गुरुवार, 30 मई 2024

जलेबी का जलेबीदार इतिहास

 

प्रस्तुति -  उषा रानी / राजेंद्र प्रसाद  सिन्हा 


जलेबी की विशेषताएं जलेबी : बिहार और खासकर उत्तरी भारत में जलेबी बड़े शौक से खायी और खिलाई जाती है, परन्तु दुनिया के 90 फीसदी लोग जलेबी का संस्कृत और अंग्रेजी नाम नहीं जानते । 


जानें  जलेबी के गुण व  जलेबी से जुड़े दिलचस्प किस्से…..

जलेबी में जल तत्व की अधिकता होने से इसे जलेबी कहा जाता है। मानव शरीर में 70 फीसदी पानी होता है, इसलिए इसे खाने से जलतत्व की पूर्ति होती है।

जलेबी को रोगनाशक औषधि भी बताया है। गर्म जलेबी चर्म रोग की बेहतरीन चिकित्सा है। 

जलेबी को..

© संस्कृत में कुण्डलिनी,

© महाराष्ट्र में जिलबी तथा

© बंगाल में जिलपी कहते है ।

© जलेबी का भारतीय नाम जलवल्लिका है। 

© अंग्रेजी में जलेबी को स्वीट्मीट (Sweetmeet) और सिरप फील्ड रिंग कहते हैं।

© महिलाएं अपने केशों से “जलेबी जूड़ा” भी बनाती हैं।

जलेबी का जलवा…

∆ बंगाल में पनीर की,

∆ बिहार में आलू की,

∆ उत्तरप्रदेश में आम की,

∆ म.प्र. के बघेलखण्ड- रीवा, सतना में मावा की जलेबी खाने का भारी प्रचलन है।

∆ कहीं-कहीं चावल के आटे की और उड़द की दाल की जलेबी का भी प्रचलन है।

∆ ग्रामीण क्षेत्रों में दूध-जलेबी का नाश्ता करते हैं।

जलेबी तेरे रूप अनेक….

जलेबी डेढ अण्टे, ढाई अण्टे और साढे तीन अण्टे की होती है। अंगूर दाना जलेबी, कुल्हड़ जलेबी आदि की बनावट वाली गोल-गोल बनती है।

जलेबी से तात्पर्य….

जलेबी दो शब्दों से मिलकर बनता है। जल +एबी अर्थात् यह शरीर में स्थित जल के ऐब (दोष) दूर करती है। शरीर में आध्यात्मिक शक्ति, सिद्धि एवं ऊर्जा में वृद्धि कर स्वाधिष्ठान चक्र जाग्रत करने में सहायक है। जलेबी के खाने से शरीर के सारे ऐब (रोग दोष )जल जाते हैं ।

जलेबी ओषधि भी है….

जलेबी अर्थात जल+एबी। यह शरीर में जल के ऐब, जलोदर की तकलीफ मिटाती है। जलेबी की बनावट शरीर में कुण्डलिनी चक्र की तरह होती है।

अघोरी की तिजोरी…..

अघोरी सन्त आध्यात्मिक सिद्धि तथा कुण्डलिनी जागरण के लिए सुबह नित्य जलेबी खाने की सलाह देते हैं । मैदा, जल, मीठा, तेल और अग्नि इन 5 चीजों से निर्मित जलेबी में पंचतत्व का वास होता है । 

अपने ऐब (दोष) जलाने, मिटाने हेतु नित्य जलेबी खाना चाहिये । 

वात- पित्त- कफ यानि त्रिदोष की शांति के लिए सुबह खाली पेट दही के साथ, वात विकार से बचने के लिए-दूध में मिलाकर और कफ से मुक्ति के लिए गर्म-गर्म चाशनी सहित जलेबी खावें ।

रोग निवारक जलेबी….

