मंगलवार, 22 जून 2021

दुनियां के लिए ये 10 अबुझ रहस्य

 *दुनिया खोज रही है ये 10 रहस्य, आप भी जानिए...*



पहले बल्ब का जलना, विमान का उड़ना, सिनेमा और टीवी का चलन, मोबाइल पर बात करना और कार में घूमना एक रहस्य और कल्पना की बातें हुआ करती थीं। आज इसके आविष्कार से दुनिया तो बदल गई है, लेकिन आदमी वही मध्ययुगीन सोच का ही है। धरती तो कई रहस्यों से पटी पड़ी है। उससे कहीं ज्यादा रहस्य तो समुद्र में छुपा हुआ है। उससे भी कहीं ज्यादा आकाश रहस्यमयी है और उससे कई गुना अं‍तरिक्ष में अंतहीन रहस्य छुपा हुआ है।

दुनिया में ऐसे कई रहस्य हैं जिनका जवाब अभी भी खोजा जाना बाकी है। विज्ञान के पास इनके जवाब नहीं हैं, लेकिन खोज जारी है। ऐसे कौन-कौन से रहस्य हैं जिनके खुलने पर इंसान ही नहीं, धरती का संपूर्ण भविष्य बदल जाएगा। आओ जानते हैं ऐसी ही 10 रहस्य और रोमांच से भरी बतों को...

 

*पहला रहस्य...*


1. टाइम मशीन : समय की सीमाएं लांघकर अतीत और भविष्य में पहुंचने की परिकल्पना तो मनुष्य करता रहा है। भारत में ऐसे कई साधु-संत हुए हैं, जो आंख बंद कर अतीत और भविष्य में झांक लेते थे। अब सवाल यह है कि यह काम मशीन से कैसे हो? इंग्लैंड के मशहूर लेखक एचजी वेल्स ने 1895 में 'द टाइम मशीन' नामक एक उपन्यास प्रकाशित किया, तो समूचे योरप में तहलका मच गया। उपन्यास से प्रेरित होकर इस विषय पर और भी कई तरह के कथा साहित्य रचे गए। इस कॉन्सेप्ट पर हॉलीवुड में एक फिल्म भी बनी।

 

टाइम मशीन अभी एक कल्पना है। टाइम ट्रेवल और टाइम मशीन, यह एक ऐसे उपकरण की कल्पना है जिसमें बैठकर कोई भी मनुष्य भूतकाल या भविष्य के किसी भी समय में सशरीर अपनी पूरी मानसिक और शारीरिक क्षमताओं के साथ जा सकता है। अधिकतर वैज्ञानिक मानते हैं कि यह कल्पना ही रहेगी कभी हकीकत नहीं बन सकती, क्योंकि यह अतार्किक बात है कि कोई कैसे अतीत में या भविष्य में जाकर अतीत या भविष्य के सच को जान सकता है? 


टाइम मशीन की कल्पना भी भारतीय धर्मग्रंथों से प्रेरित है। आप सोचेंगे कैसे? वेद और पुराणों में ऐसी कई घटनाओं का जिक्र है जिसमें कहा गया है कि कोई व्यक्ति ब्रह्मा के पास मिलने ब्रह्मलोक गया और जब वह धरती पर पुन: लौटा तो यहां एक युग बीत चुका था। अब सवाल यह उठता है कि कोई व्यक्ति एक युग तक कैसे जी सकता है? इसका जवाब है कि हमारी समय की अवधारणा धरती के मान से है लेकिन जैसे ही हम अंतरिक्ष में जाते हैं, समय बदल जाता है। जो व्यक्ति ब्रह्मलोक होकर लौटा उसके लिए तो उसके मान से 1 वर्ष ही लगा। लेकिन उक्त 1 वर्ष में धरती पर एक युग बीत गया, बुध ग्रह पर तो 2 युग बीत गए होंगे, क्योंकि वहां का 1 वर्ष तो 88 दिनों का ही होता है। अब हम टाइम मशीन की थ्‍योरी को समझें...

 

पहले यह माना जाता था कि समय निरपेक्ष और सार्वभौम है अर्थात सभी के लिए समान है यानी यदि धरती पर 10 बज रहे हैं तो क्या यह मानें कि मंगल ग्रह पर भी 10 ही बज रहे होंगे? लेकिन आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार ऐसा नहीं है। समय की धारणा अलग-अलग है।

 

आइंस्टीन ने कहा कि दो घटनाओं के बीच का मापा गया समय इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें देखने वाला किस गति से जा रहा है। मान लीजिए की दो जुड़वां भाई हैं- A और B। एक अत्यंत तीव्र गति के अंतरिक्ष यान से किसी ग्रह पर जाता है और कुछ समय बाद पृथ्वी पर लौट आता है जबकि B घर पर ही रहता है। A के लिए यह सफर हो सकता है 1 वर्ष का रहा हो, लेकिन जब वह पृथ्वी पर लौटता है तो 10 साल बीत चुके होते हैं। उसका भाई B अब 9 वर्ष बड़ा हो चुका है, जबकि दोनों का जन्म एक ही दिन हुआ था। यानी A 10 साल भविष्य में पहुंच गया है। अब वहां पहुंचकर वह वहीं से धरती पर चल रही घटना को देखता है तो वह अतीत को देख रहा होता है।

 

जैसे एक गोली छूट गई लेकिन यदि आपको उसको देखना है तो उस गोली से भी तेज गति से आगे जाकर उसे क्रॉस करना होगा और फिर पलटकर उसको देखना होगा तभी वह तुम्हें दिखाई देगी। इसी तरह ब्रह्मांड में कई आवाजें, चित्र और घटनाएं जो घटित हो चुकी हैं वे फैलती जा रही हैं। वे जहां तक पहुंच गई हैं वहां पहुंचकर उनको पकड़कर सुना होगा।

 

यदि ऐसा हुआ तो...? कुछ ब्रह्मांडीय किरणें प्रकाश की गति से चलती हैं। उन्हें एक आकाशगंगा पार करने में कुछ क्षण लगते हैं लेकिन पृथ्वी के समय के हिसाब से ये दसियों हजार वर्ष हुए।

 

भौतिकशास्त्र की दृष्टि से यह सत्य है लेकिन अभी तक ऐसी कोई टाइम मशीन नहीं बनी जिससे हम अतीत या भविष्य में पहुंच सकें। यदि ऐसे हो गया तो बहुत बड़ी क्रांति हो जाएगी। मानव जहां खुद की उम्र बढ़ाने में सक्षम होगा वहीं वह भविष्य को बदलना भी सीख जाएगा। इतिहास फिर से लिखा जाएगा।

 

एक और उदाहारण से समझें। आप कार ड्राइव कर रहे हैं आपको पता नहीं है कि 10 किलोमीटर आगे जाकर रास्ता बंद है और वहां एक बड़ा-सा गड्डा है, जो अचानक से दिखाई नहीं देता। आपकी कार तेज गति से चल रही है। अब आप सोचिए कि आपके साथ क्या होने वाला है? लेकिन एक व्यक्ति हेलीकॉप्टर में बैठा है और उसे यह सब कुछ दिखाई दे रहा है अर्थात यह कि वह आपका भविष्य देख रहा है। यदि आपको किसी तकनीक से पता चल जाए कि आगे एक गड्‍ढा है तो आप बच जाएंगे। भारत का ज्योतिष भी यही करता है कि वह आपको गड्ढे की जानकारी दे देता है।

 

लेकिन एक अतार्किक उदाहरण भी दिया जा सकता है, जैसे कि एक व्यक्ति विवाह करने से पहले अपने पुत्र को देखने जाता है टाइम मशीन से। वहां जाकर उसे पता चलता है कि उनका पुत्र तो जेल के अंदर देशद्रोह के मामले में सजा काट रहा है तो... तब वह दो काम कर सकता है या तो वह किसी अन्य महिला से विवाह करे या विवाह करने का विचार ही त्याग दे।

 

*दूसरा रहस्य...*


अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।

कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥

सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।

जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

 

2. अमर होने का रहस्य : अमर कौन नहीं होना चाहता? समुद्र मंथन में अमृत निकला। इसे प्राप्त करने के लिए देवताओं ने दानवों के साथ छल किया। देवता अमर हो गए। मतलब कि क्या समुद्र में ऐसा कुछ है कि उसमें से अमृत निकले? तो आज भी निकल सकता है? अभी अधिकतम 100 साल के जीवन में अनेकानेक रोग, कष्ट, संताप और झंझट हैं तो अमरता प्राप्त करने पर क्या होगा? 100 वर्ष बाद वैराग्य प्राप्त कर व्यक्ति हिमालय चला जाएगा। वहां क्या करेगा? बोर हो जाएगा तो फिर से संसार में आकर रहेगा। बस यही सिलसिला चलता रहेगा।


महाभारत में 7 चिरंजीवियों का उल्लेख मिलता है। चिरंजीवी का मतलब अमर व्यक्ति। अमर का अर्थ, जो कभी मर नहीं सकते। ये 7 चिरंजीवी हैं- राजा बलि, परशुराम, विभीषण, हनुमानजी, वेदव्यास, अश्वत्थामा और कृपाचार्य। हालांकि कुछ विद्वान मानते हैं कि मार्कंडेय ऋषि भी चिरंजीवी हैं।

 

माना जाता है कि ये सातों पिछले कई हजार वर्षों से इस धरती पर रह रहे हैं, लेकिन क्या धरती पर रहकर इतने हजारों वर्ष तक जीवित रहना संभव है? हालांकि कई ऐसे ऋषि-मुनि थे, जो धरती के बाहर जाकर फिर लौट आते थे और इस तरह वे अपनी उम्र फ्रिज कर बढ़ते रहते थे। हालांकि हिमालय में रहने से भी उम्र बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। हिन्दू धर्मशास्त्रों में ऐसी कई कथाएं हैं जिसमें लिखा है कि अमरता प्राप्त करने के लिए फलां-फलां दैत्य या साधु ने घोर तप करके शिवजी को प्रसन्न कर लिया। बाद में उसे मारने के लिए भगवान के भी पसीने छूट गए। अमर होने के लिए कई ऐसे मंत्र हैं जिनके जपने से शरीर हमेशा युवा बना रहता है। महामृत्युंजय मंत्र के बारे में कहा जाता है कि इसके माध्यम से अमरता पाई जा सकती है।

 

वेद, उपनिषद, गीता, महाभारत, पुराण, योग और आयुर्वेद में अमरत्व प्राप्त करने के अनेक साधन बताए गए हैं। आयुर्वेद में कायाकल्प की विधि उसका ही एक हिस्सा है। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि विज्ञान इस दिशा में क्या कर रहा है? विज्ञान भी इस दिशा में काम कर रहा है कि किस तरह व्यक्ति अमर हो जाए अर्थात कभी नहीं मरे।

 

सावित्री-सत्यवान की कथा तो आपने सुनी ही होगी। सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे। सावित्री और यमराज के बीच लंबा संवाद हुआ। इसके बाद भी यह पता नहीं चलता है कि सावित्री ने ऐसा क्या किया कि सत्यवान फिर से जीवित हो उठा। इस जीवित कर देने या हो जाने की प्रक्रिया के बारे में महाभारत भी मौन है। जरूर सावित्री के पास कोई प्रक्रिया रही होगी। जिस दिन यह प्रक्रिया वैज्ञानिक ढंग से ज्ञात हो जाएगी, हम अमरत्व प्राप्त कर लेंगे।

 

आपने अमरबेल का नाम सुना होगा। विज्ञान चाहता है कि मनुष्य भी इसी तरह का बन जाए, कायापलट करता रहा और जिंदा बना रहे। वैज्ञानिकों का एक समूह चरणबद्ध ढंग से इंसान को अमर बनाने में लगा हुआ है। समुद्र में जेलीफिश (टयूल्रीटोप्सिस न्यूट्रीकुला) नामक मछली पाई जाती है। यह तकनीकी दृष्टि से कभी नहीं मरती है। हां, यदि आप इसकी हत्या कर दें या कोई अन्य जीव जेलीफिश का भक्षण कर ले, फिर तो उसे मरना ही है। इस कारण इसे इम्मोर्टल जेलीफिश भी कहा जाता है। जेलीफिश बुढ़ापे से बाल्यकाल की ओर लौटने की क्षमता रखती है। अगर वैज्ञानिक जेलीफिश के अमरता के रहस्य को सुलझा लें, तो मानव अमर हो सकता है।

 

क्या कर रहे हैं वैज्ञानिक : वैज्ञानिक अमरता के रहस्यों से पर्दा हटाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। बढ़ती उम्र के प्रभाव को रोकने के लिए कई तरह की दवाइयों और सर्जरी का विकास किया जा रहा है। अब इसमें योग और आयुर्वेद को भी महत्व दिया जाने लगा है। बढ़ती उम्र के प्रभाव को रोकने के बारे में आयोजित एक व्यापक सर्वे में पाया गया कि उम्र बढ़ाने वाली 'गोली' को बनाना संभव है। रूस के साइबेरिया के जंगलों में एक औषधि पाई जाती है जिसे जिंगसिंग कहते हैं। चीन के लोग इसका ज्यादा इस्तेमाल करके देर तक युवा बने रहते हैं।

 

' जर्नल नेचर' में प्रकाशित 'पजल, प्रॉमिस एंड क्योर ऑफ एजिंग' नामक रिव्यू में कहा गया है कि आने वाले दशकों में इंसान का जीवनकाल बढ़ा पाना लगभग संभव हो पाएगा। अखबार 'डेली टेलीग्राफ' के अनुसार एज रिसर्च पर बक इंस्टीट्यूट, कैलिफॉर्निया के डॉक्टर जूडिथ कैंपिसी ने बताया कि सिंपल ऑर्गनिज्म के बारे में मौजूदा नतीजों से इसमें कोई शक नहीं कि जीवनकाल को बढ़ाया-घटाया जा सकता है। पहले भी कई स्टडीज में पाया जा चुका है कि अगर बढ़ती उम्र के असर को उजागर करने वाले जिनेटिक प्रोसेस को बंद कर दिया जाए, तो इंसान हमेशा जवान बना रह सकता है। जर्नल सेल के जुलाई के अंक में प्रकाशित एक रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया कि बढ़ती उम्र का प्रभाव जिनेटिक प्लान का हिस्सा हो सकता है, शारीरिक गतिविधियों का नतीजा नहीं। खोज और रिसर्च जारी है...।

 

*तीसरा रहस्य...*


गायब हो जाने का रहस्य : अमर होने से ज्यादा लोगों में गायब होने की तमन्ना है। जिसने भी 'मिस्टर इंडिया' फिल्म देखी होगी वह जानता है कि इसके ऐसे भी फायदे हो सकते हैं। गायब या अदृश्य होना मनुष्य की प्राचीन अभिलाषा रही है जिसके लिए समय-समय पर तरह-तरह के प्रयोग होते रहे हैं। इसके लिए कई सिद्धांत गढ़े गए हैं। 

 

वेद, महाभारत और पुराणों में ऐसी कई कथाएं हैं जिसमें कहा गया है कि देवता अचानक प्रकट हुए और फिर अंतर्ध्यान हो गए अर्थात गायब हो गए। हनुमानजी के बाद भगवान कृष्ण के पास यह विद्या थी। मशहूर विज्ञान गल्‍पकार एचजी वेल्‍स (H.G. Wells) ने 1897 में प्रकाशित अपने लोकप्रिय उपन्‍यास 'अदृश्‍य आदमी' (The Invisible Man) में गायब होने का फॉर्मूला दिया है। हालांकि भारत के हिमालयीन राज्यों में ऐसी धारणा है कि जड़ी-बूटियों के माध्यम से एक ऐसी गोली बनती है कि जिसको मुंह में रखने से व्यक्ति तब तक के लिए अदृश्य हो जाता है है, जब तक कि उस गोली का असर रहता है। खैर...

