गुरुवार, 31 मार्च 2022

हिन्दी पत्रकारिता

 

हिन्दी पत्रकारिता की कहानी भारतीय राष्ट्रीयता की कहानी है। हिन्दी पत्रकारिता के आदि उन्नायक जातीय चेतना, युगबोध और अपने महत् दायित्व के प्रति पूर्ण सचेत थे। कदाचित् इसलिए विदेशी सरकार की दमन-नीति का उन्हें शिकार होना पड़ा था, उसके नृशंस व्यवहार की यातना झेलनी पड़ी थी। उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दी गद्य-निर्माण की चेष्टा और हिन्दी-प्रचार आन्दोलन अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थितियों में भयंकर कठिनाइयों का सामना करते हुए भी कितना तेज और पुष्ट था इसका साक्ष्य ‘भारतमित्र’ (सन् 1878 ई, में) ‘सार सुधानिधि’ (सन् 1879 ई.) और ‘उचित वक्ता’ (सन् 1880 ई.) के जीर्ण पृष्ठों पर मुखर है।

भारत में प्रकाशित होने वाला पहला हिंदी भाषा का अखबार, उदंत मार्तंड (द राइजिंग सन), 30 मई 1826 को शुरू हुआ।[1] इस दिन को "हिंदी पत्रकारिता दिवस" के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि इसने हिंदी भाषा में पत्रकारिता की शुरुआत को चिह्नित किया था।

वर्तमान में हिन्दी पत्रकारिता ने अंग्रेजी पत्रकारिता के दबदबे को खत्म कर दिया है। पहले देश-विदेश में अंग्रेजी पत्रकारिता का दबदबा था लेकिन आज हिन्दी भाषा का झण्डा चहुंदिश लहरा रहा है। ३० मई को 'हिन्दी पत्रकारिता दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

टीएमयू के वीसी प्रो. रघुवीर सिंह को मोस्ट प्रोमिजिंग अवार्ड

ख़ास बातें

कुलाधिपति ने वीसी को दी बधाई, बोले- अवार्ड यूनिवर्सिटी परिवार को समर्पित 

स्टुडेंट्स के सर्वांगीण विकास को टीएमयू संकल्पित और समर्पितः प्रो. सिंह

2021 में बेस्ट यूनिवर्सिटी इन ओबीई इंप्लीमेंटेशन का भी मिल चुका है अवार्ड

कोविड-19 की महामारी के बावजूद 2022 में यूनिवर्सिटी का उत्कृष्ट प्रदर्शन



प्रो. श्याम सुंदर भाटिया


मुरादाबाद l


नॉर्थ इंडिया की बेहतरीन प्राइवेट यूनिवर्सिटीज में शुमार तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. रघुवीर सिंह की झोली में इस बार इंडियाज मोस्ट प्रोमिजिंग वाइस चांसलर अवार्ड आया है। डेली इंडियन मीडिया एजुकेशनल ग्रुप की ओर से यह अवार्ड दिल्ली में दिया गया। प्रो. सिंह को यह प्रतिष्ठित अवार्ड ग्रुप की ओर से चेयरमैन श्री डॉ. अरिंदम चौधरी और मिस इंडिया- 2019 अर्थ देविका वेद ने संयुक्त रूप से दिया है। इस भव्य समारोह में प्रो. सिंह के संग-संग देश के करीब बीस विश्वविद्यालयों को भी उच्च शिक्षा में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया है।


कोविड-19 की महामारी के बावजूद टीएमयू का 2022 में उत्कृष्ट प्रदर्शन रहा है। कुलपति प्रो. सिंह और यूनिवर्सिटी की मुकम्मल टीम की कडी मेहनत के चलते यूजीसी से 12 (बी) का स्टेटस मिला है।

मिनिस्ट्री ऑफ एजुकेशन-इन्नोवेशन सेल की ओर से टीएमयू को आईआईसी में सर्वोच्च स्टार रेटिंग भी मिली है। कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर को आईसीएआर ने एक्रीडिएशन किया है। अब टीएमयू एग्रीकल्चर कॉलेज की गिनती देश की चुनिंदा टॉप यूनिवर्सिटीज में होती है।


यूनिवर्सिटी के वीसी को मोस्ट प्रोमिजिंग अवार्ड मिलने पर कुलाधिपति श्री सुरेश जैन, जीवीसी श्री मनीष जैन और एमजीबी श्री अक्षत जैन कुलपति प्रो. रघुवीर सिंह को हार्दिक बधाई देते हुए कहते हैं, यह पुरस्कार यूनिवर्सिटी के हजारों फैकल्टी और स्टुडेंट्स के प्रतिफल का ही नतीजा है और यह अवार्ड उन्हें समर्पित है।



एजुकेशन लीडरशिप के तौर पर ख़ास पहचान

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. रघुवीर सिंह की शैक्षणिक लीडरशिप के तौर पर ख़ास पहचान है। हायर एजुकेशन में आउटकम बेस्ड एजुकेशन- ओबीई आज वक्त की दरकार है। कुलपति प्रो. सिंह को ओबीई के क्षेत्र में महारत हासिल है। प्रो. सिंह टीम भावना के संग नई शिक्षा नीति-2020 को टीएमयू में अक्षरशः क्रियान्वयन के प्रति संकल्पबद्ध हैं।


नतीजतन टीएमयू की एक्जीक्यूटिव काउंसिल में एनईपी को हरी झंडी दी जा चुकी है। कुलपति का साफ-साफ मानना है, उच्च शिक्षा रोजगार और उद्यमिता केंद्रित होनी चाहिए।


उल्लेखनीय है, लीड ग्लोबल कॉनक्लेव-2021 में प्रो. सिंह को बेस्ट यूनिवर्सिटी इन ओबीई इंप्लीमेंटेशन इन इंडिया का पुरस्कार मिल चुका है। यह प्रतिष्ठित अवार्ड कुलपति ने दिल्ली में रिसीव किया था।


हमारे छात्र जॉब जनरेटर या क्रिएटर होंगे

प्रो. सिंह मानते हैं, दुनिया में लर्निंग के तीन आयाम हैं- कॉग्निटिव, अफेक्टिव और साइकोमोटर। कॉग्निटिव का बेस ब्लूम टेक्सोनॉमी है। इनका क्रियान्वयन ब्लूम टेक्सोनॉमी के संग-संग यूनिवर्सिटी में स्थापित सेंटर फॉर टीचिंग एंड लर्निंग डवलपमेंट के जरिए करते हैं। हमारी एजुकेशन फिलॉसफी के तीन पिलर हैं- नॉलेज क्रिएशन, नॉलेज डिलीवरी और इंप्लायबिल्टी। इन सभी पर हम सघनता से काम कर रहे हैं। वह कहते हैं- आप देखिएगा, तीन बरस में यूनिवर्सिटी में आमूलचूल परिवर्तन आएगा।

