गुरुवार, 4 जून 2020

माटी की गंध से लबरेज रिपोर्टिंग की यादें / त्रिलोकदीप




दिनमान के संपादक रघुवीर सहाय ने मुझे एक के बाद एक ऐसे असाइनमेंट दिये जो लंबी दूरी के हुआ करते थे और उनकी बदौलत पूरे राज्य का कमोबेश दर्शन हो जाया करता था। निकलते तो थे हम एक स्टोरी के लिए, मिल जाती थीं तीन चार स्टोरियां।मसलन गया तो मैं लद्दाख कवर करने के लिए  था, मुझे जम्मू कश्मीर के बहुत से संवाद मिल गये। इसी प्रकार बिहार के लिए मुझे भूदान के बारे में  संवाद तैयार करने थे, लिख मैंने कई इतर संवाद भी दिये जो खासे सराहे  गये। पटना में मेरे साथ थे जुगनू शारदेय, जो उस समय दिनमान के लिए लिखा करते थे। उन्होंने  मेरी मुलाकात रेणु जी से करायी। रेणु जी ने  मुझे सलाह दी कि मैं सहरसा और पूर्णिया में बिहारी सिखों से मिलूं और हो सके तो बिराटनगर का एक चक्कर भी लगा आऊं। बहुत बढ़िया सुझाव था। भूदान आंदोलन से जुड़े दो युवक सुधेन्दु पटेल और कुमार प्रशांत भी मिले जिन्होंने भूमि वितरण के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां दीं। अब मुझे राजस्थान में खादी ग्रामोद्योग के विस्तृत दौरे का दायित्व मिला। कार से ही आना जाना था। कमोबेश सारे राजस्थान का ही दौरा था। कई समाचार पत्रों के औऱ पत्रकार भी साथ में थे। मैं खुशकिस्मत था कि मुझे साथ मिला हिंदुस्तान टाइम्स के राज गिल का। उन्हें मैं पढ़ता रहा हूं और उनकी विद्वता से भी थोड़ा बहुत परिचित था।

दिल्ली से हम सभी पत्रकार साथ साथ निकले। हर कार में पत्रकारों के साथ खादी ग्रामोद्योग का एक अधिकारी भी था। वह रास्ते भर हमें ब्रीफ करता रहा। जयपुर में हमारा पहला पड़ाव था। वहां पर एक मंत्री टाइप के व्यक्ति ने अंग्रेज़ी में संबोधित करने का प्रयास किया। राज गिल समझ गये कि अंग्रेज़ी बोलने में इन्हें दिक्कत हो रही है।  उन्हें सहज करते हुए गिल जी ने कहा , आप हिंदी में बोलिये हम सब समझ जायेंगे। उन्होंने खादी के अनुसंधान, निर्माण, विकास और मार्केटिंग की विस्तृत जानकारी दी। अगले दिन सुबह हमें कोई ऐसे स्थान दिखाने थे जहां से कच्चा माल प्राप्त करके उसे  फिनिश करने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी देनी थी। इस पहले प्रोग्राम के बाद हमें जयपुर घूमना था। उनकी तरफ से भी प्रबंध था और हमें अपनी मनमर्जी की भी छूट थी। जयपुर में समाचार एजेंसी के सतीश जुगरान से भी मुलाकात हो गयी। वह भी हमारे साथ हो लिये। राज गिल ने नेशनल हेराल्ड के मुसद्दीलाल रस्तोगी को फोन लगाकर लोकल द्रव्य का इंतज़ाम करने को कहा। वह भी हमें मिलने के लिए आ गया। वह जो सामान लाया था उसे हमने रास्ते के लिए रख लिया। मुसद्दीलाल के साथ जयपुर में  रसपान किया और डिनर भी। अगले दिन सुबह तैयार होकर जब हम लोग कच्चा माल देखने के लिए पहुंचे तो हमें रूई के ढेर दिखाए गए जिनसे खादी तैयार होती है। बातचीत चली। दूसरे साथियों से मुलाकात हुई और हम अगले पड़ाव के लिए निकल पड़े। जोधपुर में लंच लिया। तय हुआ कि बालोतरा और बाड़मेर के बीच रेगिस्तान के बीच रात गुजारी जाएगा। मैं और राज गिल रेत के एक टीले के पास जाकर जम गये। चांद की चांदनी खूब सुकून प्रदान कर रही थी। हम दोनों द्रव्य पान कर रहे थे और चांद के रेत पर पड़ने वाले प्रतिबिंब को निहार रहे थे। मुझे लगा राज गिल अपनी सृजन की दुनिया में खो गया है। मैं जानता था कि वह बहुत पायेदार लेखक है और उनका अंग्रेज़ी और पंजाबी पर समान अधिकार है। थोड़ी देर में बोले, देखो दीप यह चांद का रिफ्लेक्शन। यार आंधी आने पर ये रेतीले टीले कहाँ गायब हो जाते होंगे। खो जाने पर यहां के लोग एक दूसरे को कैसे तलाशते होंगे। उनके दिमाग में कई तरह के प्लाट घूमने लगे थे। इतने में खाने का पैगाम आ गया। भोजन के बाद विश्राम किया और सुबह उठकर बाड़मेर। वहां खादी ग्रामोद्योग का काम देखने के बाद गदरा रोड का रेलवे स्टेशन देखा जो 1965 में पाकिस्तान युद्ध के दौरान हमारे कब्जे में आ गया था। बाड़मेर में एक पाकिस्तानी टैंक भी था जो निशानी और अपने शूरवीरों के शौर्य के प्रतीक के तौर पर वहां रखा गया था। वहां से हम लोग  जैसलमेर, बीकानेर, उदयपुर आदि से होते हुए दिल्ली लौटे थे। खादी के अलावा मेरे पास राजस्थान के जनजीवन, कला, हवेलियों के निर्माण और उसकी कला, राजस्थान के स्मारकों का महत्व और पयर्टन जैसे तमाम विषय थे जिन पर मैंने आलेख तैयार किये थे।

इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि राज गिल थी। क्या ज़हीन और प्यारा इंसान। धीमे धीमे बोलने वाला, ठेठ पंजाबी बंदा। अपनी माँ बोली से बहुत प्यार। उनकी लेखनी में एक अजब तरह की लय होती है जो एक अलग तरह का एहसास कराती है। उनकी रिपोर्टिंग कभी भी आपको शुष्क नहीं लगेगी। चाहे वह डिफेंस पर लिखें, कृषि पर या अन्य किसी विषय पर उनकी बौद्धिक और साहित्यिक छाप दीख ही जाएगी। एक बार उनसे मिलने के लिए उनके आफिस में गया तो उन्होंने मेरी मुलाकात प्रभा बहल से कराते हुए कहा था कि यह हमारे दफ्तर की शेरनी है, मजाल है कोई इससे पंगा ले। उसने जवाब में कहा था कि गिल साहब हमारे मार्गदर्शक हैं, इनकी रिपोर्टें पढ़ने में मज़ा आता है।हम लोगों के आदरणीय हैं। बाद में वह प्रभा दत्त हो गईं। उनकी शादी एस .पी. दत्त से हुई । वह एयर इंडिया में थे और मेरे मित्र। अक्सर दिनमान में मुझसे मिलने आया करते थे । एक बार मैं एयर इंडिया पर कोई स्टोरी कर था तब भी वह आये थे। आज भी वह मेहरबान हैं।

राज गिल के साथ मुलाकातों का दौर जारी रहा।कभी मैं उनके घर कीर्तिनगर चला जाता या वह कभी हमारे तब के घर सुदर्शन पार्क आ जाते। हम लोगों के बीच लिखने पढ़ने पर ही चर्चाएं हुआ करती थीं। कभी कभी सामाजिक मुद्दों और मसलों पर भी बातचीत हो जाती। एक बार उन्हें कुछ समय के लिए हिंदुस्तान टाइम्स के ईवनिंग न्यूज़ की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई । उन्हें लगता था कि यहां बैठ कर उनकी सृजनात्मक सोच कुंद हो रही है। मन की तस्सली के लिए वह मुख्य पत्र में लिख ज़रूर लेते थे लेकिन इवनिंग न्यूज़ में वह असहज महसूस किया करते थे। आजभी उनकी धीर गंभीर और मौलिक सोच और ईमानदाराना सलाह की बहुत याद आती है।उनकी सुनहरी यादों को नमन।



शानदार संपादक निहाल सिंह की याद में / त्रिलोकदीप






मेरे पुराने मित्र औऱ शालीन पत्रकार तथा कई अंग्रेज़ी दैनिक समाचारपत्रों के एडिटर रहे एस.निहाल सिंह जिन्हें मैं सुरिंदर जी कहा करता था से कई यादगार मुलाकातें हुई।  7 अक्टूबर, 1980 को बोन के इंसेल होटल से ब्रेसेल्स जाने के लिए जब मैं चेकआउट कर रहा तो लॉबी में मैं सुरिंदर निहाल सिंह को देखकर चौंक गया। दुआ सलाम के बाद जर्मनी आने का सबब पूछा तो बताया कि आपको चुनाव कवर करने के लिए पश्चिम जर्मन सरकार ने आमंत्रित किया था और मुझे सरकार बनने के बाद चुनाव का विश्लेषण करने के लिये। मतलब यह जर्मन सरकार दुनिया को यह बताना और जताना चाहती थी कि हमारे यहां चुनाव से लेकर सरकार गठन करने तक किस तरह की पारदर्शिता बरती जाती है। फिर हंस कर बोले मैं इस इंतज़ार में था कि कब आप कमरा खाली करें और मैं वहां दाखिल होऊं। गले मिलने के बाद फिर मिलने का वादा कर मैं एयरपोर्ट के लिए निकल गया।

मेरा अगला पड़ाव ब्रेसेल्स था। बोन से जिस विमान पर मैं सवार हुआ वह छोटा सा था। उसमें न कोई एयर होस्टेस और न ही कोई चाय पानी पूछने वाला था। विमान ऐसे हिचकोले खा रहा था कि अब गिरा कि तब गिरा। बहरहाल वह ब्रेसेल्स एयरपोर्ट पर सकुशल लैंड कर गया।  मैं कमीशन ऑफ यूरोपियन कम्युनिटी का मेहमान था। वहां से टैक्सी लेकर मुझे होटल पहुंचना था। पहुंच गया। अब अगले कार्यक्रम से अनजान होने पर जर्मनी में मिले बेल्जियम के मित्र हर्स्ट कोलमैन को फोन लगाया। वह होटल पहुंच गए, कमीशन की लापरवाही की तरफ1से माफी मांगने लगे। यह वहां की तहज़ीब है, इसमें बेचारे कोलमैन का क्या कसूर। बहरहाल उन्होंने मुझे ब्रुसेल्स घुमाया, अपने घर ले गये, परिवार से मिलवाया और वॉटरलू दिखाया जहां नेपोलियन द ग्रेट पराजित हुआ था।सारी दुनिया को जीतने का संकल्प करने वाले नेपोलियन का पराजय स्थल  वॉटरलू ब्रुसेल्स से बाहर है। वहां एक कुएं में नेपोलियन के अस्त्र शस्त्रों के साथ साथ कई यादगार स्मृतियों को सहेज कर रखा गया है।ब्रुसेल्स के बाद मैं लंदन में रहा काफी दिनों तक। मेरा मित्र वेद मित्र मोहला हीथ्रो एयरपोर्ट तक मुझे छोड़ने के लिए आया। वेद और उसकी पत्नी तोशी मेरे आम तौर पर मेज़बान होते हैं जब मैं निजी यात्रा पर लंदन जाता हूं। वेद दिल्ली का रहने वाला है, बाल साहित्यकार है और पेशे से इंजीनियर है।