【】जलेबी ओषधि भी है

जो लोग सिरदर्द, माईग्रेन से पीड़ित हैं वे सूर्योदय से पूर्व प्रातः खाली पेट २से 3 जलेबी चाशनी में डुबोकर खाकर पानी नहीं पीएं  सभी तरह मानसिक विकार जलेबी के सेवन सेे नष्ट हो जाते हैं।

【】जलेबी पीलिया से पीड़ित रोगियों के लिए यह चमत्कारी ओषधि है। सुबह खाने से पांडुरोग दूर हो जाता है।

【】जिन लोगों के पैर की बिम्बाई फटने या त्वचा निकलने की परेशानी रहती हो हो वे 21 दिन लगातार जलेबी का सेवन करें।

आयुर्वेदिक जड़ी बूटी जलेबी…

जंगली जलेबी नामक फल उदर एवं मस्तिष्क रोगों का नाश करता है। भावप्रकाश निघण्टु में उल्लेख है –

जो जंगल जलेबी खावै, 

दुःख संताप मिटावै।

जलेबी खाये जगत गति पावै!

जलेबी खाने वालों को ब्रह्मचर्य का विधिवत् पालन करना चाहिये ।

       ‘‘टपकी जाये जलेबी रस की’’

अतः आयुर्वेद में विवाह होने तक स्वयं पर अंकुश रखने का निर्देश है।

जलेबी केे फायदे…

जलने, कुढन में उलझे लोग यदि जानवरों को जलेबी खिलाये तो मन शांत होता है।

क्योंकि मन में अमन है, तो तन चमन बन जाता है और तन ही हमारा वतन है नहीं तो सबका पतन हो जाता है इसे जतन से संभालो।

जलेबी की कहावतें…..

खाये जलेबी बनो दयालु

तहि चीन्हे नर कोई।

तत्पर हाल-निहाल करत हैं,

रीझत है निज सोई।

जलेबी खाने से दया, उदारता उत्पन्न होती है। 

पहचान बनती है। आत्मविश्वास आता है।

टूटी की नही बनी है बूटी

झूठी की नही बनी है खूॅंटी

फूटी को नही बनी है सूठी

रूठी तो बने काली कलूटी

अर्थात- जिस व्यक्ति का आत्मविश्वास अंदर से टूट जाये उसको ठीक करने की कोई बूटी  यानी ओषधि आज तक नहीं बनी है। जो आदमी बार -बार बदलता है इनकी एक खूटी यानि ठिकाना नही होता। जिसकी किस्मत फूटी हो, जो भाग्यहीन हो, उसका भला सूफी-संत भी नही कर सकते और स्त्री रूठ जाये तो काली का भयंकर रूप धारण कर लेती है। अतः इन सबका इलाज जलेबी है।

रोज सुबह जलेबी खाओ।

भव सागर से पार लगाओ ।

खाली पेट करे मुख मीठा

विद्वान वाद-विवाद बसो दे झूठा …..

बाबा कीनाराम सिद्ध अवधूत लिखते हैं –

बिनु देखे बिनु अर्स-पर्स बिनु,

प्रातः जलेबी खाये जोई ।

तन-मन अन्तर्मन शुद्ध होवे

वर्ष में निर्धन रहे न कोई

एक संत ने जलेबी का नाता आदिकाल से वताया है-

पार लगावे चैरासी से, मत ढूके इत और।

जलेबी का नियम से प्रातःकाल सेवन करें, तो बार-बार क जन्म-मरण से मुक्ति मिलती है। जलेबी के अलावा अन्य मिठाई की कभी देखें भी नहीं।


जलेबी बनाने हेतु आवश्यक सामग्री:-

मैदा 900 ग्राम, उड़द दाल 50 ग्राम पानी में गला कर पीस कर 500 ग्राम मैदा में 50 ग्राम दही मिलाकर दो दिन पूर्व खमीर हेतु घोल कर रखे शेष मैदा जलेबी बनाते समय खमीर में मिलाये शक्कर करीब 1 किलो 300-400 ML पानी में डालकर चाशनी बनाये। जलेेबी को बहुत स्वादिष्ट बनाने के लिए चाशनी में एक चम्मच नीबू का रस और केशर मिला सकते हैं।

जलेबी के खाने से लाभ….