 स्टुडेंट्स के सर्वांगीण विकास के लिए तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी संकल्पित और समर्पित है। हमें छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए माइंड, हार्ट और हैंड्स को डवलप करना होगा। यदि शिक्षा रोजगार और उद्यमिता केंद्रित है तो हमारे छात्र जॉब जनरेटर या क्रिएटर होंगे या नामचीन कंपनियों में बड़े ओहदेदार होंगे।

बुधवार, 30 मार्च 2022

विक्रम सम्वत् के प्रवर्तक हैं सम्राट विक्रमादित्य / श्रीराम त्रिपाठी

 2 अप्रैल गुड़ी पड़ावा पर विशेष लेख


स्वाधीन भारत में संविधान स्वीकार करते समय राष्ट्र गान एवं राष्ट्र ध्वज के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर दो सम्वत् अंगीकार किये गये हैं. पहला ईस्वी सम्वत् और दूसरा शक सम्वत्। ये दोनों ही सम्वत् भारत आक्रांताओं और उसे पराधीन बनाने वाली शक्तियों द्वारा प्रवर्तित किये गये हैं. जहाँ तक ईस्वी सम्वत् का प्रश्न है यह एक तरह से इसकी अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति की वजह से मान्य किये जाने योग्य है, परंतु शक सम्वत् को भी राष्ट्रीय स्तर पर अंगीकार कर लिया जाना आपत्तिजनक है, आपत्तिजनक होना ही चाहिए।

यह निर्विवाद तथ्य है कि शक हमारे देश में आक्रांता की तरह आये। यह इतिहास सिद्ध है कि मध्य एशिया बर्बर और दुर्दश जातियों का क्षेत्र रहा है। 160-165 ईस्वी पूर्व में घुमक्कड़ जातियों का निष्क्रमण बढ़ा। ह्यूंग नू जाति ने अपने पड़ोस की यूह्ची जाति को पराजित कर अपने राज्य से बेदखल किया तो यूह्ची जाति ने आक्रामक हो अपने पश्चिम में सीर दरिया के उत्तर में रहने वाली जाति शक को पराजित कर उनके स्थान पर कब्जा कर लिया। इसके फलस्वरूप शक जाति विस्थापित होकर दूसरे स्थानों की खोज में बर्बर हो उठी। उसने दक्षिण की ओर रूख किया। शकों की कुछ शाखाओं ने यहाँ-वहाँ घुसपैठ की। 120-140 ईस्वी पूर्व कुछ बर्बर शक बाख्त्री और पार्थव राज्यों पर टूट पड़े। शक हमले करते करते पूर्वी ईरान से होते हुए कन्दहार और बलूचिस्तान होते हुए सिंध और इंडो सिंथिया आ पहुँचे। भारत के उत्तरी-पश्चिमी प्रदेशों में दाखिल होकर शकों ने गुजरात, सिंध में मार-काट मचाते हुए तक्षशिला और पंजाब में काबिज हो गये।

जैन ग्रंथ कालकाचार्य कथा के अनुसार उज्जैन के तत्कालीन राजा से प्रतिशोध लेने के लिए शकों को उज्जैन आक्रमण के लिए प्रेरित किया गया। लगभग 100 ईस्वी पूर्व शकों ने उज्जैन और तत्पश्चात मथुरा पर पर कब्जा किया। और धीरे-धीरे शक उज्जैन केंद्र से भारत के अनेक प्रांतों में दाखिल हो गये। अंत में शकों का सामना स्वतंत्रता प्रिय मालवों से हुआ, जो फिरोजपुर, पंजाब, अजमेर से विस्तारित होते हुए उज्जैन आ बसे थे। मालव गणों ने शकों को पराजित ही नहीं किया बल्कि उन्हें भारत भूमि छोड़ने को विवश किया। मालव गणों ने शकों को परास्त कर अवंति क्षेत्र को मालवभूमि बनाया। इसी तिथि से अवंति मालवा कहलाने लगी और विजय तिथि के स्मारक स्वरूप विक्रम सम्वत् का प्रवर्तन हुआ, जिसे कभी-कभी कृत और मालव सम्वत् के रूप में भी संबोधित किया जाता रहा। सम्वत् प्रवर्तन के साथ साथ नये सिक्के भी चलाये गये. सिक्कों पर अंकित किया गया-

‘मालवान (नां) जय(यः)’. 

इसी विजय और गण के अवंति में प्रतिष्ठित होने के समय से आगे की काल गणना के लिए मालव सम्वत् या कहें कि विक्रम सम्वत् प्रशस्त हुआ। 

भारतीय संस्कृति पर अभिमान करने वालों के लिए यह निश्चय ही गौरव करने योग्य है कि आज भारत वर्ष में प्रवर्तित विक्रम सम्वत्सर बुद्धनिर्वाणकाल गणना को छोड़ कर संसार के प्रायः सभी ऐतिहासिक सम्वतों में प्राचीन है। यह भारत के इतिहास की एक महत्वपूर्ण परिघटना है। विक्रम सम्वत् के उद्भव तक विशुद्ध वैदिक संस्कृति का काल, रामायण और महाभारत का युग, महावीर गौतम बुद्ध का समय, चंद्रगुप्त मौर्य एवं प्रियदर्शी अशोक, पुष्यमित्र शुंग की साहसगाथा, वेद, पुराण, सूत्रग्रंथ एवं स्मृतियों की रचना भारतवर्ष में हो चुकी थी, वैयाकरण पाणिनी और पतंजलि और चाणक्य के पांडित्य तथा राजनीतिक बुद्धिमत्ता चतुर्दिक फैल चुकी थी। विक्रमादित्य का समय भारशिवनागों, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, स्कंदगुप्त, यशोवर्मन, विष्णुवर्द्धन के बल और प्रताप की चमक से विश्व को चमत्कृत करने का समय था, यह ही वह समय था जब दुनिया कई भागों में भारत की संस्कृति व भारत के धर्म की सुगंधि विस्तारित थी। कालिदास, भवभूति, भारवि, भतृहरि, वराहमिहिर, माघ, दंडी, बाणभट्ट, धन्वन्तरि, कुमारिल भट्ट, आद्य शंकराचार्य, नागार्जुन, आदि की रचनाप्रतिभा चतुर्दिक व्याप्त थी।