 

मिस्टर इंडिया लाल चश्मा पहनते ही गायब हो जाते थे तो हैरी पॉटर के पास इनविजिबिलिटी क्लॉक था लेकिन वैज्ञानिकों ने गायब होने का एक तरीका निकाला है। वे एक ऐसी ड्रेस बनाने वाले हैं जिसे पहनकर व्यक्ति गायब हो जाएगा यानी कि लबादा ओढ़ो और गायब हो जाओ।

 

जर्मनी के कार्ल्सरूहे तकनीकी विश्वविद्यालय और इंपीरियल कॉलेज ऑफ लंदन के कुछ वैज्ञानिकों ने मिलकर फोटोनिक क्रिस्टलों से एक लबादा तैयार किया है। फोटोनिक क्रिस्टल ऐसे पदार्थ होते हैं, जो अपने पर पड़ने वाली रोशनी के इलेक्ट्रॉन की दिशा बदल देते हैं। अगर इस प्रवृत्ति को विकसित किया जाए तो ऐसे पदार्थ बनाए जा सकते हैं, जो रोशनी के कणों को पूरी तरह मोड़ सकते हैं। आज हम जो भी देख रहे हैं, वे उस पदार्थ पर पड़ने वाली रोशनी के कारण देख रहे हैं भले ही यह रोशनी धुंधली ही क्यों न हो।

 

लेकिन इस प्रयोग में दिक्कत यह है कि भले ही सामने से व्यक्ति स्पष्ट नजर न आए लेकिन वह बगल से दिखाई दे सकता है। वैज्ञानिक कहते हैं कि दृश्‍यमानता प्रकाश के साथ पिंडों की क्रिया पर निर्भर करती है। आप जानते हैं कि कोई भी पिंड या तो प्रकाश को अवशोषित करता है या परावर्तित या अपवर्तित। यदि पिंड न तो प्रकाश को अवशोषित करता है, न परावर्तित या अपवर्तित, तो पिंड अदृश्‍य होगा। 

 

हालांकि अभी अदृश्य होने का कोई पुख्ता फॉर्मूला विकसित नहीं हुआ है लेकिन अमेरिका सहित दुनियाभर के वैज्ञानिक इस पर रिसर्च में लगे हुए हैं ताकि हजारों अदृश्य मानवों से जासूसी करवाई जा सके और दूसरों देशों में अशांति फैलाई जा सके। हो सकता है कि आने वाले समय में नैनो टेक्नोलॉजी से यह संभव हो। 

 

*चौथा रहस्य...*


 ब्रह्मांड के बनने का रहस्य : आजकल के ‍वैज्ञानिक ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्य को जानने से ज्यादा उसके अंत में उत्सुक हैं। वे बताते रहते हैं कि धरती पर जीवन का खात्मा इस तरह होगा। सूर्य ठंडा हो जाएगा। ग्रह-नक्षत्र आपस में टकरा जाएंगे। तब क्या होगा? इसलिए मानव को अभी से ही दूसरे ग्रहों को तलाश करना चाहिए।


अधिकतर वैज्ञानिक शायद यह मान ही बैठे हैं ‍कि उत्पत्ति का रहस्य तो हम जान चुके हैं। बिग बैंग का सिद्धांत अकाट्य है। लेकिन कई ऐसे वैज्ञानिक हैं, जो यह कहते हैं कि हमने अभी भी ब्रह्मांड की उत्पत्ति और धरती पर जीवन की उत्पत्ति के रहस्य को नहीं सुलझाया है। अभी तक जितने भी सिद्धांत बताए जा रहे हैं वे सभी तर्क से खारिज किए जा सकते हैं।

 

हिन्दू धर्म अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति का रहस्य...

 

ब्रह्मांड की उत्पत्ति के सबसे ज्यादा मान्य सिद्धांत को महाविस्फोट (The Big Bang) कहते हैं। इसके अनुसार अब से लगभग 14 अरब वर्ष पहले एक बिंदु से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है। फिर उस बिंदु में महाविस्फोट हुआ और असंख्य सूर्य, ग्रह, नक्षत्र आदि का जन्म होता गया। 

 

वैज्ञानिक मानते हैं कि बिंदु के समय ब्रह्मांड के सभी कण एक-दूसरे के एकदम पास-पास थे। वे इतने ज्यादा पास-पास थे कि वे सभी एक ही जगह थे, एक ही बिंदु पर। सारा ब्रह्मांड एक बिंदु की शक्ल में था।

 

यह बिंदु अत्यधिक घनत्व का, अत्यंत छोटा बिंदु था। ब्रह्मांड का यह बिंदु रूप अपने अत्यधिक घनत्व के कारण अत्यंत गर्म रहा होगा। इस स्थिति में भौतिकी, गणित या विज्ञान का कोई भी नियम काम नहीं करता है। यह वह स्थिति है, जब मनुष्य किसी भी प्रकार अनुमान या विश्लेषण करने में असमर्थ है। काल या समय भी इस स्थिति में रुक जाता है, दूसरे शब्दों में काल या समय के कोई मायने नहीं रहते हैं। इस स्थिति में किसी अज्ञात कारण से अचानक ब्रह्मांड का विस्तार होना शुरू हुआ। एक महाविस्फोट के साथ ब्रह्मांड का जन्म हुआ और ब्रह्मांड में पदार्थ ने एक-दूसरे से दूर जाना शुरू कर दिया।

 

हालांकि ब्रह्मांड की उत्पत्ति और प्रलय के बारे में अभी भी प्रयोग और शोध जारी है। सबसे बड़े प्रयोग की चर्चा करें तो महाप्रयोग सर्न के वैज्ञानिक कर रहे हैं। ये वैज्ञानिक उस खास कण को ढूंढने में लगे हैं जिसके कारण ब्रह्मांड बना होगा। दावा किया जाता है कि फ्रांस और स्विट्जरलैंड की बॉर्डर पर बनी दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला में दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने वो कण ढूंढ लिया है जिसे गॉड पार्टिकल यानी भगवान का कण कहा जाता है। इसे उन्होंने 'हिग्स बोसन' नाम दिया है। सर्न के वैज्ञानिकों को 99 फीसदी यकीन है कि गॉड पार्टिकल का रहस्य सुलझ गया है। मतलब 1 प्रतिशत संदेह है? 

 

हमारा ब्रह्मांड रहस्य-रोमांच और अनजानी-अनसुलझी पहेलियों से भरा है। सदियों से इंसान सवालों की भूलभुलैया में भटक रहा है कि कैसे बना होगा ब्रह्मांड, कैसे बनी होगी धरती, कैसे बना होगा फिर इंसान। हालांकि धर्मग्रंथों में रेडीमेड उत्तर लिखे हैं कि भगवान ने इसे बनाया और फिर 7वें दिन आराम किया।

 

पांचवां रहस्य...*


बिगफुट का रहस्य : अमेरिका, अफ्रीका, चीन, रूस और भारत में बिगफुट की खोज जारी है। कई लोग बिगफुट को देखे जाने का दावा करते हैं। पूरे विश्व में इन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। तिब्बत और नेपाल में इन्हें 'येती' का नाम दिया जाता है तो ऑस्ट्रेलिया में 'योवी' के नाम से जाना जाता है। भारत में इसे 'यति' कहते हैं।

 

ज्यादा बालों वाले इंसान जंगलों में ही रहते थे। जंगल में भी वे वहां रहते थे, जहां कोई आता-जाता नहीं था। माना जाता था कि ज्यादा बालों वाले इंसानों में जादुई शक्तियां होती हैं। ज्यादा बालों वाले जीवों में बिगफुट का नाम सबसे ऊपर आता है। बिगफुट के बारे में आज भी रहस्य बरकरार है।

 

*छठा रहस्य...*

 

एलियंस का रहस्य : वर्षों के वैज्ञानिक शोध से यह पता चला कि 10 हजार ईपू धरती पर एलियंस उतरे और उन्होंने पहले इंसानी कबीले के सरदारों को ज्ञान दिया और फिर बाद में उन्होंने राजाओं को अपना संदेशवाहक बनाया और अंतत: उन्होंने इस तरह धरती पर कई प्रॉफेट पैदा कर दिए। क्या इस बात में सच्चाई है?

 

अब वैज्ञानिक तो यही मानते हैं। हालांकि उन्होंने कभी एलियंस को देखा नहीं फिर भी वे विश्वास करते हैं कि धरती के बाहर किसी अन्य धरती पर हमारे जैसे ही लोग या कुछ अलग किस्म के लोग रहते हैं, जो हमसे भी ज्यादा बुद्धिमान हैं। आज नहीं तो कल उनसे हमारी मुलाकात हो जाएगी। हालांकि यह कल कब आएगा?

 

नासा के शीर्ष वैज्ञानिकों ने कहा कि एलियन के जीवन का संकेत 2025 तक पता चल जाएगा जबकि परग्रही जीव के बारे में ‘निश्चित सबूत’ अगले 20-30 साल में मिल सकता है। यदि नासा का यह दावा सच साबित होता है तो सवाल यह उठता है कि तब क्या होगा? क्या एलियन मानव जैसे हैं या कि जैसी उनके बारे में कल्पना की गई है, वैसे हैं? यदि वे मिल गए तो मानव के साथ कैसा व्यवहार करेंगे?

 

 *सातवां रहस्य...*

 

गति का रहस्य : गति ने ही मानव का जीवन बदला है और गति ही बदल रही है। बैलगाड़ी और घोड़े से उतरकर व्यक्ति साइकल पर सवार हुआ। फिर बाइक पर और अब विमान में सफर करने लगा। पहले 100 किलोमीटर का सफर तय करने के लिए 2 दिन लगते थे अब 2 घंटे में 100 किलोमीटर पहुंच सकते हैं। रफ्तार ने व्यक्ति की जिंदगी बदल दी। पहले पत्र को 400 किलोमीटर पहुंचने में पूरा 1 हफ्ता लगता था अब मेल करेंगे तो 4 सेकंड में 6 हजार किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति को मिल जाएगी। मोबाइल करेंगे तो 1 सेकंड में वह आपकी आवाज सुन लेगा। तो कहने का मतलब यह है कि गति का जीवन में बहुत महत्व है। इस गति के कारण ही पहले मानव का भविष्य कुछ और था लेकिन अब भविष्य बदल गया है।

 

मानव के पास अभी इतनी गति नहीं है कि वह चंद्रमा पर जाकर चाय की एक चुस्की लेकर पुन: धरती पर 1 घंटे में वापस लौट आए। मंगल ग्रह पर शाम को यदि किसी ने डिनर का आयोजन किया हो तो धरती पर सुबह होते ही पुन: लौट आए। जब इतनी गति विकसित हो जाएगी तब आज हम जो विकास देख रहे हैं उससे कई हजार गुना ज्यादा विकास हो जाएगा। वैज्ञानिक इस तरह की गति को हासिल करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं।

 

मानव चाहता है प्रकाश की गति से यात्रा करना : आकाश में जब बिजली चमकती है तो सबसे पहले हमें बिजली की चमक दिखाई देती है और उसके बाद ही उसकी गड़गड़ाहट सुनाई देती है। इसका मतलब यह कि प्रकाश की गति ध्वनि की गति से तेज है। वैज्ञानिकों ने ध्वनि की गति तो हासिल कर ली है लेकिन अभी प्रकाश की गति हासिल करना जरा टेढ़ी खीर है।

 

बहुत सी ऐसी मिसाइलें हैं जिनकी मारक क्षमता ध्वनि की गति से भी तेज है। ऐसे भी लड़ाकू विमान हैं, जो ध्वनि की गति से भी तेज उड़ते हैं। लेकिन मानव चाहता है कि ध्वनि की गति से कार चले, बस चले और ट्रेन चले। हालांकि इसमें वह कुछ हद तक सफल भी हुआ है और अब इच्छा है कि प्रकाश की गति से चलने वाला अंतरिक्ष विमान हो।

 

प्रकाश की गति इतनी ज्यादा होती है कि यह लंदन से न्यूयॉर्क की दूरी को 1 सेकंड में 50 से ज्यादा बार तय कर लेगी। यदि ऐसी स्पीड संदेश भेजने में हो तो मंगल ग्रह पर संदेश भेजने में 12.5 मिनट लगेंगे। अब यदि हमें मंगल ग्रह पर जाकर लौटना है तो प्रकाश की गति ही हासिल करना होगी अन्यथा जा तो सकते हैं लेकिन लौटने की कोई गारंटी नहीं। अब आप जोड़ सकते हैं कि 22 करोड़ किलोमीटर दूर जाने में कितना समय लगेगा यदि हम 1,000 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से जाएं तो...।

 

क्या है प्रकाश की गति : अंतरिक्ष जैसी शून्यता में प्रकाश की एकदम सही गति 2,99,792.458 किलोमीटर प्रति सेकंड है। ऋग्वेद में सूर्य की प्रकाश की गति लगभग इतनी ही बताई गई है। सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी लगभग 14,96,00,000 किलोमीटर या 9,29,60,000 मील है तथा सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुंचने में 8 मिनट 16.6 सेकंड का समय लगता है।

 

एक वर्ष में प्रकाश द्वारा तय की जाने वाली दूरी को एक प्रकाश वर्ष कहते हैं। एक प्रकाश वर्ष का मतलब होता है लगभग 9,500 अरब किलोमीटर। यह होती है प्रकाश की गति।

 

*8वां रहस्य...*


जीवन की शुरुआत : धरती पर जीवन की शुरुआत कब और कैसे हुई? किसने की या यह कि यह  क्रमविकास का परिणाम है? ये कुछ सवाल जिनके जवाब अभी भी ढूंढे जा रहे हैं। सवाल यह भी है कि यह शुरुआत पृथ्वी पर ही क्यों हुई? कई शोध बताते हैं कि मनुष्य का विकास जटिल अणुओं के विघटन और सम्मिलन से हुआ होगा, लेकिन सारे जवाब अभी नहीं मिले हैं।

