बुधवार, 13 जुलाई 2011

आईबीएन 7 पर हमले के बाद फंस गई सरकार

> सरकार को भारी पड़ा मीडिया से पंगा

सरकार को भारी पड़ा मीडिया से पंगा

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...
Font size:

सरकार को भारी पड़ा मीडिया से पंगा


संजय शर्मा

संजय शर्मा, लेखक वीक एंड टाइम्स के सम्पादक हैं
अगर सरकार के स्तुति गान में जुटे पुलिस अफसरों को पता होता कि मीडिया पर हमला पूरी सरकार पर भारी पड़ जायेगा तो वह इसकी गुस्ताखी कभी नहीं करते। मगर ऐसा हो ना सका और आईबीएन 7 के ब्यूरो चीफ शलभ मणि त्रिपाठी पर हुए हमले के बाद सरकार को जिस तरह फजीहत का सामना करना पड़ा, उसकी सपने में भी कल्पना सरकार चला रहे अफसरों ने नहीं की होगी। सरकार को इससे यह भी नुकसान हुआ कि जिस मुद्दे की रिपोर्टिंग से नाराज होकर शलभ पर हमला हुआ था वह मुद्दा और चर्चा में आ गया। दरअसल लखनऊ में दो सीएमओ और एक डिप्टी सीएमओ की हत्या के बाद माया सरकार की बहुत किरकिरी हो रही थी। जिस तरह से दोनों सीएमओ की हत्या के बाद डिप्टी सीएमओ डॉक्टर सचान की मौत जिला कारागार में हुई उसने सरकार को बैकफुट पर ला दिया था। सरकार ने दावा किया
था कि दोनों सीएमओ की हत्याओं के जिम्मेदार डॉक्टर सचान ही थे फिर जिला कारागार में उनकी मौत ने सारी तस्वीर ही बदल दी। सरकार के आला अफसर शुरुआती दौर में कोशिश करते रहे कि सारा मामला खुदकुशी का ही लगे। मगर मीडिया की सक्रियता से साबित हो गया कि सचान ने खुदकुशी नहीं की थी बल्कि उनकी हत्या की गई थी। इस खुलासे में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का बड़ा योगदान रहा। आईबीएन 7 के शलभ उस कैदी को ढूंढ़ लाये जो सचान की हत्या वाले दिन रिहा हुआ था।
जाहिर है ऐसी तेजी सरकार को पसंद नहीं आती और इसी जोश में सरकार के करीबी माने जाने वाले एएसपी वीपी अशोक और हजरतगंज के क्षेत्राधिकारी अनूप कुमार ने शलभ मणि और उनके सहयोगी मनोज राजन त्रिपाठी से न सिर्फ अभद्रता की बल्कि एक अपराधी की तरह शलभ मणि को थाने ले जाया गया। इसी बीच मौके से भाग गये मनोज राजन त्रिपाठी ने सभी पत्रकारों को इसकी सूचना दे दी। सूचना पाते ही बड़ी संख्या में पत्रकार हजरतगंज थाने पर इकट्ठा हो गये। तनाव की स्थिति को देखते हुये जिलाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक हजरतगंज कोतवाली पहुंचे मगर पत्रकारों ने उनसे बात करने से ही मना कर दिया। पत्रकार बेहद आक्रोशित थे और इस घटना के बाद वे शासन से आर-पार की लड़ाई का मन बना चुके थे।
बारिश के बावजूद पत्रकारों ने मुख्यमंत्री निवास की ओर कूच कर दिया। बड़ी संख्या में पत्रकारों के मुख्यमंत्री निवास पर जाने की खबर शासन में खलबली मचा दी। आनन-फानन में शासन स्तर पर तय किया गया कि मुख्यमंत्री के सचिव नवनीत सहगल को ही इस मुसीबत से निपटने के लिये भेजा जाये। नवनीत सहगल पत्रकारों के पास पहुंचे जो मुख्यमंत्री आवास के निकट ही धरने पर बैठे हुये थे। जबरदस्त नारेबाजी के बीच पत्रकार मांग कर रहे थे कि एएसपी और सीओ को निलंबित किया जाये जबकि श्री सहगल घटना की उच्चस्तरीय जांच करवाने के पक्ष में थे।
मगर सड़क पर बैठकर जबरदस्त नारेबाजी कर रहे पत्रकार अपनी शर्तों से हटने को तैयार ही नहीं थे। इस बीच सूचना पाते ही राजनैतिक दलों ने भी सरकार की निंदा शुरू कर दी। मौके पर पहुंचे कांग्रेस के प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह ने कहा कि इस सरकार की लोकतांत्रिक मूल्यों में पहले भी आस्था नहीं थी और अब मीडिया पर हमला करके सरकार ने दिखा दिया कि वह उन सब लोगों के दमन पर आमादा है जो सरकार के खिलाफ कुछ भी कहने या सच्चाई सामने लाने के पक्षधर हैं।
