गुरुवार, 27 जनवरी 2022

गांधी,27 जनवरी,1948 महरौली में / विवेक शुक्ला

 

दिल्ली में आजकल की ही तरह 27 जनवरी,1948 को भी कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। सारा वातावरण में अवसाद और निराशा फैली हुई थी। सूरत देवता दर्शन देने के नाम ही नहीं ले रहे थे।  इसके बावजूद गांधी जी सुबह साढ़े आठ बजे के आसपास अलबुर्कर रोड (अब तीस जनवरी मार्ग) पर स्थित बिड़ला हाउस से अपने कुछ सहयोगियों के साथ महरौली की तरफ निकले। वे महरौली में कुतुबउद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह में जा रहे थे। वे इससे पहले अपनी सन 1915 की पहली दिल्ली यात्रा के समय महरौली में कुतुब मीनार को देखने गए थे। तब कस्तूरबा गांधी और हकीम azmal खान भी उनके साथ साथ थे। 


पर इस बार मामला गंभीर था। महात्मा गांधी को दिल्ली आए हुए लगभग चार महीने हो चुके थे। पर इधर सांप्रदायिक दंगे थमने नहीं रहे थे। इनसानियत मर रही थी।  वे नोआखाली और कलकत्ता में दंगों को शांत करवाकर 9 सितंबर, 1947 को यहां आए थे। तब दिल्ली में सरहद पार से हिन्दू- सिख शरणार्थी आ रहे थे, यहां से बहुत से मुसलमान पाकिस्तान जा रहे है। करोल बाग,पहाड़गंज, दरियागंज, महरौली में मारकाट मची हुई थी। वे दंगाग्रस्त क्षेत्रों में जा रहे थे। पर बात नहीं बन रही थी। इस बीच, कुतुबउदीन बख्तियार काकी की दरगाह के बाहरी हिस्से को भी कुछ दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई। 


इस घटना से बापू अंदर तक हिल गए थे। उन्हें 12 जनवरी 1948 को खबर मिली थी कि काकी की दरगाह के बाहरी हिस्से को दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई है। ये सुनने के बाद उन्होंने अगले ही दिन से उपवास पर जाने का निर्णय लिया। हालांकि माना जाता है कि बापू ने अपना अंतिम उपवास इसलिए रखा था ताकि भारत सरकार पर दबाव बनाया जा सके कि वो पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये अदा कर दे। पर सच ये है कि उनका उपवास दंगाइयों पर नैतिक दबाव डालने को लेकर था। गांधी जी ने 13 जनवरी 1948 को प्रात: साढ़े दस बजे अपना उपवास चालू किया। उनके उपवास का असर दिखने लगा। दिल्ली शांत हो गई।


 तब बापू ने 18 जनवरी, 1948 को अपना उपवास तोड़ा। 78 साल के बापू ने हिंसा को अपने उपवास से मात दी। इसके बाद वे काकी की दरगाह में 27 जनवनरी को पहुंचे। तब तक महरौली बिल्कुल जंगल सी रही होगी। वे बिड़ला हाउस से जब महरौली के लिए निकले होंगे तो उन्हें सबसे पहली बस्ती युसुफ सराय ही मिली होगी। तक तक साउथ दिल्ली में कमोबेश गांव  ही ही आबाद थी। एम्स, हौज खास, सर्वप्रिय विहार, सफदरजंग डवलपमेंट एरिया वगैरह तो 1950 के दशक के शुरू में बनने शुरू हुए थे।


खैर, वे बिड़ला हाउस से युसुफ सराय के रास्ते 30-40 मिनट में काकी की दरगाह में पहुंच गए होंगे। वहां पर उर्स चल रहा था,पर जायरीन कम ही थे। उर्स का उत्साह नहीं था। वहां पर पहुंचते ही उन्होंने दरगाह के उन हिस्सों को देखा जिसे दंगाइयों ने नुकसान पहुंचाया था। उन्होंने वहां पर एकत्र हुए मुसलमानों को भरोसा दिलाया कि उन्हें सरकार सुरक्षा देगी। 