हालांकि चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत में त्रुटी है तो महर्षि अरविंद का सिद्धांत तार्किक ही है। लेकिन विज्ञान आज भी डार्विन के सिद्धांत को मानने को मजबूर है, लेकिन अब कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि हमारी धरती पर जीवन की शुरुआत परग्रही लोगों ने की है जिन्हें आजकल एलियन कहा जाता है। डीएनए कोड पर अभी रिसर्च जारी है। 

 

पश्चिमी धर्म कहता है कि मानव की उत्पत्ति ईश्‍वर ने की। उसने पहले आदम को बनाया फिर उसकी ही छाती की एक पसली से हव्वा को। जबकि पूर्वी धर्मों के पास दो तरह के सिद्धांत है पहला यह कि मानव की रचना ईश्वर ने की और दूसरी की आठ तत्वों से संपूर्ण संसार की क्रमश: रचना हुई। उक्त आठ तत्वों में पंच तत्व क्रमश: है आकाश, वायु, अग्नि, जल और धरती।


*नौवां सिद्धांत...*


डार्क मैटर : अंतरिक्ष में 80 फीसदी से ज्यादा पदार्थ दिखाई नहीं देता इसे डार्क मैटर कहते हैं। वैज्ञानिक अभी तक इसकी खोज में लगे हुए हैं। आज तक यह रहस्य बना हुआ है कि डार्क मैटर किस चीज से बना है।  


 *10वां रहस्य...*


कैसे काम करता है गुरुत्वाकर्षण : न्यूटन ने यह तो कह दिया की धरती में गुरुत्वाकर्षण बल है जिसके कारण चीजें टीकी रहती है लेकिन यह बल कहां से आया, कैसे काम करता है यह नहीं बताया। हालांकि न्यूटन से पहले भास्कराचार्य ने भी गुरुत्वाकर्षण बल की चर्चा की लेकिन उन्होंने भी यह नहीं बताया कि यह बल काम कैसे करता है।

पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल उसे सूर्य के कक्ष में स्थिर रखता है अन्यथा पृथ्वी किसी अंधकार में खो जाती। चंद्रमाका गुरुत्वबल धरती पर फैला समुद्र है। लेकिन यह गुरुत्वाकर्षण बल असल में कहां से आया, वैज्ञानिक इसे पूरी तरह से स्पष्ट नहीं कर पाए हैं। यह गुरुत्वाकर्षण अन्य कणों के गुरुत्व केंद्र के साथ कैसे संतुलन बनाता है?

 

खगोल विज्ञान को वेद का नेत्र कहा गया, क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टियों में होने वाले व्यवहार का निर्धारण काल से होता है और काल का ज्ञान ग्रहीय गति से होता है। अत: प्राचीन काल से खगोल विज्ञान वेदांग का हिस्सा रहा है। ऋग्वेद, शतपथ ब्राहृण आदि ग्रथों में नक्षत्र, चान्द्रमास, सौरमास, मल मास, ऋतु परिवर्तन, उत्तरायन, दक्षिणायन, आकाशचक्र, सूर्य की महिमा, कल्प का माप आदि के संदर्भ में अनेक उद्धरण मिलते हैं।

उनकी आंखों में था अखंड भारत का सपना

 बलिदान दिवस(23 जून) पर विशेष / डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी




- प्रो.संजय द्विवेदी


    भूमि, जन तथा संस्कृति के समन्वय से राष्ट्र बनता है। संस्कृति राष्ट्र का शरीर, चिति उसकी आत्मा तथा विराट उसका प्राण है। भारत एक राष्ट्र है और वर्तमान समय में एक शक्तिशाली भारत के रूप में उभर रहा है। राष्ट्र में रहने वाले जनों का सबसे पहला दायित्व होता है कि वो राष्ट्र के प्रति ईमानदार तथा वफादार रहें। प्रत्येक नागरिक के लिए राष्ट्र सर्वोपरि होता है, जब भी कभी अपने निजी हित, राष्ट्र हित से टकराएं, तो राष्ट्र हित को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए, यह हर एक राष्ट्रभक्त की निशानी होती है। भारत सदियों तक गुलाम रहा और उस गुलाम भारत को आजाद करवाने के लिए असंख्य वीरों ने अपने निजी स्वार्थों को दरकिनार करते हुए राष्ट्र हित में अपने जीवन की आहुति स्वतंत्रता रूपी यज्ञ में डालकर राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया। ऐसे ही महापुरुष थे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी।


   यह कितना दुखद था कि माता वैष्णो देवी भी परमिट मांगती थी। डल झील भी पूछती तू किस देश का वासी है, बर्फानी बाबा अमरनाथ के दर्शन के लिए इंतजार करना पड़ता था, जिस प्रकार कैलाश मानसरोवर के लिए करना पड़ता है कि आखिर मेरा नंबर कब आएगा। अगर देश के पास भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं होते तो कश्मीर का विषय चर्चा में नहीं आता । जिस प्रकार लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने खंड-खंड हो रहे देश को अखंड बनाया, उसी प्रकार डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अखंड भारत की संकल्पना को साकार करने के लिए अपना पूरा जीवन होम कर दिया।


    डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी केवल राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे। उनके जीवन से ही राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को सीख लेनी चाहिए, उनका स्वयं का जीवन प्रेरणादायी, अनुशासित तथा निष्कलंक था। राजनीति उनके लिए राष्ट्र की सेवा का साधन थी, उनके लिए सत्ता केवल सुख के लिए नहीं थी। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी राजनीति में क्यों आए? इस प्रश्न का उत्तर है, उन्होंने राष्ट्रनीति के लिए राजनीति में पदार्पण किया। वे देश की सत्ता चाहते तो थे, किंतु किसके हाथों में? उनका विचार था कि सत्ता उनके हाथों में जानी चाहिए, जो राजनीति का उपयोग राष्ट्रनीति के लिए कर सकें।


     डॉ. मुखर्जी 33 वर्ष की आयु में ही कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए और विश्व का सबसे युवा कुलपति होने का सम्मान उन्हें प्राप्त हुआ। वे 1938 तक इस पद पर रहे। बाद में उनकी राजनीति में जाने की इच्छा के कारण उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी और कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि के रूप में बंगाल विधान परिषद का सदस्य चुना गया, लेकिन कांग्रेस द्वारा विधायिका के बहिष्कार का निर्णय लेने के पश्चात उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। बाद में डॉ. मुखर्जी ने स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और निर्वाचित हुए।


     1943 में बंगाल में पड़े अकाल के दौरान श्यामा प्रसाद जी का मानवतावादी पक्ष निखर कर सामने आया, जिसे बंगाल के लोग कभी भुला नहीं सकते। बंगाल पर आए संकट की ओर देश का ध्यान आकर्षित करने के लिए और अकाल-ग्रस्त लोगों के लिए व्यापक पैमाने पर राहत जुटाने के लिए उन्होंने प्रमुख राजनेताओं, व्यापारियों, समाजसेवी व्यक्तियों को जरुरतमंद और पीड़ितों को राहत पहुंचाने के उपाय खोजने के लिए आमंत्रित किया। फलस्वरूप बंगाल राहत समिति गठित की गई और हिन्दू महासभा राहत समिति भी बना दी गई। श्यामा प्रसाद जी इन दोनों ही संगठनों के लिए प्रेरणा के स्रोत थे। लोगों से धन देने की उनकी अपील का देशभर में इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि बड़ी-बड़ी राशियां इस प्रयोजनार्थ आनी शुरू हो गई। इस बात का श्रेय उन्हीं को जाता है कि पूरा देश एकजुट होकर राहत देने में लग गया और लाखों लोग मौत के मुंह में जाने से बच गए। वह केवल मौखिक सहानुभूति प्रकट नहीं करते थे, बल्कि ऐसे व्यावहारिक सुझाव भी देते थे, जिनमें सहृदय मानव-हृदय की झलक मिलती, जो मानव पीड़ा को हरने के लिए सदैव लालायित और तत्पर रहता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्होंने संसद में एक बार कहा था, ‘‘अब हमें 40 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं, पता नहीं भविष्य में लोकसभा के सदस्यों के भत्ते क्या होंगे। हमें स्वेच्छा से इस दैनिक भत्ते में 10 रुपये प्रतिदिन की कटौती करनी चाहिए और इस कटौती से प्राप्त धन को हमें इन महिलाओं और बच्चों (अकाल ग्रस्त क्षेत्रों के) के रहने के लिए मकान बनाने और खाने-पीने की व्यवस्था करने के लिए रख देना चाहिए।’’


      पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अंतरिम सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया। लेकिन नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली के बीच हुए समझौते के पश्चात 6 अप्रैल, 1950 को उन्होंने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गुरु गोलवलकर जी से परामर्श लेकर मुखर्जी ने 21 अक्टूबर, 1951 को जनसंघ की स्थापना की। भारत में जिस समय जनसंघ की स्थापना हुई, उस समय देश विपरीत परिस्थितयों से गुजर रहा था। जनसंघ का उदेश्य साफ था। वह अखंड भारत की कल्पना कर कार्य करना चाहता था। वह भारत को खंडित भारत करने के पक्ष में नहीं था। जनसंघ का स्पष्ट मानना था कि भारत एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने आएगा। डॉ. मुखर्जी के अनुसार अखंड भारत देश की भौगोलिक एकता का ही परिचायक नहीं है, अपितु जीवन के भारतीय दृष्टिकोण का द्योतक है, जो अनेकता में एकता का दर्शन करता है। जनसंघ के लिए अखंड भारत कोई राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि यह तो हमारे संपूर्ण जीवनदर्शन का मूलाधार है।


    देश में पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर, 1951 से 21 फरवरी, 1952 तक हुआ। इन आम चुनावों में जनसंघ के 3 सांसद चुने गए, जिनमें एक डॉ. मुखर्जी भी थे। तत्पश्चात उन्होंने संसद के अंदर 32 लोकसभा और 10 राज्यसभा सांसदों के सहयोग से नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी का गठन किया। डॉ. मुखर्जी सदन में नेहरू की नीतियों पर तीखा प्रहार करते थे। जब संसद में बहस के दौरान पंडित नेहरू ने भारतीय जनसंघ को कुचलने की बात कही, तब डॉ. मुखर्जी ने कहा, ‘‘हम देश की राजनीति से इस कुचलने वाली मनोवृत्ति को कुचल देंगे।’’


    डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत का विभाजन नहीं होने देना चाहते थे। इसके लिए वे महात्मा गांधी के पास भी गए थे। परंतु गांधी जी का कहना था कि कांग्रेस के लोग उनकी बात सुनते ही नहीं। जब देश का विभाजन अनिवार्य जैसा हो गया, तो डॉ. मुखर्जी ने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं के हितों की उपेक्षा न हो। उन्होंने बंगाल के विभाजन के लिए जोरदार प्रयास किया, जिससे मुस्लिम लीग का पूरा प्रांत हड़पने का मंसूबा सफल नहीं हो सका। श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रभक्ति एवं देश प्रेम की उस महान परंपरा के वाहक थे, जो देश की परतंत्रता के युग तथा स्वतंत्रता के काल में देश की एकता, अखंडता तथा विघटनकारी शक्तियों के विरुद्ध सतत् जूझते रहे। उनका जीवन भारतीय धर्म तथा संस्कृति के लिए पूर्णतः समर्पित था। वे एक महान शिक्षाविद् तथा प्रखर राष्ट्रवादी थे। पारिवारिक परिवेश शिक्षा, संस्कृति तथा हिन्दुत्व के प्रति अनुराग उन्हें परिवार से मिला था।


      डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ‘एक भारत’ की कल्पना में विश्वास रखते थे। हमारे स्वाधीनता सेनानियों और संविधान निर्माताओं ने भी ऐसे ही भारत की कल्पना की थी। मगर जब आजाद भारत की कमान संभालने वालों का बर्ताव इस सिद्धांत के खिलाफ हो चला, तो डॉ. साहब ने बहुत मुखरता और प्रखरता के साथ इसका विरोध किया। महाराजा हरि सिंह के अधिमिलन पत्र अर्थात् 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर हस्ताक्षार करते ही समूचा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग हो गया। बाद में संविधान के अनुच्छेद एक के माध्यम से जम्मू कश्मीर भारत का 15वां राज्य घोषित हुआ। ऐसे में जम्मू कश्मीर में भी शासन व संविधान व्यवस्था उसी प्रकार चलनी चाहिए थी, जैसे कि भारत के किसी अन्य राज्य में। जब ऐसा नहीं हुआ तो मुखर्जी ने अप्रैल 1953 में पटना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि, “जम्मू एवं कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला और उनके मित्रों को यह साबित करना होगा कि भारतीय संविधान जिसके अंतर्गत देश के पैंतीस करोड़ लोग, जिनमें चार करोड़ लोग मुसलमान भी हैं, वे खुश रह सकते हैं, तो जम्मू-कश्मीर में रहने वाले 25 लाख मुसलमान क्यों नही?” उन्होंने शेख को चुनौती देते हुए कहा था कि, “यदि वह सेकुलर हैं, तो वह संवैधानिक संकट क्यों उत्पन्न करना चाहते हैं। आज जब राज्य का एक बड़ा हिस्सा अपने आप को संवैधानिक व्यवस्था से जोड़ना चाहता है, तो शेख अब्दुल्ला इसमें रोड़े क्यों अटका रहे हैं?”3   उनके द्वारा उठाये गए सवालों के जवाब न शेख के पास थे और न पंडित नेहरू के पास। इसीलिए दोनों ने कभी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी से सीधे बात करने की कोशिश भी नहीं की।


      अनुच्छेद 370 के राष्ट्रघातक प्रावधानों को हटाने के लिए भारतीय जनसंघ ने हिन्दू महासभा और रामराज्य परिषद के साथ सत्याग्रह आरंभ किया। डॉ. मुखर्जी इस प्रण पर सदैव अडिग रहे कि जम्मू एवं कश्मीर भारत का एक अविभाज्य अंग है। उन्होंने सिंह-गर्जना करते हुए कहा था कि, “एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान, नहीं चलेगा”। उस समय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 में यह प्रावधान किया गया था कि कोई भी भारत सरकार से बिना परमिट लिए हुए जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता। डॉ. मुखर्जी इस प्रावधान के सख्त खिलाफ थे। उनका कहना था कि, “नेहरू ने ही ये बार-बार ऐलान किया है कि जम्मू व कश्मीर राज्य का भारत में 100% विलय हो चुका है, फिर भी यह देखकर हैरानी होती है कि इस राज्य में कोई भारत सरकार से परमिट लिए बिना दाखिल नहीं हो सकता। मैं नहीं समझता कि भारत सरकार को यह हक है कि वह किसी को भी भारतीय संघ के किसी हिस्से में जाने से रोक सके, क्योंकि खुद नेहरू ऐसा कहते हैं कि इस संघ में जम्मू व कश्मीर भी शामिल है।”