वेद तो छोड़ कर चला गया। विमान में जब प्रवेश किया तो एक बार फिर हैरानी मेरा इंतज़ार कर रही थी। थोड़ी देर में क्या देखता हूं कि सुरिंदर निहाल सिंह मेरी सीट की बगल सीट पर बैठे हैं। हाथ हिला कर एक दूसरे का अभिवादन किया। फिर एयर होस्टेस से निवेदन कर एक साथ बैठने का इंतज़ाम कर लिया। उन्होंने जर्मन लोकतंत्र की गरिमा बताते हुए कहा कि कैसे एक बार फिर बिना ज़्यादा दिक्कत के एसपीडी और एफडीपी की गठबंधन सरकार बन गई है।उन्होंने ने जर्मन चैरित्रिक खूबी बयान करते1हुए बताया कि 1973 में विली ब्रांट की सरकार एक वोट के बहुमत से सत्ता में आई थी लेकिन क्या मजाल किसी ने दलबदल कर सरकार गिराने की हिम्मत की हो।  मई  1974 में ब्रांट को अपनी यूरोपीय शांति का खामियाजा इस मायने में भुगतना पड़ा कि उनके स्टाफ में कोई ऐसा व्यक्ति भर्ती हो गया जो पूर्वी जर्मनी का जासूस था। इस बात का इल्म होते ही ब्रांट ने तुरंत अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसे कहते हैं राजनीतिक चरित्र। हम लोग बातें भी कर रहे थे और खा पी भी रहे थे। मैं ने उन्हें अपनी बेल्जियम यात्रा और वॉटरलू के बारे में जानकारी दी। इनके अलावा भी बातों का दौर चलता रहा। हम लोग सारे रास्ते पंजाबी में ही बातचीत करते रहे। पता ही नहीं चला कब हम दिल्ली पहुंच गये।

एस. निहाल सिंह से मेलजोल दिल्ली में भी जारी रहा। कभी इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मिल जाते तो कभी मैं उनके घर भी चला जाता । वह प्रेस क्लब भी आया करते थे। उन्हें किसी तरह का गुमान नहीं था। वह बहुत ही ज़हीन और प्यारे इंसान थे। एक बार संडे मेल का प्रबंधन अंग्रेज़ी संडे मेल के लिए नये एडिटर की तलाश कर रहा था।मुझ से जब सलाह ली गयी तो मैंने एस.निहाल सिंह का नाम सुझा दिया। उन्हें भी यह नाम रुचता दीखा उन्हें यह पता तो था ही कि सुरिंदर निहाल सिंह बहुत धाकड़ एडिटर है। उसने इमरजेंसी की परवाह नहीं की थी और जमकर उसके खिलाफ लिखा था।वह पहला पत्रकार था जो पाकिस्तान में रहते हुए दमदार रिपोर्टिंग किया करता था। मोटा मोटी मैंने उन्हें अंग्रेज़ी संडे मेल की एडिटर शिप के लिए तैयार कर लिया था। बाद में पता नहीं चला प्रबंधन से उनकी क्या बातचीत हुई। इस बाबत न उन्होंने बताया और न ही मैंने पूछना उचित समझा । लेकिन जब हिंदी संडे मेल की लोकार्पण पार्टी हुई तो मेरे आग्रह पर वह उसमें शामिल हुए। उनके साथ मेरा यह चित्र उसी  वक़्त का है। हमारी मुलाकातें जारी रहीं। उनकी पत्नी के निधन के बाद वह उदास रहने लग गये थे। उसी गम में ही हमें वह छोड़ कर चले गये। सुरिंदर के पिता गुरुमुख निहाल सिंह दिल्ली के पहले सिख मुख्यमंत्री थे 1955 से 1956 तक। बाद में वह राजस्थान के राज्यपाल भी रहे। गुरुमुख निहाल सिंह के बाद जब सरदार हुकम सिंह को राजस्थान का राज्यपाल बनाया गया तो राजनीतिक क्षेत्रों में कहा जाने लगा कि लगता है राजस्थान को सिख राज्यपाल अधिक रास आता है। वह शायद इसलिए भी कि सरदार हुकम सिंह के बाद जोगेंद्र सिंह राजस्थान के राज्यपाल बनाये गये थे। बेशक़ आज भी सुरिंदर निहाल सिंह की बहुत याद आती है। उनकी याद को सादर नमन।

केहू नईखे बोलत बा / रामबचन यादव







कोरोना काल की पीड़ा


काल चक्र ई अइसन सबके,चढ़ल कपारे डोलत बा।
बड़काभइया शहर सेआइलन, केहू नईखे बोलत बा।।

बॉम्बे जइसन शहर में उनकर,
चढ़ल   जवानी   बीत   गइल,
उनहीं   के  पैसा   से    हमारे,
घर  कै  पक्की   भीत   भइल,
लमवैं से अब छोटका बड़का, सबही मेथी छोलत बा।
बड़काभइया शहर सेआइलन, केहू नईखे बोलत बा।।

पांव में छाला पड़ल बा उनके,
अखिया   जइसे   जागल   बा,
बांम्बे    से   पैदल   अइले  में ,
सोरह   दिनवां     लागल   बा,
बड़े प्यार से बोलत बाड़े ,
मुंहवां केहु ना खोलत बा।
बड़काभइया शहर सेआइलन, केहू नईखे बोलत बा।।

