शनिवार, 30 जुलाई 2011

प्रेस क्लब / अनामी शरण बबल -2



30 जुलाई 2011

 मनमोहन जी, खुशवंत प्रेम देश के साथ गद्दारी है

हमारे ईमानदार प्रधानमंत्री बड़े भोले बमभोले है। कम बोलते हैं , मगर लोगों के अहसान को लंबे समय तक याद रखते हैं। अपने जमाने के मशहूर बिल्डर और अमर शहीद भगत सिंह को अदालत में पहचानकर फांसी दिलवाने में मुख्य भूमिका निभाने वाले (गद्दार) सर शोभा सिंह के बेटे होने के बावजूद सरदार खुशवंत सिंह( जिनकी एक लेखर पत्रकार की अलग पहचान है) से हमारे पीएम सरदार मनमोहन काफी पुराने दोस्त रहे हैं। यह दोस्ती भी उस जमाने से चली आ रही है, जब मनमोहन की पहचान एक नौकरशाह की थी। राजनीति से तो इनका दूर दूर का नाता नहीं था। ईमानदार होने की वजह से ये करोड़पति (अब अरबपति भी कह सकते हैं) खुशवंत से कई बार कर्ज भी ले चुके थे। पचास साल पुरानी दोस्ती का फर्ज कहे (या कर्ज) कि पीएम साहब को लग रहा है कि पीएम रहते हुए कर्ज उतारने का इससे बेहतर मौका तो दोबारा मिलने वाला नहीं। लिहाजा लगे हाथ क्यों ना एक ही झटके में खुशवंत पर इस तरह का अहसान कर दें कि पुराने सारे कर्ज का सफाया हो जाए। यह जानते हुए भी कि खुशवंत के पिता की इमेज देश भर में एक गद्दार की है। अंग्रेजों के पिटठ् रहकर दोनों हाथों से मेवा बटोरने की है। इसकी तनिक भी परवाह किए बगैर पीएम साहब ने झट से  दिल्ली की सीएम शीला दीक्षित को लेटर लिखकर नयी दिल्ली इलाके के विंड़सर प्लेस का नाम बदल कर सर शोभा सिंह प्लेस करने का फरमान (इसे आग्रह भी कह सकते है) जारी कर दिया। चारो तरफ हंगामा बरपा है। कई संगठनों ने विरोध करके इस आदेश को रद्द कराने की चेतावनी दी है। फिर भी कम बोलने वाले पीएम साहब ने हंगामा खड़ा करके  सारा ठीकरा शीला दीक्षित के सिर पर फोड़ दिया है। पीएम दफ्तर के तमाम नौकरशाहों की इस दलील पर भी पीएम साहब ने इस बार गौर नहीं फरमाया कि खुशवंत प्रेम का रास्ता देश के साथ गद्दारी से कम नहीं है।

सांसत में शीला

हंसमुख बातूनी तेजतर्रार और फर्राटे के साथ नहले पर दहला मार कर सामने वाले पर भारी हो जाने के लिए विख्यात दिल्ली की मुख्यमंत्री इस बार सांसत में है। अपने प्रिय पीएम साहब के पत्र पाकर भी वे यह तय नहीं कर पा रही हैं कि इसका क्या करे। हालांकि मीडिया में खबर उछालकर इसकी प्रतिक्रिया तो जान ही गई है। ज्यादातर सरदारों को ही यह नागवार लग रहा है कि शहीद भगत सिंह के साथ गद्दारी करने वालों को यह सम्मान क्यों ? पीएम साहब का कोई और फरमान होता तो इसे सीएम साहिबा कब की पूरा करके उसके एवज में भरपूर वसूली कर लेती, मगर इस बार उन्हें यह आदेश ना उगलते बन रहा है और ना ही निगलने का साहस हो रहा है। फिलहाल तो सीएम साहिबा ने चुप्पी साध ली है। मगर यह देखना काफी रोचक और शर्मनाक भी हो सकता है कि आजादी दिलाने वाले शहीदों को सम्मानित करने से भी परहेज करने वाली दिल्ली सरकार क्या एक गद्दार को महिमामंड़ित करने का जोखिम उठाती है ?

 खुशवंत का भोलापन

जीवन में शतातु होने के करीब सरदार खुशवंत सिंह काफी सरल दिल के भोलेभाले      इंसान है। बंद कंचुकी  में किसी भी महिला के वक्ष की लंबाई गोलाई चौड़ाई और उभार नापने में माहिर (एक्सपर्ट भी कहे तो कोई गलत नहीं) सरदारजी किसी भीमहिला की मादकता,और सेक्स की भूख का मापतौल करने में भी काफी दक्ष है। यहीं नहीं किस महिला को किस तरह आनंद के आसमान से लेकर मस्ती के पाताल में लेकर जाया जाए, इसको मापन वाला यंत्र भी सरदारजी के खुराफाती दिमाग में छिपा है। यानी कोई भी महिला या लड़की ( इनके घर की औरतें भी) इनके सामने आते ही सरदारजी की निगाह में स्कैन हो जाती है। मन की बात थाह लेने में माहिर सरदारजी आग लगने से पहले ही हंगामा खड़ा करके तमाशा बनाने में दक्ष है। इसी के बूते नाम यश और भरपूर दौलत कमाने वाले सरदार अपने बाप के मामले में कोरे हैं। बाप शोभा सिंह की गवाही से शहीद भगत सिंह को अपने साथियों के साथ फांसी दे दी गई,मगर खुशवंत की यह दलील कितनी भोली और बालसुलभ (और बेशरम भी) सी लगती है कि मेरे पिता ने तो केवल पहचान की थी। बेशरमी से दुनियां को नंगा करने वाले खुशवंत कुछ तो शरम करो। गद्दार के संतान होने की बेशरमी को तो शर्मसार होने दो।शुक्र है कि महानगर में गद्दारी की पीड़ा नहीं झेली, जो दूसरे गद्दारो के संतानों को आज तक झेलनी पड़ रही है।

सच एक दंड़नीय अपराध है

जमाना बदल गया है। झूठो का बोलबाला है और सच का मुंह काला है।  इसके बावजूद धन्य हो अय्यर साहब लाख खतरा उठाकर भी सच बोलने से आप नहीं घबराते। चापलूसों की लंबी फौज में एक अपन अय्यर ही तो कभी कभार सच उगल बैठते हैं। कांग्रेस को सर्कस कहकर मणिशंकर दा ने तो पार्टी का बैंड बजा दी है। मुंहफट अय्यर के इस बयान पर आलाकमान ने  एक्शन लेने की बजाय चुप्पी साध ली है। वैसे भी पार्टी में आजकल दिग्गी,जेडी,सिब्बल, और जयराम में बोलने की होड़ लगी है। इससे परेशान सुप्रीमों कहा-कहां हाथ डाले।  पार्टी में सच कहना एक दंड़नीय अपराध है। मगर देखा जाता है कि बोल कौन रहा है। अगर सी और डी ग्रेड का कोई बंदा निकला तो झट से एक्शन हो जाती है, मगर बोलने वाले की हैसियत ठीक ठाक रही तो मामले पर मलहम पट्टी लगाकर भूलने की कोशिश होने लगती है।

एचएमवी सिब्बल

अपने मनभावन पीएम साहब कम बोलते है, मगर उनके सबसे टैलेंटी सहकर्मी कुछ ज्यादा ही बोलते है। कभी कभार तो इतना बोलने लगते हैं कि यह तय कर पाना कठिन हो जाता है कि इन पर कोई लगाम है भी या नहीं।लोकपाल को लेकर महाभारत भले ही 16 अगस्त से होगा, मगर कौरवों की तरफ से सिब्बल सत्ता का सारा रौब दिखाने में लग गए। जंतर मंतर पर अनशन करना इस बार मुमकिन नहीं होगा, क्योंकि दिल्ली पुलिस अभी से केंद्र की थाप पर डांस करने लगी है। लोकतंत्र के पहरेदारों ने ही गला दबाने का काम चालू कर दिया है।यह दूसरी बात है कि चांदनी चौक में वकील साहब के खिलाफ धरना प्रदर्शन, जनमत संग्रह का काम चालू हो गया है और इलाके के लोग इस भूंकने वाले सांसद से आजिज हो गए हैं मगर लोकपाल के सामने सीसी टू सीसी की क्या बिसात। यानी लोकतंत्र खतरे में है, मगर पीएम और कांग्रेस सुप्रीमो फिलहाल खामोश है।

दिल्ली में भी बोलो बाबा
केवल दिल्ली को छोड़ कर पूरे देश में आग लगाते फिर रहे और केवल हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद का गीत गाते चल रहे कांग्रेस के अधेड़ युवराज राजधानी के लिए मौनी बाबा है। लोकपाल को लेकर अभी से हंगामा बरपा गया है। कैसा होगा लोकपाल के आकार प्रकार को लेकर सिब्बल और अन्ना की जुबानी जंग सड़कों पर उतर गई है। धमकी, चेतावनी,आगाह करने की बाते भावी रामलीला के दोहराव की आशंका प्रकट कर रही है। बुलंद हौसले के साथ पुलिस ट्रेनिंग कैंप में मार पीट का पाठ पठाया जा रहा है.
यानी लोकतंत्र का गला घोंटने के लिए सरकार तैयार है और अपने पीएम मनमोहन सिब्बल से हालात का जायजा ले रहे है। कांग्रेस सुप्रीमों को यूपी के अलावा कोई फ्रिक नही है। बाबा भी इन दिनों मैराथन यूपी से थक हार कर अपनी थकान मिटाने मे लगे है। दिल्ली से बेपरवाह युवराज जी कभी कभार राजधानी की चिंता कर लिया करो प्यारे , यहां के लोग भी मनमोहन शीला सिब्बल से यूपी वालों से कम त्रस्त नहीं है।

बीजेपी का कांग्रेसी करण

कहा जाता है कि संगत से गुण आत है और संगत से गुण जात। दिन रात कांग्रेस को कोसते कोसते पार्टी का ही कांग्रेसीकरण होता दिख रहा है। कुछ मामलों मे तो यह कांग्रेस से भी आगे निकलती दिख रही है। कांग्रेस के परिवारवाद से परेशान बीजेपी अब अपने यहां वंशज परम्परा को देखकर हक्का बक्का है। हिमाचल प्रदेश में रहकर केंद्र की हमेशा राजनीति करने वाले अपन शांता कुमार को यह भान होने लगा कि पार्टी का तो कांग्रेसीकरण हो गया है। शासन अनुशासन तो खैर रामराज की बात हो ही गई है। कांग्रेस में तो कमसे कम एक नेता है, अगर फरमान जारी हो गया तो फिर उसको साक्षात देव से लेकर दानव कोई नहीं बचा सकता, मगर बीजेपी में तो सहस्त्र धारा है। कर्नाटक के सीएम येदियुरप्पा को हटाना गड़करी साहब के लिए भारी हो रहा है। कुर्सी छोड़ने से परहेज करते हुए सीएम ने अपनी मर्जी और अपनी पसंद की तमाम गोटियों को फिट करने के बाद ही कुर्सी से अलग होने की शर्त रख दी। लाचार आलाकमान कईयों को बेंगलुरू भेज रही है कि सीएम कम से कम तय सीमा के अंदर ही पदत्याग करके पार्टी को किरकिरी से तो बचा ले। हाय गडकरी जी माफियाओं के साथ रहने वाले येदि से संभल कर रहना।