उन्हें पाकिस्तान जाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु से दरगाह की फिर से मरम्मत कराने के लिए भी कहा। गांधी जी के साथ नेहरु कैबिनेट में स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर भी थीं। वे काकी की दरगाह में लगभग एकाध घंटा रहे। पर अफसोस कि दरगाह के आसपास कोई शिलालेख भी नहीं लगा जिससे पता चल सके कि यहां कब और किसलिए राष्ट्रपिता आए थे।


 अब दरगाह से जुड़े किसी खादिम को ये जानकारी नहीं है कि बापू का काकी की दरगाह से किस तरह का रिश्ता रहा है। बहरहाल, यहां आने के तीन दिनों के बाद उनकी हत्या कर दी जाती है।

Vivekshukladelhi@gmail.com 

Navbharatimes 27 January 2022



नागा साधु संतो की शहादत

 जब अहमदशाह अब्दाली दिल्ली और मथुरा पर आक्रमण करता हुआ गोकुल तक आ गया था ।लोगो को बर्बरतापूर्वक काटा जा रहा था . .. महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे थे और बच्चे देश के बाहर बेचे जा रहे थे . 


तभी गोकुल में अहमदशाह अब्दाली का सामना नागा साधुओं हुआ । कुछ 5 हजार साधुओं की सेना कई हजार सैनिकों से लड़ गयी थी पहले तो अब्दाली साधुओं को मजाक में ले रहा था , किन्तु तभी अब्दाली को एहसास हो गया था कि यह साधू अपनी भारत माता के लिए जान तक दे सकते हैं ।


 इस युद्ध में 2000 नागा साधू वीरगति को प्राप्त हुए थे . लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही थी कि दुश्मनों की सेना चार कदम भी आगे नहीं बढ़ा पाई थी . जो जहाँ था वहीं ढेर कर दिया गया था या फिर पीछे हटकर भाग गया था ।


 तबसे कई मुस्लिम शासक जब यह सुनते थे कि युद्ध में नागा साधू भाग ले रहे हैं तो वह लड़ते ही नहीं थे देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ नहीं है कि आज हम दुश्मन औरंगजेब , तैमूर अकबर बर्बर लुटेरो को याद रखते हैं , जहाँगीर को सपनों में देखते हैं और ऐसे भारतीय वीर योद्धाओं के बारे में कुछ नहीं जानते हैं जो देश और धर्म की शान हैं .


 तो इस प्रकार से साधू संतों ने देश की आजादी के लिए भी कई युद्ध लड़े है और अपनी कुर्बानियां दी हैं । 


सनातन धर्म , संस्कृति साधु संत यही पहचान रही है हमारी


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बुधवार, 26 जनवरी 2022

भारत का संविधान ( कब कहाँ क्यों और कैसे)

 नई दिल्ली l भारत के इतिहास में 26 नवंबर, 1949 और 26 जनवरी , 1950 का बहुत महत्‍व है। यह दोनों तारीखें भारत के संविधान के इतिहास से जुड़ी हैं। विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान ‘भारतीय संविधान’ 26 नंवबर 1949 को पारित हुआ और 26 जनवरी 1950 को प्रभावी हुआ। भारतीय संविधान के जनक डॉ. भीमराव अम्बेडकर के प्रयासों के कारण ही यह ऐसे रूप में सामने आया, जिसे न केवल भारत में सबने सराहा बल्कि विश्व में कई अन्य देशों ने भी इसे अपनाया। भारत के संविधान के प्रति हमारी आस्था, उसके बारे में जानना और उसका पूर्ण रूप से अनुपालन करना हम भारतीयों का प्रथम कर्तव्य है।

22 भागों में विभजित है भारत का संविधान

  • भारतीय संविधान दुनिया का न सिर्फ सबसे लंबा हस्तलिखित दस्तावेज है, बल्कि इसके निर्माताओं ने कई देशों की उन अच्छाइयों को भी इसके भीतर समेटा, जिससे भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में मजबूत बन सके।

