शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

पहचान असली खूंखारों की / रवि अरोड़ा

 पहचान असली खूंखारों की / रवि अरोड़ा



रिपोर्टिंग के सिलसिले में जिले की डासना जेल में कई बार जाना हुआ है। पत्रकार साथियों से देश प्रदेश की कुछ अन्य जेलों की भी छुटपुट खबरें मिलती रहती हैं। लगभग सभी जगह पर एक बात समान है कि निजी दुश्मनी के चलते खुलेआम हत्या करने वालों का कैदियों के बीच बहुत सम्मान होता है जबकि बलात्कारियों से बेहद नफरत की जाती है। ऐसा भी खूब होता है कि नाबालिग से दुराचार अथवा सामूहिक बलात्कार के आरोपियों को पुराने कैदी मिल कर बहुत पीटते भी हैं। कुछ मठाधीश किस्म के सजायाफ्ता कैदियों द्वारा इस आरोपियों के साथ भी यही अपराध दोहराए जाने की भी अपुष्ट खबरें बाहर आती रहती हैं। जेलों के जानकर लोगों के बीच यह आम धारणा है कि अपने बीच आए जघन्य बलात्कारियों को सामाजिकता का बोध लिए कैदी खुद अपने तईं सजा देने की कोशिश करते हैं। विडंबना ही है कि जेलों में बंद खूंखार कैदियों के तो सामाजिक सरोकार हैं मगर हमारी सरकारों, सामाजिक संगठनों, आला अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों के बीच यह सिरे से नदारद हैं । निर्मम हत्याओं और सामूहिक दुराचार करने वालों को अब न केवल रिहा कर दिया जाता है अपितु जेल से बाहर आने पर उनका जोरदार स्वागत और अभिनन्दन तक किया जा रहा है। 


गुजरात की 21 वर्षीय बिल्किस बानो उस समय पांच माह के गर्भ से थी जब उनसे सामूहिक बलात्कार किया गया और उसकी तीन वर्षीय बेटी समेत परिवार के सात सदस्यों की निर्मम हत्या की गई । सीबीआई कोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2002 के गुजरात दंगों के दौरान हुए इस नृशंस कांड में कुल 11 लोगों को दोषी पाया और आजीवन कैद की सजा सुनाई थी। मगर तकनीकि दांवपेच का इस्तेमाल कर गुजरात की भाजपा सरकार ने सजा पूरी होने से पूर्व ही इन सभी दरिंदों को स्वतंत्रता दिवस पर रिहा कर दिया । खास बात यह है कि जिस दिन लाल किले से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने महिलाओं के सम्मान पर लंबा चौड़ा भाषण देश को पिलाया ठीक उसी दिन उनकी पार्टी की राज्य सरकार ने इन सामूहिक बलात्कारियों को छोड़ दिया । रेमिशल पॉलिसी के तहत जिस 11सदस्यीय कमेटी की सिफारिश पर इन बलात्कारियों को रिहा किया गया उनमें दो भाजपा विधायक भी हैं। बताना फिजूल होगा कि इन अपराधियों में से भी अनेक भाजपा के सदस्य अथवा समर्थक थे। बेशर्मी की इंतेहा देखिए कि महिलाओं के बीच आतंक का पर्याय बने इन वहशियों का विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठन अब इस तरह जोरदार स्वागत कर रहे हैं और मिठाइयां बांट रहे हैं जैसे देश के लिए कोई बड़ी कुर्बानी देकर वे लौटे हों। 


गुजरात में चार महीने बाद चुनाव होने हैं। बिल्किस बानो मुस्लिम है और सभी अपराधी हिंदू। जाहिर है चुनाव के दौरान धार्मिक ध्रुवीकरण तेज करने की नीयत से भाजपा द्वारा इस शर्मनाक कृत को अंजाम दिया गया । कहना न होगा कि इसी मामले को नज़ीर बता कर गुजरात दंगों के अब वे तमाम लोग भी छुट जायेंगे जिन्होंने हजारों लोगों का कत्ल किया अथवा महिलाओं की अस्मत से खिलवाड़ किया । पता नहीं इस तुलना पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है मगर कम से कम मुझे तो यही लगता है कि जेलों में बंद जिन अपराधियों को हम खूंखार कहते हैं, उनमें तो फिर भी कुछ न कुछ इंसानियत है मगर खद्दर पहन कर हमारे बीच आकर बड़ी बड़ी बातें करने वाले कतई असली खूंखार हैं।

कस्तूरबा गांधी की डायरी बताया जा रहा है, वो अचानक कैसे मिली?