राजनीतिक दलों की सक्रियता और मीडियाकर्मियों के बढ़ते गुस्से के बाद श्री सहगल समझ गये थे कि अब यह मामला आसानी से निपटने वाला नहीं है। उन्होंने मोर्चे पर अपने विश्वस्त कुछ पत्रकारों को लगाया कि वह इस मामले को मैनेज करें मगर उन पत्रकारों को बाकी पत्रकारों ने भी टका सा जवाब दे दिया कि इस मामले में कोई पत्रकार श्री सहगल से बात करने नहीं जायेगा जिसे बात करनी हो वह सड़क पर बैठकर बात करे। पत्रकारों के गुस्से को देखते हुये श्री सहगल पत्रकारों के पास जमीन पर आकर बैठे और दोनों अधिकारियों को निलंबित करने की घोषणा की।
उधर इस घटना के बाद कांग्रेस के पदाधिकारियों ने प्रधानमंत्री से मिलकर भी इस घटना की जानकारी दी। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के अनुसार प्रधानमंत्री ने इस घटना पर दुख जाहिर किया। बाद में पत्रकारों ने लखनऊ में एक मार्च भी निकाला। चुनाव की दहलीज पर खड़ी सरकार के लिये यह बड़ा झटका था। पूरे कार्यकाल में सरकार मीडिया को खुश कर पायी हो ऐसा भी नहीं था। मुख्यमंत्री मायावती खुद मीडिया से ज्यादा संवाद नहीं रखती। कुछ मामलों को छोड़ दें तो बाकी मामलों में उनके बयान कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ही बताते हैं। सूचना विभाग में प्रमुख सचिव के पद को लेकर भी लम्बी राजनीति चलती रही है। पूर्व प्रमुख सचिव सूचना विजय शंकर पांडे और शशांक शेखर सिंह के बीच छत्तीस का आंकड़ा पहले भी चर्चा का विषय रहा है। ऐसा कोई अधिकारी पूरी सरकार के कार्यकाल में नहीं रहा जो पत्रकारों से बेहतर संवाद लगातार बनाता रहता। सचिव सूचना दिवाकर त्रिपाठी के संबंध जरूर मीडिया से बेहतर हैं। इसीलिये उनको अवकाश के बाद भी सेवा विस्तार दिया गया। इस आंदोलन में पत्रकारों ने साफ तौर पर कहा कि अब सरकार अगर मीडिया पर किसी भी तरह का हमला करती है तो उसका मुंहतोड़ जवाब दिया जायेगा। इस आंदोलन में प्रमुख रूप से एनडीटीवी के कमाल खान, स्टार न्यूज के पंकज झा, इंडिया टीवी की रुचि कुमार, कुमार सौवीर, हरीश मिश्रा, शरद प्रधान, मुदित माथुर, हिसामुल सिद्दीकी आदि शामिल थे। जिन्होंने कहा कि किसी भी कीमत पर पत्रकारों का उत्पीडन बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। कांग्रेस के विधान परिषद सदस्य नसीब पठान ने भी इस घटना की तीखी आलोचना करते हुये कहा कि मीडिया किसी भी सरकार की नीतियों का आईना होता है। मीडिया पर हमला करने के स्थान पर सरकार को मीडिया द्वारा उठाये जा रहे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिये।
यह सारी स्थितियां किसी भी सरकार के लिये बेहतर नहीं कही जा सकती। उधर केन्द्र सरकार चुनाव से पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को मैनेज करने की कोई कोशिश नहीं छोड़ रही। ऐसे में उन पत्रकारों तथा मीडिया समूह जिन्हें इस सरकार में अपेक्षित सम्मान नहीं मिला के लिये यह स्थितियां बहुत अनुकूल है कि सरकार और मीडिया के बीच यह संवादहीनता कुछ महीने और बनी रहे जिससे बाद में सरकार से हिसाब-किताब बराबर किया जा सके। इन कमजोरियों के बीच जाहिरा तौर पर आईबीएन 7 जैसे चौनल से पंगा आने वाले दिनों में सरकार पर भारी पड़ सकता है।

1 टिप्पणी: