन्हें चैतरफा कमाई हो रही है।’’
शोर-गुल और टोका-टोकी के बीच एक दूसरे प्रतिनिधि ने इस मुद्दे को आगे बढ़ाते हुये जोर-जोर से कहना शुरू किया, महोदय। यह बहुत गंभीर मुद्दा है। सरकार की ओर से चोरों को चोरी करने के एवज में कई तरह की सुविधायें दी जाती है। यही नहीं चोरी से होने वाली कमाई को आयकर से छूट प्रदान की गयी है। लेकिन चोरों ने अधिक कमाई के लिये चोरी करने के बजाय दूसरे रास्तों को अपना लिया है जबकि लाइसेंस उन्हें चोरी करने के लिये मिला है। इन चोरों ने अब टेलीविजन चैनल चलाना शुरू कर लिया है और सरकार ने टेलीविजन चैनल चलाने के लिये भी कई तरह की छूट और सहुलियतें प्रदान की है। सरकार इन चैनलों को आर्थिक मदद भी देती है और भरपूर विज्ञापन देती है ताकि इन्हें खूब कमाई हो। लेकिन ये चैनल राजनीतिक दलों, मंत्रियों और नेताओं से भी पैसे वसूलने लगे हैं। जो इन्हें पैसे देते हैं उनकी ये वाहवाही करते हैं जबकि हम जैसे नेता जो इन्हें पैसे नहीं देते हैं उन्हें बदनाम करते हैं। मैं सरकार से यह मांग करता हूं कि इन्हें कमाई के लिये अन्य रास्तों को अपनाने से रोका जाये।’’
इस समय तक संसद में शोर-शराबा बढ़ गया तभी पहले वाले प्रतिनिधि ने अपनी बात बढ़ाने की कोशिश की – ‘‘माननीय महोदय, मैं सरकार के ध्यान में यह बात लाना चाहता हूं कि इन चोरों ने पति-पत्नियों के बीच के नितांत निजी क्षणों को भी इन चोरों और उनके चैनलों ने कमाई का जरिया बना लिया है। ऐसी फिल्मों को टेलीविजन पर दिखाने के कारण इन्हें भरपूर टीआरपी मिलती है और फिर धुंआधार विज्ञापन मिलते हैं। चोरों को अब इस ध्ंाधे में इन्हें इतना मुनाफा होने लगा है कि इनमें से कई चोरी करने के अपने मूल काम को छोड़ कर टेलीविजन चैनल चलाने और अश्लील वीडियो को दिखाने का काम करना षुरू कर दिया है क्योंकि इसमें न तो किसी तरह की मेहनत, न दिमाग और न पैसे की जरूरत पड़ती है। मैं सरकार से कहना चाहता हूं कि जब इन्हें लाइसेंस चोरी करने के लिये मिली है तो ये चोरी का छोड़कर अन्य काम क्यों कर रहे हैं। अब तो माननीय महोदय इन्होंने हद ही कर दी है। इन्होंने कमाई का और नया तरीका इजाद कर लिया है। अब तो ये चोर मोहल्ले की पुलिस को यह कहकर किसी के घर में घुसने की इजाजत पाते हैं कि वे उस घर में चोरी करने के लिये जा रहे हैं, लेकिन वे घर में घुस कर चोरी नहीं करते बल्कि पति-पत्नी को उनके मासूम बच्चों और बूढे मां बाप के सामने बिठाकर नितांत निजी सवाल पूछते हैं। उनसे यह पूछा जाता है कि उन्होंने अपनी बेटी से कम उम्र की कितनी लड़कियों से कितनी बार संबंध बनाया है, होटलों से कितनी सफेद चादरें चुराई हैं, उनकी कितनी नाजायज संतानें हैं, उनके मन में पत्नी या मां-बाप की हत्या का ख्याल कितनी बार आया है। ऐसे ऐसे सवाल पूछ कर उन्हें अपने बेटे-बेटियों और बूढ़े माता-पिता के सामने जलील किया जाता है। यही नहीं ऐसे सवाल-जबाव की फिल्मे बनाकर इन्हें टेलीविजन चैनल पर प्रसारित करके लोगों की इज्जत-आबरू को लूटा जा रहा है। पहले तो ये चोर लोगों की धन-सम्पत्ति लूटते लेकिन अब इनकी इज्जत लूट रहे हैं। ऐसी घटनायें तेजी से बढ़ ही है जिसके कारण परिवार टूट रहे हैं, पति-पत्नी का एक दूसरे पर से भरोसा उठ रहा है, लोग अपने बहु-बेटियों की नजर से गिर गये हैं। कई लोग आत्महत्या करने को विवश हो गये। क्या सरकार इस बारे में कोई कार्रवाई करेगी।’’
संसद में हंगामे को देखते हुये मंत्री ने आश्वासन दिया कि इस बारे में जांच करायी जायेगी और जांच के निष्कर्ष से संसद को अवगत कराया जायेगा। सरकार ने इस बारे में जांच के लिये जांच आयोग बिठाया और आयोग की रिपोर्ट के आधार पर कुछ चोरों को कारण बताओ नोटिस भेजा गया जिसमें कहा गया था कि यह पता चला है कि वे चोरी करने के अपने मूल कर्तव्य से भटक गये हैं और वे लोगों की सम्पत्ति लूटने के बजाय लोगों की इज्जत लूट रहे हैं और इस कारण क्यों नहीं चोरी करने के लिये मिली उनकी लाइसेंस रद्द कर दी जाये।
इस नोटिस का जवाब देने के लिये चोरों को एक भव्य पांच सितारा होटल में हाजिर होने तथा अपने साथ उन फिल्मों की बिना संपादित सीडी और जरूरी कागजात लाने को कहा गया। सभी चोर निधार्रित जगह पर निधार्रित समय पर पहुंच गये। हर चोर के पीछे-पीछे उनके निजी सहायक अटैची लेकर चल रहे थे जिनमें वे जरूरी कागज थे जिन्हें लेने के लिये मंत्रियों और अधिकारियों की पूरी टीम वहां उमड पडी थी। मीटिंग में सबने खाया-पिया और लार टपकाते हुये बिना संपादित सीडी देखी। चोरों ने अपने कागजों और जवाब से सरकार को संतुष्ट कर दिया। उस बैठक में सरकार ने ऐसी फिल्में बनाने वाले और उन्हें टेलीविजन पर प्रसारित करने वाले चोरों को पुरस्कृत करने का फैसला किया तथा संसद में फालतू सवाल उठाने वाले प्रतिनिधियों को लोकतंत्र और विकास विरोधी करार देते हुये उनके खिलाफ जांच कराने का फैसला किया कि वे किन लोगों से मिले हुये हैं और उन्हें कौन भड़का रहा है।
सरकार ने संसद में वक्तव्य दिया कि जांच से पता चला है कि ये चोर दरअसल किसी तरह के मानदंड का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं बल्कि चोरी करने के ही अपने मूल कर्तव्य को ही अंजाम दे रहे है। पहले ये चोर लोगों के घरों से उनकी धन-सम्पत्ति लूटते थे और अब भी वे ऐसा ही करना चाहते हैं, लेकिन इन चोरों के महत्वपूर्ण योगदान के कारण गरीबी मिटाने करने के सरकार के अभियान को जो भारी सफलता मिली है उसके कारण अब लोगों के पास धन-सम्पत्ति जैसी वैसी चीजें रहीं नहीं जिन्हें लूटा जा सके इस कारण अब मजबूरी में ये चोर उनकी इज्जत को लूट रहे हैं क्योंकि उनका काम ही कुछ न कुछ लूटना है ओर इसके लिये ही उन्हें लाइसेंस मिला है अब अगर किसी सांसद को इस पर भी कोई आपत्ति हो तो वे सुझाव दें कि चोर अब क्या लूटें। जहां तक धन-सम्पत्ति और इज्जत-आबरू गंवाने लोगों के आत्महत्या करने का सवाल है तो इस संबंध में सरकार का कहना है कि यह गरीबी मिटाओ अभियान की प्रगति का ही प्रमाण है। सरकार के इस जबाव से सभी सांसद लाजवाब हो गये। उनके पास पूछने और बोलने के लिये कुछ रह नहीं गया था।
Tel : 09868793203 (Mobile)parliament