 जिसे कस्तूरबा गांधी की डायरी बताया जा रहा है, वो अचानक कैसे मिली?

पायल भुयन

बीबीसी संवाददाता


कुछ समय पहले एक डायरी इंदौर के एक आश्रम में पाई गई थी, इस डायरी को महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा की डायरी बताया जा रहा है.


इस डायरी को लेकर विवाद जारी है. कुछ लोग इसे कस्तूरबा गांधी की डायरी नहीं मान रहे हैं. वहीं, उनके पड़पोते तुषार गांधी इसे अपनी पड़दादी कस्तूरबा गांधी की ही डायरी मान रहे हैं.


तुषार गांधी ने इस डायरी पर एक किताब भी लिखी है जिसका नाम - 'द लॉस्ट डायरी ऑफ़ कस्तूर, माई बा'.


बीबीसी ने तुषार गांधी से बात करके इस डायरी और उनकी किताब से जुड़े कुछ सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की.


डायरी के पीछे की कहानी


तुषार गांधी ने इस डायरी के दुनिया के सामने आने की कहानी बयान करते हुए बताया कि कुछ साल पहले जलगांव में गांधी रिसर्च फाउंडेशन नाम से एक संस्था का स्थापना हुई थी.


इसका मकसद गांधी और उनसे जुड़े साहित्य को संजोना था. इस फाउंडेशन के कर्मचारी अलग-अलग गांधी संस्थाओं में जाकर गांधी जी से जुड़ी चीजों को इकट्ठा कर यहाँ लाते हैं.


तुषार गांधी कहते हैं, "ऐसी ही एक टीम कस्तूरबा ट्रस्ट इंदौर गई थी जहाँ सालों से बंद पड़ी पुरानी अलमारियाँ और संदूक दिखे जो बरसों से खुले ही नहीं थे और जब इन्हें खोलकर देखा गया तो इसमें से कई किताबें और दूसरी पुरानी चीजें मिलीं, ऐसे ही बक्से में से एक डायरी मिली, शुरुआत में पता नहीं लग पा रहा था कि हाथ से लिखी ये डायरी किसकी है लेकिन जांच करने गई टीम में से गुजराती जानने वाले एक व्यक्ति ने इसे पढ़ना शुरू किया तो लगा कि किसी ने अपनी रोज़मर्रा की बातें इस डायरी में लिखी हैं और ऐसा माना जाने लगा कि शायद ये डायरी कस्तूरबा गांधी की है."


तुषार गांधी कहते हैं, "क्या इस डायरी में लिखी बातें कस्तूरबा की ही हैं, इसकी पुष्टि के लिए लिखी बातों का मिलान उस समय से किया गया कि उस वक्त कस्तूरबा कहां थीं और पन्ने-दर-पन्ने पढ़ने और कस्तूरबा की जिंदगी से उन पन्नों को जोड़ने पर शक यकीन में बदल गया कि ये डायरी कस्तूरबा की ही है. ये कहानी थी कस्तूरबा की डायरी की लेकिन फिर भी हममें से कोई मानने को तैयार नहीं था कि ये डायरी उन्हीं की है क्योंकि वो तो पढ़ना-लिखना नहीं जानती थीं.


शरीर भस्म हो गया, पर नहीं जलीं कस्तूरबा गांधी की पांच चूड़ियाँ


तुषार गांधी के तर्क


सवाल उठता है कि जब कस्तूरबा गांधी निरक्षर थीं, तो ऐसे में तुषार गांधी इस निर्णय पर कैसे पहुंचे कि ये डायरी उन्होंने ही लिखी थी.