....कांग्रेस की सेहत के लिए नुकसानदेह है

नोएडा समेत पूरे प्रांत में किसानों की भूमि अधिग्रहण का मुद्दा गरमा कर राहुल बाबा फूले नहीं समा रहे है। चिंगारी को आग के गोले में तब्दील होने पर माया सरकार के साथ साथ अपना घर का सपना देख रहे लाखों लोगों के दिनरात का चैन हराम हो गया है। उधर मुआवजे की मांग को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में रोजाना दन दना दन केस डाले जा रहे है। बाबा पूरे इलाके में इस कदर लोकप्रिय हो गए है मानों बस तूफान सा माहौल उफान पर है, मगर कांग्रेसी नेता समेत आलाकमान अब बाबा की नौटंकी के समापन को लेकर चिंतित है। पुराने घाघ कांग्रेसियों का आकलम है कि यूपी में बाबा द्वारा लगाई आग से सबसे ज्यादा खतरा अपनों को ही है। किसान तो कब पलटकर मुलायम माया या कमल की गोद में जा बैठेंगे। पूरा तमाशा वोटबैंक नहीं है, मगर जिनको असल में नुकसान हो रहा है वो आमतौर पर कांग्रेस का ही वोटबैंक है, जो बाबा के इस खेल से आहत और बेघऱ होने के कगार पर है। नुकसान का जायजा लेने पर सबसे घाटे में कांग्रेस के ही रहने की उम्मीद को देखकर  सारे परेशान है। परेशान तो कम बाबा भी नहीं है, मगर वे इतना आगे निकल चुके है कि वापसी की उम्मीद और भी खतरनाक हो सकती है। यानी अपने ही हाथों खुद को जलने की नौबत से तो इस बार बाबा से शानदार प्रदर्शन की उम्मीद भी धुंधली हो सकती है।

खतरे में रामदेव

राखी सावंत को कौन नहीं जानता। मादक हसीन वाचाल और मुंहफट होने के चलते बहुतों के सपनें में भी राखी नहीं आती है। ज्यादातर लोग राखी से दिल लगाने की बजाय राखी बंधवाकर ही अपने मन को संतुष्ट कर लेते है। संसार को योग बताकर योग के जरिए हर रोग के नायाब इलाज का नुस्खा बांटने वाले रामदेव पर फिलहाल राखी सांवत का दिल आ गया है। वो रामदेव को अपना स्वामी मान चुकी है और बस वो अपने प्रियतम स्वामी के बुलावे का इंतजार कर रही है। उधर, जीवनभर ब्रहचर्य पालन करने का संकल्प करने और रखने वाले रामदेव भी राखी के इस प्रस्ताव से हैरान रह गए होंगे। उधर बालीवुड में लगातार पिछड़ रही राखी के लिए प्रचार में बने रहने के लिए कोई धमाका करने की जरूरत थी, लिहाजा हक दिल अजीज रामदेव से ज्यादा पोपुलर बंदा और कौन हो सकता है। रामदेव जी राखी प्रेम से अब सावधानी बरतने की बारी आपकी है। किसी भी दिन पांतजलि में धमक कर आपको धमका भी सकती है। मीडिया के सामने आपके प्रणय निवेदन की सीडी भी रखकर धमाल मचा सकती है। यानी स्वामी  को पाने के लिए फूल से  फूलझड़ी तक बन सकने वाली इस राखी से बचने के लिए बाबाजी इस रक्षाबंधन में राखी बंधवा ही लो नहीं तो मत कहना योग करते करते कब भोग के भी आचार्य बनना ना पड़ जाए। फिर आजकल आपके उपर शनि महाराज की नजर भी कुछ तंग है।

हिना की शिकायत

पाकिस्तानी नेताओं का अबतक रिकार्ड रहा है कि वे भारत में आकर इस कदर प्यार मुहब्बत मेल मिलाप अमन शांति चैन प्यार सदभाव की बाते करने लगते है ति मीडिया समेत पूरा भारत ही इनका दीवाना हो जाता है। लगता है मानो बैर दुश्मनी के दिन अब खत्म होने वाले हैं। मगर भारत से विदाई लेकर इस्लामाबाद लाहौर पहुंचते ही गिरगिट सा रंग बदलते हुए फिर से वहीं नफरत, कटुता, और दोषारोपण का बेरूखा रंग सामने आ जाता रहा है। हिना रब्बानी को भारत आने पर खूब कवरेज मिला,मगर काम से ज्यादा हुस्न और उनकी अदाओं को ज्यादा दिखाया गया। शायद इसीलिए भरपुर कवरेज के बाद भी हिना ज्यादा फूल नहीं पाई। अब हम भी क्या करे हिना जिया बेनजीर और मुर्शरफ साहब से तो यही सबक मिला है कि रगं बदलते लोगों पर यकीन मत करो। खुशगवार रही आपकी यात्रा यही शुक्र माने ।

ट्रीपल ए की बिखरती जोड़ी (अमर अकबक एंथोनी)

मनमोहन देसाई की इस सुपर हिट फिल्म की धमक आज तक बाकी है। असल जीवन में ट्रिपल ए यानी अमर (सिंह-सपा वाले), अमिताभ बच्चन और अनिल अंबानी की मस्त-मस्त जोडी को अमर अकबर और एंथोनी की तरह देखा और माना जाता था। दोस्ती भी इस तरह कि घर में मुंडन से लेकर प्रसूति और घर की साफ सफाई वाले कार्यक्रम में भी हमेशा बिजी रहने वाले ये लोग समय निकाल कर इडियटबाक्स में दिक जाते थे। मगर मुलायम भैय्या से नाता क्या टूटा और वोट 4 नोट मामला क्या गरमाया कि सुपर हिट जोड़ी एकदम फलाप सी हो गई। अब इनके पास समय की इतनी किल्लत हो गई कि सब एक दूसरे की कंपनी से इस्तीफा इस वजह से देने लगे कि मौका नहीं मिल पा रहा है। यह अलग बात है कि अमर को लतिया कर बाहर निकालने वाले मुलायम भैय्या फिलहाल तरस खाकर अम्मू के साथ खड़े हो गए है। इसे कहते है प्रेम अम्मू नरेश प्रेम जो मुलायम ने आड़े समय में दरशा दिया, जबकि मुंबईया लोगों ने मुंह फेर करक्या दिखा दिया  ?  यह तो आप समझ रहे है ना ?

गजनी बनती राजा की जुबान और कलमाड़ी
आड़े समय पर राजा यानी देश के सबसे बड़े घोटाले के राजा तिहाड़ से बाहर निकलते ही 2-जी स्प्रेक्ट्रम घोटाले में पीएम होम मिनिस्टर से लेकर अपने हेड करूणानिधि क का नाम लेकर लपेटना चालू कर दिया। मगर पता नहीं कौन सा प्रेशर पड़ा या क्या दिखा दिया गया कि बागी तेवर दिखा रहे राजा एकदम सुस्त प्रजा की तरह सब पालतू मानने लगे। यही हाल अपने दबंग खिलाड़ी सुरेश बाबू यानी कलमाडी की है। इन्हें भूलने का रोग लग गया। भारी भरकम घोटाले को बूलकर पूरे देश को उल्लू बनाते हुए करूणामूलक आधर पर सजा से बचने का प्लान था, मगर भला हो कोर्ट को जो इस घपलेबाज खिलाड़ी के चककर में ना आकर नाना प्रकार के जांच करा कर रिपोर्ट देने का फरमानव सुना डाला। कोर्ट की फटकार से गजनी बन रहे कलमाड़ी को सब याद आ गया और सफाई देनी पड़ी कि वे कभी गजनी नहीं थे।

महाबलि बनते बनते क्या हुआ महाबल

मात्र दो दशक के भीतर ही पार्षद से पोलिटिकल यात्रा शुरू करके पार्षद  और विधायकी के रेस को लांघते हुए महाबल वेस्ट दिल्ली से सांसद बन गए। सांसद बनते ही फूल कर कुप्पा हो गए महाबल आजकल बोलने की बजाय घिघियाने लगे है।  पता चला कि इन पर बाहरी दिल्ली में कहीं जमीन हथियाने का आरोप है। जिसे वो अपने भाई पर दोषारोपण करते हुए महाबल का यह महा बहाना कि भाई के साथ बेहतर रिश्ता नहीं है, किसी के गले नहीं उतर रहा है। यानी आग लगी है, मगर महाबल इसमें अपना हाथ ना मान कर भाई का घोटाला बताकर खुद को बेदाग साबित करने में लगे है। खुदा खैर करे महाबल जी सोत लो कुर्सी तो परमानेंट नहीं ह मगर भाई से तो जन्म जन्म का नाता है।

प्रेसक्लब डायरी / अनामी शरण बबल-1



24जुलाई2011

 मनमोहन, सोनिया और राहुल के ट्यूटर जेडी
कांग्रेस में जेडी का बड़ा जलवा है। जेडी यानी जर्नादन द्विवेदी। सोनिया गांधी देश में जो कुछ भी बोलती है, वो जुबान भले ही सोनिया की हो मगर हर शब्द का राईटर जेडी होते है। हिन्दी के जानकार जेडी को इसका पूरा इनाम भी मिला है। दिल्ली  हिन्दी अकादमी से उठाकर मैडमजी ने सीधे राज्यसभा सांसद बनवा दिया। हिन्दी वाणी और सोनिया की जुबानी का जादू कुछ इस तरह को है कि ज्यादातर लोगों को सोनिया की भाषा पसंद आने लगी। राहुल के लिए भी पटकथा लिखने वाले जेडी युवराज से थोड़ा परेशान रहते है, राहुल बाबा इसमें कभी कभी इतना संशोधन कर देते हैं कि पटकथा राईटर का पूरा श्रेय बाबा खुद ले जाते हैं। मगर जेडी को सबसे ज्यादा दिक्कत होती है अपने ईमानदार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए 15 अगस्त की पटकथा लिखने में। हिन्दुस्तान के पीएम होने के बाद भी साल भर में केवल एक दिन यानी 15 अगस्त को हिन्दी बोलने वाले पीएम मन साहब को हिन्दी बोलने में काफी परेशानी होती है। उनके लिए सरल से सरलतम भाषा में पटकथा लिखना और हर शब्द के उच्चारण का रियाज कराते हुए उन्हें उस शब्द को फर्राटे से बोलने का प्रैक्टिस कराने का पूरा जिम्मा जेडी को दी जाती है। व्यस्त रहने वाले पीएम तो हमेशा फ्री होते नहीं, लिहाजा समय असमय देर रात को पीएम हाउस में जेडी को तलब की जाती है। और अपने हिन्दी के मास्टर  जेडी साहब  को पीएम दरबार में जाकर अंग्रेजी दां मन साहब को हिन्दी का ककहरा जुबान पर याद दिलानी पड़ती है। अपने जेडी साहब फिलहाल 15 अगस्त तक सांसत में है, क्योंकि अगर कभी पीएम की जुबान से कोई शब्द फिसल गई तो इसका खामियाजा अपने हिन्दी के गौरव जेडी को चुकानी पड़ सकती है।


 कांग्रेसी महाजन

रंग रूप और पेशा बदलने में गिरगिट को भी मात देने वाले पत्रकार से सांसद बने राजीव शुक्ला के संसदीय मंत्री बनते ही ढेरो उधोग घरानों की पौ बारह हो गई है। पिछले चार माह से साउथ एवं नार्थ ब्लाक में ज्यादातर लोगों के लिए वर्जित सा हो गया था। मगर मुकेश से लेकर अनिल अंबानी गोदरेज और कई मोबाइल कंपनियों के स्वामी  राहुल से मिलकर सुकून महसूस कर रहे है। राहुल से जलने वालों की कोई कमी नहीं है। दिल्ली की राजनीति करने वाले एक कांग्रेसी ने शुक्ला के बारे में बतायाकि यह आदमी भाजपा के प्रमोद महाजन का भी बाप है..एक ही साथ सोनिया राहुल प्रणव ममता माया नीतिश लालू और मनमोहन से लेकर नरेन्द्र मोदी को तक को साधने में माहिर है। इस पर सबका एक समान यकीन भी होता है। टाटा बिरला अंबानी गोदरेज सहारा भारती से लेकर दर्जनों मल्टीनेशनल वाले भी इसके आगे पीछे मंडराते रहते है। यानी सौ तालों की एक चाभी शुक्लाजी के मंत्रीमंडल में आते ही क्रिकेट से लेकर बालीवुड तक के लोगों को दिल्ली में काम कराना आसान सा हो गया।


