मंगलवार, 27 नवंबर 2012

इलेक्ट्रानिक मीडिया क्या है?


इलेक्ट्रानिक मीडिया क्या है?
प्रकाशन, संपादन, लेखन अथवा प्रसारण के कार्य को प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक माध्यमों से आगे बढ़ाने की कला को मीडिया कहते है।

इलेक्ट्रानिक मीडिया के संदर्भ में विभिन्न विद्वानों का मत

इलेक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से जो जनसंचार होता है वह इलेक्ट्रानिक मीडिया है। (शिक्षाविद् : डॉ. प्रेमचंद पातंजलि)

श्रव्य और दृश्य विधा के माध्यम से तुरत-फुरत सूचना देने वाला माध्यम इलेक्ट्रानिक मीडिया हे। (रेडियो प्रोड्यूसर डॉ0 हरिसिंह पाल)

विशेष रूप से इलेक्ट्रानिक मीडिया से तात्पर्य ऐसी विद्या से है जिसके माध्यम से नई तकनीक के द्वारा व्यक्ति देश-विदेश की खबरों के अलावा अन्य जानकारी भी प्राप्त करता हो। (वरिष्ठ पत्रकार मोहनदास नैमिशराय)

इलेक्ट्रानिक मीडिया जनसंचार माध्यमों में प्रमुख माध्यम है। हजारों मील दूर की गतिविधियों की जीवंत जानकारी इससे पलभर में मिल जाती है।
अशांत मन ही पत्रकारिता की जननी है।
रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, इंटरनेट व मल्टीमीडिया इलेक्ट्रानिक मीडिया के अवयव है।
`नई पत्रकारिता में केवल समाचार प्रसारित करना एकमात्र उद्देश्य नहीं है, बल्कि मनोरंजन, विचार-विश्लेषण, समीक्षा, साक्षात्कार, घटना-विश्लेषण, विज्ञापन और किसी न किसी सीमा तक समाज को प्रभावित करना भी इसके उद्देश्यों में निहित है।
मीडिया समाज का आईना है और जागृति लाने का जरिया भी।

इलेक्ट्रानिक मीडिया का प्रसारण-सिद्धांत

ध्वनि -ध्वनि ही दृश्य चित्र के निर्माण में सहायक होती है। घोड़ों की टाप, युद्ध क्षेत्र का वर्णन, पशु-पक्षियों की चहचहाहट बारिश की बूदें, दरवाजे के खुलने की आवाज, जोर से चीजें पटकने, लाठी की ठक-ठक, चरम चाप की आवाज, बस व रेलगाड़ी के आने की उद्घोषणाएं, रेलवे प्लेटफार्म के दृश्य आदि का आनन्द रेडियों पर ध्वनि द्वारा ही लिया जा सकता है।

चित्रात्मकता-ध्वनियां और चित्रों का एक साथ संप्रेषण ही टेलीविजन की वास्तविक प्रक्रिया है। इसके प्रसारण में चित्रों के साथ-साथ ध्वनि के कलात्मक उपयोग पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
संगीत -संगीत ही मनोंरंजन की एक ऐसी विधा है जिससे मनुष्य ही नहीं बल्कि सर्प, हिरनजैसे पशु भी मुग्घ हो जाते है। संगीत से ही नाटकीयता उभरती है। रोचकता बढ़ती है।


कैमरा-प्रोड्यूसर को शूटिंग के समय, शूटिंग सीक्वेंस का क्रम निर्धारित करना पड़ता है। दूरदर्शन एवं फिल्म लेखन में तीन (S) का प्रयोग प्रचुर मात्राा में होता है यानी शॉट, सीन, सीक्वेंस। वही लेखक दूरदर्शन व सिनेमा में सफल हो सकता है। जिसे अभिनय, गायन, फिल्मांकन एवं संपादन का भरपूर ज्ञान हो।

भाषा :-रेडियो की भाषा आम आदमी से जुड़ी हुई भाषा है जिसे झोपड़ी से लेकर राजमहल तक सुना जाता है । जबकि टेलीविजन की भाषा एक खास वर्ग के लिए है। रेडियो पर आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया जाता है। इस भाषा में क्षेत्रीय शब्दों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है। जो अपनी परम्परा, संस्कृति धर्म से जुड़े होते है। टेलविजन की भाषा में ग्लोबलाइजेशन है। विदेशी संस्कृति से जुड़े शब्दों का अधिक प्रयोग किया जाता है। आजादी के 55 साल बाद भी छोटे कस्बों में टेलीविजन की आवाज नहीं पहुंच पाई है। रेडियो वहां पहुंच गया है। वाक्य हमेश छोटे-छोटे होने चाहिए। साहित्यिक शब्द श्रोता की रूचि को नष्ट कर देते है।

संक्षिप्तता- इलेक्ट्रानिक मीडिया समयबद्ध प्रसारण है इसलिए थोड़े में बहुत कुछ कह देना इलेक्ट्रानिक मीडिया की विशेषता है।

सृजानात्मक और मीडिया
कविता, कहानी, नाटक, रिपोटाZज, साक्षात्कार, विज्ञापन, अनुवाद, कमेंट्री, फीचर, यात्रावर्णन, पुस्तक समीक्षा आदि साहित्य के सृजनात्मक पहलू है। जब इनका संबंध रेडियो व टेलीविजन से जुड़ जाता है तो ये इलेक्ट्रानिक मीडिया की श्रेणी मे आ जाते है।

सृजनशक्ति परम्परागत जनसंचार माध्यमों से आदिकाल से ही अभिव्यक्त होती रही है पर आधुनिक जनसंचार माध्यमों ने मनुष्य की सृजनशक्ति में चार चांद अवश्य लगाया है।

कठपुतली, नौटंकी, स्वांग, ढोलक आदि माध्यमोें से सृजन अभिव्यक्त होता रहा और ये माध्यम अपनी पैठ बनाते रहे। फिर मुद्रण कला का आगमन हुआ। मनुष्य की सृजनशक्ति प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया के रूप में देखी जाने लगी। दोनों का अपना-अपना घर है। शब्द-संरचना अलग-अलग है। भाषा अलग-अलग है। प्रस्तुतीकरण के तौर-तरीके एकदम भिन्न है।
कहानी कहानी होती है। इसे सुनने की ललक मनुष्य को शुरू से ही रही है। घटना-मूलकता ही पारम्परिक कहानी का प्रधान गुण माना गया है।

आगे क्या हुआ
कथानक, चरित्र, देशकाल, संवाद, भाषा-शैली, उद्देश्य कहानी के प्रमुख तत्व माने गये है।
मीडिया की गोद में आने का मतलब कहानी सर्वव्यापी होनी चाहिए। यानी बच्चे से लेकर वृद्ध उसका आनन्द ले सकें। जब कहानी टेलीविजन के लिए लिखी जाती है तो उसमें दृश्यात्मकता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
कथा के दृश्यों को फिल्मांकित करने के लिए विभिन्न लोकेशन, कोणों की योजना में एक साहित्य की विशेष प्रकार की तकनीक का प्रयोग किया जाता है जिसे वर्तमान में हम `पटकथा´ के नाम से जानते है। इस तकनीक में कथा संक्षेप रूप में लिखी जाती है। अनुवाद का अन्त ता है, ती है, ते हैं पर होता है।
कथा के प्रमुख बिन्दुओं का जिक्र करते हुए अगले चरण का संकेत किया जाता है। कथानक का क्रमश: विकास चित्रित किया जाता है। इसके बाद किाा दृश्यों में विभाजित कर दी जाती है। दृश्य-प्रति-दृश्य रूप में लिखि गई साहित्य की तकनीक ही पटकथा कहलाती है। पटकथा के अंतिम प्रारूप में कथा के साथ-साथ कैमरा, ध्वनि, अभिनय आदि का भी पूर्ण निर्देशन होता है।

पटकथा लेकक के भाषा के अलावा मीडिया संबंधी तकनीक का भरपूर ज्ञान होना आवश्यक है। प्रत्येक प्रकार के दृश्य फिल्माने के लिए पहले `मास्टर शौट´ लेना होता है। इसके बाद विषय से संबंधित शॉट लिया जाता हे। मास्टर शॉट के बाद मिड शॉट और फिर टू शॉट बाद में क्लोजअप शॉट लेना होता है।

रिपोटाZज रिपोर्ट मात्र नहीं है बल्कि लेखक का हृदय, अनुभूति, दू-दृष्टि संवेदनशील व्यक्तित्व का होना परम आवश्यक है। उक्त बातों से जो व्यक्ति ओतप्रोत नहीं होता उसे मात्र संवाददाता ही कहा जा सकता है। घटना का मार्मिक वर्णन रिपोर्ताज हैै।

नाटकीयता, रोचकता, उत्सुकता आदि गुण रखने वाला व्यक्ति ही एक अच्छा रिपोर्ताज हो सकता है।
शहर, पहाड़, झील, सम्मेलन आदि विषयों पर अच्छे रिपोर्ताज लिखे जाते है।
विषय विशेषज्ञ, साहित्कार, कलाकार, राजनीतिज्ञ, समाज सुधारक आदि का अक्सर साक्षात्कार प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया में प्रचुर मात्रा में लिखा जाता है।

दो व्यक्तियों की मानसिकता इस विधा के द्वारा पढ़ी, सुनी व देखी जा सकती है। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से बात कहलवाकर सच्चाई की तर तक पहुंचता है।

पन्द्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी, राष्ट्रीय नेता की शवयात्रा, खेलों का आंखों-देखा हाल जब हम रेडियो व टेलीविजन पर सुनते हैं तो उसे कमेंट्री कहते है।

कमेंट्रीकर्ता को घटना की प्रत्येक चीज का वर्णन करना पड़ता है। खेल कमेंट्री उत्तेजक व रोमांचक होतीह है जबकि शवयात्रा की भावविह्वलता पूर्ण।

कमेंत्री चाहे रेडियों के लिए हो या टेलीविजन के लिए पर कमेंत्रीकर्ता का स्वर घटना के अनुकूल ही होना चाहिए।
सामग्री को पहले अच्छी तरह से पढ़ लेना चाहिए।