भारतवर्ष में विक्रमादित्य युग परिर्वतन और नवजागरण की एक महत्वपूर्ण धुरी रहे हैं। और उनके द्वारा प्रवर्तित विक्रम सम्वत् हमारी एक अत्यंत मूल्यवान धरोहर है। यह भारतीयजन के लिए एक शक्ति और आत्माभिमान का स्रोत भी है। यह भी एक बड़ा कारण है कि विदेशी आक्रांताओं ने भारत गौरव तथा ज्ञान संपदा के प्रमाणों, साक्ष्यों, पुस्तकों, स्थापत्यों के सुनियोजित विनाश का अभियान चलाया। हमारी संपदा को विध्वंस किये जाने के प्रमाण लगातार मिलते रहे हैं। इस अभियान को उपनिवेशवादी इतिहासकारों ने भी अपना भरपूर समर्थन दिया. इन सभी की दुरभिसंधि यही थी कि भारत ज्ञान, विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा, आर्थिकी का नहीं बल्कि अंधेरे का क्षेत्र भर था, जिसके उद्धार के लिए गोरांगप्रभु जन ने देश को लूटा, मिटाया और फिर आधुनिक युग में प्रवेश का टिकट दिया, कृपा पूर्वक। उन्होंने दुनिया की तमाम सभ्यताओं के साथ यही कुछ किया. पश्चिम अभिमुख मानस के इतिहासकारों ने इसी क्रम में विक्रमादित्य को भी ध्वस्त करने की सचेत कोशिश की। ऐसे ही एक इतिहासकार डी. सी. सरकार ने विक्रमादित्य की परंपरा को अनैतिहासिक सिद्ध करने का सघन प्रयास किया। उन्होंने एन्शिएंट मालवा एंड दि विक्रमादित्य ट्रेडिशन की भूमिका में दो टूक कहा कि ईस्वी पूर्व प्रथम शती में पारंपरिक विक्रमादित्य के लिए कोई जगह नहीं है. अलबत्ता उन्होंने माना कि विक्रम सम्वत् की स्थापना विक्रमादित्य ने ही की। लेकिन वह उज्जैन के विक्रमादित्य नहीं हैं. लेकिन विक्रम सम्वत् का अस्तित्व उन्होंने या उन जैसे इतिहासकारों ने स्वीकार किया। स्वीकार इसलिए करना पड़ा उन सभी को, क्योंकि विक्रम सम्वत् भारत के काफी बड़े भूभाग में समादृत रहा है, सदियों से। 

लेकिन विक्रमादित्य के अस्तित्व की गुत्थी भी विक्रम सम्वत् की वजह से अधिक उलझी लगती है क्योंकि विक्रम सम्वत् का प्रवर्तन विदेशी आक्रांता शकों की पराजय और उन्हें देश से बाहर भगाने से आबद्ध हैं। और उपनिवेशवादी मानस इस बात को स्वीकारने के लिए तत्पर ही नहीं है कि भारतवर्ष में विदेशियों को मार भगाने का साहस कभी रहा भी था। विक्रमादित्य उन चुनिंदा शासकों में से थे जिन्होंने देश को विदेशी हमलावरों से मुक्ति दिलाई और इस महती उपलब्धि के उपलक्ष्य में विक्रमादित्य ने विक्रम सम्वत् का प्रवर्तन किया। मान्यता यह भी है कि जनता के ऋण मुक्त होने के अवसर पर उज्जैन में ऋण मुक्तेश्वर महादेव मंदिर तत्समय ही स्थापित हुआ होगा। कथा सरित्सागर में उल्लिखित है ही कि -‘‘न मे राष्ट्रे पराभूतो न दरिद्रो न दुखितः।’ विक्रमादित्य सब लोगों के हितों की रक्षा करता था। उसके राज्य में न कोई दुखी था,न दरिद्र था और न कोई पराभूत। शकों पर अप्रतिम विजय के कारण विक्रमादित्य शकारि भी कहलाये और अप्रतिम साहस प्रदर्शन के कारण साहसांक भी। 

यह भी ध्यान दिये जाने योग्य है कि विक्रम सम्वत् का प्रवर्तन विक्रमादित्य द्वारा उज्जैन से किया गया। उज्जैन परम्परा से ही काल गणना का एक प्रमुख केंद्र माना जाता रहा और इसीलिए अरब देशों में भी उज्जैन को अजिन र्(्रंढ्ढहृ) कहा जाता रहा। सभी ज्योतिष सिद्धांत ग्रंथों में उज्जैन को मानक माना गया है। आज जो वैश्विक समय के लिए ग्रीनविच की स्थिति है, वह ज्योतिष के सिद्धांत काल में और उसके बाद सैंकड़ों वर्षों तक उज्जैन की रही। यह भी निर्विवाद है कि ज्योतिर्विज्ञान उज्जैन से यूनान और एलेक्जेंड्रिया पहुँचा। काल गणना केंद्र होने से उज्जैन को विश्व के नाभि स्थल की मान्यता भी रही है- ‘स्वाधिष्ठानं स्मृता कांची मणिपूरमवंतिका। नाभि देशे महाकालस्यन्नाम्ना तत्र वै हरः।’ साथ ही महाकालेश्वर की उज्जैन में अवस्थिति काल के विशेष संदर्भ की द्योतक है। इस प्रकार विक्रम सम्वत् ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार भी एक विशेष महत्व रखता है।  

विक्रमादित्य के अवसान के बाद उनके वंशज साम्राज्य का संरक्षण नहीं कर पाये अतः शकों ने विक्रम के वंशज को पराजित कर अपना शक सम्वत् चलाया। 

शकानां वंशमुच्छेद कालेन कियतापि हि।

राजा विक्रमादित्यः सार्वभौमोपमोऽभवत्।। 

मेदिनीमनृणां कृत्वा ऽ चीकरद् वत्सरं निजम।

ततो वर्षशते पंच त्रिषता साधिके पुनः।

तस्या राज्ञोऽन्वयं हत्वा वत्सरः स्थापितः शकैः।। 

एक दूसरा मत यह भी है कि शक सम्वत् संभवतः कनिष्क ने चलाया था और उसके समकालीन शक क्षत्रपों और सातवाहनों के राज्यों में इसका काफी प्रयोग होने की वजह से इसका नामकरण शक सम्वत् हो गया। शक चाहे शक शासकों ने प्रारंभ किया या चाहे कुषाण वंश के शासक कनिष्क ने, लेकिन ये शक और कुषाण दोनों ही भारत आक्रांता थे। विदेशियों द्वारा शुरू किये ये सम्वत् को भारत में स्वीकार किया जाना औचित्यपूर्ण नहीं है। वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर सटीक राष्ट्रीय कैलेंडर अंगीकार करने के लिए गठित समिति की वर्ष 1955 में प्रकाशित रिपोर्ट की भूमिका में पं. जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि- ‘‘विभिन्न कैलेंडर देश में पिछले राजनीतिक विभाजन का प्रतिनिधित्व करते हैं, जब हमने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है तब यह वांछनीय है कि कैलेंडर में हमारी नागरिक, सामाजिक और अन्य आवश्यकताओं की एकरूपता हो और इस समस्या का निदान वैज्ञानिक आधार पर हो। लेकिन राजनीतिक विभाजन, वैज्ञानिकता, राष्ट्रीयता तथा नागरिक, सामाजिक आवश्यकताओं को अलक्षित करते हुए विभाजन तथा देश की पराजय के प्रतीक सम्वत्सरों को आधिकारिता प्रदान की गयी।

मंगलवार, 29 मार्च 2022

जंतर-मंतर पर होगा पत्रकारों का ऐतिहासिक धरना व प्रदर्शन!

