शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

सोनार ( ज्वेलर्स ) GST से क्यु डरता है?*

 * मान लीजिये आप सुनार के पास गए आपने *10 ग्राम प्योर सोना 50000 रुपये का खरीदा।*



उस सोने को लेकर आप सुनार के पास हार बनवाने गए। सुनार ने आपसे 10 ग्राम सोना लिया और कहा की 2000 रुपये बनवाई लगेगी। 

आपने *खुशी* से कहा ठीक है। उसके बाद सुनार ने *1 ग्राम सोना निकाल लिया* और 1 ग्राम का *टांका* लगा दिया। क्योंकि बिना टांके के आपका हार बन ही नहीं सकता। 


*यानी की 1 ग्राम सोना 3000 रुपये का निकाल लिया* और 2000 रुपये आपसे *बनवाई अलग से* लेली। 


यानी आपको *5000 रुपये का झटका* लग गया। अब आपके *50 हजार* रुपये सोने की कीमत मात्र *45 हजार* रुपये बची और सोना भी *1 ग्राम कम कम हो कर 9 ग्राम शेष बचा ।*  


बात यहीं खत्म नही हुई। उसके बाद *अगर* आप पुन: अपने सोने के हार को बेचने या कोई और आभूषण बनवाने पुन: उसी सुनार के पास जाते हैं तो वह पहले टांका काटने की बात करता है और सफाई करने के नाम पर *0.5 ग्राम सोना* और कम हो जाता है। 


अब आपके पास मात्र *8.5 ग्राम* सोना ही बचता है। यानी की *50 हजार* का सोना मात्र *43500* रुपये का बचा।


आप जानते होंगे कि,


*50000 रुपये का सोना + 2000 रुपये बनवाई = 52000 रुपये ।*


*1 ग्राम का टांका कटा 3000 रुपए + 0.5 ग्राम पुन: बेचने या तुड़वाने पर कटा मतलब सफाई के नाम पर = 1500/=*


*शेष बचा सोना 8.5 ग्राम*


*यानी कीमत 52000 - 6500 का घाटा  .....= 45500 रुपये*


*भारत सरकार की मंशा क्या है ?*


*GST* लगने पर सुनार को रसीद के आधार पर उपभोक्ता को पूरा सोना देना होगा। 

और जितने ग्राम का टांका लगेगा उसका सोने के तोल पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जैसा कि आपके सोने की तोल *10 ग्राम* है और टाका *1 ग्राम* का लगा तो सुनार को रसीद के आधार पर *11 ग्राम* वजन करके उपभोक्ता को देना होगा। इसी लिए सुनार हड़ताल पर है कि अब उनका *धोखाधड़ी* का *भेद* खुल जायेगा।


*कृपया इस मेसेज को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ।*


*जागो ग्राहक जागो।*


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भाई जो सोनार हो माफ़ करना इंसानियत के नाते शेयर किया हूँ

आपका अपना.🙏

आजादी के अमृत महोत्सव में संदर्भ मध्यप्रदेश/ मनोज कुमार

 🙏🏼🙏🏼18 सितम्बर विशेष /  डरे अंग्रेजों ने पिता-पुत्र को शहीद कर दिया / मनोज कुमार 🙏🏼🙏🏼



हिन्दुस्तान में स्वाधीनता संग्राम का बिगुल बज चुका था. 1857 के विद्रोह की चिंगारी हर वर्ग और हर अंचल में सुलगने लगी थी. किसी को अपनी जान की फिक्र नहीं थी और जो फिक्र थी तो अपने वतन की. अंग्रेजी शासन हर स्तर पर विद्रोह को कुचलने के लिए बर्बर कार्यवाही कर रहा था. इतिहास के सुनहरे पन्नों पर जिन बलिदानियों के नाम अंकित हैं, उनमें राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह का नाम सबसे ऊपर है. पिता-पुत्र की कविता से भयभीत अंग्रेजों ने उन्हें तोप से उड़ा दिया था क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि यह विद्रोह का गीत है. पिता-पुत्र के बलिदान के साथ पूरा देश उनकी जयकारा करने लगा और देखते ही देखते अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावत हो गई. आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर ऐसे वीर पुत्रों का स्मरण कर मध्यप्रदेश की माटी सदैव उनकी ऋणी रहेगी. स्वाधीनता संग्राम के इस महान प्रसंग के माध्यम से नयी पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली इतिहास से परिचित कराया जाना है.