     उन्होंने इस प्रावधान के विरोध में भारत सरकार से बिना परमिट लिए हुए जम्मू व कश्मीर जाने की योजना बनाई। इसके साथ ही उनका अन्य मकसद था वहां के वर्तमान हालात से स्वयं को वाकिफ कराना, क्योंकि शेख अब्दुल्ला की सरकार ने वहां के सुन्नी कश्मीरी मुसलमानों के बाद दूसरे सबसे बड़े स्थानीय भाषाई डोगरा समुदाय के लोगों पर असहनीय जुल्म ढाना शुरू कर दिया था। नेशनल कांफ्रेंस का डोगरा-विरोधी उत्पीड़न वर्ष 1952 के शुरुआती दौर में अपने चरम पर पहुंच गया था। डोगरा समुदाय के आदर्श पंडित प्रेमनाथ डोगरा ने बलराज मधोक के साथ मिलकर ‘जम्मू व कश्मीर प्रजा परिषद् पार्टी’ की स्थापना की थी। इस पार्टी ने डोगरा अधिकारों के अलावा जम्मू व कश्मीर राज्य के भारत संघ में पूर्ण विलय की लड़ाई, बिना रुके और बिना थके लड़ी।


     डॉ. मुखर्जी ने भारतीय संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को कहा था कि ‘या तो मैं संविधान की रक्षा करूंगा, नहीं तो अपने प्राण दे दूंगा’। हुआ भी यही। 8 मई, 1953 को सुबह 6:30 बजे दिल्ली रेलवे स्टेशन से पैसेंजर ट्रेन में अपने समर्थकों के साथ सवार होकर डॉ. मुखर्जी पंजाब के रास्ते जम्मू के लिए निकले। उनके साथ बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, टेकचंद, गुरुदत्त वैद्य और कुछ पत्रकार भी थे। रास्ते में हर जगह डॉ. मुखर्जी की एक झलक पाने एवं उनका अभिवादन करने के लिए लोगों का जनसैलाब उमड़ पड़ता था। डॉ. मुखर्जी ने जालंधर के बाद बलराज मधोक को वापस भेज दिया और अमृतसर के लिए ट्रेन पकड़ी। 11 मई, 1953 को कुख्यात परमिट सिस्टम का उलंघन करने पर कश्मीर में प्रवेश करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और गिरफ्तारी के दौरान ही रहस्मयी परिस्थितियों में 23 जून, 1953 को उनकी मौत हो गई। डॉ. मुखर्जी की माता जी ने नेहरू के 30 जून, 1953 के शोक संदेश का 4 जुलाई,1953 को उत्तर देते हुए पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने उनके बेटे की रहस्मयी परिस्थितियों में हुई मौत की जांच की मांग की। जवाब में पंडित नेहरु ने जांच की मांग को ख़ारिज कर दिया। उन्होंने जवाब देते हुए यह लिखा कि, “मैंने कई लोगों से इस बारे में पता लगवाया है, जो इस बारे में काफी कुछ जानते थे और उनकी मौत में किसी प्रकार का कोई रहस्य नहीं था।”


     उनकी शहादत पर शोक व्यक्त करते हुए तत्कालीन लोकसभा के अध्यक्ष श्री जी.वी. मावलंकर ने कहा था, ‘‘वे हमारे महान देशभक्तों में से एक थे और राष्ट्र के लिए उनकी सेवाएं भी उतनी ही महान थीं। जिस स्थिति में उनका निधन हुआ, वह स्थिति बड़ी ही दुःखदायी है। उनकी योग्यता, उनकी निष्पक्षता, अपने कार्यभार को कौशल्यपूर्ण निभाने की दक्षता, उनकी वाक्पटुता और सबसे अधिक उनकी देशभक्ति एवं अपने देशवासियों के प्रति उनके लगाव ने उन्हें हमारे सम्मान का पात्र बना दिया।’’


       उनकी मृत्यु के पश्चात टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा अत्यंत उल्लेखनीय श्रद्धांजलि दी गई, जिसमें कहा गया कि ‘‘डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सरकार पटेल की प्रतिमूर्ति थे’’। यह एक अत्यंत उपर्युक्त श्रद्धांजलि थी, क्योंकि डॉ. मुखर्जी नेहरू सरकार पर बाहर से उसी प्रकार का संतुलित और नियंत्रित प्रभाव बनाए हुए थे, जिस प्रकार का प्रभाव सरकार पर अपने जीवन काल में सरदार पटेल का था। राष्ट्र-विरोधी और एक दलीय शासनपद्धति की सभी नीतियों तथा प्रवृत्तियों के प्रति उनकी रचनात्मक एवं राष्ट्रवादी विचारधारा तथा उनके प्रबुद्ध एवं सुदृढ़ प्रतिरोध ने उन्हें देश में स्वतंत्रता और लोकतंत्र का प्राचीर बना दिया था। संसद में विपक्ष के नेता के रूप में उनकी भूमिका से उन्हें ‘‘संसद का शेर’’ की उपाधि अर्जित हुई।


भारतीय जनसंघ से लेकर भाजपा के प्रत्येक घोषणा पत्र में अपने बलिदानी नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के इस घोष वाक्य को, कि ‘हम संविधान की अस्थायी धारा 370 को समाप्त करेंगे’, सदैव लिखा जाता रहा। समय आया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्होंने स्वयं डॉ. मुरली मनोहर जोशी के साथ भारत की यात्रा करते हुए श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराया था और गृह मंत्री अमित शाह ने 5 अगस्त, 2019 को धारा 370 को राष्ट्र हित में समाप्त करने के निर्णय को दोनों सदनों से पारित कर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि दी। वे महापुरुष बहुत भाग्यशाली होते हैं, जिनकी आने वाली पीढ़ी अपने पूर्वर्जों की कही गई बातों को साकार करती है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भाग्यशाली हैं कि उनके विचारों के संवाहक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह सहित पूरे मंत्रिमंडल ने धारा 370 को समाप्त कर दुनिया को बता दिया:-


जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वो कश्मीर हमारा है,


जो कश्मीर हमारा है, वह सारा का सारा है।


      सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धांतों के पक्के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सदैव राष्ट्रीय एकता की स्थापना को ही अपना प्रथम लक्ष्य रखा था। संसद में दिए अपने भाषण में उन्होंने स्पष्ट कहा था कि राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है। एक कर्मठ और जुझारू व्यक्तित्व वाले मुखर्जी अपनी मृत्यु के दशकों बाद भी अनेक भारतवासियों के आदर्श और पथप्रदर्शक हैं। जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय करने का श्रेय सरदार पटेल को जाता है, ठीक उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकांश भागों को भारत का अभिन्न अंग बनाये रखने की सफलता प्राप्ति में डॉ. मुखर्जी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। उन्हें किसी दल की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता, क्योंकि उन्होंने जो कुछ किया, देश के लिए किया और इसी भारतभूमि के लिए अपना बलिदान तक दे दिया।


      वे सच्चे अर्थों में राष्ट्रधर्म का पालन करने वाले साहसी, निडर एवं जुझारु कर्मयोद्धा थे। जीवन में जब भी निर्माण की आवाज उठेगी, पौरुष की मशाल जगेगी, सत्य की आंख खुलेगी एवं अखंड राष्ट्रीयता की बात होगी, तो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अवदान को सदा याद किया जायेगा।


(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान , नई दिल्ली के महानिदेशक है)

शहीद भगत सिंह की नास्तिकता

 भगत सिंह की बैरक की साफ-सफाई करने वाले भंगी का नाम बोघा था। भगत सिंह उसको बेबे (मां) कहकर बुलाते थे। जब कोई पूछता कि भगत सिंह ये भंगी बोघा तेरी बेबे कैसे हुआ? तब भगत सिंह कहता, मेरा मल-मूत्र या तो मेरी बेबे ने उठाया, या इस भले पुरूष बोघे ने। बोघे में मैं अपनी बेबे (मां) देखता हूं। ये मेरी बेबे ही है।

यह कहकर भगत सिंह बोघे को अपनी बाहों में भर लेता।

भगत सिंह जी अक्सर बोघा से कहते, बेबे मैं तेरे हाथों की रोटी खाना चाहता हूँ। पर बोघा अपनी जाति को याद करके झिझक जाता और कहता, भगत सिंह तू ऊँची जात का सरदार, और मैं एक अदना सा भंगी, भगतां तू रहने दे, ज़िद न कर।

सरदार भगत सिंह भी अपनी ज़िद के पक्के थे, फांसी से कुछ दिन पहले जिद करके उन्होंने बोघे को कहा बेबे अब तो हम चंद दिन के मेहमान हैं, अब तो इच्छा पूरी कर दे!

बोघे की आँखों में आंसू बह चले। रोते-रोते उसने खुद अपने हाथों से उस वीर शहीद ए आजम के लिए रोटिया बनाई, और अपने हाथों से ही खिलाई। भगत सिह के मुंह में रोटी का गास डालते ही बोघे की रुलाई फूट पड़ी। ओए भगतां, ओए मेरे शेरा, धन्य है तेरी मां, जिसने तुझे जन्म दिया। भगत सिंह ने बोघे को अपनी बाहों में भर लिया।

ऐसी सोच के मालिक थे अपने वीर सरदार भगत सिंह जी...। परन्तु आजादी के 70 साल बाद भी हम समाज में व्याप्त ऊँच-नीच के भेद-भाव की भावना को  दूर करने के लिये वो न कर पाए जो 88 साल पहले भगत सिंह ने किया। 

महान शहीदे आजम को इस देश का सलाम।

नेहरू, कार्टूनिस्ट शंकर और मीडिया की अहमियत / कुमार नरेंद्र सिंह

 एक नेहरू थे जिन्होंने कभी कार्टूनिस्ट शंकर से कहा था, 'शंकर मुझे भी मत बख्शना'. एक आज के नेता हैं जो ट्विटर और फेसबुक से नोटिस भिजवाने से लेकर थानेदार से एफआईआर करा देते हैं.


मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर और नेहरू के किस्सा आपने भी कहीं पढ़ा होगा. उस दौर के दिग्गज कार्टूनिस्ट केशव शंकर पिल्लई के कॉलम का उद्घाटन था. शंकर ने नेहरू से कहा कि वे उनके कॉलम का उद्घाटन करें. इस पर नेहरू ने कहा कि उद्घाटन तो मैं जरूर करूंगा, लेकिन एक शर्त पर कि आप हमें भी न बख्शें.


शंकर ने उनको निराश नहीं किया. द प्रिंट में छपे रशेल जॉन के एक आर्टिकल के मुताबिक, शंकर ने नेहरू पर करीब 4000 कार्टून बनाए. कहते हैं कि नेहरू अपनी बेटी इंदिरा को जो चिट्ठियां लिखते थे, उनके साथ शंकर के कार्टून भी भेजते थे. शंकर बड़ी निर्दयता से नेहरू पर कार्टून बनाते थे ​लेकिन नेहरू इसके लिए उनकी तारीफ करते थे. वे नेहरू की निर्दयता पूर्वक आलोचना करके भी उनकी प्रशंसा पाते रहे.


एक बार नेहरू ने कहा, "शंकर के पास एक दुर्लभ उपहार है. वे एक कलात्मक कौशल के साथ, द्वेष या दुर्भावना के बिना, सार्वजनिक मंच पर खुद को प्रदर्शित करने वालों की कमजोरियों को उभारते हैं. हमारे दंभ का पर्दा बार-बार हट जाना अच्छा है."


बाद में शंकर के बनाए कार्टून ‘डोंट स्पेयर मी, शंकर’ शीर्षक से प्रकाशित हुए.


कार्टूनिस्ट मंजुल को कुछ दिन पहले ट्विटर का नोटिस आया कि सरकार को उनके ट्विटर अकाउंट से आपत्ति है. उधर तेलंगाना में एक कार्टूनिस्ट पर दर्ज मुकदमे में कोर्ट का फैसला आया. इन दो घटनाओं से मुझे नेहरू और शंकर के बारे में मशहूर कहानियां याद आईं.


ये वही नेहरू हैं जिन्होंने नवंबर 1957 में मॉडर्न टाइम्स में अपने ही खिलाफ एक जबर्दस्त लेख लिखा. लेखक का नाम था चाणक्य और लेख का शीर्षक था ‘द राष्ट्रपति’. इस लेख में जनता को नेहरू के तानाशाही रवैये के खिलाफ चेतावनी देते हुए कहा गया था कि नेहरू को इतना मजबूत न होने दो कि वो सीजर हो जाए. नाम के बाद में इसका खुलासा हुआ कि नेहरू हर तरफ अपनी तारीफ और जय-जयकार सुनकर उकता चुके थे. उन्हें महसूस हो रहा था कि बिना मजबूत विपक्ष के लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं होता. क्या आज आप ऐसी कल्पना कर सकते हैं?


देश की आजादी के लिए एक दशक तक जेल काटने वाले नेहरू को अपनी आलोचना से आपत्ति नहीं थी. आज देश के लिए नाखून कटाए बगैर देश को लूटने वालों को अपनी आलोचना से आपत्ति है. क्योंकि उन्हें लोकतंत्र नहीं चाहिए. उन्हें लगता है कि देश जनता का नहीं, उनके बाप की जागीर है.


शंकर आज जिंदा होते तो या तो मुकदमे झेल रहे होते या ट्विटर की नोटिस का जवाब दे रहे होते.