वरूण से ज्यादा पाकिस्तान को बेचा खबरिया चैनलों ने

अप्रैल 21, 2009
इस बात में कोई शक नहीं कि खबरिया चैनल विज्ञापन और टीआरपी बटोरने के लिये किसी को भी बेच सकते हैं। केवल उन्हें इस बात का आभास होना चाहिये कि कौन सा विषय सबसे अधिक बिक सकता है। उन्हें लगता है कि जिससे लोगों में आतंक, भय और सनसनी पैदा हो वह ज्यादा बिकता हैं। टेलीजिवन चैनल लोगों में डर और आतंक पैदा करने में इतने माहिर है कि किसी से भी भय पैदा कर सकते हैं। अपने इस फन को मुजाहिरा उन्होंने कई बार किया है। ये चैनल बारिश अधिक हो जाये तो धरती के जलमग्न होने की, ठंड अधिक हो जाये तो हिम युग लौटने की और वैज्ञानिक अगर कोई प्रयोग करने लगें तो धरती के महाविनाश होने की भविष्यवाणी करके लोगों को आतंकित कर देते हैं। आतंकवादियों ने मुंबई पर हमले करके और कई बेगुनाहों की हत्या करके देश में जितना आतंक फैलाया था, उससे कई गुना अधिक आतंक खबरिया चैनल अब भी फैला रहे हैं और आगे भी फैलाते रहेेंगे। लेकिन आतंक फैलाने का खबरिया चैनलों का उद्देश्य लोगों को अगाह करना या उन्हें सर्तक बनाना नहीं बल्कि आतंक को बेचना है। खबरिया चैनलों की नजर में आंतकवाद खबरों के बाजार में मंहगा बिकता है इसलिये वे अपनी हर खबर से आतंक पैदा करने की कोशिश में लगे रहते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा आतंक पैदा हो और ज्यादा से ज्यादा कमाई हो। अधिक कमाई के खेल में इन चैनलों ने पाकिस्तान से जुड़ी उन्होंने हर खबरों को बेचा। जनपथ पर उतरे हुये कपड़े बेचने वालों की तरह खबरिया चैनलों के पत्रकारों और एंकरों ने पाकिस्तान से जुड़ी ऐसी-ऐसी खबरों को गला फाड़ कर बेचा जिन्हें कई समाचार पत्र आज तक खबर ही नाम मान पाये इन खबरों को एक पैरे की भी जगह देने लायक नहीं समझ पाये। ये चैनल रोज ब रोज विनाश की कगार पर बैठा है पाकिस्तान, टूट जायेगा पाकिस्तान, बर्बाद हो जायेगा पाकिस्तान, बारूद की ढेर पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान की राह पर पाकिस्तान जैसी घोषणायें रोज करते रहे, लेकिन इन घोषणाओं के पीछे की सच्चाई क्या थी सबको पता हैं।
एक पत्रकार होने के कारण खबरिया चैनलों को देखने के लिये अभिशप्त होने के कारण यदा-कदा खबरिया चैनल देखना पड़ता है। मुंबई हमले के बाद से पिछले कुछ दिनों तक इन चैनलों को देखते समय कई बार मुझे यह लगता रहा कि ये चैनल वाले आतंकवाद और पाकिस्तान, तालिबान, जैशे मोहम्मद बगैरह-बगैरह को बहुत अधिक महत्व दे रहे हैं। मेरी इस धारणा की पुष्टि मीडिया की प्रकृति एवं प्रवृति के बारे में अध्ययन करने वाली संस्था – सेंटर फार मीडिया स्टडी (सीएमएस) के मीडिया लैब के प्रमुख श्री प्रभाकर ने की, जिन्होंने बताया कि सीएमएस ने मुंबई हमलों के बाद से खबरिया चैनलों के कवरेज का अध्ययन करने पर पाया कि देश के प्रमुख छह चैनलों पर इन हमलों के बाद से पाकिस्तान एवं वहां से जुड़ी खबरों के कवरेज एवं उनके विश्लेषण को दिये जाने वाले समय में तेजी से इजाफा हुआ और फरवरी माह में पाकिस्तान से जुड़ी खबरों को अन्य विषयों और यहां तक कि चुनाव की खबरों की तुलना में दोगुना समय दिया गया। हालांकि मार्च में चुनाव की सरगर्मियों में तेजी आने पर पाकिस्तान की खबरों का कवरेज कम हुआ।
सीएमएस के अध्ययन के अनुसार ये चैनल मुंबई हमलों के पूर्व तक पाकिस्तान से आने वाली खबरों को 100 मिनट का समय दे रहे थे लेकिन मुंबई हमलों के बाद इसमें इजाफा होता गया और मार्च में इन चैनलों ने इन खबरों को 3400 मिनट का समय दिया अर्थात 34 गुना अधिक। सीएमएस का इस अध्ययन के तहत जी न्यूज, आज तक, सीएनएन-आईबीएन, एनडीटीवी 24 गुना 7, स्टार न्यूज और डीडी न्यूज को शामिल किया गया।
इस अध्ययन के मुताबित 26 नवम्बर को मुंबई पर आतंकवादी हमलों के समय इन खबरिया चैनलों पर पाकिस्तान से आने वाली खबरों को 100 मिनट का अर्थात प्राइम टाइम प्रसारण का करीब 0.73 प्रतिशत समय दिया गया जो दिसंबर में बढ़कर चार प्रतिशत तथा फरवरी में दस प्रतिशत तथा मार्च में साढ़े 12 प्रतिशत हो गया। हालांकि मार्च में चुनाव तथा राजनीतिक खबरों का कवरेज बढ़कर 30 प्रतिशत हो गया।
इस अध्ययन के अनुसार जब वरूण गांधी का मुद्दा जोरों पर था उस समय भी वरूण गांधी से जुड़ी खबरों का कवरेज दस प्रतिशत था अर्थात पाकिस्तान से आने वाली खबरों के कवरेज से ढाई प्रतिशत कम।
हालांकि आतंकवाद बहुत बड़ी समस्या है लेकिन हमारे देश की बड़ी आबादी जिन मुद्दों से सबसे अधिक प्रभावित होती है उनमें आंतकवादी का स्थान काफी पीछे है। हमारे देश के लोगों के लिये आतंकवाद और आई पी एल की तुलना में गरीबी, भूखमरी, जन सुविधाओं और चिकित्सा सुविधाओं का अभाव, पानी की कमी, आवास समस्या, अशिक्षा, अधंविश्वास आदि-आदि बड़े मुद्दे हैं। आतंकवाद से कई गुना बड़ा मुद्दा सड़क दुर्घटना और प्रसव के दौरान होने वाली गर्भवती महिलाओं की मौत है। एक साल में आतंकवाद से जितने लोग नहीं मरे होंगे और जितने परिवार बर्बाद हुये होंगे उससे कई गुना लोग एक साल में केवल दिल्ली में सड़क दुघर्टनाओं में मरे होंगे। हमारे देश में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण हर घंटे 440 महिलायें प्रसव के दौरान मौत का ग्रास बन जाती है। आप हिसाब लगाइये मुंबई हमलों में जितने लोग मारे गये उसकी तुलना में कितनी महिलायें उन घंटों में मारी गयी होगी जब आतंकवादियों ने मुंबई को बंधक बना लिया था, लेकिन चैनलों ने इन अभागी महिलाओं की मौत पर कितना सेकेंड समय दिया। हमारे देश की गरीब महिलाओं की मौत और गरीबों की बेबसी को दिखाकर क्या मिलेगा। लेकिन समय का चक्र बदले देर नहीं लगता। खुदा न करें गरीबी, बेबसी और लाचारी की हवा इन चैनल वालों को लगे।

