स्पष्टता
-
संक्षिप्तता
पत्रकारिता (मीडिया) का प्रभाव समाज पर लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद यह पेशा अब संकटों से घिरकर लगातार असुरक्षित हो गया है। मीडिया की चमक दमक से मुग्ध होकर लड़के लड़कियों की फौज इसमें आने के लिए आतुर है। बिना किसी तैयारी के ज्यादातर नवांकुर पत्रकार अपने आर्थिक भविष्य का मूल्याकंन नहीं कर पाते। पत्रकार दोस्तों को मेरा ब्लॉग एक मार्गदर्शक या गाईड की तरह सही रास्ता बता और दिखा सके। ब्लॉग को लेकर मेरी यही धारणा और कोशिश है कि तमाम पत्रकार मित्रों और नवांकुरों को यह ब्लॉग काम का अपना सा उपयोगी लगे।
सोमवार, 26 अगस्त 2013
मीडिया की भाषा
1. माध्यम तय करती है भाषा- पत्रकारिता करते समय आप किस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, यह आपकी पत्रकारिता के माध्यम पर निर्भर करता है. जैसे- अगर आप आपका माध्यम रेडियो है तो
- आपकी भाषा ज्यादा सरल होनी चाहिए
- आप जाने-माने याने प्रचलित शब्दों का प्रयोग करें
- आपके वाक्य छोटे-छोटे और चुटीले हों
- यहां आप प्रयोग कर सकते हैं.
- आप अप्रचलित शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं.
- यहां आप जटिल वाक्यों और विश्लेषणों का सहारा ले सकते हैं.
- आपकी वर्तनी सही और वाक्य संचरना संतुलित हों.
- टेलीविजन के परदे पर का पाठ्य वर्तनी की दृष्टि से सही हों
- आपकी की साफ हो
- उच्चारण सही हों, मसलन ड़ ड और में फर्क, श, स और ष में फर्क, एकार और ऐकार में अंतर, ओकार और औ-कार में फर्क
- कम से कम शब्दों से काम चलाया जा सकता है
- यहां भी वाक्य छोटे, सरल और संतुलित हों
- एकबार फिर, यहां परदे पर दिखने वाले पाठ्य अहम होते हैं इसलिए इनकी वर्तन शुद्ध हों.
Posted by
Satyajeetprakash
at
6:14 PM
शनिवार, 17 अगस्त 2013
गुरुवार, 15 अगस्त 2013
जर्नलिज्म शब्द की उत्पति , पत्रकारिता का अर्थ
पत्र पत्रिकाएं समाज का आईना होती है। समाज में घटित घटनाओ का वर्णन इन माध्यमो द्वारा
किसी न किसी रूप में हमारे सामने अवश्य होता है। समाचारो पत्रों में तो इन घटनाओ की सम्पूर्ण जानकारी हमें मिल जाती है । सस्ता व आसान माध्यम समाचार पत्र घर बैठे ही हमें देश विदेश की
जानकारी उपलब्ध करवा देता है। पत्रकार
द्वारा घटना का वर्णन पत्रकारिता कहलाता है। जर्नलिज्म शब्द इसका अंग्रेजी रूपांतरण है जिसकी उत्पति जर्नल शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है दैनिक । इसलिए दिनभर के क्रियाकलापो तथा गतिविधयों की जानकारी का माध्यम बनने के कारण ही इसे जर्नलिज्म का नाम
दिया गया है। एक दैनिक पत्र में सम्पूर्ण संसार का विवरण दिया होता है।
घटना की जानकारी से लेकर उसको समाचार पत्र तक पहुंचाने का कार्य पत्रकार
द्वारा होता है, वहीं समाचारो की कांट छांट ,उचित शीर्षक आदि से समाचार संपादकों द्वारा पढने योग्य बनाया जाता है। इस तरह के क्रियाकलापो को
पत्रकारिता नाम दिया गया है।
अंग्रेजी सीखने के महत्वपूर्ण सूत्र
किसी भी साक्षात्कार में आपके सामान्य ज्ञान के साथ साथ आपके आत्मविश्वास को
भी परखा जाता है. इसलिए साक्षात्कार के लिए हमेशा नियमित तयारी रखे. यह कार्य आप
सामान्य ज्ञान की मासिक पत्रिकाओ व विषय से सम्बंधित पुस्तकों के नियमित अध्यन
द्वारा कर सकते है. आत्मविश्वास बनायें रखे और सवालों को ध्यान से सुनें अगर
प्रश्न समझ में न आये तो विनम्रता से सवाल दोहराने का निवेदन कर सकते है. ज्यादा
स्मार्ट या चालक बनाने का प्रयास कदापि न करें. समझदारी इसमें है की आप अपनी
योग्यता से साक्षात्कार को अपने मुताबित मोड़ सकें. और ऐसा संभव है.