तुषार गांधी की बातों से ऐसा लगता है कि वे पढ़ी-लिखी नहीं थी लेकिन समय के साथ उन्होंने खुद ही बुनियादी अक्षर ज्ञान हासिल कर लिया था.


तुषार गांधी दावा करते हैं, "डायरी मिलने पर मेरा भी यही मानना था कि ये ''बा'' की कैसे हो सकती है क्योंकि वो तो निरक्षर थीं और लिखना नहीं जानती थीं लेकिन जब मैंने डायरी पढ़ी तो मुझे यकीन होता गया कि ये ''बा'' की ही डायरी है. इस पर मैंने अपने पिताजी और उनसे बात कि जिन्होंने ''बा'' की बायोग्राफी लिखी है, उनका भी यही मानना था कि ये ''बा'' की डायरी नहीं हो सकती क्योंकि वो निरक्षर थीं, लेकिन मुझे यकीन तब हुआ कि जिस तरह की भाषा, शब्दावली, व्याकरण और वाक्यों का गठन था, वो सब जब मैं पढ़ने लगा तो ऐसा लग रहा था कि किसी ऐसे व्यक्ति ने लिखी है जिसे सिर्फ बोली भाषा का ज्ञान था, उसे लिखित भाषा का ज्ञान नहीं था, जैसे वो बोलते था, जैसा सोचता है, वैसे ही लिखाई हो रही है."


कई जगहों पर काठियावाड़ी लहज़े का इस्तेमाल है, काठियावाड़ी गुजरात की एक बोली है, और ''बा'' की ज़ुबान भी जीवन भर काठियावाड़ी ही थी, परिवार के साथ अन्य लोग ''बा'' के साथ रहे थे, इन सभी का मानना था कि ''बा'' काठियावाड़ी ही बोलती थीं, तो यकीन होता गया कि किसी काठियावाड़ी बोलने वाले ने ही इसे लिखा है और लिखाई में जो व्याकरण की गलतियां थीं उससे भी लगने लगा क्योंकि अगर ऐसा हुआ होता कि ''बा'' बोलती रही होंगी और कोई दूसरा डायरी लिखता रहा होगा तो वो लिखने वाला अपना कमाल दिखाता, वो ''बा'' की बोलने में जो गलतियां होतीं उसे वो सुधार देता, इसमें ये हुआ है कि जिस तरह से वे उच्चारण करती होंगी उसी तरह से उसे लिख दिया गया."


हॉस्पिटल शब्द को कहीं ''इसपिताल'' लिखा है कहीं पर ''हॉस्टिपल'' लिखा है, कहीं पर ''इसपताल'' लिखा है, इस एक ही शब्द को तरह अलग-अलग जगह पर अलग-अलग तरीके से लिखा है, जैसे सुपरिटेंडेंट जो जेल में होते थे उन्हें, कहीं ''सुपरीटेन'',''सुपलीनटेन'', ''सुकटेनली'' शब्द को गलत अक्षरों में लिखा है, ये सिर्फ वही लिख सकता है जिस लिखने का ज्ञान ना हो अगर ''बा'' बोलती और कोई और लिखता तो, भले ही ''बा'' बोलतीं गलत लेकिन वो लिखता तो सही, मैं जब ये सब पढ़ता गया तो यकीन और भी ठोस होता गया कि ये तो ''बा'' ने ही लिखा है."

वो 8 महिलाएं, जिनके करीब रहे महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी दक्षिण अफ्रीका में


डायरी में क्या लिखा है?


बीबीसी संवाददाता ने उनसे पूछा कि हम जब इतिहास को पढ़ते हैं तो महात्मा गांधी के बारे में तो बहुत कुछ है लेकिन उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी के बारे में उतना ज्यादा पढ़ने को नहीं मिलता है, जो ये डायरी लिखी गई है वो 1933 के आस-पास लिखी गई है, इस डायरी को अगर कस्तूरबा ने लिखा है तो उन्होंने अपने बारे में क्या लिखा है?