 "दिल्ली हम भी आयेंगे, सोती हुई सरकार को जगायेंगे!


जंतर-मंतर पर होगा धरना व प्रदर्शन!


30 मार्च का दिन होगा,  पत्रकारिता जगत में ऐतिहासिक!


माँगें हम मनबा कर रहेंगे - ये हमने है ठान लिया!

पहले भी माना, अब भी मानोगे!!


हम भी हैं देश के प्रहरी!

हम भी हैं कोरोना योद्धा!!


पत्रकार एकता जिन्दाबाद!

मीडिया एकता जिन्दाबाद! 


वर्किंग जर्नलिस्ट्स आफ इंडिया जिन्दाबाद!


*केन्द्र सरकार को चेतावनी*


देवभूमि उत्तराखंड की मीडिया व पत्रकारिता जगत से जुड़े दर्जनों साथी 30 मार्च को दिल्ली में जंतर मंतर पर ऐतिहासिक महाप्रदर्शन व धरना में सम्मिलित होकर अपनी उपस्थिति दर्ज करायेंगे और इस संघर्ष में कन्धे से कन्धा मिलाकर चलेंगे।


*पत्रकार साथियों  से अपील*

साथियों,  

अपने अधिकारों और सुरक्षा के लिए WJI द्वारा आहूत 30 मार्च  के "धरना व महा प्रदर्शन" में अधिक से अधिक संख्या में सम्मिलित होने का कष्ट करें!

👍

*सुनील गुप्ता, प्रदेश अध्यक्ष*

वर्किंग जर्नलिस्ट्स आफ इंडिया (उत्तराखंड इकाई)

देहरादून

मोबा. 9837277287

9411101515

सोमवार, 28 मार्च 2022

रवि अरोड़ा की नजर से......

 अहसास ए कमतरी का नया आयाम / रवि अरोड़ा



नाम से तो आप उन्हें नहीं जानते होंगे मगर आपने सोशल मीडिया पर उनके चुटकुले अवश्य देखे सुने होंगे । उनका नाम है तरलोचन सिंह चुग और पिछले कई दशकों से वे कनाडा में अपने परिवार के साथ रहते हैं । पेशे से इंजीनियर रहे चुग साहब भारतीय रक्षा मंत्रालय में बड़े ओहदे पर थे और पिछले कई सालों से उनके चुटकुलों ने पूरी दुनिया में धूम मचा रखी है । तरलोचन सिंह की खास बात यह है कि वे पति पत्नी के रिश्ते और इसमें भी स्त्रियों के व्यवहार पर ही केवल चुटकुले सुनाते हैं । मैंने अब तक उनके जितने वीडियो देखे उन सभी में वे किसी रंगीन शाम की भरी महफिल में एक के बाद एक दसियों जोक सुना रहे होते हैं और खास बात यह होती है कि उस महफिल में महिलाओं की संख्या लगभग पुरुषों जितनी होती है तथा अपना मजाक उड़ाए जाने के बावजूद औरतें सर्वाधिक खिलखिला रही होती हैं । गौर करने योग्य बात यह है कि कोविड काल में सोशल मीडिया पर औरतों पर चुटकुलों की तादाद अचानक बढ़ गई है और खास बात यह है महिलाओं द्वारा ही उन्हें अधिक फॉरवर्ड किया जा रहा है । यह सब देखकर मुझे तरलोचन सिंह और उनकी महफिल की खिलखिलाती औरतें बहुत याद आती हैं । 


एक दौर था कि जब सिखों , पठानों, जाटों और शराबियों पर सर्वाधिक चुटकुले छोड़े जाते थे । समाज में जातीय संवेदनशीलता इतनी बढ़ गई है कि अब आसानी से किसी खास कौम अथवा जाति का मज़ाक नहीं उड़ाया जा सकता । सिक्खों के खिलाफ चुटकुले छोड़ने का मामला तो सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच गया था । शराब के प्रति समाज की स्वीकारोक्ति ने शराबियों को भी मज़ाक से मुक्त सा कर दिया है। शायद यही वजह रही हो कि समाज की सबसे कमजोर कड़ी मान कर औरतों को अब चुटकुलों का केंद्र बना दिया गया है । कोरोना के दौरान लम्बे लम्बे लॉक डाउन ने पुरुषों को भी घर की दहलीज में कैद कर दिया था और शायद चुटकुले बनाने वालों को नया मसाला ही मिल गया हो । हैरानी की बात यह है कि इन चुटकुलों पर स्त्रियां अधिक हंसती हैं और धड़ाधड़ आगे भेजती हैं । ये सभी चुटकुले औरतों को पुरुषों के मुक़ाबिल कमतर साबित करने वाले, उन्हें लेट लतीफ , खर्चीला, झगड़ालू और मंद बुद्धि घोषित करने वाले होते हैं मगर फिर भी स्त्रियां इनमें पूरा रस ले रही होती हैं । मैं समझने में खुद को असफल पाता हूं कि खुद की हंसी उड़वाने वाले औरतों के इस व्यवहार के पीछे उनका कौन सा मनोविज्ञान है ? इस पितृ सत्तात्मक समाज में क्या उन्होंने खुद को दोयम दर्जे का नागरिक स्वीकार कर लिया है ? क्या स्वेच्छा से वे ऐसा करती हैं अथवा इसके पीछे कोई सामाजिक, आर्थिक अथवा मनोवैज्ञानिक दबाव काम कर रहा होता है ? क्या वाकई वे खुद पर हंस रही होती हैं अथवा अपने इर्द गिर्द के पुरुषों को हंसाने के लिए अपने अहम की बलि चढ़ा रही होती हैं ? क्या यह उनकी कोरी भावुकता है या पुरुष के वर्चस्व के प्रति उनकी स्वीकारोक्ति ? क्या उन्होंने स्त्रियों को मनोरंजन की कोई शय मानने की प्रवृत्तियों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है अथवा समाज की रूढ़िवादी सोच से विद्रोह उन्हें अब अपने बूते से बाहर लगता है ? मैं यह समझने में कतई असफल हूं कि लैंगिग समानता की बात करने वाली आधुनिक महिलाएं भी इन चुटकुलों का पात्र खुद को क्यों माने बैठी है ? 


हो सकता है कि औरतें के लिए खुद पर हंसना उनके मनोरंजन का ही कोई माध्यम हो । यह भी संभव है कि दूसरों के मनोरंजन से उन्हें खुशी मिलती हो । यह भी हो सकता है कि संवाद का उनका यह कोई तरीका हो अथवा इसके बहाने से वे अपने संबंध प्रगाढ़ करती हों । मगर मनोवैज्ञानिक तो कहते हैं कि जिन चुटकुलों पर हम हंसते हैं दरअसल अपनी निजी जिंदगी में हम वैसा ही सोचते रहे होते हैं । यदि ऐसा है तो कहीं ये चुटकुले हमारी औरतों के अहसास ए कमतरी का कोई नया आयाम तो नहीं ?