सोमवार, 21 जून 2021

विष्णु प्रभाकर पर प्रकाश मनु - ( साभार )

कल प्रसिद्ध लेखक विष्णु प्रभाकर की जयंती थी। विष्णु प्रभाकर का नाम आते ही उनकी अमर कृति ‘आवारा मसीहा’ की याद आ जाती है। उसी बहाने उनको याद किया है वरिष्ठ लेखक प्रकाश मनु ने-

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विष्णु प्रभाकर हिंदी के दिग्गज साहित्यकार हैं, जिन्होंने हिंदी साहित्य में बहुत कुछ नया और मूल्यवान जोड़ा। उसे अनुभव-विस्तार के साथ एक नया गौरव और गरिमा दी। विष्णु जी मूलतः कथाकार हैं, पर आश्चर्य, उनके द्वारा लिखी गई शरत की औपन्यासिक जीवनी को जो चतुर्दिक ख्याति मिली, वह हिंदी साहित्य की एक विरल और ऐतिहासिक घटना है। हिंदी में जीवनी साहित्य बहुत लिखा गया, पर शरत की जैसी शाहकार जीवनी विष्णु प्रभाकर ने लिखी, वह अपने आप में एक मयार है। किसी बड़े और बहुमुखी साहित्यिक प्रतिभा के धनी लेखक की सुंदर और सांगोपांग जीवनी कैसी होनी चाहिए, उसे किस तल्लीनता से लिखा जाना चाहिए, इसे ‘आवारा मसीहा’ पढ़कर जाना जा सकता है। सच तो यह है कि अपने अथक श्रम और अतुलनीय समर्पण से विष्णु जी ने हिंदी में जीवनी साहित्य को जिस असंभव लगती ऊँचाई तक पहुँचा दिया, वह आज भी बहुतों के लिए स्पृहणीय है।

‘आवारा मसीहा’ शरत सरीखे बड़े कद के साहित्यकार की एक संपूर्ण जीवनी तो है ही, पर इसके साथ ही वह एक ऐतिहासिक महत्त्व की कृति बन गई, जिसमें सर्जना का अपार सौंदर्य है। यही उसे विलक्षण बनाता है। उसमें जितनी गहराई है, उतना ही भावनाओं का विस्तार भी, जितना असाध्य श्रम है, उतनी ही रस में ऊभ-चूभ करती सृजनात्मकता भी। किसी उपन्यास से ज्यादा रोचक और रसपूर्ण होने के साथ ही, उसमें किसी नदी की अजस्र धारा जैसा प्रवाह है और हर क्षण मन में यह जिज्ञासा और कौतुक बना रहता है कि आगे अभी और क्या सामने आना है, अभी क्या कुछ और उस रहस्य के परदे से बाहर आना है, जिसने जाने-अनजाने  शरत के व्यक्तित्व को ढककर, उसे असंख्य किंवदतियों का विषय बना दिया है।

यों सच पूछिए तो ‘आवारा मसीहा’ शरत के जीवन से जुड़े तथ्यों की पुनःपुनः खोज ही नहीं, यह एक तरह से शरत का पुनराविष्कार है, यानी ‘ए डिस्कवरी ऑफ शरत’। शरत सरीखे बड़े कद के और कुछ-कुछ बोहेमियन किस्म के बीहड़ साहित्यकार की जीवनी ऐसी ही हो सकती थी।

विष्णु जी ने खुद को समूचा झोंककर शरत की जीवनी लिखी। पर लिखने के बाद संभवतः विष्णु प्रभाकर भी वही नहीं रह गए, जो इस जीवनी को लिखने से पहले थे। उनकी पहचान ही नहीं, साहित्यिक परिचय भी हमेशा-हमेशा के लिए बदल गया था। अब वे घर-घर ‘आवारा मसीहा’ वाले विष्णु प्रभाकर के रूप में जाने जा रहे थे। हिंदी के हजारों पाठकों ने ‘आवारा मसीहा’ को पढ़ा और पढ़ते ही सबके होंठों पर बस एक ही शब्द सुनाई देता, “अद्भुत…!”

हालाँकि जिस समय कालजयी कथाकार शरतचंद्र पर जीवनी लिखने का प्रस्ताव विष्णु जी के सामने आया, उन्हें पता नहीं था कि एक विशाल समंदर सामने है और उसके नजदीक जाते ही वे उसमें इतना गहरे उतरते जाएँगे कि बरसों तक उनकी इस खोज-यात्रा का कोई ओर-छोर ही नहीं रहेगा। उनका अपना लिखना तो छूटेगा ही, भीतर का चैन भी। और वे तो बस उस अनंत मायावी शरत, शरत, बस शरत के होकर रह जाएँगे। उनकी हर साँस-साँस में शरत बस जाएँगे।

वे सोच रहे थे, शरत इतने बड़े लेखक हैं तो बंगाल में जरूर उन पर कुछ अच्छी जीवनियाँ लिखी गई होंगी। कुछ और सहायक सामग्री भी आसानी से उपलब्ध हो जाएगी। उस सबकी मदद लेने पर थोड़ी आसानी हो जाएगी और फिर रास्ता मिलने लगेगा। पर जब उन्होंने छान-बीन शुरू की तो पता चला कि वहाँ तो ऐसा कोई काम हुआ ही नहीं। बल्कि इसके उलट वहाँ हालत यह थी कि शरत का नाम लेना भी बहुतों के लिए अखरने वाला था। उनके बारे में लोगों में एक गोपन रहस्य का सा भाव था। कोई कुछ बताता, कोई कुछ। परस्पर विरोधी चीजें कही जातीं। बेसिर-पैर की अफवाहें भी।

विष्णु जी के लिए यह एक अकल्पनीय अनुभव था, जिसने उनके भीतर एक थरथराहट सी भर दी। वे आखिर कैसा काम करने जा रहे हैं, जिसके ओर-छोर का ही उन्हें पता नहीं। यहाँ तक कि कोई ऐसा सिरा भी नहीं मिल रहा था, जहाँ से बात शुरू की जाए।

कुछ लोग तो शरत से इतने नाराज थे कि उनका नाम सुनते ही भड़क उठते। उनके लिए शरत एक निहायत पतित, बदनाम और गिरा हुआ शख्स था, जिसकी चर्चा करने से कोई फायदा नहीं। देख-सुनकर विष्णु जी हक्के-बक्के। वे समझ गए कि शरत की जीवनी को लिखने के लिए उन्हें बहुत छोटी-छोटी चीजों के लिए दर-दर भटकना पड़ेगा। यह तो अपने आप में एक बीहड़ शोध-कार्य जैसा है, जिसमें चारों ओर फैली तरह-तरह की भ्रांतियों और दुस्तर जंगली झाड़ियों के अंबार में से सच्चाई के कण ढूँढ़कर लाने होंगे। लिखने की शुरुआत तो फिर बाद में होगी।

उस समय दुर्भाग्य से, विष्णु जी की घरेलू स्थितियाँ भी कुछ अच्छी नहीं थीं। वे मसिजीवी लेखक थे। रोज कुआँ खोदना और पानी पीना। लेखन से जो आय होती, उसमें मुश्किल से गुजारा होता था। फिर शरत की जीवनी लिखी जाए, तो यह उनके साहित्यिक कद और गरिमा के अनुकूल होनी चाहिए। जाहिर है कि जैसी जीवनी लिखने का खयाल उनके मन में था, उसे लिखने में बहुत श्रम और समय लगने वाला था। पर इतने समय तक घर कैसे चलेगा, यह एक अलग चिंता थी। पत्नी सुशीला जी समझती थीं। उनका संबल विष्णु जी का बल था और उन्होंने हाँ कह दी।

लेकिन मन कह रहा था, “बहुत कठिन है डगर पनघट की…!”

विष्णु जी के जीवन में यह पहली ऐसी घटना थी, जिसने उन्हें भीतर-बाहर से झिंझोड़कर रख दिया।

[2]

पुस्तक की भूमिका में विष्णु जी ने ‘आवारा मसीहा’ के लिखे जाने की पूरी कहानी लगभग उसी भावोत्तेजना के सीथ टाँक दी है, जिससे उन्हें गुजरना पड़ा था। और यह कहानी, खुद में किसी रोमांचक कथा से कम नहीं है। विष्णु जी ने लिखा है—

“कभी सोचा भी न था कि एक दिन मुझे अपराजेय कथाशिल्पी शरतचंद्र की जीवनी लिखनी पड़ेगी। यह मेरा विषय नहीं था, लेकिन अचानक एक ऐसे क्षेत्र से यह प्रस्ताव मेरे पास आया कि मुझे स्वीकार करने को बाध्य होना पड़ा। हिंदी ग्रंथ रत्नाकर, बंबई के स्वामी श्री नाथूराम प्रेमी ने शरत साहित्य का प्रामाणिक अनुवाद हिंदी में प्रकाशित किया है। उनकी इच्छा थी कि इसी माला में शरतचंद्र की एक जीवनी भी प्रकाशित की जाए। उन्होंने इसकी चर्चा यशपाल जैन से की और न जाने कैसे लेखक के रूप में मेरा नाम सामने आ गया। यशपाल जी के आग्रह पर मैंने एकदम ही यह काम अपने हाथ में लिया हो, ऐसा नहीं था। लेकिन अंततः लेना पड़ा, यह सच है। इसका मुख्य कारण था, शरतचंद्र के प्रति मेरी अनुरक्ति।”

शरत की जीवनी लिखने में तमाम झंझट थे। पर सबसे बड़ी मुश्किल तो खुद शरत का चरित्र था, जो खासा पेचीदा और जटिल था। उनमें एक अजब तरह का आत्मगोपन था। खुद को जान-बूझकर छिपाकर रखने का विचित्र रहस्यात्मक रवैया। यह क्यों था, समझना मुश्किल था। फिर इसके साथ ही मित्रों के साथ गप लगाते हुए, शरत जो तमाम बातें कहते, उनसे चीजें और उलझ जातीं। हर बार घटना को कोई और रूप सामने आता। विचित्र भूल-भुलैया थी। विष्णु जी को कतई समझ में नहीं आ रहा था कि सच्चाई क्या है। उलटा वे जितना आगे बढ़ते, सत्य पर रहस्य के कुछ और परदे पड़ जाते। तो फिर सच्चाई का पता कैसे चले? विष्णु जी अपनी यह ऊहापोह छिपाते नहीं है। वे बड़ी साफगोई के साथ लिखते हैं—

“यह धारणा सत्य ही है कि मनुष्य शरतचंद्र की प्रकृति बहुत जटिल थी। साधारण बातचीत में वे अपने मन के भावों को छिपाने का प्रयत्न करते थे और उसके लिए कपोलकल्पित कथाएँ गढ़ते थे। कितने अपवाद, कितने मिथ्याचार, कितने भ्रांत विश्वासों से वे घिरे रहे। इसमें उनका योग भी कुछ कम नहीं था। वे परले दर्जे के अड्डेबाज थे, घंटों कहानियाँ सुनाते रहते। जब कोई पूछता कि क्या यह घटना उनके जीवन में घटी है तो वे कहते, न…न, गल्प कहता हूँ। सब गल्प, मिथ्या, एकदम सत्य नहीं। इतना ही नहीं, एक ही घटना को जितनी बार सुनाते, नए-नए रूपों में सुनाते…!”

फिर एक मुश्किल यह थी कि विष्णु जी के लिए जीवनी लेखन के मानक बहुत ऊँचे थे। कुछ भी लिखकर काम चला लेना उनका उद्देश्य न था। शरत जैसे महाकार व्यक्तित्व पर वे कलम चला रहे थे तो जीवनी भी तो वैसी ही होनी चाहिए। उसमें उनकी लेखकीय शख्सियत, भीतर की बेचैनियाँ और जीवन की सच्ची, प्रामाणिक गाथा न आए तो लिखने से फायदा? यहाँ कोरी गप और किंवदंततियों से काम नहीं चल सकता। यों विष्णु जी के लिए जीवनी लेखन का आदर्श क्या है और क्या कसौटियाँ हैं, इसकी ओर उन्होंने स्वयं भी इशारा किया है—

“कला के लिए सत्य भले ही संपूर्ण आदर्श न हो, परंतु जीवन चरित्र लिखना इस दृष्टि से विज्ञान के अधिक पास है और उसका दर्शन सत्य ही है। पर जैसा कि पहले कहा जा चुका है, घटना तो सत्य नहीं है। उसका जीवन में महत्त्व है, लेकिन उससे अधिक महत्त्व है घटना के पीछे की प्रेरणा का। वही प्रेरणा सत्य है। मैंने इतना समय इसीलिए लगाया कि मैं भ्रांत और अभ्रांत घटनाओं के पीछे के सत्य को पहचान सकूँ, जिससे घटनाओं से परे जो वास्तविक शरच्चंद्र हैं, उनका रूप पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जा सके। यह सब कैसे और किस प्रकार हुआ, यह मैं नहीं बता सकूँगा। जिसे सिक्स्थ सेंस कहते हैं, शायद वही मेरी सहायक रही। मैं अधिक से अधिक उन व्यक्तियों से मिला जिनका किसी न किसी रूप में शरच्चंद्र से संबंध था। उन सभी स्थानों पर गया, जहाँ वे या उनके उपन्यासों के पात्र रहे थे। उस वातावरण में रमने की कोशिश की, जिसमें वे जिए थे। शायद इसी प्रयत्न के फलस्वरूप मैं एक ऐसी तसवीर बनाने में यत्किंचित सफल हो सका, जो शरीर-रचना विज्ञान (एनोटोमी) की दृष्टि से भले ही सही न हो, पर उसके पीछे जो चेतना-तत्व होता है, उसको समझने में अवश्य ही सहायक हुई।”

‘आवारा मसीहा’ शरत की प्रामाणिक जीवनी बने, इस लिहाज से विष्णु जी ने अधिक छूट लेने के बजाय शरत के मित्रों, संबंधियों और उनके समय के लोगों की कही हुई बातों, संस्मरणों आदि पर कहीं अधिक भरोसा किया। कोरी कल्पना की उड़ान से वे बचे। अपने मन से कोई प्रसंग या घटना नहीं जोड़ी। साथ ही कोई ऐसी बात उनके मुख से नहीं कहलवाई जो स्वाभाविक न हो। इससे विष्णु जी की राह थोड़ी और मश्किल हो गई, पर वे इस जीवनी को शरत की सर्वथा प्रामाणिक और आधिकारिक जीवनी बना पाने में कामयाब हुए। कुछ अरसे बाद पुस्तक का नया संस्करण आया, तो पुस्तक की दूसरी भूमिका लिखने की जरूरत महसूस हुई। पुस्तक की दूसरी भूमिका में विष्णु प्रभाकर लिखते हैं—

“आवारा मसीहा में आई किसी घटना के बारे में मैंने कल्पना नहीं की। जितना और जैसी जानकारी पा सका हूँ, उतना ही मैंने लिखा है। प्रथम पुरुष के रूप में उनके मुख से जो कुछ कहलवाया है, वह सब शरत के उन मित्रों के संस्मरणों से लिया है जो उसके साक्षी रहे हैं। यथासंभव उन्हीं की भाषा का प्रयोग मैंने किया है। प्रामाणिकता की दष्टि से एक-दो स्थानों पर उनकी रचनाओं में आए उन्हीं स्थलों के वर्णन का भी सहारा लिया है। पर ऐसा बहुत कम किया है। मैंने अगर स्वतंत्रता ली भी है तो उतनी ही, जितनी एक अनुवादक ले सकता है।”

इससे काफी कुछ समझ में आ जाता है कि शरत की जीवनी लिखते समय विष्णु जी को किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

[3]

फिर शरत की जीवनी लेखन में कदम-कदम पर मुश्किलें थीं। यों भी एक लेखक या कलाकार का चरित्र आम आदमी से भिन्न और किसी मायने में अबूझ होता है। उसका जीवन जीने का ढंग ही नहीं, बहुत सी जिदें, आकांक्षाएँ, स्वाभिमान, यहाँ तक कि रोजमर्रा की चीजों को लेकर उसकी सोच और व्यवहार भी औरों से अलग नजर आता है। वह छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ तलाश लेता है। लेकिन जिन चीजों से हजारों लोग बेपरवाह हों, उन पर घंटों गमगीन बना रह सकता है।

विष्णु जी ने देखा कि शरत में भी ऐसा बहुत कुछ है, जो उन्हें आम इनसानों से अलगाता है। पर इतना ही नहीं, शरत में ऐसा भी बहुत कुछ था, जो उन्हें दूसरे लेखकों की कतार में भी शामिल नहीं होने देता। वे सदाचार के प्रचलित मानदंडों और नैतिकता की बँधी-बँधाई धारणाओं पर चोट करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते थे। यही नहीं, वे जीवन में हर तरह के ढोंग और छद्म के खिलाफ थे और खुलकर उनका मजाक उड़ाते थे। इससे यथास्थितिवादी नैतिकता के प्रहरियों और तथाकथित धर्मधुरीणों में हाहाकार मच गया। खुद को समाज के कर्णधार मानने वाले तिलमिला गए। उनकी नजरों में शरत तो मानो आचार-विचार की सारी सरहदें लाँघ गए थे—

“शरत बाबू के चरित्र को लेकर समाज में जो भ्रांत धारणा बन गई थी, उसकी चर्चा करना असंगत न होगा। कलाकार का चरित्र साधारण मानव से किसी न किसी रूप में भिन्न होता ही है। फिर शरत बाबू तो बचपन से ही अभाव और अपमान के उस वातावरण में जिए, जहाँ आदमी या तो विद्रोह कर सकता हो या आत्महत्या। उनके अंतर में जो साहित्यकार सोया पड़ा था, उसने उन्हें पहला मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी। इसलिए उन्होंने तत्कालीन समाज के कठोर विधि-विधान को मानने से इनकार कर दिया। सदाचार के प्रचलित मानदंडों पर चोट करते हुए उन्होंने वही किया जो यथास्थितिवादी मुखियाओं के लिए अकरणीय था, तब वे चरित्रहीन का विरुद न पाते तो आश्चर्य ही होता?”