एषा कुण्डलिनी नाम्ना पुष्टिकान्तिबलप्रदा।

धातुवृद्धिकरीवृष्या रुच्या चेन्द्रीयतर्पणी।।

(आयुर्वेदिक ग्रन्थ भावप्रकाश पृष्ठ ७४०)

अर्थात – जलेबी कुण्डलिनी जागरण करने वाली, पुष्टि, कान्ति तथा बल को देने वाली, धातुवर्धक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक एवं इन्द्रिय सुख और रसेन्द्रीय को तृप्त करने वाली होती है।

जलेबी का अविष्कार…

दुनिया में सर्वप्रथम जलेबी का अविष्कार किसने किया यह तो ज्ञात नहीं हो सका। लेकिन उत्तरभारत का यह सबसे लोकप्रिय व्यंजन है। भारत की जलेबी अब अंतरराष्ट्रीय मिठाई है।

प्राचीन समय के सुप्रसिद्ध हलवाई शिवदयाल विश्वनाथ हलवाई के अनुसार जलेेबी मुख्यतः अरबी शब्द है।

तुर्की मोहम्मद बिन हसन “किताब-अल-तबिक़” एक अरबी किताब  जलेबी का असली पुराना नाम जलाबिया लिखा है। 300 वर्ष पुरानी पुस्तकें “भोजनकटुहला” एवं संस्कृतमें लिखी “गुण्यगुणबोधिनी” में भी जलेबी बनाने की विधि का वर्णन है। घुमंतू लेखक श्री शरतचंद पेंढारकर ने जलेबी का आदिकालीन भारतीय नाम कुण्डलिका बताया है। वे बंजारे बहुरूपिये शब्द और रघुनाथकृत “भोज कौतूहल” नामक ग्रन्थ का भी हवाला देते हैं। इन ग्रंथों में जलेबी बनाने की विधि का भी उल्लेख है। मिष्ठान भारत की जान जैसी पुस्तकों में जलेबी रस से परिपूर्ण होने के कारण इसे जल-वल्लिका नाम मिला है। जैन धर्म का ग्रन्थ “कर्णपकथा” में भगवान महावीर को जलेबी नैवेद्यल लगाने वाली मिठाई माना जाता है । Bihar डायरी


मंगलवार, 28 मई 2024

हज़ारीबाग यानी पूरब का शिमल्स / विजय केसरी

 

एक समय ज़ब हजारीबाग को देश का दूसरा शिमला कहा जाता था 


विजय केसरी 



एक समय हजारीबाग को देश का दूसरा शिमला कहा जाता था। यहां का मौसम इतना सुहावना रहता था, जो भी लोग यहां आते थे, यहां के मौसम की तारीफ किए बिना नहीं रह पाते थे। गर्मी  के दिनों में भी यहां गर्मी  बहुत कम पड़ती थी। शाम  होते ही मौसम फिर सुहावना हो जाता था। सूरज  ढलते ही ठंडी - ठंडी हवाएं बहने  लगती थी।  जब बड़े बड़े दरख्तों से ठंडी हवाएं गुजर कर लोगों तक पहुंच थीं, तब  लोग हजारीबाग के मौसम की तारीफ की बिना नहीं रह पाते थे।  यहां के मौसम का यह हाल था कि गर्मी के दिनों में ज्यादा गर्मी नहीं पड़ती थी। ठंड के दिनों में सहने योग्य ठंड पड़ती थी। हजारीबाग जिले में कभी भी तबाही मचाले वाली बारिश नहीं हुई । यहां के मौसम की खासियत यह थी कि  गर्मी के दिनों में जब भी थोड़ी गर्मी बढ़ती थी, तब किसी न किसी रूप में बारिश दस्तक दे देती थी । जून के महीने में  संपूर्ण देश को मानसून आने का इंतजार रहता था। लेकिन हजारीबाग को मानसून का इंतजार नहीं करना पड़ता था बल्कि जब भी यहां थोड़ी गर्मी बढ़ी,  किसी ने किस रूप में बारिश दस्तक दे देती थी 