राजा शंकर शाह, कुंवर रघुनाथ शाह, दोनों पिता-पुत्र अच्छे कवि होने के कारण अपनी ओजस्वी कविता के माध्यम से जनमानस में क्रांति का संदेश दिया करते थे. जबलपुर की 52वीं पलटन को मेरठ के सिपाहियों के विद्रोह की जानकारी मिल चुकी थी. जबलपुर में भी वहां की जनता ने गोंडवाना साम्राज्य (वर्तमान का जबलपुर मण्डला) राजा शंकर शाह के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का प्रारंभ कर दिया था. कहा जाता है कि राजा शंकर शाह की आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब थी, अंग्रेज सरकार उनको अपने पक्ष में रखने के लिए पेंशन भी दिया करती थी. राजा शंकर शाह चाहते तो क्रांतिकारियों एवं क्रांति का दमन करके अपनी पेंशन भी बढ़वा सकते थे और कुछ अन्य प्रकार के लाभ ले सकते थे.  किंतु उन्होंने अभाव में ही जीना पसंद किया. कुछ भी हो जाए, इस क्रांति का साथ देंगे, समर्पण नहीं करेंगे-संघर्ष करेंगे.


सन् 1857 में सितंबर अंग्रेजों पर आक्रमण की योजना बनी क्योंकि उस दिन अत्यधिक भीड़ भाड़ चहल-पहल रहेगी. अंग्रेज सरकार ने खुफिया रूप से अपने एक गुप्तचर को फकीर के रूप में भेजा था, जिससे राजा की योजना की जानकारी उन्हें प्राप्त हो चुकी थी. अंग्रेज सरकार की 52वीं रेजीमेंट के कमांडर क्लार्क के गुप्तचर उसको समय-समय पर सूचना देते थे. क्रांति के दिन से पहले ही 14 सितंबर, 1857 को आधी रात में क्लार्क ने राजमहल घेर लिया. राजा की तैयारी पूरी नहीं हो पाई राजा शंकर शाह, कुंवर रघुनाथ शाह सहित तेरह अन्य लोगों को भी बंदी बना लिया गया. उन्हें जबलपुर रेलवे स्टेशन के पास अस्थाई जेल बनाकर कैद किया गया था, साथ ही पूरे महल में हथियार और क्रांति की सामग्री थी, उन्हें भी ढूंढा गया.


वह कहते हैं ना, युद्धों में कभी नहीं हारे, हम डरते हैं छल छंदों से, हर बार पराजय पायी है अपने घर के जयचंदों से. राजा के राज्य में भी एक जयचंद था. जिसका नाम गिरधारीलाल दास था. वह क्लार्क को राजा के साहित्य की कविताओं का अनुवाद करके अंग्रेजी में बताता था. कविता के आधार पर मुकदमा चलाया गया. ‘देश के इतिहास में पहली बार था, जिसमें किसी लेख, कविता या साहित्य के आधार पर मुकदमा चलाकर उसे मौत की सजा दी.’ उन्हें माफी मांगने को कहा गया, साथ ही साथ धर्म परिवर्तन करने को कहा गया और अंग्रेजों से सहयोग करने को कहा गया, प्रस्ताव को राजा ने नकार दिया. 03 दिन में मुकदमा चलाया गया, निर्णय भी हो गया. 17 सितंबर, 1857 को दोनों पिता-पुत्र को मौत की सजा सुनाते वक्त उनसे कहा था कि यदि वे माफी मांग लें तो सजा माफ कर दी जाएगी. परंतु आजादी के मस्तानों और दीवानों ने क्षमा नहीं मांगी और अपना सिर कटाना मंजूर किया.