फिर निकल गई लालू पासवान की हवा


मंत्री बनते बनते रह गए लालू इन दिनों काफी हताश है। एकाएक नीतिश राज में जमीन घोटाला की खबर पाते ही मानो लालू ने अंगड़ाई ले ली हो। मगर नीतिश ने नहले पर दहला फेकते हुए जांच के आदेश और सबों के उपर कार्रवाई का फरमान जारी करके ेक बार फिर लालूपासवान की हवा निकाल दी।अपनी सुस्ती और निराशा को फेंकते हुए वे पटना में जाकर हंगामा करने की ठान ली। पासवान के साथ मिलकर इस घोटाले को सार्वजनिक करने की रणनीति पर मंथन करने लगे। दोनों मिलकर अभी नीतिश को घेरने की योजना ही बना रहे थे कि नीतिश ने जमीन के आवंटन को रद्द करके सबों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दे डाला। यानी मंत्री बनते बनते संतरी बन गए लालू के हाथ फिर खुछ नहीं आया। जब लालू से संपर्क साधा गया तो वे कन्नी काटते हुए अपनी पीड़ा प्रकट की। का करे लड्डू मिलते मिलते तो लकठो (एक मिठाई)भी नहीं मिल पाया।


घर में भी तो .कभी शेर बनो अन्ना

आमतौर पर ज्यादातर लोग घर के शेर होते है। घर से बाहर निकलते ही दुबक जाने वाले घरेलू शेर अपने घर में सबों के सामने भूंकते रहते है। मगर अन्ना के साथ मामला ही कुछ और है। दाद  देनी होगी वे बाहर इतने दबंग और निर्भीक हो जाते हैं कि क्या पीएम से लेकर सीएम, होम मिनिस्टर और सिब्बल, दिग्गी से लेकर राहुल सोनिया सबों  पर लाठी भांजने लगते है।  वाकई अन्ना हजारे ने इस बार कमाल कर दिया। लोकपाल बिल क्या आया कि अन्ना अपने जीवन में प्रचार और नाम कमाने के गोल्डेन युग का स्वाद ले रहे है। अन्ना का यह पुराना रिकार्ड रहा है कि वे महाराष्ट्र की सीमा मे रहते हुए अपनी जुबान हमेशा बंद रखते हैं। चाहे बाल ठाकरे और राज ठाकरे की गुंड़ई का मामला हो या आदर्श घोटाला हो या कोई भी होराफेरी हो, मगर अन्ना एक शरीफ आदमी ही बने रहते है। लोकपाल और घोटालो को एक राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में अन्ना का योगदान है, मगर बाल(राज,उद्वव) ठाकरे के सामने हमेशा अपनी जुबान बंद रखने वाले अन्ना क्या पिछले छह माह के दौरान मुंबई-दिल्ली की हवाई यात्राओं के खर्चे का हिसाब सामने रखना पंसद करेंगे कि उनका खजांची कौन है जिसके बूते वे आजकल हवा में रहकर हवाई बाते करने लगे हैं।

 बातूनी पोलिटिक्स खतरे में  

लगता है बोलने की कला में माहिर वाचाल नेताओं समाजसेवकों पर शनि की चाल ठीक नहीं है। देश भर में आग लगाते हुए कभी घूमने वाले प्रवीण तोगडिया कहां गायब हो गए। शायद यह पता लगाने के लिए अखबारों का सहारा लेना पडे। काला धन का देश व्यापी राग अलापने वाले अपने योग गुरू का दिल्ली के राम(देव) लीला में इस तरह की पटकनी दी गई  कि एक माह से ज्यादा हो गया अब ना पेपर में ना टीवी में बाबा रामदेव दिख रहे है ना ही बोल रहे है.। हाजिरजवाब और हमेशा नहले पर दहला मारने वाले अपने अमर सिंह भी मुलायम से अलग होते ही गुम से हो गए. मगर अपने अमर बाबू संसद में नोट 4 वोट के खेल में इस तरह घिरते जा रहे हैं कि अब इनको भी पालिटिकल मंदिर तिहाड़ जाने का खतका दिखने लगा है। जुबानी राजनीति करने वाले अमर इस संकट से कैसे पार पाएंगे। यह देखना सबसे दिलचस्प लग रहा है।

. और अब एनडीएमसी सुप्रीमों घेरे में .

 कामनवेल्थ गेम भले ही खत्म हो गया हो, मगर इस खेल के करप्ट खिलाड़ियों की धरपकड़ का काम अभी चालू है। आयोजन समिति के मुखिया कलमाड़ी साहब तो जेल में जाकर भी कईयों को अपना शिकार बना डाला। एनडीएमसी के मुखिया परिमल राय पर भी करप्शन के दाग जगजाहिर होता दिख रहा है। करप्शन की जांच कर रही शुंगलू कमेटी ने परिमल पर सवाल उठाते हुए उनके शहरी विकास मंत्रालय में जाने की तमाम संभावनाओं पर पानी फेर दिया। शुंगलू कमेटी ने होम मिनिस्टर को पत्र लिखकर परिमल राय के तबादलों पर रोक लगाने की सिफारिश की। कमेटी को आशंका है कि शहरी विकास मंत्रालय में जाकर परिमल जांच में बाधक बन सकते है। यानी परिमल के दागदार होने से बचने की तमाम संभावनाओं पर पानी फिरता दिख रहा है।



बुढौती में जिद

काग्रेस में रहकर जीवनभर मलाई चाभने और सुंदर कन्याओं के समीप रहने वाले पूर्व सीएम एनडी तिवारी का बुढ़ापा जलालत बनता जा रहा है। दक्षिण में राज्यपाल रहते हुए कन्याओं के शौकीन साहव कुछेक कन्याओं के संग रासलीला मनाते हुए राजभवन में ही पकड़े गए। इज्जत गंवाकर दिल्ली पहुंचे नेताजी को अपना बाप मानने वाला एक युवक ने कोर्ट से यह गुहार किया कि इसकी जांच कराई जाए। कोर्ट के सख्त रवैये के बाद भी अपने खून कासैंपल देने से इंकार करते हुए तिवारीजी ना नुकूर कर रहे है। अब उनको यह डर सताने लगा है कि डीएनएन टेस्टके बाद तो फिर कोई बहाना नहीं चलेगा। काम वासना के ता उम्र गुलामी करने वाले नेताजी ही क्या पूरे देश को सब पता है मगर जिद में ही सबकी भलाई है।

आय से अधिक के फेर में ताउ खानदान

आय से अधिक संपति होना तो नेताओं की शान होती है, मगर कोर्ट कचहरी का बुरा हो , जो खुर्दबीन लगाकर नेताओं की संपति का लेखाजोखा करने लगी है। हरियाणा के ताउ देवीलाल के सुपुत्र ओम प्रकाश चौटाला और इनके दोनों सुपुत्र अभय और अजय चौटाला इन दिनों आयसे अधिक संपति होने के आरोपों का सामना कर रहे हैं। कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाते हुए देवीलाल के परिजनों की तमाम सफाईयों के बाद भी कोर्ट यह मानने को राजी नहीं है कि करोड़ों अरबों की यह संपति पुश्तैनी है। सवाल लाख टके की यह है  कि यह मामला कब तक निपटता है।



सज्जन की सज्जनता

1984 के दंगों के आरोपों से घिरे पूर्व सांसद सज्जन कुमार वाकई एक सज्जन पुरूष है। इन दंगों के भूत से उन्हें 28 साल के बाद भी छुटकारा नहीं मिल पा रहा है। कोर्ट कचहरी और जांच ट्रिब्यूनलों के चक्कर में सांसद बनना कठिन हो गया। अब तक सब्र वान होने का प्रमाण दे रहे सज्जन आखिरकार कोर्ट में बेसब्र हो गए और अपने गवाहों और चश्मदीदों की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठाते हुए उनके पाक दामन होने का मुद्दा रखा। सज्जन कुमार का यह विलाप क्या रंग लाएगा, इसका फैसला तो वक्त ही करेगा, मगर अब जाहिर हो गया है कि खामोशी के खोल से बाहर निकलते हुए सज्जन कुमार अब जल्द से जल्द निपटारा चाहते है।

कांग्रेसी भोंपू

कांग्रेस में आजकल काम कम और बातचीत ज्यादा हो रही है। रोजाना हंगामा खड़ा करना ही मेरा मकसद है की तर्ज पर सिब्बल दिग्गी जेडी को कुछ भी कहीं पर भी बोलने या चीखने  कीछूट मिली हुई है। पार्टी की साख बचाने के लिए यह जरूरी भी है, क्योंकि युवराज तोदिल्ली में तो मौनी बाबा का रूप धारण कर लेते है।सोनिया अम्मां भी रायबरेली औरअमेठी से पहले कुछ नहीं बोलती। और बाल बच्चों  से छुटकारा पाकर प्रियंका दीदी भी कभी कभार ही मदर या ब्रदर के  हंगामा खड़ा करती है। यानी पार्ट टाईम पोलटिक्स कर रहे गांधी खानदान के महारथियों के पास देश या पार्टी के लिए फुल टाईम नहीं है। और अपने महान शांत और ईमानदार पीएम भी जरूरत से ज्यादा कभी नहीं बोलते। वे इतना कम और धीमा बोलते हैं कि ज्यादातर लोगों को इनकी आवाज नहीं सुने  है।  इस खालीपन को भरने के लिए ही हमेशा बोलने के लिए वि(कु) ख्यात सिब्बल जेडी और दिग्गी(राजा) को खुला छोड़ दिया गया है। साहित्यकारों के संग रहने की वजह से जेडी तो अपने उपर लगाम लगा लेते हैं,मगर कोर्ट में चीखने के अभ्यस्त वकील साहब घर से लेकर संसद और गली मोहल्लातक भूलजाते है कि यहां बोलना मना है। मधेशिया से बाहर आए दिग्गी को भी  जुबान के बूते ही दिल्ली मे टीकना है, लिहाजा अपनी नौकरी और सरकारी घर बचाने के लिए  (बे) मतलब का कुछ भी बोलते रहना बहुत जरूरी है। आजकल पार्टी भी इन्हीं भोंपूओं के बूते देश में कहीं अपने होने का अहसास करा रही है.

,कलमाड़ी रोग

आमतौर पर नेताओं को भूलने का रोग होता है। जनता से वादा करके बड़ी बेशर्मी से भूल जाना या अपनी जनता को देखकर उसको ना पहचानना आम बात होती है। नेताओ को ना चाहे  को भूलने में ही अपना हित नजर आता है। कामनवेल्थ गेम मे भारी घोटाला करके तिहाड सुख ले रहे सुरेश कलमाड़ी को भी भूलने का रोग हो गया है। हालांकि कोर्ट को इनके रोग पर यकीन नहीं हो रहा है, तभी तो एम्स में एमआरआई   करके डाक्टरों से रपट मांगी है। अब देखना यही है कि सेटिंग करने में सबसे अव्वल कलमाड़ी इस बार क्या एम्स के डाक्टरों पर दाना डालते हुए सेट कर पाते हैं।  गेम घोटाला की तरह ही रोग का गोरखधंधा भी कलमाड़ी को शर्मसार करने के लिए तैयार है। हालांकि माना तो जा रहा है कि इनको यह रोग वकीलों के कहने पर हुआ है ,मगर जांच में तो दूध का दूध और पानी के अलग होने की उम्मीद है।

मम्मी चिंता

आमतौर पर मां की चिंता से हर बेटा को चिंतित होना ही चाहिए, और आजकल पूर्वी दिल्ली जिसे यमुनापार भी कहा जाता है के युवा ( और कभी कभार दिखने वाले) सांसद संदीप दीक्षित भी काफी चिंतित है। वजह , दिल्ली की सीएम मम्मी शीला दीक्षित भी आजकल कई तरह की दिक्कतो से  दो चार हो रही है। एक तरफ एलजी की बंदूक सीएम पर है। उधर लोकायुक्त मनमोहन सरीन भी शीला को पस्त करने में लगे है। शुंगलूकमेटी  रपट में शीला पर भी गेम घोटाले के छींटे पड़े है। पार्टी के भीतरघात से अलग दिक्कत चल रही है। अब देखना है कि अपने खासमखास राजकुमार चौहान को मनमोहन के फंदे से बचाने वाली शीला इस बार गरीबों को मकान देने के झूठे प्रचार से इस बारकैसे बच पाती है। मम्मी की चिंता ओढ़कर शीला के सांसद पुत्र क्या कुछ नया पैंतरा चलेंगे यह तो राम ही जाने।