 हजारीबाग जिले को बागों के शहर रूप में जाना जाता था। हजारीबाग की पहचान पेड़-पौधों और  घने जंगल थी । हजारीबाग के धने जंगल में शेर, चीता, बाघ, हिरण सहित विभिन्न किस्म के पशुओं को दिन और रात्रि में विचरण करते दिखे जाते थे । हजारीबाग  जिले में भारत प्रसिद्ध नेशनल पार्क में आज भी शेर, चीता, बाघ है सहित विभिन्न पशुओं को देखा जाता है । नेशनल पार्क पूरे क्षेत्र को  इन्हीं पशुओं के लिए संरक्षित किया गया था। यहां के बड़े -  बुजुर्गों को  कई बार यह कहते हुए सुना कि कभी-कभी भटकते - भटकते जंगल से बाघ, हिरण आदि पशु शहर भी आ जाते थे । जिन्हें लोगों ने अपनी आंखों से देखा था। तब का हजारीबाग ऐसा न था। ब्रिटिश हुकूमत  के समय हजारीबाग नगर को एक नक्शे के तहत निर्माण किया  गया था।‌ इस नक्शे का नाम बाडम साहब के नाम पर रखा गया था।  आज भी इस नगर को बाडम बाजार के नाम से जाना जाता है। इस नगर की खासियत यह रही कि इसे चौतरफा मार्गो के साथ एक दूसरे से जोड़ा गया था। मार्ग के मध्य एक  बडे़ नाले का निर्माण किया गया था,  जिस नाले से शहर का सारा गंदा पानी निकट के नदियों में  मिल जाया  करता था।

 हजारीबाग को एक नगर के रूप में विकसित करते के समय अंग्रेजी हुकूमत ने इस बात का खास ख्याल रखा था कि उन्होंने इसकी बागों की पहचान को कभी भी नुकसान पहुंचाया था । उन्होंने पूरे नगर में आम, लीची, जामुन, इमली, कटहल,अमरूद आदि के  पौधों को लगाया  था ताकि इसकी प्राकृतिक सौंदर्य  बरकरार रहे।

हजारीबाग के सुहावने मौसम पर चर्चा करते समय इस बात का उल्लेख करना उचित समझता हूं कि ब्रिटिश हुकूमत के कालखंड में हुकूमत के सुरक्षा और तकनीकी सलाहकारों ने  हुकूमत को यह सलाह दिया था कि हजारीबाग जिले भारत की राजधानी  बनाई सकती है।  हजारीबाग जिला जहां स्थित है, यहां भूकंप के झटके पड़ने की संभावना, देश के  अन्य  हिस्सों की तुलना में सबसे न्यूनतम  है।  यहां की जलवायु बिल्कुल स्वच्छ हे। यहां प्रदुषण  स्तर देश के अन्य हिस्सों  तुलना में सबसे न्यूनतम है। हजारीबाग से बहुत ही अच्छे ढंग से हुकूमत चलाई जा सकती है । इस बात  का उल्लेख हजारीबाग जिले  के गजेटियर में है। लेकिन तत्कालीन प्रशासनिक और राजनीतिक परिस्थितियों  के कारण हजारीबाग देश की राजधानी नई बन पाई थी। 

हजारीबाग शहर अपने स्थापना काल से ही लोगों के प्रभावित करता रहा था।  हजारीबाग शहर जो भी आया, यहां का होकर रह गया था। हजारीबाग के सुहावने मौसम के कारण ही ब्रिटिश हुकूमत के बड़े अधिकारियों ने हजारीबाग में अपना बंगला बनाया था।  वे गर्मी के दिनों में यहां पर छुट्टी बिताने आया करते थे । ब्रिटिश हुकूमत के समय की पश्चिम बंगाल से बंगाली अधिकारियों को  हजारीबाग स्थांतरित किया था।  यहां पर जो भी बंगाली अधिकारी आए, यहां के मौसम के सुहावने मौसम कारण ही परिवार सहित बस गए थे।

   हजारीबाग जिला बिहार राज्य का एक हिस्सा हुआ करता था । बिहार से सटे पश्चिम बंगाल सहित अन्य प्रदेशों के लोग अपनी छुट्टियां  बिताने हजारीबाग आया करते थे।  पश्चिम बंगाल के दो बड़े उद्योगपति भाई स्वर्गीय हीरालाल जैन  और पन्नालाल जैन ने हजारीबाग जिले के दीपू गढ़ा  रोड स्थित पर एक विशाल बंगला हीरा बाग के नाम से बनाया था। गर्मी के दिनों में ये दोनों भाई पूरे परिवार के सहित आकर रहते थे। यह दोनों भाई नगर के कुछ खास लोगों को बुलाकर हीरा बाग में  बड़ी  बड़ी पार्टियां किया करते थे। यह मेरा सौभाग्य रहा था इन पार्टीयों का मैं भी हिस्सा  बना था। हजारीबाग जिले स्थित पंडित जी रोड सहित अन्य मार्गो में  ऐसी कोठियां आज भी अपनी गवाही दे रही हैं।