18 सितंबर, 1857 को अपना प्रभाव बनाए रखने के लिये अंग्रेज सरकार ने राजा शंकर शाह, रघुनाथ शाह को जबलपुर उच्च न्यायालय के पास खुले आसमान के नीचे तोपों से बांध दिया गया. तोप से बांधते समय राजा और राजकुमार दोनों सीना तानकर निडर खड़े रहे. भारत माता के वीर सपूत ने भारत माता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए. मृत्यु से पूर्व उन्होंने अपनी प्रजा को एक-एक छन्द सुनाने चाहा। पहला छन्द राजा शंकरशाह ने सुनाया -


मूँद मूख डण्डिन को चुगलों की चबाई खाई

खूब दौड़ दुष्टन को शत्रु संहारिका।

मार अंगरेज रेज कर देई मात चण्डी

बचे नाहिं बैरी बाल बच्चे संहारिका।

संकर की रक्षा कर दास प्रतिपाल कर

वीनती हमारी सुन अब मात पालिका।

खाई लेइ मलेच्छन को झेल नाहिं करो अब

भच्छन ततत्छन कर बैरिन कौ कालिका।।

यह पूरा होते ही दूसरा छन्द पुत्र ने और भी उच्च स्वर में सुनाया, जिससे जनता जोश से भर गई.

कालिका भवानी माय अरज हमारी सुन

डार मुण्डमाल गरे खड्ग कर धर ले।

सत्य के प्रकासन औ असुर बिनासन कौ

भारत समर माँहि चण्डिके संवर ले।

झुण्ड-झुण्ड बैरिन के रुण्ड मुण्ड झारि-झारि

सोनित की धारन ते खप्पर तू भर ले।

कहै रघुनाथ माँ फिरंगिन को काटि-काटि

किलिक-किलिक माँ कलेऊ खूब कर ले।।


अंग्रेजों का इस तरह सरेआम राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह को तोप से बांधकर मृत्युदंड देने का उद्देश्य लोगों और राजाओं में अंग्रजों का डर पैदा करना था. परन्तु अंग्रेजों के इस कदम से क्रांति और ज्यादा भडक़ गई. दूसरे ही दिन से लोगों द्वारा बड़ी संख्या में उस स्थान की पूजा की जाने लगी. 52वीं रेजिमेंट के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और इनकी टुकड़ी पाटन की ओर कूच कर गई. विद्रोह की आग मंडला, दमोह, नरसिंहपुर, सिवनी और रामगढ़ तक फैल गई. जगह-जगह अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रांति फैल गई. तोप से उड़ाते समय वहां उपस्थित एक अंग्रेज अधिकारी लिखता है कि - ‘मैं अभी-अभी क्रांतिकारी राजा और उनके पुत्र को तोप से उड़ाए जाने का दृश्य देखकर वापस लौटा हूं. जब उन्हें तोप के मुंह पर बांधा जा रहा था तो उन्होंने प्रार्थना की -भगवान उनके बच्चों की रक्षा करें ताकि वे अंग्रेजों को खत्म कर सकें.’ (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का शंखनाद करने वाले गोंडवाना के अमर बलिदानी राजा शंकर शाह और उनके पुत्र कुंवर रघुनाथ शाह के बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता. आज इन महान शहीद पिता-पुत्र का स्मरण कर एक शहर क्या पूरा देश गौरव का अनुभव करता है और यह सीख देता है कि देश से बड़ा कोई नहीं. उन्हें शत-शत प्रणाम.


गुरुवार, 16 सितंबर 2021

रेहान फ़ज़ल की आप बीती

 गुजरात दंगे: रेहान फज़ल की आपबीती- पत्‍नी के क्रेडिट कार्ड से बची थी जान

10 वर्ष पहले

दस साल पहले गोधरा में ट्रेन जलाए जाने के बाद भड़के दंगे को कवर करने गए बीबीसी संवाददाता रेहान फज़ल को किस तरह दंगाइयों की भीड़ का सामना करना पड़ा और किस तरह उन्होंने अपनी जान बचाई, पढि़ए उनके लिखे इस संस्‍मरण में।