द्वारका लैईन में मेट्रो परेशानी

मेट्रो को दिल्ली का लाईफलाईन या जीवनरेखा मानने वाले विरोधी लोग भी दिल्ली की सीएम शीला के इस काम की तारीफ करना नहीं भूलते। ज्यादातर लोग यह भूल चुके है कि इसकी शुरूआत बीजेपी काल में ही हो गया था। मगर शीला और बीजेपी के साथ साथ मेट्रो सुप्रीमो  श्रीधरण को जमकर आज भी कोसने वालों की कोई कमी नहीं है। खासकर द्वारका से लेकर सीपी के बीच में पड़ने वाले लाखो लोग तो इसे मेठ्रो करप्शन मानते है, और इनकी शिकायत जायज भी है। धरण से लेकर अनुज दयाल की लाख वकालत और के बादभी इस रूट में कब और कहां पर मेट्रो का डिब्बागोल हो जाए ये तो मेट्रोमैन को भी नहीं पता। कमाल तो ये है कि इस रूट पर अब तक सैकड़ों बार मेट्रो का दम टूट चुका है फिर भी मेट्रो इंजीनियरों को बीमारी का पता नहीं लग पाया है। यानी दिल्ली से जाने की तैयारी कर रहे धरण  इस  प्रोब्लम को सुलझाए बगैर ही भागने वाले है।

नेताओं और नौकरशाहों की हरियाली

अपनी दिल्ली हरी भरी है। लाखो पेड़ लगे हैं और हरियाली को औरज्यादा करने के नाम पर साल में कई-कई बार लाखों पेड़ लगाए जाते हैं। कभी कामनवेल्थ के नाम पर लाखों पेड़ लगते हैं तो कभी मेट्रो के नाम पर पेड़ों को लगाया जाता है। बगैर किसी हंगामे के एमसीडी और एनडीएमसी द्वारा हर साल लाखों पेड़ लगाकर हरियाली को और घना किया  जाता है। पेड़ लगाने के बाद टै्कर से सिंचाईऔर मालियों को रखकर देखरेख भी कराया जाता है। यानी करोड़ो की होली के बाद हरियाली से दिल्ली के लोग चैन से रहते हैं। आक्सीजन बैंक के नाम पर लगने वाले करीब 95 फीसदी पेड़ एक माह के अंदर मुर्छा जाते है या गायब हो जाते है। दिल्ली की हरियाली कागजों मे और नेताओं नौकरशाहों के घर की हरियाली से राष्ट्रपति भवन का गार्डन भी शर्मसार होने लगता है।







 नेताओ, नौकरशाहों और दलालों की चांदी
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देश भर में विकास की योजनाओं को हरी झंड़ी देकर अमूमन सो जाने वाला योजना आयोग इस समय कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो उठा है। कई सरकारों औरएनजीओ द्वारा बच्चों को 10रूपए और 20 रूपए में बढ़िया खाना देने पर कटघरे में ला दिया है.। भरपूर
आहार देने के तरीकों पर खफा है। यानी अहलूवालिया साहब थोड़ा रंज होकर  इस राशि को और बढ़ाकर नेताओ, नौकरशाहों दलालों और ठेकेदारों की चांदी करने वाले है।
 एमसीडी में समानांतर सत्ता 

272 पार्षदों वाली एमसीडी में यों तो गुटबाजी गिरोहबंदी एक दूसरे को पछाड़ने, मार काट की राजनीति चलती ही रहती है, मगर अब निगम के आला अधिकारियों के बीच भी अपनी पहचान और धाक जमाने का नया खेल शुरू हो गया है। खासकर निगमायुक्त केसी मेहरा को इस बार चुनौती मिली है एडीशनल कमीश्नर  दिग्गल से। यहां के सबसे करप्ट फैक्ट्री लाईसेसिंग डिपार्टमेंट के सभी इस्पेक्टरों को एक ही झटके में पत्ता साफ कर दिया। जनक दिग्गल की इस कार्रवाई से मेहरा भी भौंचक रह गए,मगर कुछ बोल नहीं सके। निगम के 55 साल के इतिहास में पहली बार धमाल करने वाले दिग्गल को लेकर खूब शोर है। अब देखना ही है कि अपने मातहत दिग्गल की लोकप्रियता को मेहरा बर्दाश्त कर पाते हैं या दूसरे आफीसरो की तरह इनको भी ऱूखसत करके ही दम लेंगे।
सिफारशी लेटर की राजनीति

सिफारशी लेटर की राजनीति करने वाले विपक्ष के नेता पंडित जयकिशन शर्मा केसिफारिशी लेटर की पूरे निगम में धूम है। हर एक के लिए सिफारिशी लेटर लिखने को हमेशा तैयार जयकिशन के लेटरों के बूते दर्जनों अधिकारी निगम में रौब झाड़ रहे है। फैक्ट्री लाईसेंसिंग डिपार्टमेंट मेंपहले एओ बने गुप्ता को लिखे पत्र से जयकिशन की खूब किरकिरी हुई थी। वहीं आजकल नए इंस्पेटर बनकर आए दिनेश कुमार शर्मा भी भोंपू बनकर विपक्ष के नेता की सिफारिशी लेटर का हवाला देकर अपना रौब गांठने में लगे है। घाघ और पुराने कांग्रेसी नेता होकर भी नौसिखुओं को लेटर लिखने से इन्हें परहेज करना होगा अन्यथा दिनेश कुमार शर्मा अपने साथ साथ जयकिशन शर्मा की नाव को लेकर डूबते नजर आएंगे।

18अखिलेश की मुलायम लीला

नोएड़ा के भट्टा पारसौल में किसानों को भड़काकर कांग्रेस के राहुलस बाबा ने पूरे यूपी का पोलिटिकल तापमान हाई कर दिया है। भूमि अधिग्रहण विवाद इतना गहराया  कि नोएडा के सैकड़ों गांव अब इसमें कूद पड़े है। नोएड़ा अथारिटी समेत प्रदेश की मुखिया मायावती भी राहुल बाबा द्वारा लगाए इस आग के असर से परेशान तबाह है। यूपी का शंमा ही बदला सा है। हालांकि आग का यह गोला चुनाव तक वोट में रह पाता है या नहीं यह तो कोई नहीं जानता, मगर बाबा लीला से अपन मुलायम भैय्या भी कम परेशान नहीं है। राहुल की सक्रियता को देखकर मुलायम ने अपने सांसद पुत्र को भी जबरन मैदान में भेजा। बाबा के समानांतर अक्कू को खड़ा करने में नाकाम मुलायम अपने बेटे को पोलिटिकल घूंटी नहीं पीला पा रहे है। हालांकि पूर्वाचल का दौरा कर रहे अक्कू जनता की बजाय पत्रकारों पर डोरे डाल रहे है। वेतन के लिए गठित मजीठिया आयोग की सिफारिशों को लागू कराने के लिए संसद में संघर्ष करने का दावा करते फिर रहे अक्कू लीला से पत्रकारों के साथ साथ सपा को कितना लाभ होगा ये तो मुलायम बाबू भी नहीं बता सकते हैं।

अन्ना लीला से पहले

राम(देव) लीला के बाद 16 अगस्त से दिल्ली में अन्ना हजारे की लीला चालू होने वाली है.। सत्ता को चुनौती देते हुए अन्ना लोकपाल बिल के लिए पीएम से लेकर तमाम लोगों पर हमला कर रहे है।मगर अन्ना की रैली को सफल बनाने के लिए अन्ना गुट के लोग मोबाइल से मैसेज देकर कार्यकर्त्ता बनने की गुजारिश कर रहे है। एक ही मैसेज कई मोबाइल नंबरों से आते है। तो वहीं दूसरी तरफ रामलीला मैदान से रामदेव की हवा निकालने वाली यूपीए सरकार इस बार अन्ना की हवा निकालने के लिए तैयार बैठी है। रामदेव की तरह ही अन्ना को भी कुचलने की धमकीदेने वाला संदेश भी दिल्ली के मोबाइल धारको को लगातार मिल रहे है। बुलंद हौसलके साथ अन्ना एंड कंपनी को खामोश करने के लिए महाभारत की रणनीति बनाने में कांग्रेस के महारथी लगे है। अब देखना यही है कि हमेशा मीठा बोलने वाले ईमानदार  मनमोहन के राज में क्या जनहित और देशहित में आवाज उठाना भी संभव होगा या दिल्ली पुलिस के डंडों के आगे पीएम की ही बोलती बंद होकर रह जाएगी।

साख बचाना भी भारी
दिल्ली विधानसभा में बैठकर कुछ माह पहले अवैध निर्माण के खिलाफ एक स्पेशल टास्क फोर्स गठित करने और सघन अभियान चलाने का प्रस्ताव पारित किया।   अब  फोर्स ने काम चालू कर दिया तो भाजपा समेत तमाम कांग्रेसी भी इसके खिलाफ होकर इसे बंद कराने के लिए   सरकार को घेरने लगे। सबको अपना अपना वोट बैंक खिसकता हुआ दिख रहा है। टास्क फोर्स को हटाने और तोड़े गए मकानों को अनुदान दिलाने की मांग जोर पकड़ती दिख रही है। अगले साल निगम में चुनाव है। एकतरफबीजेपी दोबारा सत्ता में लौटना चाहती है, तो फिर से कांग्रेस को निगम में जीत दिलाकर
शीला कोई बड़ा प्लान कर रही है। मगर जनता को रूलाकर और घर से उजाड़कर तो शीला को साख बचाना भी भारी पड़ेगा।