बड़कीभउजी  मुहां तोपि के,
कलुआ के समझावति बाड़ी,
अबहिन पजरे  मत जाइहे तै,
ओके आंखि देखावति  बाड़ी,
अइसन पापी हवे कोरोना,
रिश्ता में विष घोलत बा।
बड़काभइया शहर से आइलन, केहू नईखे बोलत बा।।

टिबुले वाली  मडई  में अब,
भइया     कै   चरपाई    बा,
मास मांछी के छोड़ि उहाँ ना,
केहु   कै    आवा जाही   बा,
कहैं "लाल" ई मनवां हमरा भितरैं भीतर खउलत बा।
बड़काभइया शहर सेआइलन, केहू नईखे बोलत बा।।

● अज्ञात

रवि अरोड़ा की नजर में.....





खाँचों में बँटी संवेदना

रवि अरोड़ा


केरल के मलप्पुरम जिले में पटाखों से भरा अनानास खिला कर की गई एक गर्भवती हथिनी की निर्मम हत्या से पूरे देश में उबाल है । ग़म और ग़ुस्से से सोशल मीडिया के तमाम माध्यम भरे पड़े हैं । इस हत्या ने राज्य और केंद्र सरकार को भी आवेश में ला दिया है । केंद्रीय वन मंत्री प्रकाश जावडेकर , पशु प्रेमी और सत्ता पक्ष की सांसद मेनका गांधी और केरल के मुख्यमंत्री विजयन समेत तमाम नेताओं के ग़ुस्से भरे बयान आये हैं । इस हथिनी की मौत है ही इतनी दर्दनाक कि कठोर हृदय व्यक्ति का भी दिल भर आएगा । मुझे भी यह हत्या बेहद नागवार गुज़री । वैसे यह देख कर थोड़ा संतोष भी हुआ कि हम लोगों की संवेदनाएँ अभी मरी नहीं हैं और किसी मासूम का दर्द अब भी हमसे देखा नहीं जाता । हालाँकि हैरानी भी हुई कि एक जानवर की मौत पर जो आँसू गिरे वे इंसान की मौत पर क्यों पलकों पर नहीं आते ?  लॉकडाउन की वजह से जो सैंकड़ों लोग मरे उनके लिए भी यदि लोग बाग़ एसे आँसू बहाते तो शायद थोड़ी राहत महसूस होती । हथिनी की मौत पर आवेश में आये मंत्री-मुख्यमंत्री इंसानों की मौत पर यदि कोई बयान देते तो शायद इनके इस दुःख पर भी एतबार होता ।

मानवीय संवेदनाओं की भी ग़ज़ब कहानी है । उसकी राह में अनेक तरह के फ़िल्टर लगे हुए हैं । जानवर की मौत पर बेशक हमारी संवेदना जागती है मगर इंसान की मौत को राजनीति के चश्मे से देखती है । ग़रीब मज़दूरों के सड़कों और रेल की पटरियों पर भूखे-प्यासे मरने पर यदि हमारी संवेदना उपस्थित हुई तो उससे फ़लाँ पार्टी का नुक़सान होगा या फ़लाँ का फ़ायदा होगा अतः हमारी संवेदना कहीं छुप जाती है । हथिनी की मौत पर गमगींन हुए लोगों में उन लोगों की गिनती भी कम नहीं है जो दावा करते हैं कि लाक़डाउन में क़हीं कोई आदमी नहीं मरा और घर घर घी के दीये आजकल जल रहे हैं । जीवन में कदम कदम पर हमारी संवेदना खाँचों में बँट कर हाज़िर होती है । अब चूँकि इस हथिनी की मृत्यु पर उपजी संवेदना के मार्ग में कोई रुकावट नहीं है अतः इस पर हर कोई निर्बाध  दुःखी हो रहा है । अजब सूरत है कि संवेदना एक ही परिस्थिति के भिन्न भिन्न रूपों में भी हो सकती है । मरने वाला अपने धर्म का है तो संवेदना जगेगी और यदि दूसरे धर्म का है तो यह मौत जुगुत्सा जगाएगी । मरने वाले की जाति, लिंग और रंग भी तय करने लगते हैं कि संवेदना की अभी ज़रूरत है अथवा उसे आराम करने दें। अमेरिका के दंगे या यूँ कहें दुनिया के तमाम दंगे इसका उदाहरण हैं । हिंदू-सिख माँसाहारी लोगों की संवेदना हलाल मीट पर तो सहज जग जाएगी मगर यदि मीट झटका है तो संवेदना सुस्ता सकती है । ईद पर जानवरों की क़ुरबानी पर हमारी संवेदना होश में आ जाएगी और हमें चहुँओर ख़ून ही ख़ून दिखने लगेगा मगर साल के बाक़ी 364 हम स्वयं मीट शाप पर जाकर तय कर सकते हैं कि बकरे का फ़लाँ हिस्सा देना अथवा फ़लाँ मत देना । मच्छर , मक्खी, कीड़े-मक़ौड़े और चूहे आदि तो ख़ैर हमारी संवेदना के दायरे में आते ही नहीं । दोनो दूध देती हैं मगर गाय और भैंस भी हमारी संवेदनाओं का अलग अलग कोना पकड़े बैठी हैं ।