  • यह 22 भागों में विभजित है, इसमे 395 अनुच्छेद एवं 12 अनुसूचियां हैं।

  • भारतीय संविधान की दो प्रतियां हिंदी और अंग्रेजी में हाथ से लिखी गईं।

  • इस संविधान को तैयार करने में 2 साल, 11 माह और 18 दिन का समय लगा।

  • इसमें कुल शब्दों की संख्या करीब 1,45,000 थी।

  • संविधान लागू होने के करीब 70 साल बाद इसमें 108 संशोधन हो चुके हैं।

  • संविधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या 389 निश्चित की गई थी, जिनमें 292 ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि, 4 चीफ कमिश्नर क्षेत्रों के प्रतिनिधि एवं 93 देशी रियासतों के प्रतिनिधि थे।

मूल अधिकार और मूल कर्तव्य

  • संविधान में देश के नागरिकों के लिए मूल अधिकारों की विस्तृत व्याख्या (अनुच्छेद 12-35) की गई है, जिन्हें किसी भी कानून द्वारा छीना या कमजोर नहीं किया जा सकता।

  • इसी तरह, अनुच्छेद 51ए में नागरिकों के 11 कर्तव्यों का प्रावधान है।

  • शुरुआत में धर्मनिरपेक्षता शब्द संविधान का हिस्सा नहीं था। 42वें संशोधन द्वारा इसे संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया।

भारतीय संविधान के विदेशी स्त्रोत

  • भारत के संविधान को उधार का थैला भी कहा जाता है। इसमें कई अहम चीजों को अन्य संविधानों से लिया गया है।

  • आजादी, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को फ्रांस के संविधान से लिया गया है।

  • 5 वर्षीय योजना का आइडिया यूएसएसआर से लिया गया था। सामाजिक-आर्थिक अधिकार का सिद्धांत आयरलैंड से लिया गया।

  • सबसे अहम, जिस कानून पर सुप्रीम कोर्ट काम करता है, वह जापान से लिया गया। ऐसी कई और चीजें हैं जो अन्य देशों के संविधान से ली गई हैं।

  • संघात्‍मक विशेषताएं, अवशिष्‍ट शक्तियां केंद्र के पास, केंद्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति और उच्चतम न्यायालय का परामर्श न्याय निर्णयन कनाडा से लिया गया है।

  • संविधान संशोधन की प्रक्रिया प्रावधान, राज्यसभा में सदस्यों का निर्वाचन दक्षिण अफ्रीका के संविधान से लिया गया है।

हस्तलिखित संविधान क़ो लिखने वाले प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा

 How many Indians know that the Constitution of India was written by hand. No instrument was used to write the whole constitution. Prem Bihari Narayan Rayzada, a resident oaf Delhi, wrote this huge book, the entire constitution, in italic style with his own hands.


Prem Bihari was a famous calligraphy writer of that time. He was born on 16 December 1901 in the family of a renowned handwriting researcher in Delhi. He lost his parents at a young age. He became a man to his grandfather Ram Prasad Saxena and uncle Chatur Bihari Narayan Saxena. His grandfather Ram Prasad was a calligrapher. He was a scholar of Persian and English. He taught Persian to high-ranking officials of the English government.


Dadu used to teach calligraphy art to Prem Bihari from an early age for beautiful handwriting. After graduating from St. Stephen's College, Delhi, Prem Bihari started practicing calligraphy art learned from his grandfather. Gradually his name began to spread side by side for the beautiful handwriting. When the constitution was ready for printing, the then Prime Minister of India Jawaharlal Nehru summoned Prem Bihari. Nehru wanted to write the constitution in handwritten calligraphy in italic letters instead of in print. 


That is why he called Prem Bihari. After Prem Bihari approached him, Nehruji asked him to handwrite the constitution in italic style and asked him what fee he would take.


Prem Bihari told Nehruji “Not a single penny. By the grace of God I have all the things and I am quite happy with my life. ” After saying this, he made a request to Nehruji "I have one reservation - that on every page of constitution I will write my name and on the last page I will write my name along with my grandfather's name." Nehruji accepted his request. He was given a house to write this constitution. Sitting there, Premji wrote the manuscript of the entire constitution.