कारपोरेट मीडिया का अन्ना ऑब्‍सेशन






जगदीश्‍वर चतुर्वेदी
अन्ना हजारे ने अपने अनशन की घोषणा कर दी है। वे 16 अगस्त से अनशन पर बैठेंगे। असल में इस अनशन का कोई अर्थ नहीं है। अन्ना हजारे की राजनीति का आधार है ‘मैं सही और सब गलत’ । लोकतंत्र में ‘ मैं’ के लिए जितनी जगह है उससे ज्यादा ‘अन्य’ के लिए जगह रखनी होती है। अन्ना के राजनीतिक एजेण्डे में ‘अन्य ‘ के लिए कोई जगह नहीं है। अन्ना की राजनीति में ‘जिद’ का बड़ा महत्व है,यह ऐसे व्यक्ति की जिद है जिसकी कोई सामाजिक जबावदेही नहीं है। अन्ना और उनकी टीम की लोकतंत्र के मौजूदा ढ़ांचे में कोई जबाबदेही नहीं है। वे सर्वतंत्र-स्वतंत्र हैं।
अन्ना की पूरी समझ इस धारणा पर टिकी है कि ‘सरकारी लोकपाल’ भरोसेमंद नहीं है। वे ‘सरकार’ के प्रति संदेह की नजर रखते हैं। सरकार के प्रति अविश्वास के आधार पर राजनीति नहीं चलती। सरकार के प्रति आलोचनात्मक हो सकते हैं लेकिन सरकार के पक्ष को पूरी तरह दरकिनार नहीं कर सकते। आखिरकार सरकार भी तो देश की बृहत्तर जनता का प्रतिनिधित्व कर रही है। जबकि अन्ना तो अपने गुटों और सहयोगी संगठनों का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
अन्ना की एक अन्य दिक्कत है कि वे हथेली पर सरसों जमाना चाहते हैं। लोकतंत्र में यह संभव नहीं है। तानाशाही में यह संभव है कि किसी एक ने कहा और उसे सारे देश पर थोप दिया गया। अन्ना की जिद है जो कहा है उसे मानो।जैसा कह रहे हैं वैसा करो। जिस दिन करने को कह रहे हैं उसदिन करो। अन्ना का स्वभाव लोकतंत्र की प्रक्रियाओं के बाहर रमण करता है। वे चाहते हैं भ्रष्टाचार पर लगाम लगे,भ्रष्ट लोगों को दण्ड मिले लेकिन मुश्किल यह है कि वे इसे अपनी गति और मति के आधार पर करना चाहते हैं।
अन्ना की गति और मति का लोकतंत्र की गति और मति से दूर-दूर तक तार नहीं जुड़ता। अन्ना लोकतंत्र के डिक्टेटरर हैं। लोकतंत्र में डिक्टेटरशिप नहीं चलती चाहे जितनी भी अच्छी बातें करे डिक्टेटरर। अन्ना की पहले अनशन के समय मांग थी कि सारे देश में मजबूत लोकपाल की स्थापना हो और उसके लिए तुरंत लोकपाल बिल लाया जाए। केन्द्र सरकार ने उनकी यह मांग बुनियादी तौर पर मान ली है और संसद के अगस्त से आरंभ हो रहे सत्र में लोकपाल बिल पेश होने जा रहा है। अनशन आरंभ होने के बाद अन्ना ने स्टैंड बदला और कहा कि लोकपाल के लिए संयुक्त समिति बने जिसमें सरकार और ‘अन्ना ब्रॉण्ड सिविल सोसायटी’ के लोग हों। सरकार ने यह भी मान लिया। संयुक्त मसौदा समिति बना दी गयी। बाद में अन्ना स्वयं ही समिति में चले आए जबकि आरंभ में वे किसी समिति में रहना नहीं चाहते थे। मजेदार बात यह है कि अन्ना क्या चाहते हैं और उनकी मांगे क्या हैं उनके विवरण और ब्यौरे बादमें आम जनता में आए। आरंभ में मांग थी लोकपाल बिल लाओ।
अन्ना अब कह रहे हैं केन्द्र सरकार ने लोकपाल बिल का जो मसौदा तैयार किया है वह देश की जनता के साथ छल है। अन्ना जानते हैं छल तब होता है जब कोई बात छिपायी जाए। धोखा तब होता है जब ठगा जाए। केन्द्र सरकार ने अपने नजरिए से न तो ठगा है और न किसी को धोखा दिया है। केन्द्र सरकार ने कभी नहीं कहा कि वह अन्ना की सारी बातें मानते हैं।
केन्द्र सरकार ने अपने नजरिए से एक लोकपाल बिल तैयार किया है और उसे वह संसद में पेश करने जा रही है। सांसदों के ऊपर है कि वे उसे किस रूप में पास करें। केन्द्र सरकार ने लोकपाल बिल का वायदा किया था और वे जिस नजरिए से देख रहे हैं उसके आधार पर एक मसौदा संसद में पेश करने जा रहे हैं। सारी चीजें पारदर्शी हैं। अन्ना के लोग खुलेआम जितना बोल रहे हैं और अपनी असहमतियों का इजहार कर रहे हैं वैसा अन्य दल नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि मीडिया ने सारे मसले को अन्ना बनाम सरकार का मसला बना दिया है।
अन्ना और सरकार के अलावा अनेक राजनीतिक दल हैं और विभिन्न किस्म के सैंकड़ों संगठन हैं जिनकी लाखों-करोड़ों की मेम्बरशिप है। मीडिया की बहस में ये संगठन एकसिरे से गायब हैं। इससे एक बात का पता चलता है कि अन्ना को लेकर मीडिया ऑब्शेसन का शिकार है। मसलन् विभिन्न विचारधारा के महिला,किसान ,मजदूर,युवा और छात्र संगठन हैं,इसके अलावा ऐसे भी स्वयंसेवी संगठन हैं जिनकी सैंकड़ों यूनिटें हैं। इनकी राय एकसिरे से गायब है।
कारपोरेट मीडिया का अन्ना के प्रति ऑब्शेसन इस बात का सबूत है कि वह भारत की बृहत्तर ओपिनियन की उपेक्षा कर रहा है। विगत दिनों टीवी स्टूडियो में डिशकशन के नाम पर जो भीड़ अन्नाभक्तों की जुटायी गयी थी वह भी कारपोरेट मीडिया के अन्ना ऑब्शेसन को ही सामने लाती है। अन्न्भक्त स्टूडियो में अन्नाटीम से भिन्न राय व्यक्त करने वालों को हूट कर रहे थे।
अन्नाभक्तों की बॉडी लैंग्वेज में लोकतांत्रिक विनम्रता नहीं है। वे आक्रामक और उद्धत हैं। जबरिया मनवाने में विश्वास करते हैं और मीडियासेवी लोग हैं। इन्हें लोकतंत्र के अधीर नागरिक कहना समीचीन होगा। लोकतंत्र अधीरों से नहीं धीरवान समाज से चलता है। लोकतंत्र में जिद्दीभाव की नहीं लोकतांत्रिक भाव की जरूरत है। लोकतंत्र ‘मैं ‘का नहीं ‘हम’ का खेल है।
लोकतंत्र में व्यक्ति नहीं संस्थान महत्वपूर्ण हैं। अन्ना -मनमोहन,सिविल सोसायटी-कांग्रेस-भाजपा-माकपा आदि से बहुत बड़ा दायरा है लोकतंत्र का। लोकतंत्र का आधार हैं संस्थान। संस्थानों की अपनी काम करने की गति है। उस गति की उपेक्षा करने से लोकतंत्र के नष्ट हो जाने का खतरा है। अन्ना की मुश्किल यह है कि वे लोकतंत्र के साथ संस्थान की गति के बाहर रहकर संबंध बनाना चाहते हैं।
अन्ना का 16 अगस्त को अनशन पर बैठना एकसिरे से गलत है। उन्हें लोकपाल बिल के अंतिम शक्ल लेने तक का इंतजार करना चाहिए। अभी पहला चरण है जिसमें मसौदा तैयार हुआ है और वह संसद में जाएगा तो उसको अन्य प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। इसमें जो भी समय लगे वह देना होगा ,लेकिन अन्ना के पास धैर्य नहीं है। अधीरता से अन्ना की छोटी टीम तो चल सकती है लोकतंत्र नहीं चल सकता। लोकतंत्र में प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं और उसके विभिन्न चरणों में गति बनाए रखने के लिए अपार धैर्य की जरूरत है।
अन्ना की एक और मुश्किल है कि वे लोकतंत्र के काल्पनिक संसार में रहते हैं। लोकतंत्र को कल्पना में पाना और संस्थान की प्रक्रियाओं में ठोस रूप में देखने में जमीन- आसमान का अंतर है। लोकतांत्रिक संस्थाएं भेड़-बकरी नहीं हैं जिन्हें कोई चरवाहा हांककर ले जाए।
लोकपाल बिल आरंभ है यह अंतिम पड़ाव नहीं है लोकपाल का। अन्ना की मुश्किल है कि वे लोकपाल और भ्रष्टाचार के भविष्य की सारी समस्याएं एक ही साथ पूरे परफेक्शन के साथ सिलटा देना चाहते हैं। लोकतंत्र में परफेक्शन, अनुभव से आता है।ख्यालों से परफेक्ट बिल या कानून हमेशा डिक्टेटर बनाते हैं। इस अर्थ में अन्ना लोकतंत्र के डिक्टेटर हैं। हमें लोकतांत्रिकअन्ना कहीं पर भी नजर नहीं आ रहा जिसमें धैर्य हो, अन्य के लिए जगह हो,संसद की प्रक्रियाओं के प्रति नमनीय भाव हो।
अन्ना टीम का सारा प्रचार अभियान मीडिया ऑबशेसन पर टिका है। सभी बहसों में अन्नाटीम को सैलीब्रिटी के रूप में रखा जाता है। सामान्यतौर पर स्टूडियो में ऐसे लोग बुलाए जाते हैं जो अन्ना के फेन हैं या अनुयायी हैं। अन्नाटीम को मीडिया ने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं बल्कि सैलीब्रिटी के रूप में कल्टीवेट किया है।
अन्ना के इस समय जितने अनुयायी नेट पर हैं उतने जमीन पर नहीं है। जमीन पर वेही हैं जो नेट पर हैं। इनमें अधिकांश वे लोग हैं जो सोशल नेटवर्क से जुड़े हैं और सोशल नेटवर्किंग और मीडिया के ऑब्शेसन के शिकार हैं।
इनमें एक वर्ग उन लोगों काभी है जो भीडतंत्र का हिस्सा हैं। भीडतंत्र और लोकतंत्र में कारपोरेट मीडिया भेद करना नहीं जानता। भीडतंत्र की भाषा में ही बौखलाकर अन्नाटीम ने लोकपाल बिल को जोकपाल बिल कहा है। भीड़तंत्र के तर्कशास्त्र में सरकार या अधिकारी की बात न मानने का भाव होता है। वे सरकार की जमकर खिल्ली उड़ाते हैं। अन्नाटीम के लोग लोकतंत्र की खिल्ली उड़ा रहे हैं, मतदाता की खिल्ली उड़ा रहे हैं, वे वोटर की अज्ञानता,उपेक्षा,संवादहीनता,शिरकत के अभाव की खिल्ली उड़ा रहे हैं। स्वयं अन्ना हजारे यही हथकंडा अपना चुके हैं। स्वयं अन्ना ने आम नागरिकों की खिल्ली उड़ायी है। अन्नाटीम अपने को ज्ञानी और आम आदमी को मूर्ख मानकर तर्क दे रही है। संस्थान के नियम,कानून का शासन,कानून की गति,सरकार की मजबूरियां और जिम्मेदारियों आदि के प्रति अन्नाटीम का अनैतिहासिक नजरिया है। वे न तो संरचनाओं को ऐतिहासिक नजरिए से देख रहे हैं और न संसद और संविधान को ही।
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शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