उच्चारण इस विधा में पहला गुण है। तकनीक ज्ञान भी होना चाहिए।

समाचार लेखन
रेडियो-समाचार बुलेटिन एवं समाचार दर्शन रेडियो समाचार के दो रूप है। बुलेटिन में देशी व विदेशी समाचार रखा जाता है। देशी व विदेशी समाचार का मतलब होता है कि जब समाचार पूरे देश से संबंध रखता है तो उसे राष्ट्रीय स्तर का समाचार कहते है, पर जहां समाचार का स्वर राष्ट्रीय स्तर का न होकर राज्य स्तर का हो तो प्रसारित होता है। रेडियो पर प्रसारित समाचार को हम बुलेटिन कहते है। जबकि समाचार दर्शन से अभिप्राय उस समाचार से है जिसमें खेल प्रतियोगित, दुघZटना स्थल, बाढ़ का आँखों देखा हाल, साक्षात्कार, व्याख्यान, रोचक घटनाओं का वर्णन आता है।
बोलने से पहले समाचार कागज पर छोटे व सरल वाक्यों में लिखा जाता है। इस लिखे हुए रूप को रेडियो-िस्क्रप्ट कहते है। श्रोता को हमेशा यही लगे कि समाचार वाचक कंठस्थ बोल रहा है।
रेडियो समाचार की भाषा सरल होनी चाहिए। साहित्यिक भाषा का पुट कदापि न होना चाहिए। यह मानकर लिखना चाहिए कि मुझे समाचार अनपढ़ व्यक्ति को सुनाना है। समाचार में दैनिक भाषा का प्रयोग करना चाहिए।
वाक्य में उतने शब्द होने चाहिए जितने एक सांस में बोले जा सकें। क्या, क्यों, कब, कहाँ, किसने तथा कैसे आदि छह शब्द रेडियो समाचार के मुख्य अवयव है अत: इन छह अवयवों को ध्यान में रख कर समाचार तैयार करना चाहिए।
रेडियो समाचार लेखन में तारीख के स्थान पर दिन का प्रयोग होता है। महीने व साल का नाम देने के स्थान पर `आज´, रविवार, सोमवार या यूँ कहिए कि `इस सप्ताह´, `इस महिने´, अगले महीने, पिछले वर्ष, अगले वर्ष आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है। उपयुZक्त क्रमश: पर्वोक्त, अप्रसन्नता, साधन अपर्याप्त आदि शब्दों का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए।
स्क्रप्ट लिखते समय पंक्ति स्पष्ट, शब्द अलग-अलग, कागज के दोनों ओर समान हाशिया के अलावा पृष्ठ समाप्त होने से पहले वाक्य समाप्त कर देना चाहिए।

छोटी संख्या को हमेश अंकों में तथा बड़ी संख्या को शब्दों में लिखना चाहिए। इसके भी दो तरीके है-पहला तो यह है कि बारह हजार चार सौ पच्चीस, दूसरा तरीका है 12 हजार 4 सौ पच्चीस (12425)
मुख्य समाचारों को सदैव बोल्ड किया जाता है जिसे समाचार वाचक उस पर जोर देकर पढ़ सके।
रेडियो पर अक्सर, 5,10,15 मिनट का समाचार बुलेटिन होता है। 2 मिनट का समाचार संक्षिप्त में दिया जाता है जब कि दस व पन्द्रह मिनट का समाचार तीन चरणों में बांटा जाता है। पहले चरण में मुख्य समाचार तथा दूसरे चरण में विस्तरपूर्वक समाचार तथा अंतिम चरण में पुन: मुख्य समाचार बोले जाते है।
रेडियो पत्रकारिता समय सीमा के अन्तर्गत चलती है इसलिए इस पत्रकारिता की खूबी है कि 20 या 30 शब्दों में समाचार तैयार करें।

10 मिनट के बुलेटिन में चार से छह तथा 15 मिनट के बुलेटिन में छह से आठ तक हेड लाइन्स होती है।
15 हजार शब्दों का एक बुलेटिन होता है।

टेलिविजन
टेलिविजन के लिए लिखने वाला व्यक्ति दृश्य व बिम्बों पर सोचता है। टेलीविजन समाचार के दो पक्ष होते हैं। पहले पक्ष में समाचार लेखन, समाचार संयोजन के अलावा दृश्य संयोजन एवं सम्पादन-कार्य आता है। वाचन कार्य दूसरे पक्ष में रखा गया है।

समाचार तैयार करते समय समाचार से संबंधित दृश्यात्मकता पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
ग्राफ्स, रेखाचित्र एवं मानचित्रों का भी संयोजन एक तरीकेबद्ध किया जाता है। समय-सीमा का भी पूर्ण ध्यान रखना पड़ता है।

टेलिविजन समाचार सम्पादक का काम बड़ा चुनौतीपूर्ण होता है। समाचार के साथ दृश्य संलग्न करना। समाचार व दृश्य सामग्री की समय-सीमा भी निर्धारित करनी होती है। टेलीविजन पर समाचार संवाददाता ही समाचार वाचक भी हो सकता है और नहीं भी।

चित्रों का सम्पादन -क्रम में समाचार वाचन करना होता है।
टेलीविजन समाचार को रेडियो की भांति तीन चरणों में विभाजित किया जाता है। पहले और तीसरे चरण को मुख्य समाचार कहते हैं। दूसरा चरण विस्तारपूर्वक समाचारों का होता है। प्रत्येक बुलेटिन मे छ: या आठ मुख्य समाचार होते है। मुख्य समाचार संक्षिप्त होते है। सम्पादक समाचारों की चार प्रतियां तैयार करता है। फ्लोर मैनेजरर, वाचक एवं प्रोड्यूसर को एक-एक प्रति दी जाती है। चौधी प्रति वह स्वयं अपने पास रखता है।
नवीनता, स्पष्टता, संक्षिप्ता एवं भाषा का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए।
इसलिए टेलिविजन समाचारों में घटनाक्रम, चित्रात्मकता, संक्षिप्तता, संभाषणशीलता, समय-सीमा के अलावा रोचकता विशेष गुण माने गये है।

समाचार वाचन

रेडियो वाचन
रेडियो प्रस्तुतीकरण के लिए स्वाभाविकता, आत्मीयता एवं विविधता का हमेशा ध्यान रखना चाहिए।
प्रिंट मीडिया हमें 24 घंटे बाद समाचार देता है जबकि रेडियो से हमें तुरन्त समाचार उपलब्ध हो जाता है। रेडियो से हम प्रति घंटे देश-विदेश की नवीनतम घटनाओं से अवगत होते हैं पर ऐसा संचार के अन्य माध्यमों से संभव नहीं है।
रेडियो समाचार के तीन चरण है-पहले चरण में समाचार विभिन्न स्रोतों से संकलित किया जाता है। दूसरे चरण में समाचारों का चयन होता है तथा तीसरे चरण में समाचार लेखन आता है।
समाचार जनहित एवं राष्ट्रहित होना चाहिए। समाचार सम्पादक मान्यता प्राप्त माध्यमों से ही समाचार स्वीकार करता है।
समाचार छोटे वाक्य एवं सरल भाषा में लिखा जाता है। समाचार संक्षिप्त एवं पूर्ण लिखा जाता है। समाचार में आंकड़ों को कम ही स्थान दिया जाता है। समाचार लिखने के बाद समाचार सम्पादक एक बार पुन: समाचार का अवलोकन करता है। इसके बाद समाचार को `पूल´ में रखा जाता है। पूल का मतलब होता है जहां से समाचार वाचक को समाचार पढ़ने को दिया जाता है। पूल को तीन भागों में रखा गया है-पहले भाग में देशी समाचार रखे जाते है। राजनीतिक समाचार भी इस पूल में रखे जाते है। दूसरे भाग में विदेशी समाचार को रखा जाता है। खेल समाचार तीसरे पूल में रखे जाते है। प्रत्येक बुलेटिन के लिए अलग-अलग पूल होता है। संसद समाचारों के लिए अलग पूल की व्यवस्था होती है।
बुलेटिन की जीवंतता, सफलता और प्रभावपूर्णता सम्पादक की कुशलता की परिचायक होती है। समाचारों में विराम की भी व्यवस्था है। इस अवसर पर समाचार वाचक कहता है-`ये समाचार आप आकाशवाणी से सुन रहे हैं, या ये समाचार आकाशवाणी से प्रसारित किये जा रहे है।

गुणात्मक अनुसंधान


गुणात्मक अनुसंधान कई अलग शैक्षणिक विषयों में विनियोजित, पारंपरिक रूप से सामाजिक विज्ञान, साथ ही बाज़ार अनुसंधान और अन्य संदर्भों में जांच की एक विधि है.[1] गुणात्मक शोधकर्ताओं का उद्देश्य मानवीय व्यवहार और ऐसे व्यवहार को शासित करने वाले कारणों को गहराई से समझना है. गुणात्मक विधि निर्णय के न केवल क्या , कहां , कब की छानबीन करती है, बल्कि क्यों और कैसे को खोजती है. इसलिए, बड़े नमूनों की बजाय अक्सर छोटे पर संकेंद्रित नमूनों की ज़रूरत होती है.
गुणात्मक विधियां केवल विशिष्ट अध्ययन किए गए मामलों पर जानकारी उत्पन्न करती हैं, और इसके अतिरिक्त कोई भी सामान्य निष्कर्ष केवल परिकल्पनाएं (सूचनात्मक अनुमान) हैं. इस तरह की परिकल्पनाओं में सटीकता के सत्यापन के लिए मात्रात्मक पद्धतियों का प्रयोग किया जा सकता है.

अनुक्रम

इतिहास

1970 के दशक तक, वाक्यांश 'गुणात्मक अनुसंधान' का उपयोग केवल मानव-विज्ञान या समाजशास्त्र के एक विषय का उल्लेख करने के लिए होता था. 1970 और 1980 दशक के दौरान गुणात्मक अनुसंधान का इस्तेमाल अन्य विषयों के लिए भी किया जाने लगा, और यह शैक्षिक अध्ययन, सामाजिक कार्य अध्ययन, महिला अध्ययन, विकलांगता अध्ययन, सूचना अध्ययन, प्रबंधन अध्ययन, नर्सिंग सेवा अध्ययन, राजनैतिक विज्ञान, मनोविज्ञान, संचार अध्ययन और कई अन्य क्षेत्रों में अनुसंधान का महत्वपूर्ण प्रकार बन गया. इस अवधि में उपभोक्ता उत्पादों में गुणात्मक अनुसंधान होने लगा, जहां शोधकर्ता नए उपभोक्ता उत्पादों और उत्पाद स्थिति/विज्ञापन के अवसरों पर जांच करने लगे. प्रारंभिक उपभोक्ता अनुसंधान अग्रदूतों में शामिल हैं डेरियन, CT में द जीन रेइली ग्रूप के जीन रेइली, टैरीटाउन, NY में जेरल्ड शोएनफ़ेल्ड एंड पार्टनर्स के जेरी शोएनफ़ेल्ड और ग्रीनविच, CT में कॉले एंड कंपनी के मार्टिन कॉले, साथ ही लंदन, इंग्लैंड के पीटर कूपर तथा मिशन, ऑस्ट्रेलिया में ह्यू मैके.[कृपया उद्धरण जोड़ें] वैसे गुणात्मक बनाम मात्रात्मक अनुसंधान के उचित स्थान के बारे में असहमति जारी रही है. 1980 और 1990 दशक के अंत में मात्रात्मक पक्ष की ओर से आलोचनाओं की बाढ़ के बाद, डेटा विश्लेषण की विश्वसनीयता और अनिश्चित विधियों के संबंध में परिकल्पित समस्याओं से निबटने के लिए गुणात्मक अनुसंधान की नई पद्धतियां विकसित हुईं.[2] इसी दशक के दौरान, पारंपरिक मीडिया विज्ञापन खर्च में एक मंदी रही, जिसकी वजह से विज्ञापन से संबंधित अनुसंधान को अधिक प्रभावी बनाने में रुचि बढ़ गई.
पिछले तीस वर्षों में पत्रिका प्रकाशकों और संपादकों द्वारा गुणात्मक अनुसंधान की स्वीकृति बढ़ने लगी है. इससे पहले कई मुख्यधारा की पत्रिकाओं का झुकाव प्राकृतिक विज्ञान आधारित तथा मात्रात्मक विश्लेषण वाले शोध लेखों की ओर था[3].