विष्णु जी ने शरत पर लिखी गई इस शाहकार जीवनी का नाम रखा, ‘आवारा मसीहा’। इस पर भी तर्क-वितर्क की कोई सीमा नहीं थी। कुछ लोगों को लगा, ‘आवारा’ और ‘मसीहा’ तो परस्पर विरोधी गुणधर्म वाले शब्द हैं, भला इन्हें एक साथ रखने की क्या तुक? कुछ लोगों को ‘आवारा मसीहा’ में ‘आवारा’ विशेषण पसंद नहीं था और कुछ को लग रहा था कि शरत कोई मसीहा तो नहीं! तो भला मसीहा किसलिए? और फिर ‘आवारा मसीहा’ पद की भी ऐसी-ऐसी विचित्र व्याख्याएँ हुईं कि खुद विष्णु जी चकित रह गए। अंत में उन्हें स्पष्ट करना पड़ा—

“आवारा मसीहा नाम को लेकर भी काफी ऊहापोह मची है। वे-वे अर्थ किए गए जिनकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। मैं तो इस नाम के माध्यम से यही बताना चाहता था कि कैसे एक आवारा लड़का अंत में पीड़ित मानवता का मसीहा बन गया। आवारा और मसीहा दो शब्द हैं। दोनों में एक ही अंतर है, आवारा के सामने दिशा नहीं होती। जिस दिन उसे दिशा मिल जाती है, उसी दिन वह मसीहा बन जाता है। मुझे खुशी है कि अधिकतर मित्रों ने इस नाम को इसी संदर्भ में कबूल किया है।”

[4]

शरत की जीवनी ‘आवारा मसीहा’ तीन खंडों में विभक्त है। प्रथम पर्व ‘दिशाहारा’, द्वितीय पर्व ‘दिशा की खोज’ और तृतीय पर्व ‘दिशांत’। इनमें प्रथम पर्व ‘दिशाहारा’ में शरत के अनंत भटकावों की कथा है। उनके बचपन की शरारतें, छात्रावस्था की तरह-तरह की गतिविधियाँ, शुरू से ही जीवन को निकट से देखने और साथ ही गंभीर अध्ययन की प्रवृत्ति, विद्रोही चरित्र, घर-परिवार, माता-पिता और नाना-नानी के चरित्र की विशेषताएँ और उस परिवेश में शरत के लगातार अनफिट बने रहने की कथा। फिर अंततः माँ के गुजरने के साथ ही हताश होकर रंगून जाने की कथा जीवनी के प्रथम पर्व में बहुत स्वाभाविक रूप से आती है।

यों प्रथम पर्व में बहुत गहराई से शरत के बचपन, कैशौर्य काल और तरुणाई की विद्रोही रेखाओं और कुछ-कुछ स्वच्छंद, अराजक व्यक्तित्व को उकेरा गया है। यह एक तरह से उनके जीवन के पूर्वार्ध की कथा है, जिसमें तमाम मोड़, अँधेरे और उलझाव हैं, जिसके साक्षी बहुत अधिक न थे। लिहाजा इस सबके बारे में पता करना निश्चय ही विष्णु जी के लिए सबसे मुश्किल और दुष्कर काम रहा होगा, अँधेरे में हाथ-पैर मारने की तरह। पर यह किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं कि उन्होंने शरत के इन अल्पज्ञात प्रसंगों को पूरे विस्तार के साथ पाठकों के आगे प्रस्तुत किया।

इतना ही नहीं, विष्णु जी ने शरत के विद्यार्थी जीवन की बहुत सी गतिविधियों के बारे में बहुत सटीक जानकारी दी है। जीवन को निकट से देखने का जिद्दी स्वभाव, बहुत बार अपनी बातों के लिए अड़ जाना, एक ओर गंभीर अध्ययनशील व्यक्तित्व और दूसरी ओर खतरों से खेलने की दुस्साहसी प्रवृत्ति। शरत के लेखक होने की भूमिका शायद यहीं से बनने लगी थी। विष्णु जी लिखते हैं—

“स्कूल में एक छोटा सा पुस्तकालय भी था। वहीं से लेकर उसने उस युग के सभी प्रसिद्ध लेखकों की रचनाएँ पढ़ डालीं। युगसंधि के इस काल में जब कर्ता लोग चंडीमंडप में बैठकर चौपड़ को लेकर शोर मचाते, तब किशोर वय के लोग चोरी-चोरी बंकिम, रवींद्र की पुस्तकों के पन्ने पलटते। लेकिन शरत केवल पढ़ता ही नहीं था, उसको समझने और आसपास के वातावरण का सूक्ष्म अध्ययन करने की सहज प्रतिभा भी उसमें थी। वह हर वस्तु को करीब से देखता था।”

बहुत समय तक शरत को अनिच्छा से नाना के परिवार में रहना पड़ा। वहाँ का अभिजात वातावरण उसे पसंद नहीं था। उसका बोहेमियन व्यक्तित्व एक तरह से उसके विद्रोह की अभिव्यक्ति थी। आखिर माँ के न रहने पर शरत जीविका की खोज में लंबे रंगून प्रवास के लिए निकल पड़ा। यह एक टूटा, थका हुआ शरत था, जिसे जीवन में कोई उम्मीद नहीं थी। यहाँ तक कि मित्रों के बहुत कहने पर उसने एक कहानी प्रतियोगिता में कहानी भेजी तो, पर उसे भी मामा सुरेंद्रनाथ गांगुली के नाम से भेजा। उसकी कहानी उस प्रतियोगिता के लिए आई आखिरी कहानी थी। एकदम अंतिम क्षणों में जमा की गई आखिरी प्रविष्टि। उसी को पुरस्कार भी मिला। पर शरत तो पहले ही रंगून कूच कर चुका था। विष्णु जी ने इस समय के शरत की मनःस्थिति का बहुत ही सटीक अंकन किया है—

“इस पलायन के साथ-साथ उसके जीवन रूपी नाटक का एक अंक जैसे समाप्त हो गया। उसकी आयु छब्बीस वर्ष की हो चुकी थी। यौवन का सूर्य मध्याकाश में था, लेकिन जैसे ठंडे और घने कुहरे ने उसे आच्छादित कर दिया था। ‘श्रीकांत’ की तरह दूसरे की इच्छा से दूसरे के घर में वर्ष के बाद वर्ष रहकर वह अपने शरीर को कैशोर्य से यौवन की ओर धकेलता रहा था, लेकिन मन को न जाने किस रसातल की ओर खदेड़ता रहा। उसका वह मन कभी लौटकर नहीं आया।”

विष्णु प्रभाकर के इन कारुणिक शब्दों में जैसे शरत की दिशाहीन तरुणाई की पूरी तसवीर उभर आती है। बाद में चलकर शरत पर इसका इतना गहरा असर पड़ा कि वे जीवन भर तरुणाई की इन अप्रिय यादों को भुला नहीं सके, और कभी अपने समय के दूसरे लेखकों की तरह सहज, सामान्य भी नहीं हो पाए।

[5]

‘आवारा मसीहा’ के दिवितीय पर्व ‘दिशा की खोज’ में शरत के रंगून प्रवास की कथा है। वे रंगून के लिए जहाज पकड़ने पहुँचे तो देखा, वहाँ एक महा जनसमुद्र है। अपार भीड़भाड़ में वे किसी तरह बर्मा पहुँचे तो वहाँ चेकिंग के लिए रोक लिया गया। उन दिनों प्लेग का भीषण प्रकोप था। इसलिए भारत से आने वाल लोगों को सघन जाँच के बाद ही बर्मा में प्रवेश की अनुमति दी जाती थी। शरत बहुत समय तक इसी जाँच के लिए अटके रहे। विचित्र बेबसी से भरी परिस्थिति थी। वे सोच रहे थे कि क्या इसी झंझट और बेकद्री के लिए वे बर्मा आए हैं?

फिर वे मौसी के घर पहुँचे तो मौसा जी ने, जो वहाँ की जानी-मानी शख्सियत थे, उन्हें डाँटा। बोले, “तुम भी बड़े मूर्ख हो। लोग तो यहाँ मेरा नाम लेकर जाँच से बच जाते हैं। तुमने मेरे बारे में बताया क्यों नहीं?”

सुनकर शरत को झेंपना पड़ा।

शरत के मौसा वाकई खासे प्रभावशाली व्यक्ति थी। उनकी वहाँ अच्छी-खासी जान-पहचान थी। बड़ी हैसियत थी, लोग इज्जत करते थे। उन्हीं की कोशिशों से शरत को चुंगी पर नौकरी मिली। शरत को थोड़ा ठिकाना मिला, जीवन में कुछ स्थिरता आई। पर दुर्भाग्य से कुछ समय बाद मौसा जी भी बीमारी की चपेट में आ गए। देखते ही देखते वे काल-कवलित हो गए। शरत के लिए फिर परेशानियों का दौर शुरू हो गया।

यों बर्मा आकर भी शरत को चैन नहीं मिला। एक के बाद एक कई नौकरियाँ पकड़ना और छोड़ना। चित्त में चैन नहीं था और जीवन में स्थिरता भी नहीं थी। हाँ, उसने अब जमकर लिखना शुरू कर दिया था। उसका व्यक्तित्व जैसे जाग उठा। उसके भीतर की सोई हुई शक्तियाँ अँगड़ाई लेकर उठ खड़ी हुईं। वह औरों से एकदम अलग और विलक्षण लगता। बातें ऐसी कि लोग सुनते तो जादू हो जाता। समय का किसी को बोध ही न रहता था। इसलिए जहाँ भी वह जाता, उसका व्यक्तित्व सब पर छा जाता।

जल्दी ही शरत के बहुत मित्र और प्रशंसक बन गए। उसकी बातें और किस्से सुनने के लिए लोग बेसब्र थे, जिनमें जीवन के इतनी तरह के अनुभव थे कि सुनने वाले दंग रह जाते। वे समझ नहीं पा रहे थे कि यह कैसा शख्स है, जो हर पल किस्से-कहानियों की दुनिया में ही रहता है! इसके पास ऐसी अजब-अनोखी कहानियों का खजाना आया कहाँ से? क्या इसके भीतर कहानियों का कोई कारखाना है कि कहानियाँ कभी खत्म होती ही नहीं?

फिर शरत का सुनाने का ढंग भी तो लाजवाब था। सुनकर लोग मंत्रमुग्ध हो जाते। बड़े से बड़े लोग उसके प्रशंसक थे, तो बहुत छोटे-छोटे काम-काज करके जीने वाले एकदम मामूली लोग भी। वे हर पल उसे घेरे रहते। शरत की निकटता हर किसी को मोहती थी। लिहाजा देखते ही देखते हर ओर शरत के खुले स्वच्छंद व्यक्तित्व और उनकी रचनाओं की खूब चर्चा होने लगी थी—

“एक के बाद एक कई नौकरियाँ उसे मिलीं, लेकिन वे सब अस्थायी थीं। बीच-बीच में बेकार रहना पड़ता था। इस बेकारी का अर्थ था बाँसुरी बजाना, शतरंज खेलना, शिकार करना या फिर गेरुए वस्त्रों की शरण लेना। पौंगी बनकर वह अपनी चिरपरिचित दिशाहीन यात्रा पर निकल पड़ता। थक जाता तो फिर रंगून लौट आता। बर्मा में हर व्यक्ति को जीवन में एक बार पौंगी बनना ही होता है। उसकी अवधि सात दिन से लेकर जीवन-पर्यंत हो सकती है। इस वेश में उन्हें खूब सम्मान मिलता है और वे बहुत कुछ करने को स्वतंत्र होते हैं। चरस-सिनेमा कुछ भी वर्जित नहीं होता। इसलिए शरत को यह वेश धारण करने में कोई असुविधा नहीं होती थी। वैसे भी लंबे-लंबे बालों और दाढ़ी से उसे विशेष प्रेम था। बाउलों का वेश था न, सोचता होगा, बाउलों के वेश में एकतारा लिए गाता रहूँ, घूमता रहूँ।”

शरत जैसे-जैसे साहित्य में गहरे उतरते गए, दफ्तर के काम पीछे छूटने लगे। उधर कलकत्ता में उनके नाम की अजीब सी पुकार थी। लोग हैरानी से कह रहे थे, आखिर कौन है यह शरत जिसकी रचनाओं में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर जैसी अद्भुत कला और ऊँचाई है? यह कहाँ छिपा हुआ है, सामने क्यों नहीं आता? लोग बार-बार उसे कलकत्ता आने के लिए चिट्ठियाँ लिख रहे थे। आखिर दफ्तर छूटा और बर्मा भी हमेशा-हमेशा के लिए छूट ही गया—