अखबार, भाषा और आज के संपादक



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कल एक दावत में नेताओं के साथ पत्रकारों का जमावड़ा हुआ तो मीडिया पर भी बात आई और अपने भट्ट जी (इंडियन एक्सप्रेस, लखनऊ के वीरेंद्र नाथ भट्ट) ने टिप्पणी की कि अब मीडिया में पढ़े लिखे अनपढ़ों का बहुमत हो गया है। पहले अगर किसी रिपोर्टर की स्टोरी कमजोर होती थी तो डेस्क पर बैठे उप संपादक उसे दुरुस्त कर देते थे। पर आज अगर संवाददाता भाषा के मामले में कमजोर हो तो उसकी स्टोरी संपादन करने वाला उप संपादक उससे भी ज्यादा कमजोर हो सकता है।
और, फिर भाषा का, तेवर का और उप संपादक के एक्स्ट्रा ज्ञान का खामियाजा समूचा अखबार उठाता है और आमतौर पर कोई पूछने वाला भी नहीं होता है। संपादक नाम की संस्था को तो प्रबंधकों ने कंपनी के पीआरओ में तब्दील कर दिया है और जो कुछ नामी संपादक बचे हुए हैं, वे अखबार से ज्यादा ध्यान चैनल पर ज्ञान देने पर देते हैं। ज्यादातर मूर्धन्य संपादक कभी किसी रिपोर्टर की स्टोरी की भाषा या संपादन के बाद और बिगड़ी हुई स्टोरी पर चर्चा तक नहीं करते। ख़बरों में भाषा का जादू अब ख़त्म होता जा रहा है। राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी की भाषा अपवाद रही पर अपनी भाषा की ही वजह से कई पत्रकार मशहूर हुए।
आज कुछ पत्रकार बहुत आक्रामक तेवर दिखाने के लिए दल्ला, दलाल, भडुआ, नपुंसक जैसे शब्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं। यह वैसे ही है जैसे किसी चाट वाले की चाट बहुत स्वादिष्ट न बन पाई हो तो वह उसमें मिर्च झोंक देता है। पर जिस तरह मिर्च से चाट को स्वादिष्ट नहीं बनाया जा सकता वैसे ही इस तरह के शब्दों से किसी का लिखा बहुत पठनीय नहीं हो सकता। प्रभाष जोशी बहुत आक्रामक तेवर में लिखते थे पर सैकड़ों लेख व रपट पढ़ जाएं, इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल बहुत कम नजर आएगा।
प्रभाष जोशी रिटायर होने के बाद मुख्य रूप से तीन काम करना चाहते थे जिसमें देश भर के अख़बारों का एक संग्रहालय बनवाना जिसमें आजादी से पहले से लेकर आज के आधुनिक तकनीक से निकलने वाले अखबार भी शामिल हों। इस काम को उन्होंने मध्य प्रदेश में शुरू भी कर दिया था। बाकी बचे दो कामों में एक काम डेस्क के लोगों को भाषा और बेहतर संपादन के लिए प्रशिक्षित करना था। यह बहुत बड़ा काम था, जनसत्ता का इसमें ऐतिहासिक योगदान रहा है पर अब इसी अखबार में जो नए लोग आते हैं, उन्हें कोई सिखाना नहीं चाहता। इसके चलते गजब के प्रयोग भी हो जाते हैं।
एक अंग्रेजी अखबार के हमारे एक मित्र अभी दिल्ली गए तो उन्होंने एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक को पढ़ने के बाद टिपण्णी की- इनके पत्रकार तो रोज टीवी पर ज्ञान देते हैं और इस अखबार की भाषा आदि अपने मसाला बेचने वाले के अखबार से भी खराब है। वैसे भी, बीस मील पर संस्करण बदल देने वाले अख़बारों की वह पहचान और ताकत गायब हो रही है जो कुछ साल पहले थी। भाषा और जानकारी के मामले में भी अख़बारों का बुरा हाल है। इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार में गन्ने की राजनीति पर हुई स्टोरी में बगास यानी गन्ने की खोई को डेस्क अगर बायो गैस में बदल दे तो हैरानी तो होती ही है। अपने यहाँ भी कई बार दुधवा के जंगल में चीता मार दिया जाता है जबकि सालों पहले चीता विलुप्त हो चुका है।
सबसे ज्यादा कोफ़्त वाम राजनीति की राजनैतिक शब्दावली को लेकर होती है। अपने एक सहयोगी ने पिछले दिनों भाकपा में हर जगह माले जोड़कर भाकपा माले का कार्यक्रम करा दिया। तो दूसरे ने एक धुर वामपंथी संगठन के आयोजन को पीयूसीएल का कार्यक्रम घोषित कर दिया। आजम खान पर एक स्टोरी में मैंने उनका कोट दिया जिसमें उन्होंने कहा था- अमर सिंह ने समूची पार्टी को एक रक्कासा के पैरों की पाजेब बना दिया। पर यह छपा- अमर सिंह ने पूरी पार्टी को एक नर्तकी के पैर की पायल बना दिया। भाषा का जो तेवर होना चाहिए, उसका ध्यान तो रखा गया ही नहीं, साथ ही यह ध्यान नहीं दिया गया कि आजम खान संघ वालों की क्लिष्ट हिंदी नहीं, बल्कि खालिस उर्दू बोलते हैं।
ऐसे ही कई बार हेडिंग ऐसी लग जाती है मानो वह पढने के लिए भीख मांग रही हो। मरियल, रंगहीन, गंधहीन और सपाट हेडिंग में कुछ उप संपादक महारथ हासिल कर रहे हैं। अभी एक दिन मैंने 'अहीर' लिखा तो उसे 'यादव' कर दिया गया। गनीमत है, राजपूत को अभी क्षत्रिय नहीं लिखा गया है। खबर में भाषा की रवानगी और तेवर के लिहाज से शब्दों का चयन होता है। पर जब कोई शब्द बिना सोचे समझे बदल दिया जाता है तो खबर की धार भी ख़त्म हो जाती है। डेस्क पर गड़बड़ी हो सकती है। मेरे ही एक साथी ने विधानसभा को बेईमान सभा लिख दिया तो अखबार को माफ़ी मांगनी पड़ी थी।
तब खबरें टेलीप्रिंटर से आती थी और रोमन होती थी जिसे टाईप करवाने के बाद संपादन करना पड़ता था जिसमें अगर जरा सी चूक हुई तो विधान सभा बेईमान सभा में बदल जाती। खुद एक बार मैंने खबर बनाई जो राजस्थान की महिला मंत्री पर थी और उसे टाइप करते हुए रखैल मंत्री लिख दिया गया था। जब माथा ठनका तो पता किया, मालूम चला खेल मंत्री से पहले आर टाइप हो गया था।  ख़बरों के संपादन में जरा-सी चूक अख़बार को सांसत में डाल सकती है। चैनल तो चूक होने पर वह खबर दिखाना बंद कर देता है पर अखबार का लिखा इतिहास का हिस्सा भी बन जाता है।
इंडियन एक्सप्रेस में जब छतीसगढ़ देख रहा था तो एक दिन एक्सप्रेस की दक्षिण भारत की एक वरिष्ठ महिला सहयोगी ने सुबह सुबह फोन कर कहा- आपने कितनी बड़ी स्टोरी मिस कर दी है, दूसरे अखबार (दिल्ली का अंग्रेजी का एक बड़ा अखबार) में एंकर छपा है कि बिलासपुर में हाथियों ने महुआ के चलते धावा बोल रखा है। इस पर मेरा जवाब था- मोहतरमा, अभी दिसंबर का महीना है और महुआ का फूल आने में चार महीना बाकी है इसलिए महुए की चिंता न करें। मामला रोचक है पर मित्रों का है, इसलिए इस घटना का जिक्र यहीं तक।
खैर, यह कुछ घटनाएं हैं, बानगी है कि किसी पत्रकारिता की डिग्री लेने के बावजूद प्रशिक्षण की कितनी जरूरत है। वर्तनी को लेकर आज भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। एक ही वाक्य में कई बार  'द्वारा' या किन्तु परन्तु तथा आदि का इस्तेमाल तो हो ही रहा है, साथ ही किए, दिए और लिए को किये, दिये और लिये लिखा जाता है। एक और समस्या किसी नेता के कहे वाक्य को लेकर आती है जिसे रिपोर्टर तो कामा लगाकर प्रत्यक्ष वाक्य के रूप में लिखता है पर संपादन में उसे कामा हटाकर 'कि' लगा दिया जाता है और समूचा वाक्य अप्रत्यक्ष हो जाता है। मैं आज तक नहीं समझ पाया इस तरह के संपादन का क्या अर्थ है। बेहतर हो इस दिशा में कोई वर्कशाप या प्रशिक्षण शिविर कर कुछ ठोस पहल की जाए ताकि नए साथियों को भी मदद मिले।
लेखक अंबरीश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.

क्या हमारी मीडिया भटक गयी है ?


देश और समाज के हालात से अवगत कराने का कार्य मीडिया का है ! लेकिन क्या हमारी मीडिया इस कार्य को निष्ठा के साथ अंजाम दे रही है ? आम जनता की बहुत अपेक्षाएं जुडी होती हैं मीडिया के साथ , वो उसकी तरफ सहायता पाने की दृष्टि से देखती है. अपनी आवाज को ऊंचा करना चाहती है मीडिया की मदद से! और देश तथा परिवेश का पारदर्शिता से दिखाया गया आइना देखना चाहती है!

क्या हमारी मीडिया नकारात्मक हो गयी है ?

देश में बहुत कुछ सकारात्मक भी हो रहा है ! लेकिन हमारी मीडिया कहीं न कहीं चूक रही है विकास एवं तरक्की के कार्यों को दिखाने में ! बिना किसी पूर्वाग्रह के दोनों पक्षों को उजागर करना चाहिए. फैले भ्रष्टाचार और बुराइयों से अवगत कराते जहाँ हमें सचेत करती है तो वहीँ अच्छे एवं विकास कार्यों को दिखाकर कुछ स्फूर्ति एवं ताजगी भी देनी चाहिए! शिक्षा स्वास्थ्य एवं तकनीक में हो रहे विकास को भी दिखाना चाहिए! निरंतर नकारात्मक ही दिखा दिखा कर दिमाग तथा हमारी सोच को भी निराशा से भर देती है! यदि कहीं आतंकवाद है , तो कहीं सरकार के इस दिशा में सद्प्रयास भी दिखाने चाहिए! यदि भ्रष्टाचार है , तो आम जनता द्वारा उसके खिलाफ लड़ी और लोकपाल बिल जैसे सार्थक प्रयासों को भी जन जन तक पहुँचाना मीडिया का ही कर्तव्य है !


क्या मीडिया जनता की आवाज़ बन पाती है ?

आज हमारे देश में सही नेतृत्व की कमी है ! एक ऐसा नेता जो देश को प्रगति और विकास की दिशा में ले जा सके ! अपनी जनता के मन में आत्मविश्वास और स्फूर्ति दे सके ! ऐसी दशा में जब राजनीतिज्ञों से हटकर कोई अन्ना अथवा रामदेव जैसा व्यक्ति आगे आता है राष्ट्र -हित में तो समूचा देश उसके साथ हो जाता है इस उम्मीद में की अब शायद मुश्किलों से निजात मिलेगी ! यहाँ पर मीडिया का भी दायित्व है वे इन नेतृत्वों के अच्छे और सशक्त पक्षों को सामने रखें , राष्ट्र विकास में सहयोग दें और आम जनता की आवाज़ बनें !


क्या मीडिया युवा वर्ग को भ्रमित कर रही है ?

आजकल विभिन्न चैनलों पर जो हिंसा, अभद्रता , अश्लीलता परोसी जा रही है , वह युवा पीढ़ी को क्या दिशा दे रही है भला ? कुछ नहीं तो , कुछ अच्छे संस्कार देने वाले शैक्षणिक सीरियल , discussions अथवा debates दिखाई जातीं ! निरर्थक प्रोग्राम्स को दिखाने के बजाये विद्वानों द्वारा सार्थक चर्चाएँ प्रस्तुत की जा सकती हैं ! निरंतर ह्रास क्यूँ ? पहले किरण बेदी जी की अदालत आती थी तो अब राखी सावंत की अभद्रता , चैनल की शोभा बनी हुयी है ! कहीं पति-पत्नी का अनावश्यक विवाद ही हर चैनल पर दिखाया जाएगा ! देश और व्यक्तित्व का विकास करने वाले दृश्यों और घटनाओं की प्रस्तुति होनी चाहिए जिससे युवा वर्ग कुछ प्रेरणा ले सके और motivate हो सके !


क्या मीडिया जजमेंटल हो रही है ?

मीडिया का काम है जनता को पारदर्शिता के साथ सत्य से अवगत कराना न की अपने विचारों को उन पर थोपना ! जब मीडिया "बाबा का पाखण्ड" अथवा "बाबा की बाजीगरी " जैसे वक्तव्यों का प्रयोग करती है तब वह निष्पक्ष नहीं रह पाती , जजमेंटल हो जाती है और व्यक्ति विशेष को काले रंग में पेंट करने का अनुचित प्रयास करती है . मीडिया का धर्म है , सत्य को बिना मिलावट के प्रस्तुत करे और पाखंड आदि की विवेचना को पाठक और जनता के लिए अपने-अपने विवेक के अनुसार करने के लिए छोड़ दे ! मीडिया को पक्षपात और पूर्वाग्रहों से रहित होना चाहिए !


मीडिया रामदेव बाबा से तो द्वेष रखती है लेकिन राहुल बाबा और नित्यानंद बाबा के खिलाफ ज्यादा कुछ नहीं कहती ! राहुल बाबा जो देश के भावी प्रधानमन्त्री की तरह देखे जा रहे हैं , उनका कहना है की " आतंकवादी हमले बहुत से देश में होते हैं , इन्हें रोकना मुमकिन नहीं " ....तो राहुल बाबा जब इतने असमर्थ हैं तो इन्हें राजनीति में रहने की क्या ज़रुरत है! मीडिया इस बचकाना और गैरजिम्मेदाराना वक्तव्य को नहीं उछालती ! आखिर क्यूँ ?


क्या हमारी मीडिया किसी प्रकार से मजबूर है ?