मात्रात्मक अनुसंधान से भेद

(सरल शब्दों में - गुणात्मक से तात्पर्य है गैर संख्यात्मक डेटा संग्रहण या ग्राफ़ या डेटा स्रोत की विशेषताओं पर आधारित स्पष्टीकरण. उदाहरण के लिए, यदि आपसे विविध रंगों में प्रदर्शित थर्मल छवि को गुणात्मक दृष्टि से समझाने के लिए कहा जाता है, तो आप ताप के संख्यात्मक मान के बजाय रंगों के भेदों की व्याख्या करने लगेंगे.)
प्रथमतः, मामलों का इस आधार पर उद्देश्यपूर्ण चुनाव हो सकता है कि वे कतिपय विशेषताओं या प्रासंगिक स्थानों के अनुसार हैं या नहीं. दूसरे, शोधकर्ता की भूमिका या स्थिति पर अधिक गंभीरता से ध्यान दिया जाता है. यह इस वजह से कि गुणात्मक अनुसंधान में शोधकर्ता द्वारा 'तटस्थ' या मीमांसात्मक स्थिति अपनाने की संभाव्यता को व्यवहार में और/या दार्शनिक रूप से अधिक समस्यात्मक माना गया है. इसलिए गुणात्मक शोधकर्ताओं से अक्सर अनुसंधान की प्रक्रिया में अपनी भूमिका पर विचार करने और अपने विश्लेषण में इसे स्पष्ट करने को प्रोत्साहित किया जाता है. तीसरे, जहां गुणात्मक डेटा विश्लेषण विस्तृत विविध रूप ग्रहण कर सकता है, वहीं यह मात्रात्मक शोध से भाषा, संकेत और तात्पर्य पर संकेंद्रण तथा साथ ही, अतिसरल और अलगाव के बजाय समग्र और प्रासंगिक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से भिन्न हो जाता है. फिर भी, विश्लेषण के व्यवस्थित और पारदर्शी दृष्टिकोण को लगभग हमेशा ही यथातथ्यता के लिए आवश्यक माना जाता है. उदाहरण के लिए, कई गुणात्मक विधियों में शोधकर्ताओं को ध्यानपूर्वक डेटा कोड करने और एक सुसंगत और विश्वसनीय तरीके से विषयों पर विचार और प्रलेखित करने की अपेक्षा की जाती है.
संभवतः सामाजिक विज्ञान में प्रयुक्त गुणात्मक और मात्रात्मक अनुसंधान का अधिक पारंपरिक भेद, पर्यवेक्षण (अर्थात् परिकल्पना-सृजन) उद्देश्य के लिए या उलझन में डालने वाले मात्रात्मक परिणामों की व्याख्या के लिए गुणात्मक तरीक़ों के इस्तेमाल में है, जबकि मात्रात्मक पद्धतियों का उपयोग परिकल्पनाओं के परीक्षण के लिए किया जाता है. इसका कारण यह है कि सामग्री की वैधता की स्थापना को - कि क्या वे उन मानों को मापती हैं जिन्हें शोधकर्ता समझता है कि वे माप रही हैं? - एक गुणात्मक अनुसंधान के ताकत के रूप में देखा जाता है. जबकि मात्रात्मक पद्धतियों को संकेंद्रित परिकल्पनाओं, माप उपकरणों और प्रायोगिक गणित के माध्यम से अधिक निरूपक, विश्वसनीय और सटीक माप प्रदान करने वाले के रूप में देखा गया है. इसके विपरीत, गुणात्मक डेटा को आम तौर पर ग्राफ या गणितीय संदर्भ में प्रदर्शित करना मुश्किल है.
गुणात्मक अनुसंधान का उपयोग अक्सर नीति और कार्यक्रम मूल्यांकन अनुसंधान के लिए किया जाता है क्योंकि वह मात्रात्मक दृष्टिकोण की तुलना में कतिपय महत्वपूर्ण प्रश्नों का अधिक कुशलता और प्रभावी ढंग से उत्तर दे सकती है. यह विशेष रूप से यह समझने के लिए है कि कैसे और क्यों कुछ परिणाम हासिल हुए हैं (सिर्फ़ इतना ही नहीं कि परिणाम क्या रहा) बल्कि प्रासंगिकता, अनपेक्षित प्रभावों और कार्यक्रमों के प्रभाव के बारे में महत्वपूर्ण सवालों का जवाब देने के लिए भी, जैसे कि: क्या अपेक्षाएं उचित थीं? क्या प्रक्रियाओं ने अपेक्षानुरूप काम किया? क्या प्रमुख घटक अपने कर्त्तव्यों को पूरा करने में सक्षम थे? क्या कार्यक्रम का कोई अवांछित प्रभाव रहा था? गुणात्मक दृष्टिकोण में प्रतिक्रियाओं की अधिक विविधता के मौके अनुमत करने के अलावा अनुसंधान प्रक्रिया के दौरान ही नए विकास या मुद्दों को अनुकूल बनाने की क्षमता की सुविधा मौजूद है. जहां गुणात्मक अनुसंधान महंगा और संचालन में ज़्यादा समय ले सकता है, कई क्षेत्र ऐसे गुणात्मक तकनीकों को लागू करते हैं, जो अधिक सारगर्भित, किफ़ायती और सामयिक परिणाम देने के लिए विशेष रूप से विकसित किए गए हों. इन अनुकूलनों का एक औपचारिक उदाहरण है त्वरित ग्रामीण मूल्यांकन, पर ऐसे और भी कई मौजूद हैं.

डेटा संग्रहण

गुणात्मक शोधकर्ता डेटा संग्रहण के लिए कई अलग दृष्टिकोण अपना सकते हैं, जैसे कि बुनियादी सिद्धांत अभ्यास, आख्यान, कहानी सुनाना, शास्त्रीय नृवंशविज्ञान या प्रतिच्छाया. कार्य-अनुसंधान या कार्यकर्ता-नेटवर्क सिद्धांत जैसे अन्य सुव्यवस्थित दृष्टिकोण में भी गुणात्मक विधियां शिथिल रूप से मौजूद रहती हैं. संग्रहित डेटा प्रारूप में साक्षात्कार और सामूहिक चर्चाएं, प्रेक्षण और प्रतिबिंबित फील्ड नोट्स, विभिन्न पाठ, चित्र, और अन्य सामग्री शामिल कर सकते हैं.
गुणात्मक अनुसंधान परिणामों को व्यवस्थित तथा रिपोर्ट करने के लिए अक्सर डेटा को पैटर्न में प्राथमिक आधार के रूप में वर्गीकृत करता है.[कृपया उद्धरण जोड़ें]गुणात्मक शोधकर्ता आम तौर पर सूचना एकत्रित करने के लिए निम्न पद्धतियों का सहारा लेते हैं: सहभागी प्रेक्षण, गैर सहभागी प्रेक्षण, फील्ड नोट्स, प्रतिक्रियात्मक पत्रिकाएं, संरचित साक्षात्कार, अर्द्ध संरचित साक्षात्कार, असंरचित साक्षात्कार और दस्तावेजों व सामग्रियों का विश्लेषण [4].
सहभागिता और प्रेक्षण के तरीक़े सेटिंग दर सेटिंग व्यापक रूप से भिन्न हो सकते हैं. सहभागी प्रेक्षण प्रतिक्रियात्मक सीख की रणनीति है, न कि प्रेक्षण की एकल पद्धति[5]. सहभागी प्रेक्षण में [1] शोधकर्ता आम तौर पर एक संस्कृति, समूह, या सेटिंग के सदस्य बनते हैं और उस सेटिंग के अनुरूप भूमिका अपनाते हैं. ऐसा करने का उद्देश्य शोधकर्ता को संस्कृति की प्रथाएं, प्रयोजन और भावनाओं के प्रति निकटस्थ अंतर्दृष्टि का लाभ उपलब्ध कराना है. यह तर्क दिया जाता है कि संस्कृति के अनुभवों को समझने के प्रति शोधकर्ताओं की क्षमता में अवरोध उत्पन्न हो सकता है अगर वे बिना भाग लिए निरीक्षण करते हैं.
कुछ विशिष्ट गुणात्मक विधियां हैं फोकस समूहों का उपयोग और प्रमुख सूचक साक्षात्कार. फोकस समूह तकनीक में शामिल होता है एक मध्यस्थ जो किसी विशिष्ट विषय पर चयनित व्यक्तियों के बीच एक छोटी चर्चा को आयोजित करता है. यह बाज़ार अनुसंधान और प्रयोक्ता/कार्यकर्ताओं के साथ नई पहल के परीक्षण की विशेष रूप से लोकप्रिय विधि है.
गुणात्मक अनुसंधान का एक पारंपरिक और विशेष स्वरूप संज्ञानात्मक परीक्षण या प्रायोगिक परीक्षण कहलाता है जिसका उपयोग मात्रात्मक सर्वेक्षण मदों के विकास के लिए किया जाता है. सर्वेक्षण मदों का अध्ययन प्रतिभागियों पर प्रयोग किया जाता है ताकि मदों की विश्वसनीयता और वैधता की जांच की जा सके.
शैक्षिक सामाजिक विज्ञान में अक्सर इस्तेमाल किए जाने वाले गुणात्मक अनुसंधान दृष्टिकोण में निम्नलिखित शामिल हैं:
  1. संस्कृतियों की जांच के लिए प्रयुक्त नृवंशविज्ञान अनुसंधान, जहां सिद्धांत के विकास में मदद के उद्देश्य से डेटा संग्रहित और वर्णित किया जाता है. यह विधि "जाति-सुव्यवस्था" या "लोगों की कार्यप्रणाली" भी कहलाती है. प्रयोज्य नृवंशविज्ञान शोध का एक उदाहरण है, एक विशेष संस्कृति का अध्ययन और उनके सांस्कृतिक ढांचे में किसी एक विशेष बीमारी की भूमिका के बारे में उनकी समझ.
  2. महत्वपूर्ण सामाजिक अनुसंधान शोधकर्ताओं द्वारा यह समझने के लिए प्रयोग किया जाता है कि कैसे लोगों के बीच संप्रेषण और प्रतीकात्मक अर्थों का विकास होता है.
  3. नैतिक जांच नैतिक समस्याओं का एक बौद्धिक विश्लेषण है. इसमें बाध्यता, अधिकार, कर्तव्य, सही और ग़लत, चुनाव आदि के संदर्भ में नैतिकता का अध्ययन शामिल है.
  4. मूलभूत अनुसंधान, विज्ञान के लिए नींव की जांच, मान्यताओं का विश्लेषण करता है और यह निर्दिष्ट करने के लिए तरीक़ों को विकसित करता है कि नई सूचना के प्रकाश में किस तरह ज्ञान का आधार बदलना चाहिए.
  5. ऐतिहासिक अनुसंधान, वर्तमान स्थिति के संदर्भ में विगत और वर्तमान घटनाओं की चर्चा को अनुमत करता है, और लोगों को सोचने और वर्तमान मुद्दों और समस्याओं के संभाव्य समाधान उपलब्ध कराने का मौक़ा देता है. ऐतिहासिक अनुसंधान हमारे ऐसे सवालों का जवाब देने में मदद करता है: हम कहां से आए हैं, हम कहां पर हैं, हम अब क्या हैं और हम किस दिशा में जा रहे हैं?
  6. बुनियादी सिद्धांत एक आगमनात्मक प्रकार का अनुसंधान है, जो उन प्रेक्षणों या डेटा पर आधारित या "स्थापित" है जिनसे उसका विकास हुआ है; वह विविध डेटा स्रोतों का इस्तेमाल करता है जिनमें शामिल हैं मात्रात्मक डेटा, अभिलेखों की समीक्षा, साक्षात्कार, प्रेक्षण और सर्वेक्षण.
  7. घटना-क्रिया-विज्ञान, अन्वेषणाधीन व्यक्तियों द्वारा परिकल्पित किसी घटना की "स्वानुभूतिमूलक वास्तविकता" को वर्णित करता है; यह घटना का एक अध्ययन है.
  8. दार्शनिक अनुसंधान, क्षेत्र विशेषज्ञों द्वारा अध्ययन या व्यवसाय के किसी विशिष्ट क्षेत्र की सीमाओं के भीतर आयोजित किया जाता है, अध्ययन के किसी भी क्षेत्र में सबसे योग्य व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त बौद्धिक विश्लेषण का उपयोग, ताकि परिभाषाओं को स्पष्ट कर सकें, नैतिकता को पहचान सकें, या अपने अध्ययन के क्षेत्र में किसी मुद्दे से संबंधित मूल्यवान निर्णय ले सकें.