१. हिम्मत: हिम्मत बनाये रखे. सवाल पे सवाल दागे जायेंगे पर डरे नहीं ये सब आपकी
योग्यता का परीक्षण मात्र है.
२. सहजता और
स्पष्टता: सवाल के जवाब में ज्यादा जल्दबाजी न दिखाएँ. पुरे साक्षात्कार पेनल से
सामंजस्य बनाते हुए बड़ी सहजता और स्पष्टता से सवालों के जवाब दे. अगर उतर देने में
कोई गलती हो जाये तो गलती स्वीकार करें.
३. भाव और निगाह:
कुर्सी पर सावधान मुद्रा में बैठे, हाथ मेज पर रखे, सवाल पूछने वाले सदस्य की और ध्यान करके उतर दे. आपकी जबान
के साथ आपके भाव और ऑंखें भी आपके जवाबों का समर्थन करे.
४. भाषा: जिस भाषा
में आपकी अच्छी पकड़ है जवाब उसी भाषा में दिया जाना चाहिए. अगर आपके हिंदी और
अंग्रेजी दोनों भाषाओँ पर पकड़ है तो ध्यान रहे की प्रश्न की भाषा के अनुरूप उसी
भाषा में जवाब दें.
५. सकारात्मक: मन से
सारी बेकार की धारणाएं निकाल दे. प्रतिसप्र्धा जरूर है पर आप चयनित नहीं होंगे ये
गलत धारणा है अपने आपको किसी से कम न समझे.
६. विवेक: कई बार
आपके मन में एक सवाल के कई जवाब घूमते है ऐसी अवस्था में विवेक से काम लें और
प्रश्न का सबसे करीबी जवाब दे.
शनिवार, 10 अगस्त 2013
जरूरी है भाषाओं को मरने से बचाना
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज कैसी विडंबना है कि गिनी-चुनी भाषाओं को छोड़कर मनुष्य को मनुष्य कहने का हक दिलाने वाली तमाम भाषाएं संकट में हैं। हमारा समाज-संसार विकसित हो रहा है और नई सुखद घटनाएं घट रही हैं, लेकिन साथ में वह विकृति भी आ रही है, जो विकास केसाथ मिलती है। भाषाओं का संकट विकास की वेदी पर चढ़ती बलि ही है। आंकड़ा बताता है कि हर पखवाड़े एक भाषा लुप्त हो रही है। आज स्थिति यह है कि संसार में प्रचलित करीब छह हजार भाषाओं में से एक-चौथाई को बोलने वाले सिर्फ एक ही हजार लोग बचे हैं। इनमें से भी सिर्फ छह सौ भाषाएं ही फिलहाल सुरक्षित की श्रेणी में आती हैं। किसी नई भाषा के जन्मने का कोई उदाहरण भी हमारे सामने नहीं है। हां, कुछ भाषाओं की मिलावट से `फ्यूजन´ की स्थिति जरूर बन रही है, जैसे `हिंग्लिश´। पर इसे नई भाषा नहीं कह सकते। इसका कोई भाषिक व्याकरण तो है ही नहीं, सामाजिक व्याकरण भी फिलहाल नहीं है।
भाषाविद् भाषाओं के लुप्त होने को मनुष्य की मृत्यु के समान मानते हैं। भाषाशास्त्री डेविड क्रिस्टल अपनी पुस्तक, लैंग्वेज डेथ में कहते हैं, भाषा की मृत्यु और मनुष्य की मृत्यु एक-सी घटना है, क्योंकि दोनों का ही अस्तित्व एक-दूसरे के बिना असंभव है। किसी भाषा का अस्तित्व बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि उसे बोलने-चालने वाले कम से कम सौ-पचास लोग हों। यूनेस्को ने तो भाषाओं के अस्तित्व का बाकायदा पैमाना भी तय किया है। उसका मानना है कि सौ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा असुरक्षित है। इसका एक कारण यह भी है कि एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को अब विरासत में भाषा नहीं सौंपती। इंग्लैंड की संकटग्रस्त भाषाओं की फाउंडेशन का मानना है कि मानव इतिहास उस मोड़ पर है, जहां दो पीढ़ियों के बाद संसार में अधिकांश भाषाएं समाप्त हो जाएंगी हालांकि यह एक अतिवादी दृष्टिकोण हो सकता है, लेकिन खतरे की गंभीरता के प्रति सतर्क भी करता है।