Before starting writing, Prem Bihari Narayan came to Santiniketan on 29 November 1949 with the then President of India, Shri Rajendra Prasad, at the behest of Nehruji. They discussed with the famous painter Nandalal Basu and decided how and with what part of the leaf Prem Bihari would write,

Nandalal  Basu would decorate the rest of the blank part of the leaf.


Nandalal Bose and some of his students from Santiniketan filled these gaps with impeccable imagery. Mohenjo-daro seals, Ramayana, Mahabharata, Life of Gautam Buddha, Promotion of Buddhism by Emperor Ashoka, Meeting of Vikramaditya, Emperor Akbar and Mughal Empire.. 


Prem Bihari needed 432 pen holders to write the Indian constitution and he used nib number 303. The nibs were brought from England and Czechoslovakia. He wrote the manuscript of the entire constitution for six long months in a room in the Constitution Hall of India. 251 pages of parchment paper had to be used to write the constitution. The weight of the constitution is 3 kg 650 grams. The constitution is 22 inches long and 16 inches wide.


Prem Bihari died on February 17, 1986.


Collected

(ध्वजारोहण और झंडा फहराने के अंतर की व्याख्या

 !!!एक रोचक तथ्य!!!


जानिए स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस में झंडा फहराने में क्या है अंतर ?

पहला अंतर -


15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर *झंडे को नीचे से रस्सी द्वारा खींच कर ऊपर ले जाया जाता है, फिर खोल कर फहराया जाता है, जिसे *ध्वजारोहण* कहा जाता है क्योंकि यह 15 अगस्त 1947 की ऐतिहासिक घटना को सम्मान देने हेतु किया जाता है जब प्रधानमंत्री जी ने ऐसा किया था। संविधान में इसे अंग्रेजी में *Flag Hoisting (ध्वजारोहण)* कहा जाता है।


जबकि


26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर *झंडा ऊपर ही बंधा रहता है, जिसे खोल कर फहराया जाता है,* संविधान में इसे *Flag Unfurling (झंडा फहराना)* कहा जाता है।

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*दूसरा अंतर*


15 अगस्त के दिन *प्रधानमंत्री जो कि केंद्र सरकार के प्रमुख होते हैं वो ध्वजारोहण करते हैं,* क्योंकि स्वतंत्रता के दिन भारत का संविधान लागू नहीं हुआ था और राष्ट्रपति जो कि राष्ट्र के संवैधानिक प्रमुख होते है, उन्होंने पदभार ग्रहण नहीं किया था। इस दिन शाम को राष्ट्रपति अपना सन्देश राष्ट्र के नाम देते हैं।


जबकि


26 जनवरी जो कि देश में संविधान लागू होने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, *इस दिन संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं*