डेटा विश्लेषण

व्याख्यात्मक तकनीक
गुणात्मक डेटा का सर्व सामान्य विश्लेषण पर्यवेक्षक प्रभाव है. अर्थात्, विशेषज्ञ या दर्शक प्रेक्षक डेटा की जांच करते हैं, एक धारणा बनाने के ज़रिए उसे समझते हैं और अपने प्रभाव को संरचनात्मक और कभी-कभी मात्रात्मक रूप में रिपोर्ट करते हैं.
कोडिंग
कोडिंग इस अर्थ में एक व्याख्यात्मक तकनीक है कि दोनों डेटा को सुव्यवस्थित करते हैं और कुछ मात्रात्मक पद्धतियों में उन निर्वचनों को प्रवर्तित करने के लिए साधन उपलब्ध कराते हैं. अधिकांश कोडिंग में विश्लेषक को डेटा के पठन और उसके खंडों को सीमांकित करना पड़ता है. प्रत्येक खंड पर एक "कोड" का लेबल लगा होता है - आम तौर पर एक शब्द या छोटा वाक्यांश, जो यह जताता है कि कैसे संबद्ध डेटा खंड अनुसंधान के उद्देश्यों को सूचित करते हैं. जब कोडिंग पूरा हो जाता है, विश्लेषक निम्न के मिश्रण के माध्यम से रिपोर्ट तैयार करता है: कोड के प्रचलन का सारांश, विभिन्न मूल स्रोत/संदर्भों के पार संबंधित कोड में समानताओं और विभिन्नताओं पर चर्चा, या एक या अधिक कोडों के बीच संबंध की तुलना.
कुछ उच्च संरचना वाले गुणात्मक डेटा (उदा., सर्वेक्षणों से विवृत्तांत प्रतिक्रियाएं या दृढ़तापूर्वक परिभाषित साक्षात्कार प्रश्न) आम तौर पर सामग्री के अतिरिक्त विभाजन के बिना ही कोडित किए जाते हैं. इन मामलों में, कोड को अक्सर डेटा की ऊपरी परत के रूप में लागू किया जाता है. इन कोडों के मात्रात्मक विश्लेषण आम तौर पर इस प्रकार के गुणात्मक डेटा के लिए कैप्स्टोन विश्लेषणात्मक क़दम है.
कभी-कभी समकालीन गुणात्मक डेटा विश्लेषण कंप्यूटर प्रोग्राम द्वारा समर्थित होते हैं. ये प्रोग्राम कोडिंग के व्याख्यात्मक स्वभाव को नहीं निकालते, बल्कि डाटा संग्रहण/पुनर्प्राप्ति में विश्लेषक की दक्षता को बढ़ाने और डेटा पर कोड लागू करने के उद्देश्य को पूरा करते हैं. कई प्रोग्राम संपादन और कोडिंग के संशोधन क्षमता की पेशकश करते हैं, जो काम साझा करने, सहकर्मी समीक्षा, और डेटा के पुनरावर्ती परीक्षण को अनुमत करते हैं.
कोडिंग विधि की एक लगातार होने वाली आलोचना है कि यह गुणात्मक डेटा को मात्रात्मक डेटा में बदलने का प्रयास करता है, जिससे डेटा की विविधता, समृद्धि, और व्यक्तिगत स्वभाव समाप्त हो जाता है. विश्लेषक पूरी तरह अपने कोड की परिभाषा के प्रतिपादन और उन्हें अंतर्निहित डेटा के साथ बख़ूबी जोड़ते हुए, कोडों की मात्र सूची से अनुपस्थित समृद्धि को वापस लाकर इस आलोचना का जवाब देते हैं.
प्रत्यावर्ती पृथक्करण
कुछ गुणात्मक डेटासेटों का बिना कोडिंग के विश्लेषण किया जाता है. यहां एक सामान्य विधि है प्रत्यावर्ती पृथक्करण, जहां डेटासेटों का सारांश निकाला जाता है, और फिर उनको संक्षिप्त किया जाता है. अंतिम परिणाम एक अधिक सुसंबद्ध सार होता है जिन्हें आसवन के पूर्ववर्ती चरणों के बिना सटीक रूप से पहचानना मुश्किल होता है.
प्रत्यावर्ती पृथक्करण की एक लगातार की जाने वाली आलोचना यह है कि अंतिम निष्कर्ष अंतर्निहित डेटा से कई गुणा हट कर होता है. हालांकि यह सच है कि ख़राब प्रारंभिक सारांश निश्चित रूप से एक त्रुटिपूर्ण अंतिम रिपोर्ट उत्पन्न करेंगे, पर गुणात्मक विश्लेषक इस आलोचना का जवाब दे सकते हैं. वे कोडन विधि का उपयोग करने वाले लोगों की तरह, प्रत्येक सारांश चरण के पीछे तर्क के दस्तावेजीकरण द्वारा, जहां बयान शामिल हों डेटा से और जहां बयान शामिल ना हों, मध्यवर्ती सारांशों से उदाहरणों का हवाला देते हुए ऐसा करते हैं.
यांत्रिक तकनीक
कुछ तकनीक गुणात्मक डेटा के विशाल सेटों को स्कैन करते हुए तथा छांटते हुए कंप्यूटरों के उत्तोलन पर निर्भर करते हैं. अपने सर्वाधिक बुनियादी स्तर पर, यांत्रिक तकनीक डेटा के भीतर शब्द, वाक्यांश, या टोकन के संयोग की गिनती पर निर्भर होते हैं. अक्सर सामग्री विश्लेषण के रूप में संदर्भित, इन तकनीकों के आउटपुट कई उन्नत सांख्यिकीय विश्लेषणों के प्रति उत्तरदायी होते हैं.
यांत्रिक तकनीक विशेष रूप से कुछ परिदृश्यों के लिए अधिक उपयुक्त हैं. एक ऐसा परिदृश्य ऐसे विशाल डेटासेटों के लिए है जिसका प्रभावी ढंग से विश्लेषण मानव के लिए बस संभव नहीं, या उनमें आवेष्टित सूचना के मूल्य की तुलना में उनका विश्लेषण लागत की दृष्टि से निषेधात्मक है. एक अन्य परिदृश्य है जब एक डाटासेट का मुख्य मूल्य उस सीमा तक है जहां वह "लाल झंडा" (उदा., चिकित्सीय परीक्षण में रोगियों के लंबे जर्नल डेटासेट के अंतर्गत कुछ प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्ट के लिए खोज) या "हरा झंडा" (उदा., बाज़ार के उत्पादों की सकारात्मक समीक्षा में अपने ब्रांड का उल्लेख खोजना) लिए हुए है.
यांत्रिक तकनीक की एक सतत आलोचना मानव अनुवादक का अभाव है. और जहां इन तरीकों के स्वामी कुछ मानवीय निर्णयों की नकल करने के लिए अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर लिखने में सक्षम हैं, "विश्लेषण" का अधिकांश हिस्सा बिना मानव के है. विश्लेषक अपने तरीकों के सापेक्ष मूल्य को या तो क) डेटा के विश्लेषण के लिए मानव टीम को काम पर रखने और उनके प्रशिक्षण द्वारा या ख) किसी कार्रवाई योग्य पिंड को अनदेखा छोड़ते हुए, डेटा को अछूता जाने देते हुए, प्रमाणन द्वारा प्रतिक्रिया जताते हैं.

निदर्शनात्मक मतभेद

समकालीन गुणात्मक अनुसंधान अन्य बातों के साथ-साथ वैधता, नियंत्रण, डेटा विश्लेषण, सत्तामीमांसा, और ज्ञान-मीमांसा की संकल्पनात्मक और वैचारिक चिंताओं को प्रभावित करने वाले कई अलग निदर्शनों से किया जाता है. पिछले 10 वर्षों में आयोजित शोध अधिक व्याख्यात्मक, आधुनिकोत्तर, और आलोचनात्मक व्यवहारों के प्रति विशिष्ट झुकाव लिए हैं[6]. गुबा और लिंकन (2005) समकालीन गुणात्मक अनुसंधान के पांच प्रमुख निदर्शनों की पहचान करते हैं: निश्चयात्मक, निश्चयोत्तर, आलोचनात्मक सिद्धांत, रचनात्मक और सहभागी/सहकारी[7]. गुबा और लिंकन द्वारा सूचीबद्ध प्रत्येक निदर्शन, मूल्य-मीमांसा, अभिप्रेत अनुसंधान कार्रवाई, अनुसंधान प्रक्रिया/परिणामों का नियंत्रण, सत्य और ज्ञान की नींव के साथ संबंध, वैधता (नीचे देखें), पाठ प्रतिनिधित्व और शोधकर्ता/प्रतिभागियों की आवाज़. और अन्य निदर्शनों के साथ अनुरूपता के स्वयंसिद्ध मतभेदों द्वारा अभिलक्षित हैं. विशेष रूप से, स्वयंसिद्धि में वह सीमा शामिल हैं जहां तक निदर्शनात्मक चिंताएं "उन तरीक़ों से एक दूसरे के प्रति बाद में ठीक बैठाई जा सकती हैं, जो दोनों के एक साथ अभ्यास को संभव कर सके"[8]. निश्चयात्मक और निश्चयोत्तर निदर्शन स्वयंसिद्ध मान्यताओं को साझा करते हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर आलोचनात्मक, रचनावादी, और सहभागी निदर्शनों के साथ अतुलनीय हैं. इसी तरह, आलोचनात्मक, रचनावादी, और सहभागी निदर्शन कुछ मुद्दों पर स्वयंसिद्ध हैं (जैसे, अभिप्रेत कार्रवाई और पाठ का प्रतिनिधित्व).