इस सवाल का जवाब देते हुए तुषार गांधी ने कहा 'इसमें ''बा'' ने अपने बारे में व्यक्तिगत कुछ नहीं लिखा है, ये उस वक्त की डायरी थी जब वो अपने पति से अलग थीं. वो कहीं अलग जेल में बंद थीं, बापू किसी और जेल में बंद थे. ये जो उनका एक दूसरे से अलग रहने का वक्त था, उसका ब्यौरा ''बा'' ने लिखा है, अपने बारे में बस यही लिखा है कि उन दिनों मैंने क्या किया, उसके मुताबिक ही लिखा है यानी इससे आपको ''बा'' की जीवनशैली और नित्यकर्म से, वो क्या थीं, ये पता चलता है.'


एक सवाल ये भी उठता है कि क्या कस्तूरबा गांधी सिर्फ अपने बारे में लिखती थीं या आस-पास जो घटित हो रहा था उसके बारे में भी अपने विचारों को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करती थीं.


इस सवाल के जवाब में तुषार गांधी दावा करते हैं कि ''बा'' ने डायरी में अपने मन के विचार उतने नहीं लिखे हैं, जितना उन्होंने आस-पास में जो हो रहा था, उसके बारे में लिखा है. कई जगहों पर उस वक्त की जो राजनीति थी, उस पर भी अपने विचार प्रकट किए हैं."

बापू की ताक़त थीं कस्तूरबा गांधी

महात्मा गांधी की ज़िंदगी पर कस्तूरबा गांधी का क्या प्रभाव रहा, इस सवाल के जवाब में तुषार गांधी का कहना था, "मुझे लगता है और बापू ने भी ये बात मानी थी कि जो उनके जीवन का प्रयास था और जिस मंज़िल तक वो पहुंचे और जो परिवर्तन उनके जीवन में आता गया, उन सारी चीजों में उन्हें 'बा'' का सहारा और साथ न मिला होता तो उनके लिए ये सब हासिल करना नामुमकिन हो जाता."


वे कहते हैं, "उनके हर बदलाव के साथ 'बा'' अपने आप को बदलती गईं और उसमें जो बापू को सहारे और ताकत की ज़रुरत पड़ी, वो देती गईं और इसके साथ ही अपनी ओर से एक मौन समर्थन से भी शक्ति प्रदान करती गईं. बापू को ये अहसास था कि मेरे पीछे कोई है, सारी चीजों को संभाल लेने वाला और ज़रुरत पड़ने पर मुझे भी संभाल लेने वाला, कोई मेरे साथ है, मेरे पास है.. ये हमें बापू के जीवन के आखिरी चार सालों में भी देखने को मिलती है जब 'बा'' उनके साथ नहीं थीं. उस समय जो बापू को अधूरापन महसूस होता था हमें भी दिखने लगा था कि जैसे बापू बेसहारा हो गए हों और खोज रहे हों उनके जीवनसाथी को. वो जो चीज हमें दिखाई देने लगी थी तो उससे पता चलता है कि 'बा'' का महत्व कितना था बापू के लिए."

गुरुवार, 18 अगस्त 2022

क्रिकेट समेत हर क्षेत्र में अमिताभ / सुनील बादल

 स्मृति शेष


अमिताभ चौधरी: बहुआयामी व्यक्तित्व



अमिताभ चौधरी जी को मैं तब से जानता था जब जमशेदपुर में एक आईपीएस अधिकारी के तौर पर कई बार समाचारों में उनका नाम आया करता था।उसके बाद रांची के वरीय आरक्षी अधीक्षक के रूप में उनका कार्यकाल बहुत ही चर्चित रहा उनसे इंटरव्यू में करने का अवसर मिला और बातचीत करने के क्रम में उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं से अवगत हुआ उनकी पत्नी निर्मला चौधरी भी अक्सर आकाशवाणी आती थी और बहुत ही सरल स्वभाव की विदुषी  महिला थी। अपने बेटे को साथ में लेकर आती थी एक अधिकारी के रूप में अमिताभ चौधरी जितने सख्त और कुशल प्रशासक थे व्यक्तिगत तौर पर बहुत ही दोस्ताना व्यवहार था उनका और उनमें बिहार झारखंड की झलक नहीं होकर किसी यूरोपीय व्यक्तित्व की झलक थी, समानता का व्यवहार करते खुलकर मिलते खुलकर बातें करते और बहुत ही स्पष्ट सपाट  उनका व्यवहार था, बिना लाग लपेट के अपनी बात सीधे कहते और जिस तरह से बातें करते उसी तरह का उनका असली व्यक्तित्व भी था ।