27 फ़रवरी 2002 की अलसाई दोपहर. मेरी छुट्टी है और मैं घर पर अधलेटा एक किताब पढ़ रहा हूँ. अचानक दफ़्तर से एक फ़ोन आता है. मेरी संपादक लाइन पर हैं. 'अहमदाबाद से 150 किलोमीटर दूर गोधरा में कुछ लोगों ने एक ट्रेन जला दी है और करीब 55 लोग जल कर मर गए हैं.' मुझे निर्देश मिलता है कि मुझे तुरंत वहाँ के लिए निकलना है. मैं अपना सामान रखता हूँ और टैक्सी से हवाई अड्डे के लिए निकल पड़ता हूँ. हवाई अड्डे के पास भारी ट्रैफ़िक जाम है.
अफ़गानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई का काफ़िला निकल रहा है. मैं देर से हवाई अड्डे पहुँचता हूँ. जहाज़ अभी उड़ा नहीं हैं लेकिन मुझे उस पर बैठने नहीं दिया जाता. मेरे लाख कहने पर भी वह नहीं मानते. हाँ यह ज़रूर कहते हैं कि हम आपके लिए कल सुबह की फ़्लाइट बुक कर सकते हैं. अगले दिन मैं सुबह आठ बजे अहमदाबाद पहुँचता हूँ.
अपना सामान होटल में रख कर मैं अपने कॉलेज के एक दोस्त से मिलने जाता हूँ जो गुजरात का एक बड़ा पुलिस अधिकारी है. वह मेरे लिए एक कार का इंतज़ाम करता है और हम गोधरा के लिए निकल पड़ते हैं. मैं देखता हूँ कि प्रमुख चौराहों पर लोग धरने पर बैठे हुए हैं. मेरा मन करता है कि मैं इनसे बात करूँ. लेकिन फिर सोचता हूँ पहले शहर से तो बाहर निकलूँ.
अभी मिनट भर भी नहीं बीता है कि मुझे दूर से करीब 200 लोगों की भीड़ दिखाई देती है. उनके हाथों में जलती हुई मशालें हैं. वे नारे लगाते हुए वाहनों को रोक रहे हैं. जैसे ही हमारी कार रुकती है हमें करीब 50 लोग घेर लेते हैं. मैं उनसे कुछ कहना चाहता हूँ लेकिन मेरा ड्राइवर इशारे से मुझे चुप रहने के लिए कहता है.
वह उनसे गुजराती में कहता है कि हम बीबीसी से हैं और गोधरा में हुए हमले की रिपोर्टिंग करने वहाँ जा रहे हैं. काफ़ी हील हुज्जत के बाद हमें आगे बढ़ने दिया जाता है. डकोर में भी यही हालात हैं. इस बार हमें पुलिस रोकती है. वह हमें आगे जाने की अनुमति देने से साफ़ इनकार कर देती है. मेरा ड्राइवर गाड़ी को बैक करता है और गोधरा जाने का एक दूसरा रास्ता पकड़ लेता है.

छुरे से वार





जल्दी ही हम बालासिनोर पहुँच जाते है जहाँ एक और शोर मचाती भीड़ हमें रोकती है. जैसे ही हमारी कार रुकती है वे हमारी तरफ़ बढ़ते हैं. कई लोग चिल्ला कर कहते हैं,'अपना आइडेन्टिटी कार्ड दिखाओ.'


मैं अपनी आँख के कोने से देखता हूँ मेरे पीछे वाली कार से एक व्यक्ति को कार से उतार कर उस पर छुरों से लगातार वार किया जा रहा है. वह ख़ून से सना हुआ ज़मीन पर गिरा हुआ है और अपने हाथों से अपने पेट को बचाने की कोशिश कर रहा है. उत्तेजित लोग फिर चिल्लाते हैं, 'आइडेन्टिटी कार्ड कहाँ है?' मैं झिझकते हुए अपना कार्ड निकालता हूँ और लगभग उनकी आँख से चिपका देता हूँ. मैंने अगूँठे से अंग्रेज़ी में लिखा अपना मुस्लिम नाम छिपा रखा है.
हमारी आँखें मिलती हैं. वह दोबारा मेरे परिचय पत्र की तरफ़ देखता है. शायद वह अंग्रेज़ी नही जानता. तभी उन लोगों के बीच बहस छिड़ जाती है. एक आदमी कार का दरवाज़ा खोल कर उसमें बैठ जाता है और मुझे आदेश देता है कि मैं उसका इंटरव्यू रिकार्ड करूँ. मैं उसके आदेश का पालन करता हूँ. वह टेप पर बाक़ायदा एक भाषण देता है कि मुसलमानों को इस दुनिया में रहने का क्यों हक नहीं है. अंतत: वह कार से उतरता है और उसके आगे जलता हुआ टायर हटाता है.