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*तीसरा अंतर*


स्वतंत्रता दिवस के दिन *लाल किले* से ध्वजारोहण किया जाता है।


जबकि


गणतंत्र दिवस के दिन *राजपथ* पर झंडा फहराया जाता है।

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HAPPY REPUBLIC DAY

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मंगलवार, 25 जनवरी 2022

रवि अरोड़ा की nj

 अंटी में क्या है/ रवि अरोड़ा


 fr

चुनाव की बेला है । प्रत्याशी धड़ाधड़ नामांकन दाखिल कर रहे हैं । कई चरणों में चुनाव होने हैं सो यह क्रम अभी लंबा चलेगा । परंपरा ही कुछ ऐसी है नामांकन दाखिल होते ही अखबार प्रत्याशी की घोषित जन्मकुंडली छापते हैं । किसके पास कितनी चल अचल संपत्ति , कितने मुकदमे, शिक्षा और कौन कौन सी गाड़ी है वगैरह वगैरह । इस वैगरह वगैरह के क्रम में यह भी लिखा होता है कि प्रत्याशी के पास कौन कौन से हथियार हैं । पता नहीं क्या गंदी आदत है कि मेरा ध्यान हथियार वाली बात पर सबसे पहले जाता है । दरअसल मुझे लगता है कि बाकी तमाम घोषणाओं में तो हेर फेर होगा मगर यह इकलौती ऐसी बात है जिसमे कोई लाग लपेट नहीं हो सकती । जैसे बेनामी संपत्ति का लेखा जोखा कोई ढूंढ नहीं सकता । माल मत्ता कितना दिखाना है यह प्रत्याशी से अधिक उसके चार्टेड एकाउंटेंट की काबिलियत पर निर्भर करता है । शिक्षा वाले कॉलम में तो राष्ट्रीय स्तर के नेता भी झोल कर लेते हैं । मुकदमों की संख्या भी फाइनल रिपोर्ट लगवा कर कम की जा सकती है । ले देकर हथियार ही ऐसा कॉलम है जिसमें चाह कर भी कोई प्रत्याशी झूठी घोषणा नहीं कर सकता । हां हथियार अवैध हो तो बात अलग है । 


मेरे शहर समेत पहले राउंड की तमाम विधान सभा सीटों पर नामांकन हो चुका है । अपनी बुरी आदत के अनुरूप इसबार भी मेरा ध्यान केवल इसी बात पर है कि किस प्रत्याशी के पास कौन सा हथियार है ? वैसे थोड़ी हैरानी भी होती है कि राजनीति तो सेवा कार्य है फिर इसमें ऐसा कौन सा जान का खतरा है कि हमारे नेताओं को हथियार रखना पड़ जाता है ? यूं भी तो गांधी जयंती और दूसरे तमाम राष्ट्रीय उत्सवों में ये नेता हमें अहिंसा का पाठ पढ़ाते रहते हैं , फिर हिंसा के इस औजार की उन्हें क्या जरूरत है ? अब तक मैं सैकड़ों प्रत्याशियों का चुनाव अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत बायोडाटा खंगाल चुका हूं , अधिकांश के पास पिस्टल, रिवाल्वर, दोनाली अथवा राइफल मौजूद है । अच्छी खासी भली सूरत वाले प्रत्याशियों के पास भी गन है । उनके पास भी है जिनके पास कोई माल असबाब भी नहीं है । पता नहीं क्या लुटने का खतरा उन्हें है ? और तो और महिला प्रत्याशियों के पास भी हथियार है । मुख्यमंत्री , पूर्व मुख्यमंत्री  स्तर के ऐसा नेता भी हथियार लिए बैठे हैं जिनकी सुरक्षा में पूरा अमला दिन भर लगा रहता है । अहिंसा का राग अलापने वाले देश का यह हाल है । कमाल है , कैसे लोग आ गए हैं राजनीति में ? 


बेशक प्रदेश में मात्र प्वाइंट 63 फीसदी लोगो को हथियार का लाइसेंस मिला हुआ है । मगर यहां के बाशिंदों के सिर हथियार का भूत ही सवार है । हर जिले में असला बाबू की औकात कलक्टर जैसी है । जिनके पास लाइसेंस है अथवा जिन्होंने इसके लिए आवेदन किया हुआ है, उन्हें पता है कि सामान्य आदमी की जूतियां घिस जाती हैं एक अदद लाइसेंस बनवाने में । सारे नियम कानूनों का पालन करने के बावजूद यह जिलाधिकारी के मूड पर निर्भर करता है कि आपको लाइसेंस मिलेगा अथवा नहीं । अधिकांश नेता भी बताते हैं कि उनके पास आने वाली आधी सिफारिशें हथियार के लाइसेंस की ही होती हैं । पूरे प्रदेश में हथियार का ऐसा क्रेज है कि देश भर में सर्वाधिक हथियार इसी सूबे में हैं । कई जिले तो ऐसे हैं कि बंदे के पांव में जूता हो अथवा नहीं , मगर कंधे पर बंदूक जरूर होगी । अब ऐसी आबोहवा हो तो नेता जी पहले अपना लाइसेंस ही तो बनवाएंगे ।  गण तंत्र दिवस आ रहा है । इस बार भी हम शहर शहर गली गली शांति, अहिंसा , प्रेम और सद्भावना पर छोटे बड़े नेताओं के भाषण सुनेंगे । यदि मन करे तो आप भी इसबार मेरी तरह नेता जी की अंटी पर ध्यान देना और पता करने की कोशिश करना कि उनकी पेंट में रिवाल्वर है या पिस्टल ?