दुनिया भर में इस वक्त चीनी, अंगरेजी, स्पेनिश, बांग्ला, हिंदी, पुर्तगाली, रूसी और जापानी कुल आठ भाषाओं का राज है। दो अरब 40 करोड़ लोग ये भाषाएं बोलते हैं। इसमें से अंगरेजी का प्रभुत्व सर्वाधिक है और वह वैश्विक भाषा के रूप में स्वीकार कर ली गई है। भाषाविज्ञानी इसे खतरनाक ट्रेंड मानते हैं। वैश्विक दर्जा हासिल करने में अंगरेजी के एक विशेष गुण का बड़ा योगदान है। यह दूसरी भाषाओं के शब्दों को आत्मसात करके उनको मूल भाषा से çवçच्छन्न करने में माहिर है। डिक्शनरी देखने से पता चलता है कि अंगरेजी बनी ही दूसरी भाषाओं के शब्दों से है। दरअसल अंगरेजी दूसरी भाषाओं के शब्दों की देन है।
अंगरेजी के विश्वव्यापी बनने में उसके लचीलेपन का बड़ा हाथ रहा है। लेकिन अंगरेजी के विश्व वर्चस्व को भाषाविज्ञानी स्थानीय भाषाओं के लिए बड़ा खतरा मानते हैं। अंगरेजी का वर्चस्व उन भाषाओं के लिए भी खतरा है, जिन्हें बोलने वालों की संख्या बहुतायत में है, अंगरेजी उन भाषाओं के लिए भी खतरा है, जो आधुनिक हैं और उन भाषाओं के लिए तो अंगरेजी खतरा है ही, जिन्हें बोलने वालों की स्ांख्या कम है। हिंदी का ही उदाहरण लीजिए। आज विश्व की आठ प्रमुख भाषाओं में इसकी गिनती है। लेकिन क्या हिंदी या बांग्ला पढ़-लिखकर कोई तरक्की कर सकता है? सिक्का उसी भाषा का चलेगा, जिसमें उच्च शिक्षा दी जाएगी, जिसमें तकनीकी ज्ञान उपलब्ध होगा और जिसमें राजकाज चलेगा। हमारे देश में यह सब अंगरेजी में ही होता है। इसलिए कोई गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए। आसन्न लक्षण स्पष्ट हैं।
और साफ समझने के लिए यूरोप की आधुनिक भाषाओं से सबक लेना चाहिए। वे संकट की आंच महसूस करने लगी हैं। कई यूरोपीय देशों ने अपनी भाषाओं को अंगरेजी से बचाने के लिए एहतियात बरतना शुरू कर दिया है। हॉलैंड और बेçल्जयम की सरकारों ने मिलकर डच भाषा के संवद्धüन-संरक्षण के लिए एक संगठन बनाया है। संगठन का मानना है कि डच भाषा को निकट भविष्य में कोई खतरा नहीं है, पर धीरे-धीरे इसका क्षरण अवश्यंभावी है। भविष्य में यह केवल बोलचाल की भाषा रह जाएगी। एक ऐसी भाषा, जिसे आप परिवार के बीच बोल सकेंगे, अपनी भावनाएं बेहतर ढंग से व्यक्त कर सकेंगे। लेकिन जीवन के गंभीर पहलुओं, ज्ञान-विज्ञान, टेक्नोलॉजी, राजकाज, मुद्रा-मंडी इन सब पर किसी वैश्विक भाषा या अंगरेजी का ही राज रहेगा। यहां डच के स्थान पर किसी भारतीय भाषा को रखकर देखने से अपनी भाषाओं का भविष्य साफ दीखने लगेगा।