कई बार तो लगता है कि हम सबके भीतर एक मेनका गांधी है जो जानवर की मौत पर तो दुःखी होती है मगर इंसान के जीने मरने से उसे कोई सरोकार नहीं है । पिछले दो महीने से एसी हज़ारों घटनाएँ सामने आई हैं जो सौ सौ हथिनीयों की मौतों के बराबर हैं । मुल्क में जितने लोग हैं , उतने ही तरह के दुःख हैं । करोड़ों लोगों का जीवन अब वैसा ख़ुशहाल नहीं रहेगा जैसा कोरोना काल से पहले था । मगर खाँचों में बँटी हमारी संवेदना मन मुताबिक़ घटनाओं की तलाश में भटकती रहती है । यक़ीनन इस गर्भवती हथिनी ने हमें यह अवसर प्रदान किया है जिसमें हम ख़ुद को बता सकें कि हमारे सीने में भी दिल है । इस हत्या पर ट्वीट करके हम अपने लोगों को भी अब जता सकते हैं कि जनाब हम भी सहृदय इंसान हैं।

बुधवार, 3 जून 2020

गाँव में ही है जीत की चाभी / आलोक कुमार





गांव से ही निकलेगा जीत का रास्ता
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अजीब खौफ था। सबकुछ बंद कर दिया गया। अच्छी बात है। हौले से हदस निकल रहा है। चरैवेति चरैवेति। कोरोना अब सम्हलकर जीना सीखा देगा। धीरे धीरे सब खुल रहा है। हम सामान्य जीवन की तरफ बढ रहे हैं।

इस दौरान मजदूरों के साथ सबसे अधिक अनर्थ हुआ। अंतहीन दुर्दशा की तस्वीरें  विह्वल करती रहीं। सब कर्मयोगी थे। कांपता हृदय पुकारता रहा, कर्मयोगियों के साथ वक्त को न्याय करना चाहिए। मजदूरों की दारुण दशा सभ्यता को वर्षों रुलाती रहेगी। रोकर ही सही हमें सबक सिख लेना चाहिए।

खबर है कि मजदूरों की वापसी का रुझान खत्म हो रहा है। ज्यादातर जैसे तैसे गांव पहुंच गए। जो रास्ते में हैं, उनके सुरक्षित वापसी की कामना है। इनके जरिए गांवों  तक शहर की एक से एक कहानियां पहुंच रही है। ज्यादातर दिल दहलाने वाली, तो कुछ ज्योति कुमारी जैसो की लोमहर्षक कहानियां भी हैं। जीत की ये कहानियां ही भविष्य की इबारत लिखेंगी।

कर्मयोगियों की कहानियों के तनाव के बीच बचपन में रटी एक कविता लब पर भिनी सी मुस्कान ले आई। गुनगुना रहा हूं। हो सके तो आप भी सुनिए - एक चिडिया के बच्चे चार। घर से निकले पंख पसार। उत्तर से दक्षिण हो आए। पूरब से पश्चिम हो आएं। घर लौटकर बोले। मां ! देख लिया जग सारा। सबसे अच्छा-सबसे उत्तम है घर हमारा।

इन कविता में हमारे सनातन संस्कार सन्निहित हैं। इसे भूलकर हम शहरों की भुलभुलैया में जा फंसे। अच्छा है,  सामर्थ्यवान लोग गांव लौटे हैं। साथ में संकल्प लौटा है। खुद को आबाद करने का संकल्प। गांव को गरीबी से निकालने का संकल्प। इनकी सफलता की संभवना पर अभी सवाल नहीं। मजदूरों का गांव-घर सच में सबसे उत्तम साबित होने जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कहे मुताबिक भारत के भविष्य की इबारत अब गांव से लिखी जानी है। अगर ऐसा होता है, तो अद्भूत होगा। भारत में कुल 6.28,221 गांव हैं। इनमें से दो-चौथाई भी उठ खडे हुए। ये आत्मनिर्भर बनने की धुन में लग गए, तो गरीबी को घुन लगा देंगे। दुनिया का भविष्य भारत की मुट्ठी में होगा।

कोरोना विपदा से सबसे ज्यादाग्रस्त उत्तर प्रदेश रहा। उत्तर प्रदेश के लोग सदियों से दूर देश जाने और बसने के आदी हैं। उनमें से कई त्रिनिदाद, फिजी, सूरीनाम  में बसकर रह गए। उनके पास वापसी का विकल्प नहीं था। पीढियों से मुंबई-दिल्ली-मद्रास-कोलकाता को आबाद करने में लगे उत्तर प्रदेश में 1.07,753 गांव हैं। इन गांवों में पहली बार लोग बड़ी संख्या में शहर देखकर लौट आए हैं।

अगर गांव लौटे ये लोग राज्य की अर्थव्यवस्था की ताकत बन गए, तो कल्पना कीजिए। नोएडा- ग्रेटर नोएडा की जरुरत कम हो जाएगी। क्या से क्या हो जाएगा। इसी तरह गरीबी की मार झेल रहे बिहार में 45,100, तो झारखंड में 32,623 गांव हैं। इनदोनों राज्यों की गांवों में महानगरों से भागकर सबसे ज्यादा लोग लौटे हैं। इनके पास शहरों की आबादी के कई गुण हैं। अपनी तरक्की के लिए उनका इस्तेमाल गांवों में होना है। आंध्र प्रदेश में 55,429 और महाराष्ट्र में 44,198 हैं। इनको सिर्फ मजदूर नहीं रहना है। अपने गांव की सूरत बदलनी है। इसके लिए सरकार को खड़ा रहना होगा।

उलट पलायन से इन हरेक गांव तक शहरों की कहानियां पहुंची है। उनके कथित विकास का सलीका पहुंचा है। जान बचाकर लौटते लाखों कर्मयोगियों ने एक एक पग पार करते हुए कुछ करने की जिद ठानी है। ऐसी ही जिद बंटवारे के समय पश्चिम पंजाब, सिंध , पूर्वी बंगाल और बलूचिस्तान से लौटे लोगों ने कभी ठानी थी। उसका असर हुआ। सत्तर साल का इतिहास है कि विकट हालत में फंसे ज्यादातर परिवारों की हालत में जमीन- आसमान का बदलाव आ गया।

