वो भगत, जिसे आप नही जानते..
उसे जानते हैं, जिसने सांडर्स को मारा, नेशनल असेम्बली में बम फेंका। "हिंसा का नायक" जिसने मुख्यधारा के आंदोलन से अलग राह चुनने की हिमाकत की।
वो भगतसिंह, जिसे फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया..
उसकी बात नही करूँगा।
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1907 में जन्मे भगत का बचपन 1910-20 का वो दशक है, जब देश मे राष्ट्रीयता उभर रही थी। मगर सब कुछ अपरिपक्व था।
ब्रिटिश राज उरूज पर, और गोखले सुधार समझौते की कोशिशों में थे। बाल, पाल, लाल गरम दल तो थे। मगर अपनी धार्मिक साम्प्रदायिक पहचानो के इर्द गिर्द राष्ट्रीयता बुन रहे थे। उनका सपना, अधिक से अधिक होमरूल था।
तब गांधी का आगमन, विदेशी प्रवासी से कांग्रेस का असल लीडर बनने की यात्रा। जो चंपारण से शुरू हुई, और बेलगाम में पूरी हुई। भगतसिंह इस सत्य और अहिंसा के प्रयोग का साक्षी है।
वह दूसरा प्रयोग, इटली का देख रहा है। यह नया राष्ट्रवाद है- वन नेशन-वन पार्टी, वन लीडर- फासिज्म सर उठा रहा है। पर इस वक्त तीसरा प्रयोग भी हो रहा है।
रूस की क्रांति। जनता के हाथों, एक साम्राज्य का खात्मा, दुनिया की पहली जनवादी सरकार। तो कम्युनिज्म भी उस दौर की नई नई जादुई खोज था।
17 साल का किशोर भगत, यह राजनीति देख रहा है।
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और समाज को भी-
गरीबी, जातपांत, छुआछूत,
अंधविश्वास, धर्म,
साम्प्रदायिकता, नफरत।
वह पढ़ता है- विवेकानंद, दयानंद, रवींद्रनाथ टैगोर और विश्व के क्रांतिकारियों की जीवनियां। जब पढा, सुना, बातें की उनके बारे में, तो जेहन में विचार श्रृंखला बनती गयी।
उसे लिखना शुरू किया।
1923 में महज 16-17 साल की उम्र में भगतसिंह ने पत्रकारिता शुरू की। पहला यादगार आर्टिकल,पंजाबी भाषा और लिपि की समस्या पर था।
1924 में प्रकाशित हुआ और पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन में 50 रुपये का प्रथम पुरस्कार जीता। सनद रहे, तब सोना 20 रुपये तोला था।
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उनके लेखन में ऊर्जा थी, रवानी और बगावत का पुट भी।शुरुआती लेख, उस वक्त की खबरों पर कमेंट्री, क्रांतिकारियों की शहादत, उनकी बहादुरी और बलिदान पर केंद्रित होते।
यह खतरनाक था। ब्रिटिश नजरें हर शब्द पर थीं। तो छद्मनामों का इस्तेमाल शुरू किया- कभी बलवंत, कभी विद्रोही, कभी रंजीत, कभी बी.एस. सिंधु।
उन्होंने चंद पत्रिका के विशेषांक में फांसी के शहीदों पर लिखा और डैन ब्रीन की किताब, "माई फाइट फ़ॉर आयरिश फ्रीडम" का हिंदी अनुवाद किया। तब उन्होंने महसूस किया कि कलम, बन्दूक से ज्यादा मारक है। लिखा भी-
“व्यक्तियों को मारना आसान है,
लेकिन विचारों को नहीं मारा जा सकता”
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भगतसिंह पत्रकार ने आर्टिकल ही नही लिखे, वे सम्पादक भी थे। ब्याह से बचने के लिए 19 की उम्र में जब घर से भागे, तो कानपुर पहुंचे। यहां "प्रताप" नाम के हिंदी अखबार में रिपोर्टर की नौकरी की।
इसके मालिक और संपादक थे- गणेश शंकर विद्यार्थी
ख्यातनाम पत्रकार, आजादी का लड़ाका, और कांग्रेस नेता।
विद्यार्थी ने प्रताप को 1913 में शुरू किया था। अखबार किसानों, मजदूरों और शोषितों की आवाज बन था। भगत सिंह यहां रिपोर्टिंग के साथ-साथ लेख भी लिखते। बलवंत के छद्मनाम से, मार्च 1926 में बब्बर अकाली आंदोलन पर लेख लिखा।।
उन सिख क्रांतिकारियों की बहादुरी का वर्णन किया जिन्होंने अंग्रेजों और भ्रष्ट महंतों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। पाठकों से आग्रह किया कि वे शहीदों के त्याग की कल्पना करें- कि वह कितनी खूबसूरत, मोहक और पवित्र दृष्टि रही होगी।
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इस दौरान जब विद्यार्थी गिरफ्तार हुए तो करीब तीन माह, भगतसिंह ही प्रताप के मुख्य सम्पादक औऱ पब्लिशर रहे। बार बार सामाजिक मुद्दों को छुआ, क्रांतिकारी चेतना जगाई।