रविवार, 27 मार्च 2022

कम्युनिकेशन' /विजय भास्कर

 'कम्युनिकेशन'


हिंदी पत्रकारिता पर अंग्रेजी में पहली किताब

       विजय भास्कर हिंदी के उन चुनिंदा पत्रकारों में हैं जो जब भी कुछ करते हैं वह लीक से हट कर होता है।अलग,अप्रतिम और अद्वितीय करना व आत्मप्रचार से दूर रहना उनकी पहचान है।उनकी एक पहचान देश के प्रतिष्ठित विज्ञान लेखक की भी है।वे अरसे तक 'नवभारत टाइम्स', 'प्रभात खबर','आज' व दैनिक 'हिंदुस्तान' से सम्बद्ध रहे हैं।

       इस बार फिर उन्होंने लीक से हटकर एक बड़ा काम किया है।उन्होंने 'कम्युनिकेशन' नाम की एक बृहद पुस्तक लिखी है जिसमें हिंदी अखबारों का 200 सालों का इतिहास दर्ज है। 1780 से 1980 तक के हिंदी अखबारों की विस्तृत,सारगर्भित और तथ्यगत जानकारी देनेवाली यह जरूरी किताब अंग्रेजी में हैं।यह भी कि यह हिंदी पत्रकारिता पर अंग्रेजी में आयी  पहली किताब है।

     संचार के उदगम, उसकी वैज्ञानिकता,उसका विकास और एक अखबार में उसकी परिणति से शुरू हो कर यह किताब यह स्पष्ट करती है कि किस तरह एक हिंदी अखबार जनआकांक्षा व जनआक्रोश की अभिव्यक्ति के साथ कैसे जनाधिकार के भी प्रतीक हैं।

     हिंदी पत्रकारिता पर लिखी इस जरूरी किताब में देश के पहले अखबार 'हिकी गजट' के संस्थापक,संपादक जेम्स ऑगस्ट हिकी का सफरनामा,भारतीय अखबारों पर ब्रिटिश सरकार की बंदिशें, बतौर पत्रकार महात्मा गांधी की भूमिका,आजादी के संघर्ष में अखबारों की सजगता, सक्रियता और समर्पण का इतिहास, प्रेस आयोग की सिफारिशें और उनका हश्र जैसे कई अध्याय इस किताब में शामिल हैं।

        एक जरूरी और विस्तृत जानकारी भी यह किताब देती है ।1780 से 1947 के बीच प्रकाशित लगभग 150 अखबारों की एक तालिका भी इसमें दी है जिसमें  अखबार का नाम,उसके संस्थापक,पहले संपादक,आवृत्ति व प्रकाशन का स्थान भी दिया गया है।यह सब आज दुर्लभ है।

      ...और दुर्लभ है वह इच्छाशक्ति जो लकदक विश्वास के साथ हिंदी के एक बड़े पत्रकार को यह सब करने और लिखने का हौसला देती है।

         विजय भास्कर ने बहुत मेहनत,लगन, समर्पण और दृढ़ता से यह किया।शब्द विरोधी इस मौसम में यह एक लंबी लकीर है।

        इसी लंबी लकीर पर चमकती रहे उनकी यश गाथा।

हरीश पाठक 

65 सालों के बाद अपने स्कूल में दिल्ली पुलिस पूर्व आयुक्त / विवेक शुक्ला

 


उस दिन टी.आर.कक्कड़ नार्थ दिल्ली के गुरुतेग बहादुर नगर (जीटीबी नगर) के सरकारी स्कूल में आए तो वे वहां की  दिवारों,कमरों,स्कूल के अंदर के बगीचे में लगे पेड़ों को ध्यान से देखने लगे। वे उन सबको को छू रहे थे। ये सब देखकर उन्हें अपने लगभग 65 साल पहले के दिन याद आ रहे थे जब वे यहां के छात्र थे। वे अपने अध्यापकों और साथियों को याद कर रहे थे। वे भावुक हो रहे थे। कक्कड़ साहब रुंधे गले से कुछ बोल पा रहे थे। उस दौर की स्मृतियां किसी चलचित्र की तरह से उनके जेहन में आ-जा रही थीं।


 इस दौरान उनका किंग्जवे कैंप बहुत बदल चुका है। अब उसका नाम हो गया है गुरु तेग बहादुर नगर। जिन सड़कों पर कभी-कभी एकाध कार दिखाई देती थी वहां पर कारें ही कारें चल रही हैं। साढ़े छह दशकों के दौरान पाकिस्तान से देश के विभाजन के वक्त आए साढ़े छह साल के टी.आर.कक्कड़ आगे चलकर दिल्ली पुलिस के 1997 में कमिश्नर पद पर पहुंच गए।


 वे नेशनल सिक्युरिटी गार्ड (एनएसजी) के भी महानिदेशक रहे। वे जिस ओहदे पर भी रहे वहां पर उन्होंने अपनी खास छाप छोड़ी। दिल्ली पुलिस के कमिश्नर पद पर रहते हुए उन्होंने कभी किसी गुंडे–मवाली के हक में आई सिफारिश को अहमियत नहीं दी। बड़े से बड़े बदमाश उनसे कांपता था।


 वे जब करते थे दुकान में नौकरी


 टी.आर.कक्कड़ की प्राइमरी तक की पढ़ाई नगर निगम स्कूल, गुरु तेग बहादुर नगर (जीटीबी नगर) में और फिर आगे हायर सेकेंडरी की शिक्षा जीटीबी नगर के सरकारी स्कूल से ही हुई। उन्हें हाल ही में इसी स्कूल में आमंत्रित किया गया था। वे जब यहां पर पढ़ रहे थे तब वे कमला नगर मार्केट की दुकान नंबर 46 में नौकरी भी करते थे। घर की माली हालत बहुत खराब थी। 


इसलिए नौकरी करना जरूरी थी। दूसरा कोई विकल्प नहीं था। उन्हें हर रोज एक रुपया पगार के रूप में मिलता था। वे स्कूल के बाद दुकान पर जाते थे। ये 1956 की बातें हैं। कक्कड़ साहब ने कहा कि अपने पुराने स्कूल में आकर बहुत गर्व महसूस हुआ और पुरानी यादें ताज़ा हो गईं।  वे उन कमरों को भी देखने गये जिन में उनकी क्लास लगती थी। वे स्कूल की लाइब्रेयरी और स्कूल बिल्डिंग का नया हिस्सा देखकर खुश हो गये।