भाषाओं को बचाने की आवश्यकता आखिर क्यों है? जब एक भाषा से काम चल सकता है, तो अनेक भाषाओं की क्या जरूरत? यह सवाल आज का नहीं है, बहुत पुराना है। बाइबिल के समय से एक कहानी प्रचलित है। उसके अनुसार भाषा एक ही होनी चाहिए, क्योंकि ज्यादा भाषाएं मानवता पर दंड हैं। भाषा एक होने से आपसी समझ- बूझ को बढ़ावा मिलता है, मनमुटाव कम होता है और शांति का प्रचार-प्रसार होता है। लेकिन यह एक मिथक ही है। भाषा एक हो या अनेक, अंतद्वüंद तो मनुष्य के दिमाग की उपज हैं। अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया के तमाम एकभाषी देश गृहयुद्ध की आंच में झुलस रहे हैं। जाहिर है, एक भाषाभाषी होना मतभेद कम होने की गारंटी नहीं है।
इस जवाब में ही एक सवाल भी निहित है। भाषा की विविधता क्यों आवश्यक है? दरअसल कोई भी भाषा अपने में एक पूरी विरासत होती है। भाषा की मृत्यु का अर्थ होता है अपने बीते वक्त से कटना, अपने इतिहास, दर्शन, साहित्य, चिकित्सा-प्रणाली और दूसरी तमाम समृद्ध परंपराओं के मूल स्वरूप से वंचित हो जाना। एक अनुमान केअनुसार, दुनिया में इस समय करीब 6,000 भाषाएं प्रचलित हैं। यानी हम छह हजार तरीके से दुनिया को समझ सकते हैं, समझा सकते हैं। भाषा की विवधता का यही कमाल है। एस्कीमो बर्फ में रहते हैं, बर्फ ही उनका जीवन है। यही कारण है कि उनकी भाषा में बर्फ के दो दर्जन से ज्यादा उच्चारण हैं। अल्बेनियाई लोग मंूछों को 27 तरह से जताते हैं। डेविड क्रिस्टल मानते हैं कि जो लोग दूसरी भाषा में अपनी परंपराएं और संस्कृति व्यक्त करते हैं और इसे ही सही मानते हैं, वे भ्रम में हैं। संस्कृति बहुआयामी होती है। इसमें अनंत तत्वों का समावेश होता है। जिस परिवेश, जिस भूदृश्य में ये विकसित होती है, उसी के मुताबिक उसकी सरलता-सहजता-दुरूहता तय होती है, लहजा बनता और बिगड़ता है। भाषाओं की प्रारंभिक स्थिति यानी बोलियोंं में इसे आसानी से देखा-समझा जा सकता है। इसको ऐसे भी समझा जा सकता है कि समान भूदृश्यों में भाषाएं अलग-अलग होने के बावजूद कई बार गीतों और शब्दों की ध्वनियां में अद्भुत साम्य देखने को मिलता है। दूसरी भाषा में उसे व्यक्त कर सकते हैं, पर मूल भाषा से बोलियां अपने आसपास को ज्यादा बेहतर उच्चारित करती हैं। तब परदेसी भाषा कितनी विपन्न साबित होगी, इसे सहज ही समझा जा सकता है। इसलिए अपनी भाषा-बोलियों को सहेजना जरूरी है। यही सजीव इतिहास है।
- लेखक - सुनील शाह
गुरुवार, 8 अगस्त 2013
Category:Territorial disputes of India
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घुसपैठ के पीछे चीन की मंशा क्या है?
IBNKhabar चैट
Jul 24, 2013 |
Live
बार-बार घुसपैठ के पीछे चीन की मंशा क्या है?
चीन ने एक बार फिर भारतीय सीमा में घुसपैठ की
है। आखिर क्यों बार-बार चीन कर रहा है ऐसी हिमाकत? क्या है चीन का घुसपैठ
के पीछे इरादा? क्या भारत को उकसा रहा है चीन? क्या सरकार को होना चाहिए
सख्त? ये और ऐसे कई अन्य सवाल आप सीधे पूछ सकते हैं आईबीएन-7 के
एक्जीक्यूटिव एडिटर एमके झा से आईबीएनखबर डॉट काम पर लाइव चैट में बुधवार
शाम 5 बजे। अपने सवाल भेजें।
- क्या चीन की घुसपैठ के खिलाफ भारत को भी आक्रामक रवैया अख्तियार करना चाहिए? Asked by: anita
- भारत को चीन को जवाब उसी की भाषा में देना चाहिए..
- पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और अब भूटान सभी पड़ोसी देशों से भारत के रिश्ते बिगड़ गए हैं, क्या इसीलिए चीन मौके का फायदा उठा रहा है? Asked by: अमित कुमार
- बांगलादेश और भूटान से रिश्ते सही हैं..लेकिन भारत को big brother attitude से निकना होगा।...इन देशों मों चीन की मौजूदगी चीन के सामरिक और strategic फायदे के लिए हैं..भारत को इन मुद्दों पर सोचना चाहिए
- चीन बार-बार ऐसी हिमाकत क्यों कर रहा है। इसके पीछे क्या वजह हो सकती है? Asked by: रोहित सिंह
- मैं इसे psychological pressure मानता हूं..बार बार provacations कर वो चुनौती दे रहा है साथ ही लड़ाई भी नहीं कर रहा..साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं..भारत को भी यही करना चाहिए
- मृत्युंजय जी आपको नहीं लगता कि चीन भारत पर हमला करके यूपीए सरकार की नाकामी को दुनिया के सामने पेश कर रहा है? इससे तो दुनिया के और भी देश भारत को कुछ नहीं समझेंगे? Asked by: SOURAV SINGH
- यह हमला नहीं है..इसे आप चोरी और सीना जोरी कह सकते हैं। भारत सरकार को इस मुद्दे को जोर शोर से उठाना चाहिए..चीन को confront करना चाहिए।
- क्या पाक और चीन के बीच कोई ऐसी साठगांठ है कि दोनों एक साथ भारत के खिलाफ हमला बोल सकते हैं Asked by: Shivendra pratap singh
- इस बात की आशंका नहीं है..आज तक पाकिस्तान से जो भी लड़ाई लड़ी गई है..चीन ने कभी सीधे तौर पर पाकिस्तान का साथ नहीं दिया है।
- क्या पाक बॉर्डर पर ज्यादा फोकस करने से चीनी बॉर्डर पर निगरानी के मामले में भारत सरकार और सेना पिछड़ गई हैं? Asked by: नीतिश भदौरिया
- चीन को भारत का जो हिस्सा चाहिए था वो उसने 1962 की लड़ाई में उसने कब्जा कर लिया था..अब और कोई लड़ाई की आशंका नहीं है।.जहां तक सवाल है पाकिस्तान का..वहां पर ज्यादा चौकसी हौनी ही चाहिए। आपकी बात सही है भारत की सेना चीन के मुकाबले कम है लेकिन भारत की अपनी मजबूरियां हैं।
- चीन का ये कैसा चरित्र है कि उसकी किसी से नहीं पटती सिवाय पाकिस्तान के? Asked by: माधव बंसल
- 1948 से ही चीन की यही नीति रही है। माओ से लेकर नीतियां वहीं हैं..हां चेहरे बदल जाते हैं। पाकिस्तान अपनी जरुरतों के लिए चीन का मोहताज है जबकि चीन को पाकिस्तान की जमीन अपनी strategic फायदे के लिए चाहिए।
- चीन के बार-बार हमारी सीमा में घुस आने के बावजूद हमारी सरकार चुप क्यों है। क्या डिप्लोमैटिक कदमों के नाम पर चुप्पी ओड़ लेना सही है। Asked by: Mukesh Pawar
- पहली दुसरी बार जब इस तरह की घुसपैठ हुई थी तब तक को यह माना जा सकता था कि गलतियां हो गई होंगी..लेकिन बार बार होना महज संयोग नहीं है..भारत को इस पर कड़ा एतराज जताना चाहिए..चुप्प रहना या सह लोना कमजोरी की निशानी है।
- भारत से युद्ध में उलझना चीन के लिए भी आसान नहीं होगा और उसे बड़ा बाजार खोना पड़ेगा और वो जापान से पिछड़ भी जाएगा। क्या वो ये बात नहीं समझ रहा? Asked by: Farhan Khan
- चीन इस बात को भली भांति समझता है लेकिन उसे इस बात का भी घंमड है कि एशिया में उसे Giant कहा जाता है..उसकी नीति है कि सीमा पर भारत पर psychological दबाव बनाए रखो।
- जब चीन के साथ हमारी कोई सर्वमान्य सीमा ही नहीं है तो फिर घुसपैठ के सवाल कैसे खड़े किए जा रहे हैं? Asked by: मनीष
- सही बात है..लाईन आफ कंट्रोल को लेकर ही दोनों तरफ अलग अलग नक्शे हैं..जाहिर है घुसपैठ का सवाल उठेगा ही।
- क्या भारतीय सेना की ओर से भी ऐसी कोई कार्यवाही की जाती है जिसे वहां की मीडिया में घुसपैठ बताकर मुद्दा बनाया जाता हो? Asked by: रणबीर
- भारत और चीन की कोई निर्धारित सीमा नहीं है। Lne of actual control को लेकर भी दोनों देशों के बीच काफी मतभेद हैं। जब भी भारत की तरफ से सीमा उल्लघंन का मुद्दा उटाया जाता है..चीन की ओर से भी उल्टा आरोप लगाया जाता है।
- भारत और चीन सीमा विवाद सुलझाने के मामले में कितना आगे बढ़े हैं खासकर 62 के युद्ध के बाद। Asked by: समीर जैन
- सीमा विवाद पर कोई खास बात नहीं बढ़ी है लेकिन एक बात तय हुई है कि विवाद को बातचीत के जरिए ही सुलझाया जा सकता है और इसके लिए दोनों देशों की तरफ से विशेष प्रतिनिधि नियुक्त किए गए हैं ..अब तक 17 राउंड की बैठक हो चुकी है। आज भी दोनों देशों के विशेष डेलिगेशन की बातचीत हुई है।
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