यदि हम मीडिया पर दया दृष्टि रख कर सोचें तो एक बात विचारणीय है की कहीं हमारी किसी प्रकार के दबाव में तो कार्य नहीं कर रही . आखिर सत्ता रूढ़ शक्तियां इतनी ताकतवर हैं की उनके खिलाफ सच को सामने लाने से पहले ही मीडिया को खरीद लिया जाता हो , अथवा धमकी दी जाती हो . यदि यह सच है तो विकल्प क्या मीडिया की इमानदारी बनाये रखने के लिए.!


क्या हमारी मीडिया का व्यवसायीकरण तो नहीं हो रहा ?

आज विभिन्न बड़े बड़े अखबार मालिकों की Townships हर शहर में बन रही हैं , जिनके अति-महगें आवास नेताओं ने खरीद रखे हैं ! आज पत्रकारिता एक पारदर्शी आइना बनने के बजाये एक बिल्डर की तरह आवास-विकास योजना से संलग्न नज़र आ रही है !

आज हर चैनल और पत्रकारिता अपना TRP बढाने के लिए उसे sensational करने पर लगी हुयी है ! अपने वक्तव्यों एवं प्रस्तुतियों के प्रति जिम्मेदार नहीं रह जा रही है ! बड़े बड़े नेताओं के संपर्क में रहते हुए अपने मुख्य उद्देश्य से भटक रही है और लालच उन पर हावी हो रही है ! ए राजा केस में , नीरा राडिया आदि प्रकरण इसी और इशारा करते हैं !

मुझे लगता है मीडिया को निष्पक्ष , इमानदार और जिम्मेदार रहना चाहिए अपने कर्म के प्रति !


Zeal

हिन्दी पत्रकारिता के भविष्य की दिशा : ज़ियाउल हक़।




आज जब हम हिन्दी पत्रकारिता की बात करते हैं तो यह जानकर आश्चर्य होता है कि शुरूआती दौर में यह ध्वज उन क्षेत्रों में लहराया गया था जिन्हें आज अहिन्दी भाषी कहा जाता है। कोलकाता का विश्वामित्र ऐसा पहला ध्वज वाहक था। उत्तर प्रदेश, बिहार और उन दिनों के सी.पी. बरार में भी अनेक हिन्दी अखबारों की शुरूआत हुई थी। लाहौर तो हिन्दी अखबारों का एक प्रकार से गढ बन गया था। इसका एक कारण शायद आर्यसमाज का प्रभाव भी रहा होगा। परंतु इन सभी अखबारों का कार्य क्षेत्र सीमित था या तो अपने प्रदेश तक या फिर कुछ जिलों तक। अंग्रेजी में जो अखबार उन दिनों निकलनी शुरू हुई उनको सरकारी इमदाद प्राप्त होती थी। वैसे भी यह अखबारें शासकों की भाषा में निकलती थीं इसलिए इनका रूतबा और रूआब जरूरत से ज्यादा था। चैन्नई का हिन्दू, कोलकाता का स्टेटसमैन मुम्बई का टाईम्स आफ इंडिया, लखनऊ का नेशनल हेराल्ड और पायोनियर, दिल्ली का हिन्दुस्तान टाईम्स और बाद में इंडियन एक्सप्रेस भी। ये सभी अखबार प्रभाव की दृष्टि से तो शायद इतने महत्वपूर्ण नहीं थे परंतु शासको की भाषा में होने के कारण इन अखबारों को राष्ट्रीय प्रेस का रूतबा प्रदान किया गया। जाहिर है यदि अंग्रेजी भाषा के अखबार राष्ट्रीय हैं तो हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के अखबार क्षेत्रीय ही कहलाएंगे। प्रभाव तो अंग्रजी अखबारों का भी कुछ कुछ क्षेत्रों में था परंतु आखिर अंग्रेजी भाषा का पूरे हिन्दुस्तान में नाम लेने के लिए भी अपना कोई क्षेत्र विशेष तो था नहीं। इसलिए अंग्रेजी अखबार छोटे होते हुए भी राष्ट्रीय कहलाए और हिन्दी के अखबार बड़े होते हुए भी क्षेत्रीयता का सुख-दुख भोगते रहे।

परंतु पिछले दो दशकों में ही हिन्दी अखबारों ने प्रसार और प्रभाव के क्षेत्र में जो छलांगे लगाई हैं वह आश्चर्यचकित कर देने वाली हैं। जालंधर से प्रारंभ हुई हिन्दी अखबार पंजाब केसरी पूरे उत्तरी भारत में अखबार न रहकर एक आंदोलन बन गई है। जालंधर के बाद पंजाब केसरी हरियाणा से छपने लगी उसके बाद धर्मशाला से और फिर दिल्ली से।

जहां तक पंजाब केसरी की मार का प्रश्न है उसने सीमांत राजस्थान और उत्तर प्रदेश को भी अपने शिकंजे में लिया है। दस लाख से भी ज्यादा संख्या में छपने वाला पंजाब केसरी आज पूरे उत्तरी भारत का प्रतिनिधि बनने की स्थिति में आ गया है ।

जागरण तभी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर से छपता था और जाहिर है कि वह उसी में बिकता भी था परंतु पिछले 20 सालों में जागरण सही अर्थो में देश का राष्ट्रीय अखबार बनने की स्थिति में आ गया है। इसके अनेकों संस्करण दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, बिहार झारखंड, पंजाब, जम्मू कश्मीर, और हिमाचल से प्रकाशित होते हैं। यहां तक कि जागरण ने सिलीगुडी से भी अपना संस्करण प्रारंभ कर उत्तरी बंगाल, दार्जिलिंग, कालेबुंग और सिक्किम तक में अपनी पैठ बनाई है।

अमर उजाला जो किसी वक्त उजाला से टूटा था, उसने पंजाब तक में अपनी पैठ बनाई । दैनिक भास्कर की कहानी पिछले कुछ सालों की कहानी है। पूरे उत्तरी और पश्चिमी भारत में अपनी जगह बनाता हुआ भास्कर गुजरात तक पहुंचा है। भास्कर ने एक नया प्रयोग हिन्दी भाषा के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं में प्रकाशन शुरू कर किया है। भास्कर के गुजराती संस्करण ने तो अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। दैनिक भास्कर ने महाराष्ट्र की दूसरी राजधानी नागपुर से अपना संस्करण प्रारंभ करके वहां के मराठी भाषा के समाचार पत्रों को भी बिक्री में मात दे दी है।

एक ऐसा ही प्रयोग जयपुर से प्रकाशित राजस्थान पत्रिका का कहा जा सकता है, पंजाब से पंजाब केसरी का प्रयोग और राजस्थान से राजस्थान पत्रिका का प्रयोग भारतीय भाषाओं की पत्रिकारिता में अपने समय का अभूतपूर्व प्रयोग है। राजस्थान पत्रिका राजस्थान के प्रमुख नगरों से एक साथ अपने संस्करण प्रकाशित करती है। लेकिन पिछले दिनों उन्होंने चेन्नई संस्करण प्रकाशित करके दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रयोग को लेकर चले आ रहे मिथको को तोड़ा है। पत्रिका अहमदाबाद सूरत कोलकाता, हुबली और बैंगलूरू से भी अपने संस्करण प्रकाशित करती है और यह सभी के सभी हिंदी भाषी क्षेत्र है। इंदौर से प्रकाशित नई दुनिया मध्य भारत की सबसे बड़ा अखबार है जिसके संस्करण्ा अनेक हिंदी भाषी नगरों से प्रकाशित होते हैं।

यहां एक और तथ्य की ओर संकेत करना उचित रहेगा कि अहिंदी भाषी क्षेत्रों में जिन अखबारों का सर्वाधिक प्रचलन है वे अंग्रेजी भाषा के नहीं बल्कि वहां की स्थानीय भाषा के अखबार हैं। मलयालम भाषा में प्रकाशित मलयालम मनोरमा के आगे अंग्रेजी के सब अखबार बौने पड़ रहे हैं। तमिलनाडु में तांथी, उडिया का समाज, गुजराती का दिव्यभास्कर, गुजरात समाचार, संदेश, पंजाबी में अजीत, बंगला के आनंद बाजार पत्रिका और वर्तमान अंग्रेजी अखबार के भविष्य को चुनौती दे रहे हैं। यहां एक और बात ध्यान में रखनी चाहिए कि उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड इत्यादि हिन्दी भाषी राज्यों में अंग्रेजी अखबारों की खपत हिंदी अखबारों के मुकाबले दयनीय स्थिति में है। अहिंदी भाषी क्षेत्रों की राजधानियों यथा गुवाहाटी भुवनेश्वर, अहमदाबाद, गांतोक इत्यादि में अंग्रेजी भाषा की खपत गिने चुने वर्गों तक सीमित है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि राजधानी में यह हालत है तो मुफसिल नगरों में अंग्रेजी अखबारों की क्या हालत होगी? इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। अंग्रेजी अखबार दिल्ली, चंडीगढ़, मुम्बई आदि उत्तर भारतीय नगरों के बलबूते पर खड़े हैं। इन अखबारों को दरअसल शासकीय सहायता और संरक्षण प्राप्त है। इसलिए इन्हें शासकीय प्रतिष्ठा प्राप्त है। ये प्रकृति में क्षेत्रिय हैं (टाइम्स ऑफ इंडिया के विभिन्न संस्करण इसके उदाहरण है।) मूल स्वभाव में भी ये समाचारोन्मुखी न होकर मनोरंजन करने में ही विश्वास करते हैं । लेकिन शासकीय व्यवस्था ने इनका नामकरण राष्ट्रीय किया हुआ है। जिस प्रकार अपने यहां गरीब आदमी का नाम कुबेरदास रखने की परंपरा है। जिसकी दोनों ऑंखें गायब हैं वह कमलनयन है। भारतीय भाषा का मीडिया जो सचमुच राष्ट्रीय है वह सरकारी रिकार्ड में क्षेत्रीय लिखा गया है। शायद इसलिए कि गोरे बच्चे को नजर न लग जाए माता पिता उसका नाम कालूराम रख देते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि इतिहास में क्रांतियाँ कालूरामों ने की हैं। गोरे लाल गोरों के पीछे ही भागते रहे हैं। अंग्रेजी मीडिया की नब्ज अब भी वहीं टिक-टिक कर रही है। रहा सवाल भारतीय पत्रकारिता के भविष्य का, उसका भविष्य तो भारत के भविष्य से ही जुड़ा हुआ है। भारत का भविष्य उज्जवल है तो भारतीय पत्रकारिता का भविष्य भी उज्ज्वल ही होगा। यहां भारतीय पत्रकारिता में हिंदी पत्रकारिता का समावेश भी हो जाता है।