इसबार यह जिद गांव में रहने की है। गांव में फिर से बसने की है। जिद की चली तो गांव आबाद होगा। उसे विकसित होने से कोई रोक नहीं सकेगा। नकारात्मक बात करें तब भी इनमें से सब न सही कुछ ही अपनी  जिद पर अमल करने में सफल हुए, तो यह कोरोना गांवों के लिए उपहार बन जाएगा।

वैसे भी गांव के उदय के मिसाल की कमी नहीं है। देश में अन्ना हजारे के रालेगन सिद्धि से लेकर बहुतेरे तपस्वियों के गांव हैं। वहां के मजदूरों ने तप से तस्वीर बदल दी है। गांव को स्वावलंबी बनाया है। जाहिर है शहरी हवा पानी पीकर लौटे मजदूरों में व्यापार और पेशेवर कामकाज के तरीकों की खास सुध होगी।  यह गांव को आत्मनिर्भर बनने में रोल मॉडल बन सकता है।

ऐसा नहीं कि सरकार का इस ओर ध्यान नहीं है। पत्रकार के धर्म का पालक हूं। जब तब आलोचना के हथियार पर शान चढाए रहना पसंद है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब कभी गांव, गरीब और मजदूर के दर्द की बात करते हैं, तो मुझ जैसे अखझ को भी लुभा लेते हैं। तब लगता है कि चलो, कोई तो है जो पूंजीपतियों की निर्मम कैद में फंसे लोगों को बचाने की सोचता है। खुलकर बोलता है। उस दिशा में पहल करते हुए नजर आ रहा होता है।

प्रधानमंत्री ने हाल ही में कोरोना की परेशानियों के पार मजबूती खडे होने के लिए आत्मनिर्भर भारत की बात की है। इसके लिए उन्होंने  गांव के विकास को मूलभूत जरुरत के रुप में परिभाषित किया है। इसके लिए एकीकृत ‘ई-ग्राम स्वराज पोर्टल एवं मोबाइल एप’ और ‘स्वामित्‍व योजना’ का शुभारंभ किया है।

‘ई-ग्राम स्वराज’ पोर्टल औऱ एप ग्राम पंचायत के डिजिटलीकरण में महती भूमिका निभाएगा। अगर सरकार की चली। अंबानी जैसों के जिओ की नजर से बचे, तो यह एप गांवों के विकास योजनाओं को तैयार करने और कार्यान्‍वयन में मदद करेगा। यह पोर्टल विकास योजनाओं के समय पर पूरा होने की निगरानी और संबंधित अधिकारी की जवाबदेही सुनिश्चित करेगा।

श्री नरेन्‍द्र मोदी का दावा है, ‘पिछले पांच वर्षों में लगभग 1.25 लाख पंचायतों को ब्रॉडबैंड के माध्यम से जोड़ा गया है, जबकि पहले यह संख्‍या मात्र 100 ही थी। इसी तरह साझा सेवा केंद्रों (कॉमन सर्विस सेंटर) की संख्या 3 लाख का आंकड़ा पार कर गई है।
दावे की सत्यता को पत्रकारीय मापदंड पर कसा जाना बाकी हैं।  फिर भी गांवों से जुड़े ये आंकडे सुहावने हैं। प्रधानमंत्री ने सच ही कहा है, भारत का भविष्य संवरेगा। गरीबी का अभिशाप मिटेगा। पंचायतों की प्रगति से राष्ट्र और लोकतंत्र की तरक्‍की सुनिश्चित होगी।

प्रेम पत्र रोजाना वाक्यात और उपदेश





*परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज

- रोजाना वाकिआत -15 ,16 अक्टूबर 1932- शनिवार व रविवार:


- प्रेम प्रचारक मुद्रित 10 अक्टूबर पढ़कर लाहौर से एक नावाकिफ नौजवान ने जो इस वक्त वहां सेकंड ईयर क्लास में पढ़ता है चंद मशवरे भेजकर अपनी सेवाएं पेश की है । उनकी राय है कि आक यानी मदार का धागा बनाया जाए, मसूरी देहरादून वगैरह मकामात में  डेरिया खोली जावें और सिनेमा का काम जारी किया जाए। उनका ख्याल है कि धागा बनाने की मशीन जर्मनी से मिल जाएगी और अगर उनको 5 साल के लिए सत्संग के खर्चे से जर्मनी भेज दिया जाए तो सब कुछ सीख कर लौट आएंगे और दयालबाग में मुझसे "मिलकर काम करेंगे।  वगैरह-वगैरह। उस नौजवान को मालूम हो कि सत्संग उसकी इन अनुकंपा के लिए बेहद ऋणी है । लेकिन यहां के कारकून को दुनिया का काफी तजुर्बा हासिल है। इसलिये वह सिर्फ उन लोगों की बात सुनते हैं जिन्हें कोई काम करना आता है ।मिलकर काम करने के लिए मेरी तरफ से भी शुक्रिया।।     