एक बार रेडियो के लिए एक इंटरव्यू के सिलसिले में बात करने गया जब वह रानी कोठी में बतौर आईजी सीआईडी बैठते थे तो इन्होंने कहा कि तैयारी क्या करनी अभी कर लीजिए। उनसे व्यक्तित्व आधारित लंबा इंटरव्यू लेने का अवसर मिला और उनकी पसंद के गाने भी आकाशवाणी से प्रसारित किए गए। अपनी पसंद के गाने अपने लैपटॉप में सुरक्षित रखते थे उन्होंने उसकी कॉपी भी मुझे दी कि अगर आपके पास नहीं हो तो आप इसका उपयोग कर सकते हैं । बीच-बीच में उनके कनिष्ठ कर्मचारी आते थे और कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने गलतियां भी की थी उन्हें बहुत ही सख्ती से डांटते भी थे बातचीत करने में जितने विनम्र थे अचानक अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से उनका व्यवहार बहुत ही सख्त हुआ करता था। एक और संस्मरण है जो कभी ना भूलने वाला है बिहार के  खेल मंत्री का कार्यक्रम सिमडेगा में था जिसे रांची विश्वविद्यालय ने आयोजित किया था और समापन समारोह को कवर करने के बाद मैं अपने केंद्र निदेशक  रोजलिन लकड़ा जी और एक साथी ओली मिंज के साथ लौट रहा था रास्ते में सुनसान जगह पर हमारी गाड़ी को रोक कर लूटपाट की गई । गनीमत रही कि हमारे साथ मारपीट नहीं हुई लेकिन हमारे पास जो कुछ थे यहां तक की पेन तक लुटेरों ने नहीं छोड़ा । बहुत अनुरोध करने पर उन्होंने गाड़ी की चाबी तो लौटा दी हम लोग वहां से बढ़ते हुए रास्ते में कोलेबिरा थाने पहुंचे। थाने की तब बुरी स्थिति हुआ करती थी एक स्टाफ थाने में नहीं था। एक लालटेन जल रहा था और एक चौकीदार वहां सोया हुआ था। हम लोग आगे बढ़े और जैसे ही रांची जिले की सीमा प्रारंभ हुई तोरपा थाना आया वहां थाने में गए और थाना प्रभारी को जैसे ही बताया कि डकैती हुई है जिस फुर्ती और तत्परता से थाना प्रभारी बिना हथियार लिए छापा मारते निकल गए वह प्रभाव था तत्कालीन सीनियर एसपी अमिताभ चौधरी का । 

बाद में पत्रकारों की एक टोली जो दूसरी गाड़ी में पीछे आ रही थी उनकी गाड़ी में मैं हथियारबंद सिपाहियों के साथ पीछे गया कि कहीं  अपराधकर्मी बड़ा बाबू पर गोली ना चला दे क्योंकि उनके पास एक भी हथियार नहीं था । बाद में यह बहुत बड़ी खबर बनी इसलिए कि हम लोगों पर बम से भी हमला किया गया था हालांकि बम फटा नहीं था और तत्कालीन आईजी कुमार , ने छानबीन कराई पूरा पुलिस महकमा इतना सक्रिय था जो कि तत्कालीन लालू प्रसाद के राजपाट में बहुत कम देखने को मिलता था  । 