  हमारा यह नगर आम, लिची, जामुन, इमली, कटहल आदि के बड़े-बड़े फलदार वृक्षों  से लदा रहता था । नगर के एक छोर से दूसरे छोर तक जहां तक लोगों नजर जा सकती थी, फलदार वृक्षों से  यह शहर लदा हुआ था। गर्मी की छुट्टियों में शहर के बच्चों के लिए एक बड़ा ही सुंदर अवसर मिल जाता था। बच्चें इन फलदार वृक्षों से कच्चे पक्के फल  खाकर अघाते नहीं  थे। आज  भी बचपन के उन दिनों को याद कर मन फिर से बच्चा बन जाने को कहता है, लेकिन आज हजारीबाग की वह स्थिति नहीं रही ।अब तो  दूर दूर तक नगर के किनारे फलदार  वृक्ष दिखाई नहीं देते। यहां के फलो की खासियत यह है कि स्वाद की दृष्टि में अन्य जिलों और प्रदेशों के फलों के स्वाद की तुलना में ज्यादा स्वादिष्ट हैं। यहां के फलों में पौष्टिक और खनिज तत्व भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। वैज्ञानिक परीक्षण में यहां के फलों को खाने वाले लोगों में प्रतिरोध क्षमता भी ज्यादा पाई गई । जैसे-जैसे शहर का विस्तार होता गया, घनी आबादी में तब्दील होती गई, वैसे-वैसे कर फलदर वृक्ष नगर से गायब होते चले गए। हजारीबाग पीपल, बरगद के पेड़ों से भी जाना जाता था ।अब नगर में गिनती भर  पीपल और बरगद के पेड़ बच गएं हैं। अब फलदार वृक्षों की जगह कंक्रीट के बने घरों ने अपना आशियां बना लिया है। जिला प्रशासन एवं राज सरकार भी हजारीबाग जिले में पेड़ पौधे संरक्षित रहे, ठीक से ध्यान नहीं दिया।  आज इसका परिणाम है कि हजारीबाग का वह सुहावना मौसम सिर्फ स्मृतियों में शेष रह गया। अगर सरकारी स्तर पर हालदार वृक्षों को लगाने की दिशा में स्थानीय लोगों को प्रोत्साहन दिया जाता, तब इसके उत्पादन से अच्छी आमदनी भी होती और लोगों को रोजगार भी मिल पाता। कहने को तो हजारीबाग में वन विभाग का उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल का मुख्यालय है, लेकिन इस मुख्यालय ने इस दिशा में अब तक कोई पहल नहीं किया है।

हजारीबाग के सुहावने मौसम की चर्चा करते हुए यह लिखना उचित समझता हूं कि आज से ठीक 19 साल पूर्व  जून माह में बेटी की शादी थी। सुबह  में उस दिन मौसम साधारण ठीक था।  गर्मी थी। दोपहर के बाद बदल घना हो गया और मूसलाधार बारिश हो गई थी ।रात्रि में बारातियों के लिए हम सबों को कंबल की व्यवस्था करने पड़ी थी । ऐसा था, हमारा हजारीबाग।