1926-28 में पंजाब लौटे। तब 21-22 की उम्र थी। मगर लेखन, और विचार मंज चुके थे। यहाँ वे विद्यार्थी, कीर्ति औऱ अकाली में लिखने,सम्पादन करने लगे।
कीर्ति- वर्कर्स एन्ड पीजेंट पार्टी का मुखपत्र था। भगतसिंह यहाँ उप-संपादक थे। सरदार सोहन सिंह की यह पत्रिका क्रांतिकारी और मार्क्सवादी विचारों का केंद्र थी।
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कीर्ति में भगतसिंह के लेख- महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। मई 1927 में उन्होंने विद्रोही के छद्मनाम से, काकोरी के शहीदों- बिस्मिल, और अशफाक पर लिखा।
जून 1928 में “अछूत का सवाल” लिखा। जो जातिगत भेदभाव और सामाजिक न्याय पर गहरा विश्लेषण था। उन्होंने सांप्रदायिक दंगों और उनके इलाज पर लेख लिखा।
मई से सितंबर 1928 तक अराजकतावाद (Anarchism) नाम की एक सीरीज लिखी। जहां एनार्की का मतलब, राज्यविहीन, शोषणमुक्त समाज है। उन्होंने इसे भारतीय अवधारणा “वसुधैव कुटुंबकम” से जोड़ा।
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जिस "अकाली" नाम के पंजाबी अखबार संपादन किया, उसके संस्थापक मास्टर सुंदर सिंह लयलपुरी थे। यह सिख राष्ट्रवाद और अकाली आंदोलन से जुड़ा था। भगत सिंह ने यहां भी क्रांतिकारी विचार फैलाए।
बंदे मातरम (उर्दू, अमृतसर) में भी उन्होंने लिखा। संपादन से जुड़े। दिल्ली भागते समय वीर अर्जुन में भी काम किया।
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जेल में भी उन्होंने नोटबुक भरी।
लेनिन, ट्रॉट्स्की आदि के उद्धरण, अपने विचार। लाहौर जेल में लगभग दो साल भी लिखते हुए गुजारे। “मैं नास्तिक क्यों हूँ”
“To Young Political Workers”, और कई पत्र, चार किताबें, जो खो गईं।
लेकिन नोटबुक बची।जेल में कलम किताबों ने उन्हें जिंदा रखा। जाति, धर्म, शोषण के खिलाफ चली उनकी कलम के।लेख आज भी उतने ही प्रासंगिक है। The Political Writings of Bhagat Singh, जेल नोटबुक पब्लिश्ड है। पब्लिक डोमेन में है।
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भगत सिंह की पत्रकारिता आज पढ़ें, तो मालूम होगा कि सत्ता का खेल सदा एक सा रहता है। धर्म, राष्ट्र, भाषा, जाति के नाम पर लोग मोहरे बनाए जाते हैं।
लेकिन जो इतिहास पढ़ता है, वह भविष्य देखता है। भगत सिंह ने कलम उठाकर बता दिया, कि युवा मोहरा बनने को अभिशप्त नही।
वे खिलाड़ी भी बन सकते हैं।
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कुछ दिनों पूर्व शहर में पत्रकार दिवस मनाने, और नारद मुनि को भारत का प्रथम पत्रकार बताने का प्रहसन देखा। एक पूरी जमात, राजकीय संरक्षण में उन्हें पत्रकारिता का आदि पुरुष बताने का हास्यास्पद शो करती है।
पत्रकारिता, इधर की बात उधर करना,
कानाफूसी, पोडकॉस्ट और बतकही नही होती।
सच्ची पत्रकारिता जनता की आवाज होती है। वह समाज और सत्ता पर ब्लेड चलाकर उसका मवाद निचोड देती है। यह क्रूर, कठिन - मगर सात्विक कर्म है।
तो भारत मे पत्रकारिता में उस स्तर का कोई आदि पुरुष चुनना हो, नारद नही, बेझिझक भगतसिंह को चुनिये।
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क्योकि कुल जमा 23 साल जीने वाला यह छोकरा- चार भाषाओं- हिंदी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेजी- में वेटरन पत्रकार हो चुका था।
पर आप, सिर्फ उस भगतसिंह जानते हैं, जिसने सांडर्स का कत्ल किया। जिसने नेशनल असेम्बली में बम फेंका। हिंसा का वो नायक जिसने गांधी के आंदोलन से अलग राह चुनने की हिमाकत की।
पर आज ध्वस्त हो रहे लोकतंत्र में, उस भगतसिंह की तस्वीर लगी टी शर्ट पहनने से बात नही बनेगी। हमे टीवी स्क्रीन पर, यू ट्यूब चैनलों में, और हमारे बीच कलम, कैमरा, मोबाइल, सोशल मीडिया लेकर घूम रहे हर व्यक्ति के भीतर..
पत्रकार भगतसिंह की जरूरत है।
🙏