एक पुलिस अधिकारी के रूप में अमिताभ चौधरी तमाम बंदिशों के बाद भी अपनी कार्यकुशलता और क्षमता प्रदर्शित करते रहे , निर्भय होकर काम करते रहे और इतिहास रचते रहे। बाद में जब जेएससीए स्टेडियम बना तो उन्होंने इतिहास तो रचा ही बीच-बीच में कभी-कभार उनसे मुलाकात होती थी उनकी बातचीत में कोई अंतर नहीं आया था जो पहले थे बाद में भी वही थे और वह दिखावटी बातें करना या मुंह देखी बातें करना नहीं जानते थे। जिस कारण बहुत सारे लोग उनसे शत्रुता भी रखते थे, उन्हें स्वार्थी भी कहते थे लेकिन कम शब्दों में यह कहा जा सकता है कि वह बहुत ही कुशल शासक थे, कुशल प्रबंधक थे और यारों के यार थे । एक बहुआयामी व्यक्तित्व का असमय चला जाना निश्चित रूप से एक अपूरणीय क्षति है। विनम्र श्रद्धांजलि।

ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (बीबीसी) यूनाइटेड किंगडम



ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (बीबीसी) यूनाइटेड किंगडम का राष्ट्रीय प्रसारक है। वेस्टमिंस्टर, लंदन में ब्रॉडकास्टिंग हाउस में इसका मुख्यालय है; यह दुनिया का सबसे पुराना राष्ट्रीय प्रसारक है, और कर्मचारियों की संख्या के हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा प्रसारक है, जिसमें कुल मिलाकर 22,000 से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं, जिनमें से 19,000 से अधिक सार्वजनिक क्षेत्र के प्रसारण में हैं।[1][2][3][4][5] बीबीसी के कर्मचारियों की कुल संख्या 35,402 है जिसमें अंशकालिक, लचीला और निश्चित अनुबंध वाले कर्मचारी शामिल हैं।[6]

बीबीसी की स्थापना एक रॉयल चार्टर के तहत की गई है और यह 'डिजिटल, संस्कृति, मीडिया और खेल राज्य सचिव' के साथ अपने समझौते के तहत काम करती है।[7] इसका काम मुख्य रूप से एक वार्षिक टेलीविज़न लाइसेंस शुल्क द्वारा वित्त पोषित किया जाता है, जो सभी ब्रिटिश परिवारों, कंपनियों और संगठनों से लाइव टेलीविज़न प्रसारण और आईप्लेयर कैच-अप प्राप्त करने या रिकॉर्ड करने के लिए किसी भी प्रकार के उपकरण का उपयोग करने के लिए लिया जाता है। शुल्क ब्रिटिश सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता है, संसद द्वारा सहमति व्यक्त की जाती है,[8] और बीबीसी के रेडियो, टीवी और यूके के देशों और क्षेत्रों को कवर करने वाली ऑनलाइन सेवाओं को निधि देने के लिए उपयोग किया जाता है। 1 अप्रैल 2014 से, इसने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस (1932 में बीबीसी एम्पायर सर्विस के रूप में लॉन्च) को भी वित्त पोषित किया है, जो 28 भाषाओं में प्रसारित होता है और अरबी और फ़ारसी में व्यापक टीवी, रेडियो और ऑनलाइन सेवाएं प्रदान करता है।

बीबीसी के राजस्व का लगभग एक चौथाई हिस्सा इसकी वाणिज्यिक सहायक बीबीसी स्टूडियो (पूर्व में बीबीसी वर्ल्डवाइड) से आता है, जो बीबीसी के कार्यक्रमों और सेवाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेचता है और बीबीसी की 24 घंटे की अंग्रेजी भाषा की समाचार सेवाओं बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ और बीबीसी डॉट कॉम से भी वितरित करता है। बीबीसी ग्लोबल न्यूज़ लिमिटेड द्वारा प्रदान किया गया। 2009 में, कंपनी को अपनी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों के सम्मान में एंटरप्राइज के लिए क्वीन्स अवार्ड से सम्मानित किया गया।[9]

पहचान असली खूंखारों की / रवि अरोड़ा

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