मंगलवार, 2 नवंबर 2021

एक उपेक्षित ऐतिहासिक गुफा / बिनोद राज विद्रोही

 हजारीबाग के बड़कागांव प्रखंड में अवस्थित  इस्को गुफा अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बावजूद आज परिचय का मोहताज है। यहां एक गुफा है , गुफा के दो किलोमीटर की  दूरी पर एक विशालकाय प्रस्तर-खंड मौजूद है, जिसके एक छोर पर लगभग सौ सवा सौ लंबे और तीस फुट ऊंचे भाग पर बहुत से शैलचित्र बनाए गए हैं। जिसमें हिरण, खरगोश, आदमी, सूरज, ईश्वर आदि से मिलते-जुलते चित्र शामिल है। इन चित्रों को आज के मानव ने नहीं, बल्कि सदियों पहले के मानव ने उकेरा है। ये तमाम शैलचित्र सांकेतिक है। पुरातत्ववेताओं का मानना है कि इन आकृतियों को रक्तिम लौह-अयस्क से

 उकेरा गया है। इन चित्रों की श्रृंखला में यत्र-तत्र कोई ऐसे सफेद पदार्थ या अयस्क का इस्तेमाल किया गया है, जो आज की तारीख में भी अपनी पहचान नहीं खो सका है।


           इन शैलचित्रों की श्रृंखला को देखकर यह अनुमान लगाया जाता रहा है कि उस दौर में यहां बसने या निवास करने वाले मानवों ने मानव-सभ्यता को जन्म देकर लिपि की खोज के पश्चात इसे विकसित किया होगा। पुराविदों का कहना है कि यहां के ये शैलचित्र उड़ीसा राज्य के हिमगिरि ओसालबोथी और विक्रमखोले क्षेत्र के प्रागैतिहासिक शैलचित्रों से मिलती-जुलती है। इस्को के इन शैलचित्र-श्रृंखला में पुरातात्विकों को आदमी, नदियां, सूरज, ईश्वर, हिरण, खरगोश, तारे आदि चित्रों की झलक तो मिली, लेकिन किसी पालतू जानवर का कोई चित्र उकेरा गया नहीं मिला। जिससे अनुमान लगाया जाता है कि उस काल के लोगों का कृषि से मतलब नहीं था। यानी ये शैलचित्र उस काल के हैं, जिस समय मानव कृषि कार्य से अनभिज्ञ था।


              विदित हो कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई के बाद प्राचीन सभ्यता का पता चला, जो अब सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से विख्यात हो गई है। बाद में लोथल (गुजरात) नामक स्थान पर खुदाई की गई। यहां भी सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमाण मिले। रोपड़ (पंजाब) तथा कालीबंगा (राजस्थान) के नाम भी सिंधु घाटी सभ्यता से जोड़े जाते हैं ।इससे पता चलता है कि यह सभ्यता दूर-दूर तक फैली हुई थी । हो सकता है वह इस्को तक भी फैला हुआ हो। क्योंकि इस्को में जो शैलचित्र मिले हैं, वह सिंधु घाटी सभ्यता में मिले शैलचित्रों से मिलते-जुलते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता को कार्बन डेटिंग प्रोसेस द्वारा पांच हजार वर्ष का माना जाता है। इससे यह पता चलता है कि इस्को शैलचित्र श्रृंखला भी संभवतः इतनी ही पुरानी हो, जबकि पुरातत्वेताओं  ने मिस्र की सभ्यता, क्रीट या नोसास की सभ्यता, मैसोपोटामिया की सभ्यता,(बेबीलोन, असीरिया तथा हल्दिया) तथा चीन की सभ्यता को भी पांच हजार वर्ष पुराना माना जाता है।


