रविवार, 10 जुलाई 2011

मीडिया--पाकिस्तान में मीडिया पर गहराता संकट



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पाकिस्तान में मीडिया पर गहराता संकट तनवीर जाफरी

तनवीर जाफरी लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं संपर्क tjafri1@gmail.कॉम tanveerjafriamb@gmail.

शायर ने ठीक ही कहा है कि-
झूठ   सलीक़े   से  बोलोगे तो  सच्चे  कहलाओगेे।
सच को सच कह दोगे अगर तो फांसी पर चढ़ जाओगे।।
शायर के यह विचार और कहीं उतने चरितार्थ हों या न हों परंतु कम से कम पकिस्तान में तो अक्षरश: चरितार्थ होते देखे ही जा सकते हैं। वॉल स्ट्रीट जनरल के 38वर्षीय अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल का अपहरण तथा 2002 में उसकी की गई नृशंस हत्या से लेकर अब तक दर्जनों पत्रकार पाकिस्तान में सिर्फ इसी बात का खमियाज़ा भुगत चुके हैं कि उन्होंने अपनी रिपोर्टिंग,आलेख या समीक्षा में पाकिस्तान के ज़मीनी हालात तथा उसकी सच्चाई उजागर करने का साहस आखिर  कैसे किया। पाकिस्तान के सत्ताधीश,फौजी हुक्मरान, आईएसआई के अधिकारी यह कतई पसंद नहीं करते कि दुनिया को पाकिस्तान में गहराती चरमपंथ व आतंकवाद की जड़ों का सही-सही अंदाज़ा हो सके। पाक शासक व सैन्य अधिकारी यह भी नहीं चाहते कि दुनिया को इस बात का इल्म हो कि किस प्रकार आई एस आई तथा पाक सेना आतंकियों से गुप्त रूप से सांठगांठ बनाए हुए है। वे कश्मीर सहित पूरे भारत  में आईएसआई द्वारा चलाए जा रहे भारत विरोधी आतंकी मिशन का भी भंडाफोड़ नहीं चाहते।
इतना ही नहीं बल्कि पाक शासक आंतरिक राजनीति अथवा अन्य आंतरिक मामलों को लेकर भी अपनी आलोचना मीडिया के माध्यम से सुनने के कतई आदि  नहीं हैं। याद कीजिए जनरल परवेज़ मुशर्रफ के शासनकाल का वह लगभग अंतिम दौर जबकि उन्होंने पाकिस्तान के मशहूर टीवी चैनल जियो टीवी को अपना एक साक्षात्कार दिया था। इस साक्षात्कार में मुशर्रफ ने कुछ अंश प्रसारित न करने की संपादक हामिद मीर को हिदायत दी थी। परंतु हामिद मीर ने अपनी निष्पक्ष पत्रकारिता का दायित्व निभाते हुए मुशर्रफ का असंपादित साक्षात्कार  प्रसारित किया। जैसे ही साक्षात्कार के विवादित अंश टीवी पर प्रसारित होना शुरु हुए उसी समय परवेज़ मुशर्रफ के सरकारी गुंडों ने जियो टी वी के  दफ्तर  में घुसकर भारी तोड़-फोड़ कर डाली। मीडिया की आज़ादी का गला घोंटने का यह प्रयास पाकिस्तान के किसी सामान्य नेता,धर्मगुरु या अधिकारी द्वारा नहीं बल्कि सीधे तौर पर तत्कालीन राष्ट्राध्यक्ष द्वारा किया जा रहा था। यह घटना इस बात का सुबूत है कि पाकिस्तान की सेना,शासन तथा आईएसआई की व्यवस्था से जुड़े लोग अपनी उन सच्चाईयों पर पर्दा डाले रखना चाहते हैं जो वास्तव में पाकिस्तान को रसातल की ओर ले जा रही हैं। और यही सच्चाईयां इस समय न सिर्फ पाकिस्तान के आम नागरिकों के लिए सबसे बड़ा धोखा साबित हो रही हैं बल्कि इन्हीं कारणों से पाकिस्तान को पूरी दुनिया में रुसवा व बदनाम भी होना पड़ रहा है। पाकिस्तान के यही हालात पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित किए जाने की कगार पर भी ले जा चुके हैं।