अनुसमर्थन

गुणात्मक अनुसंधान का एक केंद्रीय मुद्दा है वैधता (जो विश्वसनीयता और/या निर्भरता के रूप में भी जाना जाता है). वैधता को स्थापित करने के कई अलग तरीक़े हैं, जिनमें शामिल हैं: सदस्य जांच, साक्षात्कारकर्ता पुष्टीकरण, सहकर्मी से जानकारी लेना, लंबे समय तक विनियोजन, नकारात्मक मामला विश्लेषण, लेखांकनक्षमता, पुष्टिकरणक्षमता, बराबर समझना, और संतुलन. इनमें से अधिकांश तरीकों को लिंकन और गुबा (1985) ने गढ़ा है, या कम से कम व्यापक रूप से वर्णित किया है[9].

शैक्षिक अनुसंधान

1970 दशक के अंत तक कई प्रमुख पत्रिकाओं ने गुणात्मक शोध लेखों का प्रकाशन आरंभ कर दिया[3] और कई नई पत्रिकाएं उभरीं जिन्होंने गुणात्मक अनुसंधान पद्धतियों के बारे में केवल गुणात्मक अनुसंधानपरक अध्ययनों और लेखों को प्रकाशित किया[10].
1980 और 1990 दशक में, नई गुणात्मक अनुसंधान पत्रिकाओं का ध्यान संकेंद्रन विविध विषयक हो गया, जो गुणात्मक अनुसंधान के पारंपरिक मूल यथा नृविज्ञान, समाजशास्त्र और दर्शन से परे देखने लगीं[10].
नई सहस्राब्दी ने प्रति वर्ष कम से कम एक नई गुणात्मक शोध पत्रिका के प्रवर्तन सहित, गुणात्मक अनुसंधान के क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाली पत्रिकाओं की संख्या में नाटकीय वृद्धि देखी.

इन्हें भी देंखे

  • विश्लेषणात्मक प्रेरण
  • वृत्त अध्ययन
  • सामग्री विश्लेषण
  • आलोचनात्मक नृवंशविज्ञान
  • विवेचनात्मक सिद्धांत
  • द्वंद्वात्मक अनुसंधान
  • भाषण विश्लेषण
  • शैक्षणिक मनोविज्ञान
  • प्रजाति-वर्गीकरण
  • नृवंशविज्ञान
  • फ़्लाइव्बजर्ग बहस
  • संकेंद्रण समूह
  • बुनियादी सिद्धांत
  • भाष्यविज्ञान
  • ऑनलाइन शोध समुदाय
  • सहयोगी कार्रवाई अनुसंधान
  • घटना-क्रिया विज्ञान
  • फ़िनॉमिनोग्राफ़ी
  • गुणात्मक अर्थशास्त्र
  • मात्रात्मक अनुसंधान
  • गुणात्मक विपणन अनुसंधान
  • गुणात्मक मनोवैज्ञानिक अनुसंधान
  • प्रतिचयन (वृत्त अध्ययन)
  • सार्थकता
  • सैद्धांतिक नमूना

नोट

  1. डेनज़िन, नॉर्मन के. और लिंकन, युवोना एस.((सं.). (2005). द सेज हैंडबुक ऑफ़ क्वालिटेटिव रिसर्च (तीसरा सं.). थाउसंड ओक्स, सी.ए.: सेज. ISBN 0-7619-2757-3
  2. टेलर, 1998
  3. 3.0 3.1 लोसेक, डोनिलीन आर. और काहिल, स्पेन्सर ई. (2007). "पब्लिशिंग क्वालिटेटिव मैनुस्क्रिप्ट्स: लेसन्स लर्न्ड". सी. सील, जी. गोबो, जे.एफ़.गुब्रियम, और डी.सिल्वरमैन (सं.), क्वालिटेटिव रिसर्च प्रैक्टिस: कन्साइस पेपरबैक एडिशन , पृ. 491-506. लंदन: सेज. ISBN 978-1-7619-4776-9
  4. मार्शल, कैथरीन और रोसमैन, ग्रेशेन बी. (1998). डिजाइनिंग क्वालिटेटिव रिसर्च . थाउसंड ओक्स, सी.ए.: सेज. ISBN 0-7619-1340-8
  5. लिंडलोफ़, टी.आर., और टेलर, बी.सी. (2002) क्वालिटेटिव कम्यूनिकेशन रिसर्च मेथड्स: दूसरा संस्करण. थाउसंड ओक्स, सी.ए.: सेज पब्लिकेशन्स, इंक ISBN 0-7619-2493-0
  6. गुबा, ई.जी. और लिंकन, वाई.एस. (2005). "पैराडिग्मैटिक कॉन्ट्रोवर्सिस, कॉन्ट्रडिक्शन्स, एंड एमर्जिंग इन्फ्लुएंसस" एन.के. डेन्ज़िन और वाई.एस. लिंकन (सं.) द सेज हैंडबुक ऑफ़ क्वालिटेटिव रिसर्च (तीसरा संस्करण), पृ. 191-215. थाउसंड ओक्स, सी.ए.: सेज. ISBN 0-7619-2757-3
  7. गुबा, ई.जी., और लिंकन, वाई.एस. (2005). "पैराडिग्मैटिक कॉन्ट्रोवर्सिस, कॉन्ट्रोवर्सिस, कॉन्ट्रडिक्शन्स, एंड एमर्जिंग इन्फ्लुएंसस" एन.के. डेन्ज़िन और वाई.एस. लिंकन (सं.) द सेज हैंडबुक ऑफ़ क्वालिटेटिव रिसर्च (तीसरा संस्करण), पृ. 191-215. थाउसंड ओक्स, सी.ए.: सेज. ISBN 0-7619-2757-3
  8. गुबा, ई.जी. और लिंकन, वाई.एस. (2005). "पैराडिग्मैटिक कॉन्ट्रोवर्सिस, कॉन्ट्रोवर्सिस, कॉन्ट्रडिक्शन्स, एंड एमर्जिंग इन्फ्लुएंसस" (पृ. 200). एन.के.डेन्ज़िन और वाई.एस. लिंकन (सं.) द सेज हैंडबुक ऑफ़ क्वालिटेटिव रिसर्च (तीसरा संस्करण), पृ. 191-215. थाउसंड ओक्स, सी.ए.: सेज. ISBN 0-7619-2757-3
  9. लिंकन वाई. और गुबा ई.जी. (1985) नैचुरलिस्ट इन्क्वाइरी , सेज पब्लिकेशन्स, न्युबरी पार्क, सी.ए.
  10. 10.0 10.1 डेन्ज़िन, नॉर्मन के. और लिंकन, युवोना एस. (2005). "इंट्रोडक्शन: द डिसिप्लीन एंड प्रैक्टिस ऑफ़ क्वालिटेटिव रिसर्च". एन.के.डेन्ज़िन और वाई.एस. लिंकन (सं.) द सेज हैंडबुक ऑफ़ क्वालिटेटिव रिसर्च (तीसरा संस्करण), पृ. 1-33. थाउसंड ओक्स, सी.ए.: सेज. ISBN 0-7619-2757-3

संदर्भ

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मीडिया कानून की ज़मीनी हक़ीक़त

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  अजय नाथ झा  
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तीन दिन पहले जैसे ही सूचना और प्रसारण मंत्री श्रीमती अंबिका सोनी ने ये घोषणा की कि संसद के इस सत्र में वो ख़बरों के प्रसारण संबंधित एक नए अधिनियम का प्रस्ताव लेकर आएंगी तो हमारी पत्रकार बिरादरी में चिल्ल पौं का बाज़ार फिर से गर्म हो गया।
मंत्री साहिबा ने इतना ही कहा था कि प्रेस एवं पुस्तक पंजीकरण अधिनियम 1867 का मसौदा तैयार कर लिया गया है और वैसे भी इस पीआरबी कानून में सन 1873 से लेकर 1993 के बीच कई बार संशोधन हो चुका है फिर भी कुछ नए बिंदुओं पर विचार करने की आवश्यकता है और इन्हीं संशोधनों पर काम किया जा रहा है।

फिर क्या था मीडिया के पितामह, मित्र और दोहित्र सब मैदान में कूद पड़े। एक पितामह ने ताल ठोक कर कहा”ये सारा खेल एक बार फिर से प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंटने के मकसद से किया जा रहा है और इसके लिए फिर से आवाज़ उठाने की ज़रुरत है।” दो दूसरे ने फरमाया कि विरोध के आवाज़ के लिए मीडिया की जगह घटी है। भारत पूंजीपति विदेशी पूंजी का दलाल है और उसी के इशारे पर दमन की कार्रवाई कर रहा है। श्रीमती सोनी के द्वारा इलेक्ट्रानिक मीडिया पर कुछ अंकुश लगाने और ख़बरों के बाबत एक नई कंटेट कोड के विचार पर तो कई पत्रकारों को लगा कि जैसे भरी दोपहर में बीच चौराहे पर उनका चीर हरण हो जाएगा। तो वो भी कूद पड़े इस आग में  और फिर शुरु हुआ वही पुराना राग।


सच तो ये है कि किसी भी प्रजातांत्रिक पद्धति में सरकार और मीडिया के बीच किसी न किसी विषय पर तूतू-मैंमैं का खेल तो चलता ही रहता है। जब भी सरकार के कारनामे को मीडिया उजागर करके ले आता है तो सरकार मीडिया पर लगाम लगाने की बात करने लगती है और मीडिया फौरन अपनी बुनियादी स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों पर कुठाराघात का राग अलापने लगता है।


भारत में सरकारी तंत्र तथा मीडिया के बीच ख़बरों की सीमा तथा ख़बरियों के अधिकारों को लेकर खींचतान का इतिहास काफी पुराना रहा है। कम्यूनिस्ट या फासीवाद वाले तंत्र में मीडिया की जगह जूते की बराबरी रही है क्योंकि वहां सरकारी तंत्र अपने ख़िलाफ़ एक भी वाक्य सुनना पसंद नहीं करता। यही हाल अरब देशों का है जहां सल्तनत के खिलाफ़ बोलने की सज़ा  फांसी तक हो सकती है।


सिर्फ ब्रिटेन और अमेरिका जैसे लोकतंत्र में मीडिया को सही मायने में आम आदमी की आवाज़ का परिचायक माना गया। प्रजातांत्रिक देशों में लगातार मीडिया का महत्व बढ़ता गया और इसलिए उसे लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाने लगा।