                दूसरी ओर देवनागरी लिपि का विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ, जो भारत की प्राचीन लिपियों में से एक है। दूसरी प्राचीन लिपि खरोष्ठी है। खोरठा भाषा-वैज्ञानिक ए.के. झा के अनुसार- "खरोष्ठी भाषा मोहनजोदड़ो-हड़प्पा में प्रचलित थी।" उनका तर्क खरोष्ठी-खरोठी-खरोठा, अंततोगत्वा खोरठा से तादात्म्य रखता है। इससे साफ जाहिर होता है कि संभवतः उक्त सभ्यता में प्रयुक्त होने वाली भाषा खरोष्ठी ही इस्को क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा खोरठा है। इस्को क्षेत्र ही नहीं, बल्कि इस पूरे जिले सहित आसपास के जिलों में भी खोरठा बोली जाती है। एक अन्य अनुमान के तहत यह कहा जाता है कि मुंडाओं और उरांवों के आगमन के पूर्व पूरे छोटानागपुर में असुर ही निवास करते थे।बताया जाता है कि ये असुर यहां लोहा गलाने का काम करते थे।इस्को गुफा के आसपास के इलाकों में भी असुर के निवास करने के साक्ष्य बिखरे पड़े हैं। लौह-अयस्कों को गलाकर लोहा निकाल लेने के बाद बचे अवशेषों को एक जगह जमा कर दिया जाता था, जो आज भी टीलों के रूप में आसपास के गांवों में आज भी मौजूद है। इससे यह साबित होता है कि शायद उस काल के असुर ही इस्को शैलचित्र -दीर्घा के निर्माता भी हों।


        इस्को शैलचित्र -श्रृंखला के कुछ ही दूरी पर एक गुफा है, जो इस्को गुफा के नाम से जाना जाता है, जिसके अंदर लगभग पांच सौ आदमी आराम से खड़े हो सकते हैं। लेकिन गर्मी के दिनों में, क्योंकि यहां ऊपर से पानी का सोता आता है। इसलिए बरसात में यहां पानी भरा रहता है, जबकि ठंड के दिनों में भी थोड़ी-बहुत पानी की मात्रा रहती है। गुफा के अंदर एक कोने में (ऊंचाई पर) एक सुरंग के जैसा बड़ा छेद दिखता है, जो अंधेरा रहने के कारण साफ पता नहीं चलता कि उसकी लंबाई कितनी होगी। गुफा के अंदर जोर से बोलने पर आवाज गूंजती है। बोले गए वाक्यों की प्रतिध्वनियां खुद से टकरा जाती है तो एक रोमांच महसूस होता है।इस गुफा से आधा किलोमीटर की दूरी पर एक और गुफा है, जहाँ अभी नहीं, गर्मी के दिनों में आसानी से जाया जा सकता है। बहुत कठिनाई से पिछले सप्ताह मैं और पत्रकार संजय सागर वहां तक पहुँच पाये थे। जान जोखिम में डालकर।


            बहरहाल, प्रख्यात पुरातत्ववेता बुलु इमाम द्वारा खोजे गए इस्को गुफा का इतना सशक्त इतिहास होते हुए भी गुमनामी के अंधेरे में खोता चला जा रहा है। दिनोंदिन ये शैलचित्र विलुप्ति के कगार पर पहुंच गए हैं। बरसात के दिनों में पत्थरों के ऊपर से जो पानी नीचे गिरता है उससे शैलचित्रों में 'काई' जम जाता है, जबकि उधर गाय बकरी चराने गए चरवाहे भी नुकीले पत्थरों से उन चित्रों के अगल-बगल अन्य निशान खोदते ग्रामीणों को नजर आते हैं। इससे बचने के लिए सरकार उसकी घेराबंदी करवाएं। इस इलाके को पर्यटन क्षेत्र घोषित करते हुए सड़क आदि की व्यवस्था करनी चाहिए। तभी हम अपने अतीत को याद करके भविष्य में भी गौरवान्वित हो सकेंगें। ज्ञातव्य हो कि कुछ वर्ष पूर्व जब मैं और उमेश राणा (सम्प्रति-ब्यूरो चीफ,दैनिक भास्कर,हजारीबाग) इस्को गुफा जा रहे थे तो जर्जर सड़क के कारण कई जगह गाड़ी से उतरकर पैदल चलना पड़ा था। यह स्थान अगर पर्यटन के रूप में विकसित हो जाए तो यहां से लोगों को रोजगार मुहैया हो जाएगा। मैं यहां जब भी गया, यहां के लोगों की गरीबी और फटेहाली देखकर काफी मर्माहत हुआ।1997 से लेकर अबतक मैं और उमेश राणा जी तथा संजय सागर  कई पत्र-पत्रिकाओं में कई बार इस्को गुफा पर लिखा।लेकिन आज भी यह स्थल उपेक्षित है... क्या फायदा लिखने से...हालांकि शैलचित्र दीर्घा के कुछ दूरी तक  सड़क बन गई है, लेकिन घने जंगल में स्थित दोनों गुफाओं तक पैदल ही जाना पड़ता है।

1 टिप्पणी:

  1. गुफा तक जाने के दुर्गम रास्ते का उल्लेख भी जरूरी था जो कम शब्दों में लिखा

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