जरा फेमसिया तो लें

अप्रैल 20, 2009
व्यंग्य : आजकल जिसे देखिये वही फेमस हुआ जा रहा है। खबरिया चैनलों की मेहरबानी से कौन, कहां और कैसे, फेमसिया जायेगा, कोई नहीं जानता। रात को सही सलामत सोये और सुबह उठते ही पाते कि आप फेमसिया गये। दफ्तर गये खाली हाथ और घर लौटे सिर पर फेमस का पंख लगा कर। राह चलते किसी गड्ढे में गिर गये, किसी पुल से लटक गये या मूड हुआ तो पानी टंकी अथवा टीवी टावर पर चढ़ गये और फेमस हो गये। किसी की बीबी को लेकर भाग गये और लगे हाथ आपके साथ दो दम्पति फेमस हो गये।
किसी के घर में इनकम टैक्स का छापा पड़ गया और वह फेमस हो गया। कोई चुनाव जीत कर फेमस हो रहा है तो कोई नीलामी जीत कर। कोई राह चलते किसी लड़की को छेड़ कर और उसके कोमल हाथों से दो-चार तमाचे या चप्पलें खाकर फेमस हो रहा है। कोई अपनी महबूबा के पास भाग कर फेमस हो रहा है तो कोई महबूबा के पास से भाग कर। कोई प्यार के लिये नौकरी को तिलांजलि देकर फेमस हो रहा है तो कोई नौकरी के लिये अपने प्यार को धत्ता बताकर।
कोई अपनी प्रेमिका को अपनी बीबी के हाथों पिटवाकर फेमस हो रहा है तो कोई खुद ही अपनी प्रेमिका या बीबी के हाथों पिटकर। कोई पब में या सड़कों पर महिलाओं की पिटाई करके फेमस हो रहा है तो कोई पिटाई खाकर। कोई किसी को चड्ढी भेजकर फेमस हो रहा है तो कोई किसी को साड़ी भेजकर। कहने का मतलब यह है कि फेमस नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। हर किसी के लिये हर समय और हर जगह सुविधा, क्षमता और स्थिति के अनुसार फेमस होने के मौके और विकल्प उपलब्ध हैं।
संचार क्रांति के वर्तमान युग में पैदा होने वाली नयी पीढ़ी को यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि हमारे देश में एक ऐसा भयानक दौर गुजरा है जब अच्छे-खासे लोगों को फेमस होने के लाले पड़े रहते थे। यह सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि उस समय फेमस होने के लिये कितने जतन करने पड़ते थे। उस समय आदमी महान हो सकता था, ईमानदार हो सकता था, प्रतिभाशाली हो सकता था, मेहनती हो सकता था, दयावान हो सकता था, देश प्रेमी हो सकता था, समाजसेवी हो सकता था, अमीर हो सकता था, गरीब हो सकता था लेकिन फेमस नहीं हो सकता था। लाखों-करोड़ों में एकाध को ही फेमस होने का सौभाग्य मिल पाता था। लोग सालों तक समाजसेवा में जुटे रहते थे, मोटे-मोटे ग्रंथ लिख डालते थे, दर्जन-दो दर्जन फिल्मों में एक्टिंग कर लेते थे, सैकड़ों फिल्मों में गीत गा लेते थे, सीमा पर अकेले ही दुश्मनों के दांत खट्टे कर देते थे और बहादुरी के कारनामे दिखाकर दस-बीस लोगों की जान बचा लेते थे – तब भी लोग फेमस होने की हसरत लिये ही इस दुनिया से कूच कर जाते थे।
लेकिन आज फेमस होने के लिये कुछ करने की जरूरत नहीं है। आज तो लोग किसी क्षेत्र में पर्दापण करने से पहले ही फेमस होने का जुगाड़ कर लेते है। गायन और अभिनय की कई प्रतिभायें अपना फिल्मी कैरियर ‘शुरू’ करने से पहले ही फेमस हो लेती हैं, कि फिल्म रिलीज होने के बाद फेमस होने के मौके मिले या नहीं। कई लेखक बिना लिखे ही फेमस हो लेते हैं। कई लोग कुछ बनकर, कई लोग कुछ नहीं बनकर और कई लोग कुछ बनने की प्रतीक्षा करते रहने के कारण फेमस हो जाते हैं। कई पैदा होकर फेमस हो जाते हैं और कई पैदा हुये बगैर ही। कई ऐसे भी हैं जो फेमस होकर भी पैदा नहीं होते। कई लोग जो किसी कारण से जीते जी फेमस नहीं हो पाते वे मरने के बाद भूत बनते ही फेमस हो जाते हैं और साथ में वे वीरान हवेलियां भी फेमस हो जाती है जिनमें वे पनाह लेते हैं।
आज संचार क्रांति की मेहरबानी से फेमस होने के मामले में सभी भेदभाव समाप्त हो गये हैं, तमाम सामाजिक विसंगतियां दूर हो गयी है। आज फेमस होने के लिये कुछ होना, कुछ करना जरूरी नहीं है। किसी अन्य मामले में हमारे देश में समानता आयी हो या नहीं, फेमस बनाये जाने के मामले में पूरी समानता है। आज हर काई फेमस बन सकता है – अमीर और गरीब, ईमानदार और बेइमान, समाज सुधारक और समाज बिगाड़क, नायक और खलनायक, पुजारी और जुआरी।
यही तो है रियल डेमोक्रेसी।
जय हो !

अकर्मण्ये वधिकारस्ते…..