गुरुवार, 28 जुलाई 2011



बड़े संपादकों के छोटे सवाल

किसी भी प्रजातंत्र में मीडिया का काम एक प्रहरी का होता है. वह सरकार का नहीं, जनता का पहरेदार होता है. मीडिया की ज़िम्मेदारी है कि सरकार जो करती है और जो नहीं करती है, वह उसे जनता के सामने लाए. जब कभी सत्तारूढ़ दल, विपक्षी पार्टियां, अधिकारी और पुलिस अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह नहीं करते हैं, तब मीडिया उन्हें उनके कर्तव्यों का एहसास कराता है. अ़फसोस इस बात का है कि सरकार की तरह देश का मीडिया भी क्राइसिस में है, वह दिशाहीनता का शिकार हो गया है.
किसी ने प्रधानमंत्री से यह पूछने की हिम्मत नहीं की कि आखिर सरकार किसके साथ है? देश के ग़रीबों और शोषितों के साथ है या फिर सरकार उनके साथ है, जो दुनिया के खरबपतियों की लिस्ट में अपना नाम दर्ज करना चाहते हैं? यह किसी ने नहीं पूछा कि सरकार अल्पसंख्यकों के लिए क्या कर रही है? यह किसी ने नहीं पूछा कि देश के नौजवान बंदूक़ क्यों उठा रहे हैं? यह भी किसी ने नहीं पूछा कि सोना उगलने वाले भारत के किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?
बीती 16 फरवरी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक स्पेशल प्रेस कांफ्रेंस बुलाई. स्पेशल इसलिए, क्योंकि इसमें स़िर्फ टेलीविजन चैनलों के चुनिंदा संपादकों को बुलाया गया था. इसमें वे सब चेहरे मौजूद थे, जिन्हें आप हर रोज़ टीवी पर देखते हैं. इस प्रेस कांफ्रेंस को देखकर मुझे हैरानी भी हुई, अ़फसोस भी हुआ. पत्रकारिता के सतहीपन पर हैरानी हुई कि इतने बड़े-बड़े पत्रकार बिना पढ़े, बिना किसी रिसर्च के, बिना तैयारी प्रधानमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस में कैसे जा सकते हैं! अगर ये लोग पूरी तैयारी के साथ गए थे तो यह और भी अ़फसोस की बात है. टेलीविजन पत्रकारों ने जनता से जुड़े मुद्दों पर प्रधानमंत्री को घेरने की कोशिश नहीं की. देश के बड़े-बड़े टेलीविजन चैनलों के बड़े-बड़े संपादक पत्रकारिता की पहली परीक्षा में ही फेल हो गए. इतनी लंबी प्रेस कांफ्रेंस हुई, संपादकों को पूरा व़क्त दिया गया. इन सबने सवाल भी पूछे. अ़फसोस इस बात का है कि महान संपादकों का यह समूह प्रधानमंत्री से एक भी खबर निकाल नहीं सका. प्रधानमंत्री ने इस प्रेस कांफ्रेंस में कुछ भी नया नहीं कहा, कोई नया खुलासा नहीं किया.
अगर अविश्वास ही करना चाहें तो हम कह सकते हैं कि यह प्रेस कांफ्रेंस प्रधानमंत्री की छवि को चमकाने का एक सरकारी प्रयास था, जिसमें देश के इन बड़े-बड़े संपादकों ने पूरा साथ दिया. हालांकि इस आरोप पर मेरा कोई भरोसा नहीं है. इस प्रेस कांफ्रेंस में संपादकों ने जनता से जुड़े मुद्दों और उसकी समस्याओं को नहीं उठाया. इसके लिए प्रधानमंत्री ज़िम्मेदार नहीं हैं, बल्कि इसके लिए महान संपादक और उनके द्वारा पूछे गए सवाल ज़िम्मेदार हैं. प्रधानमंत्री से इन लोगों ने श्रीलंका में भारतीय मछुआरों को परेशान किए जाने पर सवाल पूछा. 2-जी स्पैक्ट्रम घोटाले पर सवाल पूछा. एक संपादक ने देवास के साथ हुए समझौते के बारे में पूछा. किसी ने मंत्रिमंडल में फेरबदल के बारे में पूछा तो किसी ने मंत्रियों के विशेषाधिकार कोटे के बारे में सवाल पूछा.
लेकिन, किसी ने प्रधानमंत्री से यह पूछने की हिम्मत नहीं की कि आखिर सरकार किसके साथ है? देश के ग़रीबों और शोषितों के साथ है या फिर सरकार उनके साथ है, जो दुनिया के खरबपतियों की लिस्ट में अपना नाम दर्ज करना चाहते हैं? यह किसी ने नहीं पूछा कि सरकार अल्पसंख्यकों के लिए क्या कर रही है? यह किसी ने नहीं पूछा कि देश के नौजवान बंदूक़ क्यों उठा रहे हैं? यह भी किसी ने नहीं पूछा कि सोना उगलने वाले भारत के किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? किसी ने यह नहीं पूछा कि 1991 में प्रधानमंत्री ने बड़े-बड़े वादे करके देश की आर्थिक नीति बदल दी, उन वादों का क्या हुआ? 2006 में प्रधानमंत्री ने एक बयान देकर खूब वाहवाही लूटी थी. उन्होंने कहा था कि देश के संसाधनों पर वंचितों और अल्पसंख्यकों का पहला हक़ है. उस वादे का क्या हुआ? सवाल यह है कि क्या इस प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद महान संपादकों को प्रधानमंत्री का वह बयान याद भी था या नहीं?
मनमोहन सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत में ही कहा कि पिछले महीनों में महंगाई बढ़ी है. उन्होंने कहा कि अगर सरकार चाहती तो हार्ड मोनेटरी पालिसी लगाकर महंगाई पर क़ाबू किया जा सकता था, लेकिन हम चाहते थे कि इससे निपटने में विकास दर पर असर न पड़े. भारत अंतरराष्ट्रीय मंदी से अच्छी तरह से उबरा है. देश की अर्थव्यवस्था अच्छी है और विकास दर 8.5 फ़ीसदी है. मतलब यह कि सरकार महंगाई पर लगाम लगा सकती है, लेकिन विकास दर के आंकड़े को बरक़रार रखने के लिए जनता को महंगाई से जूझने के लिए छोड़ दिया गया. ताज्जुब इस बात का है कि इन संपादकों में से किसी ने यह नहीं पूछा कि इस महंगाई से सरकार को फायदा हुआ या फिर जमाखोरों और बाज़ार के माफिया को. अगर इस महंगाई से ग़रीब किसानों और छोटे दुकानदारों को फायदा हुआ होता तो भी कोई बात होती. असलियत यह है कि इस महंगाई का फायदा उन बड़े-बड़े व्यापारियों एवं उद्योगपतियों को हुआ, जिन्होंने सस्ते दामों में सामान खरीद कर अपने गोदामों को भर लिया और महंगाई बढ़ा दी. खूब मुना़फा कमाया. प्रधानमंत्री जी को इस अचानक आई महंगाई पर एक जांच बैठानी चाहिए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके.
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की ऐसी छवि होती जा रही है कि यहां भ्रष्टाचार वाली सरकार है. मनमोहन सिंह ने सबसे पहले 2-जी स्पैक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल, देवास एवं आदर्श सोसाइटी आदि मामलों का ज़िक्र किया और कहा कि मीडिया में इन सब मामलों पर ख़बरें छाई हुई हैं. भारतीय लोकतंत्र के प्रति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी सम्मान है. जब कभी भी मैं बाहर जाता हूं, लोग भारतीय लोकतंत्र और यहां मानवाधिकार के प्रति हमारे रुख़ की सराहना करते हैं. उन्होंने मीडिया से अपील की कि वह ज़्यादा नकारात्मक ख़बरों को जगह न दे, ताकि देश की ग़लत छवि बाहर न जाए. जिस देश में किसान आत्महत्या करें, ग़रीबों का शोषण हो, किसानों की जमीन छीन ली जाए, बेकारी हो, पीने का पानी न हो, अस्पताल न हों, अशिक्षा हो, अल्पसंख्यक बेसहारा हों, सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार हो और घोटाले पर घोटाले हों, उस देश की सरकार को छवि की चिंता से ज्यादा इन समस्याओं का समाधान निकालने की ज़रूरत है.
इस प्रेस कांफ्रेंस में कुछ संपादकों ने अजीबोग़रीब सवाल पूछे. देश के सबसे बड़े टेलीविजन नेटवर्क के संपादक का भोलापन देखिए. उन्होंने प्रधानमंत्री से पूछा कि आपने यह प्रेस कांफ्रेंस क्यों बुलाई. सबसे मज़ेदार सवाल चौबीस घंटे चलने वाले टीवी चैनल की मालकिन ने पूछा. उन्होंने मनमोहन सिंह से क्रिकेट वर्ल्ड कप के बारे में पूछा कि सारा देश चाहता है कि भारत जीते, आपकी क्या राय है. प्रधानमंत्री ने भी कहा कि क्या किसी देश का प्रधानमंत्री यह कहता है कि मेरा देश क्रिकेट वर्ल्ड कप नहीं जीते, बल्कि पड़ोसी देश जीते. मैं भी चाहता हूं कि भारत जीते. बात यहीं खत्म नहीं हुई. उनका अगला सवाल यह था कि आपका फेवरेट प्लेयर कौन है. प्रधानमंत्री भी उलझन में पड़ गए. प्रधानमंत्री ने नाम नहीं बताया. इसके बाद देश के सबसे सीरियस चैनल के एडिटर की बारी आई. उन्होंने पूछ डाला कि आपका साढ़े तीन साल का कार्यकाल बचा है, क्या आप अगले चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे.
प्रधानमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस से कई संकेत मिलते हैं. पहला यह कि सरकार जनता के प्रति अपने दायित्व को कम करना चाहती है. सरकार की नीतियां स़िर्फ इस बात पर केंद्रित हैं कि कैसे देश में अच्छा कॉरपोरेट माहौल बने, ताकि विदेशी कंपनियां यहां आकर मुना़फा कमा सकें. ग़रीबों के लिए जो योजनाएं हैं, वे स़िर्फ चुनाव जीतने के हथकंडे जैसी हैं. उन योजनाओं की पूर्ण सफलता पर सरकार का ध्यान नहीं है. सरकार का ध्यान स़िर्फ इस बात पर है कि कैसे ज्यादा से ज्यादा विदेशी पूंजी भारत में आए. खतरे की बात यह है कि सरकार यह संकेत दे रही है कि आने वाले दिनों में कड़े सुधारवादी क़दम उठाए जाएंगे. सुधारवादी नीतियों का असर भारत भुगत रहा है. ग़रीब और ग़रीब होते जा रहे हैं. भारत के छोटे शहर और गांव पिछड़ रहे हैं. देश का नौजवान विमुख होता जा रहा है. प्रधानमंत्री को लगता है कि जिस तरह मिस्र के लोगों ने सरकार के खिला़फ बग़ावत की, वैसी स्थिति भारत में पैदा नहीं हो सकती. सरकार को इस बात की चिंता नहीं है. मिस्र में जो कुछ हुआ, वैसा भारत में नहीं हो सकता. सरकार तो निश्चिंत है, लेकिन देश की जनता और मीडिया को सुधारवादी नीतियों और नव उदारवाद के नए हमले से निपटने के लिए तैयार रहना होगा.

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One Response to “बड़े संपादकों के छोटे सवाल”

  • khadija siddiqui says:
    महोदय सम्पादक जी,आप बिलकुल सही कहते हैं और मुझे भी यही लगता है कि हमारे टी.वी.मीडिया के संपादकों के पास शायद ग़रीबों,किसानों,अल्पसंख्यकों,और देश के नौजवानों के उत्थान व विकास के बारे में कोई प्रश्न नहीं रह गया है या फिर दूसरी बात यह हो सकती है कि वह इस बारे में पूछना ही नहीं चाहते क्योंकि ऐसे निर्धन और ग़रीब लोगों से इस मीडिया को क्या सरोकार है?उनकी दूकान तो कार्पोरेट के बाबुओं से चलती ही है या फिर उन राज नेताओं से जिसका वह गुणगान करते हैं.मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है और उस पर जनता का आश्वासन भी है लेकिन अधिकतर होता यह है कि टी. वी .पत्रकारिता की तुलना में लोग प्रिंट मीडिया पर ज्यादा भरोसा करते है.टी.वी पत्रकारिता के अधिकतर चैनल ऊपरी साज-सज्जा,ग्लैमर तथा इसी प्रकार की अन्य चीज़ों के साथ अच्छी साम्यग्री परोसते हैं.इसी प्रकार ख़बरों से अधिक वह विज्ञापनों पर भरोसा करते हैं.मुझे तो लगता है कि टी वी पत्रकारिता के सम्पादक काफी अच्छे व्यापारिक हैं जो अच्छा व्यापार करना जानते हैं.और इस बात का प्रमाड उन्होंने प्रधान जी की प्रेस कांफ्रेंस में बचकाना सवाल करके दिए हैं कि वे मीडिया की दुनिया में अभी बच्चे हैं लेकिन व्यापारिक बहुत अच्छे हैं.पर इतने से बात ख़त्म नहीं होती,ग़रीब जनता जिस मीडिया पर अपना भरोसा जताती है तो मीडिया को भी उस भरोसे पर खरा उतरना होगा.उसकी तकलीफों को समझना होगा,सरकार से उनकी समस्याओं का हल पूछना होगा.अगर मीडिया जम्हूरियत का चौथा पिलर है तो इसे अपनी ज़िम्मेदारी को हर हाल में निभाना ही होगा.

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