  किंग्सवे कैंप के आसपास के स्कूलों में एक दौर में पाकिस्तान से आए शरणार्थी परिवारों के बच्चे ही पढ़ा करते थे। शरणार्थियों के लिए सरकार ने इस सारे क्षेत्र में कैंप स्थापित किए थे। उन टेंटों में वे रहा करते थे। जीवन कठोर था पर वक्त गुजर गया। 


उन्हीं शरणार्थी परिवारों ने इस दिल्ली को जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में समृद्ध किया। अब तो जीटीबी नगर, विजय नगर, हकीकत नगर वगैरह बहुत समावेशी हो गए हैं। यहां पर यूपी और बिहार के भी सैकड़ों परिवार रहने लगे हैं। 


कक्कड़ साहब ने बताया कि उन्होंने स्कूल के बाद भारतीय सेना में नौकरी कर ली। वे पुणे चल गए। वहां रहते हुए पत्राचार से बीए की। वहां पर उनके कुछ साथियों ने उन्हें सिविल सेवा में बैठने की सलाह दी। उन्होंने सलाह को माना और कसकर मेहनत की। कक्कड़ साहब ने पहली बार में ही सिविल सर्विस की परीक्षा को क्रेक कर लिया। वे आईपीएस अफसऱ बन गए।


दरअसल कक्कड़ साहब, दिल्ली विधानसभा के पूर्व सदस्य डॉ हरीश खन्ना और इसी स्कूल के कुछ अन्य पूर्व छात्र स्कूल के 12 वीं क्लास के बच्चों को संबोधित करने आए थे। ये बच्चे अब अपनी बोर्ड की परीक्षा के लिए तैयार हो रहे हैं। डॉ हरीश खन्ना,जो दिल्ली यूनिवर्सिटी में लंबे समय तक हिन्दी पढ़ाते रहे हैं, भी अपने अपने किशोरावस्था के उस सरकारी स्कूल में जाकर गद्गद नजर आए जहां से उन्होंने हायर सेकेंडरी पास की थी।


दिल्ली पुलिस के पूर्व पुलिस कमिश्नर टी.आर.कक्कड़ को स्कूल में आमंत्रित किया था स्कूल के प्रिंसिपल श्री एच आर गिलानी ने।vivekshukladelhi@gmail.com

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Picture- TR Kakkar

शनिवार, 26 मार्च 2022

अखौरी प्रमोद जो पत्रकारों के पत्रकार थे / अनामी शरण बबल

 औरंगाबाद वाले अखौरी प्रमोद का रांची ( JK) संस्करण  / अनामी शरण बबल


साथ साथ लेखमाला लिखने की इस कोशिश में इसबार मैं एक ऐसे व्यक्ति पर कुछ लिखने का प्रयास कर रहा हूँ जिसके सामने मैं आज भी एक स्टूडेंट की तरह ही हूँ. जब भी और जहाँ कहीं भी इनकी चर्चा होती हैं तो इनका चेहरा मेरी आँखों के सामने घूमने लगता हैं. बिहार के देव जिला औरंगाबाद  से आकर दिल्ली में सक्रिय होकर आबाद हुए 35  साल (1987-2022) हो गये हैं, और इस दौरान  अनगिनत लोगों से मिला उन्ही लोगों में कुछ पर लिखने की यह पहल हो रही 


: ख़ासकर अपनों या लंबे समय से परिचित करीबियों के प्रति कुछ भी लिखना सबसे कठिन होता हैं. बातों और यादों का सिलसिला भी इतना बड़ा होता हैं की  क्या लिखें क्या छोड़ दे या लिखने के क्रम में क्या छूट गया या (जाय )  इसका खतरा हमेशा बना रहता हैं. मैं इस बार अपने युवकाल  कहे  या अपनी पहचान के लिए जूझ रहा था उस समय के एक व्यक्ति पर शब्दों का घरौंदा बना रहा हूँ जहाँ पर मैं कुछ नहीं था. मैं मूलतः औरंगाबाद जिले के  धार्मिक कस्बे के रुप में बिख्यात देव का रहने वाला था. मगर कथाक्षेत्र जिला मुख्यालय औरंगाबाद हैं. बात मैं जिला के विख्यात फोटोग्राफर अखौरी प्रमोद की कर रहा हूँ जो मूलतः एक सरकारी नौकरी में रहते हुए भी सबके लिए सर्वविदित सर्व विख्यात सर्व सुलभ और सर्वत्र मुस्कान के संग उपलब्ध पाए जाते थे. समय के पक्के उस्ताद अखौरी प्रमोद क़ो ज्यादातर लोग जानते थे, मगर वे एक सरकारी नौकरी भी करते हैं इसकी जानकारी सबो क़ो शायद नहीं थी. मोबाइल का जमाना नहीं होने के बावजूद छायालोक स्टूडियो तक कोई खबर पंहुचा देने के बाद शायद ही कभी ऐसा होता होगा की समय पर AP ना पहुंचें हो कभी. साफ कर दू की उस समय अखौरी प्रमोद जी क़ो लोग AP का सम्बोधन देने की हिममत नहीं करते थे. AP तो दूर की बात जी लगाए बगैर शायद ही कोई होता हो जो केवल  अखौरी प्रमोद कहता हो. दूसरों क़ो Ap ने  शायद ही कभी तू तडाक या गरम लहज़े में बात की होगी . शायद इसी का प्रतिफल था कि ज़िलें में शासन प्रशासन नेता नौकरशाह से लेकर ढेरों लड़कियां सहित हर तरह के लोगों के बीच AP खासे सर्वप्रिय थे.आदर के पात्र भी. 


 औरंगाबाद से मेरा नाता भी अजीब हैं. मेरे पापा सहित दो दो चाचा का ससुराल भी धरनी धर  रोड  औरंगाबाद में हैं यानी यह शहर ही मेरे लिए मेरा ननिहाल (था ) हैं

 मैं अपनी मौसियों से कहता भी था की औरंगाबाद का हर लड़का मेरा मामा और लड़की मेरी मौसी हैं.

खैर छायालोक वाले मोहन मामा क़ो जानता था और ढेरों से अपने परिचय के सूत्रधार दिवंगत प्रदीप कुमार रोशन भी रहें हैं जो खुद बहुत बडे शायर थे


बात कोई 1983- 84 की रही होगी जब मैं  लेखक या पत्रकार नहीं था. कुछ लिखने का ककहरा  सीख रहा था और मन में अपार ऊर्जा  उमंग हिलोरे मार रहा था.  पढ़ाई में भी इतना बुरा नहीं था  अगर  सरकारी नौकरी की ललक होती तो  कहीं न कहीं सेट कर ही लेता या हो जाता, मगर अखबारी नाम का ऐसा खुमार था कि मैं इसी में पगलाया हुआ था. खैर पागलपन से ही कुछ पाया भी जा सकता हैं  मैं AP से कैसे कब किस और किसके संग परिचित हुआ यह तो याद नहीं हैं मगर जब एक दूसरे क़ो जानने लगा तो कब किस तरह और कितना घुल मिल गया इसकी याद भी गज़ब की हैं. उभरता हुआ पत्रकार कहे या नवसिखुआ इस अंतर पर खुद कहना  अजीब लगता हैं  कोई खास पहचान साहस पहचान परिचय और सलीका नहीं होने के बाद भी AP हर कदम पर मेरे साथ नजर आते ( रहते ) थे.