                                   एक सतसंगिन बहन ने चिट्ठी भेजी है जिसमें लिखा है कि अपनी बीमारी मुझे दे दीजिए। मैं काफी शक्तिशाली व तंदुरुस्त हूँ।  इसे आसानी से बर्दाश्त कर लूंगी । खूब ! बीमारियों का इस तरह तबादला होने लगे तो वोटिंग की तरह लोगों के लिए यह भी एक नया रोजगार निकल आवे। प्रेमिन बहन को वाजह हो कि मालिक की बख्शी हुई दात हर शख्स को प्यारी होती है और मैं इस कायदे से अपवाद नहीं हूं । मालिक हमारा पिता है।  सच्चा हितकारी है । जो शख्स उसका बख्शा हुआ हलवा खाता रहा हो उसे उसके बख्शे हुए चने भी खाने चाहिए। चाहे वह चने लोहे ही के क्यों ना हो। शुक्रिया!                    लाहौर के अखबार प्रकाश का ताजा नंबर अवलोकन से गुजरा। उसमें डायरी  21 सितंबर से एक इन्दराज का उद्धरण नकल करके चुटकी ली गई है ।यह स्पष्ट रूप से बेइंसाफी है। पूरा पैराग्राफ नकल करके ऐतराज करना चाहिए था।।             

        🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**


[6/3, 04:51] +91 97176 60451: *


*परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज -सत्संग के उपदेश- भाग दूसरा- कल से आगे:-. 


          

    लेकिन साथ ही एक किस्म की बात सुनकर और असलियत को ना समझ कर बहुत से भाई बड़े जोर शोर के साथ एतराज करते हैं कि आत्मा किसी हालत में परमात्मा नहीं बन सकता।  मगर यह कौन कहता है कि आत्मा परमात्मा बन जाता है।  संतमत की तालीम यह है कि कतरा समुंद्र में दाखिल होकर कतरा नहीं रहता बल्कि समुंदर से मिल जाता है और यह नहीं है कि कतरा खुद समुद्र बन जाता है। डाक्टर थीबो व मैक्समूलर ने वेदांत सूत्रों पर विचार करते वक्त यह नतीजा निकाला कि दूसरे अध्याय के तीसरे पद के 43 वें सूत्र के वही मानी दुरुस्त हैं जो श्रीरामानुज जी ने बयान किए हैं और  रामानुज जी यह के मायने यह है कि आत्म यानी जीव ब्रह्म का अंश है।।                                                अलावा इसके श्रीमद्भागवत गीता में कृष्ण महाराज ने इस नुक्ते पर रोशनी डाली है। आप अध्याय 15 श्लोक 7 में फरमाते हैं कि खुद मेरा ही अंश इस जीवलोक में अविनाशी जीव बनकर इंद्रियों को , जिनमें छठा( यानी छठी इंद्रिय) मन है और जो प्रकृति म़े कायम है, अपनी और आकर्षित करता है । इस श्लोक में कृष्ण महाराज ने अपने तई अंशी ब्रह्म और जीव को अपना अंश या जुज बयान किया है ।।           इसके अतिरिक्त जिन भाइयों ने उपनिषदों के' तत्वमसि' सिद्धांत पर विचार किया है या इस सिद्धांत पर ऋषियों के विचारों का मुताला किया है वे बजोर जो कह सकेंगे कि पुराने जमाने में वैदिक धर्म के मानने वाले और वैदिक धर्म का अनुशासन करने वाले और वेदज्ञ यानी वेदों का अर्थ जानने वाले ऋषियों का भी यही मत था। क्रमशः               

   🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**





**परम गुरु हुजूर महाराज -

प्रेम पत्र -भाग्-1 कल से आगे

:-(9)जो कोई कहे कि हम एक बार गुरु कर चुके हैं (और वह उसी किस्म में से है जिनका जिक्र पहले हो चुका है ) अब दोबारा संत सतगुरु या साधगुरछ गुरु को कैसे गुरु धारण करें ,इसका जवाब यह है कि जो गुरु की बाहरमुखी पूजा का, जैसे मूरत और तीर्थ का, उपदेश करते हैं या ईष्ट ब्रह्म या ईश्वर या देवताओं का बँधवाते हैं या अंतर में नाम का सुमिरन या दृष्टि का साधन या ध्यान ,बिना पता और भेद उस स्वरूप के जिसका ध्यान किया जावे , बताते हैं पर घट का भेद और जुगत अंतर में चलने की नहीं जानते और सच्चे मालिक और उसके धाम की ओर उससे मिलने के रास्ते की जिनको खबर भी नहीं है, ऐसो का नाम साधगुरु या सतगुरू नहीं हो सकता है।फिर जब कि किसी ने इनसे उपदेश लिया है और इनको भरम करके और अनसमझता से गुरु माना - और असल में वे गुरु नहीं है -तो फिर इनके छोड़ने में किसी तरह का दोष या पाप या नुकसान नहीं हो सकता ।यह लोग तो अकसर करके मान और धन के लोभी है और सच्चे प्रमार्थ से न आप वाकिफ हैं और न दूसरों को समझा सकते हैं और ना कभी अपने चेलों से परमार्थ की कमाई का हाल पूछते हैं और ना जिक्र करते हैं । फिर उनके छोड़ने में किसी तरह का हर्ज नहीं हो सकता है, अलबत्ता उनका पूजा और भेंट बंद न करनी चाहिए यानी जब वे आवें तो उनके दस्तूर के मुआफिक पूजा भेंट बंद कर देनी चाहिए इतना ही वह चाहते हैं। संतों का बचन है-                                                       

झूठे गुरु की टेक को तजत न कीजै बार।।                     द्वार न पावे शब्द का भटके बारंबार ।। 

अलबत्ता जिसको पहले ही भाग से सच्चे और पूरे गुरु मिल जावें तो उसको फिर कोई जरूरत दूसरे गुरु के खोजने और धारण करने की ना होगी , क्योंकि वे सब भेद और जुगत बता कर पूरु दो शांति सेवक की कर देंगे और हमें उसके अभ्यास में मदद देते रहेंगे। और जो कि मूर्खता से हठ करके ओछे गुरु को नहीं छोड़ेगा और जब स़त सतगुरू भाग से मिले उनकी सरन नहीं लेगा, तो उसका भारी अकाल होगा यानी उसका हरगिज़ नहीं होवेडा। क्रमशः.     

 🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**


रवि अरोड़ा की नजर में........





मनु शर्माओं की दुनिया

रवि अरोड़ा

लगभग आठ-दस पुरानी बात है । एक ख़बर के सिलसिले में मैं डासना ज़िला अधीक्षक के कमरे में बैठा था । वहाँ झक सफ़ेद खद्दरधारी एक नेता जी पहले से बैठे थे । जेल अधीक्षक से बातचीत का सिलसिला जब शुरू हुआ तो वे नेता जी भी बीच बीच में अपना अनुभव बताते रहे । चलते समय परिचय हुआ तो पता चला कि वे विधायक हैं और एक संगीन अपराध के चलते यहाँ जेल में बंद हैं । वीआइपी क़ैदियों की आवभगत जेल में होती ही है , इस लिए एमएलए को जेल अधीक्षक के साथ चाय-नाश्ता करते देख कर ज़रा भी आश्चर्य नहीं हुआ । यूँ भी देश भर की चौदह सौ जेलों में जो अस्पताल बने हैं वे क़ैदियों से अधिक इन वीवीआइपियों के आराम करने के ही तो काम आते हैं । आम क़ैदियों के परिजन बेशक पूरा दिन धक्के खाकर अपने आदमी से मुलाक़ात करें मगर ख़ास आदमियों के लिए एयर कंडीशनर लगी बैठक तो हर जगह होती ही है । ख़ास क़ैदी के लिए जेलों में क्या क्या सुविधाएँ मिलती हैं , इसपर चर्चा फिर कभी मगर आज की बात तो मुझे मनु शर्मा पर करनी है । वही मनु शर्मा जो जेसिका लाल हत्याकांड में तिहाड़ जेल में बंद था और केवल सत्रह साल की सज़ा के बाद ही उसे रिहा कर दिया गया । बताया गया कि अच्छे चाल चलन के कारण उसे रिहा किया गया है ।

जेल में मनु शर्मा को क्या क्या सुविधाएँ मिलती थीं , यह तो मुझे नहीं पता मगर इतना ज़रूर अख़बारों से पता चला है कि उम्र क़ैद पाये इस वीआईपी क़ैदी ने जब चाहा उसे परोल मिला और जब चाहा तब फ़रलो हासिल की । अव्वल तो 30 अप्रैल 1999 को हुई जेसिका की हत्या में उसे निचली अदालत ने बरी कर दिया था मगर मीडिया में ज़बर्दस्त तरीक़े से उछलने पर हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए उसे उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई जो कल वक़्त से पहले ही ख़त्म हो गई । यहाँ यह बता देना भी ज़रूरी है कि पिछले सवा साल से मनु शर्मा को ओपन जेल का सुख भी हासिल हो रहा था ।

मनु की रिहाई से बहुत से लोग हैरान होंगे मगर मुझे लगता है कि इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है । जब पूरा सिस्टम ही मनु शर्माओ का है तो यह रिहाई भला क्यों न होती । मनु के पिता विनोद शर्मा बहुत बड़े व्यवसाई हैं और कांग्रेस के बड़े नेता रह चुके हैं । राज्य सभा सदस्य रहे और हरियाणा व पंजाब दोनो राज्यों से विधायक चुने जा चुके हैं । मनु का भाई टीवी चैनल चलाता है और बड़े बड़े लोग इस परिवार का पानी भरते हैं । एतिहासिक रूप से दिल्ली सरकार का गृहमंत्री मनु की रिहाई की संस्तुति करता है और उपराज्यपाल उसे तुरंत स्वीकार भी कर लेता है । ख़ास बात यह कि मनु को जेल भिजवाने में बड़ी भूमिका अदा करने वाली जेसिका की बहन सबरीना लाल भी इसका विरोध नहीं करती तो भला इस रिहाई में हैरानी जैसा कुछ बचा ही क्या ?

हाँ यदि कोई हैरान होना ही चाहता है तो उसके लिये यह जानकारी उपलब्ध है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार देश में साढ़े चार लाख क़ैदी जेलों में बंद हैं और उनमे से 68 फ़ीसदी अंडर ट्रायल हैं । पच्चीस फ़ीसदी से अधिक छोटे मोटे अपराधों में बंद हैं और वर्षों से उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई । इन क़ैदियों में 75 फ़ीसदी एसे हैं जिन्हें एक साल से अधिक वहाँ हो गया है जबकि सज़ा होती तो अब तक छूट भी गये होते । ब्यूरो के अनुसार देश की जेलों में 55 फ़ीसदी क़ैदी दलित , मुस्लिम और आदिवासी हैं । ब्यूरो के अनुसार इनकी संख्या अधिक होने का कारण उनका अधिक संख्या में अपराधी होना नहीं है अपितु ज़मानत के पैसों और पैरवी के ख़र्च का इंतज़ाम न होने के कारण ये लोग जेलों में क़ैद हैं  । उत्तर प्रदेश की 71 जेलों में जहाँ एक लाख से अधिक क़ैदी हैं वहाँ एसे ग़रीब क़ैदियों की संख्या सर्वाधिक है । लगभग एक हज़ार बच्चे भी सलाखों के पीछे हैं क्योंकि उनकी माँ वहाँ क़ैदी है । अनुभवी लोग कहते हैं कि न्याय ख़रीदा जाता है । मुझे उनकी बात पर यक़ीन नहीं होता क्योंकि न्याय तो होता ही अमीरों के लिये है । ग़रीब की क्या मजाल जो उसका नाम भी ले ।