पाकिस्तान में पत्रकारों को डराना-धमकाना, उनका अपहरण करना तथा बेरहमी से पत्रकारों की हत्या करना अब पाकिस्तान के लिए कोई नई बात नहीं रह गई। ठीक उसी तरह जैसे कि पाकिस्तान में आत्मघाती हमले का होना अब कोई विशेष खबर नहीं है। पाकिस्तान में इस समय चारों ओर अराजकता,असुरक्षा तथा आतंकवाद का बोलबाला है। पाक सेना व आईएस आई की आतंकियों से जगज़ाहिर मिलीभगत ने आज आतंकियों के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि अब पाक स्थित चरमपंथी तथा अफगानिस्तान की सीमा की ओर से आने वाले तालिबानी व कबाईली आतंकी अब सीधे पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों को ही चुनौती देने लगे हैं। पिछले दिनों कराची में मेहरान नौसैनिक अड्डे पर जिस प्रकार आतंकवादियों ने हमला बोला उसे देखकर कई पाक सैन्य अधिकारियों ने स्वयं इस बात का संदेह ज़ाहिर किया है कि इतनी साहसिक व सुनियोजित आतंकी कार्रवाई करने वाले लोग केवल सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त आतंकवादी ही हो सकते हैं। मेहरान नेवल बेस को आतंकियों से मुक्त कराने के लिए पाकिस्तान की स्पेशल  सर्विसिज़ ग्रुप नेवी अर्थात् एस एस जी एन को पंद्रह घंटों का समय लगा। ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान में एसएसजीएन की वही क्षमता व हैसियत है जोकि अमेरिका में यूएस नेवी सील की है। कराची के इस आप्रेशन में आतंकवादी दो लड़ाकू विमानों सहित भारी मात्रा में सैन्य सामग्री को भी नष्ट कर गए।
इस प्रकार की प्रशिक्षण प्राप्त आतंकी कार्रवाई को देखकर निश्चित रूप से उन संदेहों की पुष्टि होती है कि आतंकवादी गिरोहों में तमाम ऐसे लोग शामिल हो चुके हैं जो या तो वर्तमान में भी पाक सेना से जुड़े हैं या फिर वे पूर्व सैनिक हैं। मुंबई के 26/11 के चरमपंथी हमलों में भी पाकिस्तान सेना द्वारा प्रशिक्षित एवं सहायता प्राप्त आतंकवादियों के शामिल होने का खुलासा हो चुका है। अब सवाल यह है कि यदि इन्हें पाकिस्तान में प्रशिक्षित नहीं किया गया फिर आखिर  इन्हें किसने प्रशिक्षित किया? परंतु पाकिस्तान के शासक व सैन्य अधिकारी यह कतई बर्दाश्त नहीं करते कि कोई शख्स  विशेषकर मीडियाकर्मी ऐसी कड़वी सच्चाईयों को उजागर करने का साहस करे। और यदि कोई पत्रकार अपने पेशे के प्रति ईमानदार व समर्पित है तथा उसने ऐसी सच्चाईयों को दुनिया के सामने लाने की कोशिश की तो उसे अपने इस कर्तव्य तथा साहस का भुगतान किसी भी रूप में करना पड़ सकता है। यहां तक कि उसे अपनी जान भी गंवानी पड़ सकती है। और कुछ ऐसा ही पिछले दिनों सलीम शहज़ाद नामक एक युवा पत्रकार के साथ पाकिस्तान में हुआ। 40 वर्षीय सलीम शहज़ाद एशिया टाई स ऑन लाईन का पाक ब्यूरो प्रमुख था। उसने पाकिस्तानी नौसेना तथा अलकायदा के मध्य सांठगांठ होने जैसे नापाक रिश्तों का सप्रमाण पर्दाफाश किया था। इस आशय का लेख प्रकाशित होते ही सलीम शहज़ाद को धमकियां मिलने लगीं थीं। और आखिरकार  उसका अपहरण कर उसकी हत्या कर दी गई। सलीम की लाश इस्लामाबाद से लगभग दौ सौ किलोमीटर दूर एक सुनसान जगह पर पाई गई। पाक मीडिया में संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि हो न हो सलीम शहज़ाद की हत्या आईएसआई ने ही कराई है।