i: बात उन दिनों की हैं जब देव की क्या बिसात पूरे औरंगाबाद  जिले में ही पत्रकारों का घोर अकाल था. कहने क़ो तो कुछ वकील पत्रकार थे, मगर काले लिबास वाले झूठ के कारोबारी वकील नुमा पत्रकारों से मिलने की मन में कभी इच्छा नहीं हु, और मैं स्वनाम धन्य  पत्रकात वकीलों से कभी नहीं मिला. जब कभी भी काले कपडे वाले वकील से अधिक पत्रकारों की चर्चा होती तो  लोग इतनी शालीनता विनम्रता और आदर से नाम लेते मानो ऐसा नहीं करना भी कोई अपराध हो. हालांकि मैं भी नौ सिखुआ ही था मगर दूसरों की शर्तो अपनी  लक्ष्मण रेखा क़ो बदलना कभी गवारा नहीं होता.  हाँ तो 1983-86 तक कहने दिखने दिखाने के लिए केवल एक ही पत्रकार थे. औरंगाबाद बाजार में पोस्ट ऑफिस के निकट विमला मेडिकल स्टोर के मालिक कहे या दवाई विक्रेता विमल कुमार..


जी हाँ दिन भर दवाई बेचते बेचते  कभी कभार कोई रिपोर्ट भी लिख कर गाड़ी से पटना भेज देते थे. खबरों के लिए भटकने की बजाय विमल जी केवल उन्ही खबरों क़ो न्यूज़ की तरह भेजते थे जो उनकी दुकान तक आ जाय. यानी स्वार्थ रहित पत्रकार  विमल में सरकारी लाभ और रुतबे का गुमान नहीं था इस कारण सरकारी PRO क़ो भी प्रेस रिलीज़ विमल जी के दुकान तक पहुंचानी पड़ती  थी. यही रुतबा और मान विमल जी क़ो पत्रकारिता से जोड़े हुए था. और NBT जैसे अख़बार क़ो भी पत्रकारों से अकालग्रस्त जिला औरंगाबाद में विमल जैसे दुर्लभ पत्रकार ही मिल पाया. बिना किसी लाग लपेट के विमल जी से सीधे मिलकर अपना परिचय दिया तो वे काफ़ी खुश हुए कुछ खबर लाकर ( लिखकर ) देने का उन्होंने सुझाव दिया. तो दर्जनों खबर लिखकर विमल जी क़ो देने लगा या उनके पास उपलब्ध न्यूज़ क़ो ही दुकान में बैठे बैठे ही लिखने की चेष्टा करता  जिसके लिए विमल जी मेरे प्रति हमेशा स्नेह रखते थे. उधर मैं अपनी लिखी खबरों क़ो प्रिंट देख कर खुश होता की मुफ्त में न्यूज़ लिखने की आदत से तो हाथ मंज रही थी.


 ये तो विमल विनोद कथा के बहाने मीडिया के प्रति अपने मस्का चस्का क़ो माप रहा था, मगर अघोषित तौर पर जिले में एक और पत्रकार छायाकार थे जो स्कूटी पर होकर सवार होकर ज्यादातर या यों कहे कि सभी आयोजनों में फोटो खींचते अधिकारियो से मिलते जुलते रहते थे.  वे सक्रिय पत्रकार छायाकार हैं भी या नहीं यह तो बाद की बात हैं मगर औरंगाबाद में कोई भी राजनैतिक सामाजिक  प्रशासनिक  धार्मिक कार्यक्रम हो या कोई आंदोलन जलसा जुलुस  दंगा या बंदी हो तो जनाब छायाकार पत्रकार के रुप में हरदम हमेशा या सर्वत्र सुलभ उपलब्ध होंगे ही होंगे. बात अखौरी प्रमोद की हो रही हैं जो ( यह बाद में ज्ञात हुआ ) एक सरकारी विभाग में कार्यरत होने के बावजूद घर दफ्तर बाजार और घटनास्थलो पर वे कैसे और किस तरह मौजूद रहते या हो जाते थे 


पत्रकारिता के जोश जुनून और ताप के (चलते) साथ साथमैं भी हवा कि तरह हर जगह पहुंचने की कोशिश करता. 1987 में जिला औरंगाबाद के दरमियाँ और दलेलचक बघौरा नरसंहार की सुबह सुबह पता चलते ही मैं  कोई 10-11 बजे तक घटनास्थल पर जा पहुंचा जहाँ पर मुझसे भी पहले श्रीमान छायाकार अखौरी प्रमोद दे दनादन फोटो खींचने में मुस्तैद थे . AP जी क़ो देखते ही मेरा हौसला परवान  पर होता और मैं उनके पास क्या पहुंचा की सारा प्रशासन पुलिस का दल बल के बीच  मनमाने ढंग से काम करने की आज़ादी मिल जाती थी  सबसे पहले पहल एक छायाकार की तरह अखौरी प्रमोद होते तो पत्रकार के रुप में मेरी उपस्थिति होती थी. अमूमन होता यह था की दोपहर के बाद जब मैं उनके साथ औरंगाबाद लौटने  की तैयारी करता तब तक पटना या गया के दर्जनों पत्रकार और छायाकार मौके पर आ धमकते  तब live फोटो के लिए राजधानी के धुरंधर छायाकार भी इनके पीछे लग जाते थे.  कभी कभार तो वे लोग के आने से पहले यदि AP औरंगाबाद निकल गये तो ढेरों पत्रकार छायाकार इनसे फोटो के लिए इनके घर या छायालोक स्टूडियो में करबद्ध  हो जाते.


सबसे कमाल तो यह होता की अपने छायाकार सहोदरो  क़ो  देख कर अखौरी प्रमोद बिना बाइलाइन के प्रेशर के दुर्लभ फोटो सहज़ में दे देते.  हालांकि उनकी यह उदारता मुझे खलती थी मगर वे मुस्कुरा कर हमेशा यही संतोष कर लेते की कोई बात नहीं  फोटो मेरे पास यूहीं रहने से बेहतर हैं की वो छपे. यह बड़प्पन या उदारता मुझे अचम्भित करती थी .