मानवता के देवदूत

प्रस्तुति - सिन्हा आत्म स्वरूप 

मैं चेन्नई में कार्यरत था और मेरा पैतृक घर भोपालa में था।अचानक घर से पिताजी का फ़ोन आया कि तुरन्त चले आओ, जरूरी काम है। मैं आनन फानन में रेलवे स्टेशन पहुंचा और तत्काल रिजर्वेशन की कोशिश की परन्तु एक भी सीट उपलब्ध नहीं थी। सामने प्लेटफार्म पर ग्रैंड ट्रंक एक्सप्रेस खड़ी थी और उसमें भी बैठने की जगह नहीं थी, परन्तु मरता क्या नहीं करता, घर तो कैसे भी जाना था। बिना कुछ सोचे समझे सामने खड़े स्लीपर क्लास के डिब्बे में चढ गया। डिब्बे के अन्दर भी बुरा हाल था। जैसे-तैसे जगह बनाने हेतु एक बर्थ पर एक सज्जन को लेटे देखा तो उनसे याचना करते हुए बैठने के लिए जगह मांग ली। सज्जन मुस्कुराये, उठकर बैठ गए और बोले, 

*"कोई बात नहीं, आप यहाँ बैठ सकते हैं।"*

मैं उन्हें धन्यवाद दे वहीं कोने में बैठ गया। थोड़ी देर बाद ट्रेन ने स्टेशन छोड़ दिया और रफ़्तार पकड़ ली। कुछ मिनटों में जैसे सभी लोग व्यवस्थित हो गए और सभी को बैठने का स्थान मिल गया. मैंने अपने सहयात्री को देखा और सोचा बातचीत का सिलसिला शुरू किया जाये। मैंने कहा, 

*"मेरा नाम आलोक है और मैं इसरो में वैज्ञानिक हूँ। आज़ जरुरी काम से अचानक मुझे घर जाना था इसलिए स्लीपर क्लास में चढ गया, वरना मैं ए.सी. से कम में यात्रा नहीं करता।"*

वो मुस्कुराये और बोले, 

*"वाह ! मेरे साथ एक वैज्ञानिक यात्रा कर रहे हैं। मेरा नाम जगमोहन राव है। मैं वारंगल जा रहा हूँ। उसी के पास एक गाँव में मेरा घर है। मैं अक्सर शनिवार को घर जाता हूँ।"*

इतना कह उन्होंने अपना बैग खोला और उसमें से एक डिब्बा निकाला। वो बोले, 

*“ये मेरे घर का खाना है, आप लेना पसंद करेंगे ?”* 

मैंने मना कर दिया और अपने बैग से सैंडविच निकाल कर खाने लगा। जगमोहन राव !  ये नाम कुछ सुना-सुना सा लग रहा था परन्तु इस समय याद नहीं आ रहा था।

रेलगाड़ी तेज़ रफ़्तार से चल रही थी। अचानक मैंने देखा कि सामने वाली बर्थ पर 55-56 साल के सज्जन अपनी बर्थ पर तड़पने लगे। उनका परिवार भी घबरा कर उठ गया और उन्हें पानी पिलाने लगा परन्तु वो कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थे। मैं चिल्लाया, "अरे ! कोई डॉक्टर यहाँ सफर कर रहा, इमरजेंसी है।"

रात में स्लीपर क्लास के डिब्बे में डॉक्टर कहाँ से मिलता? उनके परिवार के लोग उन्हें असहाय अवस्था में देख रोने लगे।


 तभी जगमोहन राव नींद से जाग गए। उन्होंने मुझसे पूछा, "क्या हुआ ?"