कांपते हाथ










मैं पसीने से भीगा हुआ हूँ. मेरे हाथ काँप रहे है. अब मेरे सामने बड़ी दुविधा है. क्या मैं गोधरा के लिए आगे बढ़ूँ जहाँ का माहौल इससे भी ज़्यादा ख़राब हो सकता है या फिर वापस अहमदाबाद लौट जाऊँ जहाँ कम से कम होटल में तो मैं सुरक्षित रह सकता हूँ.
लेकिन मेरे अंदर का पत्रकार कहता है कि आगे बढ़ो. जो होगा देखा जाएगा. सड़कों पर बहुत कम वाहन दौड़ रहे हैं. कुछ घरों में आग लगी हुई है और वहाँ से गहरा धुआं निकल रहा है. चारों तरफ़ एक अजीब सा सन्नाटा है. मैं सीधा उस स्टेशन पर पहुँचता हूँ, जहाँ ट्रेन पर आग लगाई गई थी. पुलिस के अलावा वहाँ पर एक भी इंसान नहीं हैं. चारों तरफ़ पत्थर बिखरे पड़े हैं. एक पुलिस वाला मुझसे उस जगह को तुरंत छोड़ देने के लिए कहता है.
मैं पंचमहल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक राजू भार्गव से मिलने उनके दफ़्तर पहुँचता हूँ. वह मुझे बताते हैं कि किस तरह 7 बजकर 43 मिनट पर जब साबरमती एक्सप्रेस चार घंटे देरी से गोधरा पहुँची, तो उसके डिब्बों में आग लगाई गई. वह यह भी कहते हैं कि हमलावरों को गिरफ़्तार कर लिया गया है और पुलिसिया ज़ुबान में स्थिति अब नियंत्रण में है. मेरा इरादा गोधरा में रात बिताने का है लेकिन मेरा ड्राइवर अड़ जाता है. उसका कहना है कि यहाँ हालात ओर बिगड़ने वाले हैं. इसलिए वापस अहमदाबाद चलिए.

टायर में पंक्चर





हम अपनी वापसी यात्रा पर निकल पड़ते हैं. अभी दस किलोमीटर ही आगे बढ़े हैं कि हम देखते हैं कि एक भीड़ कुछ घरों को आग लगा रही है. मैं अपने ड्राइवर से कहता हूँ, स्पीड बढ़ाओ. तेज़.... और तेज़!


वह कोशिश भी करता है लेकिन तभी हमारी कार के पिछले पहिए में पंक्चर हो जाता है. ड्राइवर आनन फानन में टायर बदलता है और हम आगे बढ़ निकलते हैं. हम मुश्किल से दस किलोमीटर ही और आगे बढ़े होंगे कि हमारी कार फिर लहराने लगती है. इस बार आगे के पहिए में पंक्चर है. हम बीच सड़क पर खड़े हुए हैं.... बिल्कुल अकेले. हमारे पास अब कोई अतिरिक्त टायर भी नहीं है. ड्राइवर नज़दीक के एक घर का दरवाज़ा खटखटाता है. दरवाज़ा खुलने पर वह उनसे विनती करता है कि वह अपना स्कूटर कुछ देर के लिए उसे दे दें ताकि वह आगे जा कर पंक्चर टायर को बनवा सके.

क्रेडिट कार्ड ने जान बचाई





जैसे ही वह स्कूटर पर टायर लेकर निकलता है, मैं देखता हूँ कि एक भीड़ हमारी कार की तरफ़ बढ़ रही है. मैं तुरंत अपना परिचय पत्र, क्रेडिट कार्ड और विज़िटिंग कार्ड कार की कार्पेट के नीचे छिपा देता हूँ. यह महज़ संयोग है कि मेरी पत्नी का क्रेडिट कार्ड मेरे बटुए में है. मैं उसे अपने हाथ में ले लेता हूँ.
माथे पर पीली पट्टी बाँधे हुए एक आदमी मुझसे पूछता है क्या मैं मुसलमान हूँ. मैं न में सिर हिला देता हूँ. मेरे पूरे जिस्म से पसीना बह निकला है. दिल बुरी तरह से धड़क रहा है. वह मेरा परिचय पत्र माँगता है. मैं काँपते हाथों से अपनी पत्नी का क्रेडिट कार्ड आगे कर देता हूँ. उस पर नाम लिखा है रितु राजपूत. वह इसे रितिक पढ़ता है. अपने साथियों से चिल्ला कर कहता है, 'इसका नाम रितिक है. हिंदू है.... हिंदू है... इसे जाने दो.'! इस बीच मेरा ड्राइवर लौट आया है. वह इंजन स्टार्ट करता है और हम अहमदाबाद के लिए निकल पड़ते हैं बिना यह जाने कि वह भी सुबह से ही इस शताब्दी के संभवत: सबसे भीषण दंगों का शिकार हो चुका है.