“साहित्य में यश था, अर्थ था, लेकिन दफ्तर के कार्य की उपेक्षा अनिवार्य थी। वह अधिक परिश्रम करने का आदी नहीं था। स्वास्थ्य एकदम खराब था। उसने त्यागपत्र दे दिया। संभवतः उसकी एक वर्ष की छुट्टी शेष थी। वह उसने ली और कलकत्ते के लिए रवाना हो गया। उसके बाद वह फिर कभी बर्मा नहीं गया। लेकिन इतिहासकार इस बात को कैसे भूल सकेंगे कि कथाशिल्पी शरतचंद्र का पुनर्जन्म बर्मा में ही हुआ था। ‘श्रीकांत’, ‘चरित्रहीन’, ‘छवि और अधिकार’ सभी पर इस जीवन की अमिट छाप है। बर्मा-प्रवास में वह ऐसे ही व्यक्तियों के संपर्क में आया, जिनका बौद्धिक स्तर ऊँचा था, परंतु उसके अधिकतर साथी महत्त्वहीन और अजाने ही थे। उन्हीं के द्वारा प्रोत्साहन पाकर यह निर्धन, अर्द्धशिक्षित और आवारा युवक साहित्य के उस क्षेत्र में प्रवेश पा सका, जहाँ महानता उसकी प्रतीक्षा कर रही थी।”

जाहिर है, शरत जब बर्मा आया था, तो वह कुछ और था। एकदम महत्त्वहीन और खोया-खोया सा। एक गुमशुदा व्यक्ति की तरह। लेकिन जब वह बर्मा छोड़ रहा था तो एक तरह से उसने अपना कद पा लिया था, और खोई हुई दिशा भी, जो अब तक उसे भटकाती रही थी। यों शरत बर्मा से निकला तो अपने जीवन की बहुत सारी उलझी हुई गुत्थियों से भी वह धीरे-धीरे बाहर आ रहा था।

[6]

‘आवारा मसीहा’ के तृतीय पर्व ‘दिशांत’ में शरत के रंगून से लौटने के बाद की कथा है। विष्णु जी के शब्दों में, “जिस समय शरत ने कलकत्ता छोड़कर रंगून की राह ली थी, उस समय वह तिरस्कृत, उपेक्षित और असहाय था, लेकिन अब जब वह तेरह वर्ष बाद कलकत्ता लौटा तो ख्यातनामा कथाशिल्पी के रूप में प्रसिद्ध हो चुका था। वह अब वह नहीं रह गया था, वे के पद पर प्रतिष्ठित हो चुका था।”

सृजन के लिहाज से शरत का यह स्वर्ण काल था। इस समय उनकी अवस्था उनतालीस वर्ष की हो चुकी थी। आगे करने के लिए बहुत काम थे। मन में अधूरे सपनों का लंबा कारवाँ। लोग उन्हें देखने के लिए बेसब्र थे। खासकर कलाकारों और साहित्यिकों के मन में उनके लिए अपार सम्मान का भाव था। और आम लोगों में भी एक अजब सी रहस्यपूर्ण उत्सुकता और कुतूहल का भाव, कि जरा देखें तो ‘चरित्रहीन’ लिखने वाला यह दुस्साहसी लेखक है कैसा—

“उनके प्रति बंगाल के लोग कितने उत्सुक थे और किस प्रकार उनका स्वागत हुआ, यह तथ्य किसी भी साहित्यिक के लिए ईर्ष्या का कारण हो सकता है। नाटककार द्विजेंद्रलाल राय शरत के प्रशंसक थे, लेकिन उनके पुत्र दिलीपकार राय (जो बाद में संगीतज्ञ के रूप में मशहूर हुए) उनसे भी अधिक उसके भक्त हो चुके थे। चरित्रहीन के कारण शरच्चंद्र को जो बदनामी मिली, उससे वे और भी उनके हीरो बन गए। वे मन ही मन सोचते, वे कलकत्ता क्यों नहीं आते? ऐसे देश में क्यों पड़े हैं जहाँ लोग नाप्पि खाते हैं?”

साहित्य में एक सम्मानजनक स्थान बन जाने पर शरत ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में रहना शुरू किया। जब वे रंगून गए थे तो अपने छोटे भाई-बहनों को जैसे-तैसे रिश्तेदारों के घर छोड़कर चले गए थे। लौटकर वे सबसे मिले। उन्होंने पूरे परिवार की सुध ली। सबको इकट्ठा करने की कोशिश की। छोटा भाई उनके साथ रहने लगा। एक भाई रामकृष्ण मिशन में वृंदावन का काम देख रहे थे। वे भी जब कभी आते, शरत के पास ही ठहरते थे।

शरत के लिए साहित्यकार होने का मतलब केवल पन्ने काले करना ही नहीं था। उस समय देश और समाज के सामने एक से एक बड़ी चुनौतियाँ थीं। वह पराधीनता का काल था और अंग्रेजी दमन की कोई सीमा नहीं थी। शरत भला आँख मूँदकर इसे कैसे देखते रह सकते थे? उस समय चितरंजन दास और विपिनचंद्र पाल के जोशीले भाषणों से पूरे समाज में स्वाधीनता की लहर पैदा हो गई थी। कलकत्ता वासियों के जोश का भी पारावार न था।

शरत ने चितरंजन दास का साथ देने का निर्णय कर लिया। स्वयं चितरंजन दास भी उनकी बड़ी इज्जत करते थे। वे शरत को साथ लेकर घर-घर चंदा माँगने के लिए जाने लगे। कुछ लोग उदारता से चंदा देते, पर कुछ टरका देते। कभी-कभी दिन भर घूमने पर भी कुछ खास न मिलता। शरत उद्वेलित हो उठे। बोले, “छोड़िए, जनता में उत्सर्ग की भावना ही नहीं है।” इस पर चितरंजन दास ने समझाया, “बार-बार जनता के पास जाना हमारा काम है। इसी से लोगों में देशाभिमान और उत्सर्ग की भावना उत्पन्न होगी।”

यों शरत ने राजनीति का एक बड़ा मर्म समझा। धीरे-धीरे उनका लिखना-पढ़ना कम होता गया और वे पूरी तरह राजनीति में डूब गए। इससे घर के लोगों को चिंता हुई, मित्रों को भी। वे तो शरत से कुछ और ही उम्मीद कर रहे थे—

“शरतचंद्र उस समय आकंठ राजनीति में डूबे हुए थे। उनकी पत्नी और उनके सभी मित्र इस बात से बहुत दुखी थे। क्या हुआ उस शरतचंद्र का जो साहित्य का साधक था, जो अड्डा जमाने में सिद्धहस्त था, जो अभद्र भेलू और प्राणप्रिय पक्षी के लिए कुछ भी सहने को तैयार था।। राजनीति ने उस असली शरचचंद्र को ग्रस लिया था। लेकिन वे बिल्कुल भी लिखते न हों, ऐसी बात नहीं थी। शरत गंथावली के पाँचवें खंड के अतिरिक्त ‘नारी का मूल्य’ (संदर्भ) और ‘देना-पावना’ उपन्यास इसी काल में प्रकाशित हुए। ‘श्रीकांत’ का तीसरा पर्व, ‘पथेर दाबी’, ‘नवविधान’ और ‘जागरण’, ये चार उपन्यास भी उन्होंने इसी काल में लिखने आरंभ किए। उसी काल में प्रकाशित हुईं उनकी दो प्रसिद्ध कहानियाँ ‘महेश’ और ‘अभागी का स्वर्ग’।”

शरत के भीतर देश की आजादी के लिए जो भीषण हलचल मची थी, उसी की बड़ी दमदार अभिव्यक्ति है उनका उपन्यास ‘पथेर दाबी’, अर्थात ‘पथ के दावेदार’। जब इसके अंश पत्रिका के अंकों में सामने आने लगे, तो बहुतों का ध्यान गया। कुछ लोगों ने हैरानी प्रकट की। इसलिए कि ‘पथेर दाबी’ शरत के उपन्यासों की धारा से एकदम अलग तरह का उपन्यास है। पहली बार देश की स्वाधीनता के मतवाले शरत के यहाँ इतने प्रभावी रूप में सामने आए थे। विष्णु जी ने बिल्कुल सही लिखा है—

“‘पथेर दाबी’ उनके राजनीतिक विश्वास का प्रतीक है। अपने आवारा जीवन में उन्होंने अनेक देशों की जो यात्रा की थी, उसका अनुभव ही मानो उसमें संचित हुआ है। जिस समय वे इसे लिख रहे थे, उस समय उनके सामने बंगाल का क्रांतिकारी आंदोलन तो था ही, सुप्रसिद्ध रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की का उपन्यास माँ भी था।”

विष्णु जी ने शरत के साहित्य ही नहीं, उनके निजी जीवन की भी पड़ताल की। यहाँ तक कि उनकी घर-गृहस्थी की भी। हिरण्मयी देवी शरत की पत्नी थीं, जिनके बारे में बहुत तरह की बातें कही जाती थीं। उनका शरत के साथ विधिवत विवाह हुआ था या नहीं, इस पर मत-भिन्नता है। पर वे शरत की जीवन सहचरी थीं और शरत उन्हें बहुत प्रेम और आदर देते थे। विष्णु जी ने ‘आवारा मसीहा’ में शरत के उस भाव को शब्दों में बाँधने की कोशिश की है, जिसे अधिकांश लोगों ने नहीं समझा—

“हिरण्मयी देवी लोगों की दृष्टि में शरतचंद्र की पत्नी थीं या मात्र जीवन-संगिनी, इस प्रश्न का उत्तर होने पर भी किसी ने उसे स्वीकार करना नहीं चाहा। लेकिन इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि उनके प्रति शरत बाबू का प्रेम सचमुच हार्दिक था। अल्पशिक्षिता, अनेक बातों से अनभिज्ञ, सरलप्राणा ग्रामीण महिला हिरण्मयी शरतचंद्र की प्रतिभा की तुलना में कहीं नहीं ठहरती थीं। जब भी कोई उनसे शरत साहित्य के अमर नारी-पात्रों की चर्चा करता तो हँस पड़तीं, कहतीं, मैं मूर्ख भला उनको क्या जानूँ? तुम्हारे दादू ही जानते हैं।”

पर बहुत कम लोग यह समझ पाते थे कि हिरण्मयी देवी सिर्फ शरत की जीवन संगिनी ही नहीं, उनकी बहुत सी रचनाओं और पात्रों की प्रेरणास्रोत भी हैं। और यही नहीं, सीधी-सरल और निश्छल मन वाली हिरण्मयी देवी शरत की जीवनी शक्ति भी थीं, जिसकी ओर संकेत वे कई बार करते हैं।

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आखिरी दिनों में शरत बुरी तरह अस्वस्थ हो गए। न कुछ ठीक से खाते, न पचता। बहुत दुर्बल हो गए थे। कई तरह के इलाज के बाद भी उनकी तबीयत सँभल नहीं रही थी। हर कोई चिंतित था। शरत के पाठक हों, लेखक या मित्र, जिसने भी सुना, दौड़ा चला आया। विष्णु जी ने ‘आवारा मसीहा’ में इस दुख भरी स्थिति का भी बहुत सही चित्रांकन किया है—

“कुशल पूछने के लिए मित्रों का ताँता लगा रहता था। एक दिन असमंजस मुखोपाध्याय आए। देखा वही घर, वही द्वार, वही दालान, वही सामने का बगीचा लेकिन सब कुछ निरानंद। कुछ दिन पहले तक उन सबमें प्राणों का उत्साह था, माधुर्य का स्पर्श था। लेकिन अब वहाँ पर मानो प्राणहीनता की एक निष्करुण हवा चल रही थी। व्यथित मन से वे अंदर जाकर खड़े हो गए। वह मनहूस स्तब्धता बार-बार लौट जाने को कहती थी। लेकिन बिना मिले कैसे लौट सकते थे? कॉलबेल बजाने पर सुरेंद्रनाथ नीचे आए। जो समाचार उन्होंने दिया, वह अच्छा नहीं था।”

समय के साथ-साथ लग रहा था, मृत्यु निकट आ रही है। उसकी काली छाया ने सब कुछ ग्रस लिया था। घर के लोगों और मित्रों की आँखें मानो पथराने लगी थीं। सब बेबसी से बस उन्हें धीरे-धीरे मृत्यु पथ की ओर बढ़ते देख रहे थे—

“रात को डाक्टर की अनुमति से उमाप्रसाद उनके पास रहे। कुर्सी डालकर पास बैठ गए। रोगी की सेवा करने को विशेष कुछ नहीं था। कमरे के एक कोने में टिमटिमाता प्रकाश था। उमा बाबू की आँखों में नींद नहीं थी। एकटक वे उनकी ओर ताकते रहे। महामानव रोगशैया पर था। वह मत्यु पथ का राही था। शरीर रोग से थक गया था, लेकिन फिर भी वे पूरी तरह होश में थे।”

‘आवारा मसीहा’ में शरत के जीवन के आखिरी क्षण भी हैं। आत्मा में गूँजते एक करुण संगीत की तरह। और फिर प्रारंभ हुई साहित्य के उस अपराजेय शिखरपुरुष की शवयात्रा, जिसे पूरे राष्ट्र ने अश्रुपूरित आँखों से विदाई दी—

“उस दिन 16 जनवरी, रविवार, सन् 1938, तदनुसार 2 माघ 1344 बंगाब्द और पौष पूर्णिमा का दिन था। सवेरे के दस बजे भारत के अपराजेय कथाशिल्पी जनप्रिय साहित्यिक ने अंतिम साँस ली। उस समय उनकी आयु थी इकसठ वर्ष, चार माह।…शवयात्रा तीन बजकर पंदह मिनट पर आरंभ हुई। परिचालना का भार दक्षिण कलकत्ता कांग्रेस कमेटी ने ग्रहण किया। राष्ट्रीय पताका फहरा रही थी। जनता वंदेमातरम् और शरतचंद्र का जयघोष कर रही थी। मार्ग में न केवल सुभाषचंद्र बोस और सर आशुतोष मुकर्जी के घरों पर, बल्कि स्थान-स्थान पर अनेक संस्थाओं और अनेक कालेजों में शव पर मालाएँ चढ़ाई गईं…!”