वर्ष 2024 की गर्मी बीते 175 वर्षों की तुलना में सबसे अधिक गर्मी पड़ी है। देश के  कई हिस्सों का तापमान 48 - 49 सेल्सियस डिग्री तक पहुंच गया है।  गर्मी से लोग  त्राहिमाम त्राहिमाम कर रहे हैं। देश में प्रदूषण जिस स्तर पर बढ़ता चला जा रहा है,यह बड़े खतरे का संकेत  दे रहा है। विश्व मौसम शोध संस्थान ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया है कि जिस तेजी के साथ जलवायु परिवर्तन हो रहा है, इससे समस्त मनुष्य जाति पर खतरा बढ़ता  चला जा रहा है। ऐसे निष्कर्ष का मतलब है कि पृथ्वी पर से मनुष्यम जाती ही  समाप्त न हो जाए। वहीं दूसरी हो भारत ही नहीं विश्व भर में कई देशों के जल स्रोत नीचे चले जा रहे हैं। यह भी  संकेत ठीक नहीं है। जलवायु परिवर्तन को अनुकूल बनाने के लिए वैश्विक स्तर पर गहन अभियान चलाने की जरूरत है।  आज हर एक व्यक्ति को जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूक होने की जरूरत है। हजारीबाग का सुहावना मौसम इस जलवायु परिवर्तन से अछूता नहीं रह सकता है। हजारीबाग में कई सामाजिक ऑर्गेनाइजेशन इस जलवायु जागरूकता अभियान से जुड़कर पेड़ पौधों को लगाने में क्रियाशील है। आज भी हजारीबाग का मौसम झारखंड के अन्य जिलों की अपेक्षा काफी बेहतर है। इसे और बेहतर बनाने के लिए हजारीबाग को पुराने वन से लदे गौरव को वापस लाने जरूरत है।  बस ! हजारीबाग के हर एक निवासी को पेड़ पौधों  को लगाने को  ओर आगे बढ़ाने की जरूरत है। हजारीबाग की पहचान बागों से है, इसलिए बागों को उजाड़ने से बचाएं।




विजय केसरी,

(कथाकार/ स्तंभकार )

 पंच मंदिर चौक, हजारीबाग -  825301,

 मोबाइल नंबर : 92347 99550.

गुरुवार, 23 मई 2024

भारत में पेट्रोलियम उद्योग

 

भारत में पेट्रोलियम उद्योग: एक मूल्यांकन 

भारत में पेट्रोलियम उद्योग 1889 से शुरू होता है, जब देश में पहला तेल भंडार असम राज्य के डिगबोई शहर के पास खोजा गया था। भारत में प्राकृतिक गैस उद्योग 1960 के दशक में असम और महाराष्ट्र (मुंबई हाई फील्ड) में गैस क्षेत्रों की खोज के साथ शुरू हुआ। 31 मार्च 2018 तक, भारत ने 594.49 मिलियन मीट्रिक टन (एमटी) के कच्चे तेल के भंडार और 1339.57 बिलियन क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस (बीसीएम) के प्राकृतिक गैस भंडार का अनुमान लगाया था।[1][2]

भारत अपनी तेल की जरूरतों का 82% आयात करता है और 2022 तक इसे स्थानीय हाइड्रोकार्बन अन्वेषण, नवीकरणीय ऊर्जा और स्वदेशी इथेनॉल ईंधन के साथ बदलकर 67% तक लाने का लक्ष्य रखता है।[3]भारत 2019 में 205.3 मिलियन टन का दूसरा शीर्ष शुद्ध कच्चा तेल (कच्चे तेल उत्पादों सहित) आयातक था। [4]

भंडारसंपादित करें

1 अप्रैल 2021 तक, भारत ने 587.335 मिलियन टन कच्चे तेल के भंडार का अनुमान लगाया था, जो पिछले वर्ष की तुलना में 2.65% कम है। सबसे बड़े भंडार पश्चिमी अपतट (37%) और असम (27%) में पाए जाते हैं। 1 अप्रैल 2021 तक भारत में प्राकृतिक गैस का अनुमानित भंडार 1,372.62 बीसीएम था, जो पिछले वर्ष की तुलना में 0.52% अधिक है। प्राकृतिक गैस का सबसे बड़ा भंडार पूर्वी अपतट (40.6%) और पश्चिमी अपतट (23.7%) में स्थित है।

राज्य/क्षेत्र द्वारा भंडार का वितरणसंपादित करें

निम्न तालिका 31 मार्च 2017 को राज्य/क्षेत्र द्वारा भारत में अनुमानित कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस भंडार को दर्शाती है।[8]