 Ap के मन में संतोष और जोश भरा होता था सबो के लिए काफ़ी उत्साह कर साथ संपर्क में रहना उनकी खासियत थी  Ap मेरे लिए एक थर्वामीटर  की तरह थे जिनको देखकर मैं अपनी काबलियत नकारापन और क्षमताओं के उतार चढ़ाव के ग्राफ का आंकलन करता या अपने बढ़ते चढ़ते सिकुड़ते मुड़ते टूटते कद क़ो देखता था  यह उनका बड़प्पन था कि  मेरा साधिकार किसी भी फोटो  के लिए निःसंकोच कह देना ही काफ़ी होता. पटना में मेरे कुछ ऐसे भी गुरु नुमा दोस्त बन गये थे जिनको कोई खबर की रुप रेखा बताने पर फोटो के साथ रिपोर्ट भेज देता था तो वही रिपोर्ट कभी आज पाटलिपुत्र प्रदीप ( बाद में यही प्रदीप हिंदुस्तान बन गया ) आदि कई अखबारों में छप जाती थी.


 ख़ासकर स्पलिंटर और ढेरों नये पुराने अखबारों में खबर छपवाने के लिए पटना के शर्मांजु किशोर मेरे सारथी बनकर मदद करते थे.  हालांकि शर्मान्नजू  किशोर से पहली बार मैं 1996 में अहमदाबाद में मिला. इनपर तो काफ़ी कुछ लिखा जायगा मगर देव औरंगाबाद में रहते हुए हज़ारो रूपये के फोटो अखौरी जी  ने खींची थी. अमुमन पूरी खबर जिसे डिटेल भी कह सकते हैं के साथ फोटो मुझे लाकर देते. जिसे पटना के किसी मित्र के पास डाक से भेजकर किसी पेपर में छपने का इंतजार करता और छपी हुई रिपोर्ट क़ो देख कर ऐसा लगता मानो जन्नत  हाथ में हो


पटना के किसी अख़बार में अंशकालिक  या छपी हुई खबर के अनुसार मानदेय पाने वाला रिपोर्टर बनने का तो मौका नहीं मिला मगर 1987 में भारतीय जनसंचार संस्थान  (IIMC ) में स्नात्तकोत्तर पत्रकारिता डिप्लोमा करने का सुअवसर जरूर मिला. दिल्ली में नामांकन के साथ ही देव औरंगाबाद छूट गया. अपने ही गांव घर जिला में किसी मेहमान की तरह आता. कुछ लोग मिलते तो कुछ लोग से बिना मिले ही रिटर्न हो जाता. नौकरी बेकारी का सिलसिला जारी रहा. दर्जन भर नौकरी करने बदलने छोड़ने  छूटने के बावजूद 35 साल में 15 साल बेकारी के ही रहें. नाम शोहरत धन दौलत दर्जन भर किताबों सहित न्यूज़ एजेंसियो के लिए जमकर और खूब लिखा  दो तीन सज्जनों के लिए तो सैकड़ों रिपोर्ट लिखने के बावजूद धन नहीं मिला ख़ासकर किसी महिला से भी सुंदर संपादक रहें पत्रकार और साधु महंत बने माल मैथुन के रंगीले के संग छपने की भूख तो मिट गयी मगर धन पाना संभव नहीं हो पाया  इन दिवंगत पत्रकारों पर सच लिखना अब शोभा नहीं देता. 


नाना प्रकार के खट्टे मीठे अनुभवो के बीच मेरे मन में अखौरी प्रमोद सदैव जीवित रहे. जब कभी भी मन हताश होता या ठगा छला जाता तो मुझे अखौरी प्रमोद जी की याद आती  औरंगाबाद से रिटायर होने के बाद कोई 20 साल से भी ज्यादा समय  शहर छोड़े हो गया हैं इसके बावजूद जिले में उनकी पहचान और प्रियजनों की कोई कमी नहीं हैं मैं भी कोई 23-24 साल पहले उनसे मिला था. रिटायरमेन्ट कर बाद वे फिर कभी औरंगाबाद आए या नहीं यह भी मैं नहीं जानता मगर औरंगाबाद बिहार वाले AP के रांची झारखण्ड में तब्दिल  हो जानें के बाद भी इनकी यादों के संग सैकड़ों लोग आज भी AP के दीवानों चाहने वालों की कमी नहीं हैं  2016 में कोई तीन माह तक रांची में रहा. रांची जानें की सूचना मैंने केवल अखौरी प्रमोद जी क़ो दी थी इसके बावजूद मुलाक़ात नहीं हो सकी दिल्ली के गंगाराम हॉस्पिटल में ईलाज के लिए भाभी क़ो लेकर भी आए मगर व्यस्तता लापरवाही और उदासीनता के चलते मैं हॉस्पिटल नहीं जा सका.  भाभी के दिवंगत होने की खबर भी तब मिली जब पंचतत्त्व में लीन होकर भाभी  अंतर्ध्यान हो गयी और सपरिवार वे लोग भाभी की यादों के संग रांची लौट गये. 


 अखौरी जी का बेटा रुप बॉलीवुड में actor डायरेक्टर राइटर  सिनेमाटोग्राफर  हैं. अपनी अलग पहचान के लिए  जमकर काम क़ो नये ढंग से परिभाषित करने में लगा हैं बड़ी बेटी मृणाल संगीत गायन अध्यापन में लगी हैं  कार्यक्रमों की भीड़ में  उनकी अलग शानदार पहचान हैं तो सबसे छोटी बेटी केक गर्ल की तरह विख्यात हैं सैकड़ों स्वाद फ्लेवर और डिज़ाइन में केक से सृजन और स्वाद क़ो नया आयाम देने में लगी हैं  


वही अपने बाल बच्चों के खुशहाल जीवन से संतुष्ट कोई 80 साल के अखौरी प्रमोद में आज भी वही जोश जुनून ऊर्जा और काम के प्रति उत्साहजनक समर्पण हैं. उनसे मिलना कब मुमकिन होंगा यह तो मैं नहीं जानता मगर मोबाइल युग में अक्सर बातें हो जाती हैं. जिस समय मैं आज अखौरी प्रमोद जी क़ो याद कर रहा हूँ तो पत्रकारों से अकालग्रस्त रहें औरंगाबाद में आज दो एक नहीं सैकड़ों पत्रकार सक्रिय हैं प्रिंट से ज्यादा टीवी युग में खबरिया न्यूज़ चैनलों में ज्यादा भीड़ हैं. जिले से एक नहीं बल्कि दो दो अख़बार छप रहें हैं. इतने पत्रकारों क़ो देख कर मेरा मन भी मुदित हो जाता हैं. हालांकि ज्यादातर पत्रकारों se मिला नहीं हूँ मगर अपने जिले के इन कलम बहादुरो क़ो देखने की तमन्ना जरूर हैं. ताकि मध्य बिहार के औरंगाबाद की धरती पर सक्रिय पत्रकारों से रूबरू होकर सबके बीच मैं खुद क़ो तलाश कर सकू.  फिलहाल अखौरी जी के सक्रिय जीवन और बेहतर सेहत की कामना हैं की उनके बहाने ही मैं अपने उन दिनों उन यादों की गलियों में चक़्कर काट रहा हूँ जहाँ के ज्यादातर पत्रकार अनजान होकर भी मेरे अपने सहोदर से हैं

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