ये मीडिया की साख और कलम की ताक़त थी जिसकी वजह से अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को वाटरगेट कांड की वजह से इस्तीफा देना पड़ा और बिल क्लिंटन भी मोनिका लेविंस्की के चक्कर में बाल-बाल बच गए। दूसरी तरफ भारत जैसे देश में मीडिया को खुले सांड की तरह नहीं छोड़ा गया। मीडिया पर सरकारी तंत्र का प्रभाव और तनाव किस तरह का रहा है इसकी मिसाल सन 1975 में आपातकालीन घोषणा में देखी जा सकती थी।


दरअसल, भारत में मीडिया कानून का इतिहास अंग्रेजी हुकूमत के ज़माने से ही शुरु होता है। सन 1795 में तत्कालीन वायसराय लार्ड वेलेस्ले ने प्रेस रेग्यूलेशन की उदघोषणा की थी जिसके तहत किसी भी नए समाचार पत्र को सरकारी नियमों को सख्ती से पालन करने की हिदायत दी गई थी। उसके बाद सन 1855 में दूसरा प्रेस कानून पास हुआ जिसके तहत समाचार पत्र पर लगाए जाने वाले पाबंदियों की फेहरिस्त थोड़ी और लंबी कर दी गई। उसके बाद आया 18 जून 1857 का गैंगिंग एक्ट जिसके तहत हर नए समाचार पत्र निकालने वाले को सरकार से लाइसेंस प्राप्त करने का प्रावधान जोड़ दिया गया। इस अधिनियम ने सरकार को मीडिया प्रकाशन से लेकर प्रबंधन तक में हस्तक्षेप करने की छूट दे दी। अर्थात सेंसरशिप से लेकर प्रकाशन को स्थगित तथा बंद करने का भी अधिकार दे दिया।


उसके बाद आया प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स एक्ट(पीआरबी एक्ट)। सन 1867 में अस्तित्व में आया ये एक्ट आज भी हमारे मीडिया कानून के साथ जुड़ा हुआ है। इसी कानून के तहत सरकार ने हर  पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशक को लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया। साथ ही सरकार को किसी भी प्रकाशन के बंद करने, उस पर पाबंदी लगाने से लेकर समाचार के चयन तक का अधिकार दे दिया। इस प्रकार प्रकाशकों तथा समाचार पत्र के मालिकों ने काफी विरोध जताया।


सन 1878 में वाइसराय लार्ड ल्यूटन ने वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट की घोषणा की जिसके तहत किसी भी समाचार पत्र में छपे राजद्रोही समाचार के खिलाफ़ सरकार को मीडिया के विरुद्ध सख्ती से कार्रवाई करने का अधिकार दे दिया गया । फिर आया लार्ड मिंटो द्वारा प्रतिपादित न्यूज़पेपर एक्ट 1901, इस एक्ट के द्वारा स्थानीय प्रशासन को किसी भी संपादक के खिलाफ़ कार्रवाई करने की छूट थी। अगर उसके द्वारा छपे समाचार या संपादकीय से ब्रिटिश राज के ख़िलाफ बगावत की बू आ रही हो।


स्वाधीनता के बाद 26 जनवरी 1950 को प्रतिपादित मीडिया रिवोल्यूशन एक्ट अब तक का सबसे अहम प्रेस कानून है। यद्यपि हमारे संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार के तहत गिनाई जाती है मगर सन 1975 में पहली बार श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल के नाम पर प्रेस की स्वतंत्रता पर वज्र प्रहार के बाद देश में मीडिया के अधिकारों को लेकर काफी बवाल मचा। संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल की मेहरबानियों से परेशान मीडिया समाज बड़ा ही कुपित हुआ और कई अख़बारों ने विरोध स्वरुप संपादकीय कॉलम कुछ लिखने के बजाय कोरा छोड़ दिया।


फिर आया 1980 का दशक जिसने सूचना प्रौद्योगिकी के नए क्षितिज और आविष्कारों के ज़रिए ख़बरों की परिधि और परिभाषा ही नहीं बदली बल्कि उसे एक विश्वव्यापी क्रांति की तरह नई दशा और दिशा भी दे दी। बीबीसी और सीएनएन जैसे न्यूज़ चैनलों द्वारा इरान-इराक युद्ध के सीधे प्रसारण से लेकर अब तक मीडिया की पहुंच और ख़बरों की तेज़ी में बढ़ोतरी हुई है वो अपने आप में बेमिसाल है। आज भारत में 56 से ज़्यादा 24 घंटे के ख़बरिया चैनल हैं जिसकी बदोलत छोटी से छोटी ख़बर भी पल भर में पूरे देश में फैल जाती है।


भारत में सन 1992 में सुभाष चंद्रा के चैनल ज़ी टीवी ने दूरदर्शन का वर्चस्व और एकाधिकार तोड़ा और उसके बाद सोनी, एशिया नेट और सन टीवी जैसे निजी चैनलों का प्रादुर्भाव हुआ। सन 1995 में एनडीटीवी भारत की पहली निजी कंपनी बनी जिसे दूरदर्शन पर न्यूज़ टूनाईट दिखाने का ठेका मिला था। जुलाई 1995 में एस पी सिंह की अगुवाई में आज तक नाम से बीस मिनट का हिंदी समाचार कार्यक्रम अरुण पुरी की लिविंग मीडिया कंपनी को दिया गया था। इसके बाद नलिनी सिंह की आंखों देखी जिसका आक्रामक तेवर दर्शकों के लिए एक नया अनुभव था।


तबसे लेकर अब तक के सफ़र में ख़बरिया चैनलों की तादाद में इज़ाफा हुआ है। उनमें दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों की संख्या तो बढ़ी ही है साथ ही मौलिकता और परिपक्वता के अभाव में कई सारी ख़ामियां भी शामिल हो गई हैं। पिछले पांच बरसों में कई ख़बरिया चैनलों द्वारा दिखाई जाने वाली ख़बरों के चयन से संपादन और प्रबंधन की दृष्टि से भी ये लगने लगा कि कहीं न कहीं और कभी-कभार मीडिया के मुंह में लगाम और नाक में नकेल डालने की ज़रुरत है। अन्यथा बेलगाम मीडिया प्रजातंत्र में सबसे बड़ा फोड़ा बन जाएगा।


जब तरुण तेजपाल के तहलका ने कई सनसनीखेज खुलासा करके राजनेताओं का मुखौटा निकालकर फेक दिया था और भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारु लक्ष्मण की सही कीमत बता दी थी और मजदूरों के मसीहा कहे जाने वाले जॉर्ज फर्नाडीज़ के असली चेहरे को उजागर कर दिया था तभी से, सरकारी तंत्र के तांत्रिकों को लगने लगा था कि अगर यही सिलसिला रहा तो फिर कैमरा मच्छर या मक्खी की तरह किसी भी समय किसी भी मंत्री या बाबू के घर में घुसकर उनके मूल का चूल ही हिला देगा। फिर एक बार मीडिया का आत्मावलोकन, आत्म मूल्यांकन और आत्म अनुशासन के नए-नए सुर और राग शुरु हो गए। मगर कुछ बात बनी नहीं और अंत में देश के निजी प्रसारकों के संघ (भारतीय प्रसारक संघ) ने एक प्राधिकरण की स्थापना कर अपनी ईमानदारी का परिचय तो दिया ही साथ ही ये भी माना कि समाज को आइना दिखाने वाले को कभी कभी अपनी शक्ल भी उसमें देखनी चाहिए। इससे कार्यक्रमों का स्तर सुधरने के साथ उनको भी अपनी छवि के पुनर्मूल्यांकन का मौका मिलेगा।


मगर मीडिया के तेज़ी से बदलते परिप्रेक्ष्य और परिदृश्य के मद्देनज़र प्रसारक संघ की अपनी ज़िम्मेदारियों का पूरी तरह निर्वहन करने में नाक़ाम सा साबित होने लगा है। इस संघ की हालत ठीक वैसे ही है जैसे चार-पांच गड़ेरियों ने करीब पांच सौ भेड़-बकरियों को चराने से लेकर घर लाने तक की ज़िम्मेदारी ले ली हो मगर हर दिन चारागाह से लेकर घर के रास्ते में बीस-पच्चीस भेड़ बकरियां आसपास के खेतों में घुसकर सरसों की फसल खा जाए और इन गड़ेरियों को उन भेड़-बकरियों की हिफाज़त करने के चक्कर में खेत मालिकों से भी दो चार करने को मज़बूर होना पड़े।

इसमें को दो राय नहीं कि भारत में मीडिया कानून में कई किस्म के संशोधनों की आवश्यकता है और ये भी उतना ही बड़ा काम है जितना कई बेलगाम ख़बरिया चैनलों को उनकी अपनी सही ज़िम्मेदारियों का एहसास कराना। ऐसे में निजी प्रसारक संघ को इस नए अधिनियम को तटस्थ रुप में देखकर उसके हर पहलू पर संजीदा से गौर करना चाहिए क्योंकि हर अधिकार के साथ कर्तव्य भी जुड़ा होता है और शाश्वत सत्य ये है कि जब हम किसी की तरफ अपनी एक अंगुली उठाते है तो उसी वक्त तीन अंगुलियां हमारी तरफ भी मुड़ी रहती है। 

(लेखक लोकसभा अध्यक्ष और लोकसभा टेलीविज़न के सलाहकार हैं )

सोमवार, 26 नवंबर 2012

इलेक्ट्रोनिक मीडिया और स्टिंग ऑपरेशन:

 

 