मार्च 27, 2009
अकर्मण्ये वधिकारस्ते…..
- विनोद विप्लव
राजस्थान में एक अच्छा काम हुआ लेकिन उस पर भी सवाल उठ गया। कुछ पढ़े-लिखे लोगों को गोलमा देवी का मंत्री बनना बर्दाष्त नहीं हुआ। इनका कुतर्क है कि जो महिला ‘‘लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर’’ है, वह काम क्या खाक करेगी। मानो जो पढ़े-लिखे हैं वे ही काम करते हैं और सही काम करते है।
हमारे देश में मुख्य दिक्कत काम नहीं करने की नहीं बल्कि काम करने की है। समस्या यह नहीं है कि लोग खास तौर पर मंत्री, नेता, अधिकारी और सरकारी कर्मचारी आदि काम नहीं करते, बल्कि रोना तो इस बात का है कि ये काम करते हैं। देष की तमाम समस्याओं की जड़ यह है कि जिन्हें काम नहीं करना चाहिये या यूं कहें कि जिनकी प्रकृति ‘‘कार्य विरोधी’’ है, वे काम करते हैं अथवा उन्हें काम करने के लिये मजबूर किया जाता है जबकि जिन्हें काम करना चाहिये अर्थात् जिनकी प्रकृति ‘‘कार्यसम्मत’’ है वे या तो काम नहीं करते या उन्हें काम करने नहीं दिया जाता। ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि ‘‘कार्यविरोधी’’ प्रकृति के लोगों के कार्य करने का नतीजा देष और समाज के लिये विनाशकारी साबित हुआ है।
कई मंत्री और अधिकारी जब तक कोई काम नहीं करते, महीनों तक दफ्तर नहीं आते, तब तक सबकुछ ठीक चलता है, लेकिन जब वे नियमित दफ्तर आने लगते हैं और काम करने लगते हैं तो जलजला आ जाता है। कई कंपनियां आर्थिक मंदी या घाटे के कारण नहीं बल्कि अधिकारियों के काम करने के कारण डूबी है।
जो अधिकारी एवं मंत्री समझदार एवं विकासप्रिय होते हैं वे दफ्तर जाते ही नहीं और अगर भूले-भटके से दफ्तर चले भी गये तो काम नहीं करते। केवल विनाशप्रेमी एवं विकासविरोधी लोग ही दफ्तर जाते हैं और काम करने का खतरनाक खेल खेलते हैं।
एक अधिकारी जो पहले तो मानसिक तौर पर ठीक-ठाक थे और अपनी कंपनी का भला भी कर रहे थे लेकिन अचानक पता नहीं उनपर क्या पागलपन सवार हुआ कि रोज दफ्तर जाने और काम करने पर आमादा हो गये। कंपनी का हित चाहने वाले अधिकारियों ने उन्हें समझाया कि वे सैकड़ों कर्मचारियों के बीबी-बच्चों के पेट पर लात नहीं मारें। लेकिन वह मानें नहीं। नतीजा सामने था। कंपनी बंद हो गयी और सैकड़ों लोग सडक पर आ गये।
एक अन्य कंपनी के एक अधिकारी के बारे में कुछ सिरफिरे लोगों ने कंपनी के बाॅस से शिकायत कर दी कि वह कोई काम नहीं करते। इसका नतीजा हुआ कि उस अधिकारी का तबादला दूसरे शहर में कर दिया गया। उस अधिकारी ने कंपनी पर गुस्सा निकालने के लिये नयी जगह पर पहुंच कर काम करना शुरू कर दिया और इसका नतीजा हुआ कि छह माह के भीतर उस शहर में कंपनी के सारे व्यवसाय चैपट हो गये और उस शहर में कंपनी के कामकाज को बंद करके उस अधिकारी को वापस बुलाना पड़ा तथा उन्हें काम नहीं करने पर राजी किया गया।
जब मंत्रिगण भी कुछ नहीं करते हैं तो देश ठीक चलता रहता है लेकिन जब कुछ करते हैं तो देश विनाष की ओर जाने लगता है। अगर हिसाब लगाया जाये कि मंत्रियों ने काम करके कितनी बकवास परियोजनाओं को मंजूरी दी और उन परियोजनाओं के नाम पर कितने रुपये बर्बाद किये तो साफ हो जायेगा कि ऐसे मंत्रियों का लिख लोढा पढ पत्थर रहना ही देश हित में है।
देष के विकास के लिये मंत्रियों एवं अधिकारियों पर पांच-दस वर्शों के लिये काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिये लेकिन कुछ राश्ट्रविरोधी जनसंगठनों, मीडिया और लोगों के दबाव के कारण मंत्रियों और अधिकारियों को अपनी प्रकृति के विरुद्ध काम करना पड़ता है जिसका नतीजा विनाशकारी होता है। गनीमत यह है कि आज भी कई मंत्री इतने देशप्रेमी हैं एवं देश के विकास के प्रति समर्पित हैं कि चाहे कुछ भी हो जाये अपनी प्रकृति के विरुद्ध नहीं जाते। चाहे लाख उनके पुतले जलते रहें, उनके खिलाफ प्रदर्शन होते रहें और उनपर जूते चलते रहें, देश के हित में काम नहीं करने के अपने संकल्प से डावांडोल नहीं होते जबकि कमजोर और थाली के बैंगन टाइप के मंत्री एवं अधिकारी ऐसे दबावों के आगे झुक जाते हैं और काम करके देश का बंटाधार कर देते हैं।