क्षेत्रकच्चे तेल के भंडार (एमटी)तेल का हिस्सा (%)प्राकृतिक गैस भंडार (बीसीएम)गैस का हिस्सा (%)
अरुणाचल प्रदेश1.520.250.930.07
आंध्र प्रदेश8.151.3548.313.75
असम159.9626.48158.5712.29
कोल बेड मीथेन00106.588.26
पूर्वी अपतटीय40.676.73507.7639.37
गुजरात118.6119.6362.284.83
नागालैंड2.380.390.090.01
राजस्थान24.554.0634.862.70
तमिलनाडु9.001.4931.982.48
त्रिपुरा0.070.0136.102.80
वेस्टर्न ऑफशोर239.2039.60302.3523.44
कुल604.101001,289.81100

शनिवार, 11 मई 2024

केष्टो मुखर्जी जिन्होंने कभी शराब नहीं पी / दीपक अम्बष्ट

 

केष्टो मुख़र्जी के जीवन के कुछ खास अलग पहलू 


फिल्मों में शराबी के रोल ने दिलाई पहचान लेकिन रियल लाइफ में कभी नहीं पीते थे शराब.../ दीपक अम्बष्ठ 



भारतीय सिनेमा में कई कॉमेडियन ने अपनी बेहतरीन एक्टिंग से दर्शकों को खूब हंसाया. इनमें से एक कॉमेडियन केष्टो मुखर्जी भी थे जो गुजरे ज़माने की तकरीबन हर दूसरी फिल्म में नज़र आकर दर्शकों को अपनी कॉमेडी से हंसाकर चले जाते हैं और दर्शक उनसे अभिभूत हुए बिना रह नहीं पाते थे।


अगर बॉलीवुड फिल्मों में किसी शराबी कैरेक्टर के बारे में सोचें तो यकीनन आपके जेहन में एक ही चेहरा और नाम उभरेगा। वो है केष्टो मुखर्जी। उन्होंने दर्जनों फिल्मों में शराबी के रोल इस कदर परफेक्शन के साथ निभाए कि फिल्म मेकर उनकी जगह किसी दूसरे कलाकार को फिल्म में लेने के बारे में सोचते भी नहीं थे। चुपके-चुपके, बॉम्बे टू गोवा और शोले जैसी कई फिल्मों में बेहतरीन अदाकारी दिखा चुके थे केष्टो मुखर्जी।


केष्टो मुखर्जी  ने पहली बार फिल्म मां और ममता में शराबी की भूमिका निभाकर सबका ध्यान खींचा था. यह फिल्म 1970 में रिलीज हुई थी. इसके बाद वह बॉम्बे टू गोवा, पड़ोसन , चुपके-चुपके आदि कई फिल्मों में भी नज़र आए।


केष्टो ज्यादातर फिल्मों में केवल शराबी के किरदार में ही नजर आते थे. अपने 30 साल लंबे फ़िल्मी करियर में उन्होंने तकरीबन 90 से ज्यादा फिल्मों में काम किया लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इनमें से ज्यादा फिल्मों में वह केवल शराबी के रोल में ही दिखाई दिए. वैसे आपको बता दें कि केष्टो की एक्टिंग देखकर आपको भले ही लगे कि वह असल में शराब पिए होंगे लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं था. परदे पर शराबी के किरदार में पॉपुलैरिटी बटोरने वाले केष्टो मुखर्जी असल जिंदगी में शराबी नहीं थे और ना ही कभी शराब को हाथ लगाते थे. केष्टो मुखर्जी का जन्म 7 अगस्त 1925 को कोलकाता में हुआ था।


1950 से 80 के दशक तक उन्होंने 90 से ज्यादा फिल्मों में काम किया, लेकिन इतनी फिल्में करने के बावजूद उनकी अदाकारी को वो सम्मान नहीं मिला जिसके वो हकदार थे। अपने 3 दशक से ज्यादा के करियर में उन्हें महज एक फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। केष्टो मुखर्जी के बारे में दो तरह की बातें फिल्मी गॉसिप मैगजींस में छपा करती थीं। पहली ये कि उन्होंने कभी शराब नहीं पी। दूसरी ये कि वो खूब पिया करते थे।