महान_क्रांतिकारी_योद्धा #बरजोर_सिंह_परमार

 # वैसे तो बलिदानी बुंदेलखंड देश में हुई कई क्रांतियों की गाथा का प्रतीक माना जाता है लेकिन शायद यह कम ही लोग जानते होंगे कि स्वाधीनता के लिए संघर्ष की नींव साल 1804 में जालौन के अमीटा गांव में रखी गई थी।

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सन 1802 में बेसिन की संधि के बाद अंग्रेज यहां शासक के रूप में आए। उन्होंने जालौन के आसपास के गांवों में बदसलूकी के साथ राजस्व की वसूली करनी शुरू कर दी। ब्रिटिश सरकार के इस रवैये को देख यहां पहली बार बुंदेलों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका। बगावत की चिंगारी इस तरह से उठी कि बुंदेलों ने ब्रिटिश सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।

परमार राजवंश ने अमीटा और बिलायां को अपने राज्य का संचालन केंद्र बनाया। ये दोनों गांव एटा रेलवे स्टेशन के मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। परमार परिवार के दीवान जवाहर सिंह ने अंग्रेजों की राजस्व वसूली नीति के खिलाफ निकटवर्ती जमीदारों, जागीरदारों एक सूत्र में बांधा तथा अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और फिर अंग्रेजों को राजस्व देना बंद कर दिया।


अंग्रेजों की राजस्व नीति से तंग आकर बुंदेलों ने आंदोलन के नए समीकरण बनाए। अंग्रेजों ने इस विद्रोह को कुचलने और अमीटा-बिलायां की गढ़ी ध्वस्त करने के लिए नौगांव छावनी में नियुक्त सेना नायक फावसैट को निर्देश दिए। उसने सात कंपनियों तथा तोपखाने की एक टुकड़ी के साथ 21 मई 1804 को अमीटा की गढ़ी को घेरकर आक्रमण कर दिया।


अंग्रेजों से जब खुद को घिरते देखा तो अमीटा के परमारों ने अंग्रेजों को झांसा दिया कि वे उनसे संधि कराना चाहते हैं। अंग्रेजों को अपनी चाल में फसाने के बाद दूसरी ओर उनके सहयोगी अमीर खां ने अमीटा दुर्ग के बाहर खड़ी अंग्रेजी सेना की घेराबंदी कर ली। 22 मई 1804 की सुबह होते ही अंग्रेजी सेना चारों तरफ से घिर चुकी थी। बाहरी ओर से अमीर खां कि पिडारी सेना व अंदर घात लगाए बैठी परमार सेना ने अंग्रेजी सेना पर हमला बोल दिया।

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पिंडारी और परमार सेना की ओर से भीषण गोलाबारी हुई। इसमें अंग्रेजी सेना परास्त हुई। दो दिन तक चले इस युद्ध में अंग्रेजी सेना को आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ा। भारतीय पैदल सेना की दो कंपनियां तथा तोपखाना टुकड़ी के 50 अंग्रेजी सैनिक मौत के घाट उतार दिए गए। युद्ध में मारे गए अंग्रेजी सेना के अधिकारियों की समाधियां कोंच के सरोजनी नायडू पार्क तथा जल संस्थान के बीच पार्क में अभी भी बनी हैं। इस युद्ध में ब्रिटिश सेना की पराजय का दंड सेनानायक फावसैट को भुगतना पड़ा और उसे हटाकर इंग्लैंड वापस भेज दिया गया।