होली से कटती मुंबइया फिल्में

मार्च 10, 2009
भारत की संस्कृति से कटती मुंबइया फिल्मों में आज होली के रंग और उल्लास गायब हो गये हैं, लेकिन एक समय था जब होली के गीत और दृश्य हिन्दी फिल्मों के जरूरी हिस्से होते थे और होली के गीत और दृश्य फिल्मों को हिट बनाते थे। उस समय हिन्दी सिनेमा के पर्दे पर जितना लोकप्रिय त्यौहार होली होती थी शायद ही कोई और पर्व उतना लोकप्रिय था। आज भी कई फिल्मों को हम होली से जुड़े गीत, संवाद और दृश्यों के कारण ही याद करते हैं। शोले, नवरंग, मदर इंडिया, फागुन, आन, कटी पतंग, सिलसिला और गाइड जैसी फिल्में इसका उदाहरण है।
हिन्दी फिल्मों मे होली की खेले जाने की शुरूआत अमय चक्रवर्ती ने 1944 में की थी। दिलीप कुमार की पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ मेें पहली बार होली गीत फिल्माया गया था।
‘मदर इंडिया’ के ‘होली आयी रे कन्हाई’ गीत में कंगन वाले हाथ दिखा कर नायक सुनील दत्त को चिढ़ाने का अन्दाज कहानी को दुखांत मोड़ पर ले आता था। शक्ति सामंत की फिल्म ‘कटी पतंग’ का नायक राजेश खन्ना ‘आज न छोड़ेंगे रे हमजोली’ कहता हुआ विधवा नायिका आशा पारेख के गुलाल लगा देता है। यह गीत आशा पारेख के फिल्म में चरित्र का टर्निंग प्वांइट साबित होता था। कुछ ऐसा ही ‘अरे जा रे हट नटखट’ (नवरंग), ‘सात रंग में खेल रही है दिलवालों की होली र’े (आखिर क्यों) और ‘पिया संग खेलूं होली’ (फागुन) जैसे होली गीतों में भी था।
नयी पीढ़ी की फिल्मकार पूजा भट्ट ने बतौर निर्माता अपनी पहली फिल्म में एक होली गीत रखा था पर युवा दर्शकों को उसमें मजा नहीं आया। इसे देखते हुए पूजा भट्ट ने अपनी बाद की किसी भी फिल्म में होली गीत रखने की हिम्मत नहीं जुटाई। पूजा भट्ट कहती हैं, ‘मुझे ऐसा कोई कारण नजर नहीं आया कि मैं अपनी अगली फिल्म में ऐसा कोई सीक्वेंस दोहराती।’
शायद यही कारण है कि अपनी लगभग हर फिल्म में होली गीत रखने वाले यश चोपड़ा फिल्मों में होली गीत नजर नहीं आते। ‘धूम’, ‘धूम – 2’, ‘नील एन निक्की’, आदि फिल्मों के विदेशी सरजमीं और कहानी वाली फिल्मों में होली गीतों की कोई गुंजाइश भी नहीं है।
फिल्म शोले की सफलता में जिन चीजों का योगदान है उनमें होली से जुडे संवाद एवं गीत का है लेकिन ‘शोले’ की रीमेक रामगोपाल वर्मा की ‘आग’ में शोले के होली गीत की नकल पर एक अदद होली गीत जिसे दर्शकों ने इसे बिल्कुल पसंद नहीं किया और यह फिल्म हिन्दी सिनेमा के सर्वाधिक फ्लाप फिल्मों में शुमार हो गयी। केतन मेहता की फिल्म ‘मंगल पांडेय – द राइजिंग हीरो’ की होली का भी यही हाल रहा।
हालांकि रवि चोपड़ा और विपुल शाह ने अपनी फिल्मों ‘बागबान’ और ‘वक्त- द रेस अगेंस्ट टाइम’ में होली गीत
रखा। हालांकि, ‘बागबान’ का होली गीत ‘खेलत रघुवीरा’ ब्रज की होली से प्रभावित था, वहीं ‘वक्त’ के गीत में डिस्को का प्रभाव था जिसमें नायक अक्षय कुमार डिस्को की धुन पर थिरकते हुए हाथों में पिचकारी पकड़े नायिका प्रियंका चोपड़ा से कहते हैं ‘डू मी ए फेवर लेट्स प्ले होली’ ।
पुराने जमाने के फिल्मकारों ने अपने अपने लिहाज से अपनी फिल्मों में होली का उपयोग किया। खासतौर पर निर्माता निर्देशक यश चोपड़ा ने अपनी फिल्मों में होली और इसके रंगों का भरपूर उपयोग किया। ‘मशाल’ (होली आयी होली आयी देखो होली आयी), ‘डर’ (अंग से अंग लगाना साजन मोहे रंग लगाना साजन) और ‘मोहब्बतें’ (सोहणी सोहणी अंखियों वाली) जैसी फिल्मों के होली गीत प्रमाण हैं कि चोपड़ा ने होली के रंगों की मादकता का भरपूर उपयोग किया। ‘सिलसिला’ का ‘रंग बरसे चुनर वाली’.. गीत जहां होली की मस्ती का बयां करता था, वहीं फिल्म की कहानी को भी जबर्दस्त मोड़ देने वाला गीत था।
इन सबके बीच एक अच्छी खबर यह है कि प्रसिद्ध फिल्मकार अनुराग कश्यप की फिल्म ‘‘गुलाल’’ होली के मौके पर दर्शकों को शायरी के रंग से सराबोर करेगी। महानतम शायर एवं गीतकार साहिर लुधियानवी को समर्पित फिल्म 13 मार्च को सिनेमा घरों में रिलीज हो रही है।

