बुधवार, 27 जुलाई 2011

खुशवंत सिंह



खुशवंत सिंह का सामाजिक सरोकार

जब मैं छोटा था और पत्रकारिता में आने की सोच रहा था तो कुछ खास बड़े नामों को लगातार पढ़ता था। कुछ लोग मुझे तब भी पढ़कर समझ में नहीं आते थे। उस वक्त मुझे लगता था कि इन लोगों के लेखन के स्तर का शायद मैं हूं ही नहीं इसीलिए मेरी समझ में नहीं आता है। जब बड़ा हो जाऊंगा तो खुद ही समझने लगूंगा। अब मैं बड़ा हो गया हूं। पत्रकारिता के प्रोफेशन में भी हूं पर मुझे आज भी वे लोग समझ में नहीं आते। इसी बहाने जिक्र करना चाहूंगा महान पत्रकार खुशवंत सिंह का। उनके लेखन में सेक्स और दारू के असामयिक और बेमौसम जिक्र के सामाजिक आस्पेक्ट पर मैं हर बार सोचता हूं पर मेरी समझ में नहीं आता। मैं सोचता हूं इसीलिए कि किसी बड़े नाम को इतनी आसानी से खारिज भी तो नहीं किया जा सकता। समाज का एक बड़ा तबका उन्हें समझता है (शायद) और सम्मान देता है। मुझे एक बार फिर लगने लगता है कि मुझमें ही कुछ कमी है, शायद कि मेरी समझ ही छोटी है।
खुशवंत सिंह को पढ़ता हूं तो मेरी छोटी मानसिकता में यही समझ आता है कि सेक्स से समाज की हर समस्या का समाधान है। अगर कोई सेक्स को इंज्वाय कर ले तो वह समाज के लिए सार्थक हो जाएगा। उसके जीवन में कुछ इस तरह का घटित हो जाएगा कि रातों रात उसका अपने मूल्यों से परिचय हो जाएगा और वह दुनिया को बहुत कुछ देने लायक बन जाएगा। उसे इस दुनिया में आने का उद्देश्य पता लग जाएगा। ...आपको बात अटपटी लग रही होगी क्योंकि मैं लिख रहा हूं, है न? जी नहीं, ये विचार हैं महान पत्रकार खुशवंत सिंह के ।
पिछले दिनों उन्होंने अपने एक कालम में लिखा कि साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती, प्रग्या ठाकुर और मायाबेन कोडनानी जहर उगलती हैं। आगे उन्होंने लिखा है कि, ये चारों देवियां जहर उगलती हैं और मेरा मानना है कि ये सब सेक्स से जुड़ा है। उसे लेकर जो कुंठाएं होती हैं, उससे सब बदल जाता है। अगर इन देवियों ने सहज जिंदगी जी होती तो उनका जहर कहीं और निकल गया होता। अपनी कुंठाओं को निकालने के लिए सेक्स से बेहतर कुछ भी नहीं है।... क्या अजीब सा दर्शन है न?
खुशवंत सिंह के लेख के सामाजिक आयाम को मैं तलाशता रहता हूं पर ज्यादा वक्त मेरे हाथ खाली होते हैं। मैं समझ ही नहीं पाता हूं कि उनके लिखने का और उसे छापे जाने का क्या अर्थ है। अब यहां इन महिलाओं का जिक्र क्यों किया और वे क्या कहना चाहते हैं, मेरी तो समझ में नहीं आया। इसके बाद जवाब में उमा भारती ने उन्हें एक चिट्ठी लिखी। इस चिट्ठी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए खुशवंत जी ने अपने अंदाज में एक और लेख लिखा। इस लेख में वे लिखते हैं- उमा ने मुझे औरतों के खिलाफ साबित किया है। काश... यह सच होता। मैं तो औरतों को चाहने के चक्कर में बदनाम हूं। मुझे पूरा यकीन है कि अगर मैं उनके आसपास होता तो उन्होंने मुझे थप्पड़ रसीद दिया होता। जैसा उन्होंने एक समर्थक के साथ किया था। बाद में गुस्सा उतरने पर मुझे किस भी किया होता।... ये कैसी सोच है खुशवंत की?
अब जरा सोचिए कि जिन महिलाओं का जिक्र उन्होंने किया है और उस मामले में उन्होंने जो समाधान बताया है... क्या आप उसे तार्किक मानते हैं? क्या सेक्स में डूबकर समाज में मधुरता घुल जाएगी? समाज की सारी कटुता और कुंठा खत्म हो जाएगी? अगर उमा ने खुशवंत जी के बेहूदे सोच पर उन्हें थप्पड़ लगा दिया होता तो कौन सी राष्ट्रीय आपदा पैदा हो जाती? क्या फर्क पड़ता है इससे कि खुशवंत औरतों के चक्कर में बदनाम हैं? क्या आपको उमा भारती से खुशवंत सिंह के किस के एक्सपेक्टेशन में कुछ सार्थक नजर नजर आता है? इस महान पत्रकार की सामाजिक सोच क्या है? उसके लेखन की सार्थकता क्या है? मुझे उम्मीद है कि जिस साथी को ये सब समझ आए वो मेरा मार्गदर्शन जरूर करेंगे।

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