बाद में मराठों से संधि के बाद कोंच का यह क्षेत्र अंग्रेजों के अधीन आ गया । संघर्ष और क्रांति के बीच लम्बे समय तक यह परमार अंग्रेजों के विरुद्ध किसी बड़ी रणनीति में कामयाब नहीं हो पाये ।

आगें जलकर इन परमारों का नेतृत्व बरजोर सिंह ने किया , 15 मई 1858 एक वारंट में बरजोर सिंह की उम्र 40 बर्ष बताई गयी है। इस आधार पर उनका जन्म 1818 माना जाता है। कोंच में बंदोबस्त हुआ , तो बिलाया की जमीदारी बरजोर सिंह के नाम हो गयी । 

बरजोर सिंह अंग्रेजों को टैक्स चुकाने में देरी करते , जिससे उन्हें हवालात में भी रहना पड़ा था । अधिक टैक्स और जनता में गरीबी के कारण बरजोर सिंह अंग्रेजों के विद्रोही बन गये ।


उन्होंने आसपास के राजाओं को संगठित किया और टैक्स में कटौती कराने में कामयाब रहे । 1857 आते-आते वह अंग्रेजों के लिये नासूर बन गये । उन्होंने गांव-गांव संपर्क करने, आर्थिक संसाधन जुटाने, नाना साहब के सेनापति तात्याटोपे तथा जालौन की रानी ताईबाई की मदद करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

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1 अप्रैल 1858 को झांसी में पराजय के बाद जब रानी लक्ष्मीबाई ने कालपी की ओर प्रस्थान किया तब उन्होंने रास्ते में बरजोर सिंह से भेंट करना उचित समझा।

बरजोर सिंह से भेंट के बाद वह कोंच चली गईं। जहां 7 मई 1858 को भीषण संघर्ष हुआ। 22 मई को कालपी के संघर्ष में भी बरजोर सिंह ने अहम भूमिका निभाई।


झांसी की रानी लक्ष्मीबाई कालपी और गोपालपुरा से होती हुई ग्वालियर की ओर चली गईं। अब क्रांति के संचालन की जिम्मेदारी बरजोर सिंह पर आ गई थी। 31 मई 1858 को उनकी बिलायां गढ़ी पर ब्रिटिश सेना ने हमला किया जिसका उन्होंने मुकाबला किया। भीषण युद्ध में वह पराजित हुये , लेकिन बरजोर सिंह अंग्रेजों की पकड़ से बाहर रहे । बरजोर सिंह ने अपने साथियों को इकट्ठा किया और अंग्रेज समर्थकों जमीदारों-गांवो को लूटते रहे । 

कोंच पर हमला करके बरजोर सिंह ने कोंच को जीत लिया । राजस्व की बसूली तक बरजोर सिंह के हाथों में आ गयी ‌। जालौन को कब्जा करने की कोशिश में वह अंग्रेजों से परास्त भी हुये , लेकिन हमेशा अंग्रेजों की पकड़ से बाहर रहे ।


जालौन और आसपास के जिलों में बरजोर सिंह भय से अंग्रेजों को टैक्स देना बंद हो चुका था । ब्रिटिश सरकार के लिये बरजोर सिंह बड़ी चुनौती बने रहे । उनके सैकड़ों साथियों ने इस कार्य में अपनी कुर्बानी दी ।


सबसे लंबी अवधि तक उन्होंने अंग्रेजों से संघर्ष किया। 

सरकारी दस्तावेज के मुताबिक जून 1859 तक उनके जीवित रहने के साक्ष्य मिलते हैं। इस संबंध में अमीटा के उनके वंशजों ने बताया कि वे जून 1859 में पलेरा (टीकमगढ़) चले गए थे जहां लू लगने की वजह से उनकी मृत्यु हुई। इस प्रकार आजादी की यह ज्वाला कई वर्षों तक संघर्ष करके शांत हो गई। बाद में यहां जालौन के जिलाधिकारी एमलाज के प्रयास से 15 अगस्त 1972 को बिलायां में उनका स्मारक चबूतरा बना जो उस दीवान वीर बरजोर सिंह की शौर्यगाथा का प्रमाण है।    



LATEST 100 भड़ास

 आज के इन अखबारों को गौर से देखिए, मानवाधिकार आयोग के ‘सरकारी’ खेल को समझिए!

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