मैंने उन्हें सब बताया। मेरी बात सुनते ही उन्होंने अपने सूटकेस में से स्टेथेस्कोप निकाला और सामने वाले सज्जन की सीने धड़कने सुनने लगे। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें दिखने लगीं। उन्होंने कुछ नहीं कहा और सूटकेस में से एक इंजेक्शन निकाला और सज्जन के सीने में लगा दिया व उनका सीना दबा-दबा कर, मुंह पर अपना रूमाल लगा कर अपने मुंह से सांस देने लगे। कुछ मिनट तक सी.पी.आर. देने के बाद मैंने देखा कि रोगी सहयात्री का तड़फना कम हो गया।

जगमोहन राव जी ने अपने सूटकेस में से कुछ गोलियां निकाली और परिवार के बेटे से बोले- 

*“बेटा, ये बात सुनकर घबराना नहीं। आपके पापा जी को मेसिव हृदयाघात आया था, मैंने इंजेक्शन दे दिया है और ये दवाइयां उन्हें दे देना।”*

उनका बेटा आश्चर्य से बोला, 

*“पर आप कौन हो ?"*

वो बोले, *“मैं एक डॉक्टर हूँ। मैं इनकी केस हिस्ट्री और दवाइयां लिख देता हूँ, अगले स्टेशन पर उतर कर आप लोग इन्हें अच्छे अस्पताल ले जाइएगा।"*

उन्होंने अपने बैग से एक लेटरपेड निकाला और जैसे ही मेरी उस लेटरपेड पर नजर पडी, मेरी याददाश्त वापस आ गयी।

उस पर छपा था - 

*डॉक्टर जगमोहन राव, हृदय रोग विशेषज्ञ, अपोलो अस्पताल, चन्नयी।*

अब मुझे भी याद आ गया कि कुछ दिन पूर्व मैं जब अपने पिता को चेकअप के लिए अपोलो हस्पताल ले गया था, वहाँ मैंने डॉक्टर जगमोहन राव के बारे में सुना था। वो अस्पताल के सबसे वरिष्ठ, विशेष प्रतिभाशाली हृदय रोग विशेषज्ञ थे। उनका एपोइमेण्ट लेने के लिए महीनों का समय लगता था। मैं आश्चर्य से उन्हें देख रहा था। 

*एक इतना बड़ा डॉक्टर स्लीपर क्लास में यात्रा कर रहा था और मैं एक छोटा सा तृतीय श्रेणी वैज्ञानिक घमंड से ए.सी. में चलने की बात कर रहा था, ये इतने बड़े आदमी इतने सामान्य ढंग से पेश आ रहे थे।* 

इतने में अगला स्टेशन आ गया और वो हृदयाघात से पीड़ित बुजुर्ग एवं उनका परिवार टी.टी. एवं स्टेशन पर बुलवाई गई मेडिकल मदद से उतर गये।

रेल वापस चलने लगी। मैंने उत्सुकतावश उनसे पूछा, “डॉक्टर साहब, आप तो आराम से ए.सी. में यात्रा कर सकते थे फिर स्लीपर में क्यूँ ?"

वो कुछ रुक कर बोले,

*“मैं जब छोटा था और गाँव में रहता था तब मैंने देखा था कि रेल में कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं होता, खासकर दूसरे दर्जे में। इसलिए मैं जब भी घर या कहीं जाता हूँ तो स्लीपर क्लास में ही सफ़र करता हूँ... न जाने कब किसे डाक्टर की जरुरत पड़ जाए। मैंने डॉक्टरी गरीब लोगों की सेवा के लिए ही की थी। हमारी पढ़ाई का क्या फ़ायदा यदि हम किसी के काम न आ सकें,"*

वारंगल आ गया था। वो मुस्कुरा कर उतर गये और मैं उनके बैठे हुए स्थान से आती हुई खुशबू को महसूस कर रहा था। ये खुशबू उन महान व्यक्तित्व और पुण्य आत्मा की थी।

गांधी,27 जनवरी,1948 महरौली में / विवेक शुक्ला

  दिल्ली में आजकल की ही तरह 27 जनवरी,1948 को भी कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। सारा वातावरण में अवसाद और निराशा फैली हुई थी। सूरत देवता दर्शन द...