पर्दे पर कॉमेडियन, रियल लाइफ में स्ट्रिक्ट थे केष्टो।


उनके बेटे का नाम बबलू मुखर्जी है, उन्होंने अपने पिता के बारे में कुछ जानकारी दी।बबलू बोले- पापा फिल्मों में तो कॉमेडी करते थे, लेकिन रियल लाइफ में वो अपनी फिल्मी इमेज से कोसों दूर थे। वो बेहद स्ट्रिक्ट थे और उन्हें देखकर मैं और मेरे भाई की तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती थी।


शूटिंग से वक्त निकालकर वो जब भी घर पर होते थे तो हमें होमवर्क करवाते थे। कुकिंग का शौक था तो खाना भी बनाते थे। उन्हें बंगाली क्विजीन जैसे माछेर झोल वगैरह बेहद पसंद था। उन्होंने तो हमारी मां को भी कुकिंग सिखाई थी। उनकी एक खास बात ये भी थी कि वो कभी अपने काम को घर लेकर नहीं आए।


वो घर में एक आम इंसान ही थे, कोई एक्टर नहीं। वो घर में फिल्मों की कोई बात नहीं करते थे। हम बचपन में उनकी फिल्मों के सेट पर कभी गए या नहीं, मुझे तो ये भी याद नहीं है, क्योंकि ऐसा शायद कभी हुआ ही नहीं।


यही वजह रही कि पापा के निधन के बाद हमें असली मायनों में ये पता चला कि वो कितने बड़े एक्टर थे और लोग उनकी अदायगी के कितने कायल थे। वो बेहद सादगी पसंद थे और अगर कभी काम के सिलसिले में विदेश भी जाते थे तो वहां से कोई चीज ना परिवार के लिए खरीदते थे और ना ही खुद के लिए।


वो सिर्फ एक ब्रीफकेस लेकर जाते थे और वही लेकर वापस आ जाते थे। इस वजह से मेरी मां को उनकी सहेलियां चिढ़ाती भी थीं कि उनके लिए पापा कभी विदेश से कोई गिफ्ट लेकर नहीं आते।


जब शेखों ने खुश होकर केष्टो मुखर्जी को पहना दी सोने की चेन


मेरे पिता पहले ऐसे स्टार थे जिन्हें दुबई में रेड कारपेट वेलकम मिला था। वहां एक स्टेज परफॉर्मेंस के दौरान पापा ने अपने चिरपरिचित स्टाइल में कई एक्ट किए जिससे लोग उनके दीवाने हो गए। कई शेखों ने अपने गले से सोने की चेन निकालकर पापा के गले में पहना दी। ये सोने की चेन इतनी ज्यादा हो गईं कि पापा का पूरा गला ऊपर तक भर गया।


उन्होंने फिर सबसे गुजारिश करते हुए कहा कि जिन्होंने भी सोने की चेन उनके गले में डाली है वो वापस ले लें। ये सुनकर उनके साथियों ने कहा कि तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? तो पापा बोले कि मैं इन्हें लेकर एयरपोर्ट पर घंटों खड़े नहीं रह सकता। मैं नहीं चाहता कि कस्टम अधिकारी मेरा लगेज चेक करें और मैं इन सामानों की ड्यूटी चुकाते हुए अपना समय बर्बाद करूं। इसी वजह से वो मेरी मां को उनकी सभी पसंदीदा चीजें मुंबई से दिलवा देते थे, भले ही वो कितनी भी महंगी क्यों ना हो।


एक बार की बात है। जब हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी और हम जुहू में 1 BHK वाले किराए के घर में रहते थे। मेरी मां को टीवी देखना पसंद था तो वो पड़ोसी के घर अक्सर टीवी देखने चली जाती थीं। एक दिन पड़ोसी ने उन्हें घर आने से मना कर दिया। मां इस बात से उदास हो गईं। पापा ने कारण पूछा तो उन्होंने पूरी बात बताई। पापा को भी ये बात बेहद बुरी लगी। इस घटना के एक महीने के भीतर ही पापा ने जुहू में 2 BHK फ्लैट खरीदा और मां के लिए टीवी भी ली, ताकि उन्हें किसी और के घर कभी टीवी देखने ना जाना पड़े। वो मां को लेटेस्ट ट्रेंड की हर साड़ी और गहने दिलाते रहते थे।



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