वस्तुतः ‘आवारा मसीहा’ शरत की प्रमाणिक जीवनी ही नहीं, उन पर बहुत सूक्ष्म ब्योरों के साथ बनाई गई किसी सजीव फिल्म सरीखी भी लगती है, जिसमें आप शरत को विभिन्न मूड्स और स्थितियों में बोलते-बतियाते देखते हैं तो कभी एकदम चुप, उदास। कभी-कभी गंभीर चिंतन क्षणों में निमग्न। इसे पढ़कर वाकई शरत से मिल लेने जैसी गहन अनुभूति होती है। यही शायद ‘आवारा मसीहा’ की अपार लोकप्रियता का रहस्य भी है। कोई आश्चर्य नहीं कि सन् 1974 में प्रकाशित हुई शरत की जीवनी ‘आवारा मसीहा’ के दर्जनों संस्करण आ चुके हैं और इसकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ती ही जा रही है।

‘आवारा मसीहा’ का प्रकाशन निस्संदेह साहित्य जगत की एक बड़ी घटना थी। हिंदी के साहित्यिक भी अब बड़े गर्व के साथ कह सकते थे कि हिंदी में भी एक ऐसी जीवनी है, जिसमें एक उपन्यास सरीखी रोचकता है, महाकाव्य सरीखी गहराई है और जिसने इस विधा की सर्वोच्च ऊँचाइयों को छुआ है। अपने समय की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ ने ‘आवारा मसीहा’ के प्रकाशन पर उसका अभिनंदन करते हुए ठीक ही लिखा था—

“‘आवारा मसीहा’ के लेखक का हम सभी को हदय से कृतज्ञ होना चाहिए, जिन्होंने शरत के जीवन में छिपे हुए बहुमूल्य रत्नों को बड़े ही परिश्रम से खोजकर, हिंदी जगत् के आगे बड़े ही करीने से सँजोकर उपस्थित करके उक्त महालेखक के पुण्य प्रसंग नए सिरे से चलाने का अवसर हमें पदान किया है। यह जीवनी सचमुच साहित्य का एक गौरव-ग्रंथ है, जो विविध पाठकों को विविध पकार की प्रेरणाएँ देता है और जिसने बांग्ला पाठकों से भी अधिक हिंदी पाठकों के आगे शरत को निकटतर लाने में अभूतपूर्व सफलता पाई है। ‘आवारा मसीहा’ भारतीय साहित्य में एक घटना है।”

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प्रकाश मनु

प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,

मो. 9810602327,

ईमेल – prakashmanu333@gmail.com

झारखंडे राय : जिसकी अर्थी भी चंदे से उठी..!

 झारखंडे राय : जिसकी अर्थी भी चंदे से उठी..! / अरविंद सिंह 


० एक बार मंत्री, 3बार सांसद और 4 बार विधायक रहे इस जननेता ने आजादी के बाद भी 18 बार जेल यात्राएं की

० ब्रितानिया हुकूमत ने उन्हें 21 साल का कारवास की सजा दी थी.

@ अरविंद सिंह   #झारखंडेराय

"उन्हें मित्रों, परिचितों और सरकारों को चिट्ठियां लिखने का बहुत शौक था. चिट्ठियों के लिखने के उनके खास तरीके से सभी सम्मोहित हो जाते थे. उनकी चिट्ठियों में खास बात यह होती थी कि वह जिस स्थान से चिट्ठी लिखते, उस स्थान-विशेष के नाम का उल्लेख जरूर करते, जैसे यदि किसी ट्रेन में यात्रा के दौरान चिट्ठी लिख रहे हैं तो, उसमें ऊपर लिखतेंं.. " फलां ट्रेन से चिट्ठी..".

ईमानदार इतना कि दिल्ली में जब निधन हुआ तो उनके शव को गांव लाने भर के पैसे नहीं थे, और बेटे अशोक को लोगो से चंदा मांग कर उन्हें अमिला लाना पड़ा. शुभचिंतकों और मित्रों ने जब उनके बैंक खातों को खंगाला तो उसमें फूटी कौड़ी तक नहीं थी. यही नहीं

जिस जमीदार परिवार में पैदा हुए. 'जमीदारी प्रथा' के उन्मूलन के लिए शोषितों, मजदूरों, किसानों और वंचितों  को लेकर उन्हीं जमीदारों के विरुद्ध आंदोलन किए . कामरेड जय बहादुर के बाद आजमगढ़ में वामपंथी जमीन को सींचने और ऊर्वर करने वाले इस नेता का घर आज भी खंडहर से ज्यादा कुछ भी नहीं है, जबकि वह घोसी सीट से 3बार सांसद, 4 बार विधायक और चौधरी चरण सिंह के साथ खाद्य रसद मंत्री रह चुके था".

 दरअसल, बात हो रही है सादगी और ईमानदारी का दूसरा नाम 'झारखंडे राय' की. 

गुलाम भारत में पूरब की धरती आजमगढ़ के अमिला में 1914 में जन्म लेने वाले झारखंडे राय मेधावी, क्रांतिकारी और वैचारिक छात्र भी थे. शुरुआती शिक्षा गवर्नमेंट हाइस्कूल बस्ती, जुबली हाईस्कूल गोरखपुर होते हुए उच्च शिक्षा हेतु इलाहाबाद में इविंग क्रिश्चिशन कालेज और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया. यहाँ पर वे हिन्दुस्तान  सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (HSRA) और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी(RSP) में बड़े नेता के रूप में कार्य किया.

ब्रितानिया हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए उन्होंने 8 बरस का कारावास की सजा भी भोगी.

1938 में 'पिपरीडीह ट्रेन डकैती' कर अंग्रेजी खजाना लूटने वाले कामरेड जय बहादुर सिंह, कामरेड झारखंडे राय, मुक्तिनाथ उपाध्याय, कृष्णदेव राय, जामिल अली और इश्तेयाक आब्दी में से एक थे. 

बताया जाता है कि लूटकांड को अंजाम देने के लिए क्रांतिकारियों के इस गुट में जो बंदूक आयी थी, वह इश्तेयाक आब्दी की थी, जो अपने पिता की चोरी से घर से लेकर भाग आए थे. बाद में यही इश्तेयाक आब्दी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हुए. इन मामलों के अतिरिक्त 'गाजीपुर हथियार षणयंत्र केस', और 'लखनऊ षणयंत्र केस' में अंग्रेजी सरकार द्वारा झारखंडे राय को कुल 21 बरस की सजा हुई, लेकिन आजादी के बाद वे इन मामलों में रिहा हो गयें. यहीं नहीं आजादी के लड़ाई का यह नायक आजादी के बाद, आजाद भारत में भी गरीबों और मज़लूमों की आवाज उठाने के लिए 18 बार जेल गया. 

झारखंडे राय आजीवन किसानों और मजदूरों की लड़ाई लड़ते रहे.पूर्वाचल के सभी जिलों में साम्यवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार ही उनके जीवन का मिशन रहा. लोकसभा में उन्होंने जब भी कोई मुद्दा उठाया, वह गरीबों और किसानों से ही जुड़ा रहा.स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान वह किसान सभा की गतिविधियों से सक्रियता से जुड़े. सामन्तों और ब्रिटिश शासन के खिलाफ गांव-गांव में किसानों को एकजुट किया.1939 में गाजीपुर में किसान सभा के कार्यालय से पुलिस ने प्रतिबंधित साहित्य रखने के आरोप में पकड़ लिया.

1940-41 में गाजीपुर में देवरीकांड हुआ, जिसमें झारखण्डे राय को नजरबंद कर दिया गया.उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि जमींदार परिवार की थी.इसके बावजूद उन्होंने जमींदारी उन्मूलन के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया. इसके लिए जय बहादुर सिंह व सरजू पाण्डे के साथ किसान सभा के जरिए बड़ी संख्या में किसानों को जोड़ा.आंदोलन को आगे बढ़ाया.किसानों व आम लोगों में वह काफी लोकप्रिय थे.यही वजह थी कि वह लगातार चुनाव जीतते रहे.

सच कहें तो उनका पूरा जीवन ही सादगी भरा था। अपना काम खुद करना उन्हें पसंद था.यहां तक कि अपना कुर्ता-धोती भी वह खुद ही धोते थे.सूखने पर उसे तह करके तकिया के नीचे रख देते थे और एक दिन बाद उसे पहनते थे.किताबों से उन्हें बहुत लगाव था.काम करने के बाद मिलने वाला समय किताबों को देते थे.क्रान्तिकारियों पर कुछ किताबें भी लिखी थीं. जो इतिहास और राजनीति पर आधारित थी. उनमें से प्रमुख रूप से 'अगस्त विद्रोह', 'क्रांतिकारी जनवादी', 'भूमि सुधार और भूमि आंदोलन', 'गोपालन के नाम खुला पत्र', 'क्रांतिकारियों के संस्मरण', 'पंतशाही को चुनौती', 'भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन: एक विश्लेषण', तथा 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस' आदि थीं.

इतना ही नहीं वह कार्यकर्ताओं को किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित भी करते थे.

67 में चौधरी चरण सिंह की सरकार में जब उन्हें खाद्य मंत्री बनने का मौका मिला। इस दौरान उन्होंने गन्ना किसानों को लाभ दिलाने के लिए पूर्वाचल में चीनी मिलों की स्थापना का प्रयास किया। किसानों को अधिक से अधिक गन्ने की खेती के लिए प्रेरित किया. इस समय के लोग उनके चीनी को लेकर पूर्वांचल को प्रोत्साहित करने पर प्रायः चाय खानों और दुकानों पर जाकर बोलते सुने जाते कि- भाई! झारखंडी चाय पिलाओ.'  आखिर यह 'झारखंडी चाय' क्या थी.? दरअसल ईख वाले इस पूर्वी पट्टी में तूरपीन से राब यानि चीनी बनाने का चलन शुरू हुआ था. प्रायः बड़े दुकानदारों या बनियों के यहां यह मशीन रहती थी. चीनी बनाने की विधियों का तेजी से इस्तेमाल होना शुरू हुआ था- जिसको लेकर लेकर चाय में गुड़ या राब के स्थान पर चीनी का प्रयोग शुरू हुआ था. इस लिए इस चाय को झारखंडी चाय कहा गया.

दिग्गज कम्युनिस्ट नेता जयबहादुर सिंह के निधन के बाद पूर्वाचल में लाल झण्डे की कमान उनके हाथ में आ गई थी.

 लखनऊ में पेपर मिल कॉलोनी में रहते थे तो बिना किसी तामझाम के लोगों से मिलते थे.लोगों की मदद करने में वे कोई संकोच नहीं करते थे.उन्होंने कभी भी उसूलों से रत्ती भर समझौता नहीं किया. यही कारण है की चौधरी चरण सरकार में भूमिहीनों को भूमि वितरण में उनके विचारों से विभिन्नता होने पर सरकार के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.18 मार्च 1987 को यह जननेता भारत माता की गोद में हमेशा-हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सो गया. लाल सलाम कामरेड!!

गांव के लोग का दलित अंक 2021

 ‘गाँव के लोग’ पत्रिका का दलित विशेषांक (जनवरी-फरवरी, 2021) जून में प्रकाशित होकर आया है. 360 पृष्ठों का यह विशाल विशेषांक सुगठित है. अपने आकार में बड़ा होने के बावजूद यह व्यवस्थित अंक है. डॉ. एन. सिंह और अरुण कुमार Arun Kumar   के ‘अतिथि सम्पादन’ में निकला यह अंक पत्रिका के मूल सम्पादक रामजी यादव के कुशल प्रबंधन में प्रकाशित होकर हमारे सामने आया है.


 नौ आंतरिक खंडों में वर्गीकृत किया गया यह अंक अपने प्रतिनिधित्व के कारण ध्यान आकर्षित करता है. इसमें कई तरह के प्रतिनिधित्व को जगह दी गई है. विधाओं की दृष्टि से देखें तो इसमें साक्षात्कार, वैचारिक लेख, कहानी, उपन्यास-अंश, आत्मकथ्य, लघुकथा, कविता, नवगीत और समीक्षाएँ हैं. सभी उम्र के लेखक इसमें शामिल किए गए हैं. हिंदीतर भाषाओं में लिखित दलित साहित्य पर भी आलेख यहाँ पढ़ने को मिलेंगे. स्त्री-पुरुष और दलित-गैरदलित लेखकों से सजा यह अंक कुल मिलाकर अपने व्यापक प्रतिनिधित्व के कारण अच्छा लग रहा है. 


 साक्षात्कार वाले हिस्से में जो बातचीत दर्ज हैं उनमें पर्याप्त खुलापन है. माता प्रसाद, मूलचंद सोनकर, मलखान सिंह, चौथीराम यादव Chauthi Ram Yadav , जयप्रकाश कर्दम Jai Prakash Kardam , असंगघोष Asangaghosh Asangaghosh  आदि से की गयी बातचीत में जीवंतता का बहुत ख्याल रखा गया है. वैचारिक निबंधों की भाषा में भी परिपक्वता दिखायी पड़ रही है. 


 एक बात का उल्लेख आवश्यक है कि डॉ. धर्मवीर की मृत्यु के बाद आया हुआ यह दलित विशेषांक कुछ दूसरी बातों की तरफ भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है. मेरा आशय कुछ इस तरह की बातों से है – 


(क) भाषा की तल्खी में कमी आयी है. जैसे – कँवल भारती ने ‘राम की शक्ति-पूजा’ को द्विज मनोभाव की कविता बताते हुए कविता से प्रमाण दिए हैं मगर भाषा को ज्यादा तल्ख होने नहीं दिया है. 


(ख) एकमात्र अपनी बात को सही मानने की प्रवृत्ति में भी काफी कमी आयी है. कर्मानंद आर्य  Drkarmanand Arya  के लेख को पढ़ा जा सकता है जहाँ उन्होंने अत्यंत धैर्य के साथ अपनी असहमतियाँ दर्ज की हैं.


(ग) दलित और गैर-दलित के बीच जितने सख्त आग्रह पहले दिखायी पड़ते थे, वैसी छवि इस अंक की नहीं बनती है. यह अंक दलित साहित्य को हर तरह के प्रतिनिधित्व से जोड़ने का प्रयास करता हुआ प्रतीत होता है.


(घ) इस अंक को दलित लेखकों के किसी एक गुट तक सीमित करके भी नहीं देखा जा सकता है.


(ङ) ऐसा लगता है कि दलित साहित्य पूर्णतः स्थापित होकर यहाँ प्रस्तुत हुआ है. मेरा आशय यह है कि डॉ. धर्मवीर के दौर तक ‘अपने और अन्य’ के साथ जो संघर्ष चल रहे थे उन संघर्षों को परिणति प्राप्त हो चुकी है. किसी तरह का तीखा या विध्वंसक विवाद इस अंक में दिखायी नहीं पड़ता है.


 डॉ. धर्मवीर ने कई तरह के विवादों से संघर्ष करते हुए दलित लेखन को गति दी थी. उनका साहित्यिक-वैचारिक संघर्ष आत्मसंघर्ष भी था जो उन्हें अंततः आत्मोत्पीड़न तक ले गया था. उनके बाद का यह दौर दलित साहित्य की तीखी गति का दौर तो नहीं है, मगर वैचारिक रूप से आत्मविश्वास से भरा हुआ है. 

 ‘गाँव के लोग’ ने एक सन्नाटे को तोड़ा है और दलित साहित्य को व्यापक मंच पर प्रस्तुत किया है. इसमें हर तरह का धैर्य दिखायी पड़ता है और दलित साहित्य की अहमियत को एक बार फिर से व्यक्त करने का विवेक भी.

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गाँव के लोग (जनवरी-फरवरी, 2021) 

अतिथि सम्पादक – डॉ. एन. सिंह, अरुण कुमार 

सम्पादक – रामजी यादव, 9479060031, 9454684118