इलेक्ट्रोनिक मीडिया और स्टिंग ऑपरेशन 

इलेक्ट्रोनिक मीडिया में स्टिंग ऑपरेशन का बोलबाला है। स्टिंग शब्द 1930 के अमेरिकन स्लेंग से निकलकर आया शब्द है, जिसका अर्थ है, पूर्व नियोजित चोरी या धोखेबाजी की क्रिया। इसके क़रीब चार दशक बाद यह शब्द अमेरिकन उपयोग में आने लगा, जिसका अर्थ था, पुलिस द्वारा नियोजित गुप्त ओप्रशंस जो किसी शातिर अपराधी को फंसाने के लिए किए जाते थे. धीरे-धीरे स्टिंग ऑपरेशन अपराधियों को पकड़ने का कारगर हथियार बन गया. इसकी कामयाबी को देखते हुए मीडिया ने भी इसका इस्तेमाल शुरू कर दिया और इसमें उसे बेहतर नतीजे भी हासिल हुए हैं. स्टिंग ओप्रशंस ख़बरिया चैनलों की टीआरपी बढ़ाने का ज़रिया बन गए हैं. टैम मीडिया रिसर्च इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक़ शक्ति कपूर से जुड़े कास्टिंग काउच के प्रसारण के समय इंडिया टीवी की टीआरपी पांचवें पायदान से पहले पायदान पर आ गई थी. इसी तरह स्टिंग ऑपरेशन दुर्योधन, चक्रव्यूह, घूस महल और ऑपरेशन कलंक ने जहां लोगों को हकीक़त से रूबरू कराया, वहीं चैनलों की टीआरपी बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाई. भारत ही नहीं विदेशों में भी स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिये भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामलों का पर्दाफाश किया गया है. स्टिंग ऑपरेशन एक ऐसा ऑपरेशन होता है, जिसमे डॉक्टर भी मीडिया वाले होते है और मरीज भी उनका मनचाहा होता है. डॉक्टर से मेरा मतलब रिपोर्टर या कैमरामैन से है और मरीज का मतलब वो व्यक्ति जिसे निशाना बनाया जाता है. स्टिंग ऑपरेशन करने से पहले बाकायदा उसका खाका तैयार किया जाता है, दाना डालने में माहिर रिपोर्टर चुना जाता है, दाना डालने से मेरा मतलब है, मरीज को फ़साने के लिए लम्बी लम्बी हांकना और इसके बाद अच्छे कैमरामैन का चुनाव होता है. फ़िर चुना जाता है उस किरदार को जो पूरी स्टोरी का अहम हिस्सा होता है, यानि मरीज... जिसे बकरा भी कहा जाता है. स्टिंग ऑपरेशन में सबसे महत्वपूर्ण होता है कैमरा, जिसके लिए कुछ उन्नत किस्म के छोटे कैमरों का इस्तेमाल किया जाता है, जो सामने वाले को आसानी से दिखाई नही देते। इन सारी चीजों को जब अमल में लाया जाता है तब होता है स्टिंग ओपरेशन.
अमेरिका में 'वाशिंगटन पोस्ट' के बर्नस्टीन और वुडवर्ड नामक दो जासूस पत्रकारों ने 1970 में वाटरगेट कांड का खुलासा करके राष्ट्रपति निक्सन को अपना पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया था. इन दिनों पत्रकारिता जगत विशेषकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में स्टिंग ऑपरेशन का बोलबाला है। स्टिंग शब्द 1930 के अमेरिकन स्लेंग से निकलकर आया शब्द है, जिसका अर्थ है, पूर्व नियोजित चोरी या धोखेबाजी की क्रिया। इसके क़रीब चार दशक बाद यह शब्द अमेरिकन उपयोग में आने लगा, जिसका अर्थ था, पुलिस द्वारा नियोजित गुप्त ओप्रशंस जो किसी शातिर अपराधी को फंसाने के लिए किए जाते थे. धीरे-धीरे स्टिंग ऑपरेशन अपराधियों को पकड़ने का कारगर हथियार बन गया. इसकी कामयाबी को देखते हुए मीडिया ने भी इसका इस्तेमाल शुरू कर दिया और इसमें उसे बेहतर नतीजे भी हासिल हुए हैं. स्टिंग ओप्रशंस ख़बरिया चैनलों की टीआरपी बढ़ाने का ज़रिया बन गए हैं. टैम मीडिया रिसर्च इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक़ शक्ति कपूर से जुड़े कास्टिंग काउच के प्रसारण के समय इंडिया टीवी की टीआरपी पांचवें पायदान से पहले पायदान पर आ गई थी. इसी तरह स्टिंग ऑपरेशन दुर्योधन, चक्रव्यूह, घूस महल और ऑपरेशन कलंक ने जहां लोगों को हकीक़त से रूबरू कराया, वहीं चैनलों की टीआरपी बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाई। भारत ही नहीं विदेशों में भी स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिये भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामलों का पर्दाफाश किया गया है. अमेरिका में 'वाशिंगटन पोस्ट' के बर्नस्टीन और वुडवर्ड नामक दो जासूस पत्रकारों ने 1970 में वाटरगेट कांड का खुलासा करके राष्ट्रपति निक्सन को अपना पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया था।
जनहित में स्टिंग ऑपरेशन करना सही है ये कहना है सुप्रीम कोर्ट का। बीएमडब्लयू मामले में एनडीटीवी के स्टिंग ऑपरेशन को सही ठहराकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत का ये फैसला इसलिए अहम है क्योंकि इससे ये साबित होता है कि पत्रकारिता में स्टिंग ऑपरेशन का इस्तेमाल ग़लत नहीं है यानी स्टिंग ऑपरेशन को इससे कानूनी वैधता मिल गई है। इस लिहाज़ से ये निर्णय पत्रकारिता को फिर से परिभाषित करने वाला है। अदालत ने आरोपियों की हर दलील को ठुकराते हुए कहा कि स्टिंग ऑपरेशन जनहित में था। इसका मतलब है कि अगर जनहित को ध्यान में रखकर स्टिंग ऑपरेशन किए जाते हैं तो वे सही हैं।एनडीटीवी ने दो साल पहले स्टिंग ऑपरेशन करके ये भंडाफोड़ किया था कि मामले से जुड़े दोनों पक्षों के वकील घटना के चश्मदीद गवाह सुनील कुलकर्णी को तोड़ने की कोशश कर रहे हैं। एनडीटीवी के गुप्त कैमरे ने मुख्य अभियुक्त संजीव नंदा के इस हाई प्रोफाइल मामले में दो बड़े वकील आर.के. आनंद (बचाव पक्ष) और आई. यू. ख़ान (सरकारी पक्ष) को उस समय क़ैद कर लिया था जब वे मिलकर गवाह से सौदेबाजी को अंजाम दे रहे थे। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में खुद पहल (सूमो मोटो) करते हुए सुनवाई शुरू कर दी थी। दोनों वकीलों ने आरोप लगाया था कि चैनल ने फूटेज को तोड़-मरोड़कर दिखाया है। मगर बाद में उनके सभी आरोप ग़लत साबित हुए और उन्हें दोषी करार दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से स्टिंग ऑपरेशन को लेकर चल रही बहस को एक नई दिशा मिलेगी। तहलका के द्वारा किए गए भंडाफोड़ के बाद से ही स्टिंग ऑपरेशन के सही-ग़लत होने पर बहस चल रही है। इसके विरोधियों का कहना है कि स्टिंग ऑपरेशन अनैतिक कर्म है क्योंकि ये काम चोरी-छिपे किया जाता है। वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी तो इसे अनैतिक और पत्रकारिता विरूद्ध ही मानते हैं। उनका कहना है कि पत्रकार जासूस नहीं होते और न ही उनका काम जासूसी करना है। इसके अलावा स्टिंग ऑपरेशन में जिस तरह के उपाय इस्तेमाल किए जाते हैं उनको लेकर भी लोगों को आपत्ति थी। आपको याद होगा कि तहलका के ऑपरेशन कॉल गर्ल, शराब और धन का इस्तेमाल किया गया था और इसको लेकर बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। 
मीडिया में स्टिंग ऑपरेशन का चलन काफी पहले से है, पहले प्रिंट मीडिया भी स्टिंग ओपरेशन किया करती थी। अब स्टिंग ओपरेशन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अभिन्न अंग हो गया है। समय समय पर चैनल स्टिंग ऑपरेशन करता आया है। तहलका, इंडिया मोस्ट वांटेड, कोबरा पोस्ट जैसे प्रोग्राम स्टिंग ऑपरेशन के लिए ही जाने जाते है। पैसे लेकर सबाल पूछने का मामला हो, शक्ति कपूर, अमन वर्मा का स्टिंग हो या फ़िर गुजरात चुनाव के पहले किया गया गोधरा कांड का स्टिंग हों, सभी ने हिन्दी चैनलों पर काफी धूम मचाई है। स्टिंग ऑपरेशन आजकल न्यूज़ कम और रिपोर्टर को तरक्की देने वाला माध्यम अधिक बनता जा रहा है, जिससे इसकी सार्थकता पर भी असर पड़ा है। सवाल ये उठता है कि स्टिंग ऑपरेशन कितना सही होता है, आजकल मीडिया के कई दिग्गज भी स्टिंग के ऊपर सवाल उठा रहे है. कुलदीप नय्यर कहते है कि सभी स्टिंग ऑपरेशन ब्लैकमेल करने के लिए होते है. लेकिन मीडिया में ऐसे लोंगो की कमी भी नहीं है, जो इसे जायज़ ठहराते है. दरअसल स्टिंग पत्रकारों के लिए तुरत - फुरत पैसे कमाने का माध्यम बन गया है. मीडिया ने ऐसे कई स्टिंग ऑपरेशन किए है जिसे फर्जी साबित भी किया गया है, जिनमे एक राष्ट्रीय चैनल के द्वारा किया गया, दिल्ली का उमा खुराना का स्टिंग काफी चर्चा में रहा था. इसके अलावा गोधरा स्टिंग पर भी सवाल उठे थे कि, ये ख़ुद मोदी ने करवाया है. कई स्टिंग मीडिया ने लोगों के बेडरूम तक में जाकर किए है, जिसे हरगिज सही नही ठहराया जा सकता, हालाँकि ऐसा नही है, कि सारे स्टिंग ऑपरेशन फर्जी रहे है, लेकिन जो मीडिया आज अपने को समाज का ठेकेदार कहने से बचने लगी है, उसे किसने ये अधिकार दिया है, कि किसी के घर में घुसकर उसकी निजी जिन्दगी से खिलवाड़ किया जाए. वो भी तब जब उसका ख़ुद का दामन दागदार हो...
तहलका काँड के बाद होने वाले कई स्टिंग ऑपरेशन विवादास्पद रहे और उनमें ब्लैकमेलिंग तथा किसी को ज़बरन बदनाम करने के मामले भी सामने आए। चैनलों ने टीआरपी बटोरने के लिए ऐसे स्टिंग ऑपरेशन किए जिनसे ये विधा ही बदनाम होती चली गई। इसके बाद स्टिंग ऑपरेशन के ख़िलाफ़ माहौल बनने लगा। लेकिन इसके उलट कई बहुत अच्छे स्टिंग ऑपरेशन भी हुए, जिनमें ऑपरेशन दुर्योधन और ऑपरेशन चक्रव्यूह आदि प्रमुख हैं। इन स्टिंग ऑपरेशन ने एक बार फिर साबित किया कि जनहित में किए जाने वाले स्टिंग ऑपरेशन की ज़रूरत है और ख़ास तरह के अपराधों को बेनकाब करने के लिए ख़ास तरह की पत्रकारिता की भी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने स्टिंग ऑपरेशन के समर्थकों का पक्ष मज़बूत किया है और इससे उनके हौसले बुलंद होंगे। ये अच्छी बात है मगर इसके अपने जोखिम भी हैं। अभी तक का तज़ुर्बा कहता है कि चैनलों की दिलचस्पी मोटे तौर पर राजनेताओं और सेलेब्रिटियों में ही रहती है। व्यापारियों, उद्योगपतियों के अपराध बेनकाब करने के लिए अभी तक कोई आगे नहीं आया है, जबकि इनमें कहीं ज़्यादा भ्रष्टाचार व्याप्त है। शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि वे उन्हीं के पैसों पर आश्रित हैं। लेकिन जब तक वह इन क्षेत्रों में प्रवेश नहीं करेगा उसकी उपयोगिता भी सीमित और संदिग्ध रहेगी