आई एस आई तथा पाक सेना अपनी काली करतूतों को मीडिया की नज़रों से किस प्रकार छिपाना चाहती है और यदि उनकी कोई काली करतूत मीडिया ने उजागर कर भी दी तो उस पत्रकार से यह किस प्रकार निपटते हैं इसका भी एक उदाहरण तीन वर्ष पूर्व पाकिस्तान में देखने को मिल चुका है। अमेरिका की विश्वस्तरीय अंग्रेज़ी पत्रिका टाईम मैगज़ीन के एक पत्रकार ने इस बात का सचित्र व सप्रमाण पर्दाफाश किया था कि भारत का मोस्ट वांटेड दाऊद इब्राहिम कराची में किस स्थान पर और किस आलीशान कोठी में किस शानोशौकत के साथ रह रहा है। इसी पत्रकार ने अपने लेख में यह भी लिखा था कि दाऊद इब्राहिम को पाकिस्तान में किस प्रकार आईएसआई, सैनिकों व पूर्व सैनिकों का संरक्षण मिला हुआ है। दाऊद इब्राहिम तथा आईएस आई की इस मिलीभगत का भंडाफोड़ करने के तत्काल बाद ही भारत सहित दुनिया के कई देशों में आतंकवाद को पनाह देने वाला पाकिस्तान का असली चेहरा एक बार फिर से बेनकाब हो गया था। आतंकवादियों को पनाह देने के इल्ज़ामों से घिरता जा रहा पाकिस्तान दाऊद इब्राहिम की पाक में मौजूदगी के सुबूत प्रकाशित होने से और भी बौखला गया। आखिर कार आईएसआई तथा पाक जासूसों ने उस सत्यवादी व कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार का भी अपहरण कर लिया तथा उसे कई दिनों तक भरपूर शारीरिक व मानसिक यातना दी। उसे खूब डराया-धमकाया व प्रताडि़त किया गया तथा उससे एक फर्जी सुसाईड नोट तक लिखवा लिया गया। आखिर कार डरा-सहमा वह पत्रकार अपने परिवार सहित पाकिस्तान छोड़कर चला गया तथा अमेरिका में जा बसा।
मीडिया का गला घोंटने के ऐसे तमाम किस्से  पाकिस्तान में सुने जा सकते हैं। परंतु हकीकत तो यही है कि मीडिया का गला घोंटने का पाक हुक्मरानों तथा नीति निर्धारकों का यह प्रयास पाकिस्तान तथा वहां की जनता को अंधेरे तथा अनिश्चितता के वातावरण की ओर ही ले जा रहा है। गत् तीन दशकों से चली आ रही पाकिस्तानी शासकों की ऐसी ही नकारात्मक सोच तथा नीतियां आज पाकिस्तान को उस दयनीय स्थिति में ले आई हैं कि न तो इन्हें अब कहीं मुंह छुपाने की जगह मिल पा रही है न ही सिर छुपाने की। आतंकवादियों को संरक्षण देने तथा इनसे मिलीभगत रखने के ही परिणामस्वरूप ऐबटाबाद जैसी घटना घटित हुई। और तब पाकिस्तान को राष्ट्रीय संप्रभुता की याद आई। वास्तव में यदि पाकिस्तान को अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता से प्यार है तथा इसका आदर करना है तो न केवल आतंकवाद व चरमपंथ से अपने रिश्ते खत्म करने होंगे बल्कि ऐसे नेटवर्क का भंडाफोड़ करने वाले पत्रकारों की रिपोर्ट व उनके आलेख का भी आदर व स मान करते हुए उस पर कार्रवाई करनी होगी। बजाए इसके कि उन पत्रकारों का अपहरण या उनकी हत्या करवाकर अपने गुनाहों पर पर्दा डालने की नाकाम कोशिश की जाए। और यदि यही परंपरा चलती रही तो पाकिस्तान का खुदा ही निगेहबान हो सकता  है ।

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