Livelong worklessness!

मार्च 10, 2009
कर्महीनता जिंदाबाद !
- विनोद विप्लव
चुनाव के मौसम ने दस्तक दे दी है। काम के आधार पर वोट मांगने और वोट देने का परम्परागत पंचवार्शिक नाटक एक बार फिर दोहराया जाने लगा है। आपने देख लिया कि साठ साल से ‘‘काम के लिये’’ वोट देने का नतीजा क्या रहा। आज जरूरत ‘‘काम के लिये’’ नहीं बल्कि ‘‘काम नहीं करने के लिये’’ वोट देने की है। केवल उन्हीं उम्मीदवारों को वोट दिया जाना चाहिये कि जो ‘‘काम नहीं करने’’ का वचन दें। वोट देने से पहले उम्मीदवारों को ठोक-बजाकर परख लिया जाना चाहिये कि चुनाव जीतने के बाद वाकई वे काम तो नहीं करने लगेंगे।
देषहित में ऐसा किया जाना जरूरी है। दरअसल हमारे देश में मुख्य दिक्कत ‘‘काम नहीं करने की’’ नहीं बल्कि ‘‘काम करने की’’ है। समस्या यह नहीं है कि सांसद, विधायक, मंत्री आदि ‘‘काम नहीं करते हैं ’’, बल्कि रोना तो यह है कि ‘‘वे काम करते हैं’’। तमाम समस्याओं की जड़ ओर हमारे पिछड़ेपन का कारण यह है कि जिन लोगों को अपनी मूल प्रकृति के अनुरूप काम नहीं करना चाहिये वे अपनी प्रकृति के विरूद्ध या तो काम करते हैं अथवा उन्हें काम करने के लिये मजबूर किया जाता है।
अब तक के हमारे अनुभव एवं आंकड़े इस बात के गवाह है कि सांसदों, विधायकों और नेताओं के काम करने का नतीजा विनाशकारी होता है। जब ये लोग काम नहीं करते हैं तो देश ठीक-ठाक चलता रहता है और देष का विकास होता है लेकिन जब ये कुछ करते हैं तो देश विनाष की ओर जाने लगता है। अगर हिसाब लगाया जाये कि इन्होंने काम करके राजस्व और राश्ट्रीय संसाधनों की कितनी बर्बादी की है तो साफ हो जायेगा कि इनका ‘‘काम नहीं करना’’ ही देषहित में है।
मेरे विचार से तो कम से कम पांच साल के लिये और अधिक से अधिक हमेषा के लिये सांसदों, विधायकों, मंत्रियों आदि पर ‘‘कार्य प्रतिबंध’’ लगा दिया जाना चाहिये। जो लोग चुनाव जीतकर काम करें, उन्हें दोबारा चुनाव जीतने नहीं दिया जाना चाहिये। हालांकि आज कई सांसद और विधायक अपनी प्रकृति से अच्छी तरह वाकिफ हैं और वे देषहित की खातिर कोई भी काम नहीं करना चाहते हैं लेकिन कुछ राश्ट्रविरोधी जनसंगठनों, मीडिया और लोगों के दबाव के कारण इन्हें काम करना पड़ता है। इन पर इस तरह का दबाव डाला जाना देष के खिलाफ घोर साजिष है और इस बात की जांच करायी जानी चाहिये कि इन्हें काम करने के मजबूर किये जाने के पीछे कहीं देषविरोधी ताकतों, आई एस आई या सी आई ए का हाथ तो नहीं है।
गनीमत यह है कि आज भी कई सांसद, विधायक, मंत्री आदि इतने देश प्रेमी हैं एवं देश के विकास के प्रति इस कदर समर्पित हैं कि चाहे कुछ भी हो जाये वे ‘‘काम नहीं करने’’ की अपनी मूल प्रकृति के विरुद्ध नहीं जाते। लाख उनके पुतले जलते रहें, उनके खिलाफ प्रदर्शन होते रहें और उनपर जूते पड़ते रहें, वे देशहित की खातिर ‘‘काम नहीं करने’’ के अपने संकल्प से बिल्कुल डावांडोल नहीं होते हैं लेकिन कुछ कमजोर, संकल्प विहीन और थाली के बैंगन टाइप के सांसद, विधायक और मंत्री ऐसे दबावों और विरोधों के आगे टूट जाते हैं और काम करने लगते हैं जिससे देश का बंटाधार हो जाता है।

ये भी हैं ऑस्कर के दावेदार

मार्च 5, 2009
विनोद विप्लव
कांग्रेस ने ‘स्लमडॉग मिलिनेअर’ को ऑस्कर पुरस्कार दिए जाने पर अपनी पीठ थपथपाई। शुक्र है कि उसने संयम एवं शिष्टाचार का परिचय देते हुए केवल अपनी पीठ थपथपाकर संतोष कर लिया और चुप बैठ गई। अगर वह इस फिल्म के निर्माण में अपने महत्वपूर्ण योगदान के लिए ऑस्कर पुरस्कार की मांग कर बैठती तो ऑस्कर अकैडमी वालों के लिए इनकार करना मुश्किल हो जाता। स्लगडॉग … के लिए ऑस्कर पुरस्कार पर एक तरह से उसका ही पहला हक है।
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यह बात और है कि कांग्रेस ने कर्म प्रधान पार्टी होने का परिचय देते हुए इस मुद्दे को तूल नहीं दिया। आज झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले हर फटेहाल व्यक्ति और हर नंग-धड़ंग बच्चे स्लमडॉग ….को ऑस्कर मिलने का सेहरा अपने सिर बांध रहे हैं और ऐसे दावे कर रहे हैं कि मानो अगर वे नहीं होते तो यह फिल्म बनती ही नहीं। कई ऐसे लोग भी अपने ही नाम का जयघोष कर रहे हैं, जिनका इस फिल्म से दूर-दूर का नाता नहीं है। दुर्भाग्य है कि मीडिया भी ऐसे लोगों के इंटरव्यू दिखाकर और छापकर इन्हें मुफ्त में प्रचार दे रहा है जबकि इनका इस फिल्म से कोई लेना देना नहीं है।
राजनीतिक पार्टियों, संगठनों, सरकारी विभागों, नगर निगमों और पुलिस महकमे का कोई नाम भी नहीं ले रहा है जबकि इनके योगदान के बगैर इस फिल्म की कल्पना भी मुश्किल थी। दूसरी तरफ देश के कई नेताओं ने बड़े-बड़े दावे नहीं करके यह साबित कर दिया है कि वे कथनी में नहीं, करनी में विश्वास रखते हैं। इस फिल्म के निर्माण को संभव बनाने में विभिन्न तरीके से योगदान करने वाले राजनीतिक दल, सरकारी विभाग, पुलिस, नेता, मंत्री एवं अधिकारी गण सचमुच महान हैं कि वे अपने योगदान की चर्चा तक नहीं कर रहे हैं। ऐसी महानता भारत में ही संभव है।
एक लेखक होने के नाते मुझे ऐसी महान पार्टियों, नेताओं और मंत्रियों की चुप्पी और कुछ फालतू लोगों का बड़बोलापन हजम नहीं हो रहा है। मेरा मानना है कि जिस तरह फिल्म के लिए डैनी बॉयल, ए. आर. रहमान और अन्य लोगों को ऑस्कर पुरस्कार दिए गए, उसी तरह राजनीतिक दलों, सरकारी विभागों, पुलिस, नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों को भी पुरस्कार दिए जाने चाहिए थे, जिनके कारण भारत ने विकास की उस बुलंदी को छू लिया है कि डैनी बॉयल जैसे फिल्मकारों को स्लमडॉग…. जैसी फिल्में बनाने की प्रेरणा मिलती है। कांग्रेस समेत विभिन्न पाटिर्यों ने देश के विकास एवं समृद्धि के लिए महान कार्य किए हैं उनके कारण ही भारत में स्लमडॉग….जैसी अंतरराष्ट्रीय फिल्म के निर्माण के लिए अनुकूल माहौल तैयार हो सका और फिल्म की शूटिंग के लिए अनुकूल स्थितियां एवं दृश्य उपलब्ध हो पाए। भारत में विकास के इस सूरतेहाल का श्रेय केवल कांग्रेस को नहीं मिलना चाहिए, अन्य पार्टियों का योगदान भी कोई कम नहीं है।
यह भी सोचा जाना चाहिए कि नगर पालिकाओं, नगर निगमों और अन्य स्थानीय निकायों का इस फिल्म के लिए कितना योगदान है। पुलिस महकमे का रोल क्या किसी से कम है। ऑस्कर वाले चाहें तो वे एक आयोग गठित कर सकते हैं जो यह पता लगाएगा कि इस फिल्म को संभव बनाने में किनका कितना योगदान है। इसके अलावा अकैडमी को ऑस्कर पुरस्कारों की कई नई श्रेणियां भी शुरू करनी चाहिए ताकि राजनीतिक दलों, सरकारी विभागों, मंत्रियों एवं अधिकारियों को भी पुरस्कार मिल सके।
इस बार तो चलिए जो हो गया सो हो गया। अब आगे से सरकार के तमाम विभागों एवं राजनीतिक दलों को भारत को ऑस्कर स्तरीय फिल्मों के निर्माण के मुख्य केन्द्र के रूप में विकसित करने के काम में जुट जाना चाहिए। स्लमडॉग मिलिनेअर के जरिए दुनिया भर में भारत की जो भारी प्रसिद्धि मिली है, उसे देखते हुए यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि भविष्य में भारी संख्या में अंतरराष्ट्रीय फिल्मकार भारत आकर अपनी फिल्में बनाएंगे और उन्हें ऑस्कर में भेजेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश में ज्यादा से ज्यादा झुग्गी झोपडि़यां बनेंगी। शहरी गरीबों की संख्या भी बढ़ेगी ताकि ऐसी फिल्मों के लिए चरित्र मिल सकें।
2 Mar 2009, 2359 hrs IST,नवभारत टाइम्स
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4214144.cms

Ghost Television

फ़रवरी 1, 2009
भूत टीवी
हमारे देश की जनसंख्या एक अरब से अधिक हो गयी है। हमारे देश में हर साल तकरीबन एक करोड़ लोगों की मौत होती है। हिन्दी के टीवी चैनलों के शोध के मुताबिक मरने वाले शर्तिया तौर पर भूत बनते हैं। कह सकते हैं कि करीब 27 हजार भूत रोज जन्मते हैं। इन चैनलों के गहन अनुसंधान के अनुसार भूत कभी नहीं मरते हैं। धरती पर मानव सभ्यता के अविर्भाव से अब तक जितने लोग मरे और भूत बने, इनकी गणना के आधार पर कह सकते हैं कि भूतों की आबादी कई अरब महाशंख से अधिक हो गयी है।लेकिन यह अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि महान संचार क्रांति के इस युग में भी भारत में ऐसा एक भी टेलीविजन चैनल नहीं है जो ‘‘भूतों का, भूतों के लिये और भूतों के द्वारा’’ हो, जबकि हमारे देष में ‘‘अभूतों’’ के लिये दो सौ से अधिक चैनल हैं और कुछ दिनों या महीनों में इससे भी अधिक चैनलों के शुरू होने की आशंका है। हमारे लिये अगर कोई संतोष की बात है तो बस यही है कि आज कुछ गिनती के ऐसे चैनल हैं जो भूतों एवं उनसे जुडे मुद्दों को ‘‘अभूतों’’ की खबरों और उनकी समस्याओं की तुलना में कई गुणा अधिक प्राथमिकता देते हैं। केवल यही दो-चार चैनल हैं जो सही मायने में भूत प्रेमी कहे जा सकते हैं। एक-दो बकवास चैनल तो ऐसे घनघोर भूत विरोघी हैं कि वे भूतों की इतनी बड़ी आबादी की बिल्कुल ही चिंता नहीं करते। यह बड़ी बेइंसाफी है। इतने विशाल भूत समुदाय को टेलीविजन क्रांति के लाभों से वंचित किया जाना भूतों के खिलाफ अभूतों की साजिश है। यह वाकई गंभीर चिंता का विषय है और इस दिशा में सरकार, मंत्रियो, नेताओं, उद्योगपतियों, चैनल मालिकों, मीडियाकर्मियों और समाजिक संगठनों को गंभीरता से सोचना चाहिये तथा भूतों पर केन्द्रित टेलीविजन चैनल शुरू करने की दिशा में पूरी शिद्दत के साथ पहल करनी चाहिये। ऐसा टेलीविजन चैनल न केवल व्यापक भूत समुदाय के हित में होगा बल्कि टीआरपी, विज्ञापन बटोरने और व्यवसाय की दृष्टि से भी बहुत अधिक लाभदायक होगा जो हर टेलीविजन चैनलों का एकमात्र उद्देश्य होता है।मैंने यह प्रस्ताव उन चैनल मालिकों और उद्योगपतियों के लाभ के लिए तैयार किया है जो कोई टेलीविजन चैनल खोलने के लिए भारी निवेश करने का इरादा तो रखते हैं लेकिन यह फैसला नहीं कर पा रहे हैं कि किस तरह का चैनल शुरू करना व्यावसायिक एवं राजनीतिक रूप से फायदेमंद रहेगा। भूत चैनलों के स्वरूप और लाभ-खर्च का विस्तृत ब्यौरा मैंने तैयार कर लिया है, केवल फाइनेंसरों का इंतजार है।मैंने व्यापक अध्ययन एवं शोध के आधार पर यह नतीजा निकाला है कि अगर भूतों पर केन्द्रित कोई चैनल शुरू किया जाए तो उसकी टीआरपी और उससे प्राप्त होने वाली आमदनी ‘‘अभूतों’’ पर केन्द्रित चैनलों की तुलना में कई करोड़ गुना अधिक होगी। इसके अलावा ऐसे चैनल बहुत कम निवेश में ही शुरू किए जा सकते हैं। इस चैनल के लिये चैनल प्रमुख से लेकर बाईट क्लक्टर जैसे पदों पर नियुक्ति में उन मीडियाकर्मियों को प्राथमिकता दी जाए जो या तो भूत हो चुके हैं या जो जीते जी ही ‘‘भूत सदृश’’ हैं। ‘‘भूत सदृश’’ मीडियाकर्मी ‘‘भूत प्रेमी’’ चैनलों में काफी संख्या में मिल सकते हैं।भूतों पर केन्द्रित चैनलों को बढ़ावा देने के लिये सरकार एक नया मंत्रालय बना सकती है। भूत समुदाय के विकास में मौजूदा हिन्दी टेलीविजन चैनलों के योगदान तथा भारत में भूत चैनलों की संभावनाओं एवं उनके स्वरूप आदि के बारे में अध्ययन करने के लिए सरकार ‘भूत चैनल आयोग’ का गठन कर सकती है। सरकार भूतों पर चैनलों की स्थापना को प्रोत्साहित करने के लिये ‘विशेष भूत पैकेज’ की घोशणा कर सकती है।यह स्वीकार करते हुए कि इस दिशा में चाहे जितनी तेजी से काम किया जाए, भूतों के लिये सम्पूर्ण टेलीविजन चैनल के शुरू होने में एक-दो साल तो लग ही सकते हैं और ऐसे में सरकार मौजूदा भूत प्रेमी चैनलों को ही सम्पूर्ण भूत टीवी बनने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है। इसके लिए सरकार उन्हें विशेष सहायता भी दे सकती है। मेरी जानकारी में हमारे देश में एक या दो चैनल तो ऐसे हैं ही जिनके नाम से ‘इंडिया’, ‘आज’ और ‘न्यूज’ जैसे शब्द या शब्दों को हटाकर उनके स्थान पर अगर ‘भूत’ या ‘भुतहा’ शब्द लगा दिया जाए तो वे सम्पूर्ण भूत चैनल बन जाएंगे और हमारा लक्ष्य काफी हद तक पूरा हो जायेगा।

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