स्टिंग ऑपरेशन के लिए जहां एक अलग प्रकार की ख़ास भाषा को काम में लिया जाता है. इनमें मुख्य रूप से छोटे कैमरों का इस्तेमाल होता है. रेडियो कोवर्ट कैमरे से 500 फीट की दूरी तक के चित्र आसानी से लिए जा सकते हैं. वायरलैस कलर ब्रूच कैमरे को कपड़ों में कोट पिन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. कोवर्ट टाई में पहना जा सकता है. जैकेट कोवर्ट कैमरे की जैकेट हर साइज़ में बाज़ार में उपलब्ध है. क्योक कोवर्ट कैमरा-घड़ी में छुपे इस कैमरे में पॉकेट पीसी सॉफ्टवेर के साथ रिमोट कंट्रोल, मल्टी मीडिया कार्ड और पॉवर एडेप्टर है. टेबल लैंप वायरलैस कैमरे को टेबल लैंप में आसानी से छुपाया जा सकता है. पेंसिल शार्पनर कैमरे को किसी भी जगह रखा जा सकता है. एयर प्योरिफायर कोवर्ट कैमरा-पर्सनल एयर प्योरिफायर में लगा डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर होता है. फोलिएज बास्केट कैमरे को फूलदान में छुपाया जा सकता है. पोर्टेबल वायरलैस बुक कैमरा-किताब में लगा पिनहोल कैमरा है. स्टिंग ऑपरेशन में सी बिहाइंड-यू सन ग्लासेस भी बहुत काम आता है. बेहद साधारण दिखने वाले इस चश्मे से अपने पीछे हो रही गतिविधियों को आसानी से देखा जा सकता है. टॉकी पिक्चर्स से बोले हुए शब्द की तस्वीर कैमरे में क़ैद की जा सकती है. डिसअपीयरिंग इंक पेन का इस्तेमाल गुप्त सूचनाएं लिखने के लिए किया जाता है. इसमें विशेष प्रकार की स्याही का इस्तेमाल होता है, जिसकी लिखावट 24 घंटे के बाद ख़ुद मिट जाती है. कमरे के बाहर की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए दरवाज़े के पीप होल पर होल व्यूअर लगाया जाता है. बिग इयर से 400 फीट की दूरी से सबकुछ सुना जा सकता है. सिगरेट ट्रांसमीटर से 1200 फीट की दूरी तक सुनाई देता है. लेजर बीम की मदद से किसी भी स्थान पर हो रही बातचीत को कर में बैठे भी सुना जा सकता है. स्पाइप ऐसा उपकरण है जो पाइप सिस्टम के ज़रिये बेसमेंट से बेडरूम में कही गई हर बात पिक कर लेता है. शुगर लंप माइक को आसानी से कहीं भी छुपाया जा सकता है. बगड मैं नामक इस छोटे वाइस रिकॉर्डर को घड़ी, पेन या टाई में लगाया जा सकता है।
इसके अलावा स्टिंग ऑपरेशन में फ़ोन टेपिंग का भी इस्तेमाल किया जाता है. टेलीग्राफ एक्ट, 1885 के गैरकानूनी तरीके से किसी का फ़ोन टेप करने की मनाही है. सरकार विशेष परिस्थिति में किसी के फ़ोन टेप करने की इजाज़त देती है. 1996 में सर्वोच्च न्यायालय ने फ़ोन टेपिंग से संबंधित दिशा-निर्देश तय किए और इसे टेपिंग निजता के अधिकार का उल्लंघन बताया. फ़रवरी 2006 में दूरसंचार विभाग ने फ़ोन टेपिंग से संबंधित नए दिशा-निर्देश जारी किए. इसके तहत फ़ोन टेपिंग मामले में सुरक्षा एजेंसियों और फ़ोन कंपनियों को ज़्यादा जवाबदेह बनाया गया. हालांकि निजी जासूस एजेंसियां, स्टॉक मार्केट ऑपरेटर्स, व्यापारी, शातिर अपराधी और गैरकानूनी एक्सचेंज चलाने वाले बड़े पैमाने पर फ़ोन टेप करते हैं। हालांकि गत अगस्त में 'लाइव इंडिया' द्वारा फ़र्जी स्टिंग ऑपरेशन दिखाए जाने के बाद स्टिंग ओप्रशंस की विश्वसनीयता और ख़बरिया चैनलों के माप-दंडों को लेकर बहस छिड़ गई है. स्टिंग ऑपरेशन के अलावा न्यूज़ चैनलों पर सैक्स स्कैंडल, मशहूर लोगों के चुम्बन दृश्यों और हत्या जैसे जघन्य अपराधों को भी मिर्च-मसाला लगाकर दिखाया जा रहा है. भूत-प्रेत और ओझाओं ने भी न्यूज़ चैनलों में अपनी जगह बना ली है. सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने न्यूज़ चैनलों को फटकार लगाते हुए कहा था कि उन्हें ख़बरें दिखाने के लिए लाइसेंस दिए गए हैं न कि भूत-प्रेत दिखाने के लिए. न्यूज़ चैनलों को मनोरंजन चैनल बनाया जन सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी. उन्होंने न्यूज़ चैनलों पर टिप्पणी करते हुए यहां तक कहा था की अब लालू प्रसाद यादव का तम्बाकू खाना भी ब्रेकिंग न्यूज़ हो जाता है. रिचर्ड गेरे द्वारा शिल्पा शेट्टी को चूमे जाने की घटना को सैकड़ों बार चैनलों पर दिखाए जाने पर भी उन्होंने नाराज़गी जताई थी. ख़बरिया चैनलों के संवाददाताओं पर पीड़ितों को आत्महत्या के लिए उकसाने और भीड़ को भड़काकर लोगों को पिटवाने के आरोप भी लगते रहे हैं।
दरअसल, सारा मामला टीआरपी बढ़ाने और फिर इसके ज़रिये ज़्यादा से ज़्यादा विज्ञापन हासिल कर बेतहाशा दौलत बटोरने का है. एक अनुमान के मुताबिक़ एक अरब से ज़्यादा की आबादी वाले भारत में क़रीब 10 करोड़ घरों में टेलीविज़न हैं. इनमें से क़रीब छह करोड़ केबल कनेक्शन धारक हैं. टीआरपी बताने का काम टैम इंडिया मीडिया रिसर्च नामक संस्था करती है. इसके लिए संस्था ने देशभर में चुनिंदा शहरों में सात हज़ार घरों में जनता मीटर लगाए हुए हैं. इन घरों में जिन चैनलों को देखा जाता है, उसके हिसाब से चैनलों के आगे या पीछे रहने की घोषणा की जाती है. जो चैनल जितना ज़्यादा देखा जाता है वह टीआरपी में उतना ही आगे रहता है और विज्ञापनदाता भी उसी आधार पर चैनलों को विज्ञापन देते हैं. ज़्यादा टीआरपी वाले चैनल की विज्ञापन डरें भी ज़्यादा होती हैं. एक अनुमान के मुताबिक़ टेलीविज़न उद्योग का कारोबार 14,800 करोड़ रुपए का है. 10,500 करोड़ रुपए का विज्ञापन का बाज़ार है और इसमें से क़रीब पौने सात सौ करोड़ रुपए पर न्यूज़ चैनलों का कब्ज़ा है. यहां हैरत की बात यह भी है कि अरब कि आबादी वाले भारत में सात हज़ार घरों के लोगों की पसंद देशभर कि जनता की पसंद का प्रतिनिधित्व भला कैसे कर सकती है? लेकिन विज्ञापनदाता इसी टीआरपी को आधार बनाकर विज्ञापन देते हैं, इसलिए यही मान्य हो चुकी है। इसके अलावा न्यूज़ चैनलों में ख़बरें कम और सस्ता मनोरंजन ज़्यादा से ज़्यादा परोसा जाने लगा है, मगर इस सबके बावजूद हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिये ही भ्रष्टाचार के अनेक बड़े मामले सामने आए हैं, जिन्होंने संसद तक को हिलाकर रख दिया. इसके अलावा अनेक पीड़ितों को इंसाफ़ दिलाने कि मुहिम में भी मीडिया ने सराहनीय भूमिका निभाई है.मीडिया पर लगाम कसने के लिए सरकार नियमन विधेयक-2007 लाने कि बात कर रही है और बाक़ायदा इसके लिए कंटेंट कोड को सभी प्रसारकों के पास सुझावों और आपत्तियों के लिए भेजा गया है, लेकिन सरकार के इस क़दम को लेकर सभी ख़बरिया चैनलों ने हाय-तौबा मचानी शुरू कर दी है।
हालांकि कंटेंट कोड में प्रत्यक्ष रूप से ख़बरिया चैनलों पर सरकारी नियंत्रण कि कोई बात नहीं है, लेकिन इसमें दर्ज नियमों को देखा जाए तो ये चैनलों पर लगाम कसने के लिए काफ़ी हैं. प्रसारकों को जिन बातों पर सख्त एतराज़ है उनमें कंटेंट ऑडिटर कि नियुक्ति और पब्लिक मैसेजिंग सर्विस है. कंटेंट कोड के मुताबिक़ सभी चैनलों को कंटेंट कोड कि नियुक्ति करनी होगी और उन्हें हर प्रसारण सामग्री के लिए सरकार के प्रति जवाबदेह बनाया जाएगा. इसके अलावा पब्लिक मैनेजिंग सर्विस कोड के तहत कुल कंटेंट का 10 फ़ीसदी हिस्सा इससे तय किया जाएगा. सरकार निजी प्रसारकों से जनहित में अपने कसीस भी कार्यक्रम का प्रचार करवा सकती है. हालांकि प्रसारकों ने सरकार कि मंशा को देखते हुए न्यूज़ ब्रोडकास्टर एसोसिएशन (एनबीए) बनाकर मोर्चा संभाल लिया है. उनका कहना है कि सरकार निजी न्यूज़ चैनलों को सरकारी प्रचार के लिए इस्तेमाल करना चाहती है, जिसे क़तई मंज़ूर नहीं किया जा सकता. टीवी चैनलों से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार मीडिया पर किसी भी प्रकार के सरकारी नियंत्रण का विरोध करते हुए कहते हैं कि सरकार खोजी पत्रकारिता पर रोक लगाने के मक़सद से प्रसारण विधेयक ला रही है, क्यूंकि कई स्टिंग ओप्रशनों ने राजनीतिज्ञों के काले कारनामे दिखाकर उनकी पोल खोल दी थी।
समाचार-पत्र अपने विकास का लंबा सफ़र तय कर चुके हैं. उन्होंने प्रेस कि आज़ादी के लिए कई जंगे लड़ी हैं. उन्होंने ख़ुद अपने लिए दिशा-निर्देश तय किए हैं. मगर इलेक्ट्रोनिक मीडिया अभी अपने शैशव काल में है, शायद इसी के चलते उसने आचार संहिता कि धारणा पर विशेष ध्यान नहीं दिया. अब जब सरकार उस पर लगाम कसने कि तैयारी कर रही है तो उसकी नींद टूटी है. सरकार के अंकुश से बचने के लिए ज़रूरी है कि अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण न किया जाए. हर अधिकार कर्तव्य, मर्यादा और जवाबदेही से बंधा होता है. इसलिए बेहतर होगा कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया अपने लिए ख़ुद ही आचार संहिता बनाए और फिर सख्ती से उसका पालन भी करे.